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तेरे प्यार मे....

ये जो कुछ भी हुआ था मुझे उस सच के थोडा और करीब ले गया जिसे दुनिया का हर इन्सान महसूस करना चाहता था . चाची की लेकर मैंने जान लिया था की इस सुख का मजा अप्रतिम है , शायद इसी लिए कविता अपनी खावाहिशो पर काबू नहीं रख पायी थी . खाना खाने के बाद मैं और चाची खेतो के लिए चल दिए.हालाँकि मेरे इस निर्णय से भाभी बिलकुल खुश नहीं थी पर इन हालातो में जब कोई भी मजदुर खेतो की रखवाली के लिए तैयार नहीं था , ये मेरी जिम्मेदारी बनती थी . ये धरती कहने को ही माँ नहीं थी ये माँ का स्वरूप ही थी . किसान के लिए उसकी धरती से बढ़कर भला कौन हो . जो ये समझ ले उस किसान के वारे न्यारे करदे ये धरा.

लालटेन उठाये हम दोनों पैदल ही चले जा रहे थे . धुंध की वजह से थोड़ी परेशानी हो रही थी पर अब चले थे तो पहुंचना था ही . चाची को थोड़ी घबराहट सी हो रही थी उसे डर था की कहीं हम पर हमला न हो जाये और ये डर लाजमी भी थी . पर हम कोई आधे घंटे में कुवे पर पहुँच ही गए. चाची ने कमरा खोला . बिजली गुल थी तो लालटेन की रौशनी का ही सहारा था .

मैं- चाची तुम यही रुको मैं एक चक्कर लगा कर आता हूँ

मैंने खेतो का एक लम्बा चक्कर लगाया सुनिश्चित किया की अभी तो कोई जानवर खेतो में नहीं है . थोडा बहुत कोई जानवर कुछ खा ले तो कोई दीक्क्त नहीं थी पर कई बार जानवर खेतो में ही लड़ पड़ते थे जिस से नुकसान होता था . पर सब कुछ शांत था तो मैं वापिस से कमरे पर आ गया .

चाची ने बिस्तर लगा लिया था. मैंने दरवाजा बंद किया और कपडे उतार कर चाची के बिस्तर में घुस गया .

चाची- कितना ठंडा है तू

मैं-अब नहीं रहूँगा . तुम्हारे आगोश में गरम हो जाऊंगा.

मैंने चाची के ब्लाउज के बटन खोल दिए और उसकी नर्म चुचियो को मसलने लगा.

चाची- ये सब करने के लिए मुझे यहा लाया है न तू

मैं- तुम खुद आई हो मैंने तो कहा था की अकेले ही जाना चाहता हूँ

चाची ने मेरी जांघ पर अपनी जांघ चढ़ाई और बोली- अकेले रहता तो फिर तुझे गर्म कौन करता

चाची ने अपने होंठ मेरे होंठो पर रखे और मुझे चूमने लगी . मैं चाची की नंगी पीठ को सहलाने लगा. .चूमते चूमते चाची का हाथ मेरे लंड पर पहुँच गया था चाची ने मेरे पायजामे को उतार कर फेंक दिया और मेरे लंड से खेलने लगी. कविता के स्पर्श से वो पहले ही उत्तेजित था ऊपर से अब चाची की शरारतो ने उसे और गरम कर दिया था .

“चाची , मुह में लो न इसे ” मेरे होंठो से अपने आप निकल गया . कविता के होंठो की तपिश अब तक मेरे जिस्म को सुलगा रही थी .

चाची थोडा सा निचे को सरकी और अपने चेहरे को मेरे लंड पर झुका दिया. चाची की गीली लिजलिजी जीभ की रगड़ जैसे ही मेरे सुपाडे पर पड़ी आँखे मस्ती के मारे बंद हो गयी .

“आह चाची ” मैं मस्त हो गया .

चाची की पोजिशन इस प्रकार की थी की वो बिस्तर पर घोड़ी बनी हुई मेरा लंड चूस रही थी मैंने चाची के चूतडो को सहलाना शुरू किया गद्देदार गांड का मुलायम अहसास क्या ही कहना . मेरी उंगलिया चाची की गांड के छेद को छूने लगी. जब जब मेरी उंगलिया वहां छूती चाची के बदन में कम्पन होता. चाची अब मेरी गोलियों को अपने दांतों से काट रही थी . बदन में ऐसी मस्ती कभी महसूस नहीं हुई थी .

बेशक मेरे कंधे पर चोट लगी थी पर उस पल किसे परवाह थी . मैंने चाची की भरी जांघो को उठाया और उसे अपनी तरफ खींच लिया चाची की भारी गांड मेरे चेहरे पर आ टिकी.

“पुच ” मैंने चाची की चूत का एक चुम्बन लिया और चाची समझ गयी की आगे क्या होने वाला था . उसने चुतड ऊपर किये और अपनी चूत को मेरे होंठो पर लगा दिया. मुख मैथुन का असली मजा क्या होता है मैंने उस रात में जाना था जब औरत और मर्द एक साथ एक दुसरे के अंगो को चुमते है चूसते है तो बिस्तर पर जो समां बंधता है उसके बताने के लिए शब्द होते ही नहीं .

जब उसकी गांड हिलती तो मेरी जीभ गांड के छेद से टकराती जब जब ऐसा होता चाची अपने दांतों से मेरे लंड को काटती . और फिर एक लम्हा ऐसा भी आया जब मैने उसके चूतडो को मजबूती से थामे हुए कवर गांड के छेद पर ही अपनी जीभ रगडनी शुरू कर दी. सेक्स का ऐसा अद्भुद मजा मैं तो अनजान ही था इस से. चंपा सही ही कहती थी की कबीर एक बार तू इस रसको चख कर तो देख . और उस पल मेरे मन में पहली बार ये ख्याल आया की चंपा को इस सुख का इतना ज्ञान कैसे , क्या चाची के साथ ये सब करके या फिर वो भी लंड खा चुकी थी , अगर ऐसा था तो किसका . मैंने ये पता लगाने का निर्णय किया.

तभी चाची ने मेरे लंड को मुह से निकाला और आगे को सरक गयी. चाची ने थूक से सने लंड को अपनी चूत पर लगाया और उस पर ऊपर निचे होने लगी.

“आह कबीर आःह ” चाची की सिस्कारिया लगतार कमरे में गूंजने लगी. पूरा लंड अन्दर लेने के बाद जब वो अपने कुल्हे हिला हिला कर जो मजा दे रही थी मुझे लगा की जल्दी ही पिघल जाऊंगा मैं . जोश जोश में मैं बिलकुल भूल गया था की मेरी जांघ में ताजा जख्म है जिसका दर्द भी मीठा लग रहा था मुझे.

जी भर कर चुदाई का मजा लेने के बाद हम दोनों लगभग साथ साथ ही झड़ गए थे . गर्म वीर्य की बोछारो ने चाची की चूत को भिगो कर रख दिया. जैसे ही हमारा स्खलन हुआ चाची उठ कर बाहर भागी . इसको क्या हुआ सोचते हुए मैं उसके पीछे गया तो देखा की वो मूत रही थी .

“सुर्र्रर्र्र ” चाची की चूत से पेशाब की धार बह रही थी . फिर चाची ने पानी से अपने बदन को साफ़ किया और बोली- जब तेरा निकलने को हो तो मुझे बता दिया कर , अन्दर मत छोड़ना आगे से .

मैं- ठीक है .

एक तो मेरी हालत नासाज थी ऊपर से चाची जैसी गर्म माल को रगड़ने के बाद थकान होनी थी . मैंने चाची को बाँहों में लिया सो गए. पर बहन की लोडी तक़दीर ने उस रात में कुछ ऐसा लिख दिया था की क्या ही कहूँ. रात को न जाने क्या समय रहा होगा मूत की त्रीव इच्छा की वजह से आँख खुल गयी . मैं बाहर मूतने के लिए आया तो देखा की कुत्ते जोर जोर से रो रहे थे. ऐसा रुदन मैंने कभी नहीं देखा था .

“इन मादरचोदो को क्या हुआ है ” मैंने अपने आप से कहा और उनको भागने के लिए लट्ठ उठा कर उस दिशा में चल दिया जिधर से उनकी आवाजे आ रही थी . जितना मैं चलता आवाजे और दूर हो जाती .पीछा करते करते मैं ठीक उसी जगह पर आन पहुंचा था जहाँ पर उस रात हरिया को मैंने देखा था .

मैंने लालटेन की लौ और ऊंची की ताकि धुंध में ठीक से देख सकू और जब मेरी आँखे कुछ देखने लायक हुई तो उलटी ही आ गयी मुझे. सड़क के बीचो बीच कविता भाभी पड़ी थी उसका पेट खुला हुआ था आंते बाहर को बिखरी हुई थी . वो सिसक रही थी दर्द में और जो सक्श उसके ऊपर झुका हुआ था उसे मेरी उपस्तिथि का भान हो गया था और जब हमारी नजरे मिली .................
 
#31

जब हमारी नजरे मिली तो मेरा दिल धक् से रह गया . इतना दर्द हुआ मुझे . खून से लथपथ उस चेहरे पर जो आंखे चमक रही थी एक सर्द लहर मेरे दिल में समां गयी. उन होंठो से टपकता लहू . उसे देख कर मेरे दिल ने बगावत कर दी . आँखों ने कहा ये ही है दिल ने कहा नहीं ये नहीं हो सकता.

“क्यों , ” भर्राए गले से मैंने बस इतना ही पूछा.

हालात देखिये हम दोनों की ये मुलाकात ऐसे समय में हुई थी जब हमारे दरमियान एक लगभग मर गयी औरत थी और उस औरत के खून में सनी थी निशा, वो निशा जिसे दिल ने अपना मान लिया था . ये तो मैं था जिसका दिल अभी भी धडक रहा था वर्ना निशा को ऐसे रक्त तृष्णा से घिरी हुई देख कर अब तक पागल हो चूका होता . तो क्या निशा के इसी रूप को देख कर उन तमाम लोगो की वो हालत हुई थी .

मैं- मैंने तुझसे कहा था निशा की तू मेरा खून पीकर अपनी प्यास बुझा लेना . मैंने तुझसे वादा किया था और तूने भी मुझसे एक वादा किया था की जब भी तुझे रक्त तृष्णा होगी तू मेरा लहू पीने आएगी . पर तूने अपना वादा तोडा निशा.

मैंने कम्बल ओढा हुआ था फिर भी मैं बुरी तरह काँप रहा था कुछ ठण्ड से कुछ डर से . डायन का ऐसा रूप मैंने पहली बार देखा था . मेरी आँखे उस से सवाल कर रही थी पर वो कुछ नहीं बोली .

मैं- बोलती क्यों नहीं तुम . किसकी वजह से जान गयी इस औरत की

निशा- नियति की वजह से जान गयी इस औरत की

मैं- किसकी नियति इसकी या तुम्हारी

निशा ने फिर से चुप्पी ओढ़ ली.

मैं- तू मुझे भी मार दे निशा

निशा- ये क्या कह रहा है तू कबीर मैं तुझे नुकसान पहुंचा सकती हूँ ये सोचा भी कैसे तूने

मैं- क्यों न सोचु मैं, मेरे सामने मेरे गाँव की एक औरत ने दम तोडा है

निशा- जाने वालो को कोई नहीं रोक सकता कबीर न तू न मैं

मै- पर कोई मेरी वजह से ही गया तो मुझे मंजूर नहीं निशा

निशा- तेरा मन आहत है तू समझ नहीं पा रहा

मैं- तू ही बता मैं क्या समझूँ ,

निशा- तू अभी जा यहाँ से कबीर . मैं तुझे तेरी दहलीज तक छोड़ आती हूँ

मैं- जाऊंगा , जाना तो है ही इस लाश को मिटटी भी तो देनी पड़ेगी . यहाँ छोड़ के गया तो कोई और जानवर नोच खायेगा इसे.

निशा- इसे लेकर गया तो तेरे गाँव वाले तुझे ही दोषी समझेंगे . तेरे दुश्मन हो जायेंगे

मैं- क्या ही फर्क पड़ेगा उन लोगो के तानो से दिल तो मेरा तूने तोड़ दिया .

निशा- ऐसा मत कह कबीर

मैं अपने आंसू नहीं रोक पाया.

“दिल तोड़ दिया तूने और मैं भी भला किस से उम्मीद लगा बैठा था ये नहीं समझा की डायन के सीने में कहाँ दिल होता है जा रहा हु मैं निशा पर मैं जाते जताए तुझसे ये ही कहूँगा की अगर इस गाँव की तरफ तेरे कदम फिर बढे तो वो मेरे दर पर आकर रुकने चाहिए . तू जब चाहेगी मेरा लहू तेरे लबो पर बिखरे को तैयार रहेगा पर इन गाँव वालो का कोई दोष नहीं है इन पर मेहर करना ” मैंने कहा

निशा के होंठ कुछ कहने के लिए खुले पर फिर बंद हो गए उसने चुप्पी साध ली. मैंने कविता भाभी के बदन को कम्बल में समेटा और उसे लाद कर गाँव की तरफ चल पड़ा. पैर डगमगा रहे थे , आँखों में सैलाब था दिल जो टुटा था पर करते भी क्या . मुझे घंटा भी परवाह नहीं थी की गाँव वाले मुझे इस हाल में देखेंगे तो क्या होगा. मैंने वैध के दरवाजे पर कविता की लाश को रखा और वापिस से कुवे पर आ गया. जी चाहता था न जाने क्या कर दू पर कुछ नहीं कर सका . लिहाफ में घुस तो गया था पर नींद कोसो दूर थी आँखों से.

बुझे मन से थके कदमो से चलते हुए मैं चाची के साथ वापिस गाँव में पहुंचा और जैसा मुझे अंदेशा था गाँव में रोना-पीटना मचा था . हम लोग भी वैध के घर पे पहुँच गए देखा की भाभी-भैया पहले से ही वहां पर मोजूद थे . जैसे ही भाभी ने मुझे देखा वो मेरे पास आई और बोली- अभी के अभी मेरे साथ चलो

मैं- कहाँ भाभी

भाभी ने जवाब नहीं दिया और मुझे घर ले आई. आते ही भाभी ने दो-तीन थप्पड़ मेरे मुह पर दे मारे और बोली- मैं सिर्फ सच सुनना चाहूंगी . सिर्फ सच कविता के साथ क्या हुआ था .

मैं सन्न रह गया भाभी के इस सवाल को सुन कर

मैं-मुझे क्या मालूम भाभी मैं तो अभी अभी खेतो से आया न

भाभी ने एक थप्पड़ और मारा और बोली- मुझे क्या समझा है तूने.

मैं- भाभी मेरा विश्वास करो

भाभी- मेरे सब्र का इम्तिहान मत लो कुंवर . मैं बस ये जानना चाहती हूँ की कविता के साथ क्या हुआ क्या किया तुमने

मैं- मैंने कुछ नहीं किया भाभी

तडाक एक थप्पड़ और लगा मेरे गाल पर .

भाभी- चुतिया मत समझना मुझे तुम . इन हाथो से पाला है मैंने तुम्हे . मुझे झूठ नहीं बोल पाओगे कविता से तुम्हारा कुछ लेना देना नहीं है तो फिर उसकी लाश तुम्हारे कम्बल में क्यों लिपटी हुई है अब ये मत कहना की तुम कम्बल भूल गए थे कहीं पर .

कितनी बड़ी गलती हुई थी मुझसे , मैं कम्बल भूल गया था . और यही बात भाभी ने पकड़ ली थी .

