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लाड़ला देवर ( देवर भाभी का रोमांस) complete

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वो आअहह…..सस्स्सिईईईईई…करती हुई पूरा लंड एक बार में ही निगल गयी… मे उसकी गान्ड पर थप्पड़ बरसाते हुए दनादन धक्के लगाने लगा… !

वो भी अपनी गान्ड को मेरे लंड पर पटक-पटक कर चुदाई का मज़ा ले रही थी..

उसके चुतड़ों पर मेरी जाँघ की थप-थप की आवाज़ रात के शांत वातावरण में गूँज रही थी…

मुझे अभी मज़ा आना शुरू ही हुआ था, कि किसी ने पीछे से मुझे अपनी बाहों में लपेट लिया….

धक्के मारते हुए मेने मुड़कर देखा तो रागिनी की टेंट मेट रीना… एकदम नंगी मुझे अपनी बाहों में भरे हुए मेरे बदन से लिपटी हुई थी…!

धक्कों के साथ साथ उसका बदन भी मेरे शरीर के साथ रगडे खा रहा था…

मस्त माल कूर्वी फिगर रीना अपने मोटे-मोटे आम मेरी पीठ से सटाये हुए थी…, उसके कड़क निपल्स मेरी पीठ से रगड़ कर मेरे मज़े को और दुगना कर रहे थे..

बाजू से पकड़ कर मेने रीना को अपने बगल में खड़ा किया, और रागिनी की चूत में धक्के लगाते हुए उसके होंठ चूसने लगा…

फिर मेने उसकी चूत में अपनी दो उंगलियाँ डालते हुए पूछा…

रीना तुम यहाँ कब आई…?

वो सिसकते हुए बोली – सस्सिईईईई….आआहह….जब तुम दोनो किस करना शुरू किए थे, मे तभी से तुम दोनो का खेल देख रही हूँ….

उसकी आवाज़ सुनकर रागिनी ने मुड़कर पीछे देखा…और अपनी गान्ड को ज़ोर ज़ोर से पटकते हुए बोली- आअहह….साल्ल्लीइीइ….कुतियाअ…तू भी आ गयी…. अपनी चूत की खुजली मिटाने…

आआहह…हाईए रे.. बहुत मस्त चुदाई करता है…रीि ये अंकुश….तो.. आहह…आईईई…मे तो फिर गाइिईई….उउउऊओह… करती हुई रागिनी भालभाला कर झड़ने लगी…

इधर मेरा भी नल कभी भी खुल सकता था… सो पूरा दम लगाकर दो-तीन धक्के मारे.. और उसकी चूत में पूरा जड़ तक लंड पेलकर धार मार दी…

साथ ही उत्तेजना में मेरी दोनो उंगलियाँ जड़ तक रीना की चूत में घुस गयी…जिससे वो भी अपने पंजों के बल उचक कर पानी छोड़ने लगी….!

मेने अपना टॅंक खाली कर के पाइप को उसकी टंकी से बाहर खींचा…. फुकच्छ… की आवाज़ के साथ मेरा लंड रागिनी की चूत से बाहर आया, जिसपर रागिनी की चूत का रस लगा हुआ था…

पता नही क्यों… लेकिन वो अभी भी अपनी फुल फॉर्म में ही लग रहा था… उसका आकर देख कर रीना की घिग्घी बँध गयी… वो उसे फटी-फटी आँखों से देख रही थी…

रीना अपने मुँह पर हाथ रखकर बोली - हाए राअंम्म… रागिनी.. तू इतना बड़ा लंड झेल गयी… बाप रे ये मेरी तो चूत के परखच्चे उड़ा देगा…!

रागिनी – बकवास मत कर, मुझे पता है, तू कितनी सील पॅक है, साली खुद के चाचा का सोटा खा जाती है, और अब यहाँ नाटक कर रही है…

रीना – हहहे… वो उनका इतना बड़ा नही है यार… सच में ये तो किसी घोड़े के जैसा लग रहा है…, ये कहकर उसने उसे अपने हाथ में पकड़ा, और उसकी स्ट्रेंत चेक करने लगी..

रागिनी – चल अब बहुत नाटक हुआ, इसे चाट कर सॉफ कर, अगर चाहिए तो जल्दी से चुस्कर तैयार कर…

रीना – पर यार ये तो ऑलरेडी तैयार ही है…

मेने उसे झिड़कते हुए कहा – फिर भी थोड़ी सेवा तो करनी पड़ेगी इसकी, अगर अपनी चूत को मेवा खिलानी है तो..

मेरे झिड़कते ही, उसने उसे अपने मुँह में ले लिया, और चाट-चाट कर चमका दिया…

5 मिनिट बाद ही मेरा खूँटा फिरसे ज्यों का त्यों सख़्त हो गया, जिसे मेने रीना की टाँगें चौड़ा कर उसकी चूत में ठोक दिया…

पहले धक्के पर वो बिल बिलाकर कर गान्ड हिलाने लगी, लेकिन कुछ ही देर में फूल मस्ती में आकर चुदाई का मज़ा लेने लगी…

रीना भी खेली खाई थी, सो अपनी गान्ड उचका-उचका कर लंड का मज़ा अपनी चूत को दिलाने लगी….

दोनो की अच्छे से बजाने के बाद मेने अपने कपड़े समेटे, और उनको गुड नाइट बोलकर अपने टेंट में आकर सो गया…

वो दोनो भी मेरे आने के कुछ देर बाद अपनी जगह पर जाकर सो गयी…!

दूसरे दिन हम सब खजुराहो का मंदिर देखने गये, मंदिर की कलाकृतियाँ इतनी सुंदर और कामुक थी, की जहाँ खड़े होकर देखने लगें लंड अपने आप पेंट के भीतर ठुमके मारने लगता…

वो तो अच्छा था, कि लड़के और लड़कियों को अलग अलग ग्रूप में रख कर घूम रहे थे… कामसूत्र के सारे आयाम उन दीवारों पर दर्शाये गये थे…!

ये सब देखकर बाहर जब सब इकट्ठा हुए तो लड़के और लड़कियों के चेहरों से साफ लग रहा था, कि वो कितनी उत्तेजना में हैं…

मेडम बारी-बारी से सबके पॅंट के उठानों को देख रही थी, और शायद मन ही मन चुदने की कल्पना भी कर रही हो…

लेकिन कुछ होने वाला नही था, सो उसने नज़र बचाकर अपनी टाँगों के बीच हाथ डालकर अपनी गीली चूत को पेटिकोट से सूखा लिया…

इस तरह से रोज एक-दो नये मोनुमेंट को हम लोग देखने जाते और शाम को अपने अपने टेंट में आ जाते…

कुछ लड़के लड़कियाँ की सेट्टिंग भी हो गयी थी, और वो शाम के वक़्त जंगलों की सैर के बहाने अपनी रास लीला का लुफ्त भी उठा लेते थे…

इसी तरह 3-4 दिन निकल गये, रागिनी और रीना ने इस बीच फिरसे मेरे नज़दीक आने की बहुत कोशिश की, लेकिन मेने उन्हें मौका नही दिया…!

ऐसे ही एक दिन एक मंदिर में हम घूम रहे थे, मंदिर प्रांगड़ में एक पीपल का बड़ा सा पेड़ था, जिसके तने (स्टेम) के चारों ओर मिट्टी का गोलाई लिए हुए चबूतरा सा बना हुआ था..

मे भीड़ से अलग होकर उसपर बैठ गया, मौका ताड़ कर रीना मेरे पास आई, और एक चान्स और देने के लिए गिडगिडाने लगी..

मेने उससे कहा – देखो रीना तुम तो जानती ही हो, मे इस तरह का आदमी नही हूँ, वो तो पता नही मुझे क्या हुआ था उस दिन, और मे बैचैनि में उठ कर अकेले बाहर चला गया, और तुम लोगों ने मौके का फ़ायदा उठा लिया..…

वो – मे मानती हूँ, हमने मौके का फ़ायदा उठाया, और ऐसा तुम्हारे साथ उस दिन क्यों हुआ ये भी जानती हूँ…!

मेने चोंक कर उसकी तरफ देखते हुए पूछा – क्या कहना चाहती हो तुम..? वो तो बस ऐसे ही कुछ बाहर का खाया पीया था तो गॅस बनने लगी होगी, इसलिए बैचैनि हो रही थी… !

रीना – एक काम करो, उस दिन की घटना फिर से एक बार याद करो, क्या वो सब जस्ट गॅस से होने वाली स्वाभाविक सी प्रतिक्रिया थी..?

उसकी बात सुनकर मे सोच में पड़ गया, फिर मुझे कुछ लगा कि वो सब स्वाभविक तो नही था, ऐसा कभी मेरे साथ नही हुआ था की मेने अपना मानसिक कंट्रोल ही खो दिया हो…

और मेरे मुँह से निकलने वाले वो अपशब्द…. ये सब दिमाग़ में घूमते ही मे सोच में पड़ गया…

मुझे यूँ सोच में डूबे हुए देखकर वो फिर बोली – क्या सोच रहे हो…?

मेने अपनी सोच को विराम देते हुए कहा – तुम सही कह रही हो, मेरे साथ उस दिन कुछ तो गड़बड़ थी… क्या तुम्हें पता है…?

रीना मुस्करा कर बोली – मुझे सब पता है, कि तुम्हारे साथ क्या हुआ और किसने किया…?

मेने उसके कंधे पकड़ कर कहा – बताओ मुझे क्या हुआ था उस दिन?, और किसने किया था मेरे साथ…?

एक अर्थपूर्ण मुस्कान रीना के चेहरे पर आ गयी, और उसी अंदाज में वो बोली – मेरी एक शर्त है, अगर मानो तो मे तुम्हें सब कुछ बता सकती हूँ…!

