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लाल हवेली (एक खतरनाक साजिश)

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”वहीं पहुँचकर मालूम कर लेना। मुझे तो वो लड़की पूरी पागल नजर आती है। बड़ी अजीबो-गरीब बातें करती है। कहती है रात के वक्त उसकी हवेली में नर कंकाल घूमते हैं, हमने कई दफा उसके कहने पर इंक्वायरी भी की मगर हमारे हाथ कुछ नहीं लगा।“

”आप भूत-प्रेतों पर यकीन करते हैं?“

”नहीं।“

”इसके बावजूद आप इंक्वायरी के लिए लाल हवेली चले गये।“

”डियुटी जो करनी थी भई, उसका बाप यहां ‘वीआईपी‘ का दर्जा रखता था, मैं उसकी कंप्लेन को इग्नोर नहीं कर सकता था।“

”अब आपकी फाइनल ओपनीयन ये है कि उसका दिमाग हिला हुआ है?“

”ठीक समझ रहे हो। एक महीने पहले बाप के साथ हुए हादसे का उसके दिमाग पर कोई गहरा असर हुआ मालूम पड़ता है। लगता है उसका कोई दिमागी स्क्रू ढीला पड़ गया है, तभी वो यूँ बहकी-बहकी बातें करती है।“

”ओह।“

”तुमने जो कुछ अपने बारे में बताया क्या उसे साबित कर सकते हो?‘‘

‘‘करना ही पड़ेगा जनाब क्योंकि अपनी रात हवालात में खोटी करने का मेरा कोई इरादा नहीं है।“

‘‘समझदार आदमी हो।‘‘

‘‘दुरूस्त फरमाया जनाब, आदमी तो खैर ये बंदा जन्म से ही है, अलबत्ता समझदार बनने में पच्चीस साल लग गये।‘‘

मैंने उसे अपना ड्राइविंग लाइसेंस और डिटेक्टिव एजेंसी का लाइसेंस दिखाया।

वो संतुष्ट हो गया।

”बाहर चौराहे पर तुमने गोली क्यों चलाई थी?“

”आत्मरक्षा के लिए।“

”मतलब?“

”किसी ने मेरी जान लेने की कोशिश की थी, मजबूरन मुझे जवाबी फायर करना पड़ा।“

”ली तो नहीं जान।“

”मेरी किस्मत जो बच गया, मुझपर पर चलाई गयी तीन-तीन गोलियों के बाद भी बच गया।“

”काफी अच्छी किस्मत पाई है तुमने नहीं?“

”जी हाँ-जी हाँ।“ - मैं तनिक हड़बड़ा सा गया। जाने किस फिराक में था वह पुलिसिया।

”वो तुम्हारी जान क्यों लेना चाहते थे?“

”मालूम नहीं।“

”भई जासूस हो कोई अंदाजा ही बता दो।“

”शायद वो मुझे लूटना चाहते थे।“

मेरी बात सुनकर वो हो-हो करके हँस पड़ा।

”क्या हुआ?“ मैं सकपका सा गया।

”भई अपने महकमे में एक सीनियर और काबिल इंस्पेक्टर समझा जाता है मुझे और इत्तेफाक से ये कोतवाली भी मेरे अंडर में ही है। जबकि तुम तो लगता है मुझे कोई घसियारा ही समझ बैठे हो।“

”मैंने ऐसा कब कहा जनाब?“

‘‘कसर भी क्या रह गई? भला लूटने का ये भी कोई तरीका होता है कि पहले अपने शिकार को गोली मार दो और बाद में उसका माल लेकर चम्पत हो जाओ।“

”नहीं होता!“

”हरगिज भी नहीं, अगर उनका इरादा तुम्हें लूटने का होता तो वे तुम्हें पहले धमकाते, बाद में न मानने पर यदि गोली चलाते तो बात कुछ समझ में आती। बजाय इसके उन लोगों ने सीधा तुम पर फायर झोंक दिया। इसके केवल दो ही अर्थ निकाले जा सकते हैं या तो हमलावर तुम्हें डराना चाहते थे या फिर तुम्हारी जान लेना चाहते थे।“

”यूँ ही खामखाह।“

”ये बात तुम मुझसे बेहतर समझते हो, जहाँ तक मेरा अनुमान है तुम्हे हवेली में रह रही उस दूसरी लड़की ने यहां बुलाया है, निश्चय वो तुम्हारी कोई जोड़ीदार है। हवेली में फैले अफवाहों को तुम कैसे दूर करते हो, कथित भूत-प्रेतों, नरकंकालों से कैसे निपटते हो मैं नहीं जानना चाहता। मगर इतनी चेतावनी जरूर देना चाहता हूँ कि उस पागल लड़की की बातों पर यकीन करके बेवजह शहर में इंक्वायरी करते मत फिरना, जो की यहां पहले से पहुंची तुम्हारी जोड़ीदार कर रही है। जो भी करना सोच-समझकर करना। इस इलाके का एक दस साल का बच्चा भी गोली चलाकर किसी की जान लेने कि हिम्मत रखता है। इसलिए सावधान रहना, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि किसी बाहर से आये हुए व्यक्ति के साथ यहाँ कोई हादसा घटित हो।“

”आप मुझे डरा रहे हैं।“

”नहीं! अपना भला-बुरा तुम खुद समझो।“

”सलाह का शुक्रिया जनाब, अब आप बराय मेहरबानी मेरी रिवाल्वर मुझे वापस कर दीजिये।“

”अरे हाँ“ - वो चौंकता हुआ बोला - ”उसे तो मैं भूल ही गया था।“

”मगर मैं नहीं भूला था।“

”रिवाल्वर तुम्हारी है।“

”हाँ, इसका लाइसेंस भी मेरे पास है, अगर आप देखना चाहें तो.......।“

”रहने दो मुझे तुम पर ऐतबार है।“

कहते हुए उसने मेरी रिवाल्वर मुझे वापस कर दी।

”शुक्रिया, क्या बंदा आपका नाम जानने की गुस्ताखी कर सकता है?“

”जसवंत‘‘ - वह बोला - ‘‘इंस्पेक्टर जसवंत सिंह।“

मैं उठ खड़ा हुआ।

”जर्रानवाजी का बहुत-बहुत शुक्रिया जनाब, अब बंदे को इजाजत दीजिए।“

”जा रहे हो।“

”जी हाँ।“

”अगर तुम चाहो तो मैं किसी को लाल हवेली तक तुम्हारे साथ भेज दूँ।“

”जी नहीं शुक्रिया।“

”बाहर खड़ी कार तुम्हारी अपनी है।“

”जी नहीं उधार की है।“

”मजाक कर रहे हो।“

”सच कह रहा हूँ।“

कहने के पश्चात मैं मुड़ा और उस अजीबो-गरीब बर्ताव करने वाले कोतवाली इंचार्ज को एक उंगली का सेल्यूट देकर मैं खुले दरवाजे से बाहर निकल गया।

अजीब पुलिसिया था, सब ताड़े बैठा था, हैरानी थी कि डॉली के बारे में भी उसे सब पता था।

हालात अच्छे नहीं लग रहे थे।
 
दस मिनट पश्चात मैं लाल हवेली के सामने खड़ा था, डॉली ने उसका वर्णन ही कुछ यूं किया था कि उसे पहचानने में कोई भूल हो ही नहीं सकती थी।

रिहायशी इलाके से अलग-थलग लाल हवेली आसमान में सिर उठाये खड़ी थी। लाल हवेली को देखकर बाहर से यह अंदाजा लगा पाना कठिन था कि उसके भीतर कोई रहता भी होगा। सामने लकड़ी का दो पल्लों वाला कम से कम बीस फीट ऊंचा खूब बड़ा दरवाजा था, जो कि बाउंडरी से थोड़ा ऊंचा उठा हुआ था। दाईं ओर वाले पल्ले में एक छोटा दरवाजा बना हुआ था, जो पैदल आने-जाने के इस्तेमाल में लाया जाता होगा, इस घड़ी वो दरवाजा भी बंद था। विशालकाय दरवाजों के दोनों तरफ पत्थरों को तराशकर बनाये गये दो शेर मुंह खोले खड़े थे, जिनके सफेद दांत दूर से ही चमक रहे थे। वहां के माहौल में मौत सा सन्नाटा पसरा हुआ था। कहना मुहाल था कि वहां के वाशिंदे उस खामोशी को, उस मनहूसियत को कैसे झेल पाते होंगे।

सदर दरवाजे के नजदीक पहुँचकर मैंने लम्बा हार्न बजाया। तत्काल प्रतिक्रिया सामने आयी। दरवाजे में हिल-डुल हुई।

”चर्रररररररर की आवाज करता हुआ हवेली के विशाल फाटक का एक पल्ला खुलता चला गया। मैंने इधर-उधर निगाह दौड़ाई मगर दरवाजे के पल्लों को खोलते हाथों को देख पाने में कामयाब नहीं हो पाया। भीतर दाखिल होकर मैंने पुनः गेट खोलने वाले की तलाश में इधर-उधर निगाहें दौड़ाईं मगर कोई दिखाई नहीं दिया।

मैं कार सहित भीतर प्रवेश कर गया।

पूरी हवेली अंधकार में विलीन थी, कहीं से भी किसी प्रकार की रोशनी का आभास मुझे नहीं मिला। तकरीबन सौ मीटर लम्बे और बीस फुट चौड़े ड्राइवे से गुजर कर मैं इमारत की पोर्च में पहुँचा। पोर्च की हालत कदरन बढ़ियां थी। हाल-फिलहाल में वहां रंगरोदन होकर हटा महसूस हो रहा था। पेंट की मुश्क अभी भी वहां की फिजा में महसूस हो रही थी।

कार रोकने के पश्चात मैंने डनहिल का पैकेट निकालकर एक सिगरेट सुलगा लिया और वहां के माहौल का जायजा लेने लगा। इस दौरान आदम जात के दर्शन मुझे नहीं हुए। पहले मैंने सोचा हार्न बजाऊं, फिर मैंने अपना इरादा मुल्तवी कर दिया। उम्मीद थी कि कार के इंजन की आवाज सुनकर कोई ना कोई अवश्य बाहर आएगा, मगर ऐसा नहीं हुआ।

सिगरेट खत्म होते ही मैं कार से बाहर निकल आया, तभी दूर कहीं से उल्लू के बोलने की आवाज सुनाई दी और फड़फड़ाता हुआ एक चमगादड़ मेरे सिर के ऊपर से गुजर गया, बरबस ही मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

सांय-सांय की आवाज करती हुई हवा और दूर कहीं कुत्ते की रोने की आवाज! इस हवेली के माहौल को और भी भयावह बनाये दे रही थी। कहीं से भी जीवन का कोई चिन्ह नजर नहीं आ रहा था, वह रिहायश कम और किसी हॉरर फिल्म का सेट ज्यादा नजर आ रहा था। मुझे यूं महसूस हो रहा था जैसे गलती से मैं किसी कब्रिस्तान में आ पहुँचा था। हर तरफ अजीब सी मनहूसियत फैली हुई थी।

ऐसी वीरान जगह में तो भूत-प्रेतों के दखल के बिना भी इंसान का हार्ट फेल हो सकता था। मैंने दरवाजा खुलवाने का विचार मुल्तवी कर दिया और एक सिगरेट सुलगाकर टहलता हुआ वापस सदर दरवाजे की ओर बढ़ा। कुछ आगे जाने पर दरवाजा दूर से ही दिखाई देने लगा, जिसे की पुनः बंद किया जा चुका था। मगर उसके आस-पास आदम जात के दर्शन मुझे अभी नहीं हुए या फिर अंधेरे की गहनता के कारण मैं उन्हें नहीं देख नहीं पा रहा था।

‘‘अरे कोई है भाई यहां!‘‘ दरवाजे के कुछ और नजदीक जाकर आस-पास देखते हुए मैंने आवाज लगाई।

जवाब नदारद।

‘‘कोई सुन रहा है भई?‘‘ इस बार मैं तनिक उच्च स्वर में बोला।

‘‘जी साहब जी।‘‘ मेरे पीछे भर्रायी सी आवाज गूंजी।

मैं फौरन आवाज की दिशा में पलट गया।

”कहां जायेंगे?“-पुनः वही आवाज।

सामने निगाह पड़ते ही मैं एक क्षण को भीतर तक कांप उठा, क्या करता नजारा ही कुछ ऐसा था। मेरे सामने एक नर कंकाल खड़ा था, मेरा दिल हुआ जोर-जोर से चीखना शुरू कर दूं। मगर दूसरे ही पल मैंने खुद को काबू कर लिया। मैंने रिवाल्वर निकालकर हाथ में ले लिया और सधे कदमों से उसकी ओर बढ़ा। मेरा दिल हरगिज भी यह मानकर राजी नहीं था कि एक कंकाल मुझसे बातें कर रहा है।

मैंने अभी पहला कदम ही उसकी ओर बढ़ाया था कि अचानक जैसे आसमान टूट पड़ा। मेरे सिर के पृष्ठ भाग पर किसी वजनी चीज से प्रहार किया गया, मेरे हलक से दर्दनाक चीख निकली और मेरी चेतना लुप्त होने लगी। तभी उस नरकंकाल के दाहिने हाथ की हड्डी मेरी तरफ बढ़ी मुझे लगा वो मेरा गला दबाना चाहता है, मैंने अपने शरीर की रही-सही शक्ति समेटकर हाथ से छूट चुकी रिवाल्वर की तलाश में इधर-उधर हाथ मारना शुरू किया तभी फिर से किसी ने मेरे सिर पर वार दिया, इस बार मैं खुद को बेहोश होने से नहीं रोक पाया।

दोबारा जब मुझे होश आया तो मैंने खुद को एक बड़े कमरे में लम्बे-चौड़े पलंग पर लेटा हुआ पाया, बेहोशी से पूर्व की घटना को याद करके मैं फौरन उठकर बैठकर गया। तभी मुझे अपने सिर से उठती टीसों का अहसास हुआ, स्वतः ही मेरा हाथ पहले सिर के पीछे फिर माथे तक जा पहुँचा।

मैंने टटोलकर देखा अब वहाँ पट्टियाँ लिपटी हुई थीं। शायद बेहोशी के दौरान ही किसी ने मेरे घावों पर बेन्डेज कर दिया था, मगर किसने?

शायद उसी नर कंकाल ने, सोचते हुए उस हालत में भी मैं खुद को मुस्कराने से नहीं रोक पाया।

उसी क्षण दरवाजा खुलने की आहट हुई। मैंने सिर उठाकर देखा मेरे सामने एक बला की खूबसूरत युवती खड़ी थी। औसत से तनिक ऊँचा कद, गोरा रंग, कमर तक पहुँचते लम्बे-काले बाल, बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें, सुतवां नाक, साफ-सुथरे नयन-नक्स, वाली वो युवती इस वक्त बिना दुपट्टे के सादा सलवार कुर्ता पहने थी। अपने इस परिधान में वो निहायत कमसिन और हसीन लग रही थी।

बह सधे कदमों से चलती हुई मेरे समीप आकर खड़ी हो गई।

”हैल्लो राज“ - वह पास आकर बोली तब जाकर मुझे उसके चेहरे पर फैला पीलापन और आंखों में छाई निरीहता दिखाई दी- ”हाऊ आर यू नाऊ?“

”फाईन, तुम शायद जूही हो।“

”कैसे पहचाना?“
 
”डॉली ने कहा था कि - जब मुझे लगे कि कोई आसमानी परी मेरे सामने आ खड़ी हुई है, तो समझ जाऊं कि मैं जूही से रू-ब-रू हूं।‘‘

‘‘ओ माई गॉड‘‘-उसने हंसते हुए शरमाकर अपना चेहरा दोनों हथेलियों के बीच छुपा लिया, ‘‘कमाल की बातें करते हो तुम।‘‘

‘‘बेशक! तुम हो ही तारीफ के काबिल, और चेहरा मत ढको, नजर लगनी होगी तो अब तक लग चुकी होगी।‘‘

‘‘क्या..... अरे नहीं!‘‘

उसने अपने चेहरे को हथेलियों की गिरफ्त से आजाद कर दिया और एक बार फिर कमरा उसकी खिलखिलाहट से गूंज उठा।

”रात को हुआ क्या था?“ वह अपनी हंसी को ब्रेक लगाते हुए बोली।

”कुछ नहीं अंधेरे में ठोकर लग गई, मैं नीचे गिर पड़ा, मेरा सिर शायद किसी पत्थर से टकरा गया था, इसलिए मैं बेहोश हो गया।“

”अच्छा! वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि उस वक्त मैं और डॉली पहली मंजिल की बॉलकनी में ही थे।“

”किस वक्त?‘‘ मैं हड़बड़ाया।

‘‘जब तुम्हें अंधेरे में ठोकर लगी और और तुम्हारा सिर पत्थर से टकराया।‘‘

मैं हकबकाया सा उसका मुंह ताकने लगा।

‘‘क्या हुआ, ये असेप्ट करते हुए तुम्हारा ईगो हर्ट होता है कि तुम हवेली में घूमते कंकालों का शिकार बन गये।‘‘

‘‘तुमने मुझे देखा नहीं हो सकता बाहर बहुत अंधेरा था।‘‘

‘‘करैक्ट मगर हमने उन दोनों कंकालों की हरकतें देखी थीं तुम्हारी चीख भी सुनी थी, तभी तो हम भागकर नीचे गये और तुम्हें उठाकर यहां ले आए। वरना सुबह से पहले पता भी नहीं लगता कि तुम्हारे साथ क्या गुजरा था।‘‘

‘‘ओह।‘‘

”जानते हो डॉली ने मुझसे शर्त लगाई थी कि तुम खुद पर हुए हमले के बारे में ये तो कह सकते हो कि तुमपर मंगल ग्रह से हमला किया गया था मगर सच हरगिज नहीं बताओगे और अब मैं देख रही हूं की अभी-अभी मैं पूरे पांच सौ रूपये की शर्त हार गयी।‘‘

मैं झेंप सा गया। कम्बख्त डॉली ने और पता नहीं क्या-क्या बताया था मेरे बारे में। सच कहता हूं भगवान ने औरत को जुबान देकर उसका सत्यानाश लगवा दिया वरना वो भी इंसान होतीं।

”है कहां वो?“

”वह तुम्हारे लिए कॉफी तैयार कर रही है, लो आ गई।“

डॉली कमरे में दाखिल हुई।

”हॉय हैंडसम।“

वह खनकते स्वर में बोली, उसकी आवाज सुनकर मेरा सारा गुस्सा यूं गायब हो गया जैसे कभी था ही नहीं।

”हॅाय सैक्सी।“-मैं उसे घूरता हुआ बोला - ”कैसी है तू?“

”टॉप ऑफ दी वर्ल्ड।‘‘

नजदीक आकर उसने कॉफी का प्याला मुझे पकड़ा दिया।

मैं धीरे-धीरे कॉफी चुसकने लगा, कप खाली करने के पश्चात् मैंने स्नान आदि से निवृत होकर, डॉली और जूही के साथ डटकर खाना खाया फिर अपने कमरे में आकर सो गया।

दोबारा जब मेरी आंख खुली तो शाम के पांच बज चुके थे।

अब मैं काफी हद तक थकान मुक्त हो चुका था। मेरे सिर का दर्द भी अब पहले की अपेक्षा काफी कम था। अब मैंने मन ही मन काम पर लग जाने का फैसला किया और अपने कमरे से बाहर निकल आया।

तभी एक हट्टा-कट्टा पहलवानों सरीका आदमी मेरे आगे से गुजरा।

”जरा सुनिए प्लीज।“ - मैंने आवाज दी।

वह ठिठक गया।

”जूही कहाँ है?“

”मालूम नहीं।“ - वह ठहरे हुए लहजे में बोला।

”उसका कमरा कौन सा है?“

”मालूम नहीं।“

”इस हवेली में और कौन लोग रहते हैं?“

”मालूम नहीं।“

उसने रटा-रटाया जवाब दोहरा दिया।

”तुम यहां क्या करते हो?“

”मालूम नहीं।“

”हे भगवान“ - मैं आह भरता हुआ बोला - ”तू पागल तो नहीं है?“

”मालूम नहीं।“

”शटअप।“ मैंने उसे डपट दिया।

”मरेंगे, सब मरेंगे।“

”क्याऽऽ? - मैं हड़बड़ाकर बोला- ” क्या बकते हो?“

”तुम मरोगे, मैं भी मरूँगा, हम सब मरेंगे।“

कहकर जोर-जोर से हँसता हुआ वो आगे बढा, ठीक तभी एक युवक मेरे पास आ खड़ा हुआ, ‘‘किससे बातें कर रहे थे भई।‘‘

‘‘उससे।‘‘ कहकर मैंने अपने सामने जा रहे व्यक्ति की ओर उंगली उठा दी।

जवाब में उसने बड़े ही अजीब नजरों से मुझे देखा।

‘‘क्या हुआ?‘‘ मैं सकपकाया।

‘‘कुछ नहीं‘‘-वह मुस्कराता हुआ बोला, ‘‘सिर पर गहरी चोट का असर है, तुम्हें अपने कमरे में जाकर आराम करना चाहिए।‘‘

‘‘क्या कहना चाहते हो साफ-साफ कहो।‘‘

‘‘अभी तुम यहां खड़े होकर अपने आप से बातें कर रहे थे, यही कहना चाहता हूं, यकीनन सिर पर लगी चोट का असर होगा, तुम्हें एमआरआई करानी चाहिए। कई बार ऐसी चोट घातक सिद्ध होती है, लापरवाही मत दिखाना।‘‘ - कहकर वो तनिक ठिठका फिर बोला - ‘‘बाई दी वे मुझे प्रकाश कहते हैं, मैं जूही का कजन हूं।‘‘ कहकर उसने मुझसे हाथ मिलाया और बोला, ‘‘मैं दीवानखाने जा रहा हूं, मेरा फ्रेंड राकेश वहां वेट कर रहा है, अगर तुम आराम नहीं करना चाहते तो मेरे साथ चलो।‘‘