मैं चुप रहा

भाभी- बोलते क्यों नहीं अब

मैं- मेरे पास कुछ नहीं कहने को भाभी

भाभी- ठीक है फिर चल और बता सारे गाँव को की कविता का कातिल कोई और नहीं बल्कि तुम हो . मुझे नफरत हो रही है तुमसे मैंने अपने घर में एक दरिन्दे को पाल रखा था . घिन आती है मुझे

मैं- भाभी आपको मुझ पर विश्वास नहीं है

भाभी- नहीं है मुझे विश्वास .तुम्हे अभी के अभी अपना गुनाह गाँव के सामने कबूल करना होगा.

मैं- मैं ऐसा नहीं करूँगा क्योंकि कविता को मैंने नहीं मारा

भाभी- ठीक है फिर तुम्हे अभी इसी पल से मैं इस घर से बेदखल करती हूँ . कोई वास्ता नहीं आज से तुम्हारा हमारा इस घर में एक कातिल के साथ मैं नहीं रहूंगी अगर तुम ये घर छोड़ कर नहीं गए तो फिर मैं ही जाउंगी.

भाभी की बात सुनकर मेरा टुटा हुआ दिल और टूट गया .

मैं- क्या कहा भाभी आपने , आप ये घर छोड़ कर जाएँगी क्यों भला . बहुत बड़ी बात कह दी भाभी आपने एक पल में पराया ही कर दिया आपने तो . अरे आपके आंचल तले पला मैं. आपने जीना सिखाया दुनिया को समझना सिखाया आप को ही मुझ पर विश्वास नहीं अब क्या कहे भाभी आपने तो कुछ कहने लायक छोड़ा ही नहीं . आपका कहा हर हुकुम माना है ये इच्छा भी सर माथे पर भाभी

मैंने भाभी के चरणों को हाथ लगाया और उसी पल घर से बाहर निकल गया. बहुत कोशिश की की न रोऊ पर साले आंसू भी दगा दे गए ... वो भी बेवफा निकले.

#32

गाँव से बाहर आकर मैं बहुत रोया जिन्दगी ने आज ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया की समझ नहीं आया हुआ तो क्या हुआ. कुंवर कबीर का सारा गुरुर एक झटके में बिखर गया था. कुवे की मुंडेर पर बैठे बैठे मैं सोचता रहा मैंने तो किसी का भी बुरा नहीं किया आजतक फिर मेरे साथ ये क्यों हुआ. शाम को भैया आये मेरे पास.

भैया- घर चल छोटे

मैंने कुछ जवाब नहीं दिया

भैया- सुना नहीं तूने मैंने क्या कहा

मैं- मैंने यही रहने का सोचा है भाई , आपको तो पता ही है की मजदूरो की कमी है तो मैंने सोचा की मेरा यहाँ रहना ही ठीक होगा वैसे भी घर ये यहाँ आने जाने में ही काफी समय बर्बाद हो जाता है.

भैया- इतना बड़ा नहीं हुआ है तू की अपने भाई से झूठ बोल सके. तेरी हिम्मत कैसे हुई घर से बाहर कदम रखने की इंतज़ार नहीं कर सकता था तू, कैसे भूल गया तू की तेरे ऊपर तेरे भाई है और मेरे होते हुए किसकी इतनी मजाल जो तुझे घर से निकालने की हिम्मत कर सके. तू चल मेरे साथ तेरे सामने ही तेरी भाभी की खाल खींच लूँगा मैं.

मैं- ख़बरदार भैया जो भाभी के बारे में उल्टा-सीधा कुछ भी बोला तो . वो मेरी भाभी ही नहीं भाभी माँ है .

भैया- फिर कैसे उसकी नजरो में फर्क आ गया . वो इतना भी नहीं समझ पायी अपने दिल के टुकड़े को अपने ही आँचल से दूर कर दिया उस निर्मोही ने .

मैं- ये भी उनका प्यार ही है . और फिर किस घर में छोटी-मोटी बात नहीं होते रहती . उन्होंने दूर किया है जब उनका गुस्सा शांत होगा देखना खुद आ जाएगी. कोई बात ही नहीं है मैं जानता हूँ ज्यादा देर वो भी नाराज नहीं रह पाएंगी.

भैया- और मैं क्या करू फिर तुम दोनों के बीच मरना तो मेरा हो गया न . तू यहाँ पड़ा रहेगा मैं वहां कैसे रह पाउँगा तेरे बिना मेरे भाई.जिस भाई का चेहरा देखे बिना मैंने जल नहीं पिया उसके बिना मैं कैसे एक पल भी जी सकूँगा.

मैं- उंगलियों से नाख़ून कभी दूर नहीं होते भैया, कौन सा आपसे दूर हूँ मैं जब जी करेगा आपसे मिलने आ जाऊंगा.

भैया ने एक मुक्का हताशा में गाड़ी के बोनट पर मारा. मैंने देखा बोनट तिडक गया.

भैया- न जाने ये अन्याय हो गया छोटे, न जाने वो कौन सी घडी थी जिसने परिवार को बिखरने की नींव रख दी. मेरे भाई तू समझ तेरे बिना क्या ही है उस घर में . कोई नहीं, तू देखना मैं अभी तेरी भाभी को यहाँ लाता हूँ तेरे पाँव पकड़ कर माफ़ी मांगेगी वो

मैं- भैया आपने भाभी से कुछ भी कहा, उनसे जरा भी मारपीट की तो मैं आपकी कसम खाकर कहता हूँ मैं जहर खा लूँगा.

भैया- क्यों बान्धता है मुझे इस कसम की डोर में मेरे भाई. बता फिर मैं क्या करू कल को दुनिया कहेगी अभिमानु ने छोटे भाई को घर से निकाल दिया पिताजी आयेंगे तो मैं कहूँगा , कैसे बताऊंगा उन्हें की उनके पीछे से मैं परिवार को साथ लेकर चलने की जिम्मेदारी नहीं निभा पाया.

मैं- दुनिया की हमें कब से फ़िक्र होने लगी भैया, हम दुनिया के हिसाब से नहीं दुनिया हमारे हिसाब से चलती है . और फिर मेरे सर पर हमेशा मेरा भाई छत बन कर खड़ा है मुझे भला क्या तकलीफ हो सकती है .

भैया- इस शरीर को लेकर जा रहा हूँ छोटे मेरा दिल तो यही रह जायेगा .

भैया कुछ दूर चल कर रुके और मैं खुद को रोक नहीं पाया दौड़ कर लिपट गया अपने भाई से और आंसुओ के सैलाब में हम दोनों भाई बह गए. उस छोटे से लम्हे में मैंने समझा था की बड़े भाई का सर पर होना कितनी बड़ी खुस्किस्मती होती है . वो रात बड़ी मुश्किल से बीती मेरी . दो दिन मेरे बड़ी मुश्किल से बीते. खाने पीने की भी समस्या खड़ी हो गयी थी . मुझे तो कुछ बनाना आता नहीं था . तीसरे दिन चंपा खेतो पर आई.

“बड़ा खुदगर्ज है तू निर्मोही इतनी बड़ी बात हो गयी तूने मुझे भी बताना जरुरी नहीं समझा. अरे एक घर छोड़ा तूने, ये कैसे भूल गया हमारा घर भी तो तेरा ही है ” चंपा ने मुझे उलाहना दिया.

मैं- मेरे हालत ठीक नहीं है चंपा.

चम्पा- रोटी लाई हूँ खा ले पहले बातो के लिए तो दिन पड़ा है .

चंपा ने खाना परोसा .

चंपा- सुन खुद को ऐसे सजा नहीं देगा तू . घर तेरा भी है और अपने घर में आने के लिए किसी को कहा नहीं जाता है . तू भूखा नहीं रहेगा ऐसे. जब भी तेरा दिल करे या जब भी रोटियों का समय हो तू पहुँच जाना

मैं- तुम लोगो को तकलीफ होगी मेरी वजह से

चंपा- हमें तकलीफ होगी तेरे लिए . एक बार फिर कहके दिखा तेरा मुह न तोड़ दू मैं. अरे कमीने बचपन से एक थाली में खाया है हम तीनो ने और तू आज हमें ही पराया कर रहा है , निर्मोही मेरी नहीं तो कम से कम इस दोस्ती की ही लाज रख लेता तू . तेरे हिस्से की दो रोटियों का भला कौन सा बोझ पड़ेगा मुझ पर. इतना तो हक़ दे मुझे इतना हक़ तो है मेरा तुझ पर .

चंपा रो पड़ी . मैंने उसे अपने सीने से लगा लिया . दिल का बोझ थोडा कम हो गया .

मैं- भाभी कैसी है

चंपा- ठीक है अपने कमरे में ही रहती है निचे कम आती है

मैं- चाची

चंपा- चाची नाराज है तुमसे और भाभी दोनों से

मैं- थोड़े दिन में सब ठीक हो जायेगा

चंपा- पर क्या हुआ ऐसा जो भाभी ने इतना बड़ा निर्णय ले लिया

मैं- समय बलवान चंपा खैर छोड़ इन बातो को तू मंगू से कहना की दिन में तो खेतो में आ जाया करे एक दो दिन में मैं शहर जाऊंगा सब्जियों की गाडी लेकर .

चंपा- रात को खाना खाने आयेगा तो तू खुद ही कह देना. और तुझे यहाँ रहने की क्या ही जरुरत है तू हमारे पर भी तो रह सकता है न

मैं- खेतो की रखवाली का कारण भी है चंपा. ये काम भी जरुरी है

चंपा के जाने के बाद मैंने बाकि समय खेतो पर काम किया . रात को मैंने समय से ही रजाई ओढ़ ली. क्योंकि खेतो में ठण्ड बहुत जायदा लगती थी . आँख लगी ही थी की कमरे के दरवाजे पर आवाज हुई . मेरा दिल जोर जोर से धडकने लगा. मैंने पास रखी लाठी उठाई और कहा “कौन, कौन है बाहर ”
 
#33

मैंने दरवाजा खोला तो देखा की वो सियार दरवाजे पर खड़ा था . मेरे बाजु से होते हुए वो अंदर गया और एक कोने में पड़ी सूखी घास पर जाकर बैठ गया.

“तुझे क्या चाहिए अब . जा जाकर कह दे उस से मैं नहीं मिलूँगा उस से ” मैंने उस से कहा पर उसने मेरी बात जैसे सुनी ही नहीं घास पर सो गया वो .

इसे मेरे पास भेजने का भला क्या मकसद हो सकता था निशा का सोचते सोचते मेरी आँख लग गयी . सुबह चूँकि मुझे सब्जिया लेकर शहर जाना था तो मंगू समय से आ गया . हमने मंगू की बैलगाड़ी में सब्जिया लादी और शहर के लिए निकल गए.

मंगू- मुझे सब मालूम हो गया है भैया ने बता दिया

मैं- मैं क्या करू फिर

मंगू- जो हुआ गलत हुआ न

मैं- थोड़े दिन में सब सही हो जायेगा.

मंगू- पर.

मैं- पर वर कुछ नहीं यार. कोई और बात कर

मंगू- मलिकपुर में नाचने वालो का मजमा लगा है सुना है की उनके जैसा कोई नहीं नाचने वाला बिजली की रफ़्तार से प्रोग्राम होता है उनका पर क्या ही फायदा घर वाले जाने थोड़ी न देंगे कविता की मौत के बाद शाम होते ही घरो के दरवाजे बंद हो जाते है न जाने कब ये मुसीबत दूर होगी.

मैं- आज सब्जियों के ठीक दाम मिल गए तो बढ़िया रहे, दिवाली आने वाली है पैसे रहेंगे तो मजा होगा.

मंगू- क्या ही फायदा , तेरे बिना क्या होली-क्या दीवाली

मैं- ऐसा क्यों कहता है इस बार भी हम साथ ही सब कुछ करेंगे पहले के जैसे

बाते करते हुए हम शहर की सब्जी मंडी पहुँच गए . सब्जियों को बेचा . थोडा नाश्ता पानी किया . एक जानने वाले आढती कए यहाँ बैलो को छोड़ कर हम दोनों शहर में घुमने चले गए. दोपहर बाद हम वापिस चल दिए. चूँकि आज दाम बढ़िया मिले थे तो मैंने मंगू को थोड़े पैसे फालतू दिए . वापिस आकार मैं नहाने धोने लग गया मंगू घर चला गया . अकेले आदमी को खाली समय काटना भी किसी सजा जैसा ही होता है . करे तो क्या करे देखे तो क्या देखे . तभी मुझे मंगू की मलिकपुर वाली बात याद आई तो मैंने साइकिल उठाई और मलिकपुर का रास्ता पकड़ लिया.

वहां पहुंचा तो अँधेरा खूब हो चूका था . मैंने मालूम किया की प्रोग्राम वालो का तम्बू किधर लगा है और उधर पहुँच गया. ठण्ड बहुत थी तो मैंने चने और ताड़ी का गिलास ले लिया और पंडाल में बैठ गया . एक दो किस्से कहानियो के बाद जब लडकियों के नाचने का नम्बर आया तो मैंने महसूस किया की मंगू को गलत सुचना थी ये तो वो ही थी जिनका प्रोग्राम हमने थोड़े दिन पहले देखा था .

कुछ दारू का सुरूर , कुछ हुस्न के जलवे उनमे से एक लड़की ने मुझे पहचान लिया और ऊपर मंच पर खींच लिया मैं भी उनके साथ नाचने लगा. जेब में पैसे तो थे ही मैंने उन पर लुटाना शुरू कर दिया. मजा आ ही रहा था की तभी किसी ने मेरी जैकेट का कालर पकड़ कर खींच लिया , जिस से मेरी जैकेट फट गयी .

“क्यों बे , क्या ग़दर मचा रखा है तूने मंच पर ” जिस लड़के ने मेरी जैकेट खींची थी उसने मुझे धक्का देते हुए कहा.

मैं- तुझे क्या तकलीफ है , तू भी नाच ले किसके रोका है तुझे और ये जाकेट फट गयी इसकी भरपाई कौन करेगा.

लड़का- भरपाई तो तेरी गांड तोड़ कर कर दूंगा साले मेरे गाँव में आकार नेता बन रहा है तू

मैंने गौर से उस लड़के को देखा और बोला- गाँव तेरा है तो मैं क्या करू . तम्बू के बाहर तख्ती लगा देता की तेरे गाँव वाले ही प्रोग्राम देखेंगे .चल ठीक है तेरी बात मानी पर जो जाकेट फाड़ी तूने उसका क्या नयी जाकेट दे या फिर पैसे दे .

लड़का- दाद देनी होगी तेरी हिम्मत की सूरजभान से इस तरह अकड़ के बात कर रहा है तू. क्या तुझे डर नहीं मैं तेरा क्या हाल कर सकता हूँ

मैं- अबे चमन चूतिये. मुझे घंटा फर्क नहीं पड़ता की तू किस खेत की मूली है . मुझे फर्क पड़ता है तेरी घटिया हरकत से जो तूने की है . जाकेट के पैसे दे और निकल यहाँ से मेरा दिमाग फिर गया न तो मारूंगा तीन गिनूंगा एक समझा चोमू

“बहनचोद तेरी ये मजाल तू मुझे गाली देगा ” सूरजभान गुस्से में भर गया और उसने मुझे जोर का धक्का दिया. मैं मंच से निचे जाकर गिरा. चूँकि मेरे कंधे में पहले ही चोट लगी हुई थी दर्द हुआ तो मेरा सब्र भी जवाब दे गया . मैं वापिस मंच पर गया .

“गलती कर दी तूने भोसड़ी के ” मैंने सूरजभान को धर लिया और उसकी मरम्मत करनी शुरू कर दी. इसबार मैंने उसे उठा कर जनता के बीच फेका तो मजमा देखने वालो में अफरा तरफी मच गयी. उसके दो चार चमचे बीच में आये पर मैंने अपना काम चालू रखा . मैंने सूरजभान को उठा कर मजमे वालो की जीप के बोनट पर पटक दिया.

मैं- जाकेट के पैसे तो तेरी खाल उतार कर वसूल कर लूँगा चूतिये.

