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लाड़ला देवर ( देवर भाभी का रोमांस) complete

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वो चार लोग थे… दो ने मुझे दोनो बाजुओं से जकड़ा हुआ था, एक अभी भी जीप में ही बैठा रहा, और चौथा आदमी चाकू हाथ में लिए मेरी ओर बढ़ने लगा….!

मेने लगभग चीखते हुए कहा – कॉन हो तुम लोग, और क्यों मारना चाहते हो मुझे..?

वो चाकू वाला गुर्राया… तेरी वजह से हमारे मालिक को बड़ा धक्का लगा है.. इसलिए अब तुझे तो मरना ही होगा…

मे – कॉन हैं तुम्हारा मलिक..?

वो – ये जानना तेरे लिए ज़रूरी नही है.. और वैसे भी मरने के बाद तू करेगा भी क्या जान कर…!

मे समझ गया कि ये ऐसे बताने वाला नही है…, अब मेने इनसे निपटने का मन ही मन फ़ैसला कर लिया था, …

वो मेरे पास आकर मुझसे दो फुट दूर रुक गया और अपने चाकू को संभाल कर वो अपना हाथ पीछे को ले गया…

इससे पहले की वो अपना चाकू वाला हाथ, मुझे मारने के लिए आगे लता… मेने अपनी बॉडी को उन दोनो गुण्डों की पकड़ के सहारे बॅलेन्स किया और उच्छल कर भड़ाक से अपने पैर की किक उसकी नाक पर जड़ दी…

किक इतनी सटीक और जोरदार थी… की वो अपनी जगह से 10 फुट दूर पीछे जाकर गिरा.. उसकी नाक बुरी तरह से फट गयी,… और उसका पूरा चेहरा उसीके खून से लाल होने लगा.

उसके गिरते ही वो दोनो कुछ हड़बड़ा गये… और उनकी पकड़ कुछ समय के लिए ढीली पड़ गयी, उसी का फ़ायदा उठाकर मेने अपने बाजुओं को ज़ोर से झटका दिया.. और अपने को उन दोनो की पकड़ से आज़ाद कर लिया…

वो मुझे दोबारा पकड़ने के लिए झप्टे… तो मेने दो कदम पीछे हट कर एक की कनपटी पर घूँसा जड़ दिया और दूसरे को एक लात जमा दी..

एक साथ हुए हमले से वो दोनो लड़खड़ा गये… इससे पहले की वो सम्भल पाते मेने उन दोनो की गर्दन अपने बाजुओं में कस ली…

आज मेरी भाभी के डिसिप्लिन द्वारा कराई गयी कशारत मेरे काम आरहि थी..

मेरे बाजुओं की पकड़ उनकी गर्दन पर इतनी मजबूत थी कि उनके गले की नसें फूलने लगी, उन्हें अपनी साँस अटकती सी महसूस हो रही थी.., दोनो के चेहरे लाल पड़ चुके थे…

मेने दाँत पीसते हुए कहा… बोलो.. क्यों मारना चाहते थे मुझे…

इससे पहले कि वो कोई जबाब दे पाते.. जीप में बैठा चौथा आदमी रिवॉल्वार लहराता हुआ मेरी तरफ आने लगा….…!

वो चौथा आदमी मेरी तरफ आते हुए गुर्राया – मे नही चाहता था, कि मुझे तेरे खून से हाथ रंगने पड़ें.. ये लोग ही तुझे संभाल लेंगे.. लेकिन तू तो कुछ ज़्यादा ही शातिर निकला…

वो चाकू वाला जिसकी नाक फट गयी थी… कराहते हुए बोला… अब बातों में समय बर्बाद मत करो जग्गा भाई.. उड़ा दो साले को, वरना कोई आ निकलेगा इधर, और सब गड़बड़ हो जाएगी....

उसने उसकी बात मानते हुए मुझे निशाना बना कर गोली चला दी… उसी क्षण मेने उनमें से एक को उसके निशाने के आगे कर दिया और गोली ने उसका भेजा उड़ा दिया…

वो रिवॉल्वार वाला हक्का-बक्का सा खड़ा अपने मारे हुए साथी को देख ही रहा था कि मेने दूसरे को उसके उपेर धकेल दिया… और वो दोनो एक दूसरे से उलझ गये…

इसी चक्कर में उसकी रिवॉल्वार का लीवर फिरसे दब गया और गोली उस दूसरे आदमी के पेट में घुस गयी… और वो भी ज़मीन पर पड़ा तड़फड़ाने लगा..

अपने दो दो साथियों का हश्र देख कर वो बुरी तरह भिन्ना गया, अपनी ही गोली से घायल साथी जो लगभग अंतिम साँसें गिन रहा था को एक तरफ धकेला, और गुस्से से भन्नाते हुए एक बार फिर मेरी तरफ पलटा…

लेकिन तब तक मे उसके सर पर पहुँच चुका था.. और उसकी रिवॉल्वार वाली कलाई थाम ली… उसकी कलाई पर मेरे हाथ की मजबूत पकड़ के आगे उसकी एक ना चली… और उसकी कलाई को मोड़ कर रिवॉल्वार की नाल उसकी कनपटी की तरफ कर दी…

मे गुर्राया – अब चला गोली हरामी…, फिरसे मे उसके कान के पास इतनी ज़ोर से चिल्लाया… चलाआ…नाअ…, डर के मारे उसकी उंगली ट्रिग्गर पर दब गयी… और रिवॉल्वार की गोली ने उसके सर के परखच्चे उड़ा दिए….

अब रिवॉल्वार मेरे हाथ में था… वो फटी नाक वाला अपने खून से सने सुर्ख चेहरे को लिए, सूखे पत्ते की तरह काँपते हुए मुझे ऐसे देख रहा था मानो उसके सामने कोई इंसान नही, भूत खड़ा हो…

वो बुरी तरह मिमियाते हुए बोला – म.म.म्मूँहेछोड़ दो…

मेने गुर्राते हुए सवाल किया – तो फिर बता किसने भेजा है तुम लोगों को…?

व.वउूओ… भानु प्रताप ने…,

मेने फिर सवाल किया… इस समय कहाँ मिलेगा वो..?

वो – ये मुझे नही पता… प्लीज़ मुझे छोड़ दो, मे तुम्हारे पाँव पड़ता हूँ.. ये कहते हुए वो सचमुच मेरे पैरों में लेट गया….

मेने उसे जीवित छोड़ना ही उचित समझा… जिससे वो उस हरामी के पिल्ले को जाकर सब कुछ बता सके…

रिवॉल्वार अपनी बेल्ट में खोंसा, बयके उठाई और किक मार कर बुलेट घर की ओर दौड़ा दी…!

घर पहुँचते – 2 मुझे अंधेरा हो चुका था,.. मेरे ज़मीन पर घिसटने से कपड़े जगह -2 से फट गये थे, और बदन पर भी कयि जगह खरौन्च आ गयी थी…

मेने उन गुण्डों की रिवॉल्वार को बुलेट की डिकी में डाला, और घर के अंदर चला गया….!

 
मे जैसे ही घर में कदम रखा… मेरी हालत देख कर भैया और भाभी लपक कर मेरे पास आए और तरह – तरह के सवालों की झड़ी लगा दी…

मेने उन्हें कहा… घबराने की कोई ज़रूरत नही है… अंधेरे में बाइक एक सड़क पर पड़े पत्थर से स्लिप हो गयी थी.. और में गिर गया था…!

भैया ने डाँटते हुए कहा – लेकिन तू गया ही क्यों था शहर, आज ही शादी हुई है, और चला गया बिना किसी को बताए…!

अब इतना बड़ा हो गया है, कि किसी से कुछ पुछ्ने की भी ज़रूरत नही समझता,…

राजेश के केस के बाद हमारे दुश्मन भी पैदा हो गये हैं, कहीं भी कोई भी कुछ भी करवा सकता है…!

कोई ज़रूरी काम था, तो सोनू को साथ ले जा सकता था…

मेने भाभी की तरफ देखा, जो एकदम भावशून्य खड़ी हमें देख सुन रही थी..

मेने अपनी नज़र नीची कर के कहा – सॉरी भैया, ग़लती हो गयी, एक ज़रूरी काम था, उसे निपटाने गया था…वैसे भाभी को पता है..

भाभी का नाम आते ही भैया का गुस्सा छ्छूमंतर हो गया, और प्यार से दुलार्ते हुए बोले… तुझे कुछ हो जाता तो..?

मेने भैया से कहा – मुझे कुछ नही होगा भैया, आप चिंता ना करो, थोड़ी बहुत खरौन्च है… जल्दी ही ठीक हो जाएगी..

भाभी ने हुकुम दनदनाते हुए कहा – अब यहाँ खड़े मत रहो, जल्दी से फ्रेश होकर कपड़े चेंज करो, और अपने कमरे में जाकर निशा से दवा लगवा लो....

मे बाथरूम में जाकर फ्रेश हुआ… कपड़े उतार कर वहीं बाथ रूम में फेंके…और एक तौलिया लपेट कर अपने कमरे में पहुँचा…

जहाँ निशा नयी दुल्हन के लिबास में बैठी मेरा इंतेज़ार कर रही थी…

मुझे तौलिए में देखकर और मेरे बदन पर खरौन्च के निशान देख कर वो तड़प उठी…, दौड़ कर मेरे पास आई… और जैसे बाहर सवालों की झड़ी लगी थी…वही उसने भी रिपीट कर्दिये.

मेने उसे भी वही जबाब दिया जो भैया भाभी को दिया था, तो वो तड़प कर बोली –

मे आपके लिए कितनी बड़ी अशुभ हूँ…, मेरे आपकी जिंदगी में कदम रखते ही मुसीवतो की शुरुआत हो गयी…!

मेने प्यार से उसके गाल पर एक थपकी दी और कहा – ये क्या फालतू बकवास कर रही हो तुम..?

अब कहा सो कहा, आइन्दा ऐसी बात भी की तो समझ लेना, कभी बात नही करूँगा तुमसे..

