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मैं कोतवाली से बाहर आकर अपनी कार में सवार हो गया। अभी मैं मुश्किल से पांच सौ मीटर ही आगे बढ़ा था कि मेरा ध्यान अपने पीछे आ रही एक सफेद शेवरले बीट पर जा टिकी। मुझे लगा उस कार को मैंने अभी कोतवाली के बाहर खड़ा देखा था, तो क्या मेरा पीछा किया जा रहा था।
मैंने अपनी स्पीड एकदम कम कर दी। तत्काल बीट की स्पीड कम हुई। मैंने स्पीड बढ़ाई तो पिछली कार की स्पीड में भी इजाफा हुआ। मैंने कुछ आगे जाकर कार रोक दी। बीट भी मुझसे कुछ दूरी पर खड़ी हो गई। मैं इंतजार करने लगा। कुछ मिनट गुजरे तो बीट का चालक बाहर निकलकर कार का बोनट उठाकर उसपर झुक गया मानों जाहिर करना चाहता था कि कार में अचानक कोई खराबी आ गयी थी जिसको वो ठीक करने की कोशिश कर रहा हो।
मुझे उसकी कोई खास फिक्र नहीं थी। जिसे अपना पीछा किये जाने का पता हो उसका पीछा कोई माई का लाल नहीं कर सकता।
मैंने अपनी कार स्टार्ट की और एकदम से स्पीड बढ़ा दी। बीट का चालक उतनी फुर्ती नहीं दिखा पाया, उसके बोनट गिराकर कार के भीतर बैठने तक मैं अगले चौराहे तक पहुंच चुका था। मैंने वहां से यू टर्न लिया और वापस कोतवाली की दिशा में चल पड़ा। कुछ आगे जाते ही मुझे बीट फुल स्पीड अपने विपरीत दिशा में दौड़ती दिखाई दी।
मैं लाल हवेली पहुंचा अब तक सभी लोग वापस हवेली पहुंच चुके थे।
मैं अपने कमरे में पहुंचा और अपनी कांटेक्ट डायरी निकालकर उसमें सुरेश अग्रवाल का नम्बर तलाशने लगा। सुरेश मेरा पीडी भाई था। जो कि लखनऊ में रहता था। नम्बर मिल गया तो मैंने उसे फोन किया।
‘‘कैसे हो पीडी ब्रदर?‘‘ वो कॉल अटैण्ड करते हुए बोला।
‘‘ठीक हूं, तुम बताओ?‘‘
‘‘इधर भी सब मस्त चल रहा है, बीवियों पर शक करने वाले मर्दों की तादाद बढ़ती जा रही है, लिहाजा अपनी ऐश हो गयी है। तुम बताओ आज अचानक मेरी याद कैसे आ गयी?‘‘
‘‘एक काम है जो वार फुटेज पर करना है, खर्च चाहे जितना भी हो परवाह नहीं। आई रिपीट जो भी खर्चा हो परवाह नहीं है, मगर रिजल्ट आज ही चाहिए।‘‘
‘‘काम बोलो ब्रदर‘‘
‘‘करीब पांच महीने पहले की बात है। लखनऊ से पुरातत्व विभाग एएसआई की एक टीम सीतापुर आई थी। वे लोग इधर की प्राचीन इमारतों और मंदिरों का सर्वेक्षण करने आये थे। उनमें से दो की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। हत्या का कोई कारण सामने नहीं आया था। तुम्हें उस टीम के बाकी सदस्यों का पता करना है और उनसे सिर्फ एक प्रश्न का जवाब हासिल करना है कि हत्या से पहले वो दोनों क्या काम कर रहे थे और किस जगह कर रहे थे। इससे संबंधित अगर कोई और जानकारी हासिल हो जाय तो फिर बात ही क्या?‘‘
‘‘मगर आज ही?‘‘
‘‘हां दोस्त आज ही, ये ना सिर्फ तुम्हारे इस प्राइवेट डिटेक्टिव भाई की इज्जत का सवाल है बल्कि समझ लो जान भी शूली पर अटकी हुई है।‘‘
‘‘ओके मैं करता हूं कुछ, भला तुम्हे मरते हुए मैं कैसे देख सकता हूं।‘‘
‘‘गुड, थैंक्स!‘‘ मैंने कॉल डिस्कनैक्ट कर दी।
मैं एक बार पुनः मानसिंह के कमरे में पहुंचा, मेरा दिल बार-बार कह रहा था वहां से कुछ ना कुछ खास चीज अवश्य बरामद होनी चाहिए जिससे तफतीश के लिए कोई रास्ता बन जाता। मैं एक बार पुनः वहां की तलाशी लेने में जुट गया। मेज की दराजों से शुरू करके मैं अभी वार्डरोब तक पहुंचा ही था कि...!
