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लाल हवेली (एक खतरनाक साजिश)

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मैं कोतवाली से बाहर आकर अपनी कार में सवार हो गया। अभी मैं मुश्किल से पांच सौ मीटर ही आगे बढ़ा था कि मेरा ध्यान अपने पीछे आ रही एक सफेद शेवरले बीट पर जा टिकी। मुझे लगा उस कार को मैंने अभी कोतवाली के बाहर खड़ा देखा था, तो क्या मेरा पीछा किया जा रहा था।

मैंने अपनी स्पीड एकदम कम कर दी। तत्काल बीट की स्पीड कम हुई। मैंने स्पीड बढ़ाई तो पिछली कार की स्पीड में भी इजाफा हुआ। मैंने कुछ आगे जाकर कार रोक दी। बीट भी मुझसे कुछ दूरी पर खड़ी हो गई। मैं इंतजार करने लगा। कुछ मिनट गुजरे तो बीट का चालक बाहर निकलकर कार का बोनट उठाकर उसपर झुक गया मानों जाहिर करना चाहता था कि कार में अचानक कोई खराबी आ गयी थी जिसको वो ठीक करने की कोशिश कर रहा हो।

मुझे उसकी कोई खास फिक्र नहीं थी। जिसे अपना पीछा किये जाने का पता हो उसका पीछा कोई माई का लाल नहीं कर सकता।

मैंने अपनी कार स्टार्ट की और एकदम से स्पीड बढ़ा दी। बीट का चालक उतनी फुर्ती नहीं दिखा पाया, उसके बोनट गिराकर कार के भीतर बैठने तक मैं अगले चौराहे तक पहुंच चुका था। मैंने वहां से यू टर्न लिया और वापस कोतवाली की दिशा में चल पड़ा। कुछ आगे जाते ही मुझे बीट फुल स्पीड अपने विपरीत दिशा में दौड़ती दिखाई दी।

मैं लाल हवेली पहुंचा अब तक सभी लोग वापस हवेली पहुंच चुके थे।

मैं अपने कमरे में पहुंचा और अपनी कांटेक्ट डायरी निकालकर उसमें सुरेश अग्रवाल का नम्बर तलाशने लगा। सुरेश मेरा पीडी भाई था। जो कि लखनऊ में रहता था। नम्बर मिल गया तो मैंने उसे फोन किया।

‘‘कैसे हो पीडी ब्रदर?‘‘ वो कॉल अटैण्ड करते हुए बोला।

‘‘ठीक हूं, तुम बताओ?‘‘

‘‘इधर भी सब मस्त चल रहा है, बीवियों पर शक करने वाले मर्दों की तादाद बढ़ती जा रही है, लिहाजा अपनी ऐश हो गयी है। तुम बताओ आज अचानक मेरी याद कैसे आ गयी?‘‘

‘‘एक काम है जो वार फुटेज पर करना है, खर्च चाहे जितना भी हो परवाह नहीं। आई रिपीट जो भी खर्चा हो परवाह नहीं है, मगर रिजल्ट आज ही चाहिए।‘‘

‘‘काम बोलो ब्रदर‘‘

‘‘करीब पांच महीने पहले की बात है। लखनऊ से पुरातत्व विभाग एएसआई की एक टीम सीतापुर आई थी। वे लोग इधर की प्राचीन इमारतों और मंदिरों का सर्वेक्षण करने आये थे। उनमें से दो की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। हत्या का कोई कारण सामने नहीं आया था। तुम्हें उस टीम के बाकी सदस्यों का पता करना है और उनसे सिर्फ एक प्रश्न का जवाब हासिल करना है कि हत्या से पहले वो दोनों क्या काम कर रहे थे और किस जगह कर रहे थे। इससे संबंधित अगर कोई और जानकारी हासिल हो जाय तो फिर बात ही क्या?‘‘

‘‘मगर आज ही?‘‘

‘‘हां दोस्त आज ही, ये ना सिर्फ तुम्हारे इस प्राइवेट डिटेक्टिव भाई की इज्जत का सवाल है बल्कि समझ लो जान भी शूली पर अटकी हुई है।‘‘

‘‘ओके मैं करता हूं कुछ, भला तुम्हे मरते हुए मैं कैसे देख सकता हूं।‘‘

‘‘गुड, थैंक्स!‘‘ मैंने कॉल डिस्कनैक्ट कर दी।

मैं एक बार पुनः मानसिंह के कमरे में पहुंचा, मेरा दिल बार-बार कह रहा था वहां से कुछ ना कुछ खास चीज अवश्य बरामद होनी चाहिए जिससे तफतीश के लिए कोई रास्ता बन जाता। मैं एक बार पुनः वहां की तलाशी लेने में जुट गया। मेज की दराजों से शुरू करके मैं अभी वार्डरोब तक पहुंचा ही था कि...!

तभी कमरे कि तरफ आती पदचापें सुनाई दी, ”कौन हो सकता है?“ -मैंने सोचा - शायद श्याम सिंह, मैंने व्याकुल भाव से इधर-उधर देखा। वहाँ छुपने जैसी कोई जगह न थी, अंततः मैं आलमारी कि ओट में हो गया जो कि छुपने के लिहाज से नाकाफी था। आगंतुक की निगाह कभी भी मुझ पर पड़ सकती थी। मगर मुझे उसकी कोई खास परवाह नहीं थी। मैं सांस रोके प्रतीक्षा करने लगा।

दरवाजा हिला, आगंतुक ने अंदर कदम रखा, मैं सावधान हो गया, वो जूही थी ये देखकर मैंने चैन कि सांस ली। अभी मैं उसे वहां अपनी उपस्थिति का आभास कराने जा ही रहा था कि तभी उसके हाव-भाव देखकर चौंक पड़ा वो इस वक्त बेहद चौंकन्नी नजर आ रही थी, उसने एक बार सावधानी पूर्वक दरवाजे से बाहर झांककर देखा फिर दरवाजा बंद करने के पश्चात शंकित भाव से अपने दायें-बायें देखा, मानों तसल्ली करना चाहती हो कि कमरे में उसके अलावा कोई नहीं था।

फिर वो अंडों पर कदम रखती हुई आलमारी के समीप पहुंची। उसने आलमारी के किवाड़ खोल दिये। अब वो मुझे दिखाई पड़ना बंद हो गई। अलबत्ता वहां उभरती कुछ आहटों से मैंने अंदाजा लगाया कि वो अलमारी से किताबें निकालकर फर्श पर रख रही थी, कुछ देर तक यही प्रक्रिया चली, फिर घर्र-घर्र की आवाज हुई, उसके सामने की दीवार कांपी और बाईं ओर को सरकने लगी। मेरी आंखें मारे हैरत के फट सी गईं। चंद सैकेण्ड वही प्रक्रिया चली, अब सामने की दीवार में छः बाई चार का वर्गाकार दरवाजा खुल चुका था। निश्चय ही वो कोई गुप्त दरवाजा था जिसका सम्बंध अलमारी में लगे किसी उपकरण से था।

अलमारी से अलग हटकर जूही उस नये दरवाजे में जा घुसी, जब वो आंखों से ओझल हो गई तो दबे पांव चलता हुआ मैं उस दरवाजे तक पहुंचा। आगे नीचे को जाती सीढ़ियां बनी थीं। मैं सीढ़ियां उतरकर नीचे पहुंचा। अंधेरा इतना घना था कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं पड़ता। मैं आंखें फाड़कर जूही को तलाशने की कोशिश करता रहा। मगर वो मुझे कहीं भी दिखाई नहीं दी। किसी आहट के इंतजार में मैंने अपने कान खड़े कर दिये, मगर चारों तरफ निस्तब्धता छाई हुई थी, यहां का वातावरण बड़ा ही भयावह प्रतीत हो रहा था।

मैं सावधानी पूर्वक आगे बढ़ा। कुछ दूर चलने के पश्चात मुझे दाईं तरफ किसी दरवाजे का आभास हुआ, मैं उसमें प्रवेश कर गया, अंदर कदम रखते ही मैं थमककर रह गया। सामने एक खुली हुई तिजोरी थी जो नोटों से ठुंसी हुई थी। कम से कम भी वो करोड़ों के नोट थे।

जूही तिजोरी के सामने खड़ी थी, मेरे देखते ही देखते उसने नोटों की एक गड्डी उठाकर अपने गरेबां में ठूंसकर तिजोरी बंद कर दी।

मैं तत्काल कमरे से बाहर निकल आया और दरवाजे से हटकर कुछ दूरी पर खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद जूही भी निकली और वापस चल पड़ी।

अभी वो कुछ कदम ही चली होगी कि मुझे वहां किसी तीसरे शख्स की उपस्थिति का आभास मिला, मैंने चीखकर जूही को सावधान कर देना चाहा मगर तब तक देर हो चुकी थी। साये ने जूही के ऊपर छलांग लगा दी। जूही के गले से निकलती घों-घों की आवाज मैंने स्पष्ट सुनी। शायद साया उसका गला दबा रहा था। वक्त बहुत कम था, मगर वो हथियारबंद हो सकता था, ऐसे में उसके करीब जाना खतरनाक था। मैंने अपनी रिवाल्वर निकालने की कोशिश की तो याद आया कि मेरी दोनों रिवाल्वर महानायक सिंह के पास जमा थी। मैं झुंझला उठा।

जब मेरी सोचने-समझने की शक्ति कुंद हो गई। तब मैंने साये पर छलांग लगा दिया, मेरी पकड़ में उसकी बाइंर् कलाई आई तो मैंने उसे जोर से उमेठा, वो दर्द से बिलबिला उठा। उसके हाथों से छूटते ही जूही कटे वृक्ष की भांति फर्श पर गिर पड़ी, शायद वो...बस इससे ज्यादा मैं नहीं सोच सका साये ने मेरी पसलियों में एक तगड़ा घूंसा जड़ दिया मैं दोहरा हुआ तो वह भागा। मैंने उसके पीछे जाने की जहमत नहीं उठाई, या फिर उसने मुझे इस काबिल छोड़ा ही नहीं था। मैंने जूही की नब्ज टटोली एक बार तो मेरा दिल धक् से रह गया। मगर फिर ध्यान देने पर पाया कि नब्ज चल रही थी।