तभी उसने एक लोहे की लाइट उठा कर मेरे सर में मारी और मुझे निचे गिरा दिया जीप से

सूरजभान- अच्छा हुआ जो आज तेरा सामना मेरे साथ हुआ इतनी मार मारूंगा तुझे की हड्डिया तक कापेंगी मेरे नाम से तेरी

मैं- आजा फिर देखते है किसकी बाजुओ में कितना जोर है

मैंने पास में रखी कुर्सी उठा कर उसके पैरो पर मारी उसके गिरते ही मैंने उसके सीने पर लात रख दी . उसने फुर्ती से मुझे धकिया दिया. पीछे से उसके एक चमचे ने पीठ में लात मारी तो मैंने उसकी बाहं मोड़ दी और उसे झका दिया.

मैं- कुत्ते कभी शेर का शिकार नहीं करते आज तुम्हारा भी वहम दूर हो जायेगा.

सूरजभान- कोई बीच में नहीं आयेगा . इसके लिए मैं अकेला ही काफी हूँ

मैंने मंच के तख्तो में से एक फट्टा उखाड़ लिया और सूरजभान के सर पर देमारा. सर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. आसपास के लोगो में चीख पुकार मच गयी . खून देखते ही मुझ पर न जाने क्या हुआ मैंने फिर रहम नहीं किया

“मैंने कहा था तेरा गाँव है इस बात की धोंस मत दिखा मुझे , मैंने किसी को तंग तो नहीं किया था न प्रोग्राम देख कर चला जाता पर तेरी गांड में कीड़ा कुलबुला रहा था . पूछ कर तो देखता मेरे बारेमे , ये गुस्ताखी करने से पहले ” मैंने अपनी दोनों हाथो की उंगलिया उसके मुह में डाली और उसके गालों को फाड़ ही देता अगर वो गोली न चलती .

मैंने देखा सामने एक आदमी कुरता-पगड़ी पहने खड़ा था हाथ में बन्दूक लिया .

आदमी- अगली गोली तेरे सीने के पार होगी छोरे ,चौधरी रुडा के बेटे पर हाथ उठाने की हिमाकत की कैसे तूने .

मैं- चौधरी , ये बात अपने इस गधे बेटे से पूछ, अपनी औकात भूल कर इसने शेर का गिरेबान पकड़ा . सजा तो मिलेगी ही इसे.

रुडा- इतना अहंकार नादान तू जानता भी है यहाँ से तू जिन्दा नहीं लौट पायेगा.

रुडा ने बन्दूक मेरी तरफ तान दी .

मैं- चौधरी, इस लोहे के खिलोने से तू शेर का शिकार करने की सोच रहा है हंसी आती है तेरी मुर्खता पर मेरा जोर आजमाने की तमन्ना है तेरी तो तू भी कोशिश कर ले . गलती तेरे बेटे की थी इसने मेरी जाकेट फाड़ी . नुकसान की भरपाई तो करनी पड़ेगी .

चौधरी- मामूली से जाकेट के लिए तूने मेरे बेटे का खून बहाया

मैं- नहीं वो तो मैंने मजे के लिए बहाया . पर निराशा ही हुई तेरा खून ख़तम है चौधरी लेजा इसे जा बक्श दिया तू भी क्या यद् करेगा. खिला पिला इसे और अगर कभी तुझे फिर लगे की ये कुछ कर पायेगा तो मेरा नाम कबीर है , राज पूरा के राय साहब का बेटा हु मैं मुझे संदेसा भेज देना

मैंने सूरजभान को साइड में पटका और चौधरी रुडा के पास चल कर गया .

मैं- चौधरी तेरा गाँव है तेरी जनता है . मैं समझता हूँ मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुस्कुरा और जाने दे मुझे . तू भी जानता है तेरा बेटा कमजोर है

रुडा- तुझे यहाँ मारा तो तू कहेगा की अपनी गली में कुत्मैंता भी शेर होता है तुझे तेरे गाँव में तेरे घर में ही मारूंगा

मैं- इइश्वर करे वो दिन जल्दी ही आये जब तेरी ये इच्छा पूरी हो.

मैंने साइकिल उठाई और मलिकपुर से बाहर जाने वाले रस्ते पर चल दिया.
 
#34

वापसी में मैं बस ये सोचता रहा की ये जो हुआ ठीक नहीं हुआ. भैया को मालूम होगा तो मुझ पर गुस्सा करेंगे. दूसरी बात जीवन में ये सब कुछ अजीब हो रहा था मेरे साथ. मैं ऐसा नहीं था की गुस्सा करू, मारपीट करू. पर यही तो जिन्दगी थी न जाने कब क्या सीख दे हमें कौन जाने. मुझे मेरे भाई और बाप का डर था बाकि दुनिया से मुझे घंटा फर्क नहीं पड़ता था.

वापिस आकर देखा मैंने की सियार कुवे की मुंडेर पर बैठा था .

मैं- अरे तू फिर आ गया . जाकर कह दे उस से की मुझे नहीं मिलना उस से

सियार मुंडेर से उतरा और मेरे सीने पर पंजे लगा कर खड़ा हो गया . अपनी भाषा में कुछ कहने लगा.

मैं- क्या कहना चाहता है तू मेरे दोस्त . क्या तू भी मेरी तरह तनहा है परेशां है .

वो बस लिपटा रहा मुझसे. ठण्ड में उसे भी शायद राहत मिली होगी. मैंने कमरा खोला वो जाकर घास पर बैठ गया मैंने एक कम्बल ओढा दिया उसे और अलाव जला लिया. दरवाजा मैंने जान कर थोडा सा खुला छोड़ दिया.

“उठो , चाय पी लो ” चाची की आवाज से मेरी नींद टूटी.

मैं- तुम कब आई

मैंने आँखों को मसलते हुए कहा

चाची- आये तो बहुत देर हो गयी पर तुम इतना देर तक कैसे सो रहे हो .

मैं- थकान में पता ही नहीं चला

मैंने चाची के हाथ से कप लिया और चुस्की लेने लगा.

चाची मुझे ही देखती रही

मैं- ऐसे क्या देख रही हो

चाची- सोच रही हूँ की कितना बड़ा हो गया है तू, बहुरानी से झगडा हुआ तो खुद ही ये निर्णय ले लिया तू ये कैसे भूल गया की बहु से ऊपर भी कोई है घर में . मेरे आने का इंतजार नहीं कर सकता था .

मैं- जो हुआ अब मिटटी डालो उस पर.

चाची- तू मेरे घर पर भी तो रह सकता था न वहां से कौन निकाल देता तुझे

मैं- जब दिल करेगा आ जाया करूँगा.

चाची- खैर. इस सवाल का जवाब तो मुझे भी चाहिए जब तू उस रात मेरे पास सोया था तो कैसे तू कविता के पास पहुंचा. क्या तेरे उस से सम्बन्ध थे , बहुरानी ने मुझे बताया था की रातो को तू किसी औरत के चक्कर में ही गायब रहता था .

मैं- अगर मेरे सम्बन्ध होते उस से तो मैं क्यों मारता उसे . उस रात मुझे पेशाब लगी थी बाहर गया तो बहुत से जानवरों के रोने की आवाजे आये मैं देखने चला गया तो कविता की लाश पड़ी थी . मैंने सोचा की सुबह होने में समय है , जानवर इसके बदन को नोच खायेंगे मैंने लाश को गाँव में रख दिया. भाभी को कम्बल की वजह से शक हो गया.

चाची- पर कविता इतनी रात को जंगल में क्या कर रही थी .

मैं- इसी सवाल के जवाब के लिए मैंने यहाँ पर रहना तय किया है क्योंकि जब तक कविता के कातिल को पकड नहीं लूँगा चैन नहीं आएगा. भाभी के मन का शक तभी दूर होगा.

चाची- ठीक है फिर मैं भी तेरा साथ दूंगी यही रहूंगी तेरे साथ .

मैं- ये मेरा वनवास है चाची इसे मुझे ही सहने दो वैसे भी जब भी मेरा दिल करेगा तुमसे मिलने का घर आ जाऊंगा कोई रोक थोड़ी न सकता है मुझे.

चाची- पर तू यहाँ रहेगा तो हमें चिंता रहेगी तेरी.

मैं- कैसी चिंता , दिन में भैया, आप . मंगू-चंपा कोई न कोई साथ होता ही है मेरे. तुम बताओ भाभी कैसी है

चाची- ठीक है अपने कमरे में ही रहती है ज्यादातर . अभिमानु नाराज है उस से दुरी बना ली है निचे ही रहता है

मैं- आप समझाओ भैया को मेरी वजह से अपनी ग्रहस्थी क्यों ख़राब करनी

चाची- तू तो जानता है न उसे . जब तक तुझे न देख ले उसके गले से रोटी का कौर नहीं उतरता तूने उसे कसम दे दी और परेशां हो गया है वो . काम पर जाना भी छोड़ दिया बस अखाड़े में ही दिन रात होते है अब उसके.

मैं- नियति न जाने क्या दिन दिखा रही है.

चाची- कुछ कपडे और छोटा-मोटा सामान ले आई हूँ जरुरत के .

मैं उठ कर बाहर गया . हाथ मुह धोया . थोड़ी देर घुमने चला गया . नहाने लगा तो मैंने देखा की सूरजभान की वजह से मेरे कंधे का जख्म फिर से हरा हो गया था . खैर मैं वापिस चाची के पास गया .

मैं- गाँव वालो को भी लगता है क्या मैंने ही कविता को मारा है

चाची- नहीं , बहुरानी के सिवाय किसी के मन में भी ये ख्याल नहीं है

मैं- ठीक है , क्योंकि मुझे वैध की जरुरत है मेरे कंधे का जख्म हरा हो गया है .

चाची- मिल लेना उस से

मैं- फ़िलहाल तो मेरे मर्ज का इलाज तुम ही करोगी

मैंने अपनी पेंट खोली और लंड को बाहर निकाल लिया.

चाची- क्या कर रहा है अन्दर कर इसे. कोई आ गया तो मर जायेंगे

मैं- कोई नहीं आएगा तुम आओ तो सही .देखो तुम्हे देखते ही कैसे तन गया है ये. तुम्हारे हुस्न का नशा इस कदर चढ़ गया है की जब तुम पास होती हो तो खुद को रोकना मुश्किल हो जाता है .

मैंने चाची को दिवार के सहारे खड़ा किया और चाची के लहंगे को उठा कर कुलहो तक कर लिया. गोरे कुलहो के बीच चाची की काली चूत जो मेरे लंड की रगड़ से ही पनिया गयी थी क्या गजब नजारा था .

“तू मरवा के छोड़ेगा मुझे ” चाची बोली .

पर किसे परवाह थी मैंने लंड को झटका दिया और चाची की चुदाई शुरू कर दी. चूँकि दिन का समय था तो बस जल्दी जल्दी ही करना पड़ा . पर जब हम हटे तो दोनों पसीने से भीगे थे. चाची के चेहरे पर संतुष्टि की रौनक थी . चाची ने चुदाई के बाद मेरे गालो को चूमा और बाहर चली गयी .

चाची से साथ मैं गाँव में आया. एक बार फिर वैध जी मादरचोद न जाने कहा गायब था . आखिर ये जाता कहा था सोच कर मैं हैरान था . मैं मंगू के घर चला गया . चंपा खाना बना रही थी मैं भी खाने बैठ गया.

मैं- काकी, पिताजी कह कर गए थे की चंपा को सुनार के पास ले जाऊ नाप के लिए पर ये मान नहीं रही आप ही कहो.

काकी- बेटा, इसका कहना भी सही है राय साहब के इतने अहसान है हम पर शेखर बाबु जैसे सज्जन से रिश्ता करवाया इसका और हमें क्या चाहिए

मैं- वो तो भाग है इसके पर पिताजी को जब मालूम होगा तो वो मुझे ही गुस्सा करेंगे.

काकी- चंपा के पिता बात करेंगे राय साहब से जब वो आ जायेंगे

मैं- तब की तब देखेंगे पर तुम इस से कह दो की कल मेरे साथ मलिकपुर जाएगी सुनार के सामने

मलिकपुर का जिक्र होते ही मुझे खांसी उठ गयी. रात वाली घटना मेरी आँखों के सामने घूम गयी .

“क्या हुआ .” चंपा ने मुझे पानी का गिलास देते हुए कहा

मैं- क्या हुआ सब्जी में इतनी मिर्च डाली है , और पूछती है की क्या हुआ

चंपा- मिर्च, पर तू तो घी के साथ रोटी खा रहा है .

वो जोर जोर से हंसने लगी ..

“लगता है तेरी उस दोस्त के साथ रह रह कर तु सब्जी और घी में फर्क करना भूल गया है . क्या कर दिया उसने तेरा ” चंपा धीरे से बोली.

मेरी आँखों के सामने निशा की तस्वीर आ गयी . जब वो कविता का खून पी रही थी . ..........खैर, मैंने सर को झटका और रोटी खाने लगा की तभी बाहर से मंगू भागते हुए आया और बोला-कबीर , चल मेरे साथ . अभी चलना होगा.

चंपा- रोटी तो खा लेने दे इसे

मंगू- तू चुप रह , कबीर भाई चल अभी के अभी

मंगू के हावभाव देख कर लग रहा था की कुछ तो गड़बड़ है मेरा मन किसी अनिष्ट की आशंका से घबराने लगा.
 
#35

मैं मंगू के साथ बाहर गया तो देखा की नाचने गाने वाली वो लडकिया और उनके साथ दो आदमी थे जिनकी हालत ठीक नहीं लग रही थी . मुझे देखते ही वो लोग मेरे कदमो में गिर गए और रोने लगे.

मैंने उन्हें उठाया और पूछा की क्या हुआ .

आदमी जिसका नाम लाखा था .

लाखा- कुंवर साहब, आपके जाने के बाद चौधरी रुडा के आदमियों ने हम लोगो को बहुत मारा . ये लडकिया आपके साथ नाची थी देखिये इनका क्या हाल किया है .

उस आदमी ने लडकियों की पीठ मुझे दिखाई जो कोड़ो की मार से उधड गयी थी.

लाखा- आप ही इन्सान करो हमारा. बिना किसी कसूर के हमें ये सजा क्यों मिली .

मैं- लाखा तू आज रात मेरे साथ चलेगा और उस आदमी को पहचान लेना जिसने इन की पीठ पर कोड़े मारे है मैं तुझसे वादा करता हूँ उसकी खाल उतार कर लाऊंगा इस कृत्य के लिए.

“मंगू इन लोगो को वैध जी के पास लेकर जा इनका इलाज करवा और जो भी मदद हमसे हो कर इनकी .” मैंने मंगू को निर्देश दिया.

मंगू- हो जायेगा पर भाई, कल क्या हुआ था और तूने क्या किया

मैंने मंगू को सारी बात बताई .

मंगू- रुडा बहुत नीच किस्म का आदमी है . मलिकपुर के लोगो को कीड़े-मकोडो से जायदा कुछ नहीं समझता है वो . लोगो को ब्याज में पैसा देता है और फिर जो चूका नहीं पाता उनकी बहन-बेटिया भरपाई करती है पैसो की. उस से पंगा लेना उचित नहीं

मैं- हमें किसकी फ़िक्र . झांट नहीं समझता मैं उसे .

मंगू- भाई, कुछ भी करने से पहले अभिमानु भाई से बात कर लेते है एक बार

मैं- छोटी मोटी बातो के लिए उनको क्या परेशां करना

मंगू- पर जब उनको मालूम होगा तो हम पर ही नाराज होंगे सो पहले बताना ठीक रहेगा.

मैं- तू फिलहाल इनको वैध जी के पास लेकर जा और जब तक मैं न कहूँ ये बात किसी को भी मालूम नहीं हो .