तभी कमरे कि तरफ आती पदचापें सुनाई दी, ”कौन हो सकता है?“ -मैंने सोचा - शायद श्याम सिंह, मैंने व्याकुल भाव से इधर-उधर देखा। वहाँ छुपने जैसी कोई जगह न थी, अंततः मैं आलमारी कि ओट में हो गया जो कि छुपने के लिहाज से नाकाफी था। आगंतुक की निगाह कभी भी मुझ पर पड़ सकती थी। मगर मुझे उसकी कोई खास परवाह नहीं थी। मैं सांस रोके प्रतीक्षा करने लगा।
दरवाजा हिला, आगंतुक ने अंदर कदम रखा, मैं सावधान हो गया, वो जूही थी ये देखकर मैंने चैन कि सांस ली। अभी मैं उसे वहां अपनी उपस्थिति का आभास कराने जा ही रहा था कि तभी उसके हाव-भाव देखकर चौंक पड़ा वो इस वक्त बेहद चौंकन्नी नजर आ रही थी, उसने एक बार सावधानी पूर्वक दरवाजे से बाहर झांककर देखा फिर दरवाजा बंद करने के पश्चात शंकित भाव से अपने दायें-बायें देखा, मानों तसल्ली करना चाहती हो कि कमरे में उसके अलावा कोई नहीं था।
फिर वो अंडों पर कदम रखती हुई आलमारी के समीप पहुंची। उसने आलमारी के किवाड़ खोल दिये। अब वो मुझे दिखाई पड़ना बंद हो गई। अलबत्ता वहां उभरती कुछ आहटों से मैंने अंदाजा लगाया कि वो अलमारी से किताबें निकालकर फर्श पर रख रही थी, कुछ देर तक यही प्रक्रिया चली, फिर घर्र-घर्र की आवाज हुई, उसके सामने की दीवार कांपी और बाईं ओर को सरकने लगी। मेरी आंखें मारे हैरत के फट सी गईं। चंद सैकेण्ड वही प्रक्रिया चली, अब सामने की दीवार में छः बाई चार का वर्गाकार दरवाजा खुल चुका था। निश्चय ही वो कोई गुप्त दरवाजा था जिसका सम्बंध अलमारी में लगे किसी उपकरण से था।
अलमारी से अलग हटकर जूही उस नये दरवाजे में जा घुसी, जब वो आंखों से ओझल हो गई तो दबे पांव चलता हुआ मैं उस दरवाजे तक पहुंचा। आगे नीचे को जाती सीढ़ियां बनी थीं। मैं सीढ़ियां उतरकर नीचे पहुंचा। अंधेरा इतना घना था कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं पड़ता। मैं आंखें फाड़कर जूही को तलाशने की कोशिश करता रहा। मगर वो मुझे कहीं भी दिखाई नहीं दी। किसी आहट के इंतजार में मैंने अपने कान खड़े कर दिये, मगर चारों तरफ निस्तब्धता छाई हुई थी, यहां का वातावरण बड़ा ही भयावह प्रतीत हो रहा था।
मैं सावधानी पूर्वक आगे बढ़ा। कुछ दूर चलने के पश्चात मुझे दाईं तरफ किसी दरवाजे का आभास हुआ, मैं उसमें प्रवेश कर गया, अंदर कदम रखते ही मैं थमककर रह गया। सामने एक खुली हुई तिजोरी थी जो नोटों से ठुंसी हुई थी। कम से कम भी वो करोड़ों के नोट थे।
जूही तिजोरी के सामने खड़ी थी, मेरे देखते ही देखते उसने नोटों की एक गड्डी उठाकर अपने गरेबां में ठूंसकर तिजोरी बंद कर दी।
मैं तत्काल कमरे से बाहर निकल आया और दरवाजे से हटकर कुछ दूरी पर खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद जूही भी निकली और वापस चल पड़ी।