मैंने चैन की सांस ली।

तभी घर्र-घर्र की आवाज पुनः गूंजी। मैं समझ गया कि तीसरा शख्स ना सिर्फ तहखाने से बाहर जा चुका था। बल्कि उसने यहां से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता बंद कर दिया था। अब हम इस चूहेदानी में कैद थे।

पूरी तरह उसके रहमों-करम पर थे।

मैं जूही कि तरफ आकृष्ट हुआ, वो अभी भी बेसुध सी पड़ी थी। मैंने उसे होश में लाने कि कोशिशें शुरू कर दी।

लगभग दो मिनट बाद वो कुनमुनाती हुई उठ बैठी, मैंने फौरन जेब से निकालकर अपना लाईटर जला लिया, उसके मध्यम प्रकाश में मैंने जूही के पीले पड़ चुके चेहरे को देखा। वो अभी भी भयभीत निगाहों से चारों तरफ घूर रही थी।

”मुझ पर वो हमला तुमने किया था?“ - वो शंकित स्वर में बोली।

”पागल हुई हो मैं भला तुम्हें मारने की कोशिश क्यों करूंगा?“

”तिजोरी में रखे माल के लिए“ - वो निर्विकार भाव से बोली।

”फिर मैंने तुम्हें छोड़ क्यों दिया?“

”मुझे क्या पता, तुम बताओ।“

”तो सुनो मैं पैसा बनाने में बहुत ज्यादा इंट्रेस्टेड हूं। मगर वो पैसा मैं चोरी करके कमाऊँ ये मेरी अंतरात्मा को कभी मंजूर नहीं था और ना ही होगा।“

”सॉरी यार, मैं भी पता नहीं क्या अनाप-शनाप सोचने लगती हूं।‘‘

”नेवरमाइंड“ - मैं बोला - क्या यहाँ से बाहर निकलने का कोई दूसरा रास्ता है?“

”नहीं, मगर तुम अंदर कैसे आये थे?“

मैंने बताया।

‘‘और वो तीसरा शख्स जो कि मेरी जान लेना चाहता था! वो अंदर, मेरा मतलब इस तहखाने में कैसे पहुंचा, बाहर का दरवाजा तो मैं बंद कर आई थी।“

‘‘हो सकता है वो तुम्हारे किसी पहले फेरे में यहां आ घुसा हो और बाद में उसे बाहर निकलने का मौका ही ना मिला हो।“

”ये सम्भव नहीं है“ वो दृढ़ स्वर में बोली - ”क्योंकि पहला फेरा आज से तीन महीने पहले मैंने पिताजी के साथ लगाया था। इतने दिनों में तो वो भूख-प्यास से तड़प-तड़प कर मर गया होता।“

”जैसे कि अब हम मरेंगे।“

वो खामोश रही।

”इस तिजोरी की खबर तुम्हारे अलावा और किस-किस को है।“

”तुम्हे और शायद उस तीसरे शख्स को जो कि कुछ देर पहले यहां मौजूद था।“

”और किसी को नहीं।“

”नहीं“

”तुम्हारे चाचा जी को।“

”उन्हें भी नहीं है।“

”तुम इसे यहां क्यों रखती हो?“

”भई मुझे इसके बारे में तीन महीने पहले ही पता चला था। पहले सिर्फ डैडी को इसकी खबर थी, जब उन्होंने इसे यहीं रखा हुआ था तो मैं क्यों हटाती?“

”हवेली को न बेचने का यही कारण था।“

”नहीं यार, हवेली बेचते तो क्या हम इस पैसे को निकाल नहीं सकते थे यहां से। हवेली ना बेचने की सिर्फ एक वजह है-ये हमारे पुरूखों की हवेली है, हम इसे क्यों बेचे।“

‘‘ओके, अब बाहर कैसे निकलें?‘‘

”नहीं निकल सकते, इकलौता रास्ता वही है जिससे हम भीतर आये थे। हालांकि मेरी वजह से तुम भी यहां आ फंसे हो मगर मुझे खुशी है कि इस वक्त मैं यहां अकेली नहीं हूं। वरना डर के मारे ही मेरा दम निकल जाता।‘‘

‘‘वो तो अभी भी निकलेगा, भूख-प्यास से, तड़प-तड़प कर।‘‘

‘‘वो हमें गोली भी तो मार सकता है।‘‘

‘‘क्या जरूरत है, वो बस हमें दस-पंद्रह दिन भूल जाय तो हम वैसे ही मर जायेंगे।‘‘

‘‘था कौन वो?‘‘

”अपने चाचा जी के बारे में क्या ख्याल है?“

”क्या कहते हो? - वो चिहुंक उठी।

”क्या नहीं हो सकता?“

”असम्भव, उनके बारे में ऐसी कल्पना करना भी मूर्खता है।‘‘

‘‘ओके स्वीट हार्ट तुम कहती हो तो यकीन कर लेता हूं।‘‘
 
‘‘तुम भूल रहे हो कि हमें यहां बंद करने के अलावा भी बहुत सारी घटनायें घटित हुई हैं। फिर जरा सोचो प्रकाश तो उनका बेटा था, उसकी जान क्यों ली उन्होंने?‘‘

”फिर तो एक ही कैंडीडेट और रह जाता है, समझो अगर ये सब तुम्हारे चाचा का किया धरा नहीं है तो उसका है। बस यही दो शख्स हैं जिनपर कातिल होने का पूरा ऐतबार है मुझे।“

”नाम लो उस दूसरे शख्स का?“ - उसने उत्सुक स्वर में पूछा।

”इंस्पेक्टर जसवंत सिंह।“

”हे भगवान! तुम आदमी हो या प्रेत, अरे किसी को तो बख्श दिया करो। फिर तुम दिलावर सिंह को क्यों भूल रहे हो, तुम्हारे ही लफ्जों में, जिसकी टांग हर जगह फंसी हुई है।“

‘‘क्योंकि दिलावर मारा जा चुका है, और उसकी मौत के बाद ही मुझे इस बात का बड़ी शिद्दत से एहसास हुआ कि वो तो महज एक मोहरा था। या यूं समझ लो कमीशन एजेंट था जो मोटे कमीशन के बदले अपना काम कर रहा था।‘‘

‘‘फिर तो मेरे चाचा जी हरगिज भी अपराधी नहीं हो सकते।‘‘

‘‘क्यों?‘‘

‘‘क्योंकि मेरे चाचा जी कहीं से भी इतने पॉवरफुल नहीं दिखाई देते कि दिलावर जैसे शहर पर राज करने वाले गुण्डे को वो हैंडल कर सकें।‘‘

‘‘ऐन यही बात मेरे भी मन में आती है, तभी तो बार-बार मेरा ध्यान जसवंत सिंह की ओर जाता है।‘‘

‘‘मगर उसके पास ऐसा करने की वजह क्या है?‘‘

‘‘एक वजह है तो सही मेरी निगाहों में, बस साबित होना बाकी है। उम्मीद है शाम तक मुझे अपने हर सवाल का जवाब मिल जायेगा। खैर ये बताओ तुम्हारा मोबाईल फोन कहां है।‘‘

”मेरे कमरे में।“

‘‘ओह‘‘

‘‘और तुम्हारा?‘‘

‘‘मेरे कमरे में।‘‘

‘‘गुड।‘‘

‘‘अपराधी ने इस बारे में क्यों नहीं सोचा।‘‘

‘‘किस बारे में?‘‘

‘‘यही कि हमारे पास मोबाइल फोन हो सकता है, जिसका इस्तेमाल कर हम अपने लिए मदद बुला सकते थे।‘‘

‘‘उसे ध्यान नहीं आया होगा, तुम भूल रहे हो कि उसकी प्राथमिकता हमें यहां बंद कर सुरक्षित बाहर निकलने की थी। फिर हम मदद बुलाकर यहां से बाहर निकल भी जाते तो उसका क्या बिगाड़ लेते। हम कौन सा उसे पहचानते हैं।‘‘

वो ठीक कह रही थी।

डॉली जूही के कमरे में उसके पलंग पर अधलेटी मुद्रा में पसरी हुई थी। अकेलेपन कि बोरियत हटाने के लिए वो किसी उपन्यास के पन्ने पलट रही थी। उपन्यास वो पहले भी एक बार पढ़ चुकी थी। लिहाजा थोड़ी देर में ही बोर होकर उसने उपन्यास एक तरफ रखा और उठकर खड़ी हो गई। बाहर आकर उसने जूही की तलाश में हवेली का कोना-कोना छान मारा, मगर जूही उसे नहीं मिली। उसने कारों को चैक किया तो पता चला कि जूही की कार वहीं खड़ी थी। इम्पाला भी वहीं मौजूद थी।

‘‘उसने राज के कमरे में जाकर देखा। मोबाइल वहीं था मगर राज नहीं था। क्या माजरा था?