मेने उसकी मनसा समझते हुए अपना एक हाथ उसके पीछे ले गया, और उसकी गान्ड सहला कर कहा – क्या शर्त है तुम्हारी…?

उसने मेरे पेंट के ऊपर से मेरे लौडे को सहला का कहा – एक बार और ये चाहिए मुझे… बोलो दोगे..?

मेने भी हाथ आगे कर के उसकी चूत को सहला दिया, और कपड़े के ऊपर से ही अपनी एक उंगली घुसाकर कहा – ठीक है, मे तुम्हें एक बार और चोदुन्गा, अब बोलो…

वो एक बारगी सिसक पड़ी, और मेरे हाथ को अपनी चूत पर दबाते हुए बताने लगी..

रीना मुझे उस दिन के बारे में बताते हुए बोली – तुम्हें याद होगा…,

उस रात, जब तुम लोग खाना खा रहे थे, तो मेने और रागिनी ने आकर तुम्हें जाय्न किया, और साथ बैठ कर खाने लगे…

मेने हामी भरी…. फिर

रीना – फिर हम सबने एक दूसरे का खाना भी शेयर किया था, …

उसी समय मौका देख कर रागिनी ने एक ऐसा ड्रग तुम्हारे खाने में मिला दिया

जिसके असर से आदमी या औरत सेक्स करने के लिए बैचैन होने लगते है…

 
5-6 घंटे तक इसका असर इतना रहता है, कि अगर लगातार सेक्स करे तो भी उत्तेजना बरकरार रहती है…

मे उसकी बात ध्यान से सुन रहा था…. हुउऊउंम्म फिर..

रीना आगे बोली – तुम्हारे सोने के कुछ देर बाद ही तुम्हें अजीब सी बैचैनि होने लगी… और तुम उठ कर बाहर चले गये…

रागिनी को पक्का पता था कि ऐसा होगा, इसलिए वो तुम पर नज़र बनाए हुए थी.. और तुम्हारे कुछ देर बाद ही वो तुम्हारे पास चली आई…

मे – ये बातें तुम्हें कैसे पता लगी…?

रीना – यहाँ का टूर डिसाइड होते ही रागिनी बहुत एक्शिटेड थी, मेने उससे इसका कारण पूछा तो वो जोश-जोश में कह गयी… कि ये साला अंकुश अपने आप को बहुत बड़ा हीरो समझता है…

अब देखूँगी ये मेरे चंगुल से कैसे बच पाता है…

जब मेने पूछा कि तू क्या करने वाली है… तो उसने ये कहकर बात टाल दी, की ये तो समय आने पर ही पता चलेगा, तू बस देखती जा.

यहाँ आते ही मेरी नज़र हर समय उसकी हरेक आक्टिविटी पर ही थी, मेने उसे वो ड्रग तुम्हारे खाने में मिलाते हुए देख लिया था…

फिर खाने के बाद जब सोने गये, तब मेने उससे पूछा कि उसने तुम्हारे खाने में क्या मिलाया था, तो उसने ये सब बताया…

मेने कहा – तो तुम वहाँ क्यों गयी…? क्या तुम भी पहले से ही उसके साथ मिली हुई थी…..?

रीना – झूठ नही बोलूँगी, मेरे मन में भी तुम्हें पाने की चाहत तो थी जैसे कॉलेज की ज़्यादातर लड़कियों की है, लेकिन मे रागिनी की तरह तुम्हें पाना नही चाहती थी..

फिर जब मौका हाथ आ ही गया था, तो मेने रागिनी को धमकाया, कि मे तुम्हें ये बात बताने जा रही हूँ,

मेरी धमकी से वो घबरा गयी और मुझसे बोली - अरे यार मिलकर मज़ा करते हैं… मेरे बाद तू आ जाना…

मे – हुउंम्म… तो ये बात है, तभी मे साला सोचते – 2 पागल हुआ जा रहा था, कि मेरा दिमाग़ काम क्यों नही कर रहा था उस दिन…

खैर ग़लती तो तुमसे भी हुई है, और इस ग़लती की माफी तुम्हें तभी मिलेगी, जब तुम मेरा भी एक काम करोगी…

रीना गिडगिडाते हुए बोली – देखो अंकुश, मेरी ऐसी कोई इंटेन्षन नही थी कि तुमसे कोई ज़ोर जबर्दुस्ति से अपना काम निकलवाऊ, वो तो बस रागिनी की बातों में आ गयी, प्लीज़ मुझे माफ़ करदो यार…!

मेने हँसते हुए कहा – डरो नही ! मे तुम्हें कोई सज़ा नही देने वाला, बस जैसा कहूँ वैसा करती जाना,

इसमें तुम्हारा भी फ़ायदा होगा, तुम जैसे चाहो मेरे साथ सेक्स कर सकती हो…

वो खुश होकर बोली – सच ! बोलो मुझे क्या करना होगा…?

मे – पता करो वो ड्रग अभी भी रागिनी के पास है, या कन्स्यूम हो गया…

रीना – वो तो होगा ही, मे पता लगा लूँगी, फिर…?

मे – शायद कल हमारे टूर का लास्ट दिन है, हो सकता है कल ही हम लोग यहाँ से निकल लें, तो तुम्हें आज ही उसमें से थोड़ा सा ड्रग, जितना मुझे उसने दिया था, लेकर तुम्हें रागिनी को देना होगा किसी भी तरह…और थोड़ा सा मुझे भी देना…

रात को जब उसका असर उसके ऊपर होने लगे, तो उसे लेकर उसी जगह पर आ जाना…

रीना – लेकिन मेरे साथ कुछ ग़लत तो नही करोगे ना तुम…

मे – विश्वास रखो, मे तुम्हें तुम्हारी मन मर्ज़ी से ही मज़ा दूँगा…

मेरी बात सुनकर रीना खुशी से झूम उठी, और उचक कर मेरे होंठों को चूमकर वहाँ से चली गयी…!

घूम घाम कर शाम को हम सब अपने टेंट्स में लौट लिए… कल दोपहर बाद हमें यहाँ से लौटना था,

सबको बोल दिया गया, कि कल जिसको जंगल वग़ैरह देखने हो वो सुबह के टाइम जा सकता है, और 1 बजे तक लौट कर अपना समान वग़ैरह पॅक कर के 3 बजे तक रेडी होना है…

कुछ देर हम सब मिलकर धमा-चौकड़ी मचाते रहे, तब तक खाना रेडी हो गया, सबने एक साथ मिलकर खाना खाया…

रीना ने थोड़ी सी ड्रग मुझे भी दे दी थी, और ये भी कन्फर्म कर दिया, कि जैसा तय हुआ था, उतना उसने रागिनी के खाने में मिला दिया है…

जैसा सोचा था वैसा ही हुआ, लगभग 11 बजे रागिनी और रीना अपने टेंट से बाहर निकली, और उस ओर चल दी… मेने उनके पास थोड़ा देर से जाने की सोची..,

करीब 20-25 मिनिट के बाद में भी उस ओर चल दिया…. वो दोनो एक दूसरे के साथ लेज़्बीयन सेक्स करने में गुत्थी हुई थी…

दोनो के शरीर पर कपड़ा नाम की चीज़ नही थी, रीना तो जैसे बस उसका साथ ही दे रही थी, लेकिन रागिनी पर तो जैसे हवस का भूत ही सवार था…

मुझे देखते ही उसने रीना को छोड़, मेरे कपड़ों पर धावा बोल दिया, और एक मिनिट में ही मुझे भी बिल्कुल नंगा कर दिया…

वो मेरे लंड पर किसी भूखी कुतिया की तरह टूट पड़ी.. और चूस-चूस कर चमका दिया…

मेने भी उसे ज़्यादा तरसने नही दिया, और खड़े खड़े ही उसकी एक टाँग उठाकर अपना खूँटा, उसके छेद में ठोक दिया…

जोरदार झटकों की वजह से रागिनी ज़्यादा देर एक टाँग पर खड़ी नही रह पाई, तो मे उसे घोड़ी बनाकर चोदने लगा…

एक बार जमकर रागिनी की चूत चोदने के बाद मेने रीना को अपने पास खींच लिया…

वो तो पहले से ही वासना की आग में बुरी तरह झुलस रही थी, उसकी चूत लगातार चासनी टपका रही थी…

मेने अपना मूसल उसकी गीली चूत में डाल दिया, और उसके मन मुताविक चोदने लगा, वो खुश होगयि…और अपनी गान्ड उठा उठाकर चुदाई का मज़ा लूटती रही…

रीना की मोटी- मोटी चुचियों का रस निचोड़ते हुए मेने उसे उलट-पुलट कर जमकर मज़ा दिया.. अब वो पूरी तरह से संतुष्ट नज़र आ रही थी…

 
कुछ देर सुस्ताने के बाद मेने फिरसे रागिनी की तरफ अपना रुख़ किया….

थोड़ी देर उससे लॉडा चुसवाने के बाद, वो फिरसे फनफनाकर खड़ा था अगली जंग जीतने के लिए…

ड्रग का असर उसे ज़्यादा देर शांति से बैठने ही नही दे रहा था…

रागिनी की हवस भी बुरी तरह बढ़ चुकी थी… उसे अब सिवाय मेरे मोटे लंड के और कुछ भी दिखाई नही दे रहा था…!