अभी वो कुछ कदम ही चली होगी कि मुझे वहां किसी तीसरे शख्स की उपस्थिति का आभास मिला, मैंने चीखकर जूही को सावधान कर देना चाहा मगर तब तक देर हो चुकी थी। साये ने जूही के ऊपर छलांग लगा दी। जूही के गले से निकलती घों-घों की आवाज मैंने स्पष्ट सुनी। शायद साया उसका गला दबा रहा था। वक्त बहुत कम था, मगर वो हथियारबंद हो सकता था, ऐसे में उसके करीब जाना खतरनाक था। मैंने अपनी रिवाल्वर निकालने की कोशिश की तो याद आया कि मेरी दोनों रिवाल्वर महानायक सिंह के पास जमा थी। मैं झुंझला उठा।
जब मेरी सोचने-समझने की शक्ति कुंद हो गई। तब मैंने साये पर छलांग लगा दिया, मेरी पकड़ में उसकी बाइंर् कलाई आई तो मैंने उसे जोर से उमेठा, वो दर्द से बिलबिला उठा। उसके हाथों से छूटते ही जूही कटे वृक्ष की भांति फर्श पर गिर पड़ी, शायद वो...बस इससे ज्यादा मैं नहीं सोच सका साये ने मेरी पसलियों में एक तगड़ा घूंसा जड़ दिया मैं दोहरा हुआ तो वह भागा। मैंने उसके पीछे जाने की जहमत नहीं उठाई, या फिर उसने मुझे इस काबिल छोड़ा ही नहीं था। मैंने जूही की नब्ज टटोली एक बार तो मेरा दिल धक् से रह गया। मगर फिर ध्यान देने पर पाया कि नब्ज चल रही थी।
मैंने चैन की सांस ली।
तभी घर्र-घर्र की आवाज पुनः गूंजी। मैं समझ गया कि तीसरा शख्स ना सिर्फ तहखाने से बाहर जा चुका था। बल्कि उसने यहां से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता बंद कर दिया था। अब हम इस चूहेदानी में कैद थे।
पूरी तरह उसके रहमों-करम पर थे।
मैं जूही कि तरफ आकृष्ट हुआ, वो अभी भी बेसुध सी पड़ी थी। मैंने उसे होश में लाने कि कोशिशें शुरू कर दी।
लगभग दो मिनट बाद वो कुनमुनाती हुई उठ बैठी, मैंने फौरन जेब से निकालकर अपना लाईटर जला लिया, उसके मध्यम प्रकाश में मैंने जूही के पीले पड़ चुके चेहरे को देखा। वो अभी भी भयभीत निगाहों से चारों तरफ घूर रही थी।
”मुझ पर वो हमला तुमने किया था?“ - वो शंकित स्वर में बोली।
”पागल हुई हो मैं भला तुम्हें मारने की कोशिश क्यों करूंगा?“
”तिजोरी में रखे माल के लिए“ - वो निर्विकार भाव से बोली।
”फिर मैंने तुम्हें छोड़ क्यों दिया?“
”मुझे क्या पता, तुम बताओ।“
”तो सुनो मैं पैसा बनाने में बहुत ज्यादा इंट्रेस्टेड हूं। मगर वो पैसा मैं चोरी करके कमाऊँ ये मेरी अंतरात्मा को कभी मंजूर नहीं था और ना ही होगा।“
”सॉरी यार, मैं भी पता नहीं क्या अनाप-शनाप सोचने लगती हूं।‘‘
”नेवरमाइंड“ - मैं बोला - क्या यहाँ से बाहर निकलने का कोई दूसरा रास्ता है?“
”नहीं, मगर तुम अंदर कैसे आये थे?“
मैंने बताया।
‘‘और वो तीसरा शख्स जो कि मेरी जान लेना चाहता था! वो अंदर, मेरा मतलब इस तहखाने में कैसे पहुंचा, बाहर का दरवाजा तो मैं बंद कर आई थी।“
‘‘हो सकता है वो तुम्हारे किसी पहले फेरे में यहां आ घुसा हो और बाद में उसे बाहर निकलने का मौका ही ना मिला हो।“
”ये सम्भव नहीं है“ वो दृढ़ स्वर में बोली - ”क्योंकि पहला फेरा आज से तीन महीने पहले मैंने पिताजी के साथ लगाया था। इतने दिनों में तो वो भूख-प्यास से तड़प-तड़प कर मर गया होता।“