मंगू कुछ कहना चाहता था पर फिर चुप हो गया. दुश्मनी मुझसे करनी थी तो मुझ पर वार करते इन गरीबो पर क्या जोर दिखाया . मैं अपनी योजना बनाने लगा रुडा के आदमियों को सरे आम मारना ठीक नहीं था उस से रंजिश और पक्की होती . क्या पता वो ऐसा ही हमला मेरे अपनों पर कर दे तो . मन में ये विचार भी था.

लाखा ने मुझे बताया की जिस आदमी ने उन्हें मारा था उसका नाम दारा था और वो रोज रात को ताड़ी की दूकान पर जरुर जाता था . मैंने तमाम बातो पर विचार किया और अंत में लाखा को भी हटा दिया क्योंकि मैं नहीं चाहता था की बाद में उस पर भी कोई मुसीबत आ जाये.

तय समय पर मैं छिपते छिपाते मलिकपुर की ताड़ी की दूकान पर नजर रखे हुए था . दारा बहुत देर तक ताड़ी पीते हुए वही किसी से बाते करता रहा फिर वो वहां से चल दिया मैं दबे पाँव उसका पीछा करने लगा. गाँव को पार करके वो जंगल की तरफ चल दिया.

“ये भोसड़ी का जंगल में क्या करने जा रहा है ” मैंने सोचा क्योंकि इतनी रात में जंगल में भला कोई क्यों जायेगा. कोई आधा किलोमीटर या उसके आस पास जाने के बाद वो ऐसी जगह पहुंचा जहाँ पर कुछ खानाबदोश रहते थे . मैंने देखा की दारा ने एक आदमी को कुछ पैसे दिए और एक तम्बू में घुस गया . मौका देख कर मैं भी उस तरफ गया . तम्बू में एक औरत थी शायद वो पैसे लेकर चुदाई करवाती होगी क्योंकि तम्बू में रास लीला चल रही थी .

फिर कुछ देर बाद वो औरत तम्बू से निकल कर बाहर चली गयी . मैंने तम्बू में झांककर देखा की दारा नग्न अवस्था में पलंग पर पड़ा था. मेरे लिए यही मौका था उसे अगवा करने का. मैं तम्बू में घुस गया और अपने हाथो से उसका मुह भींच लिया दारा तडपने लगा पर मैं जानता था की शांतिपूर्वक अगवाई के लिए एकमात्र यही मौका था . जैसे तैसे मैंने उसे बेहोश किया और उसके नग्न बदन को काँधे पर लाद कर वहां से न जाने किस दिशा में चल दिया.

एक तो इस इलाके में मैं अनजान था ऊपर से रात का वक्त कुछ दूर चलने पर मुझे एक पगडण्डी दिखी तो मैं उस पर ही चल दिया . आस पास घने झंखाड़ थे . धीरे धीरे वो पगडण्डी गायब हो गयी और मेरे कानो में हिलोरे लेटे पानी की आवाज आई . थोडा और आगे बढ़ने पर मैं समझ गया की मैं कहाँ हूँ. मैं निशा के काले मंदिर के ठीक पीछे पहुँच गया था .

जंगल की अजीब भूलभुलैया . मेरे काँधे पर एक बेहोश आदमी था और मैं डायन के ठिकाने पर वो मुझे देखती तो क्या समझती . खैर मैं दारा को लेकर प्रांगन में आया तो देखा की सब कुछ शांत था निशा की उपस्तिथि के कोई निशान नहीं . तभी दारा को होश आने लगा. तो मैंने उसे निचे पटक दिया. खुद को ऐसी हालत में और सामने मुझे पाकर उसे समझ नहीं आया की क्या हुआ है .

दारा- कौन है तू और मैं कहाँ हु

मैं- मैं वो हु जिसने कल सूरजभान की गांड तोड़ी थी और आज तेरी

दारा- अच्छा तो तू है वो . पर ये कायरो जैसी हरकत क्यों की गांड में दम था तो आमने सामने लड़ता

मैं- तेरी गांड में तो इतना दम है की तूने मासूम नाचने वालो की पीठ पर कोड़े मारे. तू मर्द होता तो मुझे तलाश करता . नामर्द सूरजभान की संगत में रह रह कर तू भी हिजड़ा हो गया .

दारा- तेरा ही काम तमाम करना था मुझे और देख मेरी किस्मत तू मुझे खुद से मिल गया .

मैं- तो देर किस बात की आजा फिर.

दारा मेरी तरफ लपका पर मैं तैयार था मैंने झुक कर अपना बचाव किया और उसके पैरो में टांग लगा दी . वो गिरा गिरते ही मैं उसकी पीठ पर कूद गया वो डकारा मैंने उसका हाथ मोड़ दिया. कट की आवाज आई और दारा की जोर की चीख उस काले मंदिर में गूंजने लगी.

“तेरे पापो का घड़ा भर गया है दारा. जितने कोड़े तूने उन मजलूमों को मारे थे उनका हिसाब लूँगा . तेरी पीठ की खाल उतारूंगा मैं .” मैंने कहा मैंने अपनी जेब से एक चाकू निकाला और दारा के कंधे के थोडा निचे कट लगाया . दारा चीखने लगा. एक तो वो दारू के नशे में था ऊपर से हाथ टुटा हुआ कब तक प्रतिरोध करता मेरा. मेरी उंगलिया उसके खून से सनने लगी. मुझे पक्का विश्वास था की इस शांत रात में दारा की चीखे दूर तक सुनी जाएँगी अगर को सुनने वाला हुआ तो .

मैं- क्या हुआ खुद पर बीत रही है तो दर्द हो रहा है . मजलूमों की चीखे सुन कर तो तुझे मजा आता है

दारा- चौधरी सहाब इसका बदला जरुर लेंगे.

मैं- माँ चोद देंगे तुम्हारे चौधरी की . जैसे जैसे मैं उसकी पीठ काट रहा था मुझे अजीब सा सुकून मिल रहा था . मेरा दिल रुकने को किया ही नहीं यहाँ तक की मैंने उसकी पीठ से हड्डिया तक काट दी . रक्त की ताजा महक में मैं ऐसा खोया की कब दारा के प्राण निकल गए मालूम ही नहीं हुआ. जब होश किया तो मैं दारा के खून से भीगा हुआ निशा के ठिकाने पर बैठा था . पर ये सब यही नहीं रुकना था . मैंने दारा की लाश को वापिस लादा और पगडण्डी से होते हुए मलिकपुर पहुच गया .

एक जूनून जैसे मुझे प्रेरित कर रहा था ये सब करने को . सारा गाँव ठण्ड की चादर में दुबका हुआ था . सब कुछ इतना शांत था की कई बार मुझे मेरे ही कदमो से डर लगा. मैंने गाँव के बीचोबीच दारा की कटी फटी लाश को रखा और फिर वापिस मुड गया .

कबीर जिसने थोड़े दिन पहले तक एक मच्छर भी नहीं मारा था उसने आज एक क़त्ल कर दिया था परिस्तिथि चाहे जो भी रही हो. मैं आज सच में एक कातिल बन गया था मैं चाहे खुद को झूठी तसल्ली देता की उन मजलूमों का बदला लिया मैंने पर सच तो ये ही था की मैंने एक क़त्ल कर दिया था . और इस पाप की आगे जाकर न जाने क्या कीमत चुकानी थी कौन जाने....................
 
#36

वो रात एक पल के लिए भी चैन नहीं मिला . निशा में और मुझमे क्या फर्क रह गया था मैं सोचता रहा . वो एक डायन और मैं इन्सान होकर भी लहू का प्यासा बन गया था . अब मेरी समझ में आ रहा था नियति का खेल. बेशक कारण कोई भी रहा हो पर एक इन्सान को मार देना . मैने ये भी गौर किया की इस वक्त जो ग्लानी हो रही थी उस वक्त वहशियत बन गयी थी जब मैंने दारा की खाल उतारी थी .

अगले दी मैंने निर्णय किया की चाहे जो भी हो जाये मैं इसे एक बुरा सपना समझ भुलाने की कोशिस करूँगा. और आगे से किसी भी हालत में पंगा तो करना ही नहीं है . सुबह मैं एक बार फिर से गाँव में गया . इस बार वैध मुझे मिला मैंने उस को बताया की कंधे का जख्म देखे. उसने जख्म को साफ़ किया और पट्टी कर दी. वैध के घर पर कविता की याद आई तो मन दुखी हो गया .

आँखों में रात की नींद थी , मैंने चाची के पास खाना खाया और रजाई ओढ़ कर सो गया .दोपहर बाद जागा तो देखा की चाची और चंपा अनाज पीस रही थी मैंने चाय के लिए बोला और चंपा के पास बैठ गया .

चंपा- क्या बात है , दिन में सो रहा है राते कहाँ काली कर रहा है तू

मैं- अरे थोड़ी तबियत ख़राब सी लग रही थी ऊपर से कुवे पर अकेले नींद नहीं आती .

चंपा- तुझसे फिर कुछ कहूँगी तो फिर तू कोई और बहाना बना देगा. मेरा तो कुछ कहना सुनना ही बेकार है .

मैं- काश तू समझ पाती

चंपा- काश तू समझा पाता

मैं- छोड़ ये बता तू मलिकपुर चलेगी या नहीं सुनार के पास

चंपा- कबीर हम इस बारे में बात कर चुके है वैसे भी चाची-भाभी ने मुझे इतना दिया है की वो संभालना ही मुश्किल होगा. तूने भी जिद ही पकड़ ली है . जिद की जगह मुझे पकड़ता तो भी कुछ सोचती

मैं- तुझे हमेशा बस ये ही खुमारी रहती है . मान ले मैं तेरे साथ कर भी लू तो क्या हो जायेगा.

चंपा- करता ही तो नहीं तू निर्मोही.

मैं- मेरी अपनी मजबुरिया है चंपा तू नहीं समझ पायेगी.

तभी चाची चाय लेकर आ गयी और हमें कप थमाते हुए बोली- कबीर, मैंने बहुरानी से बात की थी और उसे बता दिया है की तू अब मेरे साथ रहेगा. मैंने उसे बताया की अकेले वहां तेरा हाल कैसा है

मैं- मैंने मना किया था न चाची

चाची- तू हमारी औलाद है तुझे अपने से दूर रख कर हम चैन से कैसे रह सकते है सोचा कभी तूने.

मैं- पर भाभी .......

चाची- क्या भाभी भाभी हमसे वो है हम उस से नहीं है . ये मत भूलना की घर में पहला हुकुम मेरा है

मैं- सही कहा पर हमारे बीच जो एक तल्खी है वो और बढ़ेगी यहाँ रहने से.

चाची- और तेरे यहाँ न रहने से हमें जो कष्ट होगा उसका क्या अंदाजा

मैंने फिर कुछ नहीं कहा तभी वहां पर भैया आ गए.

भैया- छोटे मेरे भाई .

भैया ने मुझे आगोश में भर लिया.

मैं-छोड़ो भैया , कन्धा दुखता है

भैया- चाय पी ले फिर मेरे साथ आ जरा कुछ बात करनी है .

मैंने सोचा क्या हुआ , क्या बात करनी है इनको . कहीं इनको दारा वाली बात मालूम तो नहीं हो गयी. खैर मैंने कप रखा और भैया के साथ बाहर गली में आ गया .

भैया- तेरा सूरजभान से क्या पंगा हुआ

मैं- कुछ, कुछ नहीं भैया .

भैया- तुझे क्या लगता है मुझे तेरी खबर नहीं. सूरजभान मेरी पहचान वाला है मैं संभाल लूँगा तू फ़िक्र मत कर. पर ये ध्यान रखना की हम रायसाहब के बेटे है , उनको दुनिया बड़ा मानती है हमें ऐसा कुछ नहीं करना है जिस से उनकी साख ख़राब हो.

मैं- जी भैया

भैया- मैं समझता हूँ इस चढ़ती उम्र में जोश ज्यादा रहता है पर जोश के साथ होश रखना भी जरुरी है भाई, छोटी सी बात थी कोई कुछ कह भी दे तो अगर उसे अन्सुना करने से कोई घटना टलती है तो बेहतर है न. रही बात रुडा की तो देख तेरे आगे कोई मुझे मारेगा तो क्या तू चुप बैठेगा नहीं न बस बेटे को पिटते देख गर्म हो गया होगा . मैं देख लूँगा इस मामले को पर कभी तुझे रुडा या सूरजभान मिले तो हंस से गले लगाना

मैं- जैसा आप कहे भैया.

भैया ने मेरे सर पर हाथ रखा और बोले- दिवाली के कुछ ही दिन बचे है . गाँव में सबके घर कपडे-मिठाई पहुचाने में देर नहीं होनी चाहिए . ये लोग खुश रहेंगे तो हम भी खुश है . सबको साथ लेकर चलना है हमें .

भैया के जाने के बाद मैं वापिस मुड़ा तो देखा की चंपा दहलीज पर खड़ी मुस्कुरा रही थी .

मैं- क्या हुआ तुझे

चंपा- कुछ नहीं , बाजरे की खिचड़ी बना रही हूँ तू खायेगा क्या

मैं- बाजरे का चूरमा बना दे मेरे लिए . मुद्दत हुई तेरे हाथ का कुछ खाए

चंपा- अरे कमीने, कल ही तो घी में दबा के रोटिया जो पेली थी वो किसी डायन ने बनाई थी क्या .

तुरंत ही चंपा को अपनी भूल का अंदाजा हुआ वो अन्दर गयी और दरवाजो पर पानी लाकर डाला.

मैं- वो तेरे इस टोटके से नहीं रुकने वाली उसने आना होगा तो आ ही जाएगी.

चंपा- तुझ को बड़ा पता है ऐसे बोल रहा है जैसे उस से गहरा नाता है तेरा

मैं- तू देखेगी , एक दिन इसी दहलीज पर उसे लेकर आऊंगा तेरे सामने

चम्पा- मुह तोड़ दूंगी तेरा मैं, बनवा ले अब चूरमा उसी से मैं तो चली .

मैं- अरे नाराज क्यों होती है

चंपा मेरे पास आई इतना पास की उसकी तनी हुई छतिया मेरे सीने से रगड़ खाने लगी. उसके होंठ जैसे मेरे होंठो को छू ही गए थे .

“ऐसे ही नहीं तुझे किसी को सौंप दूंगी , पहले जांच-परख करुँगी फिर देखूंगी ” उसने कहा और मुझे धक्का देकर अन्दर भाग गयी . मैं उसे देखता रहा .......... की तभी मेरी नजर ऊपर छजे पर पड़ी भाभी की आंखे हमें ही घूर रही थी .

#37

एक रात और मैंने चाची की बाँहों में गुज़ार दी. सुबह ही मैं मंगू को लेकर हलवाई के पास गया और उस से पूछा की मिठाइयो का काम कितना बाकी है .

हलवाई- क्या बताऊ कुंवर, मेरा कारीगर न जाने कहाँ गायब हो गया है . वो होता तो बड़ी राहत रहती मुझे .

मैं- तो तुमने तलाश नहीं की उसकी

हलवाई- पिय्क्क्ड है , किसी और के साथ हो लिया होगा ऐसे की क्या तलाश करनी .

मैने मेरे मन में सोचा ये दुनिया बड़ी मादरचोद है .

मैं- कोई नहीं, दिवाली के दिन आये ही समझो मिठाई कम नहीं रहनी चाहिए

हलवाई- आजतक ऐसा हुआ है क्या कभी

मैं- ठीक है

फिर मैं और मंगू खेतो पर निकल गए. सरसों की फसल में तेजी होने लगी थी पर फिर भी हमने सोचा की दिवाली के बाद ही पानी देंगे इसको. गेहूं भी हमारे ठीक ही लग रहे थे . शाम तक हम लोग वही पर रहे . मैं मंगू के आगे कारीगर का जिक्र करना चाहता था फिर सोचा की मंगू चुतिया है . किसी और के आगे अंट शंट बक दिया तो मेर्रे लिए और मुसीबत हो जाएगी.