कहकर वो आगे बढ़ गया। कुछ क्षण मैं हकबकाया-सा, अनिश्चित-सा खड़ा रहा तत्पश्चात् उसके पीछे लपका। सीढ़ियां उतरकर मेन हॉल से दायें तरफ को एक राहदरी से गुजरकर हम दीवानखाने पहुंचे।

वहाँ एक सत्ताइस-अठ्ाइस साल का युवक बैठा सिगरेट के सुट्टे लगा रहा था, कमरे में मारीजुआना की मुश्क फैली हुई थी जो कि यकीनन उसने अपनी सिगरेट में भरा हुआ था।

”हल्लो राज“ -वो मुझे देखकर यूं चहका मानों मेले में बिछड़ा भाई मिल गया हो।

उसके हल्लो के जवाब में मैंने उससे हाथ मिलाया फिर एक कुर्सी पर पसर गया।

‘‘सुना है तुम प्राइवेट डिटेक्टिव हो।‘‘ राकेश अपनी नाक से धुंए की दोनाली छोड़ता हुआ बोला, ‘‘आज से पहले मैंने प्राइवेट डिटेक्टिव का जिक्र सिर्फ उपन्यासों में ही पढ़ा था।‘‘

‘‘होता है जनाब, अब मैंने भी तो मारीजुआना वाली सिगरेट आज से पहले सिर्फ फिल्मों में ही देखी थी।‘‘

मेरी बात सुनकर वो सकपकाया, प्रकाश की ओर देखा फिर झेंप मिटाने को जोर-जोर से हंस पड़ा।

‘‘सूंघ तीखी है तुम्हारी।‘‘ वो खड़ा होता हुआ बोला, ‘‘चलता हूं फिर मिलेंगे! बहुत जल्द।‘‘

प्रकाश ने सहमति में सिर हिला दिया, जबकि मेरी निगाह उसकी बाईं टांग पर थी, उधर से वो लंगड़ाकर चल रहा था।

‘‘कल रात नशे में वो बीयर की टूटी बोतल पर जा गिरा था‘‘ - मुझे उधर देखता पाकर प्रकाश बोला - ‘‘उसी का एक टुकड़ा इसकी बाईं टांग को जख्मी कर गया।‘‘

‘‘ओह।‘‘

मैंने जेब से सिगरेट का पैकेट निकालकर उसे ऑफर किया तत्पश्चात् लाइटर निकालकर बारी-बारी से दोनों सिगरेट सुलगा लिये।

”मैं जानता हूँ“ - वह नाक से धुँआ उगलता हुआ बोला - ‘‘तुम यहाँ क्यों आये हो?“

”अच्छा!“

”हां हवेली में हो रहे हंगामों की वजह से आये हो तुम, ऐसे हंगामें जिनका कोई वजूद ही नहीं, जो महज उस पागल लड़की के दिमाग की उपज हैं। ये बात जितनी जल्दी उसकी समझ में आ जाए उतना ही अच्छा होगा। पहले जूही ने डॉली को यहां बुलाया, वो समझती थी उसके आ जाने से सब कुछ शांत हो जायेगा।“

”हुआ?“

”जाहिर है नहीं! तभी तो उसने तुम्हें भी यहां बुला लिया।“

”क्या वह सचमुच पागल है?“

”देखो भई पूरी तरह उसे पागल करार देना तो उसके साथ ज्यादती होगी। डॉक्टर का कहना है कि जो कुछ उसके साथ हो रहा है वो ‘फोबिया‘ के शुरूआती लक्षण हैं, जिनपर उसने फौरन काबू नहीं पाया तो उसकी हालत बद्तर हो सकती है। यहां तक कि वो पागल भी हो सकती है। मगर जूही के साथ सबसे बड़ी समस्या ये है कि वो अपनी कल्पनाओं में डरावनी कहानियां पैदा करती है और फिर उन कहानियों को साक्षात घटित हुआ समझने लगती है। नतीजा ये होता है कि उसकी स्वयं की रचना ही उसे भयभीत करना शुरू कर देती है। डॉक्टर का मानना है कि पिता की मौत के बाद वह अपने को बहुत ज्यादा तनहा-असुरक्षित महसूस करने लगी, इसी वजह से ये सब हो रहा है।“

‘‘ऐसा अक्सर होता है।‘‘

”आजकल तो अक्सर ही होने लगा है। मगर ज्यादातर रात के वक्त। सुनो मैं तुम्हें परसों रात की एक घटना सुनाता हूँ - हम सभी अपने-अपने कमरों में सोये पड़े थे, तभी हमें उसकी भयानक चीख सुनाई दी! मैं फौरन उठकर उसके कमरे की ओर दौड़ा, कमरा खाली पड़ा था। मैंने इधर-उधर देखा तो वह सीढ़ियां उतरती दिखाई दी मैं उसकी तरफ लपका वो अभी भी चिल्ला रही थी। मैंने उसे पकड़कर झकझोर दिया, उसका पूरा शरीर किसी जूड़े की मरीज की तरह काँप रहा था। पूछने पर उसने बताया कि उसके कमरे में एक व्यक्ति रिवाल्वर लिए खड़ा था। जिसने उसपर फायर भी किया मगर वह किसी तरह बच गई और वहाँ से भाग खड़ी हुई।“
 
”जबकि हकीकतन वहाँ कोई भी नहीं था, ये तुम पहले ही उसके कमरे में जाकर देख चुके थे।“ - मैं बोला।

”एक्जेक्टली यही बात थी। तब तक सभी लोग इकट्ठे हो चुके थे। हमने हवेली का कोना-कोना छान मारा कहीं कोई नहीं था। हमने उसके कमरे की भी भरपूर तलाशी ली मगर वो गोली जो कि खुद जूही के कथनानुसार उस पर चलाई गई थी, बरामद नहीं हो सकी। देखो हालांकि ये मुमकिन नहीं था कि हमलावर पलक झपकते ही वहां से गायब हो गया हो, फिर भी मान लेते हैं कि वो किसी तरह भागने में सफल हो गया, पर क्या ये मानने वाली बात थी कि जाते वक्त वो कमरे से अपने द्वारा चलाई गई गोलियां भी उठा ले गया हो।“

”नहीं गोलियां ढूंढना वक्तखाऊं काम था।“ मैंने उसकी बात से सहमति जताई, ‘‘क्या ऐसा पहले भी कभी हुआ था।‘‘

”हाँ।‘‘- वो बोला - ”कम से कम हफ्ते में एक रोज तो यकीनन ऐसी कोई ना कोई घटना घटित हो ही जाती है जो हम सभी को डिस्टर्ब करके रख देती है।“

”ये सिलसिला शुरू कब हुआ था?“

”बताया तो था करीब एक महीने पहले, अंकल की मौत के बाद से। यकीनन वो अभी तक पिता की मौत का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाई है, अंकल थे तो कितनी खुशियां थी इस हवेली में! अब तो याद करना पड़ता है कि आखिरी बार हम कब खिलखिलाकर हंसे थे, कब हमने एक साथ डिनर किया था।“ उसकी आवाज भर्रा सी गयी।

”और जूही की माता जी?‘‘

‘‘उनको गुजरे तो एक अरसा बीत गया, तब जूही और मैं चौदह या पंद्रह के रहे होंगे। जूही अंकल के ज्यादा करीब थी, शायद इसीलिए मां की मौत से बहुत जल्द उबार लिया था उसने खुद को।‘‘

”मानसिंह जी की - खुदा उन्हें जन्नत बख्शें - मौत कैसे हुई थी। मेरा मतलब है वो अपनी स्वाभाविक मौत मरे थे या फिर.....।“ मैंने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

”देखो अंकल की मौत को स्वभाविक मौत नहीं कहा जा सकता, वो एक भयानक हादसा था, जो कि हम सभी पर भारी गुजरा था।“

”हुआ क्या था, कब की बात है ये?“

”बताया तो एक महीना पहले!“

”सॉरी वो क्या है कि मंगलवार को मेरी यादाश्त ठीक से काम नहीं करती!“

”मगर आज तो बुधवार है!“

”जानता हूं, शायद हैंगओवर का असर है बहरहाल तुम कुछ कह रहे थे।“

”मैं! नहीं तो।“

”अरे तुम मुझे अपने अंकल के साथ हुए हादसे के बारे में बताने जा रहे थे।“

‘‘वापस आ गयी लगता है।‘‘

‘‘क्या?‘‘

‘‘तुम्हारी यादाश्त।‘‘

मैं हंसा, उसने मेरी हंसी में साथ दिया।

”उस रोज जूही का जन्मदिन था“ - वो याद करता हुआ बोला - ‘‘उसके बर्थ-डे पर हर साल हवेली में एक बड़ी पार्टी रखी जाती है, जिसमें शहर के तमाम नामी-गिरामी लोगों को आमंत्रित किया जाता है - उस रोज की पार्टी में भी इसी तरह के लोगों की शिरकत थी। तकरीबन साढ़े आठ बजे जबकि पार्टी अपने जलाल पर थी तभी अंकल के क्लोज फ्रेंड शेष नारायण शुक्ला जी ने अंकल को खोजना शुरू किया।‘‘

‘‘उन्होंने अंकल की तलाश में इधर-उधर लोगों से पूछना शुरू कर दिया, फिर जूही से पूछा तो उसने बताया कि वे इस वक्त छत पर हो सकते थे। तत्काल एक नौकर को हवेली की छत पर भेजा गया जिसने आकर बताया कि अंकल वहां भी नहीं थे। थोड़ी ही देर में पार्टी का मजा किरकिरा हो गया, लोग बाग इंज्वाय की जगह अंकल को तलाश करने में लग गये।‘‘

‘‘तकरीबन आधे घंटे बाद किसी ने आकर बताया कि वे हवेली के बाईं ओर वाले हिस्से में मृत पड़े हैं, सब लोग फौरन उस जगह पर जा पहुँचे। पार्टी में उस रोज कोतवाली इंचार्ज जसवंत सिंह भी आया हुआ था, उसने तत्काल वहां की कमान अपने हाथ में ले ली और बड़ी मुश्किल से लोगों को लाश से दूर रहने के लिए तैयार कर पाया।‘‘

‘‘बाद में काफी पूछताछ के बाद पुलिस ने निष्कर्ष निकाला, कि पार्टी के दौरान वे आठ बजे छत पर पहुँचे। वहां किसी कारण से रेलिंग से नीचे झांक रहे थे। तभी उनका बैलेंस बिगड़ गया। अत्याधिक पिये होने की वजह से वे खुद को सम्भाल नहीं सके, नतीजतन दूसरी मंजिल की छत से नीचे जा गिरे।“

”मगर पार्टी छोड़कर वे उतनी रात गये वे छत पर क्यों पहुँच गये?“

”ये उनका रूटीन वॉक का टाइम था, वे रोज रात आठ बजे हवेली की छत पर टहलने चले जाया करते थे। तभी तो जूही ने मेहमानों को बताया था कि वे छत पर हो सकते थे।‘‘

”ओह! बाई दी वे ये भूतों और नर कंकालों का क्या चक्कर है?“

”वो कोई चक्कर नहीं है दोस्त बल्कि हकीकत है। कई लोग देख चुके हैं। खुद मैंने भी कई दफा अंकल के भूत को बाहर कम्पाउंड में टहलते देखा है। आये दिन कुछ नर कंकाल भी दिखाई दे जाते हैं, मगर यह सब बाहर ही दिखाई पड़ता है, किसी ने भी उनको हवेली के अंदर नहीं देखा और ना ही वे किसी को नुकसान पहुँचाते हैं। अब तो ये बात हमारे सभी जानने वालों और रिश्तेदारों को भी पता है, तभी तो जूही के बुलाने पर भी कोई उसके साथ हवेली में रहने के लिए नहीं आया।“

”तुम्हारे जैसे पढ़े-लिखे लड़के के मुंह से ऐसी बातें सुनकर हैरानी होती है।‘‘

”मुझे मालूम है तुम मेरी बात पर यकीन नहीं कर रहे हो मगर यही सच्चाई है। आज ही तो पहुंचे हो कुछ दिन ठहरोगे तो खुद अपनी आंखों से देख लेना।“

”जरूर देखूँगा“ - मैं बोला - ”वैसे इस हवेली में और कौन रहता है, मेरा मतलब है तुम्हारे और जूही के अलावा।“

”बस कुछ नौकर-चाकर।“

”कुछ! कितने?“

”चार नौकर, तीन नौकरानी, एक रसोइया बस!... इनके अलावा एक चौकीदार भी था मगर दस दिन पहले वो नर-कंकालों के खौफ से नौकरी छोड़कर भाग गया।“

‘‘और कोई।‘‘

‘‘कोई नहीं है भाई, अंकल जिन्दा थे तो हवेली के कमरे रिश्तेदारों और जानने वालों से भरे रहते थे। मगर अब तो लोगों ने लाल हवेली को भूतिया हवेली कहना शुरू कर दिया है। भला ऐसी जगह पर कौन टिकेगा।‘‘

”एक आखिरी सवाल का जवाब दो, अगर जूही को यहाँ इतना डर लगता है तो उसे कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर क्यों नहीं ले जाते, कहीं भी किसी भी जगह, यहां से मीलों दूर कहीं।“

”वो नहीं मानती, मैंने उसे बहुत समझाया। पापा ने भी समझाया कि वो हमारे साथ मुम्बई चल कर रहे मगर वो तो बस एक ही रट पकड़ कर बैठ हुई है कि यहाँ से कहीं नहीं जायेगी, तुम भी कोशिश करना, अगर वो मान जाय तो मैं उसे लेकर मुम्बई चला जाऊंगा, या और किसी जगह जहां भी वो जाना चाहे।“ - कहकर वो तनिक रूका फिर आगे बोला - ‘‘मुझे नहीं लगता कि तुम जूही के लिए कुछ कर पाओगे क्योंकि वह एक मनोवैज्ञानिक केस है, और तुम जासूस हो ना कि कोई साइकिएट्रिस्ट।“

”मैं समय आने पर साइकिएट्रिस्ट का बाप भी बनकर दिखा सकता हूँ। तुम इत्मिनान रखो मैं इससे पहले पागलखाने में ही था, लिहाजा पागलों को सम्भालने का काफी अच्छा तजुर्बा है मुझे और रही बात हवेली में घूमते भूतों और नर कंकालों की तो तुम उनकी चिन्ता मत करो, मेरी शक्ल देखने के बाद तो जिन्दा इन्सान भाग खड़ा होता है, फिर मुर्दों की बिसात ही क्या है?“

जवाब में वह ठठाकर हंस पड़ा।

”अगर तुम जूही के लिए कुछ कर सके तो मैं आजीवन तुम्हारा अहसानमंद रहूँगा।‘‘ - वो उठता हुआ बोला - ‘‘फिलहाल तो मैं चला, मुझे कहीं बाहर जाना है, शाम को फिर मुलाकात होगी।“

”जरूर।“ - मैं भी उठ खड़ा हुआ - ‘‘वैसे तुम्हारे अंकल माल-पानी कितना छोड़ गये हैं।‘‘

‘‘तुम्हारी उम्मीदों से कहीं ज्यादा। बहरहाल उनकी कुल जमा असेस्ट का मुझे भी कोई अंदाजा नहीं हैं।“

कहकर प्रकाश बाहर निकल गया।

मैं भी उसके पीछे-पीछे ही बाहर निकला और दोबारा मेन हॉल में पहुंचा। वहां से गुजरते एक नौकर से जूही के बारे में पूछा तो पता चला वो कॉफी लेकर उसी के पास जा रहा था। जूही के कमरे के आगे पहुंचकर मैंने दरवाजा खटखटा दिया।

”आ जाइए जनाब यहां पर्दानशीं कोई नहीं है, सब अपने ही हैं, बशर्ते की आप उन्हें अपना समझते हों।“

अंदर से आती डॉली की आवाज मुझे सुनाई दी। ऐसी ही थी कम्बख्त, सीधे-सीधे कोई बात कहना तो जैसे उसने सीखा ही नहीं था।

मैं दरवाजे के पल्ले को भीतर धकेलता हुआ कमरे में दाखिल हो गया।

वह बैड पर अधलेटी अवस्था में बैठकर किसी पत्रिका के पन्ने पलट रही थी, मुझे देखकर सीधी होकर बैठ गई। नौकर कॉफी रखकर चला गया।

”कहाँ चले गये थे तुम, मैं पिछले आधे घंटे से तुम्हें ढूँढ रही थी।“

”यूं ही बिस्तर पर लेटे-लेटे।“

”यहाँ तो अभी पहुंची हूं तनहाई में रोने के लिए।“

‘‘अरे नहीं रोना मत प्लीज।‘‘

कहता हुआ मैं उसके समीप बैठ गया। वो फौरन बैड से नीचे उतर गई।

”क्या हुआ?“

”खबरदार अगर तुमने यहाँ मुझे छूने की कोशिश की।“

‘‘ठीक है बाहर चल वहां छू लूंगा, आई हैव नो प्राब्लम।‘‘

‘‘शटअप, खबरदार जो कोई खुराफात दिखाई तुमने।‘‘

”नहीं दिखाउंगा बदले में बस एक किस दे दे मुझे।“

”नहीं दे सकती।“

‘‘अरे लो वोल्टेज, लो कैलोरीज वाली ही दे दे, वो वाली जिसमें अश्लीलता नहीं होती।‘‘

‘‘ऊं-हुं-नहीं दे सकती।‘‘

”क्यों?“

”मेरे होंठ बहुत रसीले और मीठे हैं।“

‘‘तो क्या हुआ?‘‘

‘‘मेरे आखिरी ब्वायफ्रेंड ने मुझे किस किया तो शूगर से मर गया था, अब तुम्हें भी कुछ हो गया तो मैं कहां जाऊंगी, तुम्हारे सिवाय मेरा है ही कौन, ये पहाड़ जैसी जिन्दगी मैं किसके सहारे काटूंगी।‘‘

‘‘तू मुझे मजबूर कर रही है।‘‘

‘‘किस बात के लिए?‘‘

”जबरदस्ती के लिए।“

कहता हुआ मैं उठ खड़ा हुआ।

‘‘ओह नो प्लीज ऐसा मत करो?‘‘

‘‘क्यों ना करूं, इसलिए की मुझे शूगर हो जायेगी।‘‘

‘‘एक दूसरी कदरन छोटी वजह भी है।‘‘

‘‘अच्छा! चल वो भी बता दे।‘‘ कहकर मैं उसकी ओर बढ़ा।

”खबरदार जो मेरी तरफ बढ़े।“

गुर्राते हुए वह दो कदम पीछे हट गई। मैं एकदम से उस पर झपट पड़ा, मेरा इरादा उसे दबोच लेने का था, मगर वह झुकाई देकर बच गई इस दौरान उसकी कलाई मेरी पकड़ में आ गई, मैंने उसे अपनी तरफ खींचा।

”बाबूजी भगवान के लिए मुझ अबला पर रहम कीजिए, मेरी कलाई छोड़ दीजिए, किसी ने देख लिया तो मैं रूसवा हो जाऊंगी।“

वह यूं बोली मानों अभी रो पड़ेगी।

‘‘कौन देखेगा हमें इस तनहाई में।‘‘

‘‘वही जो दूसरी कदरन छोटी वजह है।‘‘

‘‘मतलब।‘‘

तभी कोई जोर से खाँसा, हड़बड़ाकर मैंने उसकी कलाई छोड़ दी और आवाज की दिशा में देखा, बायें बाजू पलंग के पास एक चेयर पर जूही बैठी हुई थी। मुझे अपनी ओर देखकता पाकर उसने कुटिलता से अपनी एक आंख दबा दी और खिलखिलाकर हंस पड़ी।

”सच्ची यार बड़ा मजा आ रहा था।“ वो चहकती हुई बोली।

मैं झेंपकर रह गया। पता नहीं क्या सोच रही होगी वह मेरे बारे में। कम्बख्त डॉली का गला घोंट देने को जी करने लगा, कमीनी बता नहीं सकती थी कि कमरे में हम दोनों के अलावा भी कोई था।

और इस वक्त कैसी शरम से गड़ी जाने की एक्टिंग कर रही थी। सिर झुकाये हुए अंगूठे से फर्श को कुरेदने की कोशिश करती हुई।

कमरे में खामोशी छाई हुई थी, मगर जूही और डॉली की सूरतें बता रही थीं कि दोनों ठठाकर हंसना चाहती थीं, जैसे मेरी रैगिंग करके बहुत बड़ा तीर मार दिया हो।

‘‘कॉफी ठंडी हो रही है।‘‘ - कहते हुए जूही ने दो कपों में हमें कॉफी सर्व की और तीसरा खुद लेकर बेड पर आलथी-पालथी मारकर बैठ गयी।

”अब बताओ किस्सा क्या है?“

जवाब में दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। डॉली की निगाहें जूही पर टिकी थीं और जूही के चेहरे से यूं महसूस हो रहा था जैसे वो किसी दुविधा की शिकार हो।

”क्या हुआ?“

”सोच रही हूँ“ - वह बोली - ”कहाँ से शुरू करूँ?“

”फिर तो शुरू से ही शुरू करो, क्योंकि शुरूआत के लिए वही सबसे अच्छी जगह होती है।“

उसने समझने वाले अंदाज में सिर हिलाया फिर बोली - ”देखो मैं जो कुछ कहने जा रही हूँ वो सुनने में तो बेहद अटपटा लगता है, मगर सौ फीसदी सच है।“