ना जाने क्या-क्या अनप शनाप बोलती रहती हो… रास्ते में वो पत्थर तुमने रखा था क्या…? जो होना था सो होगया…, ऐसी बातों के लिए अपने आप को दोष कभी मत देना…

वो सुबक्ते हुए मेरे सीने से लिपट गयी… मेने उसके कंधे पकड़ कर अपने से अलग किया और बोला –

अब चलो, भाभी ने कहा है कि थोडा अपने पति की सेवा करनी चाहिए.., तो बाहर से दवा लाकर मेरे खरोंचों पर लगाओ…

मेरी बात सुनकर वो गर्दन झुकाए बाहर चली गयी.. भाभी से दवा लेने…

मुझे बहुत ज़्यादा चोट नही थी, बस हल्की सी खरॉच ही थी… निशा जब अपने नरम- 2 हाथों से मेरे बदन पर दवा लगा रही थी तो मुझे उसके बदन से उठती खुसबु मदहोश करने लगी..

और मेने उसे अपनी बाहों में जकड कर उसके होंठों को चूम लिया,…वो कसमसा कर मुझे अपने से दूर करने की कोशिश करने लगी…

मेने उसे अपने बंधन से आज़ाद किया तो वो बनावटी गुस्सा दिखाते हुए बोली – अभी शरीर पर चोटें लगी हैं… और जनाब को आशिक़ी सूझ रही है.. पहले इन्हें ठीक कर लो उसके बाद…

मेने उसके छोटे-छोटे गोल-मटोल कुल्हों को मसल्ते हुए कहा – आज तो मे सुहागरात मना कर ही रहूँगा मेरी जान…

क्या पता.. तुमने अपना इरादा बदल लिया तो.. मे तो रह जाउन्गा ना… ठन-ठन गोपाल…

ये कहकर मेने फिरसे उसे अपनी बाहों में जकड लिया…, वो बोली – पहले खाना पीना तो खा लीजिए.. आपके इंतेज़ार में वाकी सब भी भूखे हैं…

मे – ओह्ह्ह…सॉरी, ये कहकर हम बाहर डाइनिंग टेबल की तरफ चल दिए…

हम सबने मिल कर खाना खाया…, बाबूजी को भी जब पता लगा मेरे आक्सिडेंट के बारे में तो वो भी परेशान हो उठे… लेकिन जब मेने बताया कि बस मामूली सी खरौन्चे हैं.. तब जाकर वो कुछ अस्वस्त हुए….

 
खाना ख़ाके, थोड़ी देर हम सब आपस में बातें करते रहे,

भाभी, निशा को सुहाग रात की कुछ टिप्स देने उसके पास चली गयी…

कुछ देर मे बाबूजी और भैया के साथ बैठकर राजेश के केस से संम्बंधित बातें करते रहे,

वो दोनो अभी भी इस विषय पर चिंतित दिख रहे थे, लेकिन मेने उन्हें बिल्कुल असवास्त रहने के लिए कहा…

कुछ देर बाद बाबूजी और भैया उठ कर सोने चले गये तो मे भी अपने कमरे की तरफ बढ़ गया, जहाँ दोनो बहनें मेरा इंतेज़ार कर रही थीं.

मेरा कमरा गॅलर्री में लास्ट था, अभी में गॅलर्री में ही था, कि मेरे कमरे से निकल कर भाभी आती हुई दिखाई दी,

मे वहीं ठिठक गया, जब वो मेरे पास आ गयी मेरा हाथ पकड़ कर दीवार की तरफ कर के वो मुझे समझने लगी…

देवेर जी… आज तुम पहली बार निशा के पास एक पति के रूप मे जा रहे हो…

और वो एक पत्नी की तरह तुम्हारे सामने होगी, तो आज तुम दोनो के बीच की सारी दीवारें ढह जानी चाहिए…, जिससे एक दूसरे के बीच की हिचक दूर हो जाए….

एक और बात, निशा अपने दिलो-दिमाग़ से परिपक्व लड़की है… लेकिन शारीरिक तौर पर नही…जो आज तुम्हे यूज़ करना है…

मेने भाभी को पकड़ कर दीवार से सटा दिया, उनकी कमर में हाथ डालकर अपनी तरफ खींचा और आँखों में झाँकते हुए बोला….

हमारी सुहाग रात की साक्षी नही बनाना चाहोगी भाभी, उसे शारीरिक तौर पर परिपक्व बांबने में अपने लाड़ले की मदद नही करोगी..?

अपनी छोटी बेहन को गाइड भी करती जाना…!

भाभी ने मुस्कराते हुए प्यार से मेरे गाल पर चपत लगाई, और बोली – ये रात किसी और के साथ शेयर नही की जाती देवर्जी…!

और वैसे भी अब तुम अनाड़ी नही रहे, कइयों की सील चटखा चुके हो, तो अपनी पत्नी की नही कर पाओगे क्या..?

मेने झटके से भाभी को अपने शरीर से सटा लिया, अब उनकी गदाराई हुई चुचियाँ मेरे सीने से दब रही थी,

फिर भाभी के मस्त गदराए हुए कुल्हों को मसलकर और ज़ोर से अपनी तरफ दबाया, मेरा पप्पू उनकी मुनिया के दरवाजे को खट-खटा रहा था,

भाभी की आँखों में भी वासना के डोरे तैरने लगे, लेकिन अपनी भावनाओं पर कंट्रोल करते हुए, मेरे सीने पर हाथ का दबाब देकर मुझे अपने से अलग किया……

फिर मुस्करा कर उन्होने मेरे होंठ चूम लिए और, मेरे पप्पू को दबाते हुए बोली – अब इसके आगे और कोई शैतानी नही…

आज इस पर सिर्फ़ इसकी असली मालकिन का हक़ है, अब अंदर जाओ एक पति के अधिकार के साथ, और निशा को वो तोहफा दो…जिसके लिए हर लड़की अपने जीवन में सपने संजोती है…!

ये कह कर भाभी ने मुझे धकेल कर रूम के अंदर कर दिया और बाहर से गेट बंद कर के खुद भैया के पास चली गयीं…

मेने पलट कर जैसे ही कमरे के अंदर कदम रखा, सामने के नज़ारे को देख कर मेरा मन मयूर होकर नाच उठा…….!

सामने फक्क सफेद चादर से ढका बेड जिसपर लाल गुलाब के फूलों की पंखुड़ियों बिछि हुई थीं…!

कमरे के अंदर बिखरी हुई सुगंध, किसी को भी मदहोश कर्दे, लगता है भाभी ने ये सब करने में काफ़ी मेहनत की होगी…!

बेड के सिरहाने एक लाल सुर्ख जोड़े में, सर पर लंबा सा घूँघट लिए, सिकुड़ी सीमिटि सी निशा… अपने प्रियतम के इंतेज़ार में बैठी थी…

अभी - 2 कमरे से बाहर निकलने से पहले उसकी दीदी उसे आने वाले पलों के बारे में बहुत कुछ ज्ञान देकर गयी होंगी सुहाग रात के बारे में…

मे धीरे-2 चलते हुए बेड तक गया… और उसके साइड में जाकर खड़ा हो गया…

निशा मुझे अपने नज़दीक खड़ा पाकर और ज़्यादा अपने आप में सिमट गयी…, मे धीरे से उसके पास बैठ गया, और उसके कंधे पर हाथ रखा- उसके शरीर में एक कंपकपि सी दौड़ गयी…, जो मेने साफ महसूस की.

मेने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा - जान ! ये चाँद सा मुखड़ा घूँघट में क्यों छुपा रखा है…?

हम दोनो के बीच अब इस घूँघट का क्या काम…? हटाओ इसे….

उसने ना में अपनी गर्दन हिला दी…, मेने मुस्कराते हुए.. उसके घूँघट को अपने हाथों में लेकर उलट दिया…

वाउ ! हल्के से मेक-अप और गहनों से लदी, अपनी नज़रें पलंग पर गढ़ाए… वो शर्मो-हया की मूरत बनी बैठी थी…

नाक में नथुनि, माथे पर टीका, गले में मन्गल्सुत्र के साथ एक बड़ा सा हार,… कानों में बड़े-2 झुमके… हाथों में हतफुल.

मेहदी लगे हाथों की सभी उंगलियाँ अंगूठियों से भरी हुई, कुहनी तक लाल और हरी-हरी चूड़ीयाँ, जिनके आगे और पीछे एक –एक सोने के कंगन…!

वो इस समय साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप लग रही थी, मेरे मन ने कहा की क्यों ना इस छबि को हमेशा के लिए एक यादगार बना लिया जाए,

सो अपना स्मार्ट फोन निकाल कर उसका फोटो लेना चाहा, लेकिन वो तो अपनी नज़रें नीचे किए हुए थी…!

मेने अपने हाथ का सहारा उसकी तोड़ी पर लगाकर उसके चेहरे को ऊपर किया… फिर भी उसकी पलकें झुकी ही रही…

मेरी तरफ देखो निशु..! उसने फिरसे अपनी गर्दन ना में हिला दी…

मे – क्यों ? मुझसे नाराज़ हो..?

वो – लाज आती है…!

मे – मुझसे अब कैसी लाज ! अब हम पति-पत्नी हैं.. जान ! अब हम दोनो के बीच शर्मो-हया का ये परदा क्यों..? ज़रा मेरी तरफ देखो तो सही, मे तुम्हारी इस छबि को कमरे में क़ैद करना चाहता हूँ..

एक क्षण को उसने मेरी तरफ देखा, और उसी पल मेने उसकी उस छबि को अपने फोन में क़ैद कर लिया…

उसके लव थरथरा रहे थे… मेने उसके माथे के टीके को एक ओर कर के उसे चूम लिया… उसकी पलकें फिरसे बंद हो गयी…

उसके हाथों को अपने हाथों में लेकर मेने कहा – मेरी तरफ देखो मेरी जान…

उसने जैसे-तैसे कर के अपनी पलकों को उठाया, मानो उनके ऊपर ना जाने कितना भर पड़ रहा हो,…

मे उसकी झील सी गहरी शरवती आँखों का तो हमेशा से ही दीवाना था… उनमें झाँकते हुए बोला – तुम सच में बहुत सुन्दर हो प्रिय…

उसकी पलकें शर्म से फिर एक बार झुक गयी… आज तो वो कुछ ज़्यादा ही लजा रही थी…

 


मेने उसके सर से सारी का पल्लू उतार कर एक तरफ रख दिया और उसके गोरे-गोरे हल्की लाली लिए हुए गालों को चूम लिया…

उसकी नथुनि मेरे और उसके होंठों के बीच दीवार बन रही थी… सो उसको निकाल कर मेने उसके होंठों की तरफ अपने होंठ बढ़ा दिए…

मेरी साँसों की गर्मी महसूस कर के उसके होंठ लरज उठे… मेने जैसे ही उसके रसीले लाल – 2 लिपीसटिक लगे होंठों को किस किया….