”तो क्या वो वापस लौट आया था। फिर था कहां, क्या पता हवेली में ही कहीं हो।“

फिर उसने पूरी हवेली में दोनों को तलाश करना शुरू किया, सारे नौकरों से भी पूछ डाला मगर कुछ पता नहीं चला।

वापस हवेली के अंदर आकर उसने राज के मोबाइल से कोतवाल को फोन लगाया।

”हैलो?“

जवाब में डॉली ने अपना परिचय देते हुए राज के बारे में पूछा और जवाब सुनकर फोन रख दिया।

वो वापस जूही के कमरे में आई और उपन्यास पढ़ने में व्यस्त हो गई। रात के आठ बज गये, मगर जूही और राज में से कोई भी वापस नहीं लौटा। अब उसे चिन्ता होने लगी।

तभी राज का मोबाइल बज उठा, जसवंत का नम्बर डिस्प्ले हो रहा था।

‘‘जासूस साहब आए कि नहीं अभी?“

”जी नहीं, मैं उन्हीं का इंतजार कर रही हूँ“ - वो चिंतित स्वर में बोली -”पता नहीं कहां रह गए। आप प्लीज जरा....।“

”जी हाँ जरूर! मैं कोशिश करता हूँ। अगर इस दौरान वे लौट आएं तो आप उन्हें कोतवाली भेज दें।“

”इंस्पेक्टर साहब क्या कोई खास वजह है?“

”खास ही समझिये उन्होंने कुछ इंक्वायरी चाही थी जिसकी रिपोर्ट आ चुकी है।“

‘‘ठीक है वो जैसे ही आते हैं मैं उन्हें भेजती हूं।‘‘

जवाब में उधर से कॉल डिस्कनैक्ट कर दी गयी।

अब वो साफ-साफ फिक्रमंद दिखाई देने लगी।

अभी दो मिनट ही गुजरे थे कि दोबारा घंटी बजी। अननोन नम्बर डिस्प्ले हो रहा था।

डॉली ने कॉल अटैंड की।

‘‘हल्लो कौन?‘‘

‘‘सॉरी मैडम!‘‘-उधर से तत्काल कहा गया-‘‘लगता है रांग नम्बर लग गया।‘‘

‘‘नहीं सुनिए प्लीज‘‘-वो जल्दी से बोल पड़ी-‘‘ये राज साहब का नम्बर है, अगर आप उन्हें कॉल कर रहे थे।‘‘

‘‘जी हां, कहां है अपना पीडी ब्रदर?‘‘

‘‘शाम से उनका कुछ पता नहीं चल रहा। मैं बहुत फिक्रमंद हूं, क्या आपका नाम जान सकती हूं।‘‘

‘‘सुरेश अग्रवाल।‘‘

‘‘लखनऊ से?‘‘

‘‘जी हां।‘‘

‘‘कोई खास बात है, अग्रवाल साहब।‘‘

‘‘बात तो खास है पर सॉरी मैं आपको नहीं बता सकता।‘‘

‘‘देखिए समझने की कोशिश कीजिए, राज गायब है, ढ़ूंढे नहीं मिल रहा। हम दोनों एक साथ काम करते हैं। क्या पता आपसे मिली जानकारी उसे खोजने में कुछ मदद कर सके।‘‘

‘‘सॉरी मैडम मैं आपको नहीं बता सकता।‘‘ उसने कॉल डिस्कनैक्ट कर दी।

डॉली आह भर कर रह गयी।

फिर कुछ सोचते हुए उसने जसवंत सिंह को फोन किया।

उधर से हलो, सुनाई देते ही वो बोल पड़ी, ”इंस्पेक्टर साहब! क्या मैं वो रिपोर्ट देख सकती हूँ?“

”जी हाँ मगर आप! ......“

”इंस्पेक्टर साहब प्लीज, मैं बहुत परेशान हूं। आज से पहले वे इतनी देर तक बिना बताये कभी बाहर नहीं रहे। ज्यादा नहीं एक फोन तो वे अवश्य ही कर देते। उनका मोबाईल भी यहीं पड़ा है, वैसे भी आज सुबह से ही मेरी दाइंर् आँख फड़क रही है। जाने क्या होने को है?“

”आप तो खामखाह वहम पाले हुए हैं, जिससे राज को कोई खतरा हो सकता था वो तो पहले ही दूसरी दुनियां में पहुंच चुका है।“

”क्या करूँ इंस्पेक्टर साहब, बात अगर दिल्ली की होती तो शायद मैं इतनी चिन्ता कभी नहीं करती। मगर यह शहर, उफ! लगता है लाशों के ढेर पर ही बसा हुआ है। और फिर जूही भी गायब है, भगवान न करे कोई हादसा......।“

”वो दोनों एक साथ तो नहीं गये।“

”कुछ कह नहीं सकती, क्योंकि राज को वापस हवेली लौटकर आते मैंने नहीं देखा, मगर उनका मोबाइल यहीं पड़ा है लिहाजा वापस तो लौटे थे वो।“ कहकर वह तनिक रूकी फिर बोली - ”प्लीज आप एक बार वो रिपोर्ट मुझे दिखा दें।“

”आप तो ऐसे कह रही हैं जैसे वो दोनों रिपोर्ट में ही कहीं छुपे बैठे हों।“

”भगवान करे, ऐसा ही हो।“

”ठीक है आप इंतजार करिए मैं अभी रिपोर्ट के साथ हाजिर होता हूँ।“

”आप तकलीफ न करें मैं खुद आ जाती हूँ।“

कहकर उसने कॉल डिस्कनैक्ट किया और बाहर आकर इम्पाला में सवार हो गई।

वो कोतवाली पहुंची तब तक साढ़े आठ बज चुके थे, इंस्पेक्टर को उसने अपना इंतजार करते पाया।

”बैठिए“ - जसवंत सिंह बोला- ”आपने नाहक तकलीफ की, मैं खुद आ गया होता।“

वो खामोश रही।

तभी एक हवलदार चाय ले आया। चाय के दौरान ही इंस्पेक्टर सिंह ने तीन-चार फुलस्केप कागज डॉली की ओर बढ़ा दिये।

उस पर वो तमाम जानकारियाँ दर्ज थी। जिसकी राज ने माँग की थी।

”ये रंजीत सिंह कौन है?“ - वो कागज पर एक अपरिचित नाम-पता और फोन नम्बर दर्ज देखकर बोली।

”यहीं सीतापुर में, रोडवेज डिपो के पीछे रहते थे, मगर पिछले दो सालों से बैंगलोर में है, यहाँ कभी आना-जाना भी नहीं होता। राज ने एक लैंडलाइन नम्बर की जानकारी चाही थी। वो इन्ही के घर में लगा हुआ है।“

डॉली ने अपने मोबाईल से वह नम्बर डॉयल किया। रिंग जाती रही मगर किसी ने फोन नहीं उठाया।

”क्या मैं लैंडलाइन से कॉल कर सकती हूँ।“

जवाब में इंस्पेक्टर ने टेलीफोन उपकरण उसकी तरफ खिसका दिया। डॉली ने कई बार वह नम्बर डायल किया, घंटी बजती रही, मगर किसी ने फोन अटैण्ड नहीं किया।

अगली चीज सिविल अस्पताल सीतापुर के उन्नीस सौ अठहत्तर के बर्थ रजिस्टर की फोटो कॉपी थी। जिसमें दो इंट्री ऐसी थीं जिन्हें अंडर लाइन किया गया था।

पहली एंट्री के अनुसार मानसिंह की पत्नी जानकी देवी ने उन्नीस जुलाई सन उन्नीस सौ नब्बे को जुड़वा बच्चों को जन्म दिया था। दूसरी एंट्री के आगे दो दिन बाद की तारीख थी। जिसके अनुसार इक्कीस जुलाई को उसी अस्पताल में श्याम सिंह की पत्नी कौशल्या देवी ने एक मरे हुए बच्चे को जन्म दिया था।
 
डॉली ने उस फोटो कॉपी के पीछे स्टेपल किये कागज को पढ़ना शुरू किया। वह लिखावट ताजा महसूस हो रही थी। उसके अनुसार डॉक्टर का कहना था कि कौशल्या देवी अब कभी मां नहीं बन सकती थीं। इसके बाद दोनों भाइयों में विचार विमर्श हुआ और अस्पताल में ही श्याम सिंह ने उनमें से एक बच्चे को जो कि लड़का था, गोद ले लिया था।

अगली चीज दो बर्थ सार्टिफिकेट थे। जिनमें से एक प्रकाश का था, जिसमें उसकी जन्म तिथी इक्कीस जुलाई उन्नीस सौ नब्बे थी। दूसरा जूही का था जिसमें उसकी जन्म तिथी, उन्नीस जुलाई उन्नीस सौ नब्बे लिखी थी।

”इंस्पेक्टर साहब“ - डॉली बोली - ‘‘क्या मतलब हुआ इसका?“

‘‘वही जो आप समझ रही हैं, प्रकाश और जूही सगे भाई बहन हैं।‘‘़ जसवंत सिंह बोला, ‘‘ये अलग बात है कि इस वाकये के पांच साल बाद भगवान ने कौशल्या देवी की गोद हरी कर दी। उनके यहां बेटे ने जन्म लिया। उसका नाम विशाल है, वो मुम्बई में एमबीए का फर्स्ट इयर का स्टूडेंट है।“

”ओह माई गॉड“ - उसके होंठ गोल हो गये आंखें सिकुड़ सी गईं।

‘‘अगली रिपोर्ट देखिए।“

डॉली ने अगला कागज उठा लिया जो कि कंप्यूटर से लिया गया प्रिंट आउट था।

”इसमें क्या है?“

”सिंह परिवार कि बैक ग्राउण्ड।“ - कहकर वो खामोश हो गया।

डॉली वो कागज पढ़ने लगी, जबकि इंस्पेक्टर सिंह कि तेज निगाहें डॉली के चेहरे पर उभरने वाले भावों का अवलोकन करने में व्यस्त थीं।

पूरी इबारत कर चुकने के बाद डॉली ने गहरी सांस ली और सारे कागजात इंस्पेक्टर को वापस लौटा दिया, ‘‘ये तो बहुत बुरा कैरेक्टर खींचा है आपने श्यामसिंह की माली हालत का। अब जब की ये साबित हो चुका है कि प्रकाश श्याम सिंह का नहीं बल्कि मानसिंह का बेटा था तो क्या ये नहीं हो सकता कि श्यामसिंह ने ही उसे जहन्नुम का रास्ता दिखा दिया हो।‘‘

‘‘देखो होने को कुछ भी हुआ हो सकता है। मगर मत भूलो कि प्रकाश को उन्होंने पाल-पोषकर बड़ा किया था। इंसान एक कुत्ता भी पाले तो उसकी मौत पर जार-जार होकर रोता है। ऐसे में क्या ये मानने वाली बात है कि छब्बीस साल तक जिस बेटे की परवरिश की उससे उसे जरा भी लगाव नहीं हुआ। उसका कत्ल करने की हिम्मत जुटा पाया वो अपने भीतर।‘‘