”सच कभी भी अटपटा नहीं होता ब्राईट आईज, तुम अपनी बात शुरू करो।“

‘‘देखो जाने क्यों पिछले कुछ अरसे से मुझे ऐसा महसूस हो रहा है जैसे कि इस हवेली में मेरे खिलाफ कोई षणयंत्र रचा जा रहा है। जैसे कि कोई मुझे जान से मार डालना चाहता है। जैसे कि कोई जानबूझकर सुनियोजित तरीके से मुझे पागल साबित करने की कोशिश कर रहा है - और कामयाब हो रहा है। मुझे अपना वजूद खतरे में नजर आ रहा है, हर वक्त एक अंजाना सा डर मेरे दिलो-दिमाग पर हावी रहता है, लाख कोशिशों के बावजूद भी मैं खुद को उस डर से अलग नहीं कर पाती, मैं जितना अधिक इस बारे में सोचती हूँं उतना ही मेरे भीतर का डर मुझपर हावी होता जाता है। हर वक्त किसी अनदेखे खतरे को मैं अपने आस-पास मंडराता हुआ महसूस करती हूँ। मगर ऐसा क्यों है, इसका जवाब तलाशने की कोशिश में मैं और अधिक उलझकर रह जाती हूं। मैं मरने से नहीं डरती मगर किसी षणयंत्र का शिकार होकर अपनी जान गवां देना मुझे मंजूर नहीं। पागल साबित करके पागलखाने भेज दिया जाना भी मुझे मंजूर नहीं। उससे तो अच्छा है मैं खुद अपनी जान दे दूंं।“

बोलते-बोलते, उसके दिल का दर्द आंखों में छलक आया था।
 
”अभी-अभी तुमने कहा कि कोई तुम्हे जान से मार डालना चाहता है, कौन?“

”मुझे नहीं मालूम।“

”किसी पर शक है तुम्हे कि वो तुम्हारी जान ले सकता है।“

”नहीं।“

”फिर तुम्हें ऐसा क्यों महसूस होता है?“

”क्योंकि.....क्योंकि, पहले भी एक बार ऐसी कोशिश की जा चुकी है, मगर कोई भी मेरी बात का यकीन नहीं करता, सब कहते हैं कि मैं पागल हो चुकी हूँ, मेरा दिमाग हिल गया है। हे भगवान! ये किस मुसीबत में फंस गई हूं मैं! अब तो हवेली के नौकर भी मेरी तरफ यूं देखते हैं मानों मुझपर तरस खा रहे हों।“

”किसने की थी तुम्हारी जान लेने की कोशिश?“

”मालूम नहीं वो अपने मुँह पर नकाब चढ़ाये हुए था ऊपर से कमरे में बहुत अंधेरा भी था। मैं तो यही सोचकर हैरान हूं कि कमरे का दरवाजा बंद होने और लाइट ऑफ होने के बावजूद वहां उतना उजाला कहां से था कि मैं उसे अपनी तरफ बढ़ता देख पाई। वरना वो बड़े आराम से अपना काम करके चला जाता फिर लोगों के ज्ञानचक्षु खुलते और लोगबाग कहते - अरे जूही सच ही कहती थी, कि कोई उसकी जान लेना चाहता है- उसने बड़े इत्तमिनान से मुझपर मेरे कमरे में गोली चलाई। जोरदार आवाज गूंजी थी मगर किसी को सुनाई नहीं दी। उसका निशाना मिस हो गया, मै चीखती चिल्लाती उससे बचने की कोशिश में बाहर की तरफ भागी और उसी पल मेरी चीख सुनकर ऊपर आ रहे प्रकाश से इतनी बुरी तरह टकराई की उसे लिए-दिए सीढ़ियों पर लुढ़कती चली गई। मगर बाद में जब सभी ने मेरे कमरे में आकर देखा तो वहाँ कोई नहीं था और ना ही उसकी चलाई गई गोली ही बरामद हो सकी।“

”तुमने उस घटना की पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई।“

”नहीं“

”क्यों?“

”क्योंकि सभी का कहना था कि मैंने कोई भयानक सपना देखा था और डर गई थी। हकीकतन वे सब कहना चाहते थे कि ये सब पागल का प्रलाप था, मगर मेरा लिहाज किया जो नहीं बोला।“

”प्लीज डोंट माइंड, क्या ऐेसा हो सकता है कि वह सचमुच सपना ही रहा हो?“

”मेरा दिल यह मानने को हरगिज भी तैयार नहीं है, मगर फिर भी मैंने प्रकाश की बात मानी! मैं पुलिस के पास नहीं गई।“

”खैर फिर क्या हुआ, क्या दोबारा वैसी कोई और कोशिश हुई?‘‘

”नहीं“ - वो बोली - ”मगर एक दूसरी घटना जरूर घटित हुई?“

”वो क्या थी?“

”मैं अपने कमरे में सोई हुई थी, तब तकरीबन बारह के आस-पास का वक्त हुआ होगा, अचानक ही किसी के जोर-जोर से हँसने की आवाज सुनकर मेरी नींद उचट गई। मैंने आँख खोलकर देखा तो मेरे सामने एक नर कंकाल खड़ा जोर-जोर से अट्टहास कर रहा था। उस कंकाल के शरीर से कोई अदभुत तेज निकल रहा था। मैं जोर से चिल्ला पड़ी और डर कर मैंने आँखें मींच ली। थोड़ी देर बाद किसी ने जोर-जोर से दरवाजा भड़भड़ाया, डरते-डरते मैंने आंखे खोलकर देखा तब कमरे में कहीं कोई नहीं था। मैंने उठकर दरवाजा खोला, दरवाजे पर प्रकाश खड़ा था, मेरी बात सुनकर वो हँसता हुआ बोला - लगता है तुमने फिर कोई डरावना सपना देख लिया है - मगर उसके पांच दिन बाद ही जब चौकीदार को भी कंकाल दिखाई दिये और वह डरकर नौकरी छोड़कर चला गया तो सबके मुंह पर जैसे ताला पड़ गया।“

”अब जरा अपने पिता की मौत के वाकये पर आओ - भगवान उनकी आत्मा को शांति दें - मुझे पता चला है कि तुम्हारी बर्थ-डे पार्टी वाली रात को वो हादसा हुआ था।“

”ठीक पता चला है, मगर मैं नहीं मानती की वो कोई हादसा था। नहीं वो दुर्घटना नहीं थी, बल्कि किसी ने सोचे समझे सुनियोजित ढंग से उनकी हत्या कर दी थी। वे छत से खुद नहीं गिरे थे, बल्कि किसी ने उन्हें धकेल कर नीचे गिरा दिया था।“

”किसने?“

”इसी बात का तो अफसोस है राज कि मेरे पास किसी भी प्रश्न का कोई जवाब नहीं है, होता तो इतनी लानत नहीं झेल रही होती।“ कहते हुए वह हौले से सिसक उठी।

”फिर भी ऐसा सोचने की कोई तो वजह होगी तुम्हारे पास।“

उसने सहमति में सिर हिलाया।

”मुझे बताओ।“

”सुनो पुलिस का कहना है कि वे अत्याधिक नशे में थे, और नीचे गिरने से ठीक पहले वो रेलिंग से बाहर झुककर कुछ देख रहे थे या फिर किसी नौकर को आवाज लगा रहे थे। नशे में होने की वजह से उनका संतुलन बिगड़ गया और वे सिर के बल छत से नीचे गिर पड़े।‘‘ - इस बार वो लगभग रोती हुई बोली - ‘‘मैं ये नहीं कहती कि उन्होंने शराब नहीं पी थी, मगर जितनी शराब उन्होंने उस रोज पी थी, वो उनके लिए ऊँट के मुँह में जीरे समान थी। नशे में होने का तो सवाल ही नहीं उठता, तुम यकीन नहीं करोगे मेरे डैडी उन लोगों में से थे जो कि शराब की पूरी बोतल डकार कर भी सामान्य बने रहने की क्षमता रखते हैं।“

”क्या पता उन्होंने तुम्हारे सामने कम शराब पी हो और बाद में, छत पर जाने से पहले किसी वक्त वो अपने कमरे में गये हों और वहां छककर पी ली हो।“

”क्यों भई पार्टी में पीने पर क्या कोई पाबंदी थी?“

”नहीं, फिर भी ऐसा हुआ हो सकता है।“

”नहीं हो सकता क्योंकि पोस्टमार्टम कि रिपोर्ट के अनुसार जितनी अल्कोहल उनके शरीर में पाई गई, उस हिसाब से डैडी ने मुश्किल से दो या तीन पैग शराब पिया था, जितना पीते हुए मैंने या दूसरे मेहमानों ने उनको देखा था।“

”ये बात तुमने पुलिस को बताई थी।“

”हाँ मगर उन्होंने मेरी बात को नजरअंदाज कर दिया। सिर्फ इस बिना पर कि कत्ल का कोई भी सम्भावित कैंडिडेट उनकी निगाह में नहीं आया। डैडी के कत्ल से अगर किसी को तगड़ा फायदा पहुँच सकता था तो वो सिर्फ मैं थी, और मुझ पर शक की कोई गुंजाइश नहीं थी। क्योंकि मैं हर वक्त पार्टी में बनी रही थी, एक मिनट के लिए भी पार्टी छोड़कर कहीं नहीं गई। इसे इत्तेफाक ही कहो कि उस रोज मैं हर घड़ी पार्टी में मौजूद थी वरना अमूनन ऐसी पार्टियों से मैं बहुत जल्दी बोर हो जाती हूं और जाकर अपने कमरे में सो जाती हूं या पीछे बाग में टहलने चली जाती हूं।“

‘‘प्रकाश ने बताया कि आठ बजे छत पर टहलने जाना उनकी रोजमर्रा की आदत थी।‘‘

‘‘हां यह उनका रूटीन वॉक था, जो वह पिछले दस सालों से बिना नागा करते आ रहे थे। तुम यूं समझ लो रात को आठ बजे का टाइम जानने के लिए उन्हें घड़ी देखने की भी जरूरत नहीं पड़ती थी। ठीक आठ बजे उनके कदम खुद बा खुद छत की ओर चल पड़ते थे।‘‘

”ओह! तुम्हारे बताने के अंदाज से लगता है कि उस रोज की पार्टी काफी बड़ी पार्टी थी।‘‘

‘‘अफकोर्स बड़ी पार्टी थी और पार्टी में कई बड़ी हस्तियां शामिल थीं, इसलिए भी पुलिस ज्यादा बारीकी से इंवेस्टिगेशन को अंजाम नहीं दे पाई थी। कई तो ऐसे लोग भी थे जिनसे सवाल पूछना तो दूर उनके पास फटकने की हिम्मत भी पुलिस की नहीं हुई। लिहाजा औना-पौना, जां़च-पड़ताल के बाद पुलिस ने केस को ठंडे बस्ते में डाल दिया। फिर जब मैंने डैडी के कुछ दोस्तों की मदद से पुलिस पर दबाव डलवाने की कोशिश की तो इसे दुर्घटना का केस करार देकर फाइल क्लोज कर दी। उसी दौरान मैं खुद मुसीबतों के पहाड़ में जा दबी और डैडी को इंसाफ दिलाने की बजाय अपनी सलामती की फिक्र करने लगी, इसके बाद जो हुआ वो मैं तुम्हे पहले ही बता चुकी हूं।‘‘

‘‘उस रोज की पार्टी में घर के अलावा कौन-कौन से लोग शामिल थे?“
 
”सबके बारे में तो कहना मुहाल है। वो एक बड़ी पार्टी थी, शहर के कई प्रतिष्ठित लोग उसमें शामिल थे। बहुत से लोग ऐसे भी थे जिनकी मैंने उस दिन से पहले सूरत तक नहीं देखी थी। कई लोग हमारे द्वारा आमंत्रित किये गये मेहमानों के साथ आये थे। कुछ ऐसे भी लोग थे शक्लो-सूरत से तो गुण्डे मवाली लगते थे मगर सज-धज ऐसी की बयान करने को शब्द कम पड़ जाएं। कहने का मतलब है कि उन सबके बारे में याद रख पाना निहायत मुश्किल काम था। ऐसी कोई जानकारी तुम्हे पुलिस स्टेशन से हांसिल हो सकती है, क्योंकि तहकीकात करने वाले इंस्पेक्टर ने पार्टी में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति का नाम और पता नोट करने की हिम्मत - मिमियाते हुए, गिड़गिड़ाते हुए ही सही मगर दिखाई तो थी ही।‘‘

”पार्टी के दौरान तुमने ऐसा कुछ नोट किया हो जो कि अजीब लगा हो या कोई ऐसा वाकया हुआ हो जो कि नहीं होना चाहिए था। कोई व्यक्ति दिखाई दिया जो कि हर वक्त तुम्हारे डैडी के इर्द-गिर्द मंडराता रहा हो, या फिर जबरन उनसे चिपकने की कोशिश करता प्रतीत हुआ हो।“

वह हिचकाई।

”कमॉन यार! अब कह भी डालो।“ डॉली ने उसकी हौसला-अफजाई की।

”प्रकाश“ - वो बोली - ”पार्टी के दौरान वो हर वक्त डैडी के साथ ही रहा था, और अब मुझे याद आ रहा है, कि जब हमें पार्टी में डैडी की गैर-मौजूदगी का अहसास हुआ तब शायद प्रकाश भी वहाँ नहीं था। बाद में वो सीढ़ियाँ उतरकर नीचे हॉल में पहुँचा था। पूछने पर उसने बताया कि अंकल की तलाश में उनके कमरे तक गया था।‘‘

”तुम वही कहने की कोशिश कर रही हो ना, जो मैं समझ रहा हूं?“

”बिल्कुल नहीं, मैंने सिर्फ तुम्हारे सवाल का जवाब दिया है। बेमतलब की अटकले मत लगाओ, और फिर डैडी की जान लेकर उसे क्या हासिल होना था?“

”क्या पता कुछ हुआ हो?“

”नहीं हुआ, मुझसे बेहतर भला यह बात कौन जानता है।“

”जाने दो ये बताओ कि राकेश कौन है?“

”प्रकाश का फ्रैंड, तुम उसे कैसे जानते हो।“

”बस नाम से, अभी थोड़ी देर पहले नीचे दीवानखाने में मुलाकात हुई थी।“

”हां प्रकाश होता है तो वो अक्सर यहाँ आ जाया करता है।“

”आदमी कैसा है वो?“

‘‘गुंडा मवाली है, एक नम्बर का नशेड़ी भी है, मगर प्रकाश का यार है।“

”उस रोज की पार्टी में राकेश भी था?“

”हाँ।“

”उसे किसी ने इनवाईट किया था या फिर वो यूँ ही चला आया था।“

”प्रकाश ने बुलाया होगा आखिर उसका दोस्त है।‘‘

‘‘प्रकाश यहां क्यों रहता है?‘‘

‘‘कुछ खास वजह नहीं। पांच-छह महीने पहले अंकल से लड़-झगड़कर यहां चला आया था। पिछले महीने वापस जाने की बात कर रहा था, मगर उसी दौरान पापा के साथ वो हादसा हो गया, फिर बेचारे को मेरी खातिर यहां रूकना पड़ गया।‘‘

”तुम भूत प्रेतों में विश्वास करती हो।“

”बिल्कुल करती हूं! बहुत डर लगता है मुझे रूहानी ताकतों से। विश्वास नहीं भी करती होती तो अब, जबकि यह पूरी हवेली ही भुतहा बन गई तो यकीन करना ही पड़ता। मुझे खुद ऐसे लोग दिखाई देते हैं जो पलक झपकते ही गायब हो जाते हैं। कई बार कुछ लोग मेरे सामने होते हैं, मैं उनसे बातें कर रही होती हूं। इस दौरान अगर कोई मुझे देख लेता है तो बताता है कि वहां कोई नहीं था और मैं खुद से बातें कर रही थी। कोई परलौकिक शक्ति ही ऐसा कर सकती है, इंसानों के बस का तो है नहीं। ऊपर से कंकालों का दिखाई देना, खून दिखाई देना, लाशें दिखाई देना! अगर मैं पागल नहीं हूं तो निश्चय ही यह सब पिशाच-लीला है।“

”तुमने हवेली को इस पिशाच-लीला से मुक्त कराने कोशिश नहीं की।“

”क्यों नहीं की! बहुत कुछ किया, बड़े-बड़े तांत्रिकों को बुलाकर जाप वगैरह करवाया, लोगों की बकवासों को ध्यान से सुना उनपर अमल किया। अघोरियों से श्मसान में तांत्रिक क्रियायें करवाईं, मगर कोई फायदा नहीं हुआ। अंततः मैंने कोशिश ही छोड़ दी। तुम यकीन नहीं करोगे तंत्र-मंत्र के चक्कर में पड़कर मैं अब तक तकरीबन पांच लाख रुपये फूँक चुकी हूँ।“

”इससे तो अच्छा था तुम दस रुपये का हनुमान चालीसा खरीद लेतीं।“

जवाब में वो हौले से हँस पड़ी।

”मैं रोज हनुमान चालीसा का पाठ करती हूं, महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी करती हूं। तभी तो आज तक जिन्दा बचे हुए हूं वरना कब की ‘कुमारी जूही सिंह मरहूम‘ बन गयी होती।‘‘

‘‘अरे शुभ-शुभ बोलो, कुछ नहीं होगा तुम्हे।‘‘

”आई अण्डरस्टैण्ड, मुझे यकीन है तुम दोनों पर! इस बात का कि तुम मुझे कुछ नहीं होने दोगे।‘‘

”गुड! ये यकीन आगे भी कायम रखना और अब तुम मुझे ये बताओ, कि अभी तक तुम किसी अच्छे साइकिएट्रिस्ट से मिली या नहीं।“

”गई थी साइकिएट्रिस्ट के पास, लाल-बाग में उसका क्लीनिक है।“

”डॉक्टर का नाम क्या था?“

”डॉक्टर भट्टाचार्य, पूरा नाम मुझे नहीं मालूम।“

”क्या कहा डॉक्टर ने?“

‘‘उसने कहा था ये सब फोबिया के शुरूआती लक्षण हैं, कुछ महीने दवाइयां खाकर मैं ठीक हो जाऊंगी। बस मुझे ज्यादा से ज्यादा आराम करना है, अच्छी किताबें पढ़नी हैं और सोते समय दिमाग को विचार-शून्य रखने की कोशिश करनी है।“

‘‘क्या दवाइयां दी उसने तुम्हे?‘‘

‘‘मैंने वहां से दवाइयां नहीं लीं।‘‘

‘‘क्यों?‘‘ मैं हैरान होता हुआ बोला।

‘‘वो क्या है कि‘‘ - कहकर उसने सिर झुका लिया, इस वक्त उसकी सूरत देखने लायक थी। वह एकदम बच्चों जैसी मासूम लग रही थी - ‘‘मेरा झगड़ा हो गया।‘‘

‘‘झगड़ा!....डॉक्टर के साथ?‘‘

‘‘नहीं प्रशांत से‘‘ - वो पूर्वतः सिर झुकाये बोली - ‘‘उसने मुझे डॉक्टर के सामने पागल कह दिया। मुझे गुस्सा आ गया और मैं यह कहकर वहां से चली आई कि मुझे नहीं कराना अपना इलाज।‘‘

‘‘माई गॉड! तुमने अपना इलाज करवाया ही नहीं?“

”करा रही हूँ, मगर भट्टाचार्य से नहीं बल्कि एक दूसरे डॉक्टर से जहां दोबारा प्रकाश ही मुझे लेकर गया था।“

”क्या बकती हो“ - उसी वक्त कमरे में कदम रखता प्रकाश लगभग भड़ककर बोला - ”मैं तो सिर्फ तुम्हें डॉक्टर भट्टाचार्य के पास लेकर गया था जहां से तुनककर तुम वापिस चली आई थीं, दूसरे किसी डॉक्टर के पास कब ले गया मैं तुम्हे?“ - कहता हुआ वो अंदर आ गया।

”प्रकाश“ - वो हैरानगी भरे स्वर में बोली - ”तुम झूठ कब से बोलने लगे।“

”मैं झूठ बोल रहा हूँ या तुम कहानियां बनाने लगी हो, अच्छा बताओ कहाँ और किस डॉक्टर के पास लेकर गया था, मैं तुम्हें।“

”आर्य नगर में कोई डॉक्टर गौतम थे, पूरा नाम मुझे याद नहीं आ रहा।“

”गलत बिल्कुल गलत“ - वह जोरदार लहजे में बोला - ”वो पूरा इलाका मेरा देखा हुआ है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि आर्य नगर में कोई मलहम पट्टी करने वाला डॅाक्टर मिल जाय तो अलग बात है वरना और कोई डॉक्टर नहीं है वहां।“

”प्रकाश! - वह आहत स्वर में बोली - ‘‘क्यों झूठ बोल रहे हो इतनी सी बात पर, फिर मत भूलो मैं तुम्हें अभी भी उस क्लीनिक में ले जा सकती हूँ। तब शायद वह डॉक्टर खुद ही तुम्हारी शिनाख्त कर दे कि तुम पहले भी वहाँ जा चुके हो।“

”इम्पॉसिबल।“

”तो फिर चलो मेरे साथ।“

वह तुनकती हुई उठ खड़ी हुई।

”मगर......।“ मैंने कुछ कहना चाहा तो वह मेरा वाक्य काटकर पहले ही बोल पड़ी - ‘‘तुम दोनों भी चलो प्लीज।“

‘‘उसकी कोई जरूरत नहीं है।‘‘

‘‘क्या हर्ज है भाई, समझ लेना सीतापुर घूम लिया।‘‘ कहकर प्रकाश बाहर निकल गया। उसके पीछे-पीछे जूही भी बाहर निकल गयी।

मैंने हकबका कर डॉली की तरफ देखा।

‘‘चल लेते हैं।‘‘

‘‘चल तो मैं लूंगा मगर जिस दावे से प्रकाश ने ये बात कही है, उसे सुनकर तो लगता है वहां सचमुच किसी डॉक्टर के दर्शन नहीं होने वाले।‘‘

‘‘ना हां, हमें क्या फर्क पड़ता है।‘‘

‘‘हमें नहीं पड़ता पर अगर जूही अपनी बात साबित नहीं कर पाई तो यकीन जानों वो पूरी पागल हो जाएगी।‘‘

‘‘ओह! फिर क्या करें।‘‘

‘‘उसे रोको किसी भी तरह।‘‘

सहमति में सिर हिलाती वो बाहर की ओर लपकी, मैं भी उसके पीछे हो लिया।

हम नीचे पहुंचे। तब तक दोनों भाई-बहन अपनी-अपनी कार में सवार भी हो चुके थे।

डॉली जूही की कार के करीब पहुंची और उसे समझाने की कोशिश करने लगी। मगर कोई असर होता ना पाकर उसने मेरी तरफ देखा, मैंने अनभिज्ञता से कंधे उचका दिये। प्रतिक्रिया स्वरूप वो पैसेंजर साइड का दरवाजा खोल जूही की कार में सवार हो गई। तब मैं भी मजबूरन प्रकाश की कार में जा बैठा।