”जैसे कि अब हम मरेंगे।“
वो खामोश रही।
”इस तिजोरी की खबर तुम्हारे अलावा और किस-किस को है।“
”तुम्हे और शायद उस तीसरे शख्स को जो कि कुछ देर पहले यहां मौजूद था।“
”और किसी को नहीं।“
”नहीं“
”तुम्हारे चाचा जी को।“
”उन्हें भी नहीं है।“
”तुम इसे यहां क्यों रखती हो?“
”भई मुझे इसके बारे में तीन महीने पहले ही पता चला था। पहले सिर्फ डैडी को इसकी खबर थी, जब उन्होंने इसे यहीं रखा हुआ था तो मैं क्यों हटाती?“
”हवेली को न बेचने का यही कारण था।“
”नहीं यार, हवेली बेचते तो क्या हम इस पैसे को निकाल नहीं सकते थे यहां से। हवेली ना बेचने की सिर्फ एक वजह है-ये हमारे पुरूखों की हवेली है, हम इसे क्यों बेचे।“
‘‘ओके, अब बाहर कैसे निकलें?‘‘
”नहीं निकल सकते, इकलौता रास्ता वही है जिससे हम भीतर आये थे। हालांकि मेरी वजह से तुम भी यहां आ फंसे हो मगर मुझे खुशी है कि इस वक्त मैं यहां अकेली नहीं हूं। वरना डर के मारे ही मेरा दम निकल जाता।‘‘
‘‘वो तो अभी भी निकलेगा, भूख-प्यास से, तड़प-तड़प कर।‘‘
‘‘वो हमें गोली भी तो मार सकता है।‘‘
‘‘क्या जरूरत है, वो बस हमें दस-पंद्रह दिन भूल जाय तो हम वैसे ही मर जायेंगे।‘‘
‘‘था कौन वो?‘‘
”अपने चाचा जी के बारे में क्या ख्याल है?“
”क्या कहते हो? - वो चिहुंक उठी।
”क्या नहीं हो सकता?“
”असम्भव, उनके बारे में ऐसी कल्पना करना भी मूर्खता है।‘‘
‘‘ओके स्वीट हार्ट तुम कहती हो तो यकीन कर लेता हूं।‘‘
मैंने अपनी स्पीड एकदम कम कर दी। तत्काल बीट की स्पीड कम हुई। मैंने स्पीड बढ़ाई तो पिछली कार की स्पीड में भी इजाफा हुआ। मैंने कुछ आगे जाकर कार रोक दी। बीट भी मुझसे कुछ दूरी पर खड़ी हो गई। मैं इंतजार करने लगा। कुछ मिनट गुजरे तो बीट का चालक बाहर निकलकर कार का बोनट उठाकर उसपर झुक गया मानों जाहिर करना चाहता था कि कार में अचानक कोई खराबी आ गयी थी जिसको वो ठीक करने की कोशिश कर रहा हो।
मुझे उसकी कोई खास फिक्र नहीं थी। जिसे अपना पीछा किये जाने का पता हो उसका पीछा कोई माई का लाल नहीं कर सकता।
मैंने अपनी कार स्टार्ट की और एकदम से स्पीड बढ़ा दी। बीट का चालक उतनी फुर्ती नहीं दिखा पाया, उसके बोनट गिराकर कार के भीतर बैठने तक मैं अगले चौराहे तक पहुंच चुका था। मैंने वहां से यू टर्न लिया और वापस कोतवाली की दिशा में चल पड़ा। कुछ आगे जाते ही मुझे बीट फुल स्पीड अपने विपरीत दिशा में दौड़ती दिखाई दी।
मैं लाल हवेली पहुंचा अब तक सभी लोग वापस हवेली पहुंच चुके थे।
मैं अपने कमरे में पहुंचा और अपनी कांटेक्ट डायरी निकालकर उसमें सुरेश अग्रवाल का नम्बर तलाशने लगा। सुरेश मेरा पीडी भाई था। जो कि लखनऊ में रहता था। नम्बर मिल गया तो मैंने उसे फोन किया।
‘‘कैसे हो पीडी ब्रदर?‘‘ वो कॉल अटैण्ड करते हुए बोला।
‘‘ठीक हूं, तुम बताओ?‘‘
‘‘इधर भी सब मस्त चल रहा है, बीवियों पर शक करने वाले मर्दों की तादाद बढ़ती जा रही है, लिहाजा अपनी ऐश हो गयी है। तुम बताओ आज अचानक मेरी याद कैसे आ गयी?‘‘