‘‘हो सकता है आपकी बात सही हो मगर जरा गौर कीजिए कैसी औलाद था वह - एक ऐसा नालायक बेटा जो उन्हें सड़क पर ले आया था। जो जुआरी था, नशेड़ी था, जिसकी रातें बीयर बारों में - वेश्याओं के पहलू में गुजरती थीं। जिसकी वजह से उनका बिजनेश लगभग डूब चुका था, वे पैसे-पैसे के मोहताज हो चुके हैं। ऐसे में अगर जूही ना रहे तो परिवार की करोड़ों की जायदाद के इकलौते मालिक श्याम सिंह हो जाएंगे।‘‘

‘‘आपकी बात दुरूस्त है, मगर फिर भी प्रकाश का कत्ल श्यामसिंह ने किया हो यह समझ में नहीं आता।‘‘

‘‘हो सकता है शुरू में बाप-बेटे की मिली भगत रही हो। बाद में प्रकाश को ये बात पता चल गयी हो कि वो असल में जूही का सगा भाई है। तब उसने श्यामसिंह का विरोध करना शुरू कर दिया हो और सारी बात जूही को बता देने की धमकी दी हो। क्योंकि हालात बताते हैं, कि इस पूरे षड़यंत्र में प्रकाश का एक्टिव रोल था। ऐसे में करोड़ों की समपत्ति का ख्वाब देख रहे श्यामसिंह को जब अपना सपनों का जहाज डूबता दिखाई दिया हो तो ये नहीं हो सकता कि उन्होंने ही प्रकाश का कत्ल कर दिया हो।‘‘

‘‘आपने लगता है रिपोर्ट ध्यान से नहीं पढ़ी।‘‘

‘‘क्या कहना चाहते हैं?‘‘

‘‘हमारी तफ्तीश ये कहती है कि जिस दिन प्रकाश का कत्ल हुआ श्याम सिंह मुम्बई में थे।‘‘

‘‘हां यही एक गड़बड़ है मेरी थ्योरी में। इस बात का कोई जवाब ढूंढना ही होगा।‘‘ कहकर डॉली दोबारा से उन रिपोर्ट्स का अध्ययन करने लगी। पांच मिनट यूंही गुजरे। फिर उसने कागजात जसंवत को वापस लौटा दिया।

”कहिए तो जरा“ - वो मुस्कुराता हुआ बोला - ”ढूंढ़ लिया आपने जासूस को इन कागजों में।“

”एक रास्ता नजर तो आया है। अगर आप सहायता करें तो सफलता कि उम्मीद भी की जा सकती है।“

”क्या करना होगा?“

”फिलहाल तो आप रंजीत सिंह के मकान पर ही चलें।“

”आप शायद भूल रही हैं, मैंने पहले ही अर्ज किया था कि वे पिछले दो सालों से बैंगलौर में हैं।“

”मुझे याद है“ - वो बोली - ”तभी कह रही हूं। आप प्लीज अपने साथ किसी फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट को भी ले चलें तो बेहतर होगा।“

”ठीक है, कोशिश करता हूँ“ - कहकर वो कमरे से बाहर निकल गया, डॉली इंतजार करने लगी।

पाँच मिनट बाद ही वो वापस लौटता हुआ बोला - ”चलिए।“

”फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट का क्या हुआ“ - वो उठती हुई बोली।

”मैंने फोन कर दिया है वो दस मिनट बाद वहीं पहुंच जायेगा।“

डॉली ने समझने वाले अंदाज में सिर हिलाया और इंस्पेक्टर के पीछे-पीछे चल पड़ी। बाहर आकर उसने कार वहीं छोड़ दी और जसवंत सिंह के साथ पुलिस जीप में सवार हो गई। जीप इंस्पेक्टर सिंह खुद ड्राइव कर रहा था।

पाँच मिनट बाद वो दोनों रंजीत सिंह के मकान के सामने खड़े थे।

”अब।“ - कहकर उसने डॉली कि तरफ देखा। डॉली आगे बढ़ी, उसने कॉल बेल पुश किया, जवाब में अंदर कहीं घंटी बजने की आवाज हुई, मगर दरवाजा नहीं खुला। उसने आगे बढ़कर लोहे की सांकल हटाकर दरवाजा खोला और बाउंड्री के भीतर दाखिल हो गई। तब इंस्पेक्टर सिंह को मजबूरन उसके पीछे जाना ही पड़ा।

डॉली अगले दरवाजे पर पहुंच कर ठिठक गई। उसे लगा दरवाजा चौखट से सटा हुआ नहीं था। दरवाजे में लगे बिल्ट इन लॉक कि हालत भी कुछ बिगड़ी हुई दिखाई पड़ी। उसका माथा ठनका, उसने दरवाजे पर पैरों से ठोकर मारा और दरवाजे से अलग हट गयी। ठोकर लगते ही दरवाजा पूरा खुल गया, उसकी आशंका निर्मूूल साबित हुई। अंदर कोई हलचल नहीं हुई। उसने इंस्पेक्टर सिंह की ओर देखा जो हकबकाया हुआ कभी डॉली तो कभी खुले हुए दरवाजे को देख रहा था। वो खुद हैरान था यह सोचकर कि जब मकान के मालिक बैंगलोर में थे तो दरवाजा क्यों खुला हुआ था।

”अब क्या कहेंगे आप?“

”हो सकता है मकान मालिक ने अपने पीछे कोई केयर टेकर रख छोड़ा हो।“

”तो फिर वह सामने क्यों नहीं आता।“ - डॉली बोली - ”और फिर जरा इस बिल्ट इन लॉक पर गौर करिये, इसकी हालत से साफ जाहिर हो रहा है कि इसके साथ जबरदस्ती की गई है।“

”फिर तो जरूर यह किसी चोर का काम होगा।“

”हो सकता है, मगर फिर सवाल यह उठता है कि इसका फोन नम्बर राज को कैसे मिला। क्यों वे नम्बर के मालिकान को जानने के लिए उत्सुक थे?“

इंस्पेक्टर ने उस बात पर गम्भीरता से विचार किया।

”अब इजाजत दें तो भीतर चलें।“

”थोड़ी देर और इंतजार कीजिए, मैं किसी पड़ोसी को पकड़कर लाता हूँ। उसके सामने अंदर घुसना ज्यादा बेहतर होगा।“

डॉली को उसकी बात जंची, सो वो भी उसके साथ चल पड़ी।

बगल का मकान एडवोकेट मनीराम का था। वो इंस्पेक्टर सिंह से परिचित था। सो उसको देखते ही बोल पड़ा-”आइए-आइए इंस्पेक्टर साहब, कहिए कैसे तकलीफ की।“

”माफ कीजिए तकलीफ तो मैं आपको देने आया हूँ। मगर क्या करूँ पुलिस की नौकरी है, मजबूरन आना पड़ा।“

”इंस्पेक्टर साहब बात क्या है?“

”आप रंजीत सिंह को तो जानते होंगे, आपके पड़ोसी जो ठहरे।“

”जी हां मगर अब वे यहाँ नहीं रहते। एक लम्बा अरसा गुजर गया उन्हें देखे। पीछे उनका मकान भी लावारिस पड़ा है। पड़ोस में एक औरत रहती है जो शुरूआत में दो चार महीने मकान की साफ-सफाई करती रही। मगर जब रंजीत ने उसकी कोई खबर नहीं ली तो उसने भी अपना काम बंद कर दिया।“

”यूँ अच्छे भले मकान को छोड़कर जाने के पीछे जरूर कोई खास वजह रही होगी।“

”अरे नहीं, असल बात ये थी कि उनका एक ही लड़का है। सुना है बैंगलोर में कोई कारखाना खोल रखा है। रुपये पैसे की कोई दिक्कत उन्हें थी नहीं। सो चल दिये सब कुछ छोड़कर बेटे के पास, मगर आप उनके बारे में इतनी पूछ-ताछ क्यों कर रहे हैं?“

”कोई खास वजह नहीं है बस अभी थोड़ी देर पहले किसी ने फोन करके बताया कि उनके घर में चोर घुस आये हैं“ - जसवंत सिंह ने कोरा झूठ का सहारा लिया- ”सो चले आये तफ्तीश के लिये।“

”मगर ये कैसे हो सकता है?“ - मनीराम चौंक पड़ा।

”क्यों नहीं हो सकता?“

”आजकल तो उस मकान में रंजीत सिंह के रिश्तेदार ठहरे हुए हैं। मैं परसों ही उनमें से एक से मिला था। पूछने पर मालूम हुआ वे लोग मुम्बई से आये हैं कुछ दिन रहकर चले जायेंगे।“

”कब से ठहरे हैं वे यहाँ?“

”यही कोई पन्द्रह-बीस रोज से।“

”अगर आपको एतराज नहीं तो जरा मेरे साथ उनके मकान तक चलिए।“

”जी हां जरूर।“

तत्पश्चात वे तीनों रंजीत सिंह के मकान पर पहुंचे।

”एक-एक करके सारी प्रक्रियाएं पुनः दोहराई गईं। मगर जैसा कि आपेक्षित का मकान के अंदर कोई नहीं मिला।

”वकील साहब यहां तो कोई भी नहीं है।“

”जी हां मैं खुद हैरान हूँ।“

कमरे में प्रवेश करते वक्त इंस्पेक्टर सिंह ने एहतियातन अपनी सर्विस रिवाल्वर हाथ में ले ली। फिर एक-एक करके उसने मकान के सारे कमरे छान मारे कहीं कोई नहीं था। वो वापस ड्राईंग रूम लौट आया।

”इंस्पेक्टर साहब“ - मनीराम बोला - ”यहां चोरी हुई हो। ऐसा दिखाई तो नहीं पड़ता। क्योंकि सभी कीमती सामान यथा-स्थान मौजूद है।“

”जी हां आप बजा फरमाते हैं। लगता है झूठी खबर मिली थी, आपको नाहक तकलीफ दी इसके लिए क्षमा चाहता हूँ।‘‘

”अरे इंस्पेक्टर साहब आप तो बेवजह शर्मिंदा कर रहे हैं।“

”चलिए ऐसा ही सही“ - जसवंत हंसा- ”आप उस व्यक्ति का हुलिया बतायेंगे जो कि परसों रंजीत सिंह के मेहमान के रूप में आपसे मिला था।“
 