दोनों कारें आगे-पीछे हवेली से बाहर निकलीं और आर्य नगर की ओर उड़ चलीं।

बीस मिनट बाद।

आर्य नगर में एक दो मंजिला इमारत के सामने पहुँचकर जूही ने कार रूकवा ली। बाहर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था ‘शिवभान कटरा‘ वस्तुतः यह बड़े शहरों के शॉपिंग कॉम्पलैक्स का ही मिनी संस्करण था।

हम चारों कार से बाहर निकल आये। अब वो ड्रामा शुरू होने वाला था जिसकी आशंका मैं हवेली में ही डॉली पर जाहिर कर चुका था।

हम लोग जूही के पीछे चलते हुए इमारत में प्रवेश कर गये। इमारत के अंदर ग्राउण्ड फ्लोर पर दो कतारों में अलग-अलग प्रकार की कुल चौदह दुकानें थीं, भीतर पहुंच कर जूही दोनों कतारों का जायजा लेती आखिरी सिरे तक पहुंची फिर वापसी में वो एक स्टेशनरी की दुकान के सामने पहुंचकर ठिठक गई।

‘‘उस डॉक्टर का क्लीनिक यहीं था“ - वो आस-पास निगाहें दौड़ाती हुई बड़बड़ाई - ”जाने कहां चला गया।‘‘

”क्या हुआ?“ - मैं उसके करीब पहुंचकर बोला।

”यकीन जानो पिछली बार जब मैं यहाँ आई थी तो ये स्टेशनरी शॉप यहाँ नहीं थी। यहाँ उस डॉक्टर ने अपना क्लीनिक खोल रखा था। संडे का दिन होने की वजह से बाकी दुकाने बंद पड़ी थीं।“

हालांकि उसकी बात पर यकीन करने की कोई वजह नहीं थी फिर भी मैं दुकानदार के पास पहुँचा।

”क्या चाहिए बाबू जी? - दुकानदार बोला।

”एक अच्छी सी नोट बुक दिखाओ।“

जवाब में उसने कई नोट बुक्स मेरे सामने रख दी। मैंने उनमें से एक पसंद करके उसकी कीमत चुका दी।

”लगता है दुकान अभी हॉल ही में खोली है आपने, नहीं।“

”बिल्कुल नहीं साहब, ये दुकान तो पिछले चार साल से यहीं है।“

”ओह“ - मैं बोला - ”लगता है मुझे धोखा हुआ है।“

”कैसा धोखा?“

”पिछली बार जब मैं यहाँ आया था, तो आपकी दुकान की जगह मैंने यहाँ किसी डॉक्टर को बैठे देखा था।“

”फिर वो आपको सचमुच कोई धोखा हुआ है, क्योंकि इस कटरे में कोई डॉक्टर नहीं है।“

”तुम झूठ बोल रहे हो।“

अब तक खामोश खड़ी जूही लगभग चीख ही पड़ी।

दुकानदार सकपका सा गया। उसने अजीब निगाहों से पहले जूही को फिर मेरी तरफ देखा, मानों जानना चाहता हो कि उसने क्या झूठ बोला है।

”तकरीबन पन्द्रह रोज पहले जब मैं यहाँ आई थी तो यहाँ पर डॉक्टर गौतम ने अपना क्लीनिक खोल रखा था, तब तुम्हारी दुकान यहाँ नहीं थी।“

”देखिये अगर आपको यकीन नहीं आता तो आस-पास के दुकानदारों से पूछ कर पता कर लीजिए कि मेरी दुकान यहाँ कब से है?“ - दुकानदार बोला।

जूही खामोश रही। मैंने पूछ-ताछ की तो पता लगा वो दुकान सचमुच पिछले तीन-चार सालों से वहीं थी। अब तो मुझे भी लगने लगा कि लड़की के दिमागी कल-पुर्जे सचमुच हिल चुके थे।

”वापिस चलो।“ मैं जूही से बोला।

”मगर.......।“

”देखो मैं ये नहीं कहता कि तुम झूठ बोल रही हो। मगर दुकान की बाबत तुमसे कोई भूल हुई हो सकती है। हो सकता है वो जगह कोई और हो जहाँ कि डॉक्टर गौतम ने अपना क्लीनिक बना रखा हो, ऐसी कोई और बिल्डिंग भी हो सकती है। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि पिछली बार तुम किसी और इमारत में गई होगी, और आज भूल वश......।“

”हरगिज नहीं“ - वो मेरा वाक्य काटती हुई बोली - ”मुझे अच्छी तरह से याद है कि पिछली दफा भी मैं इसी इमारत में गई थी, ना कि किसी दूसरी इमारत में।“

”ठीक है मैंने मान ली तुम्हारी बात अब वापस चलो।“

एक बार फिर से हम लोग कार में सवार हो गए। कार लाल हवेली पहुंची।

”जूही तुम्हारी तबियत ठीक नहीं“ - नीचे हॉल में पहुँचकर प्रकाश बोला - ”जाकर अपने कमरे में आराम करो।“

”डाँट टॉक मी नानसेंस।“

कहती हुई वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

”मैंने पहले ही कहा था“ - उसके निगाहों से ओझल होते ही प्रकाश बोल पड़ा - ”इसका दिमाग हिला हुआ है, ये कल्पनाओं के घोड़े पर सवारी करने लगी है। अगर यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब यह पूरी पागल हो जाएगी।“

मैं और डॉली खामोश रहे।

तभी यूँ लगा जैसे कोई जोर से चीखा हो, अभी मैं दिशा का सही अनुमान लगा ही रहा था कि.........।

”लाश.....लाश।“

चिल्लाती हुई जूही एक छलांग में चार-चार सीढ़ियाँ उतरती दिखाई दी। मैं फौरन उसकी तरफ लपका, अभी वो दो तीन सीढ़ियाँ ऊपर ही थी कि लड़खड़ा पड़ी, अगर मैं उसे थाम न लेता तो यकीनन वो औंधे मुँह फर्श पर गिर पड़ती।

”क्या हुआ“ - मैं उसे झकझोरता हुआ बोला - ”क्यों चिल्ला रही हो?“

”लाश.....लाश“ - वो हकलाई - ”वहाँ लाश पड़ी है।“

”कहाँ?“

”मेरे कमरे में।“

‘‘बेवकूफ क्या बक रही हो।‘‘ प्रकाश चीख सा पड़ा।

मगर मैं उनकी बात सुनने को वहां रूका नहीं। हवा की रफ्तार से सीढ़ियां चढ़ता चला गया। तीसरे या चौथे सेकेंड में मैं उसके कमरे के सामने खड़ा था। मेरी रिवाल्वर मेरे हाथ में आ चुकी थी, किसी भी खतरे का सामना करने के लिए मैं पूरी तरह तैयार था। मैंने लात मार कर अधखुले दरवाजे को पूरा खोल दिया।

सामने का हिस्सा क्लीन था। मैंने सावधानी बरतते हुए कमरे में कदम रखा, दरवाजे के पीछे और दीवान के नीचे झांककर मैंने तसल्ली की, वहीं कोई छिपा हुआ नहीं था। फिर मैं वार्डरोब की तरफ आकर्षित हुआ। सारी ड्रिल बेकार साबित हुई। पूरा कमरा खाली पड़ा था, कहीं कोई नहीं था, और ना ही कोई असामान्य बात मुझे वहाँ दिखाई दी। कहीं किसी फाउल प्ले की गुंजाइश नजर नहीं आ रही थी। मैं हैरान था, क्या सचमुच लड़की पागल थी!

सच कहूं तो मेरा दिमाग भन्नाकर रह गया।

तभी डॉली और प्रकाश के साथ जूही पुनः कमरे में दाखिल हुई।

”कहाँ है लाश?‘‘ मैं उसे घूरता हुआ बोला।

”अभी तो यहीं थी“ - वह हैरान होती हुई बोली - ”जाने कहाँ चली गई।“

”अच्छा तो अब लाशें भी चलने लगीं है।“

”तुम समझते हो मैं झूठ बोल रही हूँ।“

”मैं कुछ नहीं समझता, मगर जानना जरूर चाहता हूँ, कि अगर यहाँ लाश थी तो अब कहाँ गई?“

”मैं नहीं जानती“ - वह रोआंसे स्वर में बोली - ”मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि आखिरकार ये सब हो क्या रहा है, क्यों हो रहा है। मैं क्या करूं, हे भगवान मैं क्या करूँ। कहीं सचमुच पागल तो नहीं हो गई हूं मैं?“ - आखिरी शब्द कहते-कहते उसकी आवाज भर्रा सी गयी।

वो हौले से सिसक उठी।

सच कहता हूं अगर रात को कंकालों वाला ड्रामा मैंने अपनी आंखों से नहीं देखा होता तो निःसंकोच जूही को पागल करार दे देता। वो इकलौती वजह थी जो हौले से मेरे दिमाग में सारगोशी कर रही थी कि कोई बड़ा खेल खेला जा रहा था लाल हवेली में।

”लाश किसकी थी?“ मैंने जूही से सवाल किया।

”रोजी की।“

”रोजी कौन?“

”जूही“ - प्रकाश तीव्र स्वर में बोला -”तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, तुम आराम करो।“

”एक मिनट को चुप रहो प्लीज‘‘ - मैं तनिक सख्त लहजे में बोला- ‘‘हां बताओ ये रोजी कौन है?“

”वो नर्स थी। करीब पांच महीने पहले एक बार पापा बहुत बीमार पड़ गये थे। हमने उन्हें हॉस्पिटल में एडमिट करा दिया। मगर अगले ही दिन पापा घर आने की जिद करने लगे। कहने लगे कि अगर हॉस्पिटल में रहे तो और बीमार हो जायेंगे। तब हम सबने मिलकर फैसला किया कि उनकी देखभाल के लिए एक नर्स रख ली जाय.........।“

”अपनी जुबान बंद रखो बेवकूफ“ - प्रकाश उसे डपटता हुआ बोला - ”ये तुम्हारा कोई सगेवाला नहीं है, अगर तुमने इसको कुछ बताया तो ये पुलिस को बता देगा, फिर पुलिस क्या करेगी ये बताना मैं जरूरी नहीं समझता।“

”तुम जरा खामोश रहो प्लीज! मुझे बात करने दो इससे।‘‘ - मैं चिढ़कर बोला, - ‘‘ये जो बताना चाहती है, बता लेने दो। और इत्मिनान रखो कम से कम हमारी वजह से इसपर कोई मुसीबत नहीं आने वाली, भले ही बात चाहे कितनी भी बड़ी क्यों ना हो।“

”मैंने कहा न ये सिर्फ कल्पनाओं के घोड़े पर सवार रहती है, इसका क्या भरोसा ये कब क्या कहने लग जाय“ - इस बार वो जोर से बोला - ”आज तो सचमुच मुझे यकीन आ गया कि यह पागल हो चुकी है, अब तुम पागल का प्रलाप सुनना चाहते हो तो शौक से सुनो।“

”कमीने।“ - जूही गला फाड़कर चिल्लाई और प्रकाश पर झपट पड़ी, उसने प्रकाश का मुंह नोच लिया, बाल पकड़कर नीचे गिरा दिया और पुनः गला फाड़कर चिल्लाई - ”मैं पागल नहीं हूं, समझे तुम! मैं पागल नहीं हूँ।“ कहते हुए उसने प्रकाश का चेहरा लहूलुहान कर दिया।

मैं और डॉली हकबकाये से उसे देखते रह गये।

प्रकाश उसकी पकड़ से मुक्त होने की कोशिश कर रहा था। मगर जूही में जैसी इस वक्त शैतानी ताकत आ गई थी लगता था आज वो प्रकाश की जान लेकर ही मानेगी। इसलिए अब हस्तक्षेप जरूरी हो गया था। मैं जूही को पकड़ने के लिये आगे बढ़ा, मगर तभी जूही ने खुद ही उसे छोड़ दिया।

‘‘ये पूरी पागल हो चुकी है‘‘ - प्रकाश हांफता हुआ बोला- ‘‘अब ये हॉस्पीटल केस बन चुकी है, जल्दी ही इसे पागलखाने भेजना होगा, वरना ये हम सभी के लिए मुसीबत खड़ी कर देगी।“

”बको मत।‘‘- जूही पुनः चिल्ला पड़ी - ”मैं पागल नहीं हूँ! कितनी बार कहूं कि मैं पागल नहीं हूँ। नहीं हूं मैं पागल।“

कहती हुई वह हिचकियाँ ले-लेकर रो पड़ी। अब तक वहां हवेली के तमाम नौकर-चाकर इकट्ठे हो चुके थे। सब के सब सालों पुराने और वफादार थे। जूही से उन्हें कितना लगाव था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि औरतें तो बाकायदा रोने लगी थीं।

ड्रामें के किसी अहम किरदार की तरह, शान से चलता प्रकाश वहां से रूख्सत हो गया।

”मुझे तो लगता है ये लड़का कोई गहरा खेल खेल रहा है।“ डॉली फुसफुसाती हुई बोली।

”शायद।“

हमने जूही को उसके कमरे में पहुंचा दिया।

”मैं पागल नहीं हूँ...मैं पागल नहीं हूं...।“ वो अभी भी हौले-हौले से बड़बड़ाये जा रही थी।

”जूही।‘‘ डॉली ने उसे झकझोर सा दिया, ‘‘ये फिजूल की बातें सोचना बंद करो! तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है। तुम्हे आराम करना चाहिए।“

”शायद तुम ठीक कह रही हो, मुझे सचमुच आराम करना चाहिये। मुझे आराम की ही जरूरत है, क्योंकि मेरी दिमागी हालत ठीक नहीं है। ..... क्योंकि ......शायद .....मैं पागल हो चुकी हूँ।“

”तुम्हें कुछ नहीं हुआ, तुम बिल्कुल ठीक हो, अब आराम करो।“

”सिर में बहुत दर्द हो रहा है, तुम जरा मेरी दवा दे दो, खाकर नींद आ जाएगी।“

”ठीक है देती हूँ।“

कहकर डॉली ने मेज पर रखी तीन शीशियों में से एक का ढक्कन खोल कर उसमें से एक टेबलेट निकालकर जूही को दे दिया, जूही उसे बिना पानी के ही निगल गई।

”ये दवाईयाँ डॉ. गौतम ने दी थीं।“

”हां उसी इनविजिबल डॉक्टर ने, जो अपनी क्लीनिक समेत गायब हो गया। जिसकी तलाश में हम आर्य नगर गये थे।“

”क्या?“ - मैं चौंक पड़ा, ‘‘तुम एक ऐसे डॉक्टर की प्रिस्क्राइब की हुई दवाइयॉं खा रही हो जिसका कोई वजूद ही नहीं है।‘‘

‘‘हां अब तो यही लगता है।‘‘

‘‘उसका प्रिस्क्रीप्सन कहां है?‘‘

‘‘अरे उसने कोई पर्ची नहीं दी थी ........बस ये दवाइयां दी थीं ......मुझे.... जो कि तीन टाइम खानी होती हैं। और कोई फायदा हो ना हो नींद बड़ी अच्छी आती है .....मजा आ जाता है। तुम दोनों भी खा लेना रात को एक एक गोली,........बॉय.......गुड नाइट.......तुम लोग भी सो जाओ अब।‘‘

बड़बड़ाते हुए वह नींद के आगोश में समा गयी।

मैंने एक-एक करके तीनों शीशियों को देख डाला, कुछ समझ में नहीं आया। तब मैंने गूगल देवता से पूछा, और जो जवाब मिला उससे मैं केवल इतना ही जान पाया कि वो दवाईयां थीं तो दिमागी मरीजों के लिए ही अलबत्ता किस तरह के मरीजों के लिए थी इसका कोई अंदाजा मैं नहीं लगा पाया। असली बात तो कोई स्पेशलिस्ट ही बता सकता था।

‘‘कुछ समझ में आया?‘‘ मैंने डॉली से प्रश्न किया।

‘‘हां, डॉक्टर नहीं है, क्लीनिक नहीं है मगर उसकी दी हुई गोलियां इसके पास हैं, इट मींस कोई मुगालता नहीं हुआ है इसे। कोई बहुत बड़ा मास्टरमाइंड फिक्स कर रहा है ये सब। उस स्टेशनरी शॅाप वाले से मिलना पड़ेगा।‘‘

‘‘ठीक कह रही है मैं आज ही निपटता हूं उससे।‘‘

कुछ सोचते हुए मैंने वो तीनों शीशियाँ अपने पास रख ली और जेब से डनहिल का पैकेट निकालकर एक सिगरेट सुलगा लिया।

”अब बता पिछले दो दिनों में क्या कुछ जान पाई यहाँ।“

”कुछ खास नहीं“ - वो बोली।

मैंने उसे घूर कर देखा।

”खसम बन के मत दिखाओ, घूरना बंद करो मुझे। जासूस तुम हो मैं नहीं। जानकारियां जुटाने का महकमा तुम्हारा है, इसीलिए मैंने तुम्हे यहां बुलाया है।‘‘

मैं चुपचाप सिगरेट के कस लगाता रहा।

‘‘देखो ये जगह मेरे लिए नितांत अजनबी है ऊपर से यह पूरा इलाका बेहद पिछड़ा हुआ है। यहां के लोग बड़े अजीब हैं हर बात को शक की निगाहों से देखते हैं, एक सवाल के बदले सौ सवाल पूछते हैं, इसलिए इतनी जल्दी कुछ जान पाने का तो सवाल ही नहीं उठता, फिर भी एक खास और काम की बात जानने में मैं सफल रही।“

”और वो जानकारी अगले दो चार सौ सालों तक तू मुझे देने से रही।“

”मैंने ऐसा कब कहा?“

”तो फिर जल्दी से बताती क्यों नहीं?“

”वो तकरीबन एक महीने पहले हुई जूही के फॉदर की मौत से सम्बंधित है।“

”अब कुछ बोलेगी भी।“

”सुनो मानसिंह की मौत से तकरीबन दस रोज पहले कोई प्रापर्टी डीलर यहाँ पहुँचा, उसका इरादा इस इमारत को खरीद लेने का था। इस बाबत उसने मानसिंह जी से बात भी की, मगर वे इस हवेली को बेचने के लिए तैयार नहीं हुए, जबकि वो प्रापर्टी डीलर इस हवेली को दोगुनी तीनगुनी कीमत में भी खरीदने को तैयार था। कहने का मतलब ये है कि वो किसी भी कीमत पर हवेली को खरीद लेना चाहता था। जबकि मानसिंह जी उसे किसी भी मुनासिब गैर मुनासिब कीमत पर बेचने को तैयार नहीं थे।“

”फिर क्या हुआ?“

”होना क्या था वो डीलर वापस लौट गया।“

”और कहानी खत्म इसमें खास बात क्या हुई?“

”जरा सोचो बॉस, वो इस हवेली को खरीदने के लिये मरा जा रहा था, अस्सी-नब्बे लाख की इस हवेली का वो सीधा तीन करोड़ देने को तैयार था, क्यों?“

”मुझे क्या मालूम?“

”अच्छा जवाब है, सुनो वो प्रापर्टी डीलर दोबारा यहाँ आया अबकि दफा उसने जूही से सौदा करना चाहा। क्योंकि मानसिंह जी की मौत के बाद इस हवेली का मालिकाना हक खुद बा खुद जूही को मिल चुका था। इस बार वह चार करोड़ तक देने को तैयार था। मगर जूही भी उस सौदे को राजी नहीं हुई, उसका कहना था कि वो अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध नहीं जा सकती।“

”फिर क्या हुआ?“

”वो दोबारा वापस लौट गया।“

”और कहानी पूरी तरह खत्म।“ - मैं बोला।

”हाँ, लेकिन गौर करने वाली दो बातें वो अपने पीछे छोड़ गया पहली ये कि उसके जाने के कुछ दिनों के बाद ही मानसिंह जी इस दुनियाँ से कूच कर गये, और दूसरी बार उसके जाने के बाद जूही के साथ अजीबो-गरीब वाकयात होने लगे। क्या ऐसा नहीं हो सकता की उसी ने जूही के पिता की हत्या करा दी हो।“

”हवेली को खरीदने के लिए।“

”हाँ।“

”फिर उसने जूही को क्यों जिन्दा छोड़ दिया?“

”इसके दो कारण हो सकते हैं, पहला ये कि अगर जूही की मौत हो जाती तो उसका छिपा रह पाना मुश्किल हो सकता था। बाप के पीछे-पीछे बेटी भी किसी हादसे का शिकार हो जाती तो लोग उसकी मौत को शक की निगाहों से देखते। किसी ना किसी की निगाहों का फोकस उस पर पड़ना ही था, दूसरा ये कि जूही की मौत के बाद ये हवेली जिसके हाथों में पहुंचती क्या पता उससे सौदा कर पाना और कठिन हो जाता, क्या पता वो प्रापर्टी डीलर के असल मकसद को भाँप जाता।“

”जैसे कि तू भांप चुकी है।“

”जाहिर है।“

”क्या है उसका मकसद?“

”करोड़ों रूपये का फायदा।“

”मैं समझा नहीं।“

”मैं समझाती हूँ, इस हवेली वाली जगह पर भारत सरकार अपना कोई शूगर मिल स्थापित करना चाहती है, क्योंकि यह रिहायशी इलाके से एकदम अलग थलग है और दूर-दूर तक खेत ही खेत हैं। जिसकी वजह से इधर जमीन की कीमतों में भारी उछाल आने वाला है। उस प्रापर्टी डीलर को इसकी कोई इनसाइड इंफोर्मेशन रही होगी। नतीजतन इधर आस-पास की सारी जमीनें उसने कौड़ियों के मोल खरीद ली। वैसे भी सब फार्मलैंड थे, लिहाजा आसानी से खरीद लिए गये। यह हवेली उसके द्वारा खरीदी गई जमीनों के ऐन बीच में है। इसीलिए वह इसे खरीदने के लिए मरा जा रहा होगा।‘‘