‘‘एक काम है जो वार फुटेज पर करना है, खर्च चाहे जितना भी हो परवाह नहीं। आई रिपीट जो भी खर्चा हो परवाह नहीं है, मगर रिजल्ट आज ही चाहिए।‘‘
‘‘काम बोलो ब्रदर‘‘
‘‘करीब पांच महीने पहले की बात है। लखनऊ से पुरातत्व विभाग एएसआई की एक टीम सीतापुर आई थी। वे लोग इधर की प्राचीन इमारतों और मंदिरों का सर्वेक्षण करने आये थे। उनमें से दो की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। हत्या का कोई कारण सामने नहीं आया था। तुम्हें उस टीम के बाकी सदस्यों का पता करना है और उनसे सिर्फ एक प्रश्न का जवाब हासिल करना है कि हत्या से पहले वो दोनों क्या काम कर रहे थे और किस जगह कर रहे थे। इससे संबंधित अगर कोई और जानकारी हासिल हो जाय तो फिर बात ही क्या?‘‘
‘‘मगर आज ही?‘‘
‘‘हां दोस्त आज ही, ये ना सिर्फ तुम्हारे इस प्राइवेट डिटेक्टिव भाई की इज्जत का सवाल है बल्कि समझ लो जान भी शूली पर अटकी हुई है।‘‘
‘‘ओके मैं करता हूं कुछ, भला तुम्हे मरते हुए मैं कैसे देख सकता हूं।‘‘
‘‘गुड, थैंक्स!‘‘ मैंने कॉल डिस्कनैक्ट कर दी।
मैं एक बार पुनः मानसिंह के कमरे में पहुंचा, मेरा दिल बार-बार कह रहा था वहां से कुछ ना कुछ खास चीज अवश्य बरामद होनी चाहिए जिससे तफतीश के लिए कोई रास्ता बन जाता। मैं एक बार पुनः वहां की तलाशी लेने में जुट गया। मेज की दराजों से शुरू करके मैं अभी वार्डरोब तक पहुंचा ही था कि...!
तभी कमरे कि तरफ आती पदचापें सुनाई दी, ”कौन हो सकता है?“ -मैंने सोचा - शायद श्याम सिंह, मैंने व्याकुल भाव से इधर-उधर देखा। वहाँ छुपने जैसी कोई जगह न थी, अंततः मैं आलमारी कि ओट में हो गया जो कि छुपने के लिहाज से नाकाफी था। आगंतुक की निगाह कभी भी मुझ पर पड़ सकती थी। मगर मुझे उसकी कोई खास परवाह नहीं थी। मैं सांस रोके प्रतीक्षा करने लगा।
दरवाजा हिला, आगंतुक ने अंदर कदम रखा, मैं सावधान हो गया, वो जूही थी ये देखकर मैंने चैन कि सांस ली। अभी मैं उसे वहां अपनी उपस्थिति का आभास कराने जा ही रहा था कि तभी उसके हाव-भाव देखकर चौंक पड़ा वो इस वक्त बेहद चौंकन्नी नजर आ रही थी, उसने एक बार सावधानी पूर्वक दरवाजे से बाहर झांककर देखा फिर दरवाजा बंद करने के पश्चात शंकित भाव से अपने दायें-बायें देखा, मानों तसल्ली करना चाहती हो कि कमरे में उसके अलावा कोई नहीं था।
फिर वो अंडों पर कदम रखती हुई आलमारी के समीप पहुंची। उसने आलमारी के किवाड़ खोल दिये। अब वो मुझे दिखाई पड़ना बंद हो गई। अलबत्ता वहां उभरती कुछ आहटों से मैंने अंदाजा लगाया कि वो अलमारी से किताबें निकालकर फर्श पर रख रही थी, कुछ देर तक यही प्रक्रिया चली, फिर घर्र-घर्र की आवाज हुई, उसके सामने की दीवार कांपी और बाईं ओर को सरकने लगी। मेरी आंखें मारे हैरत के फट सी गईं। चंद सैकेण्ड वही प्रक्रिया चली, अब सामने की दीवार में छः बाई चार का वर्गाकार दरवाजा खुल चुका था। निश्चय ही वो कोई गुप्त दरवाजा था जिसका सम्बंध अलमारी में लगे किसी उपकरण से था।