खैर त्यौहार सर पर था तो मैंने चाची के घर को पूरा साफ़ कर दिया. दरअसल पुताई के लिए भैया ने मना किया था वो चाहते थे की थोड़े दिन में चंपा का ब्याह होना ही है फिर ही करवा लेंगे. तमाम व्यस्तता के बीच एक चीज जो मुझे हताश कर रही थी वो थी मेरे लिंग की सूजन, जब जब मैंने मूतने जाता तो मैं उसे देखता . हालाँकि चाची कहती थी की ये चीज़ मोटी ही होनी चाहिए क्योंकि औरत को मोटे लंड से चुदने में अलग हो मजा आता है .

पर मुझे थोड़ी शर्मिंदगी होती थी क्योंकि ये साला झूलता ही रहता था इसका उभार अलग से ही दीखता था . चंपा कई बार इसकी तरफ इशारा करके मेरे मजे लेती थी. दूसरी समस्या थी मेरे कंधे का जख्म साला भर ही नहीं रहा था . हार कर मैंने भैया को बताया तो उन्होंने कहा की दिवाली के बाद वो मुझे शहर दिखायेंगे बड़े डॉक्टर को .

खैर इन्ही सब के बीच दिवाली का दिन भी आ ही गया. भैया ने हम तीनो को पैसे दिए नए कपडे दिए. भाभी ने मंगू और चंपा को तोहफे दिए . मैंने भाभी के पैरो को हाथ लगाया पर उनका हाथ मेरे सर प् र्नाही आया. ऐसी ये पहली दिवाली थी जो भाभी की नाराजगी के बीच मनाई जाने वाली थी .

इतना पराया कर बैठी थी वो मुझे , दिल में कसक तो बहुत थी कहना तो बहुत कुछ चाहता था मैं पर त्यौहार में खटास न हो जाए इसलिए मैं चुप ही रहा. भैया के साथ जाकर हम लोगो ने घर घर मिठाई बांटी. गाँव का माहौल थोडा ठीक नहीं था इसलिए इस बार आतिशबाजी नहीं की जाने वाली थी . बस दिए हो जलाने थे. रात को पूजा के बाद हमने गाँव भर में दियो की रौशनी कर दी. गाँव का स्कूल, मंदिर, डाकखाना. जोहड़ जो भी जहाँ भी जगह दिखी रौशनी करते गए.

दो दिए मैंने लाली और उसके प्रेमी के सम्मान में उस जगह पर जलाये जहाँ पर उन्हें फांसी दी गयी थी .तरह तरह की मिठाई, पकवान खाने पीने में ही आधी रात कब हो गयी मालूम ही नहीं हुआ के तभी मुझे याद आया की मैं कुवे पर और खेतो में दिए जलाना तो भूल ही गया.

मैंने एक झोले में दिए डाले और तेल का कनस्तर साइकिल पर बाँध लिया

चाची- अब कहाँ

मैं- खेतो पर तो दिए जलाये ही नहीं

चाची- रात बहुत हुई अब ठीक नहीं वहां जाना

मैं- चाची किसान का दूसरा घर खेत होते है . उस धरती माता का सम्मान नहीं किया तो ये भी गलत ही होगा न . तुम फ़िक्र मत करो मैं यूँ गया और यूँ आया .

चाची- मैं चलू साथ

मैं- नहीं कहाँ न बस गया और आया . देर नहीं करूँगा.

मैंने साइकिल उठाई और तेजी से गाँव से बाहर को निकल गया . जिस धरती से हम अनाज, सब्जिया ले रहे थे. जिस धरती को हम दूसरी माँ समझते थे इस त्यौहार में उसे कैसे अकेला छोड़ देते . मैं जब पगडण्डी से थोड़ी दूर था तो मैंने अपनी जमीन पर दूर से ही रौशनी देख ली थी और मैं हैरान हुआ . मैंने सोचा क्या मालूम भाभी आई हो यहाँ पर . जब मैं वहां पर पहुंचा तो देखा की दिए जुगनुओ जैसे फैले थे जहाँ तक मेरी नजर गयी झिलमिलाते दियो ने मन मोह लिया.

मैंने देखा कुवे की मुंडेर पर गोलाई में दिए जल रहे थे और वही पर सियार बैठा हुआ बड़ा गजब लग रहा था उस रौशनी में . मुझे देख कर वो पास आया और मेरे सीने से पंजे लगा दिए. उसका ये तरीका था गले लगने का. उसे देख कर मैं मुस्कुराया . मैं थोडा और आगे बढ़ा तो देखा की देहरी पर मेरी तरफ पीठ किये कोई बैठी थी और मैं एक पल में जान गया वो कौन थी ....

“निशा, तुम यहाँ ” मैंने कहा

निशा-और कौन होगा मेरे सिवा .

निशा उठ कर मेरे पास आई .उसे देखा , देखता ही रह गया . इतनी खूबसूरत आज से पहले वो कभी नहीं थी . आज उसने केसरिया लहंगा चोली पहना था

मैं- जोगन लग रही हो आज

निशा- जोग लगे जमाना हुआ

उसने एक दिया मेरे हाथ में रखा और बोली- बिना बताये आई तुम्हे परेशानी तो नहीं

मैं- इतना तो हक़ है तुम्हारा . ये सब तुम्हारा ही है कभी भी आ सकती हो. मुझे मालूम होता की तुम आओगी तो मैं पहले ही आया जाता

निशा- अब भी देर कहाँ हुई.

मैं- तू जब भी बुलाये मैं तो आऊंगा ही

निशा- ये बात है तो फिर इतना इंतजार क्यों करवाया

मैं- क्या बताऊ अब . वैसे मुझे किसी ने बताया नहीं की डायन त्यौहार मानती है

निशा- तूने डायन को जाना ही नहीं कभी . पहले तो कभी मनाया नहीं पर अब ये जरुर मनाएगी ये डायन. अंधेरो में मिला तू उजले की तरफ खींच रहा है मुझे.

वो मेरे पास आई उसने मेरे माथे को चूमा और एक नारंगी-लाल धागा मेरे हाथ में रख दिया.

मैं- क्या है ये ............
 
#38

मैं- क्या है ये निशा

निशा- इसे कलाई में बांध लेना ये रक्षा करेगा तुम्हारी

मैने वो धागा जेब में रख लिया.

निशा- ऐसे क्या देख रहा है

मैं- दिल करता है तुझे ही देखता रहू

निशा- देखा था न फिर मुड के देखा नहीं तूने .

मैं- समझता हूँ

निशा- समझता नहीं तू, समझता तो दारा की खाल नहीं उतारता

मैं- तुझे मालूम हो गया .

निशा- कुछ छिपा भी तो नहीं मुझसे

मैं- मुझे बहुत अफ़सोस है उस बात का , हालाँकि मैं उसे मारना नहीं चाहता था बस सबक सिखाना चाहता था ताकि फिर किसी मजलूम को सताए नहीं वो.

निशा- जो किया ठीक किया पर कबीर इस रक्त की महक से बच कर रहना , जब इसका सुरूर चढ़े तो फिर कुछ खबर न रहे.

मैं- मैं वैसा नहीं हूँ निशा, मैंने कभी किसी से ऐसा-वैसा कुछ नहीं किया उस दिन भी बस मैं उसे अहसास करवाना चाहता था की मजलूमों को नहीं सताना चाहिए. दारा को मुझसे दिक्कत थी तो मिल लेता पर उसने नीच हरकत की .

निशा- ये दुनिया बड़ी जालिम है धीरे धीरे तुम भी समझ जाओगी

मैं-ठण्ड बहुत है कहो तो अलाव जला लू या अन्दर बैठ सकते है

निशा ने सितारों की तरफ देखा और बोली- कुछ देर और ठहर सकती हूँ

मैं- अगर कभी तुम्हे दिन में मिलना हो तो .....

निशा-मेरा साथ करना है तो इन अंधेरो की आदत डाल लो . मेरा यकीन करो ये अँधेरे तुम्हारे उजालो से भी ज्यादा रोचक है .

मैं- फिर भी अगर कभी दिन में मुझे तुम्हारी जरूरत हुई तो .

निशा- तो क्या मैं आ जाउंगी पर ये समझना मेरी कुछ हदे है

मैं- चंपा कहती है की डायन का नाम लेने से वो रात को घर पर आ जाती है

निशा- वो कहती है तो ठीक ही कहती होगी.

रात के तीसरे पहर तक हम दोनों कुवे की मुंडेर पर बैठे बाते करते रहे. फिर उसके जाने का समय हो गया . दिल तो नहीं कर रहा था पर रोक भी तो नहीं पा रहा था उसे. उसके जाने के बाद मैंने भी साइकिल उठाई और गाँव का रास्ता पकड़ लिया. मैंने देखा की जब तक आबादी शुरू नहीं हुई सियार मेरे साथ साथ ही रहा और फिर ख़ामोशी से मुड गया.

देखा की चाची अभी तक जाग रही थी .

मैं- सोयी नहीं अभी तक

चाची- जिनका जवान लड़का इतनी रात तक बाहर हो वो कैसे सो सकती है.

मैं- थोड़ी देर हो गयी .

चाची- वैसे मुझे भी लगता है की बहुरानी ठीक कहती है तेरा किसी न किसी से तो चक्कर जरुर है . गाँव में ऐसी कौन हो गयी जो रातो को तेरे साथ है , मालूम तो कर ही लुंगी मैं.

मैं- ऐसी कोई बात नहीं है चाची

चाची- ऐसी ही बात है तू ही बता भला और क्या वजह है जो तू बहाने कर कर के गायब हो जाता है , मैं जानती हूँ खेतो की रखवाली भी तेरा बहाना ही है

मैं- सच सुनना चाहती हो

चाची- सुनकर ही मानूंगी

मैं- तो सुनो , मेरी जिन्दगी में कोई आ गयी है ये बात मैं मानता हूँ

चाची- वाह बेटे अब बता भी दे वो कौन है

मैं- वो एक डायन है .

चाची के माथे पर शिकन छा गयी मेरी बात सुन कर

चाची ने उसी समय आंच जलाई और लाल मिर्च कोयलों पर फूक कर मेरे सर से पैर तक उसे घुमाया और बोली- रात बहुत हुई सो जा.

मैं- मैं ऐसा करने से क्या होगा.

चाची- तसल्ली रहेगी मुझे. और हाँ अबकी बार ऐसे बहाना करके गया न तो मैं अभिमानु को सब बता दूंगी .

मैंने चुपचाप बिस्तर पकड़ा और आँखे बंद कर ली. सुबह मेरा कंधा बहुत जोर से दुःख रहा था शायद कुछ सुजन भी थी तो भैया मुझे शहर के लिए दिखाने के लिए. डॉक्टर ने बताया की मांस सड रहा है , उसने अच्छे से देखा और फिर अपने औजार लेकर कुछ चीर फाड़ करने लगा. बेशक मुझे दवाई दी थी सुन्न करने की पर फिर भी दर्द हो रहा था .मुझसे बाते करते हुए डॉक्टर कभी नुकीले औजार इधर घुसाता कभी उधर.

बहुत देर बाद उसने कंधे के अन्दर से कोई तीन-चार इंच लम्बा एक टुकड़ा बाहर निकाला. जो देखने में किसी हड्डी सा लग रहा था .

डॉक्टर- इसकी वजह से तुम्हारा मांस लगातार सड रहा था .

मैं- पर ये क्या है

डॉक्टर- शायद ये दांत हो सकता है उस जानवर का जिसने तुम्हे काटा था .

ये सुन कर मेरी रीढ़ की हड्डी में सिरहन दौड़ गयी. जिस बात को मैं लगातार मानने से इंकार कर रहा था डॉक्टर ने उसकी पुष्टि कर दी थी . उस रात बेखुदी की हालत में अवश्य ही उस हमलावर ने मुझे काट लिया था .

“क्या इस की वजह से ही मुझे रक्त की महक इतनी प्यारी लगने लगी थी .” मैंने खुद से सवाल किया और जवाब के ख्याल से ही मैं घबरा गया .

डॉक्टर ने मुझे कुछ दवाइया दी. कुछ मरहम दिए जो जख्म को जल्दी भरने में मदद करने वाले थे . साथ ही हिदायत दी की हर तीसरे दिन पट्टी बदली जाए और जितना हो सके मैं आराम करू ताकि कंधे पर जोर कम से कम आये.

“अब तुम जा सकते हो ” डॉक्टर ने कहा

मैं उठ कर बाहर को चला ही था की तभी मेरे मन में आया की लिंग की सुजन के बारे में क्या इनसे बात की जाये. पर हिम्मत नहीं हुई की जिक्र कर सकू. भैया ने एक मोटा कपडा ख़रीदा कंधे की अतिरिक्त सुरक्षा के लिए. हमने दोपहर का खाना शहर में ही खाया . भैया के एक दो जानने वालो से मिले और घर आते आते अँधेरा छाने लगा था. वापसी में भैया ने गाँव से थोडा पहले गाडी रोक दी .

मैं- क्या हुआ

भैया - कुछ नहीं बैठते है थोडा फिर चलेंगे.

भैया ने गाड़ी में से एक बोतल निकाली और बाहर उतर गए . मैं भी उनके पीछे हो लिया . पास में ही एक लकड़ी का लट्ठा पड़ा था हम उस बैठ गए . भैया ने एक पेग बनाया और मुझे दिया .

मैं- नहीं भाई

भईया- अरे ले कुछ नहीं होता. ये तो दवाई है इतनी सर्दी में खांसी-जुकाम से भी तो बचना है .

मैंने गिलास थाम लिया और एक चुस्की ली. कडवा पानी कलेजे पर जाकर लगा.

मैं- भैया ये तो कोई नयी ही चीज है

भैया- हाँ, अंग्रेजी है

मैंने कुछ घूँट और भरे.

भैया- कबीर .

मैं- हाँ भैया ..

भैया- कबीर , कुछ नहीं जल्दी से पेग ख़त्म करते है रात घिर आई है घर चलते है .

मुझे लगा की भैया कुछ पूछना चाहते है पर पूछ नहीं पा रहे है

मैं- क्या बात है भैया. होंठ कुछ पूछ रहे है आपका दिल रोक रहा है

भैया- नहीं रे कुछ नहीं

मैं- आप पूछ सकते है आपसे झूठ बोल सकू इतना बड़ा नहीं हुआ मैं अभी .

भैया- दारा की हत्या के बारे में क्या ख्याल है तेरा

भैया की बात सुनकर मेरे चेहरे का रंग उड़ गया जिसे मैं भैया की नजरो से छुपा नहीं सका..............

#

भैया- जिन रास्तो पर तू चल रहा है न उन पर मैं दौड़ चूका हूँ . तेरे हर किये कराये पर मैं मिटटी डाल दूंगा पर तुझे भी समझना होगा राय साहब के हम दो कंधे है, हमें जिम्मेदारी सिर्फ इस घर की ही नहीं है इस गाँव को इस समाज को साथ लेकर भी चलना है . मैंने तुझे आज तक नहीं रोका आगे भी नहीं रोकूंगा पर बस इतना समझना की अय्याशी चाहे जितनी भी करो ऐसा कुछ भी नहीं होना चाहिए की घर की दहलीज तक उस बात के छींटे पड़े.

मैं- भैया, दारा को मैं जानता भी नहीं उसका जिक्र भी आपसे ही सुना है

भैया- बेहतर होगा आगे जिक्र तुम्हे सुनना नहीं पड़े. मैंने और तुम्हारी भाभी ने फैसला किया है की चंपा के ब्याह के बाद तुम्हारे लिए भी रिश्ते देख लिए जाये कोई ठीक सा लगेगा तो ब्याह कर देंगे तुम्हारा .

मैं- भैया , अभी मैं इसके लिए तैयार नहीं हूँ .