कार के गतिशून्य होने के बाद उसने खुदको स्टैरिंग पर यूं गिरा दिया मानो बेहोश हो गयी हो और अधखुली आंखों से बाहर का जायजा लेने लगी।

दो लोग बोलेरो से नीचे उतरकर उसकी ओर बढ़े। उनमें से एक वो सूट-बूट वाला शहरी बाबू हो सकता था जिसका जिक्र पीछे थाने में होकर हटा था और शम्मो ने जिसका नाम रतन बाबू बताया था। अभी भी वो बादामी रंग का शानदार थ्री-पीस व उससे मैच करती टाई लगाये था। अपने इस रख-रखाव की वजह से वह किसी बड़ी कम्पनी का कोई एक्जीक्यूटिव नजर आता था, या फिर कोई बिजनेशमैन। अलबत्ता दूसरा व्यक्ति कौन था यह कह पाना मुहाल था।

दोनों हथियारबंद थे। नजदीक पहुंचकर दोनों ने मिलकर डॉली को घसीटकर कार से बाहर निकाला और जमीन पर पटक दिया।

‘‘चैक करो मर तो नहीं गयी।‘‘ सूट-बूट वाला बोला।

दूसरे ने झुककर उसकी नब्ज टटोली, ‘‘जिन्दा है, बस बेहोश हो गई लगती है।‘‘

‘‘गुड! ये यहां मर जाती तो गड़बड़ हो जाती, इसे कार की डिक्की में डाल दो। मैं इसकी कार लेकर चलूंगा तुम बोलेरो ले कर चलना। हाइवे पर चलकर इसका एक्सीडेंट स्टेज करते हैं।‘‘ सूट-बूट वाला बोला।

जवाब में दूसरा डॉली को उठाने के लिए नीचे झुका, ठीक उसी वक्त डॉली की टांग चली। झुके हुआ व्यक्ति के हलक से जोरदार चीख निकली। वह गर्दन पकड़कर दोहरा हो गया, रिवाल्वर उसके हाथों से छिटक गई। डॉली ने रिवाल्वर पर छलांग लगाई, ठीक तभी दूसरे के रिवाल्वर ने शोला उगला, डॉली बाल-बाल बची थी। रिवाल्वर को भूलकर उसने कार की ओट में छलांग लगा दी। तत्काल दूसरा फायर हुआ मगर तब तक वो कार की ओट में पहुंच चुकी थी।

आसमान में छाए काले बादलों की वजह से वहां अंधेरा घना था, बस यही एक बात डॉली के फेवर में थी।

‘‘तुम्हारी मौत निश्चित है! सुना तुमने,‘‘ -सूट-बूट वाला उच्च स्वर में बोला, ‘‘फिर बेकार में उछल-कूद क्यों मचा रही हो।‘‘

‘‘तुम अपनी फिक्र करो रतन बाबू,‘‘ - डॉली ने अंधेरे में तीर चलाया, ‘‘हैरानी है कि तुम मुम्बई से इतनी दूर मेरे हाथों मरने के लिए आ गये।‘‘

तत्काल फायर हुआ मगर डॉली अपना स्थान छोड़ चुकी थी।

‘‘ओह तो तुम मेरा नाम जानती हो?‘‘

‘‘मैं और भी बहुत कुछ जानती हूं तुम्हारे बारे में। देखना फांसी से कम सजा हरगिज नहीं होगी तुम्हे और तुम्हारे आका को।‘‘ कहते हुए डॉली ने जसवंत सिंह का नम्बर डॉयल किया। तत्काल कॉल अटैंड की गई।

‘‘इंस्पेक्टर साहब गौर से सुनिए मैं इस वक्त हवेली से दो सौ मीटर की दूरी पर हूं। रतन बाबू और उसका साथी, दोनों यहां मौजूद हैं। दोनों हथियार बंद हैं, जल्दी पहुंचिए।‘‘

उसने मोबाइल जेब में रखा और कान लगाकर कोई आहट सुनने की कोशिश करने लगी। अचानक उसे अपने पीछे कोई आहट महसूस हुई, उसने तुरंत अपनी दोनों टांगे दो दिशाओं में फैल जाने दीं, नतीजा ये हुआ कि एकदम जमीन पर पहुंच गई और उसपर चलाई गोली कार की बॉडी से टकराई। ठीक इसी पल डॉली ने खुद को पीठ के बल गिरा दिया, तब उसे सिर के पास खड़ा रतन बाबू का साथी दूसरी गोली चलाने को तत्पर दिखाई दिया। डॉली ने दोनों हाथों से उसके दोनों पैर पकड़कर अपनी ओर झटका दिया तो वह पीठ के बल धड़ाम से जमीन पर जा गिरा। उसकी रिवाल्वर से गोली चली मगर उसका रूख आसमान की तरफ हो गया था। फिर इससे पहले की वह सम्भल पाता डॉली ने उसकी पिस्तौल कब्जाकर निःसंकोच उसे गोली मार दी। यह सब महज दो सेकेंड के भीतर घटित हो चुका था।

‘‘क्या हुआ मदन मार दिया उसे?‘‘ रतन बाबू की आवाज गूंजी।

तो दूसरे का नाम मदन था। डॉली चुपचाप आवाज की दिशा में बढ़ी। फिर कुछ ऐसा इत्तेफाक हुआ कि बेलेरो के पीछे पहुंचते ही डॉली और रतन आमने सामने आ गये। इससे पहले कि रतन गोली चला पाता डॉली ने अपने एक हाथ से उसकी रिवाल्वर वाली कलाई को जकड़ते हुए दूसरे हाथ की उंगलियां उसकी आंखों में घुसेड़ दीं। रतन हलाल होते बकरे की तरह डकारा। उसकी रिवाल्वर गर्लफ्रेंड की तरह मुसीबत में उसका साथ छोड़ गई।

इसके बाद तो डॉली के वार थे और रतन बाबू की चीखें। अगले एक मिनट में उसने रतन बाबू का वो हाल कर दिया वह अपने पैरों पर खड़ा रहने के काबिल नहीं रहा।

‘‘चल अब शुरू हो जा।‘‘ वो रिवाल्वर रतन के माथे से सटाते हुए बोली।

रतन बाबू खामोश रहा। डॉली ने रिवाल्वर की नाल उसके घुटने से सटाकर बेहिचक गोली चला दी। रतन बाबू के हलक से दिल दहला देने वाली चींख गूंजी।

‘‘अब दूसरा घुटना।‘‘ कहकर उसने रिवाल्वर की नाल उसके दूसरे घुटने पर टिका दी।

‘‘सुनो-सुनो, प्लीज मेरी बात सुनो।‘‘ रतन गिडगिड़ाते हुए बोला, ‘‘मैं बताता हूं, सब कुछ बताता हूं।‘‘

जवाब में डॉली ने रिवाल्वर उसके घुटने से हटा ली और उससे कुछ कदम दूर, उसपर निशाना साधकर खड़ी हो गयी। वह नहीं चाहती थी कि किसी भी पल वो लापरवाह हो और रतन को उसपर झपटने का मौका मिले।

‘‘जल्दी बको।‘‘

‘‘देखो ये बहुत बड़ा गेम है, समझ लो अरबों-खरबों का दांव है ये। बहुत से लोग शामिल थे इसमें जिनमें से कई तो तुम्हारे ब्वायफ्रेंड की वजह से मारे गये....।

तभी किसी कार की हेडलाइट चमकी।

‘जसवंत सिंह।‘ डॉली के दिमाग में कौंधा।

‘‘धांय‘‘ गोली चलने की आवाज गूंजी। डॉली ने खुद को जमीन पर गिरा दिया और तेजी से लुढ़कती हुई बोलेरो की ओट में हो गई। कुछ सेकेंड यूंही गुजरे फिर उसने सावधानी पूर्वक कार की ओट से बाहर झांका, अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं दिया।

कुछ क्षण यूंही गुजरे फिर अंधेरे में किसी कार के स्टार्ट होने की आवाज गूंजी जो कि निरंतर दूर होती चली गयी। आक्रमणकारी या तो पहले से ही वहां मौजूद था या फिर हेडलाइट बंदकर के वहां पहुंचा था, और हालात का जायजा ले रहा था। वह नहीं चाहता था कि रतन बाबू अपना मुंह फाड़े। लिहाजा उसे गोली मार दी थी। मगर उसने डॉली को मारने की कोशिश क्यों नहीं की? क्या माजरा था। क्या वो जसवंत सिंह था। सोचते हुए उसने घड़ी देखी, वो इतनी जल्दी कोतवाली से यहां नहीं पहुंच सकता था।

इसकी क्या गारंटी की वह उसकी कॉल अटैण्ड करते वक्त कोतवाली में था। क्या पता वो पहले से ही उसके पीछा लगा हुआ हो। राज पहले ही उसके अजीबो-गरीब व्यवहार के बारे में शक जाहिर कर चुका था।

बहरहाल वह रतनबाबू के निश्चेष्ट शरीर के पास पहुंची। उसकी जेबों की तलाशी लेने पर एक लाइटर बरामद हुआ। लाइटर के सीमित प्रकाश मे डॉली ने उसका मुआयना किया, गोली उसके चेहरे का भुर्ता बना गई थी। जिंदा होने का मतलब ही नहीं था फिर भी डॉली ने उसकी नब्ज टटोल कर देखी, नब्ज गायब थी। उसकी पोशाक की तलाशी लेने पर सिगरेट के एक पैकेट और बटुए के अलावा अन्य कोई चीज बरामद नहीं हुई।

डॉली बटुए की ओर आकर्षित हुई, मगर उसमें सिवाय चंद रूपयों और खरीज के और कुछ नहीं था। ड्राईविंग लाइसेंस तक नहीं! जिसके वहां से बरामद होने की डॉली को पूरी उम्मीद थी। उसने सभी चीजें उसके पॉकेट में यथास्थान पहुंचा दी और उठकर खड़ी हो गयी।