अलमारी से अलग हटकर जूही उस नये दरवाजे में जा घुसी, जब वो आंखों से ओझल हो गई तो दबे पांव चलता हुआ मैं उस दरवाजे तक पहुंचा। आगे नीचे को जाती सीढ़ियां बनी थीं। मैं सीढ़ियां उतरकर नीचे पहुंचा। अंधेरा इतना घना था कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं पड़ता। मैं आंखें फाड़कर जूही को तलाशने की कोशिश करता रहा। मगर वो मुझे कहीं भी दिखाई नहीं दी। किसी आहट के इंतजार में मैंने अपने कान खड़े कर दिये, मगर चारों तरफ निस्तब्धता छाई हुई थी, यहां का वातावरण बड़ा ही भयावह प्रतीत हो रहा था।
मैं सावधानी पूर्वक आगे बढ़ा। कुछ दूर चलने के पश्चात मुझे दाईं तरफ किसी दरवाजे का आभास हुआ, मैं उसमें प्रवेश कर गया, अंदर कदम रखते ही मैं थमककर रह गया। सामने एक खुली हुई तिजोरी थी जो नोटों से ठुंसी हुई थी। कम से कम भी वो करोड़ों के नोट थे।
जूही तिजोरी के सामने खड़ी थी, मेरे देखते ही देखते उसने नोटों की एक गड्डी उठाकर अपने गरेबां में ठूंसकर तिजोरी बंद कर दी।
मैं तत्काल कमरे से बाहर निकल आया और दरवाजे से हटकर कुछ दूरी पर खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद जूही भी निकली और वापस चल पड़ी।
अभी वो कुछ कदम ही चली होगी कि मुझे वहां किसी तीसरे शख्स की उपस्थिति का आभास मिला, मैंने चीखकर जूही को सावधान कर देना चाहा मगर तब तक देर हो चुकी थी। साये ने जूही के ऊपर छलांग लगा दी। जूही के गले से निकलती घों-घों की आवाज मैंने स्पष्ट सुनी। शायद साया उसका गला दबा रहा था। वक्त बहुत कम था, मगर वो हथियारबंद हो सकता था, ऐसे में उसके करीब जाना खतरनाक था। मैंने अपनी रिवाल्वर निकालने की कोशिश की तो याद आया कि मेरी दोनों रिवाल्वर महानायक सिंह के पास जमा थी। मैं झुंझला उठा।
जब मेरी सोचने-समझने की शक्ति कुंद हो गई। तब मैंने साये पर छलांग लगा दिया, मेरी पकड़ में उसकी बाइंर् कलाई आई तो मैंने उसे जोर से उमेठा, वो दर्द से बिलबिला उठा। उसके हाथों से छूटते ही जूही कटे वृक्ष की भांति फर्श पर गिर पड़ी, शायद वो...बस इससे ज्यादा मैं नहीं सोच सका साये ने मेरी पसलियों में एक तगड़ा घूंसा जड़ दिया मैं दोहरा हुआ तो वह भागा। मैंने उसके पीछे जाने की जहमत नहीं उठाई, या फिर उसने मुझे इस काबिल छोड़ा ही नहीं था। मैंने जूही की नब्ज टटोली एक बार तो मेरा दिल धक् से रह गया। मगर फिर ध्यान देने पर पाया कि नब्ज चल रही थी।
मैंने चैन की सांस ली।
तभी घर्र-घर्र की आवाज पुनः गूंजी। मैं समझ गया कि तीसरा शख्स ना सिर्फ तहखाने से बाहर जा चुका था। बल्कि उसने यहां से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता बंद कर दिया था। अब हम इस चूहेदानी में कैद थे।
पूरी तरह उसके रहमों-करम पर थे।
मैं जूही कि तरफ आकृष्ट हुआ, वो अभी भी बेसुध सी पड़ी थी। मैंने उसे होश में लाने कि कोशिशें शुरू कर दी।