निशा ने अपने मेहदी लगे दोनो हाथों से अपने चेहरे को ढांप लिया…

वो अपने घुटने मोड बैठी हुई थी, तो मेने उसके घुटनों को सीधा कर के उसके गोरे – गोरे सपाट पेट को सहलाते हुए अपना हाथ उसके वक्षों तक लाया…

वो अभी भी अपने चेहरे को ढके हुए थी… मेने उसके दोनो संतरों के ऊपर हल्के से हाथ फिराया, फिर अपने दोनो हाथों से उसके हाथों को चेहरे से अलग किया..

उसने अपनी आँखों पर पलकों के पर्दे डाल कर फिरसे बंद करली….

मेने उसकी सारी की गाँठ खोल दी, और एक-एक कर के उसके शरीर से सारे गहने नोच डाले, अब वो ब्लाउज और पेटिकोट में थी,

मेने उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठों को चूमने लगा….

निशा अपनी सुध-बुध खोती जा रही थी… वो तो बस जैसे अपने प्रियतम के इशारों पर चलने वाली एक कठपुतली बन चुकी थी…

मेने उसके होंठ चूस्ते हुए अपने दोनो हाथ उसके संतरों के ऊपर रख दिए… और उन्हें ब्लाउज के ऊपर से ही मसल्ने लगा…

उसकी आँखों में लाल डोरे तैरने लगे…और अपनी मरमरी बाहें मेरे गले में डाल दी.

थोड़ा सा मसलने के बाद मेरी उंगलियों ने उसके ब्लाउज के बटन खोल दिए…

एकदुसरे के होंठ अभी भी एक दूसरे का रस चूसने में ही व्यस्त थे…

वो एक पिंक कलर की ब्रा में आ चुकी थी, जिसमें क़ैद उसकी 32” की गोलाइयाँ किसी टेनिस की बॉल के आकार की गोरी – 2 निहायत ही सुंदर लग रही थी..

मेने अपनी टीशर्ट निकाल फेंकी और उसे कमर से पकड़ कर अपनी गोद में बिठा लिया…

वो मेरे सीने से चिपक गयी… जिससे उसके छोटे-2 सुडौल वक्ष मेरे सीने में दब गये…

मेने निशा की ब्रा निकाल कर उसे बिस्तर पर लिटा दिया… और उसके बदन को सहलाते हुए उसकी गर्दन से चूमना स्टार्ट किया… और धीरे – 2 कर के उसके स्तनों तक आ पहुँचा…

वो किसी जल बिन मछलि की तरह बिस्तर पर पड़ी तड़पने लगी… गुलाब की पंखुड़ियों समेत उसने बेड शीट अपनी मुत्ठियों में कस ली थी..

मेने उसके निप्पलो को एक बार जीभ लगा कर चाटा,…. निशा के मुँह से एक मादक सिसकी फुट पड़ी…., और अपने पैरों की एडियों को आपस में रगड़ने लगी…

इष्ह……उफफफफ्फ़…. अब उसने मेरा सर अपने दोनो हाथों में ले लिया था…

जब मेने उसकी एक चुचि को अपने मुँह में भरकर चूसा.. और दूसरी को अपनी बड़ी सी हथेली से सहलाया…

तो वो अपनी एडियों को पलंग पर रगड़ते हुए सिसकने लगी….

आआहह………..मत..करूऊऊऊऊऊओ…..प्लेआस्ीईईईई………मुझीई….कुकचह….होताआ….हाईईइ…..

मेने उसकी तरफ मुँह उठा कर पूछा – क्या होता है मेरी जान…?

वो मेरी बात सुनकर बुरी तरह शरमा गयी, और बिना कोई जबाब दिए ही उसने अपना मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया और आँखें बंद कर के सिसकने लगी….

उसकी चुचियों को चूस्ते हुए… मे अपने दोनो हाथों से उसके बगलों को सहलाते हुए… नीचे को लाया… और उसके पेट और नाभि को चूमते हुए उसके पेटिकोट का नाडा खोल दिया…

अब वो मात्र एक छोटी सी पेंटी में थी… जो अब बहुत गीली हो गयी थी…

मेने एक बार फिर उसके होंठों और गर्दन को चूमा, और अपना एक हाथ नीचे ले जाकर उसकी गीली पेंटी पर रख दिया…

अपनी मुनिया पर मेरा हाथ महसूस करते ही निशा ने अपनी दोनो जांघें जोड़ दी…, मेने अपना हाथ उसकी पेंटी से हटाकर उसकी जांघों पर ले आया और उन्हें सहलाने लगा…

अपना लोवर निकाल कर मेने एक तरफ फेंका, अब में भी मात्र अपनी फ्रेंची में ही था…

उसकी टाँगों के बीच आकर मे अपने घुटने मोड़ कर बैठ गया…और मेने उसकी बगलों को अपने हाथों में भर कर उसे किसी गुड़िया की तरह उठाकर अपनी जांघों पर बिठा लिया…

वो अब अपने पैर मेरे दोनो ओर निकाल कर मेरी गोद में बैठी थी…उसकी छोटी सी कुँवारी मुनिया, कामरस से भीगी पेंटी में धकि, मेरे मुन्ने के ठीक ऊपर थी…

उसके कुल्हों को अपनी मुत्ठियों मे भरते हुए मे उसके होंठ चूसने लगा…

निशा अब बहुत गरम होने लगी थी… उसका बदन अब उसकी नही सुन रहा था.. और वो ऊपर से नीचे थिरकने लगा…

मेरे हाथ कभी उसकी पीठ सहलाते तो कभी उसके गोल-मटोल कुल्हों को मसल देते…

उसकी मुनिया, मेरे मुन्ने से मिलने के लिए तड़पने लगी… और वो दोनो कपड़े की एक पतली सी दीवार के पीछे से ही एकदुसरे से प्रेमलाप में लिप्त हो गये…

मेरे कड़क लंड की रगड़ से उसकी मुनिया… जल्दी ही खुश हो गयी… और उसका बदन अकड़ कर मेरे शरीर से चिपक गया…

मेने उसकी चुचियों को हल्के से मसल दिया, वो सिसक पड़ी ….और ऊओह….जानुउऊउउ…उूउउ....बोलते हुए पेंटी में ही झड़ने लगी,..

और मेरे कंधे पर सर टिका कर धीरे-धीरे हाँफने लगी…

मेने उसकी पीठ सहलाते हुए उसे आवाज़ दी… निशु…!

वो उसी खुमारी में बोली – हूंम्म्म…

मे – आर यू ओके…..

वो – हूंम्म…..

अब मेने उसे पलंग पर सीधा लिटा दिया, और उसकी कामरस से तर पेंटी को निकालकर एक तरफ को उछाल दिया …

अहह…. उसनकी छोटी सी मुनिया… एकदम चिकनी चमेली… जो रस से सराबोर होकर लेड की रोशनी में और ज़्यादा चमक उठी थी…,

मे अपने सामने खुली, दोनो पतले-पतले होंठों को बंद किए हुए उसकी मुनिया को कुछ पल देखता रहा…

उसके निचले सिरे पर कामरस की एक बूँद मोती जैसी चमक रही थी… जो मानो कह रही हो.. कि आओ मेरे प्रियवर…. ये तुम्हारे लिए तोहफा है… आकर अपना तोहफा कबूल करो.

मेने भी उसका स्वागत ठुकराया नही, और इससे पहले की वो उसकी मुनिया के बंद होंठों से जुदा होकर बेड की चादर में विलीन होता, मेने झुक कर हौले से उसे अपनी जीभ से चाट लिया….!

मेरी जीभ को अपनी रसीली मुनिया पर महसूस होते ही निशा एकदम से उछल पड़ी..

हाईए….ये.. क्ककयाआअ……किय्ाआ… आपनीई….उफफफफफ्फ़…सस्सिईईईईईईईईईईई……आअहह….

मेने उस मोती जैसी कमरस की बूँद को चाटने के बाद पूरी जीभ से एक बार उसकी मुनिया के बंद होंठों को नीचे से ऊपर तक चाट लिया……..

निशा ने बेड की चादर को ज़ोर से अपनी मुट्ठी में कस लिया… और अपने होंठों को चबाने लगी…

वो शर्म की वजह से अपने अंदर की उत्तेजना को भी खुलकर व्यक्त नही कर पा रही थी…

उसका बदन बेड पर किसी जल बिन मछलि की तरह तड़प रहा था….

 
मेने अब उसे और ज़्यादा तड़पाना उचित नही समझा… और अपना फ्रेंची उतार कर एक ओर उछाल दिया…

मेरा 8 इंची बब्बर शेर, पूरी तरह अपने शिकार को दबोचने के लिए तैयार था…

मेने अपने लॉड को थोड़ा मुट्ठी में लेकर मसला और उस पर थूक लगा कर

निशा की मुनिया के होंठों के ऊपर रख कर दो-तीन बार ऊपर नीचे फिराया … ताकि वो एक दूसरे को अच्छे से पहचान सकें…

उसके काम रस से मेरा मूसल भी चिकना हो गया…

फिर मेने अपने हाथों के अंगूठों की मदद से उसनकी मुनिया के बंद होंठों को खोला, उसका गुलाबी छेद बहुत ही छोटा सा था…शायद अभी तक उंगली भी नही गयी होगी उसमें…

ब-मुश्किल थोड़ी सी जगह बना कर मेने अपने लंड के मोटे से सुपाडे को उसके द्वार पर टीकाया….

उसके अहसास से ही निशा की साँसें तेज होने लगी,… और वो मुट्ठी भींचे आँख बंद कर के आने वाले तूफान के इंतेज़ार में लंबी-लंबी साँसें भरने लगी…

मेने अपने लंड को थोड़ा सा पुश किया जिससे उसका सुपाडा अच्छे से उसकी मुनिया के होंठों के बीच सेट हो गया…

मेरे सुपाडे के दबाब को अपनी मुनिया के ऊपर महसूस कर के वो सिहर गयी…उसके शरीर के सारे रोंगटे खड़े हो गये….