उसकी बात पूरी होने से पहले ही मेरा सिर स्वतः ही इंकार में हिलने लगा।

‘‘क्यों नहीं हो सकता।‘‘ वो हकबका कर बोली।

‘‘यह अंधा सौदा है कोई भी समझदार आदमी इस तरह के सौदे में हाथ नहीं डाल सकता, वो भी तब जब इंवेस्टमेंट करोड़ों की हो, ऊपर से सरकार ऐसी जमीनों का मुवाबजा खुद मुकर्रर करती है ना की मुंहमांगी रकम देती है। ऐसे में तेरे कहे मुताबिक वो डीलर अगर नब्बे लाख की हवेली के चार करोड़ देने को तैयार था तो उसकी इंकम तो जीरो हो जानी थी। अब ऐसा बेवकूफ आदमी इतनी बड़ी साजिश का रचयता कैसे हो सकता है। लिहाजा असल माजरा कुछ और है।‘‘

‘‘मगर यह प्रापर्टी खरीद-फरोख्त की जानकारी एकदम दुरूस्त है।‘‘

‘‘असल खरीददार कौन है, इस बारे में जान पाई कुछ?‘‘

‘‘कुछ प्रापर्टीज सिगमा ब्रदर्स एण्ड कम्पनी के नाम से खरीदी गईं और कुछ इंडीविजुएल खरीदी गई, यहां गौर करने वाली बात यह है कि जो प्रापर्टीज इंडीविजुएल खरीदी गईं उनका ट्रांसफर भी हाथ के हाथ सिगमा के नाम कर दिया गया, बड़ी हद दो या तीन दिनों के भीतर।‘‘

‘‘गुड अब ये बता कि इतनी कांटे की बात तू जानने में सफल कैसे हुई?‘‘

‘‘तुम्हारी बातों से तो लगता है मैं उल्लू की पट्ठी हूं, सबकुछ महज किस्सागोई था जो कि हर किसी के लिए उपलब्ध था। जमीनों की ताबड़तोड़ खरीद फरोख्त पर जिसे भी शक होता और जो भी उसकी वजह जानना चाहता उसे यही कहानी सुनने को मिलती। अलबत्ता खरीददार की जानकारी तो मैंने रजिस्टरार ऑफिस से निकलवायी है, लिहाजा वह सिक्केबंद बात है।‘‘

‘‘बशर्ते कि वो कम्पनी भी ऐसी ना निकले जो कि खास इसी प्रोजक्ट के लिए बनाई गई हो।‘‘

‘‘चांसेज तो इसी बात के ज्यादा हैं।‘‘

”फिर तो हवेली में हो रहे उत्पातों में भी इस प्रोजेक्ट के मालिकान का हाथ हो सकता है।“

”वो कैसे?“

”शायद वह किसी भी तरह जूही को इतना डरा देना चाहते हैं कि जूही खुद हवेली को बेच दे।“

”तुम्हारा इशारा भूत-प्रेतों की तरफ है।“

”हाँ।“

”इम्पॉसिबल, अभी हमने इतनी तरक्की नहीं की है कि हम प्रेतों और नर कंकालों का निर्माण कर सकें, मुझे तो वे सचमुच के भूत जान पड़ते हैं।“

”इससे पहले तूने कभी भूत देखा है।“

”नहीं।“

”फिर तुझे क्या मालूम असली भूत कैसे होते हैं।“

”तुम मजाक कर रहे हो।“

”नहीं मैं तो डांस कर रहा हूँ, अरी बावली जरा सोच भूत-प्रेतों तक तो ठीक था मगर कंकालों का क्या मतलब? कभी तूने सुना है कि कंकालों ने कहीं कोई उपद्रव किया हो? कंकाल भी कैसे जो रात को हवेली की चौकीदारी करते हैं, किसी के आने पर दरवाजा खोल देते हैं, हमला करते हैं मगर जान से नहीं मारते कि कहीं पुलिस का दखल ना बन जाय और लेने के देने ना पड़ जायं।“

वह हँसी।

”हँसी तो फँसी।“ - मैं बुदबुदाया।

”क्या कहा?“

”कुछ नहीं?“

”झूठ मत बोलो, मैं बहरी नहीं हूँ।“

”जूही का ख्याल रखना मैं जा रहा हूँ।“

‘‘वो तो ठीक है मगर.....।‘‘

‘‘ख्याल रखना उसका।‘‘

उसने सिर हिलाकर गम्भीरता से हामी भरी।

मैं उठ खड़ा हुआ।

”इसे अकेला मत छोड़ना, मुझे उस लड़के पर तनिक भी ऐतबार नहीं है, वो फिर इसे अपसेट करने की कोशिश कर सकता है।“

‘‘अब बच्चे मत पढ़ाओ यार!..‘‘

‘‘ओके सीयू सून।‘‘

कहकर मैंने जूही पर दृष्टिपात किया, वो अभी भी सोई हुई थी, नींद में वो किसी छोटे बच्चे की तरह मासूम लग रही थी। मेरे दिल में एक हूक सी उठी। मैंने जबरन उधर से निगाहें फेर लीं, वरना डॉली की बच्ची कोई कमेंट करने से बाज नहीं आती।

कुछ सोचते हुए मैंने अपनी रिवाल्वर डॉली को दे दी।

”ये किसलिए?“ - वह हड़बड़ाती हुई बोली।

”रख ले शायद कोई जरूरत आन पड़े।“

उसने बिना हीलो-हुज्जत के रिवाल्वर अपने पास रख ली, मैं कमरे से बाहर निकल आया।

अपनी कार में सवार होकर मैं सर्वप्रथम लाल बाग पहुँचा, वहाँ पहुँचकर, डॉक्टर भट्टाचार्य का क्लीनिक ढूढने में कोई दिक्कत मुझे पेश नहीं आयी।

कार बाहर खड़ी करके मैं क्लीनिक में प्रवेश कर गया। वह पचास के पेटे में पहुँचा हुआ, मामूली शक्लो सूरत वाला आदमी था, उसके सिर पर कसम खाने तक को बाल नहीं थे। अपनी चाल ढाल से वो डॉक्टर कम और पागल ज्यादा नजर आता था, जो कि उसकी जहीनता का प्रमाण हो सकता था आखिर वह दिमागी बीमारियों का डॉक्टर था।

”नमस्ते जनाब।“ - मैं उसके सामने पहुँचकर बोला।

जवाब में उसने अपने सिर को हल्की सी जुम्बिश दी और इशारे से मुझे बैठने को कहा।

मैं उसके सामने रखी कुर्सी पर आसीन हुआ।

”जहाँ तक मेरा अपना तर्जुबा कहता है“ - वो बेहद महीन आवाज में बोला - ”तुम्हें किसी भी प्रकार की कोई भी मानसिक तकलीफ नहीं है, तुम दिलो दिमाग से पूरी तरह तंदरूस्त हो।“

”दुरूस्त फरमाया आपने।“

”फिर यहाँ क्यों आये हो अपना खाली समय व्यतीत करने या फिर मेरा कीमती समय नष्ट करने के लिए।“

”दोनों ही बातें गलत हैं जनाब क्योंकि मेरे पास ‘टाइम पास‘ के लिए टाइम बिल्कुल नहीं है, और आपके पास टाइम का तोड़ा बिल्कुल नहीं दिखाई देता।“

”फिर।“ वह तनिक अप्रसन्न स्वर में बोला।

”मुझे आपसे थोड़ी सी जानकारी चाहिए।“

‘‘अरे तुम हो कौन भाई?‘‘

‘‘सॉरी जनाब।‘‘ कहकर मैंने अपना एक विजिटिंग कार्ड पेश किया।

‘‘ओेह डिटेक्टिव हो तुम।‘‘

‘‘जी जनाब।‘‘

”ठीक है बोलो कैसी जानकारी चाहते हो तुम?“

”आप जूही को जानते हैं।“

”मैं चम्पा, चमेली को भी जानता हूँ।“

”जरूर जानते होंगे जनाब मगर मैं किसी जूही के फूल की बात नहीं कर रहा, बल्कि मेरा सवाल मानसिंह - खुदा उन्हें जन्नतनशीन करें - की बेटी जूही की बाबत था, आप जानते हैं, उसे।“

”लाल हवेली वाली?“

”वही।“

”जानता हूँ।“

”वो आपके पास इलाज के लिए आई थी।“

”और भी बहुत से लोग आते हैं मेरे पास, यू नो?“

”जी हाँ, जी हाँ“ - मैं तनिक हड़बड़ा सा गया - ”मगर बात जूही की हो रही थी।“

”आई थी।“

”क्या वो साइकिएट्रिस्ट पेशेंट है?“

”क्यों जानना चाहते हो?“

कहते हुए उसने अपनी खोपड़ी पर हाथ फेरा।

”बताता हूँ, मगर पहले आप मेरे सवाल का जवाब दीजिए प्लीज।“

”भई उसकी बातों से तो लगता है कि वह फोबिया की शिकार है, असली बात तो उसके चैकअप के बाद ही पता चल सकती थी। मगर बजाय अपना चैक अप कराने के वो हत्थे से उखड़ गई, और मुझ पर, फिर मेरी काबीलियत पर प्रश्न चिन्ह लगाकर वापस लौट गई।“

”उसने अपना चैकअप क्यों नहीं करवाया?“

”मालूम नहीं।“

”आपने कहा वो हत्थे से उखड़ गई, किस बात पर?“

”देखो पूरी बात तो मुझ याद नहीं, लेकिन जहाँ तक मेरा ख्याल है उस रोज कोई ऐसी बात चल निकली थी कि उसके साथ आये लड़के ने किसी बात पर उसे पागल कह दिया। बस फिर क्या था वो तुनक कर उठ खड़ी हुई और जाने क्या अनाप-सनाप बकती हुई यहाँ से बाहर निकल गई। उसके साथ आये लड़के ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की मगर वो नहीं रूकी। तब वह खुद मुझसे माफी मांगकर जूही के पीछे ही यहाँ से रवाना हो गया।“

”क्या ऐसा नहीं हो सकता कि प्रकाश ने जानबूझकर उसे गुस्सा दिलाने के लिए पागल कहा हो।“

”ये उस लड़के का नाम है।“

”जी हाँ।“

”वो भला ऐसा क्यों करेगा?“

”पेशेंट को भड़काने की नीयत से ताकि वो तैश में आकर किसी भी प्रकार के चैकअप से साफ इंकार कर दे।“

”मगर इससे हासिल क्या होना था?“

”शायद कुछ हुआ हो, आप बताइए क्या आपने ऐसा कुछ महसूस किया था?“

”कहना मुहाल है ऐसा हो भी सकता है, और नहीं भी हो सकता है।“

”मुझे आपका जवाब मिल गया, अब आप जरा इन दवाइयों पर गौर कीजिए।“

कहते हुए मैंने जूही के कमरे से उठाई दवाई की तीनों शीशियों को उसके सामने मेज पर रख दिया।

वह कुछ देर तक खामोश बैठा उन शीशियों को घूरता रहा तत्पश्चात एक शीशी उठाता हुआ बोला - “क्या जानना चाहते हो?“

”सबसे पहले तो आप इन दवाईयों की बाबत ही बताइए, ये हैं किस मर्ज की?“

”देखो, ये ड्रग्स, मानसिक तनाव से गुजर रहे किसी भी व्यक्ति को तब दिया जाता है जबकि वो अपना विवेक खो चुका हो। किसी भी प्रकार की सोचने समझने की शक्ति उसमें शेष न बची हो, अर्थात वह अर्धपागलों की स्थिति में पहुंच चुका हो। वक्ती तौर पर उसे शांत करने के लिए ये ड्रग्स काफी करामाती साबित होते हैं।“

”और अगर ये ड्रग्स किसी नार्मल आदमी को दे दिये जायें, तब क्या इसका कोई नेगेटिव प्रभाव पड़ सकता है।“

”वो इनकी मात्रा पर निर्भर करता है, आमतौर पर ऐसी एक दो गोलियों को निगलने से एक सामान्य आदमी गहरी नींद के आगोश में पहुंच जाएगा। मगर इन गोलियों का लगातार सेवन उसके दिमाग पर बुरा प्रभाव डाल सकता है।“

”कितना बुरा प्रभाव?“

”भई ये तो उस व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक शक्ति पर निर्भर करता है। मसलन अगर कोई तंदुरूस्त शरीर वाला व्यक्ति है तो उस पर इनका असर कम होगा या फिर अगर कोई अत्याधिक शराब पीने वाला व्यक्ति इन गोलियों का सेवन करता है तो उसके दिमाग पर इसका कोई खास नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके विपरीत अगर कोई कमजोर व्यक्ति इनका सेवन करता है तो उसकी याद्दाश्त तक जा सकती है।“

”मैं समझ गया जनाब, अब जरा इस बात पर रोशनी डालें कि ये तीनों शीशियाँ क्या एक ही मर्ज की हैं?“

”तकरीबन, मगर इन तीनों का इकट्ठा इस्तेमाल खतरनाक हो सकता है, वह आदमी को शारीरिक और मानसिक तौर पर इतना कमजोर कर सकता है कि वह अगर पागल भी हो जाये तो कोई हैरानी नहीं होगी।“

”आपका मतलब है इन तीनों को साथ-साथ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।“

”हरगिज नहीं।“

”आगे पीछे भी नहीं। मेरा मतलब है कुछ घंटों के अंतराल के बाद भी इनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।“

”हरगिज नहीं।“

”ये बात क्या दिमागी मरीजों पर भी लागू होती है?“

”मैं उन्हीं की बात कर रहा हूँ, मगर तुम इन शीशियों की बाबत इतने सवालात क्यों कर रहे हो, और फिर ये तुम्हारे पास आई कहाँ से।“

”माफ कीजिए जनाब इसका जवाब इतना टेढ़ा है कि अगर फिलहाल मैं आपको समझाने की कोशिश करूँ भी तो नहीं समझा सकता। इसलिए फिलहाल तो आप बंदे को इजाजत दीजिए। उम्मीद है जल्दी ही आपसे दूसरी मुलाकात होगी, तब मैं आप के इस सवाल का जवाब अवश्य दूँगा।“

”कहता हुआ मैं उठ खड़ा हुआ।“

”तुम्हारी मर्जी।“ - वो कंधे उचकाते हुए बोला।

तत्पश्चात मैं उसे धन्यवाद देकर बाहर निकल आया, और एक बार पुनः अपनी कार में सवार हो गया।

वहां से मैं सीधा आर्यनगर पहुंचा। मगर स्टेशनरी शॉप वाले से मुलाकात नहीं हो सकी। उसकी दुकान का शटर गिरा हुआ था। मैंने पड़ोसी दुकानदारों से उसके घर का पता लिया और नीलम चौराहा पहुंचा, वहां पहुंचकर उसका घर तलाशना मामूली काम साबित हुआ। किंतु मेरी मुराद यहां भी पूरी नहीं हुई। दरवाजे पर बड़ा सा ताला लटक रहा था। पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि वह दो घंटे पहले घर आया था फिर एक बड़े से बैग के साथ जाता देखा गया था। कहां गया था यह किसी को नहीं पता था।

बाहर आकर मैं एक बार फिर अपनी कार में सवार हो गया।

उम्मीद है अब तक आप लोग बंदे को पहचान चुके होंगे मगर फिर भी यहाँ मैं अपना परिचय दे देना अनिवार्य समझता हूँ। जी हाँ बंदे को राज कहते हैं, दूसरे के फटे में टांग अड़ाना मेरा फेवरेट पेशा है, वैसे दिखावे के तौर पर मैं जासूसी का धंधा करता हूँ। साकेत, दिल्ली में बंदे का ऑफिस है और कालकाजी में तारा अपार्टमेंट के एक टू बीएचके फ्लैट में रहता हूं। जासूसी की ए-बी-सी-डी नहीं आती मगर खुद को शरलॉक होम्ज से कम समझने में मुझे अपनी तौहीन महसूस होती है। लोगों और पुलिस की नजरों में मैं एक ऐसा खुराफाती शख्स हूँ जिसका कोई दीन-ईमान नहीं है।

सामान्य गति से कार चलाता मैं दस मिनट बाद कोतवाली पहुंचा।

मैं इंस्पेक्टर जसवंत सिंह के कमरे में पहुंचा। वह मेज पर झुका हुआ कुछ लिखने में व्यस्त था।

आहट पाकर उसने मेरी तरफ देखा।

”अगर इजाजत हो तो बंदा अंदर आ जाय।“ मैं बोला।

”अंदर तो तुम आ ही चुके हो,“ -वो बोला - ”आओ बैठो।“

”शुक्रिया जनाब।“

कहता हुआ मैं आगे बढ़कर उसकी मेज के सामने रखी विजिटर्स चेयर्स में से एक पर बैठ गया। तब उसने अपने सामने रखे खुले रजिस्टर को बंद करके एक तरफ सरका दिया और मुझे घूरता हुआ बोला - ”कैसे आये?“

”बाहर तक तो कार से आया था जनाब लेकिन अंदर पैदल चलकर आना पड़ा।“

‘‘ओह नाहक तकलीफ की कार यहीं ले आते, या मुझे बाहर बुलवा लेते।‘‘

‘‘ओह! जनाब मजाक कर रहे हैं।‘‘

उसने तत्काल मुझे घूरकर देखा। पुलिसिया था भला हेकड़ी दिखाने से बाज कैसे आ सकता था। ऊपर से कोतवाली का इंचार्ज, तीन सितारों वाला इंस्पेक्टर यानि करेला और नीम चढ़ा।

”सॉरी।“

”क्या चाहते हो?“

”आपका कीमती समय जाया करना।“

”काम की बात करो?“

”मैं मानसिंह की मौत के संदर्भ में कुछ सवालात करने की इजाजत चाहता हूं।“

”यानी कि दिल्ली से तुम्हारा यहाँ आना बेवजह नहीं था।“

वो मुझे घूरता हुआ बोला।

”अब आपसे क्या छिपा है माई-बाप आप तो अंतरयामी हैं, सर्वव्यापी हैं।“

”मस्का लगा रहे हो।“

”आपके गुन गा रहा हूँ कृपा निधान, अब आप प्रसन्न मन से इस बालक की मुराद पूरी कीजिए।“

”बातें बढ़ियाँ करते हो।“

”मैं डांस भी बहुत बढ़िया करता हूँ।“

वह हंस पड़ा।

”तो मैं अपनी जिज्ञासाओं का पिटारा खोलूं जनाब! वैसे मुझे कोई जल्दी नहीं अगर आप चाहें तो ये काम हम चाय पीने के बाद भी शुरू कर सकते हैं।‘‘

‘‘चाय कहां है यहां?‘‘ वो हैरानी से बोला।

‘‘मैंने सोचा अभी आप आर्डर करेंगे‘‘

‘‘क्या आदमी हो भई तुम।‘‘ कहकर उसने अर्दली को बुलाकर चाय लाने को कह दिया।

”अब बोलो क्या जानना चाहते हो?“

”सबसे पहले तो आप यही बताइये कि, मरने वाला कैसा आदमी था।“

‘‘भई वह यहां के वीआईपी का दर्जा रखता था। राजा रजवाड़े कब के हिन्दोस्तान से खत्म हो चुके थे मगर वह आज भी खुद को यहां का बादशाह ही समझता था। उसके पूर्वजों ने कई पीढ़ियों तक यहां राज किया था लिहाजा राजशाही तो उसके खून में थी। समाज के उच्च वर्ग में वह काफी नामचीन हस्ती था। और निचला वर्ग तो उसे आज भी अपना राजा बल्कि भगवान समझता था। लोग अपने झगड़े-फसाद लेकर उसके पास इंसाफ मांगने पहुंचते थे और हैरानी थी कि उसका फैसला सभी को तहेदिल से कबूल होता था। दान-धर्म में उसकी पूरी आस्था थी। रोजाना सुबह नहा धोकर मंदिर जाता, फिर वापस लौटकर अपनी सभा जमाकर बैठ जाता और आठ से दस फरियादियों की फरियाद सुना करता था। इतना काफी है या और बताऊं?‘‘
 
‘‘काफी से भी ज्यादा है जनाब, अब जरा उसके साथ हुए हादसे पर रोशनी डालिए। सुना है आप भी उस दिन की पार्टी में इनवाइट थे।‘‘

‘‘नहीं भाई मेरी इतनी औकात कहां थी वो तो हमारे एसएसपी साहब को निमंत्रण आया था। जिन्होंने सीओ साहब को जाने को कह दिया क्योंकि उस रोज उनकी वाइफ हॉस्पिटल में एडमिट थीं। डिलीवरी का केस था। पहले तो सीओ साहब ने हामी भर दी मगर ऐन वक्त पर वो कहीं मशगूल हो गये तो मुझे हुक्म दनदना दिया। मैंने सोचा चलो बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा, सो बड़े लोगों की पार्टी इंज्वाय करने चला गया। मगर पहुंचने के बाद से ही यह एहसास होने लगा कि मैं कोई अवांछनीय तत्व था जिसकी वहां मौजूदगी बेमानी थी। मगर मेरे पीछे क्योंकि एसएसपी साहब का नाम था, इसलिए किसी ने मुझे वहां से भगाने की कोशिश नहीं की।‘‘

‘‘आप मजाक कर रहे हैं जनाब।‘‘

‘‘नहीं भई जो महसूस हुआ वो बयान कर रहा हूं।‘‘

‘‘हैरानी होती है सुनकर! बहरहाल मेरा फोकस इस बात पर है जनाब कि मतकूल क्या सचमुच दुर्घटना वश ही मरा था।‘‘

”दुर्घटना ही रही होगी भई“ - वो बोला - ”उस केस की तफ्तीश मैंने खुद की थी। कोई शक की गुंजाइश मुझे नहीं दिखाई दी और ना ही ऐसा कोई कैन्डीडेट, ऐसी कोई वजह हमें दिखाई दी जिससे हम यह सोचते की किसी ने जानबूझकर वो एक्सीडेंट स्टेज किया था और अच्छा ही हुआ कि ऐसा नहीं था वरना सीतापुर और आस-पास के शहरों में उसके इतने मुरीद हैं, कि पूरे शहर को आग लगा देते।“