अभी वह अपना अगला कदम निर्धारित कर ही रही थी, कि तभी किसी वाहन की हेडलाइट चमकी, उसने तत्काल खुद को गाड़ी की ओट में कर लिया और सांस रोके प्रतीक्षा करने लगी। आगंतुक जसवंत सिंह था। जीप रूकते ही वह छलांग लगाकर नीचे उतरा, उसके हाथ में एक शक्तिशाली टार्च थी, जिसके प्रकाश में वो वहां का मुआयना करने लगा। उसके पीछे-पीछे चार पुलिस वाले जीप से नीचे कूदे, और कोतवाल के हुक्म का इंतजार करने लगे।

डॉली कार की ओट से बाहर निकल आई।

‘‘खबरदार!‘‘ कोई पुलिसिया जोर से बोला, ‘‘हिलना नहीं वरना भेजा उड़ा दूंगा।‘‘

‘‘इंस्पेक्टर साहब ये मैं हूं शीला।‘‘

जसवंत ने टार्च का रूख तत्काल उसकी ओर किया।

‘‘आप ठीक तो हैं?‘‘

‘‘जी अभी तक तो हूं।‘‘ कहती हुई वह इंस्पेक्टर के पास आ गयी।

‘‘लगता है मैं लेट हो गया।‘‘

‘‘जी नहीं बस मामला जरा जल्दी निपट गया।‘‘

‘‘इसे आपने गोली मारी।‘‘

‘‘जी नहीं।‘‘ कहकर डॉली ने पूरा किस्सा बयान कर दिया।

‘‘शुक्र है भगवान का, कि इतनी गोलाबारी के बाद भी आप सही सलामत खड़ी हैं!‘‘ इंस्पेक्टर ने आह सी भरी, ‘‘वैसे क्या कोई अंदाजा लगा सकती हैं आप! उस चौथे व्यक्ति की बाबत, जिसने रतन बाबू को शूट किया था?‘‘

‘‘उसे देख पाना सम्भव नहीं था इंस्पेक्टर साहब क्योंकि वह गाड़ी की हैडलाइट के पीछे था। मैं अगर उसके सामने जाती तो निश्चय ही मेरा भी वही हाल होता जो उसने रतन का किया।‘‘

तत्पश्चात इंस्पेक्टर ने हैडक्वाटर फोन कर मामले की जानकारी दी, अपने सीओ को इंफॉर्म किया, फोरेंसिक टीम को फोन किया, और एक अन्य पुलिसिये को सर्च लाइट का इंतजाम करने को कहा।

‘‘आप जीप में बैठिये मैं ड्रायवर को बोलता हूं वह आपको हवेली तक छोड़ आयेगा‘‘ कहकर वह अपनी जीप की ओर मुड़ा, ‘‘नसीम अली! मैम साहब को लाल हवेली पहुंचाकर आओ।‘‘

‘‘जी साहब जी।‘‘

‘‘अरे इंस्पेक्टर साहब नाहक परेशान हो रहे हैं पांच मिनट का रास्ता है मैं पैदल ही चली...।‘‘

‘‘कहना मानिए प्लीज।‘‘
 
इस बार डॉली ने कुछ नहीं कहा, वह चुपचाप जीप में जा बैठी। दो मिनट में वह हवेली के गेट पर थी। ड्राइवर ने हार्न दिया तो पहले छोटा दरवाजा खुला फिर डॉली को पहचान कर चौकीदार ने बड़ा दरवाजा खोल दिया। हवेली में कंकालों का पर्दाफाश होने के अगले ही दिन पुराने चौकीदार को सारी बात बताकर वापस बुला लिया गया था। इस वक्त वही ड्यूटी पर था। जीप आगे बढ़ी और ड्राइवे से गुजरकर पोर्च में जा खड़ी हुई।

डॉली के उतरने के बाद पुलिस जीप वापस लौट गयी। सामने का दरवाजा खुला हुआ था वो भीतर प्रवेश कर गयी।

रास्ते भर वो ईश्वर से यही प्रार्थना करती रही कि उसके हवेली पहुंचने से पहले ही राज वहां लौट आया हो। अब देखना था उसकी प्रार्थना कबूल हुई थी या नहीं।

भीतर घुसते ही उसका सामना श्यामसिंह से हुआ। वो मानें उसी का इंतजार कर रहे थे। उसे देखते ही बोल पड़े - ”कहाँ गई थीं आप?“

”कोतवाली“।

”रात के दस बजे।“

मैं जब यहां से गई थी तो अभी आठ बजे थे।“

”देखो बेटे“ - वो समझाने वाले अंदाज में बोले - ”आप हमारे मेहमान हो, अगर आपको कुछ हो गया तो हमारे लिए डूब मरने वाली बात होगी। इसलिए वक्त का ख्याल रखा करो।“

”जी अंकल“ - कहकर वो चलने को हुई तभी......।

”जूही कहां है?“

”मालूम नहीं“ - फिर रूककर उसने संसोधन किया - ”अपने कमरे में होगी और कहां जायेगी?“

”और राज।“

”केस के सिलसिले में कहीं बाहर गये थे, अभी लौटे या नहीं, मैं नहीं जानती।“

”अगर वो आ गये हों तो कहना मैं उनसे मिलना चाहता हूँ।“

”जी अंकल।“ - कहकर वो आगे बढ़ गई।

किसी चोर दरवाजे कि तलाश में हमने - तहखाने का कोना-कोना छाना मारा, फर्श को हर जगह से टटोल डाला, मगर अफसोस कि हमें निकासी का कोई अन्य रास्ता नहीं मिला। ऐसा कोई गुप्त दरवाजा दिखाई नहीं दिया जिससे निकलकर हम आजाद हो पाते। अंततः थक-हारकर हमने खुद को वक्त के हवाले कर दिया, अलबत्ता इतनी सावधानी जरूर बरती कि तहखाने में छुपने की जगह तलाश कर वहीं फर्श पर बैठ गये। अब जब तक तहखाने में भरपूर प्रकाश की व्यवस्था न हो हमें ढूंढ पाना मुश्किल था।

मैंने घड़ी देखी नौ बज चुके थे। जूही मेरी बगल में दीवार की टेक लेकर पसरी हुई थी। वो बेहद निराश थी, पिछले आधे घंटे से उसने कोई बात नहीं की थी। मैंने भी उसे कुरेदने की कोशिश नहीं की। मैंने जेब से डनहिल का पैकेट निकालकर चुप-चाप एक सिगरेट सुलगाया और धीरे-धीरे कश लेने लगा। मेरे पास सोचने को बहुत कुछ था, फिक्र करने के लिए बहुत सारी बातें थीं। मगर इस वक्त मुझे सबसे अधिक फिक्र इस बात की हो रही थी कि मेरे सिगरेट के पैकेट में अब सिर्फ दो सिगरेट बचे थे।

”राज!‘‘ जूही ने पुकारा।

”मैं सुन रहा हूँ।“

”तो फिर कुछ करते क्यों नहीं?“

”कैसे करूँ तुमने तो अभी तक कपड़े भी नहीं उतारे।“

”ओह शटअप“ - कहकर वो मेरी गोद में सिमट आई, उसकी इस अप्रत्याशित हरकत पर मैं तनिक हड़बड़ाया मगर उसे खुद से अलग करने की कोशिश नहीं की।

”मुझे भूख लगी है“ - वो तनिक झेंपती हुई बोली - ”लगता है जैसे अंतड़ियां सूख गई हैं।“

मैं चुप रहा, वैसे भी सांत्वना के सिवाय मैं उसे दे भी क्या सकता था! और सांत्वना से पेट नहीं भरता - इतनी राज की बात भला मैं उसे कैसे बता देता।“

”तुम कुछ बोलते क्यों नहीं?“

”क्या बोलूं?“

”बताया तो मुझे भूख लगी है।“

”तो फिर सोने की कोशिश करो।“

”भूखे पेट मुझे नींद नहीं आती।“

”आ जायेगी कोशिश करो“ - कहकर मैं उसके बालों में अंगुलियां फेरने लगा। वो और कसके मुझसे लिपट गई। धीरे धीरे वक्त गुजरता रहा, इस दौरान कब मुझे नींद आ गई इसका पता ही नहीं चला।

सुबह के दस बजने को थे। डॉली अपने कमरे में उदास बैठी हुई थी वो राज के लिए काफी फिक्रमंद थी और बार-बार उस घड़ी को कोस रही थी जब उसने राज से जिद करके उसे सीतापुर बुला लिया था। काश! कि उसने ऐसा नहीं किया होता तो आज ये मुश्किल सामने नहीं आती।

हवेली में जूही कि आंटी और कुछ एक नौकरों को छोड़कर कोई नहीं था। श्याम सिंह को सुबह-सुबह ही कोतवाली बुला लिया गया था। कुछ देर पहले उसने आंटी से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने राज को कोसना शुरू कर दिया था, यह कहते हुए कि वह उनकी भतीजी को बहला-फुसलाकर कहीं भगा ले गया था।

लिहाजा उसने खुद को कमरे में कैद कर लिया था, वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी। या फिर यूं कह लीजिए कि करने के लिए उसके पास कुछ था ही नहीं।

बारह बजे जसवंत सिंह का फोन आया, उसने राज के बारे में पूछने के बाद डॉली को बताया कि, रंजीत सिंह के मकान से मिले फिंगर प्रिंट रतन बाबू और उसके साथी के थे। उसका साथी लोकल आदमी था और दिलावर सिंह के गैंग में काम करता था। अलबत्ता रतनबाबू के बारे में मुम्बई पुलिस से मदद मांगी गई है। क्योंकि जांच में यह बात अब स्पष्ट हो गई है कि वह मुम्बई का ही रहने वाला था, और करीब सप्ताह भर पहले ही सीतापुर पहुंचा था।

साथ ही उसने एक चौंका देने वाली बात ये बताई कि श्यामसिंह ने राज के खिलाफ जूही के अपहरण का मामला दर्ज कराया है। उनका आरोप है कि राज ने जूही को सही सलामत घर पहुंचाने के बदले उनसे एक करोड़ रूपये की मांग की है।