भैया- भाई हूँ तेरा , तुझे तुझसे ज्यादा जानता हूँ ये बात क्यों दोहरानी पड़ती है मुझे. लाली के लिए तेरी आँखों में जो बगावत देखि थी मैंने , वो आज भी देख रहा हूँ मैं . मेरे भाई, मैं जानता हूँ एक दिन आयेगा जब तू मेरे सामने खड़ा होगा और मैं नहीं चाहता की वो दिन कभी भी आये इसलिए कुछ फैसले मुझे लेने ही होंगे.

मैं- जब मुझे ब्याह करना होगा मैं बता दूंगा

भैया ने एक ही साँस में अपना पेग खाली कर दिया और बोले- तेरी मर्ज़ी छोटे

भाई ने जान कर बात अधूरी छोड़ दी पर मैं समझ गया था की नियति मेरे भाग में क्या लिख रही थी . बोतल ख़तम करने के बाद हम गाँव में पहुँच गए. चाची के घर पहुंचा तो देखा की चंपा रसोई में मीट पका रही थी . केसरिया सलवार सूट में बड़ी प्यारी लग रही थी वो . एक पल को मुझे लगा की जैसे निशा ही हो वहां पर . निशा के ख्याल से ही मेरे होंठ अपने आप मुस्कुरा पड़े.

चंपा- क्या बात है आजकल अपने आप में ही खोये रहते हो .

मैं- आज बड़ी कटीली लग रही है .

चंपा- मैं तो हमेशा से ही दिलदार रही हूँ एक तू ही है जो देखता नहीं मेरी तरफ .

मैं- भूख लगी है रोटी परोस

चंपा- बस ये पक जाये, आटा गूंध लिया है चाची आ जाये फिर फटाफट तवा रख दूंगी.

मैं- कहा गयी चाची.

चंपा- भाभी के पास गयी है .

मैं- किसलिए

चंपा- भाभी तेरी सलामती के लिए कल एक पूजा करवा रही है उसकी तयारी के लिए .

मैं- घर से तो निकाल दिया है अब ये किसलिए

चंपा- दिल से नहीं निकाल सकती तुझे वो इसलिए

मैं- वो मुझे कातिल मानती है उन तमाम लोगो का

चंपा- वैसे शक है मुझे भी ,

मैं- की मैंने क़त्ल किया है उनका

चंपा- नहीं मुझे शक है की कविता का तेरे साथ सम्बन्ध था तुझसे चुदने के लिए ही वो जंगल में गयी थी या फिर तूने उसे कुवे पर बुलाया होगा.

मैं- अगर मेरा ऐसा इरादा होता तो उसके घर पर ही नहीं जाता मैं, वैसे भी वैध जी तो तक़रीबन बाहर ही रहते है घर से ऐसे में हम दोनों के पास पूरा मौका नहीं रहता क्या

चंपा-वैध के घर के चक्कर भी कुछ ज्यादा ही लग रहे थे बोल न ,

मैं- वैध के घर जाने का मेरा मकसद कुछ और था .

चंपा जरा हमें भी तो बता ऐसा क्या मकसद था जो कविता पूरा कर रही थी और हम नहीं कर पाये.

मैं- मेरी कुछ समस्या है

चंपा- हाँ तो हमें भी बता देना . क्या मालूम मैं कुछ समाधान कर सकू.

मैं- तुझे हर बात मजाक में ही लेनी है न

चंपा- चल ठीक है तू चाहे तो मुझे बता सकता है

मैं- सुन कर हसेंगी तो नहीं न

चंपा- मैं कोई पागल हूँ क्या जो बिना बात दांत फाडू

मैं- ठीक है फिर बताता हूँ , मैं एक रात खेत में मैं पेशाब कर रहा था तो किसी कीड़े ने मेरे इस पर काट लिया तब से ये सूज गया है . इसकी सुजन कम ही नहीं हो रही .

चंपा- अरे ऐसा भी होता है क्या ,

मैं- ऐसा ही हुआ है

चंपा- मैं नहीं मानती इस बात को

मैं- यही बात है

चंपा- एक काम कर मुझे देखने दे इसे, तभी मैं मानूंगी

मैं- देख लिया न तो घबरा जाएगी , चुदने के तेरे सारे ख्याल गायब हो जायेंगे.

चंपा- ये बात है तो दिखा फिर

मैं- नहीं दिखाने वाला मैं

चंपा- देख तू अब मुकर रहा है बात से

मैंने देगची में चम्मच डाली और थोड़ी तरी और कुछ मांस के टुकड़े कटोरी में डाले और खाने लगा.

मैं- चंपा , तू मंगू की बहन न होती तो मैं पक्का तेरी मुराद पूरी कर देता .

चंपा- कबीर मैं बहुत दिनों से तुझे कुछ बताना चाहती थी , तू हमेशा मंगू की दोस्ती का जिक्र करता है पर आज मैं तुझे मेरी जिन्दगी का एक काला सच बताती हूँ .

चंपा ने जब ऐसा कहा तो मेरा दिल और जोर से धडकने लगा.

चंपा- जिस मंगू की वजह से तू मुझे नहीं देखता वो मंगू , वो मेरा भाई मंगू ले चूका है मेरी.........

चंपा की बात सुन कर मेरे पैरो तले जैसे जमीन ही खिसक गयी .

मैं- जुबान को लगाम दे चंपा. सोच कर बोल तू क्या बोल रही है

चंपा- मुझे मालूम था तू यकीन नहीं करेगा पर तेरा दोस्त वैसा नहीं है जितना सीधा तू उसे समझता है . जानता है मैंने तुझसे क्यों कहा की तेरा कविता से सम्बन्ध हो सकता है क्योंकि मंगू से सेट थी कविता. मैंने सोचा की क्या मालूम मंगू ने तुझे भी दिलवा दी हो कविता की .

मैं- चंपा अगर तू सच कह रही है तो अभी मेरे साथ चल , मुझे तेरी कसम मंगू का वो हाल करूँगा मैं की ये गाँव याद रखेगा. एक पवित्र रिश्ते की मर्यादा तोड़ने की उसकी हिम्मत कैसे हुई.

चंपा- तू ऐसा कुछ नहीं करेगा . तू मेरा साथी है इसलिए मैंने अपने मन की बात तुझे बताई ये किसी और को मालूम हुआ तो मुझे फांसी खानी पड़ेगी कबीर.

मैं- तू क्यों फांसी खाएगी , गलत काम मंगू ने किया है सजा उसे मिलेगी.

चंपा- और उस सजा से तकलीफ भी हमें ही होगी कबीर. मैं तुझे बस बताना चाहती थी की ये दुनिया वैसी नहीं है जैसा तू मानता है . यहाँ पर फरेब है , धोखा है

मैंने चंपा से कुछ नहीं कहा उसे अपने गले से लगा लिया मेरी आँखों से कुछ आंसू बह कर उसके गालो को भिगो गए.
 
#40

चाची के आने के बाद हम सब ने खाना खाया . उसके बाद मैं चंपा को छोड़ने चला गया . वापसी में मैं थोड़ी देर उस पेड़ के पास बने चबूतरे पर बैठ गया जहाँ से लाली को सजा सुनाई थी . ये दुनिया बड़ी मादरचोद है मैंने सोचा . पर मैं दोष देता भी तो किसे मैं खुद अपनी चाची को चोद रहा था .दूसरी बात मंगू ने कविता को फसाया हुआ था और हरामी ने मुझे कभी बताया भी नहीं ..

बैठे बैठे मैंने सोचा की एक दिन आयेगा जब मैं भी अपनी पसंद की लड़की से ब्याह करने का कहूँगा तब भी ये जमाना मेरे खिलाफ ही जायेगा जैसे लाली के खिलाफ था एक दिन मुझे भी ऐसे ही किसी पेड़ पर लटका दिया जायेगा. खैर, कितनी देर बैठे रहते घर तो जाना ही था चाची मेरी राह ही देख रही थी .

मैंने बिस्तर पर जाते ही रजाई ओढ़ ली और आँखे बंद कर ली. कुछ ही देर में चाची भी बिस्तर में आ गयी .

चाची- क्या बात है परेशां लगते हो , शहर में डॉक्टर ने क्या बताया

मैं- डॉक्टर ने कहा सब ठीक है जल्दी ही जख्म भर जायेगा

चाची- तो फिर चेहरे पर ये चिंता किसलिए

मैं- चाची तुम चंपा की सबसे अच्छी दोस्त हो . उसका तुमसे कुछ नहीं छुपा

चाची- क्या हुआ बताएगा भी

मैं- चंपा ने मुझे बताया की मंगू उसकी लेता है

मेरी बात सुन कर चाची कुछ देर के लिए चुप हो गयी और फिर बोली---- सच है ये कबीर.

मै- तुमको पता था , तुमने खाल क्यों नहीं उतारी मंगू की

चाची- उसका कारण था , ये बात अगर गाँव में फैलती तो उन दोनों को मार दिया जाता समाज में बदनामी होती अलग

मैं- तो क्या बदनामी के डर से हम अनुचित को संरक्षण देंगे

चाची- ये दुनिया वैसी नहीं है कबीर जैसा तू समझता है . मंगू के माता पिता का क्या दोष है अगर औलाद ना लायक निकल जाये तो . मंगू और चंपा को तो एक दिन लटका दिया जाता पर उसके माँ बाप लोगो के तानो से रोज मरते . तिल तिल करके मरते वो . दूसरी बात ये दुनिया एक हमाम है कबीर जिसमे हम सब नंगे है . चम्पा और मंगू की बात क्यों करे तू मुझे और खुद को देख हम दोनों भी तो गुनेह्गर है कहीं न कहीं . कहने को हम माँ-बेटे है और बिस्तर पर लोग-लुगाई बने हुए है

.

चाची मुझे वो आइना दिखा रही थी जिसके वजूद को मैं नकार रहा था .

चाची- कबीर, मैं जानती हूँ चंपा के मन में चाहत है तेरे प्रति, तेरे अन्दर जो मंगू की दोस्ती का मान है वो भी जानती हु. चंपा की हर कोशिश तेरे करीब आने की दोस्ती की आन पर आकर रुक जाती है . और मुझे गर्व है इस बात का की मेरा बेटा रिश्तो की अहमियत समझता है . चंपा ने अपना मन तेरे सामने खोला क्योंकि वो विश्वास करती है तुझ पर अब ये तेरी जिम्मेदारी है की तू उसका मान रखे.

मैं- मंगू ने कविता को भी पटाया हुआ था .

चाची- वो उसकी जिन्दगी है , उसका निजी मामला है हमें जरुरत नहीं उसमे पड़ने की .

मैं- वो मुझे बता सकता था .

चाची- कबीर समझ लो कुछ बाते निजी होती है अब देखो तुम्हारी भाभी और यहाँ तक मुझे भी लगता है की तुम्हारे किसी लड़की से चक्कर है जिससे मिलने को तुम रात रात भर गायब रहते हो हमारे लाख पूछने पर भी तुमने हमें नहीं बताया क्योंकि तुम समझते हो ये निजी मामला है तुम्हारा. बेशक मंगू और तुम बचपन से एक साथ रहे हो पर कुछ चीजे दोस्तों से भी छिपाई जाती है . सो जाओ अब , सुबह हमें पूजा के लिए चलना है .

चाची ने पीठ मोड़ ली मैंने एक बार उसकी गांड पर हाथ फेरा और फेर कर ही रह गया क्योंकि तभी मेरे कंधे में दर्द हो गया मुड़ने से . मैंने कंधे के निचे तकिया लगाया और सोने की कोशिश करने लगा. सुबह अँधेरे ही चाची ने मुझे उठा दिया . थोड़ी देर में ही मैं तैयार हो गया . और हम लोग चल दिए.

चौपाल पर पहुँचने के बाद हम लोग उस रस्ते पर मुडने लगे जो गाँव से बाहर जंगल की तरफ जाता था .

मैं- मंदिर दूसरी तरफ है

भाभी- चुपचाप चलते रहो .

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था .

चाची- पूजा, वनदेव के पत्थर पर होगी. बहुरानी को लगता है की जंगल में वनदेव ही सुरक्षित रखेंगे तुम्हे.

मैं- इतनी सी बात के लिए इतनी ठंडी सुबह में ले जा रहे हो मुझे

चाची- देवता के बारे में कुछ मत बोलो

खैर हम लोग वनदेव के पत्थर के पास पहुंचे मैंने हसरत भरी नजरो से उस तरफ देखा जो निशा की मिलकियत तक जाता था . न जाने क्यों दिल को अच्छा लगा. गाँव का पुजारी पहले से ही वहां पर मोजूद था . एक चटाई सी बिछा कर पूजा की तैयारिया शुरू की गयी . पुजारी ने अग्नि जलाई और मन्त्र पढने शुरू किये उसने मेरे माथे पर टीका लगाया और फिर मुझे अपना हाथ आगे करने को कहा जैसे ही मैंने अपना हाथ आगे किया पुजारी के मन्त्र रुक गए उसके माथे पर पसीना बहने लगा. इधर-उधर देखने लगा वो

भाभी- क्या हुआ पुजारी जी

पुजारी- ये शुभ मुहूर्त नहीं है

भाभी- ये क्या कह रहे है आप. आपने ही तो पंचांग देख कर गणना की थी

पुजारी- मुझसे भूल हुई होगी.

भाभी- भूल नहीं हुई आपसे आप कुछ छिपा रहे है हमसे . जो भी बात है वो बताई जाये

अब राय साहब की बहु को भला कौन मना करे. पुजारी ने मेरा हाथ पकड़ा और भाभी के सामने कर दिया. जलती आंच के ताप में मेरी कलाई में बंधा धागा झिलमिलाने लगा और भाभी की त्योरिया चढ़ती गयी .

भाभी- पुजारी जी आप जाइये अभी , आपकी दक्षिणा हम भिजवा देंगे

मैं भी उठने लगा तो भाभी बोली- तुम यही रुको कुंवर.

मैं- जब पूजा होने ही नहीं वाली तो क्या फायदा रुकने का वैसे भी ठण्ड बहुत है

“हमें दुबारा कहने की जरुरत नहीं है ” भाभी ने थोड़े गुस्से से कहा

चाची- आराम से बहु,

भाभी- आप हमें आराम से रहने को कह रही है ,ये देखने के बाद भी ....

मैं- क्या कह रही हो मुझे बताओ तो सही .........

चाची - ये धागा किसने दिया तुम्हे

मैं- ये धागा ......... ये ये तो........

#41

मैं- ये धागा तो मैंने ऐसे ही बाँध लिया था . दुकान से लिया था

मेरा ऐसा कहते ही भाभी ने खींच कर एक तमाचा मारा मुझे

चाची- बहुरानी ये क्या कर रही हो तुम

भाभी- चाची, मैं करू तो क्या करू आपके सामने भी ये झूठ पे झूठ बोले जा रहा है . मुझे तो शर्म आ रही है की मेरी परवरिश इतनी नालायक कैसे हो गयी .

चाची- कबीर , सच बता ये धागा तुझे किसने दिया

मैं- मामूली से धागे के पीछे पड़ गए हो आप लोग आखिर क्या फर्क पड़ता है इस धागे से

चाची- फर्क पड़ता है

मैं- तो तुम ही बताओ क्या है ऐसा इस धागे में

भाभी- ये डाकन का धागा है . इसे मनहूसियत माना जाता है

भाभी के चेहरे को देख कर ऐसा लग रहा था की बस रो ही पड़ेगी .

भाभी- सच सच बता तुझे कैसे मिला ये

मैं- कहा न दूकान से ख़रीदा था शहर गया जब . हो सकता है की ये कुछ मिलता जुलता धागा हो

भाभी- मेरी आँखे धोखा खा सकती है , चाची की आँखे धोखा खा सकती पर क्या पुजारी भी झूठा है

मैं- मुझे नहीं मालूम

भाभी- तू समझ नहीं रहा नादान . अब तो मुझे और यकीन हो गया है की वो सारे पाप तू उसके वश में होकर ही कर रहा है

मैं- तिल का ताड़ मत बनाओ भाभी . ऐसा वैसा जो भी तुम सोच रही हो कुछ भी नहीं है .