मेने झुक कर पहले उसके होंठों को चूमा और फिर उसकी चुचियों को प्यार से सहलाकर कहा – जान ! थोड़ा मॅनेज करना पड़ेगा…

वो बस हूंम्म्म… कर के अपनी सहमति दे पाई…

उसके बाजुओं पर हाथों का दबाब रखते हुए मेने एक धक्का अपनी कमर को दिया… , मेरा सुपाडा… उसकी मुनिया की पतली-पतली गुलाबी पंखुड़ियों को फैलाता हुआ… लगभग फिट गया…

वो केरेन लगी…, उसने अपने होंठों को कसकर, चीख को अपने मुँह में जप्त कर लिया…, लेकिन दर्द की रेखायें उसके चेहरे पर नज़र आने लगी…

उसके होंठों को चूमकर मेने उसके गालों को सहलाया और एक तगड़ा सा धक्का अपनी कमर में लगा दिया…

निशा की कोरी करारी मुनिया, किसी ककड़ी की तरह चीरती चली गयी….

लाख कोशिश के बाद भी उसके मुँह से एक मरमान्तडक चीख उबल पड़ी…

माआआआआआआआ…………..मररर्र्र्र्र्र्ररर……….गाइिईईईईईईईईईईई…..रीईईईईईईईई….

मे वहीं ठहर गया, और उसके बालों को सहलाते हुए उसे पुच्कार्ते हुए बोला –

बस मेरी जान… तकलीफ़ की दीवार टूट चुकी है… बस थोड़ा सा और सहन करना होगा…

मेरा लंड उसकी झिल्ली तो तोड़ चुका था…वो आधे से अधिक उसकी सन्करि प्रेम गली में प्रवेश कर चुका था…

निशा से दर्द सहन नही हुआ, वो मिन्नतें करते हुए मुझे एक बार अपना लंड बाहर निकालने के लिए बोली….

मेने भी थोड़ा रुकना बेहतर समझा और धीरे से एक बार अपना मूसल बाहर निकाल लिया…, लंड बाहर आते ही निशा ने राहत की साँस ली…

जब मेरी नज़र उसपर गयी, तो सुपाडा खून से लाल हो चुका था…

खून की एक लकीर उसकी मुनिया से भी निकल रही थी…

मेने निशा को इस बारे में बताना सही नही समझा, और फिर से उसके होंठों को चूस्ते हुए, उसकी चुचियों को सहलाने लगा…

जब उसका कराहना थोड़ा कम हुआ तो मेने पूछा – मेरी जान ! अब आगे बढ़ें…

उसने हूंम्म…कर के पर्मिशन ग्रांट कर दी.. और मेने अपने शेर को फिरसे उसकी चिकनी चमेली के मुँह पर रख कर धक्का दे दिया…

मेरा 2.5” परिधि का सोट जैसा लंड अपनी पहली वाली मंज़िल को पीछे छोड़ते हुए कुछ और आगे तक अंदर चला गया… जो अब बस मंज़िल से थोड़ा ही दूर था…

निशा एक बार फिर तडपी…और अपने सर को इधर से उधर पटकने लगी…, उसकी आँखों की कोरों में आँसू की बूँदें झलकने लगी…

मेने उसके गाल सहलाते हुए पूछा – क्या हुआ जान ! सहन नही हो रहा…?

वो कराहते हुए बोली – हूंम्म….ये बहुत ज़्यादा मोटा है….आअहह… मेरी जान निकली जा रही है…आअहह….थोड़ा रूको…प्लेअसस्ससी…

मेने रुक कर उसे फिरसे चूमना शुरू कर दिया और उसके कड़क हो रहे निप्प्लो से खेलने लगा…साथ साथ में हल्के-हल्के अपने लंड को मूवमेंट भी देता रहा…

मेरे कुछ देर के प्रयास के बाद उसका दर्द कम हुआ… अब वो अपने मज़े की तरफ ध्यान देने लगी थी…

जिससे उसके रस गागर से थोड़ा – 2 रस रिसने लगा… और मेरे शेर को अंदर बाहर होने में आसानी होने लगी..

मेरा लंड अभी भी 2” दूर था अपनी मंज़िल से, जो उसके आने वेल सेन्सेशन के कारण आसानी से पा गया.. और वो अब पूरी तरह से अंदर फिट हो चुका था…

हल्की सी कराह के साथ निशा उसे अपनी अंतिम गहराई तक फील करने में कामयाब रही.., अब उसकी रसीली मुनिया और ज़्यादा रस बहाने लगी थी…,

क्योंकि मेरे शेर ने उसके रस के खजाने का मुँह पूरी तरह खोल दिया था…

मेने उसको चूमते हुए अपने धक्कों को गति प्रदान की और आधी लंबाई के शॉट लगाने शुरू कर दिए….

उतने से ही कुछ देर बाद ही उसका बदन एक बार ज़ोर से आकड़ा और उसने जिंदगी का पहला स्खलन लंड के ज़रिए प्राप्त कर लिया…

वो बुरी तरह से मेरे सीने से चिपक कर हाँफने लगी…

उसे सीने से चिपकाए मे थोड़ा ठहर गया…, कुछ देर बाद उसके बदन को सहलाते हुए.. मेने उसे फिर से धीरे-धीरे चोदना शुरू कर दिया….

कुछ मिनटों में ही वो एक बार फिरसे उत्तेजना के भंवर में फँस गयी, और अब उसने भी मेरा साथ देना शुरू कर दिया…

अब मेने पूरी लंबाई के शॉट लगाने शुरू कर दिए…, रास्ता खुल चुका था, सो गीली चूत में लंड को सुपाडे तक बाहर लाता… और फिर एक साथ पूरा डाल देता… !

मे अपने घुटनों पर हो गया, और निशा के कुल्हों को अपनी जांघों पर रखा, और अपने धक्कों में तेज़ी लाना शुरू कर दिया…

 


निशा…सिसकारी भरती…हुई……अपनी कमर उचका देती…..इतना मज़ा मुझे आ रहा था…. जिनका शब्दों में बयान करना नामुमकिन है….

सच में इतना आनंद मेने पहले कभी नही पाया था….,

धक्कों के कारण उसकी काँच की चूड़ियों और पैरों की पायल का मिला जुला मधुर संगीत कानों में रस घोल रहा था…

हम दोनो ही अपने अपने प्रयास में जुटे हुए थे, एक दूसरे को ज़्यादा से ज़्यादा आनंद देने की कोशिश में.

इसी प्रयास में दोनो के बदन पसीने से नहा चुके थे….

अंत में वो समय भी आ ही गया जब हम दोनो एक साथ अपने-अपने मुकाम को पा गये और लंबी-लंबी साँसें लेते हुए एक दूसरे में समा गये….

कितनी ही देर यूँ ही एकदुसरे से चिपके हम पड़े रहे…वो मेरे नीचे दबी पड़ी थी, फिर भी ना कोई शिकायत, ना शिकवा…

मुझे जब होश आया तो मे उसके ऊपर से हटा… लंड को उसकी नयी चूड़ी मुनिया सॉरी ! अब चूत कह सकता हूँ से बाहर निकाला…

जिसके साथ-साथ हम दोनो का वीर्य, खून मिश्रित बाहर आने लगा…और बेड शीट पर हमारी सुहाग रात के सबूत छोड़ता रहा…..

कुछ देर बाद मेने निशा को गोद में उठाया और बात रूम की तरफ चल दिया… उसने कहा भी की मे चली जाउन्गि…

मेने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया.. और उसके फूल जैसे नाज़ुक शरीर को बाथ रूम में ले जाकर उसे खड़ा किया…

हम दोनो ने एकदुसरे के बदन साफ किए,

पहली बार निशा की नज़र मेरे लंड पर पड़ी,

वो अपने मुँह पर हाथ रख कर उसे बड़े ताज्जुब से अपनी आँखें चौड़ी कर के देख रही थी, जो उसका हाथ लगते ही, फिरसे फुल फॉर्म में आ चुका था…

मेने मुस्कुरा कर पूछा – ऐसे क्या देख रही हो जानेमन… ये अब तुम्हारी सेवा के लिए ही है…

वो अपने मुँह पर हाथ रखकर बोली – हाईए… राम… इतना बड़ा..? ये कैसे मेरे अंदर गया होगा…? तभी मेरी जान निकली जा रही थी…

मेने उसकी गोलाईयों को सहलाते हुए कहा – तो इसका मतलब ये तुम्हें पसंद नही आया…!

वो झेन्प्ते हुए बोली – ऐसी बात नही है जानू ! बाद में मज़ा भी बहुत दिया इसने… नाउ आइ लाइक इट, और ये कहकर उसने उसे चूम लिया…!

मेने मेरे मूसल की मार झेल चुकी उसकी घायल मुनिया को साफ कर के चूम लिया, उसके बाद फिर उसे गोद में उठाकर बेड पर लाकर लिटा दिया…

अलमारी से एक गिफ्ट पॅकेट निकाला और उसे निशा को देते हुए मेने कहा – लो जान ! ये तुम्हारी आज की खरी कमाई…

वो – ये क्या है जानू ..?

मे – खोल कर देख लो…..

जब उसने वो खोला… तो एक स्मार्ट फोन देख कर वो मेरे गले से लग गयी..

मेने कहा – पसंद आया…?

वो – बहुत ! लेकिन इसकी क्या ज़रूरत थी…!

मेने कहा – ज़रूरत थी…! अब इसके ज़रिए… हम दूर रह कर भी हर समय पास रह सकते हैं.. एक दूसरे से वीडियो कॉल कर के बात कर सकते हैं…

निशा मेरा तोहफा पाकर बहुत खुश हुई… फिर मे उसे उसके फंक्षन वग़ैरह समझाने लगा….