‘‘इंस्पेक्टर साहब ये झूठ है, ये श्यामिंसंह की सोची समझी चाल है। जिसके जरिए वो पुलिस का ध्यान अपनी तरफ से हटाना चाहते हैं।‘‘

‘‘हो सकता है, मगर मैं इतने बड़े आदमी की रिपोर्ट को नजरअंदाज भी तो नहीं कर सकता। अब तो सबकी भलाई इसी में है कि लड़की सही सलामत वापस लौट आये। अगर उसे कुछ हो गया तो बहुत बुरा होगा। सीओ साहब ने सीधा आदेश दे दिया है कि अगर लड़की को खरांच भी आए तो किक्रांत को गोली मार दी जाय। आप समझ रही हैं मैं क्या कहने की कोशिश कर रहा हूं।‘‘

‘‘जी! मैं उन्हें तलाशने की पूरी कोशिश कर रही हूं,‘‘ - कुछ क्षण खामोशी रही फिर - ‘‘इंस्पेक्टर साहब एक काम और कराइए प्लीज!‘‘

‘‘क्या चाहती हो?‘‘

‘‘जूही के अंकल और रतन बाबू में कोई लिंक तलाशने की कोशिश कीजिए प्लीज, मेरा मन कहता है कि इन दोनों में कोई ना कोई संबध अवश्य होना चाहिए।‘‘

‘‘ठीक है मैं देखता हूं इस बारे में क्या किया जा सकता है।‘‘

‘‘जी शुक्रिया।‘‘

कॉल डिस्कनैक्ट कर डॉली ने सिर उठाया तो चिहुंक उठी। सामने श्यामसिंह खड़ा उसको घूर रहा था।

‘‘तो ये बात है।‘‘

‘‘क्या...क्या बात है?‘‘ डॉली हड़बड़ा सी गई।

‘‘तुम समझती हो ये सब मैं कर रहा हूं।‘‘

‘‘नहीं अंकल मगर...!‘‘

‘‘शटअप! बेवकूफ लड़की! तू नहीं जानती तू आग से खेल रही है। जिन्दा रहना चाहती है तो फौरन सीतापुर से दफा हो जा और दोबारा भूलकर भी इधर का रूख मत करना।‘‘

डॉली उसके लहजे पर हैरान रह गयी।

”राज कहां है?“ - डॉली ने गोली की तरह सवाल दागा।

श्याम सिंह उसके इस अप्रत्याशित सवाल पर हड़बड़ा से गये। फिर सम्भलते हुए बोले - ”क्या कहना चाहती हो?“

”मैंने अर्ज किया कि राज कहां है, जूही कहाँ हैं?“

”नाम मत लो उस नामुराद शख्स का, न जाने कहां भगा ले गया मेरी फूल सी बच्ची को“ - वो चिंतित स्वर में बोले - ”पता नहीं कहां और किस हालत में होगी बेचारी। हिम्मत तो देखो उस कमीने की! कहता है, एक करोड़ दो वरना तुम्हारी भतीजी को जान से मार दूंगा। अभी मैं पुलिस में उसके अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराकर ही आ रहा हूं।“

”आपको सचमुच नहीं मालूम वो दोनों कहाँ हैं?“ डॉली उसकी बात को नजरअंदाज करके बोली।

”मैं झूठ क्यों बोलूंगा।“

”जाहिर है बेवजह तो नहीं बोलेंगे लिहाजा जरूर कोई खास वजह होगी।“

”ऐसी कोई वजह नहीं है, ये सब तुम्हारी खामख्याली है।“

”चलिए वही सही, अब आप जरा मेरे एक दूसरे सवाल का जवाब दीजिए।“

”पूछो।“

‘‘आपने प्रकाश का कत्ल क्यों किया?“

”लड़की तू पागल तो नहीं हो गई है, मैं भला अपने बेटे का कत्ल क्यों करने लगा?“

”इसलिए क्योंकि प्रकाश आपका लड़का था ही नहीं, वो मानसिंह और जानकी देवी का लड़का था जिसे कि जन्मते के साथ ही आपने गोद ले लिया था।“

”कहानी अच्छी गढ़ी है।“ - वो पूरी लापरवाही से बोला

”यह कहानी नहीं, हकीकत है।“

”क्या फर्क पड़ता है?‘‘ - वो तनिक आगे बढ़ा -”कौन करेगा तुम्हारी इस बेवकुफाना बात पर यकीन?“

”पुलिस“ - डॉली बोली - ”आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि इंस्पेक्टर जसवंत सिंह को ये बात पता है, बल्कि मुझे बताया ही उसी ने है।“

‘‘तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मैंने किसी का कत्ल नहीं किया है। सच पूछो तो मैंने कभी चींटी तक नहीं मारी,‘‘-वो बड़े ही दार्शनिक अंदाज में बोला, ‘‘खैर क्या कर सकते हैं। हम सब किसी ना किसी मजबूरी के मारे होते हैं, और वो मजबूरी हमसे ऐसे-ऐसे काम करा जाती है जो हम मजबूर ना होते तो हरगिज नहीं करते।‘‘

‘‘आप बच नहीं पायेंगे।‘‘

”तुम अपनी खैर मनाओ बेवकूफ लड़की, तुम कैसे बचोगी।“

”क्या मतलब?“ - डॉली हड़बड़ाई।

”मतलब ये“ - कहकर उसने अपनी जेब से रिवाल्वर निकालकर डॉली पर तान दिया - ”पहले ही कहा था वापस लौट जाओ, मगर आजकल के बच्चों ने तो जैसे जिद पकड़ ली है कि बड़ों की बेअदबी करनी ही है। अब अगर तुम इंच भर भी अपनी जगह से हिली तो गोली मार दूंगा।“

डॉली सकपकाई, अब जाकर उसे एहसास हुआ कि वो एक बेहद चालांक और खतरनाक अपराधी के सामने बैठी थी।

‘‘लाओ अपना मोबाईल मुझे दे दो, प्लीज।‘‘
 
”मुझे मारकर भी आप बच नहीं सकेंगे, जसवंत सिंह पर आपकी हकीकत खुल चुकी है।“

”हो सकता है मगर वो साबित कुछ नहीं कर पायेगा“ - वो पूर्वतः दिलेर स्वर में बोला - ”मैं फिर कहता हूं मैंने कोई अपराध नहीं किया है। ऊपर से हर कत्ल की कोई ठोस वजह होती है, जो कि दूर-दूर तक मेरे पास दिखाई नहीं देती।“

”गिरफ्तारी के बाद वजह आप खुद बयान करोगे।“

”बिना किसी ठोस सबूत के मुझ पर हाथ डालने कि जुर्रत तो उसका एसएसपी और डीजीपी भी नहीं कर सकते फिर भला एक अदने से इंस्पेक्टर की औकात क्या है, इसके बावजूद अगर उसने मुझे गिरफ्तार कर भी लिया तो किये नहीं रख पायेगा।“

”मेरी लाश का आप क्या करोगे?“

”ओह, तो तुम्हें लगता है मैं तुम्हें कत्ल करने जा रहा हूं‘‘ कहकर वह हौले से तनिक हंसा, ‘‘लाओ अपना मोबाइल मुझे दे दो, कोई होशियारी नहीं प्लीज।‘‘

डॉली ने अपने हाथ में मौजूद राज का मोबाइल उसे थमा दिया। श्यामसिंह को स्वप्न में भी ख्याल नहीं आया कि वो अपना मोबाईल अपनी जीन्स की पिछली जेब में रखे हो सकती है।

चलो अब भाई साहब के कमरे में चलकर बात करते हैं। डॉली ने विरोध नहीं किया। दोनों मानसिंह के कमरे में पहुंचे। श्यामसिंह ने पलटकर दरवाजे की सिटकिनी चढ़ा दी।

डॉली को कवर किये वो अलमारी के पास पहुंचा, कुछ किताबें नीचे फेंकने के बाद एक लोहे का हैंडल दिखाई दिया। श्यामसिंह ने उसे घुमाना शुरू किया, तो घर्र-घर्र की चिर-परिचित आवाज के साथ सामने की दीवार में दरवाजा खुलने लगा। इस दौरान वो डॉली की तरफ से सावधान था, उसकी निगाहें डॉली के ऊपर ही टिकी हुई थीं। जबकि बेचारी डॉली आंखें फाड़-फाड़ कर कभी दीवार में खुलते दरवाजे को तो कभी श्याम सिंह को घूरे जा रही थी।

दरवाजा खुल चुका था। श्याम सिंह वापस डॉली के नजदीक पहुंचा और उसे रिवाल्वर से टकोहता हुआ बोला - ”चलो“

”कहाँ?“ - वो हड़बड़ाई।

”तहखाने में।“

हुक्म मानने के सिवाय दूसरा कोई चारा न था वो दीवार में खुले दरवाजे की ओर बढ़ी, जबकि श्यामसिंह उसे कवर किये अपने स्थान पर खड़ा रहा। मन-मन के कदम रखती हुई डॉली तहखाने के दरवाजे पर पहुंची।

”सीढ़ियां उतरो“ - वो पीछे से फुंफकारा- ”जल्दी करो।“

डॉली सीढ़ियां उतरने लगी। उसके नीचे जाते ही श्याम सिंह ने तहखाने का दरवाजा बंद कर दिया।

घर्र-घर्र की आवाज ऊपरले कमरे की अपेक्षा तहखाने के अंदर ज्यादा जोर से गूंज रही थी, आवाज सुनकर मैं और जूही दोनों ही चिहुंक उठे। जूही जो कि भूख-प्यास से बेदम होकर फर्श पर पड़ी तड़प रही थी। आवाज ने उस पर जादू सा असर किया। वो उठकर बैठ गई, हालत मेरी भी बदतर थी मगर जूही के मुकाबले मैं ठीक था।

”लगता है कोई नीचे आ रहा है“ - वो सशंक स्वर में बोली - ”कौन हो सकता है?“

पदचाप मुझे भी सुनाई पड़ी, मैंने टटोलकर अपने बगल में पड़ी लोहे की छड़ को उठाकर हाथ में तौला और कुछ आश्वस्त हुआ। यह छड़ मुझे तहखाने में ही पड़ी मिली थी। जिसे मैंने ऐसी ही किसी जरूरत के लिए सम्भालकर रख लिया था।