मेने उसकी वासना को और थोड़ा भड़काया, और उसके कठोरे निप्प्लो को अपने दाँतों से काटने लगा…

प्रतिक्रिया स्वरूप उसकी हवस और भड़क उठी, और वो मेरे लौडे को जबर्जस्ती से पकड़ कर अपनी चूत पर घिसने लगी…

मेने थोड़ा उसे तरसाते हुए कहा – रागिनी अब अगर तुझे मेरा लंड चाहिए तो जैसे मे चाहूं वैसे तुझे चुदवाना पड़ेगा…

मेरी बात वो फ़ौरन मान गयी, और किसी भूखी कुतिया की तरह पून्छ हिलाते हुए बोली – तुझे जैसे, जो करना है जल्दी कर, और मेरी भट्टी को ठंडा कर्दे प्लीज़…

मेने उसे एक पेड़ के पास खड़ा किया और उसके तने से उसीकि ब्रा से उसके हाथ बाँध दिए…

उसका मुँह पेड़ की तरफ था और वो पीछे को अपनी गान्ड चौड़ा कर झुक गयी…

मेने रीना को बोलकर उसकी ब्रा रागिनी के मुँह में ठूंसवा दिया, जिससे वो चीख ना सके… और अपने लंड को रीना के मुँह में देकर गीला किया…

मेरा लंड ड्रग के असर से इस समय इस पोज़िशन में आ चुका था, कि अगर किसी दीवार में भी पेलता तो वो उसमें भी छेद कर देता…

मेरे लंड का आकार और उसकी कठोरता देख कर रीना ने एक झूर झूरी सी ली…

अब रागिनी को उसके किए का सबक सिखाने का वक़्त आ गया था,

मेने ढेर सारा थूक लेकर उसकी गान्ड के छेद पर रखा, रीना को इशारा किया तो उसने अपने हाथों से उसकी गान्ड के छेद को चौड़ा दिया…

मेरी मनसा जानकार रागिनी कसमसाई, और अपनी गान्ड को इधर उधर करने लगी…

मेने अपनी एक हथेली उसकी गान्ड के एक पाट पर जमाई, मूसल को उसके छेद पर टीकाया, और एक सुलेमानी धक्का अपनी कमर को मार दिया….

छर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्ररर……..की आवाज़ के साथ रागिनी की गान्ड फट गयी…. उसके चूतड़ बुरी तरह से हिलने लगे…. मेरा आधे से भी ज़्यादा लंड उसकी गान्ड में फिट हो चुका था…

उसके मुँह से बस गून..गूणन्.. जैसी आवाज़ें ही निकल पा रही थी… मेने रीना को उसकी चूत सहलाने के लिए कहा, और खुद उसकी चुचियों को मसल्ने लगा…

वो कुछ शांत हुई, तो एक और फाइनल स्ट्रोक लगा कर बॉल बाउंड्री के बाहर…. बोले तो जड़ तक लंड रागिनी की गान्ड में फिट कर दिया…

उसकी आँखों से आँसुओ की बाढ़ सी आ रही थी…टाइट गान्ड पाकर मेरे मूसल की तो बल्ले-बल्ले हो गयी…

वो साला उसके अंदर जाकर और ज़्यादा फूल गया…, कुछ देर और अंदर रखने के बाद मेने अपने खूँटे को बाहर खींचा…

उसपर लाल खून के रेशे दिखाई दे रहे थे, माने रागिनी की गान्ड की दीवारें बुरी तरह डॅमेज हो गयी थी….

लंड निकालकर मेने देखा तो उसकी गान्ड का छेद किसी ब्लॅक होल जैसा दिख रहा था…

थोड़ा सा थूक और उसके छेद में थूक कर मेने फिर से अपने खूँटे को एक साथ ही गाढ दिया… रागिनी एक बार फिर बुरी तरह कसमसाई…

लेकिन हाथ बँधे थे, मुँह में रीना की ब्रा ठूँसी हुई थी, इस बजह से वो कुछ विरोध करने की स्थिति में नही थी…

मेने अपने धक्के लगाना शुरू कर दिए…, ड्रग के असर से मेरा लंड इतना जल्दी हार मानने वाला नही था…

लगभग आधे घंटे तक में बदस्तूर उसकी गान्ड फाड़ता रहा, फिर उसकी छत-विच्छित गान्ड को अपने वीर्य से भर दिया…

अपनी साँसें इकट्ठा करने के बाद मेने रागिनी के हाथ खोल दिए, उसके मुँह से रीना ने अपनी ब्रा निकाली.. वो वहीं पेड़ की जड़ में पस्त होकर पड़ी रह गयी,

उसकी आँखों से अभी भी पानी बह रहा था…, कुछ ड्रग का असर, और ऊपर से उसकी गान्ड सुन्न हुई पड़ी थी सोते जैसे लंड की मार से….!

बहुत देर तक उसकी गान्ड का सुराख खुला का खुला ही रह गया. जिसमें से मेरा वीर्य, एक सफेद लकीर के रूप में धीरे-2 बाहर रिस रहा था..

उसकी गान्ड के होल की दीवारें लाल सुर्ख हो चुकी थी…मुझे लगा कि ये कुछ दिन ठीक से चल भी पाएगी या नही…

खैर इस सबसे अपना ध्यान हटाकर मेने अपने कपड़े पहने और रीना को उसके पास छोड़कर अपने टेंट में जाकर सो गया…

अगली सुबह, मेरे उठने से पहले ही, अधिकतर लोग जंगल घूमने निकल गये, मेने अनमने भाव से नित्या क्रिया की, और फिर रागिनी की खैर खबर लेने उसके टेंट की तरफ चल दिया…

रीना उठ चुकी थी, लेकिन रागिनी अभी भी बेसूध पड़ी थी, कुछ तो ड्रग का असर, ऊपर से फटी गान्ड का दर्द…

रीना को उसका ख़याल रखने का बोलकर मे भी थोड़ा नदी की तरफ निकल गया, और एकांत जगह देख, उसके किनारे पर बैठकर नदी के निर्मल जल को निहारते हुए सोचने लगा…

रागिनी के बारे में सोचकर, मुझे अपने मन में बड़ी ग्लानि सी होने लगी, मुझे रागिनी के साथ ऐसा दुर्व्यवहार नही करना चाहिए था…

वो तो जैसी थी सो थी, लेकिन मुझे ऐसा नही करना चाहिए था…

बहुत देर तक में यूँ ही बैठा पानी को निहारता रहा, फिर सोचा थोड़ा नहा लिया जाए, और अपने कपड़े निकाल कर नदी के पानी में उतर गया…

नदी के ठंडे पानी का अहसास बदन पर होते ही मुझे राहत महसूस हुई, बहुत देर तक में पानी में नहाता रहा…

फिर बाहर आकर अपने कपड़े उठाए, और गीले बदन मात्र अंडरवेर में ही जंगल के बीच से होते हुए अपने टेंट की तरफ चल दिया…

अभी में जंगल से बाहर निकल भी नही पाया था, कि सामने से मुझे रीना आती हुई दिखी…

उसे देखते ही मेने झट से अपने कपड़ों से गीले अंडरवेर को ढक लिया… जब वो पास आ गयी तो मेने पूछा…

रीना तुम यहाँ क्या कर रही हो…, मेरी बात सुनकर वो बोली…

चलो तुम्हें रागिनी बुला रही है, जब मेने उसे पूछा कि अब वो कैसी है..?

तो उसने बताया, कि अभी ठीक तो है, लेकिन चलने में थोड़ी तकलीफ़ हो रही है…

फिर उसकी नज़र नीचे को गयी, और मेरे कपड़ों से अंडरवेर को ढके देखा, तो शरारत करने से वो बाज़ नही आई, और झटके से मेरे कपड़े छीन्कर खिल-खिलते हुए झाड़ियों की तरफ भागने लगी…

 


मे उसके पीछे पीछे दौड़ा, थोड़ा सा ही आगे जाकर वो झटके से रुक गयी, और एकदम से मेरे सामने आकर उसने मेरे गीले अंडरवेर के ऊपर से ही मेरे लंड को पकड़ लिया…

मेने उसकी गान्ड मसल्ते हुए कहा – कल रात से मन नही भरा तुम्हारा..?

वो मेरी आँखों में झाँकते हुए बोली – इसे देखकर फिर से मन करने लगा है..

प्लीज़ अंकुश एक बार और कर्दे ना यार.., ना जाने फिर मौका मिले या ना मिले…

मेरा भी रात के ड्रग का असर अभी वाकी था, सो मेने वही उसे घोड़ी बनाकर पीछे से उसकी मस्त गान्ड को मसल्ते हुए अपना लंड उसकी गान्ड में ठोक दिया…

वो बुरी तरह से कसमसाने लगी, लंड अभी आधा भी अंदर नही गया था, और वो हाए-तौबा करने लगी, और लंड बाहर निकालने के लिए गुहार करने लगी…

मेने भी उसे ज़्यादा परेशान करना ठीक नही समझा, वरना एक और लंगड़ी घोड़ी ग्रूप में शामिल हो जाती,

मेने उसकी गान्ड से अपना लंड खींचकर उसकी चूत में पेल दिया, उसकी एक बार और अच्छे से खुजली मिटाकर हम दोनो वापस आ गये…

अपने टेंट में जाने से पहले रीना ने मेरे होंठों को चूम लिया और बोली –

थॅंक यू अंकुश… तुम्हारे साथ बिताए लम्हों को जीवन भर नही भूल पाउन्गि.

मेने अपने टेंट में जाकर कपड़े चेंज किए, और फिर डरते-डरते रागिनी के पास गया, मुझे देखते ही रागिनी सुबकते हुए बोली –

मुझे तुमसे ये उम्मीद नही थी, मेने जो तुम्हारे साथ किया वो मेरी ज़िद थी तुम्हें पाने की, लेकिन तुमने तो….