कुछ देर बाद उसने टेबल से उठा कर एक ग्लास दूध का मुझे पकड़ा दिया.. जिसमें भाभी का लाड शामिल था…

हम दोनो ने मिलकर वो दूध ख़तम किया… और फिर से एक दूसरे से लिपट गये…

थोड़ी सी आपस की छेड़-छाड़ और प्रयासों से एक बार फिरसे हम उसी तूफान के भंवर में जा फँसे, जिसमें से बाहर निकलने का शायद ही किसी का मन करता होगा…

और जब बाहर निकले तो एक नये शुकून, एक नये मुकाम के साथ एक दूसरे के करीब और करीब होते हुए…

सारी रात हम दोनो एक दूसरे के प्यार में डूबे रहे, और अपनी पहली रात के सफ़र में आगे बढ़ते रहे..

फिर एक नयी सुबह की आगाज़ के साथ, एक दूसरे की बाहों में लिपटे ना जाने कब नींद ने हमें अपने आगोस में ले लिया……!

दूसरे दिन मेरी नींद बहुत देर से खुली… किसी ने मुझे जगाया भी नही… लेकिन जब नाश्ते का समय हो गया.. तब भाभी ने आकर मुझे जगाया…

मेने सीधे उठ कर पहले भाभी के पैर छुये, फिर उनके गाल पर किस किया, उन्हें निशा और मुझे मिलाने के लिए थॅंक यू कहा.. और फ्रेश होने चला गया…

भाभी अपने गाल को प्यार से सहला कर मुस्कुराती हुई मुझे बाथरूम की तरफ जाते हुए देखती रही…

आधे घंटे में ही में रेडी होकर किचिन में पहुँचा ,… वहाँ निशा स्लॅब के साथ खड़ी नाश्ता तैयार कर रही थी…

मेने उसे पीछे से जाकर अपनी बाहों में भर लिया… वो इस समय एक हल्की सी साड़ी में थी, रात की खुमारी की वजह से उसकी पलकें अभी भी भारी हो रही थीं..

मेने पीछे से उसे बाहों में लेकर उसकी गर्दन पर किस करते हुए मॉर्निंग विश किया…

मेरे किस करते ही, पहले तो वो सिहर उठी, और फिर हँसते हुए वेरी गुड मॉरिंग जानू कहा और कसमसा कर मुझे छोड़ने के लिए रिक्वेस्ट करने लगी…

छोड़िए ना जानू ! कोई आ जाएगा… वो बोली

मेने अपनी कमर को उसकी गोल-गोल थोड़ी सी पीछे को उठी हुई गान्ड पर दबाते हुए कहा – आने दो.. !

कोई चोरी थोड़ी ना कर रहे हैं हम…! अपनी जान को प्यार ही तो कर रहा हूँ.., अब इसमें भला किसी को क्या आपत्ति हो सकती है…

निशा मेरे लंड का अहसास अपनी गान्ड की दरार के ठीक ऊपर महसूस कर के गन्गना उठी और सिसकते हुए बोली – आअहह….फिर भी अच्छा नही लगता..

प्लीज़ जानू छोड़ो ना, कोई देखेगा तो क्या कहेगा.. की देखो कैसे बेशर्म हैं ये दोनो, कल ही शादी हुई है.. और आज ही कैसे एक दूसरे से चिपके हुए है…

हम अभी ये बातें कर ही रहे थे कि, बड़े भैया पीछे से आ गये…

हमें इस तरह खड़े देख कर वो उल्टे पाँव लौट गये… निशा को कुछ आभास हुआ तो उसने कहा…

सीईईई….जानू अभी कोई था गेट पर… प्लीज़ छोड़ो ना… !

मेने उसे छोड़ दिया और उसके गाल और होंठों पर किस किया..…, मेरे ट्राउज़र में आगे तंबू बन गया था, जिसे अड्जस्ट करते हुए बाहर की ओर निकल गया….

आँगन में भैया भाभी से कुछ बात कर रहे थे… जब उनकी बातें मेरे कानो में पड़ी तो पता लगा कि वो हमारे बारे में ही बोल रहे थे..

भैया – मोहिनी ये छोटू कितना बेशर्म हो गया है… वहाँ किचन में ही वो निशा को पकड़ कर प्यार करने लगा… कुछ तो लिहाज करना चाहिए इसे…

भाभी – तो इसमें किसी को क्यों एतराज होना चाहिए… पति-पत्नी हैं वो दोनो.., नयी-नयी शादी हुई है…, प्यार ही तो कर रहे हैं… कोई झगड़ा तो नही कर रहे…

भैया – फिर भी कुछ तो मर्यादा होनी चाहिए…

भाभी – आप भी क्या सुबह-सुबह मर्यादा का पाठ लेकर बैठ गये… अब सब आपके जैसे तो नही हो सकते ना…!

मुझसे रहा नही गया और उनके पास जाकर बीच में बोल पड़ा – भैया..!

कभी – 2 ज़रूरत से ज़्यादा मर्यादायों में जकड कर आदमी अपने जीवन साथी की अपेक्षाओं की भी उपेक्षा करने लगता है…

भूल जाता है कि उसकी मर्यादाओं की उसके साथी को क्या कीमत चुकानी पड़ेगी..

मेरी बात सुन कर भैया, एकदम चुप पड़ गये… शायद अपने अंतर्मन में बीते हुए दिनो का मंथन कर रहे होंगे…

मेने आगे बढ़कर दोनो के पैर छुये और उनका आशीर्वाद लिया…

आशीर्वाद देने के बाद भैया बोले – शायद तू ठीक कह रहा था भाई… ज़रूरत से ज़्यादा मर्यादाओं का पालन, आदमी को बंधनों में जकड लेता है…

जो कभी-कभी शायद उसके आस-पास के लोगों के लिए हितकर नही होता… फिर वो भाभी को संबोधित कर के बोले – मेरा भाई काफ़ी समझदार हो गया है, क्यों मोहिनी..!

भाभी ने हूंम्म… कर के जबाब दिया और आगे बढ़ कर मेरा माथा चूम लिया..

फिर हम सबने मिलकर नाश्ता किया… भैया अपने कॉलेज चले गये और मे बाबूजी का नाश्ता लेकर खेतों की ओर चला गया, उनका भी आशीर्वाद लेने…

घर लौट कर मेने निशा को पकड़ा, और शाम तक, फिर देर रात तक हम दोनो एक दूसरे के प्यार में डूबे रहे…!

निशा की सारी झिझक, शर्म जो उसके नेचर में भरी हुई थी, कुछ घंटों में ही हवा हो चुकी थी, सेक्स को एंजाय करने में वो कोई मौका हाथ से नही जाने दे रही थी…!

दूसरे दिन सुबह का नाश्ता कर के मे भी भैया के जाने के बाद ही घर से निकल लिया, और सीधा शहर जा पहुँचा….

मेने अपनी बुलेट सीधे सहयोग हॉस्पिटल की पार्किंग में ही जाकर रोकी… बाइक स्टॅंड कर के सीधा डॉक्टर. वीना के कॅबिन की तरफ बढ़ गया…

वो अभी – 2 सुबह के राउंड में मरीज़ों को चेक कर के ही आई थी..और कुछ रिपोर्ट को सीरियस्ली रिव्यू करने में व्यस्त थी…

मे आइ कम इन डॉक्टर…मेने गेट पर खड़े होकर अंदर आने के लिए पूछा…

उसका ध्यान रिपोर्ट से हटकर आवाज़ की दिशा में गया…, मुझे देखते ही फ़ौरन उसके चेहरे के एक्सप्रेशन चेंज हो गये…

जो एक पल पहले तक सीरियस्ली किसी केस की स्टडी में लगी थी, अब वो एकदम से चहक उठी… और बोली ….

आओ-आओ..अंकुश ..! अरे भाई आप तो एकदम से गायब ही हो गये,… ना कोई फोन कॉल, ना और कोई खैर खबर…

मे उसके सामने जाकर बैठ गया.. और बोला –

सॉरी डॉक्टर ! मे थोड़ा ज़्यादा ही बिज़ी हो गया था अपने कामों में…. आज ही फ़ुर्सत हुआ हूँ,.. और देखिए आपके सामने हाज़िर हो गया…

वो – एनीवेस ! कहिए.. क्या सेवा की जाए तुम्हारी..? आइ मीन क्या लोगे.. ठंडा… , गरम… या और कुछ.. ये कहकर उसने अपनी एक आँख दबाई…

मे मुस्करा कर बोला – ये बंदा तो आपके हुक्म का गुलाम है.. आप जो देना चाहेंगी.. ले लूँगा…!

वो – अभी तो चाय-कॉफी से ही काम चलाना पड़ेगा.. वाकी के लिए समय नही है.. तो बोलो क्या लोगे.. चाय या कॉफी…

मे – जो आप लेना चाहें…वही मे भी ले लूँगा…

उसने बेल बजाकर ऑफीस बॉय को अंदर बुलाया और उसको दो कॉफी लाने को कहा…फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोली …

और कोई सेवा हो तो बताओ… अरे हां उसका क्या हुआ जो तुमने रिपोर्ट ली थी.. वो तो अभी भी यहीं बहाने बनाए पड़ा हुआ है…!

मे – दर्सल मे उसी सिलसिले में आपसे बात करने आया था..

वो – हां बोलो… मे और क्या कर सकती हूँ तुम्हारे लिए..?

मे – असल में घी सीधी उंगली से नही निकल रहा.. तो उंगली अब टेडी करनी ही पड़ेगी.. और उसमें मुझे आपकी थोड़ी मदद चाहिए..

वो – हुक्म करो मेरे आका ! कह कर वो खिल-खिला पड़ी..!

मे – आप उसे डिसचार्ज क्यों नही कर देते…, वो ज़बरदस्ती तो कर नही सकता यहाँ रहने के लिए…

वीना – नही कर सकते ना, हॉस्पिटल के ही एक बड़े ट्रस्टी का सिफारिश है, उसे यहाँ रखने का, जब तक वो चाहे…

मे – तो फिर अब एक ही रास्ता है,… अब उसे यहाँ से ज़बरदस्ती उठाना पड़ेगा.. और उसके लिए आपको उसे कोई ऐसा ड्रग देना पड़ेगा.. जिससे वो शारीरिक तौर पर तो काम करे लेकिन मानसिक तौर पर अचेत रहे…

वो कुछ देर सोच में पड़ गयी… मेने कहा - अगर आपके लिए कोई मुश्किल हो तो रहने दीजिए.. मे कोई और रास्ता निकाल लूँगा…

वो – नही ऐसी बात नही है.. ऐसा ड्रग तो है मेरे पास पर…, लेकिन कोई रिस्क ना हो.