लगभग दो मिनट बाद वो कुनमुनाती हुई उठ बैठी, मैंने फौरन जेब से निकालकर अपना लाईटर जला लिया, उसके मध्यम प्रकाश में मैंने जूही के पीले पड़ चुके चेहरे को देखा। वो अभी भी भयभीत निगाहों से चारों तरफ घूर रही थी।
”मुझ पर वो हमला तुमने किया था?“ - वो शंकित स्वर में बोली।
”पागल हुई हो मैं भला तुम्हें मारने की कोशिश क्यों करूंगा?“
”तिजोरी में रखे माल के लिए“ - वो निर्विकार भाव से बोली।
”फिर मैंने तुम्हें छोड़ क्यों दिया?“
”मुझे क्या पता, तुम बताओ।“
”तो सुनो मैं पैसा बनाने में बहुत ज्यादा इंट्रेस्टेड हूं। मगर वो पैसा मैं चोरी करके कमाऊँ ये मेरी अंतरात्मा को कभी मंजूर नहीं था और ना ही होगा।“
”सॉरी यार, मैं भी पता नहीं क्या अनाप-शनाप सोचने लगती हूं।‘‘
”नेवरमाइंड“ - मैं बोला - क्या यहाँ से बाहर निकलने का कोई दूसरा रास्ता है?“
”नहीं, मगर तुम अंदर कैसे आये थे?“
मैंने बताया।
‘‘और वो तीसरा शख्स जो कि मेरी जान लेना चाहता था! वो अंदर, मेरा मतलब इस तहखाने में कैसे पहुंचा, बाहर का दरवाजा तो मैं बंद कर आई थी।“
‘‘हो सकता है वो तुम्हारे किसी पहले फेरे में यहां आ घुसा हो और बाद में उसे बाहर निकलने का मौका ही ना मिला हो।“
”ये सम्भव नहीं है“ वो दृढ़ स्वर में बोली - ”क्योंकि पहला फेरा आज से तीन महीने पहले मैंने पिताजी के साथ लगाया था। इतने दिनों में तो वो भूख-प्यास से तड़प-तड़प कर मर गया होता।“
”जैसे कि अब हम मरेंगे।“
वो खामोश रही।
”इस तिजोरी की खबर तुम्हारे अलावा और किस-किस को है।“
”तुम्हे और शायद उस तीसरे शख्स को जो कि कुछ देर पहले यहां मौजूद था।“
”और किसी को नहीं।“
”नहीं“
”तुम्हारे चाचा जी को।“
”उन्हें भी नहीं है।“
”तुम इसे यहां क्यों रखती हो?“
”भई मुझे इसके बारे में तीन महीने पहले ही पता चला था। पहले सिर्फ डैडी को इसकी खबर थी, जब उन्होंने इसे यहीं रखा हुआ था तो मैं क्यों हटाती?“
”हवेली को न बेचने का यही कारण था।“
”नहीं यार, हवेली बेचते तो क्या हम इस पैसे को निकाल नहीं सकते थे यहां से। हवेली ना बेचने की सिर्फ एक वजह है-ये हमारे पुरूखों की हवेली है, हम इसे क्यों बेचे।“
‘‘ओके, अब बाहर कैसे निकलें?‘‘
”नहीं निकल सकते, इकलौता रास्ता वही है जिससे हम भीतर आये थे। हालांकि मेरी वजह से तुम भी यहां आ फंसे हो मगर मुझे खुशी है कि इस वक्त मैं यहां अकेली नहीं हूं। वरना डर के मारे ही मेरा दम निकल जाता।‘‘
‘‘वो तो अभी भी निकलेगा, भूख-प्यास से, तड़प-तड़प कर।‘‘
‘‘वो हमें गोली भी तो मार सकता है।‘‘
‘‘क्या जरूरत है, वो बस हमें दस-पंद्रह दिन भूल जाय तो हम वैसे ही मर जायेंगे।‘‘
‘‘था कौन वो?‘‘
”अपने चाचा जी के बारे में क्या ख्याल है?“
”क्या कहते हो? - वो चिहुंक उठी।
”क्या नहीं हो सकता?“
”असम्भव, उनके बारे में ऐसी कल्पना करना भी मूर्खता है।‘‘
‘‘ओके स्वीट हार्ट तुम कहती हो तो यकीन कर लेता हूं।‘‘