अपनी बात अधूरी छोड़कर वो फिरसे सुबकने लगी…

मे उसके पास जाकर बैठ गया, और उसके कंधे को सहलाते हुए कहा - मुझे माफ़ कर दे रागिनी, सच्चाई जानने के बाद में अपने आपे में नही रहा.. सो तुम्हें सबक सिखाने के लिए ये सब कर बैठा…

सच कहूँ तो सुबह से ही मेरा मन आत्मगीलानी से भरा हुआ था, इसीलिए में नदी की तरफ चला गया था…

रागिनी ने अपने को शांत करते हुए कहा – इट्स ओके, ग़लती हम दोनो से ही हुई है..अब बेहतर होगा, कि बीती बातें भूलकर हम फिर से दोस्त रहें..

रागिनी के मुँह से ऐसी समझदारी भरी बातें सुनकर मेने उसे अपने बाजुओं में भरते हुए कहा…

ओह… थॅंक यू रागिनी, तुमने मुझे माफ़ कर दिया, अब हम पक्के वाले दोस्त हैं..

तभी रीना बीच में बोल पड़ी – मुझे भूल गये क्या…?

हँसते हुए हमने उसे भी अपने पास खींच लिया, और हम तीनों ही एक दूसरे से लिपट गये…

जीवन के किसी मोड़ पर फिरसे मिलने का वादा कर के मे अपने टेंट में चला गया, और अपना समान पॅक करने लगा…

दिन ढले हमारा टूर वापसी के लिए चल पड़ा, और दूसरे दिन सुबह हम अपने कस्बे में थे…

कुछ दिनो बाद ही हमारे फाइनल एग्ज़ॅम हो गये, मेने अच्छे ग्रेड से ग्रॅजुयेशन कंप्लीट कर लिया….!

रिज़ल्ट के बाद घर में बड़ों के बीच डिस्कशन का दौर शुरू हुआ, वीकेंड में दोनो भाई घर में मौजूद थे…

बड़े भैया का सुझाव था, कि मे उनकी तरह हाइयर स्टडी करूँ और किसी कॉलेज में लग जाउ…

लेकिन कृष्णा भैया चाहते थे, की मे उनकी तरह किसी प्रशासनिक पद के लिए तैयारी करूँ….

किसी को मुझे पूच्छने की तो जैसे कोई ज़रूरत ही महसूस नही हो रही थी, कि मे क्या चाहता हूँ…

तभी बाबूजी ने अपनी अलग ही राई रख दी और बोले – वैसे तो तुम सब लोग समझदार हो, जो भी कहोगे छोटू के भले के लिए ही कहोगे,

लेकिन मे चाहता हूँ, कि घर में कोई एक ऐसा भी हो जो क़ानून और अदालती कार्यों की जानकारी रखता हो.. तभी हमारा परिवार पूर्ण होगा…

भाभी ने मेरी तरफ देखा और बोली – तुम क्या चाहते हो लल्ला…?

मेने भाभी की तरफ धन्यवाद वाली नज़रों से देखा, कि चलो कम से कम भाभी को तो मेरी इच्छाओं का भान है…

उनकी बात सुनकर सब मेरी तरफ देखने लगे…

मेने कहा – मेरे विचार से हम सभी को बाबूजी की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए, रही बात मेरी अपनी इच्छा की तो वो भी उनके सम्मान से ही जुड़ी हुई हैं…

मेरी बात से बाबूजी की आँखें भर आईं, उन्होने मुझे अपने सीने से लगा लिया..और भरे कंठ से बोले –

जीता रह मेरे बच्चे…, पर बेटा मेने तो बस अपना विचार रखा था, ये तेरे ऊपर निर्भर करता है, कि तू क्या चाहता है…?

मेने उनसे अलग होते हुए कहा – मे बस ये चाहता हूँ, कि आप मुझसे क्या चाहते हैं…

हर माँ बाप अपनी आधी अधूरी हसरतों को अपने बच्चों के रूप में पूरा करना चाहते हैं, और यही सोच लेकर वो अपने बच्चों की परवरिश अपनी ख्वाहिशों को दफ़न कर के करते रहते हैं…

 


तो बच्चों का फ़र्ज़ भी है, कि वो उनकी भावनाओं का सम्मान करें…

फिर मेने दोनो भाइयों से मुखातिब होकर कहा – आप लोगों ने भी तो वही राह चुनी जो बाबूजी ने सुझाई थी, तो मे कैसे अलग राह चुन सकता हूँ…

मेरी बातें सुनकर सबकी आँखें नम हो गयी, और बारी-बारी से सबने मुझे सीने से लगाकर आशीर्वाद दिया.

बाबूजी ने मेरे सर पर हाथ रखकर कहा - अब मुझे पूरा विश्वास है, कि तू जो भी करेगा उसमें अवश्य सफल होगा…!

आज मे ईश्वर का बहुत अभारी हूँ, जिसने मुझे इतने लायक बेटे दिए… मेरा जीवन धन्य हो गया…!

आज अगर तुम्हारी माँ जिंदा होती, तो अपने बच्चों को देख कर कितनी खुश होती..ये बोलते - बोलते माँ की याद में उनकी आँखें भर आईं.

भाभी ने बाबूजी से कहा – वो अब भी हमारे बीच ही हैं बाबूजी… आज इस घर में जो खुशियाँ दिख रही हैं, वो उनके त्याग और आशीर्वाद का ही तो फल है…!

बाबूजी ने भाभी के सर पर आशीर्वाद स्वरूप अपना हाथ रख कर कहा – तुम सच कहती हो बेटी,

लेकिन इन सबके अलावा विमला के जाने के बाद जिस तरह से तुमने अपनी छोटी उमर में इस घर को संभाला है, वो भी कोई मामूली बात नही है…

ये घर तुम्हारा हमेशा एहसानमंद रहेगा बेटी….

भाभी – भला अपनों पर भी कोई एहसान करता है बाबूजी…! मेने तो बस वही किया जो माजी मुझसे बोलकर गयी थी…

माहौल थोड़ा एमोशनल सा हो गया था, सभी की आँखें नम हो चुकी थी, इससे पहले की मामला कुछ और सीरीयस रूप लेता, कि तभी रूचि बीच में कूद पड़ी…

मम्मी ! आप लोग बात ही करते रहोगे, मुझे भूख लगी है..., सभी को उसके अचानक इस तरह बोलने से हँसी आ गयी, भाभी ने उठ कर उसे दूध दिया, तो माहौल थोड़ा नॉर्मल हुआ…

कुछ देर के वार्तालाप के बाद डिसाइड हुआ कि मुझे लॉ करना चाहिए, वो भी किसी अच्छे कॉलेज से, सो दूसरे दिन ही बड़े भैया, देल्ही के एक अच्छे से कॉलेज का फॉर्म ले आए…

मेरे ग्रॅजुयेशन के अच्छे नंबरों की वजह से देल्ही के कॉलेज में मुझे अड्मिशन मिल गया…, मे अपनी आगे की पढ़ाई के लिए देल्ही जाने की तैयारियों में जुट गया….!

देल्ही जाने से एक दिन पहले शाम को मे अपने सभी परिवार वालों से मिलने के लिए घर से निकला…

पहले बड़े चाचा के यहाँ, फिर मनझले चाचा-चाची से आशीर्वाद लेकर मे छोटी चाची के यहाँ पहुँचा…

चाचा कहीं बाहर गये थे.. चाची ने मुझे देखते ही, चारपाई पर बिठाया और अंश को रूचि के साथ खेलने को भेजकर वो मेरे पास आकर बैठ गयी…

सी. चाची – लल्ला ! सुना है, तुम दिल्ली जा रहे हो पढ़ने के लिए, इसमें तो सालों निकल जाएँगे…

मे – हां चाची लगभग 4 साल तो लग ही जाएँगे…!

वो – हाए राम ! 4 साल..? चाची दुखी सी दिखाई देने लगी ये सुनकर, फिर मेरे हाथों को अपने हाथों में लेकर बोली…

बहुत याद आओगे तुम, वैसे हम सबके बिना कैसे काटोगे इतने दिन अकेले…?

मे – क्या करूँ चाची काटने तो पड़ेंगे ही… अब बाबूजी की आग्या का पालन तो करना ही पड़ेगा… वैसे आप मुझे बहुत याद आओगी चाची…

मेरी बात सुनकर उनकी आँखें डॅब्डबॉ गयी, और मुझे अपने सीने से लगाकर बोली – सच बेटा…! तुम्हें अपनी चाची की याद आएगी..?

ना जाने क्यों , चाची के मुँह से पहली बार बेटा सुनकर मेरा भी मन भर आया, मेरी आँखों से आँसू छलक पड़े, और मे कसकर उनके सीने से लिपट गया…!

फिर मेने उन्हें अलग करते हुए, उनके आँसू पोंच्छ कर कहा – चाची , एक बार फिरसे बेटा कहो ना… ये शब्द सुनने के लिए कान तरस गये थे मेरे…

चाची – सच बेटा…! मेरा बेटा कहना अच्छा लगा तुम्हें.. ?

मे उनके सीने से एक बार फिर लिपट गया, और हिचकी लेते हुए कहा – हां चाची… मुझे बेटा कहने वाला कोई नही है… आप मेरी माँ बन कर मुझे अपने गले से लगा लो..!