मे – उसकी आप चिंता मत करो, वापस आपके पास ऐसी कोई कंप्लेंट नही आएगी इसके लिए…

फिर वो मेरी हेल्प करने को तैयार हो गयी…, तब तक कॉफी भी आ गयी..हम दोनो ने कॉफी पी, फिर मेने उसको अपना नंबर शेयर किया..

जब भी वो फ्री हो मुझे कॉल कर्दे.. मे हाज़िर हो जाउन्गा उसकी सेवा में..

डॉक्टर वीना उसके बाद भानु के रूम में गयी, जो एक स्पेशल रूम लेकर मौज ले रहा था.. और उसको चेक-अप के बहाने एक इंजेक्षन दे दिया…

इस समय वो अकेला ही था… मालती अपने फ्लॅट पर थी… कुछ देर बाद उसे इंजेक्षन का असर होने लगा…

 
डॉक्टर वीना ने इशारा किया कि अब वो उस ड्रग के असर में आ चुका है.. और दो-ढाई घंटे से पहले नॉर्मल नही होगा…

इशारा पाते ही मे उसे एक वॉर्डबॉय की मदद से अपनी बाइक तक लाया, उसे पीछे बिठाया और ले उड़ा उसे हॉस्पिटल से कहीं दूर एकांत में,

जहाँ अकेले में उससे सारे राज उगलवाए जा सकें, जो उसने अपने जेहन में छिपा रखे थे अब तक..….!

मे भानु को लेकर जंगल की ओर निकल गया… जहाँ मेने एक बार दूसरे शहर से आते वक़्त जंगल के बीचो बीच एक खंडहर को देखा था…!

वैसे तो खंडहर बिल्कुल टूटा-फूटा पड़ा था, ये शायद किसी जमाने में किसी का चरागाह रहा होगा… ज़यादा बड़ा भी नही था…

इसमें एक कमरा कुछ ठीक-ठाक हालत में था, मेने भानु को उसी कमरे में लाकर बिठा दिया… उसका शरीर तो काम कर रहा था… लेकिन दिमाग़ जैसे सोया पड़ा था…

वहाँ बिठाते ही वो वहीं ज़मीन पर पसर गया… और कुछ देर में ही नींद में चला गया…

मे उस कमरे के टूटे फूटे गेट को बाहर से बंद कर के जंगल में ऐसे ही समय पास करने घूमने निकल गया… कुछ दूरी पर एक छोटी सी नदी बह रही थी…

उसी के किनारे पेड़ों की छाया में आके मे बैठ गया.. और नदी के बहते पानी में छोटे- 2 पत्थर फेंकने लगा…

बैठे – 2 मे अपने पुराने दिनो की याद में खो गया… स्कूल और फिर कॉलेज के दिनो की घटनायें, फिर ग्रॅजुयेशन के बाद घरवालों का प्रेशर डाल कर मुझे लॉ कॉलेज भेजना…

मेरा सपना था… साइन्स में कुछ रिसर्च फील्ड में आगे बढ़ने का.. लेकिन बाबूजी के सुझाव पर सबने मिलकर मुझे लॉ करने के लिए प्रेशर डाला…

और देल्ही के मशहूर कॉलेज में अड्मिशन करा दिया… और ना चाहते हुए मुझे देल्ही जाना पड़ा…

वहीं कॉलेज के हॉस्टिल में रहकर मे पढ़ाई करने लगा… और धीरे – 2 मुझे लॉ के सब्जेक्ट्स में इंटेरेस्ट आने लगा और हमेशा की तरह अपने बॅच का फ्रंट रो स्टूडेंट बन गया….

शुरू-2 में घर की यादें, भाभी, डीडियों और चाची के साथ बिताए वो लम्हे याद कर के दुखी भी हो जाता…

निशा से सारे कॉंटॅक्ट टूट चुके थे… लेकिन अपने घर पर में फोन से बात करता रहता, और भाभी से ही उसके बारे में पता कर लेता था…

इन्ही सब में कब एक साल निकल गया.. पता ही नही चला…

दूसरा साल शुरू हो चुका था.., अब मे भी कॉलेज के माहौल मे अपने आपको ढल चुका था, हॉस्टिल की लाइफ रास आने लगी थी मुझे…!

बारिश का सीज़न शुरू होने जा रहा था…, ऐसे समय में देल्ही की उबाउ गर्मी.. बहुत परेशान करती है…

मे एक दिन सनडे की शाम को पास ही एक थियेटर में मूवी देखने निकल गया…

लौटते में शाम घिर आई थी… थियेटर से बाहर निकला तो देखा.. मौसम एकदम बदला हुआ था…

एकदम से अंधेरा सा छा गया था, घटायें उमड़-गुमड़ रहीं थी आसमान में, हवायें भी तेज चल रही थी, लगभग आँधी का रूप धारण कर चुकी थी…

तेज हवा के साथ, धूल मिट्टी, आँखों को बंद होने पर मजबूर कर रही थी…

इससे पहले की बारिस शुरू हो मे वहाँ से तेज-तेज कदमों से अपने हॉस्टिल की तरफ बढ़ने लगा… मेरा हॉस्टिल वहाँ से कोई 2 या 2.5 किमी की दूरी पर ही था…,

सो कोई साधन ना मिलने की वजह से पैदल ही निकल पड़ा…

अभी में कुछ दूर ही निकला था, .. कि जोरदार आँधी के साथ बूंदा-बंदी शुरू हो गयी… जो एक आम बात थी, देल्ही में इस मौसम में..

मेने अपनी चाल और तेज करदी… लेकिन मौसम से तेज नही चल सका… और तेज बौछारो के साथ बारिश ने मुझे घेर लिया…,

अब भीगने के अलावा और कोई चारा नही बचा था मेरे पास..

तो अपनी सामान्य गति से ही चलता हुआ आ रहा था, पहली बारिश का लुफ्त उठाते हुए…

 


वैसे भी तेज हवाओं के कारण बारिस की बूँदें इतनी तेज शरीर पर पड़ रही थी मानो शरीर में कोई सूइयां चुभा रहा हो..

मुँह पर बारिस की तेज बूँदें इतनी तेज पड़ती की आँखें खोलना दूभर हो रहा था… रोड पर ट्रॅफिक ना के बराबर हो गया था…

मे अपने हॉस्टिल की ओर जाने वाले कॉलोने के सिंगल रोड पर जैसे ही मुड़ा… सामने का दृश्य देख कर मेरे पैर जहाँ के तहाँ जम गये…

घनघोर बारिश में चार बदमाश एक लड़की के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती कर रहे थे… उनके एक तरफ एक मारुति वॅन खड़ी थी,

जो शायद उन बदमाशों की थी…, दूसरी साइड में एक सफेद रंग की अक्तिवा लुढ़की पड़ी थी, जो शायद उस लड़की की होनी चाहिए…

वो लड़की अपने को उन बदमाशों से बचने का हर संभव प्रयास कर रही थी…और चीख पुकार भी करती जा रही थी…

लेकिन इस तेज हवा और बारिस में उसकी पुकार सुनने वाला वहाँ कोई नही था, और वैसे भी दिल्ली जैसे शहर में कोई किसी का साथ देने नही आता…

मे कुछ देर वहीं खड़ा ये सब देखता रहा…

वो कभी एक बदमाश के हाथ से छूटती, तो दूसरा पकड़ लेता, उससे छूटती तो तीसरा…

सच कहूँ तो मेरी भी हिम्मत नही हो रही थी कि मे उस लड़की की कोई मदद कर सकूँ…

क्योंकि देल्ही की गुंडागर्दी के बारे में पिच्छले एक साल में बहुत कुछ सुन चुका था मे…

यहाँ आए दिन मर्डर… बीच सड़क पर बलात्कार होना आम बात थी… लोग देख कर भी अनदेखा कर के निकल जाते हैं…

ऐसे में बैठे बिठाए मुशिबत मोल लेना बेवकूफी ही थी…, लेकिन एक मजबूर लड़की की मदद ना करना…कहीं ना कहीं ये भी ग़लत लग रहा था मुझे.

मेरा जमीर मुझे अनदेखा कर के वहाँ से जाने भी नही दे रहा था…

मे अभी कोई निर्णय नही ले पाया था… की वो लड़की ना जाने कैसे उन गुण्डों के चंगुल से निकल भागी… शायद उसकी नज़र मेरे ऊपर पड़ गयी थी…

सो भागते हुए वो मेरे पास आ गयी… और हाथ जोड़ कर मुझसे मदद करने के लिए गिडगिडाने लगी….

मे बुत बना उस भीगी हुई लड़की को देखता रहा…, भीगने से उसके टाइट फिटिंग टॉप और जीन्स और ज़्यादा शरीर से चिपक गये थे, जिसकी वजह से उसके अन्तर्वस्त्र भी साफ-साफ उजागर हो रहे थे…

तब तक उनमें से दो बंदे वहाँ आ पहुँचे और उन्होने उस लड़की के दोनो बाजुओं को फिरसे थाम लिया…

वो अभी भी अपने हाथ जोड़े मुझसे मदद की भीख माँग रही थी, साथ ही साथ उनसे अपने आप को छुड़ाने का प्रयास भी करती जा रही थी…

तभी उनमें से एक गुंडा बोला… अबबे साली चल, ये लौंडा क्या बचाएगा तुझे… इसे क्या अपनी जान प्यारी नही है क्या…

ओये हीरो…! चल निकल ले यहाँ से… वरना खम्खा मारा जाएगा…

बात अब अपनी मर्दानगी पर आ गयी थी, सो मेने अब अपनी टाँग अड़ाने का फ़ैसला कर लिया…, और उस गुंडे की बात ख़तम होते ही बोल पड़ा…

अरे भाई लोगो… क्यों बेचारी अकेली लड़की को परेशान करते हो … जाने दो ना उसे…

वही गुंडा – अब्बे ! मेरी बात तेरे भेजे ना पड़ी के… निकल ले यहाँ से वरना…!

मेने उसकी बात में ही काटते हुए कहा – वरना के..?