”फिर तफ्तीश बंद कर दी गयी।‘‘

”मैंने ऐसा कब कहा?“

”नहीं कहा, फिर तो जरूर मेरे कान बज रहे होंगे।“

उसने फौरन अग्नेय नेत्रों से मुझ घूरा।

”कोई खता हो गई माई-बाप।“ - मैं सकपकाता हुआ बोला।

‘‘जुबान को काबू में रखना सीखो जानते नहीं कहां बैठे हो, मेरे लिए तुम्हारी किसी बात का जवाब देना जरूरी नहीं, फिर भी मैंने तुम्हे जाने को नहीं कहा तो अब नाशुक्रे बनकर तो मत दिखाओ।‘‘

‘‘सॉरी जनाब प्लीज आगे बताइये।‘‘

”वो बड़े लोगों की बड़ी पार्टी थी‘‘ - मेरी सॉरी को नजरअंदाज करके वह बोला - ‘‘पार्टी में शहर के जाने-माने धुरंधरों, सम्मानित लोगों को आमंत्रित किया गया था। जिनकी संख्या चालीस के करीब थी, सभी को एक-एक करके चेक कर पाना, काफी वक्तखाऊँ और दुश्वारियों से भरा हुआ काम था। इसके बावजूद जहां तक संभव हो सका हमने एक-एक व्यक्ति को चेक किया। अपनी इस तफ्तीश में मैंने मकतूल के भाई-भतीजे किसी को भी नहीं बख्शा मगर नतीजा सिफर रहा। कोई नई बात पता नहीं चली, जबकि उसकी मौत को दुर्घटना साबित करने वाले तथ्यों की अधिकता थी।“

”जैसे की....?“

”जैसे की, उसके भाई श्यामसिंह का ये कहना था कि वह रोज रात आठ बजे अपने कमरे से निकलकर छत पर पहुँच जाता था, और फिर घंटों वहाँ टहला करता था, टहलने जाने का उसका वक्त मुकर्रर था, ठीक आठ बजे! आंधी आए या तूफान, भले ही तेज बारिश हो रही हो मगर वह आठ बजे अपनी हवेली के छत पर होता था। और यह सिलसिला सालों से चला आ रहा था। अलबत्ता वापसी का कोई तयशुदा वक्त नहीं था।

इस लिहाज से वो उस दिन भी छत पर गया हो सकता था। मगर उस दिन वो पिये हुए था और शायद बहुत ज्यादा नशे में था। हमारा अपना ये अंदाजा है कि वह छत पर लगी रेलिंग से नीचे झांककर कुछ देखने की कोशिश कर रहा था या फिर किसी नौकर को आवाज दे रहा था, जबकि उसका बैलेंस बिगड़ा और वह छत के नीचे गिर गया। उसके पीने वाली बात और टहलने वाली आदत की पुष्टि खुद उसके भाई श्यामसिंह और बेटी जूही ने की थी। यह एक सीधा-सादा ओपेन एण्ड शट केस था, लिहाजा हमने उसकी फाइल बंद कर दी।“

”जूही ने एक बात और कही थी जिसे कि आप नजर अंदाज कर रहे हैं।“

”क्या?“

”उसका कहना है, कि जितनी शराब उस रोज मानसिंह ने पी थी, वो उनके लिए ऊँट के मुँह में जीरे के समान था, फिर नशे में होने का तो सवाल ही नहीं उठता।“

”मुझे याद है उसने ऐसा कहा था, मगर उसकी बात पर गौर करने का कोई कारण मुझे दिखाई नहीं दिया। शराब की एक ही मिकदार अलग-अलग वक्त में जहन पर अलग तरीके का असर दिखा सकती है। उस रोज भी यही हुआ होगा, उसने कम पिया था मगर नशा ज्यादा हो गया होगा।“

”यानी की जो बात पुलिस की सोच को हवा देती हो उन पर तो आप गौर करते हैं, मगर वो बात जो कि आपकी थ्योरी से अलग हटकर हो, जो आपकी थ्योरी में फिट नहीं बैठती हो। उसे आप नजरअंदाज कर देते हैं।“

मुझे लगा वो अभी फट पड़ेगा और मुझे चिल्लाकर गेट आउट बोलेगा मगर...।

”ऐसी बात नहीं है“ - वह बड़े ही सब्र से बोला - ”मेरे इलाके में कोई मुजरिम जुर्म करके बच जाय ये मेरे लिए डूब मरने वाली बात है, मगर शक की कोई गुंजाईश तो हो, और फिर इंवेस्टीगेशन में इतने रोड़े अटकाये गये कि मुझे मजबूरन केस क्लोज करना पड़ा।“

‘‘आपका मतलब है कोई ऐसा भी था जो नहीं चाहता था कि मानसिंह की मौत की तफ्तीश हो?‘

‘‘घोड़ों के आगे बग्घी मत जोतो, पहले पूरी बात सुन लो।‘‘

‘‘सॉरी।‘‘

‘‘दरअसल मेरे अधिकारी नहीं चाहते थे कि मानसिंह की मौत को लेकर शहर में कोई हंगामा हो, जिसका अंदेशा मैं पहले ही जाहिर कर चुका हूं। उन्होंने मतकूल की मौत के तीसरे ही दिन मुझे बुलाकर दो टूक सवाल किया कि अपनी अब तक की इंवेस्टिगेशन से मैंने क्या नतीजा निकाला है? क्या मानसिंह की मौत में किसी फाउल प्ले की गुंजाइश थी? मैंने कहा नहीं। जवाब में मुझे हुक्म दनदना दिया गया कि मैं उसे दुर्घटना बताकर केस क्लोज कर दूं।‘‘

‘‘जवाब में मैंने कुछ कहने की कोशिश की तो मेरे सर्कल ऑफीसर ने मुझे यूं घूरा जैसे मौन चेतावनी हो कि मैं अपनी जुबान ना खोलूं। बाद में कोतवाली पहुंचकर सीओ साहब ने मुझसे जानना चाहा कि क्या कोई सस्पेक्ट है मेरी निगाहों में, जवाब में मैंने उसे बताया कि सस्पेक्ट कोई नहीं मगर क्योंकि मतकूल के बाद उसकी इकलौती वारिस उसकी बेटी थी इसलिए मैं उसे चेक करना चाहता था। उससे गहराई से पूछताछ करना चाहता था। तब शायद कोई नई बात निकल कर सामने आ सके। जवाब में मुझे हुक्म हुआ कि मैं ऐसी कोई कोशिश भी ना करूं वरना नौकरी से हाथ धो बैठूंगा।‘‘

‘‘फिर!‘‘

‘‘फिर क्या भाई, मेरे चार बच्चे हैं, चारों लड़कियां हैं.....मुझे अपनी नौकरी प्यारी है।‘‘

”ओह!.....बहरहाल क्या लाश का पोस्टमार्टम हुआ था।“

”जाहिर है होना ही था-हुआ।“

”अगर आपको एतराज न हो तो मैं एक नजर वो रिपोर्ट देखना चाहता हूँ।“

वो हिचकिचाया।

”इंस्पेक्टर साहब प्लीज इतनी मेहरबानी करने के बाद ये हिचक समझ में नहीं आती। सिर्फ एक नजर नजर देखना ही तो चाहता हूं बशर्ते की उस ढोल में कोई पोल ना हो।“

‘‘कोई पोल नहीं है, मैं सिर्फ याद करने की कोशिश कर रहा था कि वो फाइल अभी इसी कमरे में है या रिकार्ड रूम में।‘‘

फिर उसने अपनी मेज पर लगी घंटी को पुश किया।

फौरन एक पुलिसिया कमरे में दाखिल हुआ।

‘‘जी जनाब!‘‘

”मानसिंह की फाइल निकालो।“

कहने के पश्चात् वो मुझे घूरता हुआ बोला - ”किस फेर में हो?“

”मैं समझा नहीं।“

”क्यों गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हो?“

”अपनी आदत से मजबूर हूँ बंदानवाज, चाहकर भी मैं खुद को हवेली में हो रहे हंगामों से अलग नहीं रख पाया।“

”बुरी मौत मरोगे।“

”शायद आप ठीक कह रहे हैं, मगर अब जबकि मैंने ओखली में सिर डाल ही दिया है तो मूसल से क्या डरना?“

इस बार वो कुछ नहीं बोला।

”तभी वो पुलिसिया मानसिंह की फाईल निकाल लाया, जसवंत सिंह ने फाईल उसके हाथों से लेकर उसे वापस भेज दिया, और बिना कुछ कहे पूरी फाईल मेज पर मेरे आगे रख दी।

मैने सरसरी तौर पर पूरी फाइल का मुआयना कर डाला। फिर पोस्टमार्टम रिर्पोट देखी, रिर्पोट में ऐसी कोई बात नहीं थी जो कि मुझे पहले से ही मालूम न हो। फाईल में घटनास्थल की कुछ तस्वीरें भी मौजूद थी, मैंने एक-एक करके सभी तस्वीरों को गौर से देख डाला। अंततः एक तस्वीर अलग करता हुआ जसवंत सिंह से बोला - ”अगर आपकी इजाजत हो तो मैं वक्ती तौर पर इस तस्वीर को अपने पास रखना चाहता हूँ, बाद में वापस कर दूँगा।“

उसने इजाजत दे दी। मैंने वह तस्वीर अपने कोट की जेब में रख ली।

”और कुछ।“ - वह बोला।

”था तो जनाब एक काम।“

”वो भी बोलो।“

”मैं उन तमाम लोगों के नाम और पते की लिस्ट चाहता हूँ जो कि वारदात वाली रात को जूही की बर्थ डे पार्टी में शामिल थे।‘‘

”फाइल ढंग से नहीं देखी लगता है, उसी में रखी है निकाल लो।“

मैंने ढूंढकर वो लिस्ट फाइल से अलग की और उससे इजाजत लेकर वहीं रखी फोटोकॉपी की मशीन से उसकी एक कॉपी निकाल ली। फिर मूल प्रति मैंने वापिस फाइल में लगाकर उसकी ओर बढ़ा दिया और उठ खड़ा हुआ।

‘‘अब एक आखिरी बात मेरी सुनो। इतनी जो कथा मैंने तुम्हें सुनाई है इसका मतलब ये हरगिज मत समझना कि मुझे किस्सागोई का कोई शौक है। बल्कि इसलिए सुनाई क्योंकि मुझे तुम काबिल नौजवान लगे। केस में हालांकि इंवेस्टीगेट करने के लिए कुछ नहीं रखा, मगर यहां से जाते वक्त अगर तुम भी यही बात कहकर जाते हो कि मानसिंह की मौत महज दुर्घटना थी, तो मेरे दिल को सकून मिल जायेगा, क्या समझे?‘‘

‘‘समझ गया जनाब, पहली बार किसी पुलिस अधिकारी को इतना इमोशनल देख रहा हूं। आप इत्मीनान रखिए बंदा दूध का दूध और पानी का पानी करके ही यहां से जायेगा। आखिर आपके विश्वास पर खरा उतरकर दिखाना है, खुद को काबिल नौजवान साबित करना है। लेकिन एक वादा आपको भी करना होगा।‘‘

उसकी प्रश्नसूचक निगाहें मेरी तरफ उठीं।

‘‘अगर मैं साबित करने में कामयाब हो जाता हूं कि मानसिंह की हत्या हुई थी, तो आप हत्यारे को उसके किये की सजा दिलाकर रहेंगे फिर चाहे वो कोई बाहुबली, कोई मंत्री, कोई बड़ा अफसर ही क्यों ना हो।‘‘

‘‘बेशक ऐसा ही होगा, और इसके लिए तुम्हें कातिल के खिलाफ सबूत जुटाने की भी जरूरत नहीं तुम सिर्फ कातिल को अपनी थ्योरी से कातिल साबित कर देना, बाकी काम पुलिस कर लेगी।‘‘

‘‘शुक्रिया जनाब।‘‘

”अगर कोई खास बात हो तो मुझे इंफार्म करना, हीरो बनने की कोशिश मत करना। जो भी करना खुद को महफूज रखकर करना। यहाँ के लोग-बाग बहुत की उद्ण्ड हैं वो सीधे मुंह तुम्हारी बात का जवाब नहीं देंगे और टेढ़ा रवैया तुम अपनाने की कोशिश भी मत करना वरना अपनी जान से हाथ धो बैठेगे।‘‘

”आप मुझे डरा रहे हैं।“

”नहीं तुम्हें आगाह कर रहा हूँ।“

”मैं ध्यान रखूँगा फिलहाल जर्रानवाजी का बहुत-बहुत शुक्रिया, नमस्ते।“

कहकर मैंने हाथ जोड़े और कमरे से बाहर निकल आया।

मैं एक बार पुनः अपनी कार में सवार हो गया, लाल बाग चौराहे पर पहुंचकर मैंने अपनी कार दाईं तरफ मोड़ दी और धीमी रफ्तार से ड्राइव करने लगा।

दो मिनट पश्चात मैं एक ”आर्म्स एण्ड एम्युनिशन स्टोर“ के सामने पहुँचा। फिर कार रोककर मैं नीचे उतर गया।

दो डगों में मैं दुकान के अंदर पहुँच गया।

”आइए सर“ - सेल्समैन बोला - ”क्या चाहिए?“

”पच्चीस कैलीबर की एक पिस्तौल दिखाओ।“ - कहते हुए मैंने उसे अपना लाइसेंस निकालकर दिखाया, जिसमें स्पष्ट लिखा था कि विभिन्न कैलीबर की कई गन मैं रख सकता था।

लाइसेंस से संतुष्ट होकर सेल्समैन ने गन दिखाना शुरू किया। सब क्लोज रेंज वाली गन थीं, अच्छा निशाने बाज ही उन्हें ढंग से इस्तेमाल कर सकता था, लेकिन अपने आकार की वजह से वो मेरी जरूरत पर फिर बैठती थी। मैंने एक गन पसंद की। बेल्ट होलस्टर और लोडेड क्लिप सहित क्रेडिट कार्ड के जरिये खरीद ली।

तकरीबन सात बजे मैं लाल हवेली पहुँचा। अब तक चारों तरफ अंधेरा फैल चुका था।

कार को पोर्च में ही छोड़कर मैं भीतर प्रवेश कर गया।
 
हॉल में जल रहे इकलौते सौ वॉट के बल्ब का पीला प्रकाश फैला हुआ था, उसकी मध्यम रोशनी में मैं सीढ़ियों की तरफ बढ़ा, चारों तरफ मरघट का सा सन्नाटा फैला हुआ था, उस सन्नाटे में मेरे चलने से पैदा हुई खट्-खट् की आवाज बड़ी डरावनी प्रतीत हो रही थी।

सीढ़ियां चढ़कर मैं पहली मंजिल पर स्थित जूही के कमरे तक पहुंचा।

दस्तक के जवाब में खुद जूही ने दरवाजा खोला।

”तुम“ - वो एकटक मुझे देखती हुई बोली - ”कहाँ थे अभी तक?“

”यहीं खड़े होकर बताऊँ।“

”सॉरी“ - वो दरवाजे से अलग हटती हुई बोली - ”प्लीज कम“।

मैं कमरे के अंदर प्रवेश कर गया।

”शीली कहाँ है?“

”अपने कमरे में होगी।“

”मैंने उसे मना किया था कि तुम्हें छोड़कर ना जाये।“

”वो बस अभी थोड़ी देर पहले ही गई है।“

”तुमने खाना खाया।“

”अभी नहीं, हम तुम्हारा इंतजार कर रहे थे।“

”प्रकाश कहाँ है?“

”मालूम नहीं, शायद अपने कमरे में हो। मेरी तो हिम्मत नहीं हुई उसके सामने जाने की, बहुत बुरा सलूक किया मैंने बेचारे के साथ।“

‘‘बहुत बुरा तो खैर नहीं था, बस जरा सा ज्यादा हो गया था।‘‘ मैं हंसता हुआ बोला।

वह भी हौले से हंस दी, ‘‘क्या करूं वो बार-बार मुझे पागल कहे जा रहा था बस मैं अपना आपा खो बैठी। बहरहाल जो हुआ उसका मुझे सख्त अफसोस है मैं उससे माफी मांग लूंगी। मेरा भाई है माफ कर देगा मुझे।‘‘

ठीक तभी कमरे में जल रही टयूब लाईट अचानक ही बंद हो गई। पूरा कमरा अंधकार में विलीन हो गया, जूही मेरे समीप ही खड़ी थी, मगर मैं उसकी शक्ल देखने में असमर्थ था, अंधेरा इतना गहन था कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता।

”ये टयूब लाइट को क्या हुआ?“

”मालूम नहीं शायद बिजली गुल हो गई“ - वो बोली -”तुम रूको मैं मोमबत्ती तलाश करती हूँ।“

फिर कुछ देर तक कमरे में खिट-पिट की आवाजें गूँजती रही तत्पश्चात् मुझे जूही का फुसफुसाता हुआ स्वर सुनाई दिया - ”राज जरा इधर आओ।“

मैं बिना कोई जवाब दिये अंदाजे से उसकी तरफ बढ़ा, वह पलंग के सिराहने खड़ी थी।

”क्या हुआ?“

”बताती हूँ पहले इधर आओ।“

वो मेरा हाथ पकड़कर मुझे खिड़की के पास ले गई।

”बाहर देखो।“ - वो बोली।

मैंने वैसा ही किया।

”कुछ दिखाई दिया।“

”नहीं।“

”ध्यान से सदर दरवाजे को देखो वहाँ नर कंकाल खड़े हैं क्या वो तुम्हे भी दिखाई दे रहे हैं या मुझे वहम हो रहा है।“

मैंने गौर किया तो पाया कि वो सच बोल रही थी। साथ मैं मुझे उसके शरीर में कम्पन होता महसूस हुआ।

‘‘बोलो क्या वो तुम्हें भी दिखाई दे रहे हैं?‘‘

‘‘हां।‘‘

”ओह माई गॉड ये कर क्या कर रहे हैं?“ - वह पुनः फुसफसाई।

”मीटिंग कर रहे हैं और ये फैसला करने की कोशिश कर रहे हैं कि कौन कहाँ ड्यूटी करेगा।“

”नानसेंस?“ - वह कड़वे स्वर में बोली - ”मेरी जान पर बनी है और तुम्हे मजाक की सूझ रही है।“

”कहाँ है?“

‘‘कौन?‘‘

‘‘तुम्हारी जान?‘‘

”यहाँ।“

कहते हुए उसने मेरा हाथ अपने सीने पर रख लिया। मैं यूं चिहुंका जैसे गलती से बिजली का नंगा तार मेरे जिस्म से छू गया हो। उसका दिल बड़े ही तेज गति से धड़क रहा था। उसके उभारों का स्पर्श पाकर मुझ पर एक अजीब सा नशा सवार होने लगा। मैं उस मदहोश कर देने वाले नशे को खूब पहचानता था। मैंने उसे खींचकर अपनी बाहों के घेरे में ले लिया और उसके सुलगते होंठों पर अपने होंठ रख दिये। फिर तो जैसे तन-बदन सुलग सा उठा। पर ऐसा ज्यादा देर तक नहीं चला। अचानक ही जैसे मेरी खोई हुई चेतना वापस लौटी। मैंने एक झटके से वह मोहजाल तोड़ दिया और उसे खुद से परे झटक दिया।

”सॉरी, आइम रियली सॉरी“ - वो फुसफुसाई - ”मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।“

”नेवर मांइड, मैं नहीं समझता कि इसमें तुम्हारा कोई कसूर है।“

”फिर किसका कसूर था?“

”जाहिर है तुम्हारी चढ़ती हुई जवानी का।‘‘

‘‘चुप करो।‘‘

”मैं हकीकत बयान कर रहा हूँ, और इससे पहले की इस अंधेरे में मेरी नीयत फिर डोल जाय। तुम्हारा बेमिशाल हुस्न मुझे पागल कर दे। और मैं तुम्हारे इस सांचे में ढले बदन पर टूट पड़ूं! तुम उजाले की व्यवस्था करो, वरना कहे देता हूँ बाद में अपनी इज्जत की दुहाई देती मत फिरना।“

मेरी बात सुनकर वो खिलखिला उठी।

”मैं अभी इंतजाम करती हूँ।

कहकर वो दरवाजे की तरफ बढ़ी।

मैं अपनी जगह पर खड़ा रहा, मैंने एक बार पुनः खिड़की से बाहर झांक कर देखा, मगर अब वे नरकंकाल जा चुके थे।

”राज“ - जूही की आवाज गूँजी - ”किसी ने बाहर से दरवाजा लॉक कर दिया है।“

”क्या?“

चौंक कर मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा।

वह सचमुच लॉक्ड था।

”दरवाजा किसने लॉक किया?“

”मुझे क्या मालूम मैं तो हर वक्त तुम्हारे साथ थी?“

”कमरे की चाबी कहाँ रखी थी तुमने?“

”वो बाहर लॉक में ही लगी हुई थी।“

”फिर क्या करें!“

मैंने लॉक का मुआयना किया वो बिल्ट इन लॉक था।

”इसकी दूसरी चाभी होगी तुम्हारे पास।“

”है तो सही, मगर इस अंधेरे में उसका मिल पाना मुश्किल है।“

”हवेली के सभी कमरो में क्या ऐसे ही लॉक लगे हैं?“

”नहीं, ऐसा सिर्फ इसी कमरे में है, अभी हाल ही में इसका दरवाजा चेंज किया गया था इसलिए ऐसा आधुनिक लॉक मौजूद है।“

तभी मुझे याद आया कि मेरी जेब में लाइटर मौजूद था मैंने उसे बाहर निकाल लिया।

ठीक उसी वक्त मुझे अपने बाईं तरफ जोर की सरसराहट महसूस हुई।

मैंने चौंककर आवाज की दिशा में देखा।

वहाँ दीवार के साथ अंधेरे में एक साया मुझे दिखाई दिया। मैं उसकी सूरत न देख सका, अलबता उसके सिर पर रखे टोकरीनुमा हैट का आभास मुझे जरूर हुआ।

”राज यही है वो आदमी।“

कहते हुए जूही ने मुझे जोर से भींच लिया, इस वक्त उसका जिस्म किसी सूखे पत्ते की तरह काँप रहा था।

”कौन आदमी?“

”वही...... वही जो कि पहले भी दो बार मुझ पर गोली चलाकर मेरी जान लेने की कोशिश कर चुका है।“

उसका इतना कहना था कि साये ने जोर का अट्हास किया, उसके शरीर में हरकत हुई। अंधेरे में मैंने उसका एक हाथ ऊपर उठता महसूस किया।

खतरा!