चाची की रुलाई फुट पड़ी, और रोते हुए उन्होने मुझे अपने कंठ से लगा लिया… फिर मेरी पीठ सहलाते हुए बोली – माँ की याद आ रही है मेरे बेटे को… मुझे अपनी माँ ही समझ मेरे बेटे…

मेने रोते हुए कहा – हां ! आप मेरी माँ ही तो हो, जिसने अपने बेटे की हर ख्वाहिश का ख़याल रखा है अबतक…

कुछ देर एमोशनल होने के बाद मेने थोड़ा माहौल चेंज करने की गरज से चाची के होंठों को चूम लिया..और उनकी आँखों में देखते हुए कहा…

वैसे मेरे तो आपसे और भी नाते हैं.. हैं ना चाची…?

वो भी मुस्करा पड़ी, और मेरे होंठों पर प्यारा सा चुंबन लेकर बोली – तुम तो मेरे सब कुछ हो, बेटा, जेठौत (भतीजा)…और..और…

मेने शरारत से उनके आमों को सहलाते हुए कहा- और क्या चाची.. बोलो..

चाची – और मेरे बच्चे के बाप भी…फिर वो मेरी जांघों को सहला कर बोली –

वैसे सच में बहुत याद आएगी तुम्हारी… ख़ासकर इसकी.. ये कहकर उन्होने मेरे लंड को अपनी मुट्ठी में ले लिया…

मेने उनके आमों को ज़ोर से मसल दिया – सीधे-सीधे कहो ना कि एक बार और चाहिए ये आपको….

वो उसे ज़ोर से दबाते हुए बोली – अभी समय हो तो दे दो ना.. एक बार..

मे – यहीं…?,

ये सुनते ही वो झट से खड़ी हो गयी, और मेरा हाथ पकड़ कर अपने बेडरूम की तरफ चल दी…

 
मेने चाची को नंगा कर के उनकी भरी हुई, मस्त जवानी का लुफ्त लेते हुए एक बार जमकर छोड़ा, और उन्हें उनके मन्मुताविक खुशी देकर अपने घर आ गया.

रात के खाने पर यही सब चर्चा होती रही, सभी लोग अपनी अपनी तरह से समझाते रहे मुझे,

कैसे रहना है, क्या खाना है, क्या नही खाना है… अपनी पढ़ाई पर ध्यान रखना है, इधर-उधर की बातों से बचना है.. यही सब बातें.

फिर सब सोने चले गये, मे भी अपने कमरे आकर बेड पर लेट गया, और भविश्य के बारे में सोचने लगा…

नींद तो आँखों से कोसों दूर थी…बस पड़ा था कमरे की छत को घूरते हुए…

लगभग 11 बजे भाभी मेरे कमरे में आईं, गेट लॉक कर के वो जैसे ही मेरी तरफ पलटी, मे उन्हें देखता ही रह गया…

मात्र एक मिनी गओन, जिसमें से उनका मादक दूधिया बदन छलक पड़ने को तत्पर दिखाई दे रहा था…

उनकी आँखों में अपने लाड़ले से बिछड़ने की उदासी साफ-साफ दिखाई दे रही थी..उन्हें देखते ही मे उठ कर बेड के सिरहाने से टेक लेकर बैठ गया…

हल्के कदमों से बढ़ती हुई वो मेरे बेड तक आईं, और बेड के साइड में खड़े होकर उन्होने अपना वो नाम मात्र का गाउन भी अपने बदन से सरका दिया…

भाभी की आँखें नम थी, जिन्हें देखकर मे भी बेड से नीचे उतरकर उनके सामने खड़ा हो गया….

मेने उनके हाथ को अपने हाथ में लेकर पूछा – भाभी आप यहाँ मेरे कमरे में और इस तरह… भैया को छोड़कर… वो क्या सोच रहे होंगे…?

वो अपनी रुलाई पर काबू करते हुए बोली – तुम्हें बस अपने भैया की फिकर है…मुझ पर क्या बीत रही है, इसका कोई अंदाज़ा नही है…

तुम उनकी फिकर छोड़ो, उन्हें मेने नींद की गोली देकर सुला दिया है, अब वो सुबह से पहले नही उठेंगे…

उनकी बात सुनकर मेने उनके चेहरे को अपने हाथों में लेकर उनके लरजते होंठों पर अपने होंठ रख दिए… और एक गमगीन सा किस लेकर कहा…

मुझे पता है भाभी की आप पर क्या बीत रही है…, मे खुद नही समझ पा रहा हूँ, कि आपके बिना इतने साल मे कैसे रह पवँगा..?

भाभी मेरे सीने से लिपटकर फुट-फूटकर रोने लगी… मत जाओ लल्ला.. नही रह पाउन्गी मे तुम्हारे बिना…

मेने उनके नंगे बदन को सहलाते हुए कहा – मे भी नही चाहता भाभी…आप बाबूजी को समझाओ ना… यहीं पास के शहर में रहकर कुछ कर लूँगा…

कुछ देर सुबकने के बाद वो मुझसे अलग हुई… फिर अपने आँसू पोन्छ्कर बोली – अब कुछ नही हो सकता लल्ला, मे बाबूजी से क्या कहूँगी… नही..नही…तुम जाओ, रह लेंगे तुम्हारी यादों के सहारे…

मे नही चाहती की, मेरी वजह से तुम अपना भविश्य बरवाद करो…और तुम्हें भी अपना जी कड़ा करना होगा…

इसलिए मे तुम्हारे भैया को सुला कर तुम्हारे सामने इस अवस्था में खड़ी हूँ, कि आने वाले कुछ सालों के लिए इस रात को यादगार बना सकूँ,

आओ मुझमें समा जाओ मेरे प्रियतम… मेरे दिलवर…. मेरे लाड़ले देवर…

ये कहकर वो मुझसे किसी बेल की तरह लिपट गयीं, और मेरे चेहरे पर जगह जगह अनगिनत चुंबन ले डाले…

उन्हें बाहों में समेटे, मे पलग पर ले आया और फिर मेने उनके बदन पर उपरर से नीचे तक चुंबनों की बौछार करदी…

वो जलबिन मछली की तरह पलंग पर पड़ी तड़पने लगी…, अपनी आँखें मीचे छन-प्रतिछन वासना की तरफ बढ़ने लगी…

चूमते हुए मे उनकी टाँगों के बीच आ गया और उनकी चिकनी चमेली को हाथ से सहला कर उनकी चुचियो को चूस लिया…

आआहह…..सस्स्सिईईईईईईईईईई….लल्लाआ….मुझे खूब सराअ…प्यार चाहिए…आजज्ज….हहुऊन्न्ं…

जब मेने उनकी रस गागर के मुँह पर अपनी जीभ लगाई… भाभी की कमर बुरी तरह से थिरकने लगी… मे अपनी एक उंगली चूत के अंदर डालकर उनकी क्लिट को चूसने लगा…

आआययईीीई….म्म्मा आ….चूसूऊ…आअहह…खा…जाओ… उन्होने मेरे सर को अपनी चूत पर दबा दिया और अपनी गान्ड को हवा में लहराते हुए झड़ने लगी.

भाभी ने मेरे बालों को पकड़कर अपने ऊपर खींचा, और मेरे होंठों को चूस्ते हुए बोली – तुम सच में जादूगर हो लल्ला… अब पता नही ऐसा मज़ा कब मिलेगा मुझे….?

मेने उनके आमों को सहलाते हुए कहा – ये सब आपने ही तो सिखाया है भाभी...

सच कहूँ तो इतना सकुन मुझे और कहीं नही मिलता, जितना आपके आगोश में मिलता है… आप ही मेरे लिए सब कुछ हो,

मेरी गुरु, मेरी प्रेयशी, मेरी भाभी, मेरी माँ…सब कुछ… आप हैं, तो मे हूँ, वरना आपके बिना मेरा कोई वजूद नही…

भाभी ने मेरे नीचे लेते हुए, मेरे शेर को अपने हाथ में लेकर अपनी रसीली के मुँह पर रखा और अपनी टाँगों को मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेटकर कस लिया…

मेरा लंड सरसरकार उनकी गीली चूत में चला गया….

सस्स्स्सिईईईईईईई…..आअहह….इतना प्यार करते हो अपनी भाभी से… उउफफफ्फ़…. रजाअ.. मत करो इतना प्यार…की ये मोहिनी कहीं मर ही ना जाए तुम्हारी जुदाई में…

भाभी के शब्द उनके मुँह में ही जप्त रह गये, क्योंकि मेने अपने होंठ जो टिका दिए उनके होंठों से… और अपनी कमर को और ज़ोर से दबा दिया….

मेरा पूरा लंड उनकी बच्चेदानी के मुँह तक दस्तक देने लगा… भाभी अपार सुख की सीमा लाँघ गयी… और ज़ोर से उन्होने मुझे अपने बदन से कस लिया….

मेने जैसे ही अपने मूसल को सुपादे तक बाहर लेकर एक जोरदार धक्का मारा…

उन्होने अपने दाँत मेरे कंधे में गढ़ा दिए.. और जोरदार सिसकारी भरते हुए अपनी कमर और ऊपर कर के मेरे शेर को गहरे और गहरे तक अपनी मान्द में समा लिया…

आज भाभी के साथ सेक्स करने में कुछ अलग सी ही फीलिंग हो रही थी, वो मशीनी अंदाज में अपनी कमर को झटके दे देकर चुदाई के मज़े को दुगना-तिगुना करने की कोशिश में लगी थी…

रात के अंतिम पहर तक भाभी मेरे पास ही रहीं, उनका मन ही नही था अलग होने का… लेकिन सामाजिक बाँधों में जकड़े उदास मन.. एक दूसरे से जुदा होना ही पड़ा..

उस रात मेरी माँ, मेरी अबतक की हमसफर, मेरी जान, मेरी सब कुछ, मोहिनी भाभी ने उस रात दिल्खोल कर अपने लाड़ले देवर को प्यार दिया…

मे उनके प्यार से सराबोर होकर, अपने परिवार की यादों को अपने साथ समेटे हुए, दूसरे दिन देल्ही लॉ की पढ़ाई करने के लिए निकल पड़ा….!