ये सुनते ही उसकी झान्टे सुलग गयी, और उस लड़की का बाजू छोड़कर मेरी तरफ झपटा… उसका इरादा मेरे मुँह पर घूँसा जड़ने का था…

मेने पीछे हटके उसका वार खाली कर दिया और साइड में होकर उसका वही हाथ थामा…, पलटा…, उसे अपनी पीठ पर लिया और इतनी ज़ोर से से रोड पर धोबी पछाड़ मारा… कि उसकी कमर कड़क से टूट गयी…

अब वो लाख कोशिशों के बाद भी उठने की स्थिति में नही था…

अपने साथी का हश्र देख कर वो दूसरा उस लड़की को छोड़ कर अपने दूसरे दो साथियों की तरफ भागा…

उसने जैसे ही वहाँ से भागने की कोशिश की मेने उसका गिरेबान पीछे से पकड़ा…वो एक हल्के शरीर का बंदा था, तो उसे भी गले से पकड़ कर ऊपर उठाया और दे पटका रोड पर…

तब तक वो दोनो परिस्थिति को समझ चुके थे और भागते हुए मेरी ओर झपटे…

उनमें से एक के हाथ में रिवॉल्वार था… और दूसरे के हाथ में रामपुरी चाकू…

वो लड़की डर के मारे थर-थर काँप रही थी… मेने उसे अपने पीछे खड़े होने को कहा..

वो मेरी पीठ से चिपक कर खड़ी, थर-थर काँप रही थी,

इतने में वो दोनो हमारे पास तक पहुच गये…

वो रेवोल्वर वाला अपने दोनो साथियों को, ज़मीन पर पड़े तड़पते हुए देख कर गुस्से से लाल भभुका हो उठा और अपना रेवोल्वर मेरे ऊपर तान कर गुर्राया…

बहुत हेरोपंति हो गयी..छोरे…इब तेरा खेल ख़तम करना ही पड़ेगा… इतना कहते ही उसने मेरे ऊपर गोली चला दी…

मेने बचने की कोशिश भी की लेकिन फिर भी वो मेरे बायें कंधे में घुस गयी…

मुझे लगा मानो कोई गरम लोहा मेरे कंधे में घुसकर जला रहा हो…गोली लगते ही में पीछे को चक्कर ख़ाता चला गया…

अपने को संभालने की सारी कोशिशों के बाद भी मे ज़मीन पर गिर पड़ा…

सीधे हाथ से अपने कंधे को दबाए हुए मे दर्द से तड़प रहा था…

वो रेवोल्वर वाला ठहाके मरता हुआ मेरे सर पर आकर खड़ा हो गया…और मुझे गालियाँ बकते हुए वो मेरे सीने में गोली उतारने के लिए उसने निशाना ले लिया…,

 
मुझे आज अपना अंतिम समय नज़दीक दिखाई दे रहा था,

लेकिन कहते हैं ना कि जाको राखे साईयाँ मार सके ना कोई…

इससे पहले की वो ट्रिग्गर दबाता, कि तभी एक लोहे के पाइप का वार उसके रिवॉल्वार वाले हाथ पर पड़ा…,

उसकी रेवोल्वर हाथ से छूट कर कहीं गिर पड़ी, और वो अपना हाथ पकड़ कर दर्द से बिलबिलाता हुआ ज़मीन पर बैठता चला गया……..!

हुआ यौं कि, जैसे ही पहली गोली जो मेरे कंधे मैं लगी थी, मुझे गोली लगते ही वो लड़की डर के मारे पीछे को भाग खड़ी हुई….

वो थोड़ा सा ही पीछे हटी थी, कि उसका पैर वहीं साइड में पड़े एक दो फुट लंबे 1” मोटे लोहे के पाइप से टकरा गया…

उसने वो पाइप का टुकड़ा उठा लिया…, उसे हाथ में लेकर वो सोचने लगी, कि एक अंजान आदमी जो उसकी मदद करने की वजह से मौत के मुँह मैं घिर चुका है, उसे इस तरह अकेला छोड़कर यौं भागना ठीक नही है…

उसे उसकी मदद करनी ही चाहिए, अभी वो ये सब सोच ही रही थी, कि तभी उसके कानों में उस गुंडे के ठहाके सुनाई पड़े,

पाइप पर उसके हाथों की पकड़ मजबूत हो गयी, और वो हिम्मत जुटाकर पलटी,… इससे पहले की वो गुंडा मेरे सीने में गोली उतारता, पूरी ताक़त से उसने वो पाइप उस गुंडे के रेवोल्वर वाले हाथ पर दे मारा…

रेवोल्वर उसके हाथ से छूट कर ज़मीन पर गिर पड़ी, और वो गुंडा अपनी कलाई थामे ज़मीन पर बैठ गया, दर्द के कारण बिलबिलाता हुआ वो अपनी कलाई थामे दर्द कम होने के इंतेज़ार में था..

तब तक उस चाकू वाले ने एक हाथ से उस लड़की का गला पकड़ लिया..और दूसरे हाथ में थामे चाकू को उसके पेट में घुसाने वाला ही था कि…

मे अपनी पूरी चेतना शक्ति समेट कर उठ खड़ा हुआ और उस चाकू वाले गुंडे की कमर में लपेटा मारा और पूरी ताक़त से ज़मीन पर दे मारा…

जोश में आकर पटकने के कारण उसका सर सबसे पहले नीचे आया… और सड़क पर टकराने की वजह से उसका सर फट गया…

इतने में उस रेवोल्वर वाले ने अपने दर्द पर काबू पाकर पीछे से मेरे घायल कंधे को जकड लिया…और जोरे देकर मेरे जख्म पर दबाब डालने लगा…

मेरे गोली लगे कंधे में दर्द की एक तेज लहर दौड़ गयी, और लाख रोकने के बावजूद भी मेरी चीख निकल गयी…

जख्म से खून का रिसाब तेज हो गया…, दर्द और खून की कमी होने की वजह से मेरी आँखें बंद होने लगी…

तभी उस लड़की ने उसी पाइप का एक जोरदार प्रहार उसके सर पर किया… वो अपना सर पकड़ कर लहराता हुआ ज़मीन पर गिर पड़ा… और बेहोश हो गया…

इधर मे भी दर्द के कारण अपनी चेतना खोता जा रहा था, मेरे कंधे से लगातार खून बहरहा था,…

इससे पहले की मे चक्कर खाकर ज़मीन पर गिरता… उस लड़की ने मुझे थाम लिया और जैसे तैसे कर के मुझे घसीटती हुई अपनी स्कूटी तक ले गयी….

उसके बाद क्या हुआ मुझे कुछ पता नही चला…जब मेरी आँख खुली तो मे एक बेड पर लेटा हुआ था….

मेने धीरे से अपनी आँखें खोली और इधर-उधर देखने लगा…

अपने को एक अजनबी जगह पर पाकर मे झटके से उठ कर बैठ गया…झटके के कारण मेरे कंधे में दर्द की एक टीस सी उठी.. और मेरे मुँह से एक कराह निकल गयी…

मेरी कराह सुन कर पास में बैठी वो लड़की जो एक कुर्सी पर बैठी उंघ रही थी… उठ कर उसने मेरे बाजू को थाम कर फिर से लिटा दिया और बोली ….

लेटे रहो … अभी तुम्हारा घाव ताज़ा है… !

मेने उसे पूछा – मे कहाँ हूँ…?

वो – मेरे घर में हो, अब हम सुरच्छित हैं… तुम्हारी गोली निकाल दी गयी है.. लेकिन घाव ठीक होने में कुछ वक़्त लगेगा… तुम सो जाओ, सुबह बात करते हैं..

मेने अपने खुश्क होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा – मुझे प्यास लगी है… तो उसने मुझे पानी पिलाया और बोली – कुछ खाना चाहोगे…?

मे – नही… पर अभी वक़्त कितना हुआ है…? तो उसने अपनी घड़ी पर नज़र डाली और बोली – अभी रात के 3 बजे हैं…

मे – तो क्या में इतनी देर तक बेहोश रहा…?

वो – हां ! डॉक्टर ने तुम्हें बेहोसी का इंजेक्षन दिया था, गोली निकालने से पहले… शायद उसी का असर रहा होगा इतनी देर तक…

पानी के साथ ही उसने मुझे एक गोली और खाने को दी, जिसके असर से मुझे कुछ देर बाद फिरसे नींद आ गयी और फिर जाकर सुबह ही आँख खुली…

जब मेरी आँख खुली, तो वो लड़की इस समय मेरे पास नही थी… मे बेड से उठ खड़ा हुआ और गेट खोल कर बाहर आ गया…जो एक बड़े से हॉल में खुलता था…

मुझे देखते ही हॉल में बैठे अधेड़ दंपति… मेरी ओर लपके और मुझे पकड़ कर सोफे पर बिठा दिया…

मे उन्हें देख कर चोंक गया… और मेरे मुँह से निकल पड़ा… सर आप ?

वो अधेड़ कोई और नही हमारे लॉ कॉलेज के सबसे काबिल सीनियर प्रोफेसर राम नारायण श्रीवास्तव थे…

प्रोफ़ेसर – हां ! और तुम शायद मेरे स्टूडेंट अंकुश शर्मा हो..? नेहा मेरी बेटी है…

मे – कॉन नेहा ?

प्रोफ़ेसर – जिसकी तुमने उन गुण्डों से इज़्ज़त बचाई है…वो मेरी बेटी नेहा है… लॉ करने के बाद मेरे साथ ही प्रॅक्टीस कर रही है…

जिन गुण्डों ने उसपर ये हमला किया था, दो दिन पहले उनके लीडर को हमने कत्ल के जुर्म में सज़ा दिलाई थी… शायद इसी कारण वो नेहा से बदला लेना चाहते होंगे..