मेरे दिमाग में कौंधा, और मैं जूही को लिये दिये फर्श पर ढेर हो गया।

”धाँय!.... गोली चलने की जोरदार आवाज गूँजी।

हम बाल-बाल बचे, अगर मैं जरा भी चूक जाता तो निश्चय ही वो गोली हम दोनों में से किसी एक का काम तमाम कर जाती। मैं जूही को लिए दिये लुढ़कता हुआ दीवान के नीचे पहुँच गया। तब मुझे अपनी जेब में मौजूद पच्चीस कैलीबर की गन का ख्याल आया।

मैंने गन बाहर निकाल ली, और अंदाजे से साये के ऊपर फायर झोंक दिया, गोली की आवाज गूंजी मगर कोई प्रत्याशित परिणाम सामने नहीं आया।

”धाँय।“

कुछ क्षण बाद साये की तरफ से पुनः फायर किया गया, मैंने तुरंत जवाबी फायर किया, और जूही को धकेलता हुआ बेड के दूसरी तरफ पहुंच गया। फिर फायर नहीं हुआ, हम दम साधे फर्श पर पड़े रहे। जूही अभी भी मुझसे लिपटी हुई थी। उसकी हालत खराब थी, साँसे उखड़ी और शरीर कांप रहा था, उस अवस्था में मुझे बेहद असुविधा हो रही थी। मगर मैंने उसे खुद से अलग करने की कोशिश नहीं की।

मेरे कान साये की तरफ से उभरने वाली किसी आहट पर लगे हुए थे। मगर कमरे में पूर्वतः सन्नाटा छाया रहा।

दस मिनट पश्चात।

मैंने खुद को जूही की पकड़ से मुक्त किया और सावधानी पूर्वक सिर ऊपर उठाकर देखा। कहीं कोई नहीं था, मैं अंधेरे में आंखें फाड़-फाड़ कर उस अजनबी साये को तलाश करने की कोशिश करता रहा, मगर वो कमरे में कहीं नहीं था, शायद वो जा चुका था।“

मगर कैसे दरवाजा तो बंद था, फिर वो बाहर कैसे गया और लाख रूपये का सवाल ये कि वो अंदर आया ही कैसे? यह प्रश्न मेरे दिमाग में हथौड़े की तरह ठोकर मार रहा था। मगर उसका कोई मुनासिब जवाब मुझे नहीं सूझा।

ठीक तभी बिजली आ गई, पूरा कमरा टयूब लाईट के दूधिया प्रकाश में नहा उठा। मैं खिड़की के समीप पहुँचा, मगर वहाँ से नीचे उतर जाना नामुमकिन था क्योंकि खिड़की पर लोहे की मजबूत ग्रिल लगी हुई थी।

मैं दरवाजे के पास पहुँचा।

मैंने हैंडल ट्राई किया तो वह खुलता चला गया।

”तो क्या वह साया“ - मैं जैसे खुद से बोला - ”इस दरवाजे को खोलकर बाहर निकल गया।“

”शायद।“

मैंने दरवाजे के लॉक पर गौर किया चाभी उसमें बाहरी की तरफ ही फँसी हुई थी।

उसी वक्त दरवाजे पर डॉली प्रकट हुई।

”तुम कब आये?“ वह संदिग्ध निगाहों से मुझे घूरती हुई बोली।

”तकरीबन आधे घंटे पहले।“

”तुमने गोली चलने की आवाज सुनी थी?“

”हाँ, वो गोली हम पर ही चलाई गई थी।“

”हम पर।“ - वो अचकचाई।

”हाँ मुझपर या फिर जूही पर या फिर हम दोनों पर।“

कहकर मैंने जूही पर दृष्टिपात किया, उसका चेहरा अभी तक पीला पड़ा हुआ था।

”गोली किसने चलाई।“

”मालूम नहीं, उस वक्त लाईट गुल थी मैं अँधेरे में उसकी शक्ल नहीं देख सका, मगर जूही कहती है कि ये वही आदमी था जो पहले भी उसकी जान लेने की कोशिश कर चुका है।“

यानि कि पहले भी इसने कोई सपना नहीं देखा था, सबकुछ सचमुच घटित हुआ था।

‘‘अब तो यही लगता है।

”तुम कहते हो लाइट चली गई थी, मगर मेरे कमरे की लाइट तो हर वक्त मौजूद थी।“

”जब लाईट गुल हुई थी तब जरूर तेरी आंख लग गई होगी।“

”बकोमत, मैं अपने कमरे में बैठकर तुम्हारा इंतजार कर रही थी ना कि सो रही थी।“

”ओह‘‘ - मैं विचार पूर्ण भाव से बोला - ”फिर तो जरूर किसी ने मेन स्विच ऑफ कर दिया होगा।“

‘‘ऐसा होता तो मेरे कमरे की लाइट भी चली गई होती।‘‘

‘‘ऐसा नहीं है क्योंकि इस कमरे के बाहर एक स्विच लगा हुआ है जिसको ऑफ करने से सिर्फ इसी कमरे की इलैक्ट्रिक कनैक्टविटी बंद हो जाती है।‘‘
 
‘‘ऐसा तो पहले सिर्फ मैंने होटलों में देखा है। वो भी इसलिए लगाया जाता है कि गलती से अगर कस्टमर कोई इक्युपेंट जैसे कि एसी, फैन, टीवी इत्यादि बंद करना भूलकर बाहर चला जाय तो बिना उसका कमरा खोले उन्हें बंद किया जा सके। किसी घर में तो ऐसा मैं पहली बार देख रही हूं।‘‘

जवाब में मैंने जूही की ओर देखा।

‘‘जब इस कमरे का दरवाजा चेंज किया गया था तभी यह स्विच भी लगाया गया था।‘‘ - मेरा मंतव्य समझते हुए उसने जवाब दिया - ‘‘कोई वजह नहीं थी बस यूंही लगा दिया गया था।‘‘

”वजह तो थी नूरे नजर, बहुत बड़ी वजह थी।“

‘‘क्या वजह थी।‘‘

मैंने जवाब नहीं दिया और आगे बढ़कर लाइट का स्विच ऑफ कर दिया, कमरे में एक बार फिर अंधेरा छा गया। अंधेरे में मैंने इधर-उधर निगाह घुमाया तो बाईं तरफ की दीवार में ऊपर की तरफ मुझे एक बाई एक फीट का मोखला नजर आया, और मेरे दिमाग में जैसे कोई धमाका सा हुआ। दिल हुआ अपने ऊपर जी-खोलकर हंसू। कितना बड़ा बेवकूफ साबित हुआ था मैं। अब बस अपने अंदाजे की पुष्टि करना बाकी था। मैंने लाइट वापस जला दी और वो गोलियां ढूंढने लगा जो हमलावर और मैंने इस कमरे में चलाई थीं। मेरी चलाई गोलियां तो सामने की दीवार से बरामद हो गइंर् मगर हमलावार की गोलियां कमरे से बरामद नहीं हुईं ना ही दीवारों पर या फर्श पर गोली चलने का कोई निशान दिखाई दिया। अब मुझे अपना अंदाजा सौ फीसदी दुरूस्त जान पड़ने लगा।

अब एक आखिरी चीज बरामद होनी बाकी थी।

”जो होना था हो गया, बाकी की जासूसी बाद में कर लेना।‘‘ जूही कमरे में फैले सन्नाटे को भंग करती हुई बोली, ‘‘चलो पहले हम खाना खायें, काफी देर हो चुकी है।“

हम सभी डायनिंग हॉल में पहुंचे। जूही ने नौकर को आवाज देकर खाना लगाने को बोल दिया। फिर हम तीनों ने डट कर खाना खाया और जूही को उसके कमरे में पहुँचाने के बाद मैं डॉली के साथ उसके कमरे में आ गया।

अभी मैं बैड के समीप पहुँचा ही था कि उसने मुझे जबरन बैड पर धकेल दिया और खुद मेरे सामने एक स्टूल पर बैठती हुई बोली - ”अब फटाफट बोलो तुम क्या गुल खिला रहे थे, जूही के साथ उसके कमरे में?“

”मैं समझा नहीं।“

”वाह रे मेरे भोले बालम! इतने नासमझ तो नहीं थे तुम।“

”अब कुछ कहेगी भी।“

”मैं खूब समझती हूँ, तुम्हारी लच्छेदार बातों को“ - वह मुँह बिगाड़कर बोली - ”बिजली गुल हो गई थी, हम पर गोली चलाई गई थी, नॉनसेंस तुम अपनी हरकतों से कभी बाज नहीं आओगे।“

”मैं अभी भी नहीं समझ तू कहना क्या चाहती है?“

”अब इतने भोले मत बनो, मैं जब वहाँ पहुँची तो तुम्हारे, बल्कि तुम दोनां के कपड़े अस्त-व्यस्त थे। जूही तब भी हाँफ रही थी। फिर जब तुमने उसकी तरफ देखा तो उसकी निगाहें झुक गयीं। उसका चेहरा लाल हो गया, और उस लाली का मतलब मैं खूब समझती हूँ जासूस साहब।“

”हे भगवान“ - मैंने आह सी भरी - ”अरी बावली हमारे कपड़े इसलिए अस्त-व्यस्त थे क्योंकि हम अपनी जान बचाने के लिए दीवान के नीचे जा घुसे थे। उस साये ने हम पर दो बार गोलियाँ चलाई थीं। ये तो हमारी किस्मत अच्छी थी जो कि हम बच गये।“

”मगर मुझे तो चार बार गोलियों की आवाज सुनाई दी थी।“

”बाकी के दो फायर मैंने किये थे।“

”तुम्हारे पास रिवाल्वर कहाँ से आई?“

”खरीदी है आज ही।“

”कहाँ है, मुझे दिखाओ।“

मैंने रिवाल्वर उसे सौंप दी।

”इस बात की क्या गारंटी कि वो चारों गोलियाँ तुमने नहीं चलाई थीं।“

”गन तेरे हाथ में है, गोलियाँ चैक कर ले, और फिर मुझे खामख्वाह गोलियाँ खर्च करने की क्या जरूरत थी?“

”तुम्हारा कोई भी काम खामखाह नहीं होता अगर तुमने चार गोलियाँ चलाई थीं तो उसकी भी कोई खास वजह रही होगी।“

”रिवाल्वर का चैम्बर चेक कर ले अगर दो से ज्यादा गोलियाँ चली हों तो मैं तेरा मुजरिम हुआ।“

”रहने दो अगर तुम कहते हो तो दो ही गोलियाँ कम होंगी, भले ही तुमने चार चलाई हों।“

”जादू के जोर से।“

”नहीं तुम्हारे जोर से तुमने अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए पहले ही इसमें दो गोलियाँ भर ली हो सकती हैं।“

मैंने असहाय भाव से उसकी ओर देखा, वो परे देखने लगी।

अब अगर तेरी बात खत्म हो चुकी हो तो मैं कुछ कहूँ।

”बोलो।“

”गोली चलने की आवाज तुझे तो सुनाई दे गई मगर प्रकाश और यहाँ के नौकर-चाकरों के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी, क्यों?“

”क्योंकि प्रकाश अपने कमरे में नहीं है, और नौकर पहले से ही इतने डरे हुए हैं कि ऐसी बातों से दूर रहने में ही अपना कल्याण समझते हैं। सच पूछो तो अगर उन्हें जूही का लिहाज नहीं होता तो वे कब के नौकरी छोड़कर भाग गये होते। ऐसा दावे के साथ मैं इसलिए कह रही हूं क्योंकि तुम्हारे जाने के बाद मैंने काफी देर तक यहां नौकरों के साथ माथापच्ची की थी।“

”प्रकाश कहाँ गया है?“

”मालूम नहीं वो शाम से गायब है।“

”जूही के कमरे से बाहर निकलने का दरवाजे के सिवाय कोई दूसरा रास्ता है।“

”नहीं है, क्यों?“

”क्योंकि लाइट जाने से पहले जब मैं उसके कमरे में पहुँचा तो कमरा खाली पड़ा था। फिर बाद में बिजली गुल हो गई और दरवाजे को किसी ने बाहर से लॉक कर दिया। इसके बावजूद हमलावर कमरे के भीतर कैसे पहुँच गया?“

”शायद दरवाजा खुद उसने कमरे के अंदर पहुँचने के बाद लॉक कर लिया हो, या फिर दरवाजा लॉक होने से पहले ही वो कमरे के भीतर पहुँच चुका हो।“

”फिर दरवाजा किसने लॉक दिया?“

”क्या पता?“

”या फिर दरवाजा खुद जूही ने लॉक कर दिया हो।“

”वो ऐसा क्यों करेगी?“

मुझे जवाब नहीं सूझा।

”अलबत्ता एक दूसरी बात हुई हो सकती है।“

”वो क्या?“

”ये सब ड्रामा तुमने खुद क्रियेट किया हो सकता है।“

”किसलिये?“

”जूही पर रौब गालिब करने के लिए! उसे जबरन अपना अहसानमंद बनाने के लिए और फिर बाद में उस अहसान की वसूली के लिए जो कि मुझे लगता है तुम कर भी चुके हो।“

”नहीं हो सकता, तेरे रहते तो हरगिज-हरगिज भी ऐसा नहीं हो सकता।“

”बकोमत, मैं क्या तुम्हे जानती नहीं। तुम्हारी सख्सियत उस छुट्टा सांड की तरह है जो कभी भी किसी भी खेत में मुंह मार सकता है।“

”मैं अपने खेत में मुँह मारना चाहता हूँ, तू राजी तो हो उसके लिए।“

”शटअप।“

मैं हँसा।

”आई से शटअप।“

”ओके-ओके मैं हो गया शटअप।‘‘

”अब तुम जाओ मुझे नींद आ रही है।“

”मुझे भी नींद आ रही है।“

”तभी तो कह रही हूँ जाओ यहाँ से।“

”मैं यहीं तेरे पास सो जाता हूँ।“

”हरगिज नहीं।“

”क्यों?“

”मुझे तुम पर ऐतबार नहीं है।“

”तुझे अकेले सोते हुए डर नहीं लगता।“

”बिल्कुल नहीं, अब तुम जाओ यहाँ से।“

”ठीक है मैं जूही के कमरे में जाता हूँ। वह डरी हुई है, मुझे लगता है उसे मेरी जरूरत पड़ सकती है। मैं वहीं सोऊँगा, मुझे उम्मीद है वह इंकार नहीं करेगी।“

”तुम जूही के कमरे में नहीं जाओगे।“

”कौन रोकेगा मुझे?“

जवाब में वो केवल कसमसा कर रह गई।

”ठीक है मैं उसके कमरे में नहीं जाऊँगा, बशर्ते की तू मुझे यहीं सोने दे।“

”ओ.के.‘‘ - वो मरे स्वर में बोली - ”मगर तुम अपनी मर्यादा का ध्यान रखना।“

”मैं हमेशा ध्यान रखता हूँ।“

”ठीक है सो जाओ।“

जवाब में मैं पूरे कपड़ों में ही बेड पर पसर गया। वो बेड के दूसरे किनारे पर खिसक गई।

‘‘शीला!‘‘ कुछ क्षण बाद मैंने उसे पुकारा।

‘‘हूं!‘‘

उसने मेरी तरफ देखे बिना जवाब दिया।

‘‘तुझे पता है?‘‘

‘‘क्या?‘‘

‘‘यही कि तू कितनी खूबसूरत है।‘‘

‘‘हां पता है।‘‘-वो हौले से हंसी - ‘‘अपने ये पैंतरे किसी और पर आजमाना, मैं तुम्हारे झांसे में नहीं आने वाली, आना होता तो पांच साल पहले ही आ गयी होती जब मैं तुम्हारे हरामीपन से वाकिफ नहीं थी।‘‘

‘‘अरे मैं सच कह रहा हूं, बहुत शानदार है तू।‘‘

”मैं शानदार हूँ।“

”हद से ज्यादा।“

‘‘ठीक है मान लिया, अब सो जाओ।‘‘

जवाब में मैं ठण्डी आह! भर कर रह गया। पता नहीं कमीनी लड़कियां उसके जैसी होती हैं या उसके जैसी लड़कियां कमीनी होती हैं। कम्बख्त का ये हाल तब था जबकि उसका कोई ब्वायफ्रेंड भी नहीं था। होता तो जरूर उसके हाथों अब तक मेरा कत्ल करवा चुकी होती।

मैंने अपनी आंखें बंद कर लीं और सोने की कोशिश करने लगा। मेरी उस वक्त की जहनी हालत का अंदाजा सिर्फ वही साहबान लगा सकते हैं जिन्हें ज्येष्ठ की तपती दोपहरी में, कुआं सामने होने के बावजूद पानी नसीब ना हुआ हो।

तकरीबन पन्द्रह मिनट और गुजर गये।

”राज“ - डॉली ने हौले से फुसफुसाते हुए आवाज दी।

मैं ज्यों का त्यों पड़ रहा।

‘‘किक्रांत उठो प्लीज।‘‘

मुझे झकझोरते हुए वह फुसफसाई।

”क्या हुआ?“ मैंने फुसफुसाते हुए ही पूछा।

”कमरे में कोई है।“

”मैंने आंखे खोलकर देखा कमरे में जलता जीरो वॉट का बल्ब बुझ चुका था मगर कमरे में अभी भी हल्का सा प्रकाश फैला हुआ था। उस नीम अंधेरे में मुझे डॉली की शक्ल तो नहीं दिखाई दी मगर दरवाजे के पास खड़े दो नर कंकालों पर निगाह गये बिना नहीं रही। हड्डियों के ढांचे दूर से ही चमक रहे थे।

”खामोश रह।“-मैं उसके कान में फुसफुसाया-‘‘और लड़ने के लिए तैयार हो जा। जूही के मन से इनका खौफ हटाने का वक्त आ चुका है।“

‘‘हे भगवान! तुम पागल हो, नरकंकालों से कौन जीत सकता है।‘‘

‘‘ज्यादा भोली मत बन! तुझे खूब पता है कि यह क्या बला हैं।‘‘

‘‘ओह! यानि कि मैं खामखाह आजतक तुम्हे तपाने की कोशिश कर रही थी।‘‘

तभी दोनों नरकंकाल आगे बढ़े उनके हाथों में नंगी तलवारें थी, खतरे का अहसास होते ही हमने अपनी-अपनी रिवाल्वर निकालकर हाथ में ले ली।

उनमें से एक कंकाल मेरे पास पहुँचा। उसका तलवार वाला हाथ हवा में ऊँचा उठा, इससे पहले की वो मुझ पर वार कर पाता, मैंने उसके हाथ का निशाना लेकर गोली चला दी। वो जोर से चिल्लाया, तलवार उसके हाथ से नीचे जा गिरी। तभी एक फायर और हुआ गोली भागने की कोशिश कर रहे दूसरे कंकाल को लगी वह चीख मार कर कमरे के फर्श पर गिर पड़ा।

ठीक तभी मेरी बगल में खड़े कंकाल ने भागने की कोशिश की, मैंने झपट कर उसे पकड़ लिया। मेरी पकड़ कोई कंकाल नहीं था, बल्कि वो जीता जागता इंसान था। मैंने बिना कोई मौका दिये उसे लात घूंसों पर रख लिया, जबकि हाथ में रिवाल्वर लिये डॉली दूसरे कंकाल का मुआयना करने लगी।

”ये तो मर गया।“

‘‘हाथ पर गोली चलानी थी।‘‘

‘‘मैंने हाथ पर ही चलाई थी, ऐन वक्त पर उसने खुद को झुककर बचाने की कोशिश की और गोली इसकी गर्दन में जा घुसी।‘‘

”ओह, तुम जूही को यहाँ लेकर आओ फौरन! उसके मन से इन कंकालों का भय दूर करना बहुत जरूरी है, साथ में कोई टार्च भी लेती आना।“

”मैं समझ गई।“

कहकर वो दरवाजा खोलकर कमरे से बाहर निकल गई।

”नाम क्या है तेरा?“

मैंने अपने सामने बेसुध पड़े कंकाल से पूछा।

उसने जवाब नहीं दिया।

मैंने रिवाल्वर की नाल उसके माथे पर रख दी।

”अगर अपने साथी वाले अंजाम को नहीं पहुंचना चाहता हो फटाफट अपना नाम बोल।“

वो खामोश रहा।

मैंने रिवाल्वर का सेफ्टी कैच पीछे खिसकाया।

”नहीं“ - वो गिड़गिड़ाया- ”प्लीज गोली मत चलाना।“

”नाम बता अपना।“

”नरेश।“ - वो मरे स्वर में बोला।

”ये सब ड्रामा क्यों कर रहा था?“

”बॉस के हुक्म पर।“

”बॉस कौन?“

”दिलावर सिंह। वह यहाँ का बहुत बड़ा दादा है। सभी उससे खौफ खाते हैं, तुमने उसके आदमी को मारा है, वो तुम्हें कुत्ते की मौत मारेगा।“

”जुबान बंद कर और दिलावर सिंह का पता बोल।“

”वो आलम नगर में रहता है।“

”आलम नगर में कहाँ?“

”मच्छी बाजार के पास।“

”वो हवेली में ये ड्रामा क्यों करवा रहा है?“

”मालूम नहीं मगर बॉस हर काम पैसों के लिये करता है। इसके लिए भी उसे पैसे मिले होंगे।“