 
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चार साल बाद ....................

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आज मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी का दिन था… क्योंकि पूरे 4 साल के बाद मे अपने घर वापस जा रहा था,

बीते 4 सालों से मे देल्ही में रहकर एलएलबी की पढ़ाई करता रहा था…, इस बीच रामा दीदी के यहाँ भी जाता रहा, लेकिन धीरे-2 वो भी बंद सा हो गया…

पिच्छले एक साल से एक जाने माने लॉयर के अंडर में मेने प्रॅक्टीस की, जिनसे मेने लॉ की बारीकियों को अच्छे से जाना था…

आज अपने गुरु प्रोफ़ेसर. राम नारायण जो उसी लॉ कॉलेज में प्रोफेसर भी हैं, उनसे पर्मिशन लेकर मे अपने घर जा रहा था…

ट्रेन में बैठा मे अपने बीते हुए दिनो को याद कर रहा था… साथ ही अपनी भाभी और प्यारी भतीजी रूचि से मिलने की एग्ज़ाइट्मेंट, …

बाबूजी और भैया का स्नेह और आशीर्वाद मिलने वाला था मुझे आज.

बीते कुछ दिनों में निशा से भी कोई बात नही हो पाई थी.., मेने कितनी ही बार उसके घर फोन किया, लेकिन लगा ही नही,

ना जाने वो क्या कर रही होगी आजकल, … फिर अचानक एक अंजानी सी आसंका ने मुझे घेर लिया…

कहीं उसके घरवालों ने उसकी शादी ना करदी हो…ये सोचकर ही मेरे शरीर में एक अंजाने डर की लहर दौड़ गयी… और मे बैचैन हो उठा…

इधर कुछ दिनो से मेरे घरवालों ने भी एक तरह से मुझसे संबंध सा ही ख़तम कर लिया था…

बस महीने के महीने मुझे खर्चा मिल जाया करता था, वो भी मनी ऑर्डर के ज़रिए….

मे जब भी फोन करता, लाइन मिलती, और मेरी आवाज़ सुनते ही कट कर दिया जाता...

जब पिछले कई महीनों से कोई खैर खबर नही मिली, तो मे बैचैन रहने लगा, जिसे प्रोफ़ेसर साब ने भाँप लिया और पुच्छ बैठे…

जब मेने सारी बात उन्हें बताई, तो उन्होने ही मुझे घर जाकर पता करने की बात कही…

फिर मेरी सोचों पर भाभी ने कब्जा कर लिया, उनके साथ बिताए वो स्वर्णिम दिन याद आने लगे, भाभी ने मेरी खुशी को कैसे अपनी जिंदगी ही बना लिया था…,

प्यार और स्नेह के साथ साथ उन्होने मुझे दुनियादारी भी सिखाई थी…, एक तरह से उन्होने ही मुझे इस काबिल बनाया था, मे उनके त्याग और ममता का ऋण कैसे उतार पाउन्गा…?

अपनी सोचों में गुम मुझे पता भी नही चला, कब मेरा स्टेशन आ गया…जब गाड़ी खड़ी हुई, तब जाकर मेरी सोचों पर भी ब्रेक लगे…

मेने लोगों से स्टेशन के बारे में पूछा.., हड़बड़ा कर मेने अपना बॅग लिया और डिब्बे से बाहर आया…

यहाँ से मुझे अपने घर तक बस से ही जाना था… जो करीब 1 घंटे बाद निकलने वाली थी…

मे जब अपने घर की चौपाल पर पहुँचा … जहाँ किसी समय बाबूजी की मौजूदगी में लोगों की जमात लगी होती थी वहीं आज सन्नाटा सा पसरा हुआ था..

बैठक का दरवाजा तो खुला था… इसका मतलव बाबूजी बैठक में हैं… लेकिन इतनी शांति क्यों है…

मे धड़कते दिल से बैठक के गेट पर पहुँचा… अंदर बाबूजी अकेले अपनी ही सोच में डूबे हुए आराम कुर्सी पर बैठे झूल रहे थे…,

वो आज मुझे कुछ थके-थके से दिखाई दिए.

मुझे सामने देखकर वो झटके से खड़े हो गये, मेने जाकर उनके पैर छुये, उन्होने मेरे सर पर हाथ फेर्कर आशीर्वाद दिया…

बाबूजी ने मुझे अपने गले से लगा लिया…, ना जाने क्यों उनकी आँखों से दो बूँद टपक कर मेरे कंधे पर गिरी…

मेने उनकी तरफ देखा… तो वो रुँधे गले से बोले… जा बेटा घर जाकर फ्रेश होले.. हारा थका आया है… थोड़ा आराम करले.. फिर बैठेंगे साथ में…

मे उनके पास से उठ कर अपना बॅग उठाए घर के अंदर पहुँचा…मेरी बिटिया रानी मेरी भतीजी… रूचि जो अब काफ़ी बड़ी हो गयी थी.. आँगन में खेल रही थी..

मुझे देखते ही दौड़कर मेरे पैरों से लिपट गयी… और चिल्लाते हुए बोली –

चाचू आ गये…. मम्मी… मौसी… देखो चाचू आ गये…

उसकी आवाज़ सुनकर भाभी और निशा दौड़ कर बाहर आई… मुझे देखते ही भाभी ने मुझे अपने कलेजे से लगा लिया… लाख कोशिशों के बाद भी उनकी रुलाई फुट पड़ी.. और उनकी आँखें बरसने लगी…

उनके पीछे खड़ी निशा भी रो रही थी…

 


मेने भाभी के कंधों को पकड़ कर उनसे कहा – क्या भाभी ! अपने लाड़ले का आँसुओं से स्वागत करोगी.. अब तो मे आ गया हूँ ना ! फिर ये आँसू क्यों..?

उन्होने अपने ऊपर कंट्रोल किया और बोली – ये तो मेरे खुशी के आँसू थे जो 4 साल से रुके पड़े थे… तुम्हें देखते ही कम्बख़्त दगा दे गये.. और छलक पड़े…

जाओ तुम पहले फ्रेश हो जाओ… फिर निशा की तरफ मुड़कर बोली… जा निशा लल्ला के लिए चाय नाश्ते का इंतज़ाम कर, ये थके हारे आए हैं..

भाभी मेरे हाथ से बॅग लेकर मेरे कमरे में चली गयी.. उनके साथ-2 रूचि भी थी.…

मे जब बाथरूम से लौट रहा था… तब रूचि भाभी से पुच्छ रही थी…

मम्मी..! आपने चाचू से झूठ क्यों कहा…? उन्हें सच क्यों नही बताया कि आप और मौसी क्यों रो रही थी ?

भाभी – नही बेटा ! चाचू अभी थके हुए हैं ना ! इसलिए मम्मी उन्हें परेशान नही करना चाहती थी… इसलिए..

रात को जब पापा आजाएँगे ना, तब दादू और हम सब मिलकर चाचू को बताएँगे… अभी तू चाचू को कुछ मत बताना.. ठीक है, मेरा अच्छा बच्चा..

रूचि ने हां में गर्दन हिला दी… लेकिन इन बातों ने मुझे अंदर तक हिला दिया था… ना जाने ऐसा क्या हुआ है यहाँ…? और ये निशा यहाँ क्यों हैं..?

अब मुझे चैन नही पड़ रहा था..मेरे अंदर उथल-पुथल होने लगी, मुझे किसी उन्होनी का आभास सा हो रहा था.

मे जानना चाहता था.. कि आख़िर ऐसा क्या हुआ है.. जिससे सब लोग दुखी हैं..

पर जब भाभी एक बार बोल चुकी हैं कि वो मुझे परेशान नही करना चाहती..

तो मे भी अब उनको पुच्छ कर उनकी परेशानी नही बढ़ाउंगा….. , ये सोचकर मे किचन की ओर बढ़ गया…

किचन में निशा मेरे लिए चाय बना रही थी.. मेने उसके पास जा कर उसको आवाज़ दी – निशु…!

मेरी आवाज़ सुनते ही वो पलट कर मेरे सीने से लिपट गयी और सूबकने लगी….

मेने उसकी पीठ को सहलाते हुए कहा – हुआ क्या है यहाँ…? मुझे कुछ बताओ तो सही…

ये सुनकर वो एक झटके में मुझसे अलग हो गयी… और अपने आँसू पोन्छते हुए बोली –

मे आपको कुछ भी नही बता पाउन्गि… प्लीज़ मुझसे कुछ मत पुछिये….

मेने झल्लाकर कहा… आख़िर बात क्या है.. तुम बता नही सकती, भाभी बताना नही चाहती… लगता है आप लोग मुझे पागल बनाक छोड़ोगे…

तभी वहाँ भाभी आ गयी… और बोली – थोड़ा सा इंतेज़ार कर लो लल्ला.. प्लीज़ अपने भैया को भी आ जाने दो…फिर बात करते हैं.. हां..!

मे – लेकिन भैया हैं कहाँ…? रात होने को आई.. अभी तो कॉलेज भी बंद हो गया होगा…

भाभी – वो थोड़ा शहर गये हैं, आते ही होंगे… अभी हम ये बात कर ही रहे थे.. कि भैया की गाड़ी की आवाज़ सुनाई दी.. रूचि भागते हुए बाहर गयी…

कुछ देर बाद भैया भी आ गये… मेने उनके पैर छुये, तो उन्होने मुझे आशीर्वाद दिया…

कुछ देर बाद उनके पीछे ही बाबूजी भी घर के अंदर आ गये… अब हम सब एक साथ बैठे थे…

बाबूजी ने भैया से पूछा… आज कुछ हुआ राम…?