चाची- बहुरानी हमें घर चल कर बात करनी चाहिए.

घर आकर भी भाभी का रोना-धोना चालू ही रहा . दिल तो किया की भाभी का मन रखने के लिए इस धागे को उतार कर फेंक दू पर निशा ने इतने मान से ये धागा दिया था इसे उतार देता तो उसकी तोहीन होती अब करे भी तो क्या करे. जब कुछ नहीं सूझा तो मैंने रजाई ओढ़ी और सो गया . न जाने कितनी देर तक भाभी का रुदन चला होगा.

दोपहर को ही उठा फिर मैं . खाना खाके डॉक्टर की दवाई ली . घर से बाहर निकला ही था की मंगू मिल गया वो जाल और काँटा लिए जा रहा था .

मैं- अरे कहाँ

मंगू- बड़े भैया ने कहा की आज शाम के लिए मछली पकड़ लाऊ

मैं- चल मैं भी चलता हूँ .

हम दोनों गाँव के जोहड़ पर आ गए .

मंगू ने जाल फेंका और हम बाते करने लगे.

मंगू- कन्धा कब तक ठीक होगा

मैं- थोडा समय लगेगा तब तक तू थोडा खेतो का काम देख लेगा न

मंगू- ये भी कोई कहने की बात है .

मैं- मंगू यार मैं क्या सोचता हूँ अपनी उम्र के लड़के साले किसी न किसी को पटाये तो होंगे ही .वो लाली भी आशिक पाले हुई थी . अपनी जिन्दगी में कोई ऐसी आएगी या फिर घरवाले जब ब्याह करेंगे तभी कुछ हो पायेगा.

मंगू- गाँव में दो तीन चालू औरते तो है जिनके बारे में कहा जाता है की वो आशिकी करती है पर जब से लाली वाला काण्ड हुआ है न तब से इस मामले में ख़ामोशी सी ही है .

मैं- तुझे नहीं लगता की हमें भी कोई दे दे तो हम भी थोडा मजा कर ले.

मंगू- भाई तुझे तो फिर भी कोई न कोई दे ही देगी मैं तो किसान हूँ मेरी तरफ कौन देखेगी .

मैं- भोसड़ी में मैं भी तेरे साथ ही खेती करता हूँ न .

मंगू- पर तू राय साहब का बेटा है

मैं- तो राय साहब के नाम से कोई भी चुद जाएगी मुझसे

मंगू- ऐसा नहीं है पर तू कोशिश करेगा तो कोई न कोई फंस ही जाएगी.

मैं मंगू को बातो में लगा कर उस से कुछ उगलवाना चाहता था पर वो सहज था मेरे साथ . मुझे चाची की बात याद आ रही थी .

मैं- मंगू तू किसी ऐसी को मिले जो देने को तैयार हो तो मुझे मिलवा देना

मंगू- अरे ये भी कोई कहने की बात है भाई .

बात करते करते मंगू ने जाल में मोटी मछलिया फंसा ली और हम वापिस आ गए. मेरे मन में एक ही सवाल था की क्या उस रात कविता मंगू से मिलने तो नहीं गयी थी जंगल में . पर इतना दूर जाने की क्या जरुरत थी मंगू कविता के घर में घुस जाता वैध को तो कुछ मालूम वैसे भी नहीं होना था . इस सवाल ने मुझे परेशान कर दिया.

तमाम सवालो के बीच एक राहत थी की पिछले कुछ दिनों से मामला शांत था कोई नया हमला नहीं हुआ था हालाँकि भाभी ऐसा मानती थी की निगरानी की वजह से मैं कुछ कर नहीं पा रहा हूँ. रात को एक बार फिर मैं चाची के साथ अकेला था बिस्तर पर . चाची मुझ पर झुकी हुई मेरे होंठ चूस रही थी और मेरे नंगे लंड को हाथ में लेकर मसल रही थी .

मैं- आराम से कंधे में दर्द न हो जाये

चाची- थोडा दर्द सहना सीख

मैं- ज़ख्म ताजा है न इसलिए

चाची -कोई बात नहीं जब तू पूरी तरह ठीक हो जायेगा तब ही करेंगे

मैं- और अभी जो ये खड़ा होकर झूल रहा है इसका क्या .

चाची- मैं क्या जानू इसके बारे में

मैं- और जो तुम्हारी जांघो के बिच छुपी है उसके बारे में तो जानती हो न

चाची- अश्लील बहुत हो गया है तू

मैं- मजा आता है न गन्दी बाते करने में

मैं दिलो जान से चाची की लेना चाहता था पर ये साला हाथ उपर हो नही पाता था पट्टियों की वजह से अजीब ही समस्या थी . चाची लिपट कर मुझसे सो गयी . सर्दी में गर्म औरत पास हो तो चुदाई न भी हो तब भी मजा आता ही है .

न जाने कितनी रात बीती थी दरवाजे पर ही अजीब दस्तक से मेरी आँख खुल गयी . इतनी रात को कौन होगा सोचते हुए मैंने दरवाजा खोला तो देखा की चबूतरे पर सियार बैठा था . मुझे देखते ही वो लपक कर आया और मेरे सीने पर अपने पंजे रख दिए

मैं- आहिस्ता से , चोट लगी है न

वो चबूतरे से कूदा और गली में सडक के बीचो बीच खड़ा हो गया . मैं समझ गया .

मैं- आता हु

मैंने कम्बल ओढा और दरवाजे को इस तरह से बंद किया की लगे अन्दर से बंद है मैं जानता था की मुझे कहाँ जाना है . दो गली पार करके मैं आगे हुआ ही था की एक चीख ने मुझे हिलाकर रख दिया . कोई भागते हुए मेरी तरफ आया और जोर से मुझ से लिपट गया ..........

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“कबीर बचा ले मुझे ” सिस्कारिया भरते हुए चंपा की आवाज मेरे कानो में पड़ी

अनजानी आशंका लिए धडकते दिल को संभाले मैं पलटा तो देखा की चंपा का खूबसूरत चेहरा खून से सना था . उसका कुरता फटा हुआ था . सीने पर गहरी खरोंचे थी .

“क्या हुआ चंपा ” मेरी आवाज लरजने लगी .

चंपा और जोर से मुझसे लिपट गयी और गली के किनारे की तरफ इशारा किया और जो मैंने देखा मेरी समझ से बाहर हो गया . एक शख्स खड़ा था जिसके हाथ पैर अजीब तरीके से हिल रहे थे .

“कौन है तू और तेरी हिम्मत कैसे हुई चंपा पर हमला करने की ” मैंने जोर से कहा

पर उधर से कोई जवाब नहीं आया . मैंने एक नजर चंपा पर डाली जो भय से थर थर कांप रही थी मैंने अपना कम्बल उसे ओढाया क्योंकि कुरता फटने से उसका सीना नंगा हो गया था. मैं उस शख्स की तरफ बढ़ा की चंपा ने मेरा हाथ पकड़ लिया .

“हाथ छोड़ मेरा ” मैंने कहा

चंपा- मत जा कबीर वो खतरनाक है

मैं- सुना नहीं तूने हाथ छोड़ मेरा .

चंपा की ऐसी हालत देख कर मेरा दिमाग हद से ज्यादा ख़राब हो गया था . मेरी नजर एक घर के दरवाजे के पास रखे लट्ठ पर पड़ी मैंने उसे उठाया , कमबख्त मेरा कन्धा भी ना, मैंने दुसरे हाथ से उस लट्ठ को उसकी तरफ फेंका पर वो बन्दा जरा भी नहीं हिला. मैं थोडा और उसकी तरफ बढ़ा की तभी बिजली आ गयी लट्टू की रौशनी में मैंने जो देखा मेरी हैरत का ठिकाना नहीं रहा .वो कोई और नहीं वो कारीगर था जिसकी तलाश में मैं दिन रात एक किये हुए था .

मैं- कारीगर तू ,

पर उसने कोई जवाब दिया , न जाने क्या बडबडाते हुए वो मेरी तरफ लपका और मुझे गिरा के चढ़ गया मुझ पर .

“कबीर ,,,,,, कबीर ” चंपा की चीख एक बार फिर से वातावरण की शान्ति को चीर गयी . मुझ पर हुए हमले से घबरा गयी थी वो .

मैं- होश कर कारीगर . देख समझ मैं क्या कह रहा हूँ

पर उस पर न जाने कौन सा जूनून चढ़ा था . उसने मेरे गले पर अपने दोनों हाथ कस दिए और मेरा गला दबाने लगा. उसके हाथ इतने भारी हो गए थे की जैसे न जाने कितने किलो के बाट रख दिए हो . बड़ी मुश्किल से मैंने उसे अपने से दूर किया .

खांसते हुए मैं अपनी सांसो को दुरुस्त कर रहा था की वो दौड़ कर चंपा की तरफ गया और उसे पकड़ लिया

“कबिर्र्र्रर्र्र्र ” चंपा खौफ से चीखने लगी . मैं उठ कर भागा उसकी तरफ. और उसे चंपा से दूर किया . लट्टू की रौशनी में मैंने ध्यान से उसका चेहरा देखा जो एक तरफ से सड गया था .

“बस बहुत हुआ अब तक मैं टाल रहा था पर अब नहीं ” इस से पहले की मेरी बात पूरी होती कारीगर ने खींच कर मुक्का मारा जो मेरे कंधे के जख्म पर जाकर लगा. न चाहते हुए भी मैं अपनी चीख को रोक नहीं पाया. उसने फिर से चंपा को पकड लिया और उसे मारने लगा. मेरे सब्र का बाँध टूट गया . मैंने अपने कंधे पर बंधी पट्टियों को खोला और हाथ को जकदन से आजाद किया . कारीगर के प्रति मेरे मन में जो भी था अब सिर्फ नफरत बची थी .

मैंने उसके पैर पर मारा वो जैसे ही झुका मैंने उसे उठा लिया. पर कंधे की कमजोरी मेरे लिए आफत बन गयी थी . उसे लिए लिए ही मैं गिर गया और उसने एक लात मेरे पेट में मारी मैं दूर जाकर गिरा. वो फिर से चंपा की तरफ बढ़ा मैंने उसका पैर पकड़ लिया पर जैसे उसे फर्क नही पड़ा मुझे घसीटते हुए वो चंपा के पास पहुँच गया जो सड़क के बीचो बीच पड़ी थी . उसने हम दोनों को उठाया और हमारे गले दबाने लगा.

आँखे जैसे बाहर ही निकल आई थी लगा की अब प्राण गए की तभी उसकी पकड़ हमसे ढीली हो गयी और वो हमारे ऊपर से होते हुए दूर जाकर गिरा . पनियाई आँखों से मैंने देखा अपने भाई को , जो हाथ के लोहे का एक पाइप लिए उसकी तरफ बढ़ रहा था .

“मेरे भाई को मारेगा तू हरामजादे , देख मैं क्या करता हूँ तेरा ” जिन्दगी में पहली बार मैंने भैया को इतने गुस्से में देखा था . भैया ने लगातार उसे मारा पर फिर उसने पाइप पकड़ लिया और भैया के हाथ से छीन लिया . कारीगर न जाने किस भाषा में क्या बोल रहा था उसने भैया की पीठ पर मारा भैया धरती पर गिर गए.

कारीगर ने पाइप ऊपर किया और इस से पहले की वो भैया के सर पर दे मारता भागते हुए मैंने कारीगर की कमर पकड़ी और उसे लिए लिए गिर गया भैया तुरंत खड़े हुए और कारीगर के सर पर लात मारी. मौके का फायदा उठाते हुए मैंने कारीगर का एक पैर तोड़ दिया . वो तड़पने लगा घिसटने लगा. तभी भैया को एक घर की चोखट पर रस्सी लटकी दिखी उन्होंने एक सिरा मेरी तरफ फेंका मैं समझ गया की क्या करना है . गोल गोल घूमते हुए हमने उसे फंसा लिया और रस्सियों को विपरीत दिशाओ में खींचने लगे.

मेरा कन्धा दर्द से परेशान था भैया इस बात को समझ गए .

“छोटे तू चिंता मत कर मैं संभाल लूँगा ” भैया ने अचानक से रस्सी छोड़ दी और अपनी आस्तीन ऊपर चढ़ा ली . भैया ने एक बार मेरी और चंपा की तरफ देखा और फिर अगले ही पल मैंने वो देखा जो मैंने दारा के साथ किया था . उस पल मुझे लगा की मैंने भैया को नहीं बल्कि काली मंदिर में दारा को हलाल करते हुए खुद को देखा हो . सब कुछ जब थमा तो भैया कारीगर के रक्त में सने हुए थे . उस पल को भी उन्हें देखता तो दहशत से ही मर जाता .

“मेरे भाई-बहनों को मारेगा साले. ” भैया कारीगर के जिस्म को तार तार कर रहे थे . वो तब तक नहीं रुके जब तक की भाभी की चीख उनके कानो में नहीं पड़ी . मैंने देखा की भाभी-चाची और कुछ गाँव वाले गली में आ पहुंचे थे . मैंने भाग कर बेसुध पड़ी चंपा को दुबारा से कम्बल ओढाया .चाची-भाभी ने चंपा को संभाला

“अपने अपने घर जाओ सब लोग , सुबह बात हो गी जो भी होगी , और कोई तुरंत वैध को हमारे घर आने का संदेसा दो ” भैया ने सबसे कहा तो गाँव वाले घरो में दुबक गए भैया ने मुझे उठाया और घर ले आये.

“वैध जी आते ही होंगे छोटे ” भैया ने मुझे चारपाई पर लिटाते हुए कहा

मैं- मैं ठीक हूँ भैया , चंपा को देखिये उसे चोट लगी है

भैया- उसे भी कुछ नहीं होगा.

वैध जी ने आते ही अपनी कार्यवाई शुरू की और हमारी मरहम पट्टी की . एक दो काढ़े पिलाये . चंपा के सीने पर गहरा जख्म लगा था . सर भी फूटा था . मैंने पाया की भाभी की नजरे मुझ पर जमी थी .

मैं- ऐसे क्या देख रही हो मैंने कुछ नहीं किया इस बार तो भैया और चंपा भी गवाह है और हमला करने वाला भी .

भाभी- तुम्हे कैसे पता चला की चंपा पर हमला हुआ है और तुम चंपा के पास कैसे पहुंचे

मैंने अपना माथा पीट लिया और भाभी को देखा . उसके मन में आये शक ने मेरा जीवन हरम कर दिया था . इस से पहले की मैं कुछ भी कहता सियार अन्दर आया और मेरी चारपाई पर चढ़ गया ...........
 
#43

सियार को देख कर सारे घर वालो में अफरा तफरी मच गयी . भैया ने उसे मारने के लिए लट्ठ उठा लिया पर मैंने उन्हें रोका. सियार मेरी गोद में चढ़ गया और मेरे कानो को चाटने लगा.

मैं- भैया, ये मेरा दोस्त है .

मेरी बात सुन कर सब लोगो को हैरत हुई

भैया- पर ये जानवर पालतू नहीं हो सकता

मैं- आपके सामने ही है, दरअसल ये अपने खेतो के आस पास ही रहता है कई बार आ जाता है , फिर मुझे भी इस से लगाव हो गया . ये किसी को नुकसान नहीं करेगा भरोसा करो

मैंने कहा तो था पर मेरी बात का घरवालो को रत्ती भर भी यकीन नहीं था खासकर भाभी को . ऊपर से सियार को यहाँ वो पचा नहीं पा रही थी .