लेकिन भगवान ने किसी फरिश्ते की तरह तुम्हें वहाँ भेज दिया… और एक अनहोनी होने से बच गयी…

 
हम ये बातें कर ही रहे थे… कि तभी वहाँ नेहा आ गयी.. उसने अपने मम्मी-दादी को गुड मॉर्निंग कहा, फिर मुझे गुड मॉर्निंग कह कर मेरा हाल चाल पूछा…

प्रोफ़ेसर – बेटी ये अंकुश शर्मा है, मेरा सेकेंड एअर का बहुत होनहार स्टूडेंट… देखो एश्वर ने क्या संयोग रचा.. कि इसे वहाँ तुम्हारी मदद के लिए भेज दिया…

इसकी जगह कोई और होता तो शायद वो वहाँ रुकता ही नही…हमें इसका एहसानमंद होना चाहिए…

मे – सर ! ये कह कर आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं… मे नही जानता था, कि ये आपकी बेटी हैं…

बस मेरे जमीर ने कहा.. कि मुझे इनकी मदद करनी चाहिए.. सो वहाँ रुक गया…और जो बन पड़ा वो किया…

नेहा – नही ! तुमने जिस साहस और दिलेरी से उन गुण्डों का सामना किया, ये हर किसी के बस की बात नही थी… थॅंक यू वेरी मच अंकुश..! मे तुम्हारा ये एहसान जिंदगी भर नही भूलूंगी..

मे – आप भूल रही हैं नेहा जी, थॅंक यू तो मुझे कहना चाहिए आपको, कि आपकी दिलेरी और सूझ-बुझ के कारण आज मे यहाँ जिंदा बैठा हूँ…

प्रोफेसर और उनकी पत्नी यानी नेहा की मम्मी किनकर्तव्यविमूढ़ से हम दोनो की बातें सुन रहे थे… तो मेने उन्हें सारा वाकीया डीटेल में बता दिया…

वो दोनो अपनी बेटी को प्रशंसा भरी नज़रों से देख रहे थे… फिर वो बोले – चलो अच्छा हुआ कि तुम दोनो ने ही मिलकर एक दूसरे की मदद की…

लेकिन बेटे.. ये बात भी अपनी जगह बहुत मायने रखती है कि, तुमने जो एक अंजान लड़की के लिए किया है, आज के जमाने में कोई किसी के लिए अपनी जान जोखिम में नही डालता…!

इन्ही बातों के दौरान हम सबने नाश्ता किया… नेहा की मम्मी किसी एनजीओ के लिए काम करती थी, कुछ देर बाद वो दोनो अपने-अपने काम पर निकल गये….!

मेने भी अपने हॉस्टिल जाने के लिए नेहा से कहा, तो वो मुझे घुड़कते हुए बोली…

बिल्कुल नही… तुम कहीं नही जाओगे… जब तक कि पूरी तरह से ठीक नही हो जाते..इट्स आन ऑर्डर… और ये कह कर वो मुस्कराने लगी…

मे – लेकिन मी लॉर्ड ! मेरे कपड़े तो देखो.. खून से सने हुए हैं.. फ्रेश भी होना है.. तो जाना तो पड़ेगा ही ना…

वो ऑर्डर देते हुए बोली – कोई ज़रूरत नही, अपने रूम की चावी दो मुझे.. मे अभी तुम्हारे कपड़े मँगावती हूँ तुम्हारे रूम से…

मेने हथियार डालते हुए.. अपनी जेब से उसे चावी निकाल कर दी, और अपना रूम नंबर. बताया…

उसने फ़ौरन अपने नौकर को भेज कर मेरे कपड़े मंगवा दिए.. फिर मे वहीं फ्रेश हुआ, जिसमें नेहा ने भी मेरी मदद की,

मुझे फ्रेश करते समय, नहाने के दौरान मेरी कसरती बॉडी को देखकर वो बिना इंप्रेस हुए नही रह पाई…

फिर नेहा ने मुझे दवा दी… और बैठ कर एक दूसरे से गप्पें लगाने लगे…

मुझे नेहा और प्रोफेसर ने एक हफ्ते अपने घर पर ही रखा… इन दिनो में नेहा हर संभव मेरी हर ज़रूरत का ख्याल रखती थी,

यहाँ तक कि शुरू के, एक दो दिन तो उसने अपने हाथों से मुझे फ्रेश होने में मेरी मदद की…

उसके मुलायम हाथों का स्पर्श अपने नंगे बदन पर पाकर में सिहर उठता, और शायद वो भी उत्तेजित होने लगती…..,

कंधे को सेफ रख कर वो मुझे नहलाती भी… उसके बदन की खुसबु, और स्पर्श से मेरी उत्तेजना बढ़ने लगती..

नहाने के दौरान कुछ पानी उसके कपड़ों को भी गीला कर देता, जिससे उसके कपड़े बदन से चिपक जाते, और उसके बदन के कटाव झलकने लगते..

जिसे देखकर मे और ज़्यादा उत्तेजित होने लगता था, और इकलौते अंडरवेर में मेरा लंड तंबू बनके खड़ा हो जाता.. जिसे वो बड़े गौर से निहारती रहती….

जब मेरी नज़र उसकी नज़रों से टकराती.. तो वो शर्म से अपनी नज़र वहाँ से हटा लेती… और मन ही मन मुस्करा उठती…

मेरी हाइट उससे कुछ ज़्यादा ही थी, तो जब वो तौलिए से मेरे सर को सुखाती, तो उसे अपने हाथ ऊपर करने पड़ते, जिससे उसके मुलायम बूब्स मेरे शरीर से टच हो जाते…,

वो भी शायद उत्तेजित हो जाती थी, जिस कारण से मेरा सर रगड़ने के बहाने अपने बूब्स मेरे बदन के साथ रगड़ देती…

कभी कभी मेरा खड़ा लंड उसकी कमर पर टच हो जाता, तो वो अपने पंजों पर उचक कर उसे अपनी मुनिया पर फील करने की कोशिश करती…

मे जान बूझकर और अपनी गर्दन अकडा देता, तो उसे और ज़्यादा उचकना पड़ता, जिससे मेरा पप्पू उसकी मुनिया के साथ और ज़्यादा खिलवाड़ करने लगता, वो धीरे से सिसक पड़ती..

ऐसी ही प्यार भरी छेड़-छाड़ और खट्टी-मीठी यादों के चलते मेरा एक हफ़्ता उनके घर पर कब निकल गया मुझे पता ही नही चला..

आख़िर कार मे बिल्कुल ठीक होकर एक दिन अपने हॉस्टिल वापस लौट गया….!

अभी मे अपने अतीत के पन्ने पलटने में खोया हुआ कुछ और आगे बढ़ता, कि तभी मुझे भानु की याद आ गयी,…ओये तेरी का !!…

साला में तो भूल ही गया था उसको..., मेने तुरंत अपनी घड़ी . पर नज़र डाली…

यहाँ बैठे बैठे मुझे दो घंटे हो चुके थे, … मे वहाँ से फटाफट भागा और खंडहर मे पहुँचते ही उस कमरे का दरवाजा खोला…

भानु जाग चुका था, और ज़मीन पर बैठा गुस्से में भुन्भुना रहा था…

मुझे देखते ही वो भड़क उठा.., झटके से खड़ा होकर मेरी तरफ लपका, और तेज आवाज़ में गुर्राते हुए बोला – तो तू मुझे यहाँ लाया है हरामजादे…!

अपना बदला लेना चाहता है ना… ? चल मार डाल मुझे.. ,ले-ले अपना बदला..

मेने उसके कंधे पकड़ कर एकदम शांत लहजे में कहा – भानु भैया… शांत हो जाओ…, और ज़रा ठंडे दिमाग़ से सोचो,

मुझे तुम्हें मार कर ही बदला लेना होता तो यहाँ लाने की ज़रूरत ही क्या थी, और क्यों तुम्हें होश में आने देता…

जब चाहता, तुम्हारा गेम बजा सकता था…क्यों कुछ ग़लत कह रहा हूँ मे .. ?

वो सोचने लगा, मेरी बात भी सही थी… फिर क्या वजह है, जो मे उसे यहाँ उठा लाया था, यही सब सोचने लगा वो, जब किसी नतीजे पर नही पहुँच पाया तो आख़िर में पुच्छने लगा…

तो इस तरह यहाँ क्यों लेकर आए हो मुझे…?

मे – देखो भानु भैया..! तुम्हारे पिताजी ने मेरे घर आकर तुम्हारे कुकार्मों की एक बार माफी माँगी थी,… और अश्वाशन दिया था कि आइन्दा ऐसा कुछ भी तुम हमारे साथ नही करोगे…

और भविष्य में दोनो परिवारों के बीच संबंध अच्छे रहें, इसकी भरसक कोशिश करते रहेंगे…

बावजूद इसके तुमने वो घिनोना काम कर दिया.. जो किसी भी डिस्कनारी में माफी के लायक नही है, ऊपर से तुमने मुझे मारने के लिए गुंडे भी भेजे..

फिर भी मेने सोचा कि चलो कोई बात नही, अपने इलाक़े के ज़मींदार की इज़्ज़त का सवाल है, अब उन्हें कोई तकलीफ़ है, तो आपस में मिल बैठ कर सुलटा लेते हैं….!

मुझे ये भी पता था कि तुम सीधी तरह से मेरे साथ बात करने वाले थे नही, तो इसलिए तुम्हें यहाँ इस तरह लाना पड़ा…!

अब इसमें तुम्हें कोई तकलीफ़ हुई हो तो माफ़ करना…

वैसे जिस तरह से मुझे तुम्हारे खानदान की इज़्ज़त की फिकर है, क्या उसी तरह तुम्हें भी अपने परिवार की मान –मर्यादा की फिकर है..?

वो एकदम तैश में आते हुए बोला – मे किसी की जान भी ले सकता हूँ, अगर मेरे परिवार की इज़्ज़त पर आँच भी आई तो…

मेने आगे कहा – बहुत अच्छी बात कही तुमने ! सुनकर खुशी हुई.. कि तुम्हें अपनी मान-मर्यादा का इतना ख़याल है…

लेकिन भाई मेरे दूसरे की इज़्ज़त का ज़रा भी ख़याल नही किया तुमने…! क्या दूसरों की कोई इज़्ज़त नही होती..?

वो घमंड के साथ अकड़ कर बोला – हुन्न्ह… ऐसे छोटे-मोटे लोगों की भी कोई इज़्ज़त होती है…, जो तुम उसकी हमारे खानदान से तुलना करने लगे…

मे – तो तुम्हारा कहने का मतलब है, कि तुम्हारी इज़्ज़त, इज़्ज़त है, दूसरे की कोई इज़्ज़त नही…!

 
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