भैया ने मेरी तरफ देखा… और बोले…, बाबूजी ! इससे पहले कि आज क्या हुआ… मे अपने भाई को सब कुछ साफ-2 बता देना बेहतर समझता हूँ…

भैया - छोटू ! मेरे भाई मुझे पता है, कि घर के बदले हुए हालत देख कर इसके बारे में जानने को तू उत्सुक है.. और मे आज कहाँ से आरहा हूँ…?

तो सुन , मोहिनी का भाई राजेश इस समय जैल में है… उसपर इरादतन कत्ल करने का संगीन इल्ज़ाम है.. दफ़ा 307 के तहत उसे जैल में डाला हुआ है,

पिच्छले 6 महीनों से धक्के खाने के बाद भी अभी तक उसकी जमानत नही हो सकी है..

भैया की बात सुन कर मेरा मुँह खुला का खुला रह गया… मेरे मुँह से आवाज़ तक नही निकली….

मेरी ऐसी अवस्था देख कर उन्होने मेरा हाथ पकड़ते हुए आगे कहना शुरू किया – ये क्यों हुआ… कैसे हुआ… मेरे ख़याल से ये सब आगे निशा ही बताए तो ज़्यादा सही होगा…

भैया की बात सुन कर मेने निशा की तरफ देखा… जो गर्दन झुकाए..बस रोए जा रही थी…..

बहुत देर की चुप्पी के बाद बाबूजी बोले – बता दे बेटी… तेरे ऊपर जो बीती है.. वो तुझसे अच्छा और कॉन बता सकता है… !

मे लगभग चीख ही पड़ा – क्या……? क्या हुआ था निशा के साथ..?

बोलो निशा ! क्या हुआ था तुम्हारे साथ……

निशा तो बस रोए ही जा रही थी, उसकी हालत देखकर लग रहा था कि वो कुछ भी बताने की स्थिति में नही है…

मेरे सब्र का बाँध टूटने लगा था… सो ये भी भूल गया कि मेरे सामने कॉन-कॉन बैठा है…, और उसको कंधों से पकड़ का झकझोरते हुए बोला…

बताओ निशु ! मुझे सब कुछ सच सुनना है… तुम्हें अपने प्यार की कसम अब अगर अब भी तुम कुकच्छ नही बोली तो…मे तुम्हें कभी माफ़ नही करूँगा…

सब मेरे मुँह की तरफ देखने लगे… निशा किन्कर्तब्यविमूढ़ सी कुछ देर यौही बैठी सुबक्ती रही, मेरे इस तरह चीखने से उसकी रुलाई तो थम गयी थी, लेकिन फिर भी कुछ बोल नही पा रही थी,

फिर कुछ साहस बटोरकर सुबक्ते हुए वो अपनी आप बीती बताने लगी…!

 
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निशा की आप बीती –


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मेरी सहेली मालती… उसकी शादी एक साल पहले ठाकुर सुर्य प्रताप के बेटे भानु प्रताप से हुई थी.. अब ये क्यों हुई कैसे हुई.. इस बारे में हमें ज़्यादा कुछ मालूम नही पड़ा..

हां ! इतना पता है कि भानु के पिता खुद मालती के दादा के पास आकर उसका हाथ माँगने आए थे…

शादी बड़ी धूम धाम से हुई, मालती के दादा के पास भी ज़्यादा तो नही पर अच्छी-ख़ासी ज़मीन जयदाद है.. सो उन्होने अपनी पोती की शादी में कोई कसर नही रखी…

भानु कभी –2 मालती के साथ हमारे गाँव आता था, जैसे और वाकी के रिस्तेदार भी आते हैं…

6 महीने पहले.. एक दिन मालती हमारे घर आई.. और मुझे अपने साथ अपने घर ले गयी… उसके साथ घर पर उसका पति भी मौजूद था…

उसके दादा – दादी कहीं बाहर किसी रिस्तेदार के यहाँ गये हुए थे.. घर पर वो दोनो ही थे…

मालती ने मुझे चाय बना कर दी… उस चाय के पीने के कुछ देर बाद ही मेरा सर चकराने लगा… मेने मालती को ये बात बताई तो उसने कहा – वैसे ही सर चकरा रहा होगा.. तू बैठ मे अभी आती हूँ..

मे उसके रूम में बैठी थी… मेरी आँखें बार-2 बंद खुल रही थी… तो मे कुछ देर बाद उसी पलंग के सिरहाने से टेक लेकर बैठ गयी…

मेरी आँखें बंद थी… कि तभी किसी के हाथों का स्पर्श मेने अपने शरीर पर किया… मेने जैसे तैसे कर के अपनी आँखें खोली – देखा तो मालती का पति मेरे बदन को सहला रहा था..

मे झट से उठ खड़ी हुई… और मेने उससे कहा – जीजा जी ये आप क्या कर रहे हैं..? मालती कहाँ है…?

वो मक्कारी भरी हसी के साथ बोला – वो तो किसी पड़ोसी के यहाँ गयी है… और मेरा हाथ पकड़ कर बोला – मे अपनी साली साहिबा को प्यार कर रहा हूँ…

आओ रानी मेरे पास आओ.. और ये कह कर उसने मुझे अपनी बाहों में भरना चाहा…

मे किसी तरह उससे छूट कर वहाँ से बाहर जाने के लिए भागी.. लेकिन देखा तो गेट अंदर से बंद था…

इससे पहले कि मे दरवाजे को खोल पाती, कि उसने मुझे फिरसे पकड़ लिया.. और मेरे साथ ज़ोर जबर्जस्ती करने लगा… छीना झपटी में मेरे कपड़े भी फट गये..

जिन्हें वो और तार-तार करने लगा…

मे बेबस और लाचार, नशे से बोझिल हो रही आँखों को किसी तरह खोले हुए रखकर उसके बंधन से छूटने की जी तोड़ कोशिश करती रही…

निशा अपनी आप-बीती सुनाते हुए सुबक्ती जा रही थी…. वो हिचकी सी लेकर फिर आगे बोली –

उसी दिन मेरे निकलते ही भैया घर आए थे, उन्हें ऑफीस में बहुत अच्छा प्रमोशन मिला था, वो बड़े खुश थे और सबके लिए कुछ ना कुछ गिफ्ट लेकर आए थे…

घर आकर जब उन्होने मेरे बारे में पूछा तो माँ बाबूजी ने बताया कि मे मालती के यहाँ गयी हूँ…

जब काफ़ी देर हो गयी.. और मे घर नही लौटी.. अंधेरा घिरने लगा था,.. तो घर पर सब लोग चिंता करने लगे…

कुछ देर और इंतेज़ार करने के बाद भैया मुझे लेने उसके घर पहुँच गये…

घर में सन्नाटा पसरा हुआ था… वो उसके चौक में जाकर आवाज़ लगाने लगे…

उनकी आवाज़ सुन कर मे अपनी पूरी ताक़त जुटाकर चिल्लाते हुए मेने भैया को मदद के लिए पुकारा..

भानु ने मेरे गाल पर एक जोरदार चान्टा जड़ दिया… और गाली देते हुए बोला.. साली चिल्लाकर अपने भाई को बुलाना चाहती है… और फिर उसने मेरा मुँह दबा दिया…

भैया ने मेरी आवाज़ सुन ली थी… वो गेट खटखटने लगे… और साथ ही साथ मुझे आवाज़ भी देते जा रहे थे…

भानु का थोड़ा ध्यान गेट की तरफ भटका… मेने मौके का फ़ायदा उठा कर उसके हाथ को बुरी तरह काट लिया… वो चीखते हुए दर्द के मारे ज़मीन पर बैठ गया…

इतने में मेने भाग कर गेट खोल दिया… और मे भैया से लिपट कर रोने लगी…

मेरे कपड़े फट चुके थे.. होंठों से खून रिस रहा था..मेरी हालत देख कर भैया की आँखें गुस्से से लाल हो उठी..

उन्होने मेरी पीठ सहलाते हुए.. मुझे अपने पीछे खड़ा किया और गुर्राते हुए भानु तरफ बढ़े….

तूने ये अच्छा नही किया हरम्जादे…, मेरी बहन की इज़्ज़त पर हाथ डालकर अपनी आफ़त मोल ले ली है तूने…

इससे पहले की वो उस तक पहुँच पाते… भानु के हाथों में ना जाने कहाँ से एक लंबा सा चाकू लहराने लगा…

उसने चाकू का बार भैया के ऊपर करना चाहा…,लेकिन उन्होने अपने आप को बचाते हुए उसकी चाकू वाले हाथ की कलाई थाम ली…

अब वो दोनो एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था हो चुके थे… कभी लगता की चाकू भैया की तरफ मूड गया, तो कुछ देर बाद उसका रुख़ भानु की ओर हो जाता…

मे खड़ी – 2 डर से थर-थर काँप रही थी…, मे किकरतव्यविमूढ़ सी कभी उसकी तरफ देखती, तो कभी भैया की तरफ…

उन दोनो में बहुत देर तक जद्दो जहद चलती रही, भानु की कोशिश थी कि वो चाकू का वार भैया पर कर सके, लेकिन उनकी मजबूत पकड़ उसकी कलाई पर बनी हुई थी…

फिर कुछ ऐसा हुआ कि चाकू वाला हाथ दोनो के बीच आ गया… और एक भयंकर चीख कमरे में गूँज उठी..