मैने सियार को पुचकारा और कहा - तू जा वापिस मैं जल्दी ही आऊंगा मिलने

भाभी- किस से मिलने की बात कर रहे हो

मैं- इसको ही कह रहा हूँ भाभी

इस से पहले की वो कुछ और कहती वैध जी ने भैया से एक तरफ आने को कहा और न जाने उन दोनों में क्या बात हुई फिर वैध और भैया घर से बाहर चले गए. भाभी की जलती नजरो से मुझे कोफ़्त होने लगी थी . मैंने सियार को इशारा किया और उसके पीछे मैं भी चल दिया .

भाभी- अब कहा चल दिए.

मैं- हम दोनों यहाँ रहेंगे तो आप को परेशानी होगी.

भाभी- मुझे परेशानी होगी , कमबख्त मेरा बस नहीं चल रहा वर्ना मैं पीट देती तुझे .

मैं- भाभी आपका दर्जा बहुत ऊँचा है मेरी नजरो में , मैंने आप से कभी झूठ नहीं बोला मैंने आपको सच बताया की मैं किस से मिलता हूँ , किस से मिलने जाता हूँ ये सियार भी उसका ही है . आप चाहे मानो या न मानो वो वैसी बिलकुल नहीं है जैसा हम किस्से-कहानियो में सुनते आये है . उसे कुछ गलत करना होता तो वो न जाने कब का कर चुकी होती .

भाभी- ये बकवास बंद कर तू मैं बस इतना जानना चाहती हूँ की तू इतनी रात को चंपा के साथ क्या कर रहा था .

मैं- चंपा को होश आये तो उस से ही पूछ लेना . चाची चलो यहाँ से

मैंने चाची का हाथ पकड़ा और उसे लेकर चाची के घर आ गया .

चाची- कबीर , मैं जानती हूँ तू मुझसे कभी झूठ नहीं बोलेगा

मैं- मैंने तुझे भी तो सच ही कहा था न की डायन मेरी दोस्त है

मेरी बात सुन कर चाची के माथे पर बल पड़ गए .

चाची- डाकन की दोस्ती माणूस से असंभव है . अगर ऐसा है भी तो उसने जरुर कुछ किया होगा तेरे ऊपर

मैं- तूने क्या बदलाव देखा मेरे अन्दर क्या मैंने किसी का जरा भी बुरा किया . मेरा बिस्वास कर मेरा कोई अहित नहीं है उसके साथ रहने में

चाची का चेहरा पूरा लाल हो गया था

“सो जा तुझे आराम की जरुरत है ” चाची ने बस इतना ही कहा .

सुबह आँख खुली तो बदन दर्द से टूट रहा था . सामने कुर्सी पर भाभी बैठी थी . मैंने उससे कोई बात नहीं की उठ कर बदन पर एक शाल लपेटा और घर से बाहर निकल ही रहा था की भाभी की आवाज ने मेरे कदम रोक लिए

भाभी- मैं उस डायन से मिलना चाहती हूँ

मैं- उसकी मर्जी होगी तो जरुर मिलेगी आप से

भाभी- तुम लेकर चलो मुझे उस के पास

मैं- मैंने कहा न जब उसका जी करेगा वो जरुर मिलेगी

भाभी- कुंवर, तुम्हे यूँ देख कर मुझे तकलीफ होती है सोचती हूँ की मेरी परवरिश में कहाँ कमी रह गयी

मैं- मुझे गर्व है की आपने मेरी परवरिश की और एक दिन आयेगा जब आप मुझे समझेगी और अपने आँचल तले ले लेंगी .

भाभी- मैं सिर्फ इतना कह रही हूँ की अपनी दोस्त से मुझे मिलवाने में क्या परेशानी है तुझे

मैं- मैंने कहा न उसकी इच्छा होगी तो जरुर मिलेगी

भाभी- और कब होगी उसकी इच्छा

मैं- ये तो वो जाने .

भाभी- कुंवर, ये जो भो षड्यंत्र तुम रच रहे हो न इसका पर्दाफाश मैं जरुर करुँगी , मैंने चंपा से भी पूछा उसने कहा की उसे याद नहीं . मैंने कुछ रोज पहले चंपा को तुम्हारी बाँहों में देखा था . दुआ करना मेरा शक गलत साबित हो .

मैं- चंपा को गले लगाना गलत है क्या . आप भी जानती है उसे .

भाभी - तो फिर क्यों नहीं बताया उसने की रात में घर से बाहर क्यों थी वो

मैं- शायद उसने जरुरी नहीं समझा होगा.

भाभी - इतनी बड़ी नहीं हुई है वो अभी

मैं- मुझे जाना है बाहर

खुली हवा में आकर मैंने सांस ली तो करार मिला. भैया अखाड़े में थे मैं वही चला गया .

भाई- अरे छोटे, आराम करना चाहिए न

मैं- आराम ही है भैया

भैया- मैं नहा लेता हु फिर तुझे वापिस शहर ले चलता हूँ डॉक्टर के पास

मैं- ठीक है भैया , बस पट्टी ही तो करवानी है वैध कर देगा

भैया- वैसे कल अच्छी बहादुरी दिखाई तूने

मैं- आप न होते तो मामला हाथ से निकल ही गया था

भैया- उठा पटक की आवाज ने नींद तोड़ दी . मैंने खिड़की से देखा की दरवाजा खुला पड़ा है उसे बंद करने ही आया था की तुम लोगो की चीख पुकार सुनी भैया पर वो कारीगर को हुआ क्या था कुछ समझ नही आया

मैं- मुझे भी तलाश है इस सवाल के जवाब की

भैया- तू फ़िक्र मत कर मैं मालूम कर ही लूँगा.

मैं चंपा के पास गया वो लेटी हुई थी उसकी माँ को मैंने एक कप चाय के लिए कहा और चंपा से मुखातिब हुआ

मैं- बस एक ही सवाल है मेरा और सच सुनना चाहता हूँ , इतनी रात को घर से बाहर क्या कर रही थी तू.

चंपा- मैं सोयी पड़ी थी , अचानक से एक आहट से मेरी आँख खुल गयी मैंने देखा की आँगन में एक छाया है . गौर किया तो मालूम हुआ की मंगू था जो घर से बाहर जा रहा था .

मैं- इतनी रात को कहाँ जा रहा था वो .

चंपा- यही सवाल मेरे मन में भी था मैं भी उसके पीछे दबे पाँव हो ली . गली में पहुची इतने वो गायब हो चूका था . मैंने सोचा की इधर उधर देखूं उसे की तभी न जाने कहाँ से वो कारीगर आ गया और मुझे दबोच लिया ये तो शुक्र था की तू मिल गया

मैं- अभी कहा है मंगू.

चंपा मालूम नहीं लौट कर आया नहीं वो .

मैं- भाभी को लगता है की रात में तू मुझसे मिलने आई थी

चंपा- सच में

मैं- तेरी कसम

चंपा- सच तू जानता तो है

मैं- तेरे मेरे कहने से क्या होता है , कल को भाभी ये आरोप लगा दे की तू मुझसे चुदने आई थी रात को तो कोई हैरानी नहीं

चंपा- मैं भाभी से बात करुँगी

मैं- पिछले कुछ दिनों में मंगू के व्यवहार में किसी तरह का परिवर्तन लगा है क्या तुझे

चंपा- कुछ खास नहीं बस आजकल वो तेरे साथ खेतो पर नहीं रहता रातो को

मैं - कहाँ कटती है उसकी राते

चंपा यही घर पर ही . कभी कभी दारु की दूकान पर जरुर जाता है पर समय से ही लौट आता है .

दारू की दुकान का सुन कर मुझे दारा की याद आयी . मुझे लगा की कहीं सूरजभान ने ही तो मंगू को अपने जाल में फंसा लिया हो मुझसे दुश्मनी के चलते . पर क्या ये मेरा वहम हो सकता था जो भी था मुझे सच की तलाश करनी ही थी .
 
#44

मुझे शिद्दत से मंगू का इंतज़ार था और जब वो आया तो उसके कपडे सने हुए थे कीचड़ से . हालत पस्त थी उसकी.

मैं- कहाँ गायब था बे

मंगू- भाई , खेतो की परली तरफ नहर का एक किनारा टूट गया काफी पानी भर गया है बहुत नुक्सान हो गया . किनारे की मरम्मत करने में देर हो गयी .

मैं- तू अकेला गया , मुझे बता तो सकता था न

मंगू- अकेला नहीं था उस तरफ जिनके भी खेत है सब लोग थे. तुझे इसलिए नहीं बताया की पहले ही चोट लगी है. पानी का बहाव फ़िलहाल के लिए तो रोक दिया है पर मुझे लगता नहीं की ज्यादा देर ये कोशिश कामयाब होगी , अभिमानु भाई ही मदद करेंगे अभी . मैं नहा लेता हु फिर भैया को बुलाने जाऊंगा.

मंगू के रात भर गायब होने की वजह ये थी . मैंने तस्दीक कर ली थी मंगू गाँव के और लोगो के साथ नहर के किनारे को ठीक करने में ही जुटा था . एक बार फिर से मैं घूम कर वहीँ पर आ गया था जहां से चला था . दोपहर में भाभी ने मुझसे कहा की डायन अगर मिलने को तैयार हो जाये तो वो गाँव के मंदिर में मिलना चाहेगी उस से. भाभी ने अपना दांव खेल दिया था उसने जान बुझ कर ऐसी जगह चुनी थी . पहली बार मुझे लगा की भाभी कितनी कुटिल है .

खैर उस रात को ये सुनिश्चित करने के बाद की कोई भी मेरा पीछा नहीं कर रहा मैं काले मंदिर के तालाब के पास पहुँच गया. पानी एकदम शांत था इतना शांत की जैसे तालाब था ही नहीं . सीली दिवार का सहारा लेते हुए मैं काली मंदिर की सीढिया चढ़ कर ऊपर पहुँच गया .

“माना के मेरे मुक्कद्दर में लिखे है ये अँधेरे , पर तुम क्यों अपनी राते काली करते हो ” निशा ने बिना मेरी तरफ देखे कहा. वो आज भी वैसे ही पीठ किये बैठी थी जैसा हमारी पहली मुलाकात में .

मैं- अंधियारों में तू एक जोगन और मेरा मन रमता जोगी.

निशा- जोग का रोग जो लगा बैठे न तो फिर सब से बेगाने हो जाओगे.

मैं- तू ही जाने क्या अपना क्या पराया

निशा- तू सबका तेरा कोई नहीं

मैं- तू तो है मेरी

निशा- मैं हूँ तेरी

वो हंसने लगी .

“मैं हूँ तेरी , क्या हूँ मैं तेरी मैं कुछ भी तो नहीं राख के एक ढेर के सिवा जिसे तू चिंगारी दे रहा है ” बोली वो

मैं- बस इतना जानता हूँ ये अंधियारे जितने तेरे है उतने मेरे

निशा- मत कह ऐसा . मेरी तो नियति है तू अपने उजालो से दगा मत कर

वो उठ कर मेरे पास आई . अँधेरी रात में उसकी मर्ग्नय्नी आँखे मेरे मन को टटोलने लगी.

निशा- बता क्या है मन में

मैं- बहुत कुछ , कुछ कहना है है कुछ छिपाना है .

निशा- आ बैठ पास मेरे .

निशा ने अपना सर मेरे काँधे पर रखा

मैं- आहिस्ता से, दर्द होता है .

निशा- कैसा दर्द

मैं- घाव लगा है

निशा- देखू जरा

मैं- तेरी मर्जी

निशा ने मेरा कम्बल एक तरफ किया और पट्टियों को तार तार कर दिया . उसकी सर्द सांसो ने घाव के रस्ते होते हुए दिल पर दस्तक दे दी.

निशा- कब हुआ ये

मैं- थोड़े दिन बीते

निशा- दो मिनट रुक

वो उस तरफ गयी जहाँ वो बैठी थी वापसी में एक झोला लेकर आई . उसमे से कुछ निकाला और बोली- दर्द होगा सह पायेगा .

मैं- मर्द को दर्द नहीं होता जाना

निशा- ठीक है फिर

उसने मेरे कंधे में कुछ नुकीली छुरी सा घुसा दिया और मैं लगभग चीख ही पड़ा था की उसने अपना हाथ मेरे मुह पर रखा और बोली- मर्द जी , ये तो शुरुआत है .

मुझे लगा की वो मेरे मांस को काट रही है . दर्द बहुत हो रहा था पर मैं कमजोर नहीं पड़ा . उसने झोले से एक शीशी निकाली और मेरे घाव के छेद में उड़ेलने लगी. मैंने महसूस किया की मेरे तन में आग लग गई हो.

पर ये तो शुरुआत थी . उसने आग जलाई और एक चाक़ू को गर्म करने लगी.

निशा- शोर मत करना . मुझे पसंद नहीं है .

मैं- क्या करने वाली है तू

निशा- जान जायेगा उसने अपनी चुनर उतारी और बोली- मुह में दबा ले .

मेरे वैसा करते ही उसने सुलगते चाकू को मेरे काँधे में धंसा दिया . उफफ्फ्फ्फ़ कसम से मर ही गया था मैं तो . निशा ने जख्म को दाग दिया था.

“बस हो गया ” उसने बेताक्लुफ्फी से कहा और कम्बल वापिस ओढा दिया मुझे .

मैं- जान लेनी थी तो वैसे ही ले लेती .

निशा- क्या करुँगी मैं इतनी सस्ती जान का

मैं- ये तेरी कमी हुई जो तूने सस्ती जान का सौदा किया

निशा- छोड़ इन बातो को मुझे मालूम हुआ कुछ परेशानी है तुझे

मैं- परेशानी तो जिन्दगी भर रहनी ही हैं .तुझे तो मालूम है की मेरी भाभी ने मेरा जीना मुश्किल किया हुआ है . उसे लगता है की गाँव में जो भी ये हो रहा है मैं कातिल हूँ

निशा- सच कहती है तेरी भाभी कातिल तो तू है

मैं- मैं कातिल हूँ ये तू समझती है वो नहीं

निशा- तो समझा उसे

मैं- मैंने उसे बताया सब कुछ बताया अब उसकी जिद है की वो तुझसे मिलेगी .

निशा-डाकन से मिल कर क्या करेगी वो

मैं- मैंने भी यही कहा उसे पर वो जिद किये हुई है

निशा- ठीक है फिर तेरी भाभी की जिद पूरी कर देती हूँ उस से कहना की तेरे कुवे पर मिलूंगी मैं उस से पर वो अकेली आयेगी.

मैं- तुझे कोई जरुरत नहीं है उसके सामने आने की

निशा- तू साथी है मेरा इन अधियारो में जब कोई नहीं था तू ही तो था . मेरी वजह से तुझे परेशानी हो . तू तकलीफ में होगा तो मैं चैन कैसे पाऊँगी . और फिर एक मुलाकात की ही तो बात है

मैं- तू समझ नहीं रही है

निशा- समझा फिर

मैं- भाभी तुझसे गाँव के मंदिर में मिलना चाहती है

मेरी बात सुन कर निशा थोड़ी देर के लिए खामोश हो गयी मैं उसके चेहरे की तरफ देखता रहा .

निशा- बस इतनी सी बात , चलो ये भी सही . भाभी से कहना की मैं उसकी हसरत जरुर पूरी करुँगी पर मेरी भी एक शर्त है की मैं उस से निखट दुपहरी में मिलने आउंगी और जब ये मुलाकात होगी तो मंदिर में उसके और मेरे सिवा कोई तीसरा नहीं होगा. यदि उस समय किसी और की आमद हुई तो फिर ठीक नहीं रहेगा

मैं- तुझे ऐसा कुछ भी करने की जरूरत नहीं है, मेरी वजह से तू मंदिर में कदम नहीं रखेगी .

निशा- ये तो शुरआत है दोस्त . रास्ता बड़ा लम्बा है ......

निशा ने मेरे कंधे पर सर रखा थोडा कम्बल खुद ओढा और आँखों को बंद कर लिया .........
 
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