”किसने दिये पैसे?“

”मुझे नहीं मालूम।“

”फिर किसे मालूम होगा?“

”बॉस को।“

”तुम लोग मुझे क्यों मारना चाहते थे?“

”बॉस का यही हुक्म था।“

”मानसिंह को भी तुम्हारे बॉस ने ही मरवाया था।“

”मालूम नहीं।“

”यहाँ इस वक्त तुम कितने आदमी हो?“

”दो जिसमें से एक को तुमने मार दिया।“

”आज दो हो या हमेशा दो ही रहते हो।“

”दो ही रहते हैं।“

तभी दरवाजे पर डॉली के साथ जूही प्रकट हुई।

”तुमने“ - वो फर्श पड़े कंकाल को देखती हुई हैरानगी भरे स्वर में बोली - ”इसको मार डाला।“

”और दूसरे को पकड़ लिया।“ -मैं बोला - ”ये दोनों कंकालों के कानून का उल्लंघन कर रहे थे। धरती पर भेजने से पहले इन्हें कसम खिलाई जाती है कि ये लोहे की चीजों से डरेंगे। हनुमान चालीसा पढ़ने वाले व्यक्ति से दूर रहेंगे। मगर इन्होंने आज कंकाल कानून का उल्लंघन कर दिया। लिहाजा इनमें से एक को डॉली ने कंकाल एक्ट की धारा तीन सौ दो के तहत सजा ए मौत दे दिया क्योंकि वो लोहे की तलवार हाथ में लेकर मुझ पवन पुत्र हनुमान के भक्त को मारने आया था। मगर दूसरे ने अपनी गलती स्वीकार कर ली, इसलिए मैंने इसे जिन्दा छोड़ दिया।“

मजाक मत करो।

”शीला।“

”हाँ।“

”चिराग रोशन करो।“

फौरन उसने टार्च जला दी।

अब हमारे सामने एक जीता जागता इंसान खड़ा था। वो ऊपर से नीचे तक काले लबादे से ढका हुआ था, और उस लबादे पर पेंट द्वारा कंकाल का दृश्य अंकित किया गया था।

”हे भगवान“ - जूही आश्चर्य मिश्रित स्वर में बोली, ”ये सब क्या है?“

”आधुनिक प्रेत लीला“ - मैं बोला - ”अँधरे में इनका काला लबादा छिप जाता है, और उस पर नाइट ब्राईट पेंट - जो कि अंधेरे में चमकने लगता है - द्वारा बनाया गया हड्डियों का ढाँचा हमें दिखाई पड़ने लगता है। लिहाजा तुमने इन्हें नर कंकाल समझ लिया। हैरानी होती है कि आज के युग में, पढ़ी-लिखी होकर भी तुम इतने छोटे ट्रिक में जा फंसी। जबकि इससे मिलते-जुलते पेंट का इस्तेमाल हमें सड़कों पर, स्पीड ब्रेकर पर और टै्रफिक पुलिस की वर्दी पर आम देखने को मिल जाता है। बस अंतर ये ही कि वे पेंट अंधेरे में रोशनी पड़ने पर चमकते हैं और इनके मेकअप में इस्तेमाल पट्टियां अंधेरे में चमकती हैं। तुमने रेडियम डॉयल वाली घड़ी देखी होगी बस समझ लो ये वैसा ही कुछ है।“

”कहते हुए मैंने उसके सिर से नकाब खींच लिया, वह तकरीबन बीस वर्षीय क्लीन सेव्ड युवक था जो कि शक्लो-सूरत से काफी भला दिखाई देता था।“

”पहचानती हो उसे“

”नहीं।“

मैंने दूसरे का नकाब हटाया। फिर जूही की तरफ देखा।

”इसे भी नहीं पहचानती, कौन है ये?“

”सब मालूम हो जायेगा, डॉली तुम कोतवाली फोन करके इंस्पेक्टर जसवंत सिंह को यहाँ हुई वारदात की खबर करो उसका नम्बर मेरे मोबाइल में सेव है।“

वो बिना कुछ कहे फोन करने में लग गई।

तब मैंने जूही के साथ मिलकर नरेश की मुश्कें कस दीं।

थोड़ी देर बाद डॉली ने बताया कि उसकी जसवंत सिंह से बात हो गयी है वो पहुंच रहा है।

”गुड, मेरी रिवाल्वर कहाँ है?“

उसने रिवाल्वर मुझे दे दी।

”तुम दोनों जूही के कमरे में सोई हुई थीं। बाद में गोली चलने की आवाज सुनकर तुम्हारी नींद उचट गई। जब तुम यहाँ पहुँची तब यह फर्श पर मरा पड़ा था और दूसरा मेरी पकड़ में था, ध्यान रखना पुलिस के सामने तुम दोनों को यही बयान देना है।“

”मगर ये तो जिंदा हैं...इसने अगर मुंह फाड़ा तो....।“

इसके मुंह फाड़ने कोई फर्क नहीं पड़ता।

कहकर मैं कमरे से बाहर निकल गया और एक सिगरेट सुलगाकर पुलिस के आगमन की प्रतीक्षा करने लगा।

बीस मिनट पश्चात।

जसवंत सिंह अपने दल-बल के साथ वहाँ पहुँचा।

”लाश कहाँ है?“

”कमरे में।“

वो उधर ही बढ़ गया।

‘‘अरे यह तो अपना नरेश है, बुरा फंसा इस बार।‘‘ किसी पुलिसिए की आवाज आई।

‘‘कोई बुरा नहीं फंसा भाई, ये अंधेर नगरी है देखना कल सुबह ही छूट जाएगा।‘‘ कोई अन्य पुलिसिया बोला। फिर खामोशी छा गयी। अगले एक घण्टे तक पुलिस की कार्रवाई चलती रही, फिर लाश को उठाकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया।

‘‘अब बको क्या हुआ था?‘‘ जसवंत सिंह मेरे करीब पहुंचकर बोला।

मैंने उसे पूरी दास्तान सुना दी मगर यह नहीं बताया कि मुझे पहले से मालूम था कि यह सब मेकअप का कमाल था।

”सुबह ठीक दस बजे।“ जसवंत सिंह बोला, ”कोतवाली पहुँच जाना।“

”कोई खता हो गई बंदा परवर।“

”नाटक मत करो, सुबह ठीक टाइम पर पहुँच जाना, साथ में दोनों लड़कियों को भी लेते आना।“

”उन्हें किसलिए?“

”उनका बयान लेना होगा।“

मैंने सिर हिलाकर हामी भरी।

तब जसवंत सिंह अपने दल-बल के साथ जैसे आया था वैसे ही वापस लौट गया।

सबकुछ सही ढंग से निपट गया। अबकि बार मैं डॉली की बजाय अपने कमरे में पहुँचा, और पलंग पर पसर गया, जल्दी ही मुझे नींद आ गई।

अगली सुबह मुझे खुद जूही ने आकर जगाया। मैं आँखें मिचमिचाता हुआ उठ बैठा, देखा तो वो चाय का प्याला हाथ में लिए खड़ी थी।

”गुड मॉर्निंग मिस्टर डिटेक्टिव।“

”गुड मॉर्निंग।“ मैं अंगड़ाई लेता हुआ बोला, ”हाऊ आर यू एंजलफेश?“

”फाइन, तुम कैसे हो?“

”तुम्हें कैसा लग रहा हूँ।“

मैंने चाय का प्याला उसके हाथों से ले लिया।

‘‘तुम्हारी तो बात ही क्या है, तुम तो हमेशा ठीक ही लगते हो।“ कहकर वो मुस्कराई, ”कल रात तो तुमने कमाल ही कर दिया।“

”मैं अक्सर कमाल करता हूँ।“

वह हँसी।

”फिलहाल चाय के लिए थैंक्यू।“

”इसमें थैंक्यू वाली कौन सी बात है तुम और डॉली मेरे मेहमान हो। ऐसे मेहमान जो कि मेरे साथ मौजूद रहकर मुसीबतों को झेल रहे हो।“

”हम सिर्फ अपना फर्ज अदा कर रहे हैं।“

”ओके मि. डिटेक्टिव, तैयार होकर नीचे डॉयनिंग हॉल में पहुँचो, नाश्ता हम लोग वहीं करेंगे।“

”हम लोग।“

”हाँ मैं, प्रकाश, तुम और शीला।“

”प्रकाश लौट आया।“

”हाँ तकरीबन घण्टा भर पहले ही लौटा है आते ही बिस्तर पर ढेर हो गया।“

”अरे तबियत तो ठीक है उसकी?“

”वो कहता है, रात को बहुत ज्यादा पी गया, अब हैंगओवर से परेशान है।“

”ठीक है तुम चलो मैं अभी तैयार होकर नीचे पहुँचता हूँ।“

वह सहमति में सिर हिलाकर कमरे से बाहर निकल गई। आधे घण्टे बाद मैं तैयार होकर नीचे पहुँचा तब तक नौ बजे चुके थे।

प्रकाश, डॉली और जूही डाइनिंग टेबल पर मौजूद थे, प्रकाश की आँखें सूजी हुई थीं, वो रह-रहकर अपने सिर को झटका दे रहा था, उसकी हालत से साफ जाहिर हो रहा था कि वह अभी भी नशे में था।

”हैल्लो एवरीबॉडी।“

”हैल्लो।“

सभी सम्मलित स्वर में बोले। मैं वहाँ इकलौती खाली कुर्सी, जो प्रकाश के बगल में थी उस पर जाकर बैठ गया।

”मैं लेट तो नहीं हुआ।“

”बिल्कुल नहीं।“ प्रकाश बोला, उसकी आवाज थर्रा रही थी।

”तुमने सुबह-सुबह फिर चढ़ा ली।“

”सॉरी, मैं हैंगओवर से परेशान था।“-वह झेंपता हुआ बोला, ”इसीलिए...।“

”हैंगओवर का इससे बढ़िया कोई इलाज नहीं कि विस्की से मुँह धोना शुरू कर दो।“

वो खामोश रहा।

”रात को तुम अपने कमरे में नहीं थे।“

”मैं अपने फ्रेंड से मिलने गया था, वापसी से पहले मैं इतना ज्यादा पी गया कि कार चलाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई, इसलिए रात को मैं वहीं रुक गया। बहरहाल जूही मुझे बता चुकी है कि कल रात को तुमने कितना बड़ा कमाल कर दिखाया, थैंक्स।‘‘

अगले बीस मिनटों में हमने नाश्ता किया।
 
ठीक दस बजे हम तीनों इंस्पेक्टर जसवंत सिंह के सामने मौजूद थे।

सर्वप्रथम उसने हम तीनों का बयान नोट किया फिर कुछ और कागजी कार्रवाई पूरी करने के पश्चात उसने हमें छुट्टी दे दी। मैंने डॉली और जूही को वापस भेज दिया, मगर खुद वहाँ से हिला तक नहीं।

”अब क्यों बैठे हो।“ इंस्पेक्टर सिंह बोला।

”कुछ बताया उसने।“ मैं बोला, ”कि वो हवेली में नर-कंकाल का पार्ट क्यों अदा कर रहा था।“

”वो कहता है उसे ऐसा करने का हुक्म मिला था।“

”किससे।“

”दिलावर सिंह से।“

”वो क्या बला है।“

”दिलावर सिंह शहर जाने माने गुण्डों का सरगना है। पैसे लेकर हाथ-पैर तुड़वाना, कत्ल करवाना, लोगों को डराना-धमकाना, हफ्ता वसूली इत्यादि ऐसे धंधे हैं, जिनसे उसने शहर और आस-पास के इलाकों में दबदबा कायम कर रखा है। अलबत्ता उसकी आमदनी का मुख्य साधन वैध-अवैध शराब के ठेके, गैरकानूनी जुआघर और सट्टा लगवाना है। पुलिस और पब्लिक दोनों उसकी करतूतों से वाकिफ हैं।

वैसे तो पुलिस उसपर हाथ डालने से कतराती है! इसके बावजूद ऊपर से दबाव पड़ने पर उसे कई बार कई मामलों में गिरफ्तार किया गया, मगर हर बार सबूत गायब कर दिये गये। गवाह मुकर गये या फिर उनका दूसरी दुनियां के लिए टिकट कटवा दिया गया। नतीजा ये हुआ कि वह हर बार पहले से कहीं अधिक ताकतवर होता चला गया।

तुम हैरान रह जाओगे यह सुनकर कि इन कामों से होने वाली उसकी सालाना आमदनी करोड़ों में है। वर्ष 2015-2016 में उसने बतौर इंकम टैक्स, अस्सी लाख रूपये जमा कराये थे। बावजूद इसके वो बेहद लो प्रोफाइल रहता है। उसे देखकर अंदाजा लगा पाना सहज नहीं की वो इतना खतरनाक और इतना अमीर आदमी हो सकता है।“

”तुमने पूछताछ की उससे।“

”नहीं।“

”क्यों?“ मैं बोला, ”अब तो तुम्हारे पास एक गवाह भी मौजूद है।“

”किस गवाह की बात कर रहे हो भई, उसे तो आज सुबह ही छोड़ दिया गया, खुद हमारे सीओ साहब आये थे उसे रिहा करवाने के लिए। कहते थे ऐसा पहली बार थोड़े ही होगा, जब मुजरिम पुलिस के चंगुल से भाग निकला हो।“

मैं हैरान निगाहों से उसे देखता रह गया। इसलिए नहीं कि पुलिस ने ऐसा किया था - ये तो आये दिन होता ही रहता है - बल्कि हैरान मैं इस बात के लिए था कि वो कोतवाल खुद ये बात स्वीकार कर रहा था।

‘‘जब मैंने उसे पकड़ा था तो उसने साफ-साफ दिलावर का नाम लिया था।‘‘

‘‘अच्छा! जबकि हमें तो उसने बताया था कि - वो दोनों चोर थे। कंकाल वाला कॉस्टयूम पहनकर ही हमेशा वे दोनों चोरी करने जाते थे। लोग उस कास्टयूम में उन्हें नर-कंकाल समझकर भाग खड़े होते थे और वे दोनों निर्विघ्न अपनी चोरी की वारादात को अंजाम देते थे।‘‘

‘‘जज को हजम हो जायेंगी ये बातें?‘‘

‘‘आसानी से तो नहीं होंगी भई, करेंगे उसकी बाबत भी कुछ। अपनी कहानी को पॉलिश करेंगे चमकायेंगे, जज को हजम होने लायक बनायेंगे, फिर इसकी नौबत तो तब आयेगी जब वो पकड़ा जाएगा।‘‘

‘‘हर जवाब पहले ही सोचे बैठे हो बंदापरवर।‘‘

‘‘हां भई, क्या करें नोकरी करनी है तो दिमाग तो चलाना ही पड़ेगा।‘‘

”हे भगवान।“ मैंने आह भरी, ”कैसी अंधेर नगरी है ये?“

इंस्पेक्टर खामोश रहा।

‘‘फिर तो इंसाफ की उम्मीद करना ही बेकार है।‘‘

‘‘ऐसा नहीं है, जासूस साहब! इंसाफ तो होकर रहता है। हमेशा होता है, बस करने का अंदाज बदल जाता है।‘‘

‘‘दिल बहलाने के लिए गालिब ख्याल अच्छा है।‘‘

मैं उठ कर खड़ा हो गया।

”जा रहे हो।“

”हाँ।“

”सावधान रहना तुमने उसके एक आदमी को मार डाला है, बदले में वो तुम्हारी जान लेने की पूरी कोशिश करेगा।“

”डोंट वरी, मुझे अपनी जान बहुत ही प्यारी है।“

जवाब में वो कुछ देर तक अपलक मुझे घूरता रहा फिर बोला, ”देखो मैं तुम्हारे कहने पर दिलावर सिंह को फौरन गिरफ्तार कर सकता हूँ, मगर उसे गिरफ्तार रख पाना मेरे लिए सम्भव नहीं है। उसके एक अदने से प्यादे को छुड़ाने के लिए जब सीओ यहाँ सिर के बल दौड़ता आ सकता है तो फिर खुद दिलावर की तो बात ही क्या है?“

”मैं समझ गया इंस्पेक्टर साहब।“

कहकर मैंने उसे एक अंगुली का सेल्यूट दिया और बाहर की ओर बढा।

‘‘जरा ठहरो।‘‘

मैं ठिठका, उसकी ओर घूमा।

‘‘ठीक चार बजे तहसील के सामने अपनी कार से उतरना, ना एक मिनट इधर ना एक मिनट उधर। और पूरी तरह किसी भी हमले से सावधान रहना।‘‘

‘‘क्या मतलब हुआ इसका?‘‘ मैं हड़बड़ाकर बोला, ‘‘वहां कुछ होने वाला है क्या?‘‘

‘‘दो मिनट पूरी तरह चौकन्ने रहना फिर बेशक वापस लौट जाना, अब जाओ! और कोई सवाल मत करो।‘‘

‘‘ओके।‘‘ मैं बाहर की ओर बढ़ा।

किस फिराक में था यह पुलिस वाला, उसका पल में तोला पल में माशा वाला कैरेक्टर मेरी समझ में नहीं आ रहा था। ऊपर से उसका चार बजे वाला हुक्म, अगर मैं नहीं जाता तो! क्या करता वो? मगर गये बिना ये पता लगना मुमकिन नहीं था कि वह था किस फिराक में। मेरी खोपड़ी भिन्नाकर रह गई। इसी उलझन में मैं अपनी कार में जा बैठा।

घड़ी देखी अभी 12 बजे थे।

कार में पहुँचकर मैंने एडहेसिव टेप का रोल निकाला और पच्चीस कैलीवर वाली रिवाल्वर का होल्सटर निकालकर अपनी बाईं टांग पर टखने से तनिक ऊपर टेप की सहायता से अंदर की तरफ मजबूती से चिपकाकर रिवाल्वर उसमें रख लिया। फिर बाहर निकलकर खड़े होकर देखा, रिवाल्वर पैंट के पैताने से पूरी तरह ढक गई थी। संतुष्ट होकर मैं पुनः कार में जा बैठा। अड़तीस कैलीबर वाली रिवाल्वर निकाल कर मैंने अपनी पतलून की बेल्ट में खोंस लिया।

मैं आलम नगर में मच्छी बाजार पहुँचा। कार को फुटपाथ के किनारे लगाकर मैं बाहर निकल आया। मैंने इधर-उधर निगाह दौड़ाई, फौरन मैंने अपनी जरूरत का आदमी तलाश लिया, वह एक पतला-दुबला मरियल-सा नौजवान था, जो कि मुझसे कुछ दूरी पर बैठा बीड़ी के सुट्टे लगा रहा था।

मैं उसके समीप पहुँचा।

”क्या नाम है तुम्हारा?“

”काम बोलो बाप।“ - वो मुम्बइया स्टाइल के गुण्डों की नकल करता हुआ बोला, ”नाम जानकर किया करेगा तुम, अपुन काम माँगता है, क्या?“ कहकर उसने चुटकी बजाई।

‘‘मुम्बई हो आए हो या सब फिल्मों का असर है?‘‘

जवाब में उसने घूर कर मुझे देखा, ‘‘क्या चाहते हो?‘‘

”दिलावर सिंह कहाँ रहता है?“

”तुम्हारे पास सिगरेट है?“

जवाब में मैंने चुपचाप उसे सिगरेट का पैकेट पकड़ा दिया। उसने एक सिगरेट निकालकर अपनी बीड़ी के साथ लगाकर सुलगाया और पैकेट मुझे वापस करने की बजाय अपनी पैंट की जेब में ठूंस लिया।

”दिलावर साहब का क्या करेगा बाप?“ उसने फिर अपनी टोन बदली।

”कत्ल।“

”क्या?“ वह उछलकर उठ खड़ा हुआ।

”मेरा मतलब है, मुझे एक कत्ल करवाना है।“

”पहले बोला होता, सामने वो बंगला दिखाई दिया तुम्हारे कू।“

”हाँ।“

”उसी बंगले में दिलावर साहब रहता है।“

समझने वाले अंदाज में सिर हिलाकर मैं आगे बढ़ गया।

वह एक दो मंजिला राजा-महाराजाओं के जमाने का बना हुआ बंगला था, जिसमें कि लकड़ी का एक बड़ा दरवाजा लगा हुआ था।

आगे बढ़कर मैंने दरवाजे पर दस्तक दे दी।

थोड़ी देर बाद।

दरवाजा खुला, खोलने वाला एक हट्टा-कट्टा पहलवानों जैसे डील-डोल का खुरदरे चेहरे वाला व्यक्ति था। उसके गाल पर अनगिनत जख्मों के निशान उसका कैरेक्टर खुद बयान कर रहे थे।

”क्या है?“ वो मुझे घूरता हुआ बोला।

”दिन है।“

”बकोमत, यहाँ क्यों आये हो?“

”मुझे दिलावर से काम है।“

”तुम यहीं रूको, मैं साहब से पूछकर आता हूँ।“

”हरगिज नहीं।“ मैं बोला, ”मुझे अपने साथ ले चलो।“

”चुपचाप यहीं खड़े रहो, वरना हाथ-पाँव तोड़कर वापस भेज दूँगा।“

”कोशिश करके देख लो हो सकता है मुझसे मार खाकर तुम्हारा चेहरा कुछ इंसानों जैसा लगने लगे।“

”उसने फौरन खा जाने वाली निगाहों से मुझे घूरा, मगर मुझे विचलित होता न पाकर परे देखने लगा।

”तुम बॉस से क्यों मिलना चाहते हो?“

”ये मैं दिलावर को ही बताऊँगा।“

”यानी की तुम ऐसे नहीं मानोगे।“

”मैं कैसे भी नहीं मानूँगा।“

इतना सुनते ही वो तैस में आ गया। उसने अपने दाहिने हाथ के मुक्के का वार मुझ पर करना चाहा, मैं सावधान था। अतः हाथ बीच में ही लपककर मैंने एक प्रचण्ड घूंसा उसकी पसलियों पर रसीद कर दिया, वो जोर से कराहा। मैं उसे एक तरफ झटक कर आगे बढ़ गया।
 
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