भानु का चाकू उसकी अंतड़ियाँ फाड़ते हुए उसकी पसलियों में जा घुसा था…

वो धडाम से फर्श पर गिर पड़ा.. चाकू उसके पेट में घुसा पड़ा था… भैया के कपड़े उसके खून से सन गये थे…

 
मे दौड़ कर भैया से जा लिपटी और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी… उन्होने मुझे चुप करते हुए वहाँ से निकल चलने को कहा…

अभी हम वहाँ से निकलने ही वाले थे कि तभी वहाँ मालती आ गयी.. वहाँ का मंज़र देखकर वो चीखने चिल्लाने लगी…

उसकी चीखें सुन कर मोहल्ले के लोग इकट्ठा हो गये…

उन्होने मेरी हालत देखी और फिर उनकी नज़र ज़मीन पर पड़े भानु के घायल शरीर पर पड़ी, जो दर्द से तड़प रहा था…

इतने में किसी ने पोलीस को इत्तला कर दी.. पोलीस ने आव ना देखा ताव… भैया को हथकड़ी लगा दी और अपने साथ थाने ले जाकर हवालात में बंद कर दिया…

इतना कहते-2 निशा बुरी तरह रोने लगी… भाभी उसे अपने से लिपटकर शांत करने की कोशिश करने लगी…

निशा की कहानी सुनकर मेरी हालत किसी लकवे के मरीज़ जैसी हो गयी, मे समझ नही पा रहा था, कि मुझे किस तरह से रिएक्ट करना चाहिए…

एक तरफ भानु और मल्टी के प्रति गुस्से का भाव भी था, तो दूसरी तरफ राजेश को बाहर निकालने की बैचैनि…

कुछ देर सबके बीच चुप्पी छाइ रही, फिर उसको तोड़ते हुए भैया ने आगे कहना शुरू किया…

हमने पोलीस को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन शायद वो शुर्य प्रताप के रुआब के कारण हमारी बात अनसुनी करते रहे… और उन्होने राजेश के ऊपर इरादतन हत्या की कोशिश करने का चार्ज लगा कर दफ़ा 307 के तहत जैल भेज दिया…

मेने किसी तरह अपने मनोभावों पर काबू करते हुए पूछा – आपने कृष्णा भैया को ये बात नही बताई…? उन्होने कुछ नही किया..

भैया – कहा था… उसने शुरुआत में तहकीकात भी की… लेकिन फिर पता नही क्यों वो भी पीछे हट गया…

और ये कह कर पल्ला झाड़ लिया कि एक बार चार्ज शीट फाइल हो गयी.. और अपराधी को जैल भेज दिया तो फिर कोर्ट से ही अब कुछ हो पाएगा…

तबसे लेकर आज तक मेने और मोहिनी के पिताजी ने खूब जी तोड़ कोशिश की… लेकिन हम राजेश की जमानत तक नही करवा पाए हैं…

मे – आपने किसी वकील से बात की…? कोई हाइयर किया है…?

भैया – हां बात की थी एक वकील से लेकिन थोड़ी बहुत खाना पूर्ति कर के वो भी पीछे हट गया…

इस डर से की भानु या उसका बाप निशा को और कोई नुकसान ना पहुँचा दे हम उसे यहाँ ले आए…

इसके लिए भी कृष्णा ने बाबूजी पर दबाब डाला कि, एक मुजरिम की बेहन को यहाँ क्यों रखा है…,

तब तेरी भाभी ने बाबूजी को बताया कि निशा इस घर की धरोहर है… इसे तेरे सुपुर्द करने की हमारी ज़िम्मेदारी है…

अब तक हमने ये ज़िम्मेदारी जैसे-तैसे निभाई है मेरे भाई… अब तू इसे संभाल आज से ये तेरी ज़िम्मेदारी है…

मेने हैरत से भैया की तरफ देखा, तो वो बोले… हमें तेरी भाभी ने सब कुछ बता दिया है.. इसी वजह से इसके माँ-पिताजी ने इसकी शादी नही की थी.. वरना ये नौबत ही नही आती…

मेने भभक्ते लहजे मे कहा – भैया ! अब मे निशा से शादी तभी करूँगा… जब इसका भाई खुद इसे अपने हाथों से विदा करेगा… तब तक ये आपकी ही ज़िम्मेदारी रहेगी…

भैया – ये तू क्या कह रहा है मेरे भाई… हम अपनी पूरी कोशिश कर के थक चुके हैं, अब तो एक तरह से आस ही छोड़ दी हैं हमने…

मेने उनसे ठहरे हुए लहजे में कहा – ठीक एक हफ्ते में राजेश भाई हमारे पास होंगे, ये मेरा वादा है आप सबसे.. उसके बाद ही मे और निशा एक होंगे…

मेरी बात सुन कर सभी मुँह बाए मेरी तरफ देखने लगे…, मेने उनसे कहा – इसमें इतना चकित होने की क्या बात है.. ?

क्या आप भूल गये, बाबूजी ने ऐसे ही कुछ मौकों के लिए मुझे लॉ करने के लिए कहा था.... अब आगे कैसे और क्या करना है वो आप सब मुझ पर छोड़ दीजिए….

अब मे भानु को ही नही, पोलीस को भी क़ानून का वो सबक सिखाउन्गा कि कुछ समय तक याद रखेंगे..

मेरे इतना कहने से सबके चेहरों पर आशा की एक किरण दिखाई देने लगी….!

निशा की रुलाई अब थम चुकी थी, और अब वो अपने मन में एक शांति सी अनुभव कर रही थी.

भाभी ने अपने आँसू पोन्छ्ते हुए मेरे माथे को चूम लिया…., उनके चेहरे से अब चिंता की सारी लकीरें मिट चुकी थी…

जैसे उन्हें अब पूर्ण विश्वास हो गया हो, कि उनका लाड़ला देवर अब सब कुछ ठीक कर देगा..….!

कस्बे में कॉलेज के समय के मेरे बहुत सारे ऐसे दोस्त थे जो किसी के बिना दबाब में आए मेरा साथ देते रहे थे.…

मेने अपनी उन्हीं सोर्स से पता किया कि इस समय मालती और भानु कहाँ हैं…? और क्या कर रहे हैं…?

दो घंटे में ही मुझे उनके बारे मे पता चल गया.

ठीक होने के बावजूद भी भानु ड्रामा कर के शहर के हॉस्पिटल में ही पड़ा हुआ है…

उसकी पत्नी मालती भी शहर में उसके शहर वाले घर पर ही रहती है..

दिखावे के लिए कि वो उसकी सेवा कर रही है.. लेकिन वो दोनो वहाँ ऐश कर रहे हैं…

जब मर्ज़ी होती है, घर आ जाते हैं, जब मर्ज़ी होती है.. हॉस्पिटल में भरती हो जाता है, पैसे और पवर का इस्तेमाल कर के डॉक्टर भी मन मर्ज़ी रिपोर्ट बनाकर दे देता है.

ये इन्फर्मेशन मेरे लिए किसी रामबाण से कम नही थी, बस फिर क्या था, अपनी बुलेट रानी उठाई, जो बेचारी सालों से धूल में पड़ी अपने असली राजा के इंतजार में बस खड़ी थी…,

उसकी सॉफ सफाई की, और निकल लिया शहर की तरफ………………….

शहर का नामी गिरामी सहयोग हॉस्पिटल, जहाँ की डॉक्टर. वीना जैन, निहायत ही सुंदर और परफेक्ट फिगर की मालिकिन, जिसकी शादी को कुछेक ही साल हुए थे…

पति पत्नी दोनो ही इसी हॉस्पिटल में डॉक्टर हैं.., वो इस समय अपने कॅबिन में बैठी मरीजों को चेक कर रही थी…

नंबर बाइ नंबर मरीज आते वो उन्हें चेक करती…और मर्ज़ के मुतविक उन्हें प्रिस्क्रिप्षन लिख देती..

मे आइ कम इन डॉक्टर…! अगले मरीज़ ने जब अंदर आने की पर्मिशन माँगी.. तो डॉक्टर वीना ने अपनी शरवती आँहें उठाकर आवाज़ की दिशा में देखा…

आगंतुक को देखते ही वो उसकी पर्सनॅलिटी मे जैसे खो ही गयी… 6’2” की हाइट… गोरा रंग.. उँचे कंधे… चौड़ा विशाल सीना. वेल शेप्ड सीने के नीचे का बदन..

लाल रंग की फिटिंग वाली एक टीशर्ट और जीन्स में वो किसी कामदेव की तरह उसके गेट से धीरे-2 उसकी टेबल की तरफ बढ़ रहा था… वो मंत्रमुग्ध होकेर उसकी मर्दानी चाल में खो सी गयी…

एक्सक्यूस मी डॉक्टर ! युवक ने जब उसके सामने खड़े होकर कहा – तो जैसे वो नींद से जागी हो… और झेन्प्ते हुए बोली – यस प्लीज़…,

एर अपने सामने पड़ी चेयर पर बैठने का इशारा करते हुए बोली – व्हाट कॅन आइ डू फॉर यू…मिस्टर्र्र्र्र्र्र्र्ररर…

माइ नेम ईज़ अंकुश शर्मा ! कुछ दिनो से मे एक अजीब से दर्द से परेशान हूँ..

वीना – कहाँ पर है ये पेन…?

अंकुश (मे) – डॉक्टर, वो मेरी नबल के नीचे होता है.. और कभी – 2 इतना तेज होता है जैसे ये मेरी जान ही निकाल देगा…

वीना – चलिए वहाँ चेक-अप टेबल पर लेट जाइए.. और हां अपनी टीशर्ट उतार देना..

मेने अपनी टीशर्ट उतार कर वहीं चेक-अप टेबल के पास पड़े स्टूल पर रख दी…

 
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