अचानक ही कदमों की आहट सुनाई देनी बंद हो गई।

”राज।“ - डॉली की चिर-परिचित आवाज गूंजी, सहसा मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ।

”राज, क्या तुम यहाँ हो, क्या मेरी आवाज सुन रहे हो?“ अब शक की कोई गुंजायश नहीं थी, आवाज निश्चय ही डॉली की थी।

”मैं यहाँ हूँ स्वीटहार्ट।“ - कहकर मैंने लाइटर जला दिया, तत्काल दौड़ते हुए कदमों की आहट सुनाई दी, दौड़ती हुई वो आई और मुझसे लिपट गई। बेध्यानी में लाइटर मेरे हाथों से छूटकर फर्श पर गिर गया। मेरे सीने में मुख छुपाकर वो हौले से सिसक उठी। उसकी इस अदा पर मैं निहाल हो गया। मेरा मन हुआ मैं जोर-जोर से हंसूं- खुशियां मनाऊँ, नाचना शुरू कर दूं।

”भई हम भी खड़े हैं यहां“ - पीछे से जूही की आवाज सुनाई दी - ”थोड़ा प्यार मुझपर भी उड़ेल लो।“

आवाज सुनकर डॉली छिटक गई और जूही के पास पहुंचकर उसे गले से लगाती हुई रो पड़ी। आज पहली बार मुझे इस बात का अहसास हुआ कि, मर्दों की तरह तठस्थ दिखने वाली डॉली के सीने में भी औरतों वाला ही दिल था।

पांच मिनट बाद सब कुछ नार्मल हो चुका था।

”तू यहां कैसे पहुंच गई?“ - मैंने पूछा।

”चाचा जी की मेहरबानी से।“

”पूरी बात बता?“ - मैं चौंका।

उसने बताया जिसे सुनकर मैं और जूही दोनों अवाक् रह गये, चाचा जान पर मुझे शक तो था, मगर उतना ही जितना की औरों पर, मगर अब शक कि गुंजाइश शेष नहीं बची थी।

”क्या फायदा हुआ?“ - जूही निराश स्वर में बोली - ”हमारी स्थिति तो ज्यों की त्यों बनी रही अलबत्ता इस कैदखाने में एक और व्यक्ति का इजाफा हो गया।“

”हाँ सो तो है।” मैंने समर्थन किया, ”मगर अब किया भी क्या जा सकता है?“

”घबड़ाओ मत स्थिति कि थोड़ी-बहुत खबर जसवंत सिंह को भी है, वो खामोश नहीं बैठेगा“ -डॉली बोली- ”और एक दूसरा तरीका भी है, हम उसे फोन पर सारी बातें बता देते हैं वो जरूर हमारी मदद करेगा।“

”मगर फोन....।“

”मेर पास है“ - कहकर उसने मोबाईल फोन मुझे पकड़ा दिया।

”शाबाश“ - कहकर मैंने जसवंत का नम्बर डायल करने के बारे में सोचा तो याद आया कि उसका नम्बर तो मेरे मोबाइल में था। फिर मैंने 100 नम्बर डॉयल कर पुलिस हैडक्वाटर से थाने का नम्बर लेना चाहा तो नेटवर्क चला गया। नेटवर्क तलाशता आखिर मैं सीढ़ियों पर पहुंचा वहां मोबाइल में नेटवर्क की दो लाइनें दिखाई दीं। मैंने फिर 100 नम्बर डॉयल किया मगर कॉल नहीं लगी। तब मैंने डाटा कनेक्शन ऑन किया और ‘‘गूगल देवता‘‘ से सीतापुर कोतवाली का नम्बर मांगा, तो उन्होंने भी जमकर ऐंठ दिखाते हुए पूरे दस मिनट बाद मुझे नम्बर दिया।

मैंने वो नम्बर डॉयल किया।

लाइन मिली। मगर जसवंत सिंह नहीं मिला, मैंने अपना नाम बताते हुए उससे बात करने की इच्छा जाहिर कि तो उधर से मुझे जसवंत का मोबाइल नम्बर बता दिया गया।

नम्बर मिलाकर मैं इंतजार करने लगा।

”हल्लो“ - उधर से आता जसवंत का रौबीला स्वर सुनाई दिया।

‘‘मैं हूं कृपानिधान‘‘

‘‘कहां हो भई?‘‘

‘‘हवेली में हूं, प्लीज यहां आकर हमें इस दुश्वारी से निजात दिलाओ।‘‘

‘‘हवेली में कहां?‘‘

जवाब में मैंने उसे तहखाने तक पहुंचने का रास्ता बता दिया।

‘‘वहां क्यों छिपे बैठे हो, फौरन सरेंडर कर दो। तुम नहीं जानते सीओ साहब तो इतने गुस्से में हैं कि तुम अगर उनके सामने पड़ गये तो गोली ही मार देंगे तुम्हे। वैसे भी पूरे जिले की पुलिस तुम्हारी तलाश में है। तुम बच नहीं सकते, तुम्हारे खिलाफ अपहरण और फिरौती का केस दर्ज हुआ है। श्याम सिंह की रिपोर्ट ने भयंकर मुसीबत में फंसा दिया है तुम्हे।‘‘

”ये सब उन्हीं का किया धरा है बंदापरवर, अब जल्दी से हमारी डूबती नइया को पार लगाइए, वरना हम सभी मझधार में ही डूब जायेंगे।“

‘‘और कौन है तुम्हारे साथ।‘‘

‘‘डॉली और जूही।‘‘

”हो तो तुम गोली मार देने के ही काबिल, लेकिन सवाल तुम्हारे अकेले का नहीं है, इसलिए मदद तो करनी ही पड़ेगी।“

”आपके बच्चे जियें हुजूर आपका इकबाल सालों-साल तक, बल्कि सदियों तक बुलंद रहे।“

”ठीक है-ठीक है, अब केस से रिलेटेड जो कुछ भी तुम जानते हो मुझे बताओ, ये भी कि सब किया धरा श्यामसिंह का कैसे है?“

”पहले आप हमें यहां से बाहर निकालिए।“

”उतर आये न सौदे बाजी पर।“

”जान की बाजी पर सौदा करने वाले अहमकों में से मैं नहीं हूँ इंस्पेक्टर साहब! बस डर है कातिल आप से पहले यहां न पहुंच जाय।“

‘‘खामखाह परेशान हो रहे हो, तुम्हारे जैसे बहादुर इंसान को यह शोभा नहीं देता। वैसे भी तुम और तुम्हारी सहेली तो जैसे आबेहयात में डुबकी लगाकर आये हो। जहां जाते हो लाशों का ढेर लग जाता है मगर तुम दोनों को खरोच तक नहीं आती।

‘‘घिस रहे हो भगवन?“

‘‘नहीं भई, सच कह रहा हूं। लगता है जिस दिन तुम दोनों की वजह से कोई लाश न गिरे उस दिन तुम्हें नींद नहीं आती होगी। अब देखो इत्तेफाकन कल तुम इस शुभ काम के लिए उपलब्ध नहीं थे तो वही काम तुम्हारी सहेली ने कर दिखाया। दो लाशें मढ़ दीं मेरे सिर, जिनमें से एक को लाश बनाया ही उसने था।‘‘

‘‘जनाब किस बात का बदला ले रहे हो, हमारी जान पर बनी है और आप थाने में बैठकर गप्पे हांक रहे.....।‘‘

बोलते-बोलते मैं एकदम से खामोश हो गया। एक जानी-पहचानी घरघराहट मुझे एकदम करीब महसूस हुई। यह तहखाने का दरवाजा खोले जाने की आवाज थी।
 
‘‘इंस्पेटर साहब, आप लेट हो गये।‘‘

‘‘मैं कभी लेट नहीं होता बरर्खुदार हमेशा सही समय पर सही जगह पहुंचता हूं।‘‘ अब तक दरवाजा खुलना शुरू हो चुका था, ‘‘घबराओ मत ये मैं ही हूं, बेहिचक सब लोग बाहर आ जाओ।‘‘

सुनकर मैं भौंचक्का रह गया। दरवाजा खुला, दरवाजे पर इंस्पेक्टर जसवंत सिंह पुलिस की वर्दी में खड़ा मुस्करा रहा था। पता चला वह उस वक्त हवेली ही आ रहा था जब मैंने उसे फोन किया था।

”चाचा जी के क्या हाल-चाल हैं।“

अब तक हम सभी बाहर आ चुके थे और दीवानखाने में जमा थे, नौकर जूही के कहने पर चाय बना लाया था।

”वो इस वक्त हवालात में हैं। रतनबाबू उनका सेक्रटरी था, वो सजायाफ्ता था। एक बार राहजनी और दो बार 307 के केस में जेल जा चुका था। करीब दो साल पहले वह श्यामसिंह की मुलाजमत में आया था। उसके बाद उसने कोई जुर्म नहीं किया था। मेरा मतलब है हालिया घटनाओं को छोड़कर। मूलतः वह आजमगढ़ का रहने वाला था, डबल एमए था। सालों पहले रोजी रोटी की तलाश में मुम्बई गया था तब वहीं का होकर रह गया। तुम पहले ही उससे मिल चुके हो।“

”कहां?“

”शम्मो के कोठे पर जो सूट-बूट वाला आदमी तुमने देखा था वो श्यामसिंह का सेक्रेटरी ही था। वह काफी दिनों से यहीं रंजीत सिंह के मकान में रह रहा था। रंजीत सिंह वो आदमी है जिसका नम्बर तुमने मुझे दिया था।“

‘‘ओह, बहरहाल ये रतन बाबू कहां मिलेंगे?‘‘

‘‘कहीं नहीं, कल उसने अपने एक साथी के साथ डॉली को अगवा करने की कोशिश की तो पाशा उल्टा पड़ गया। नौबत यहां तक आ गयी कि इन देवी जी ने उसे मुंह खोलने को मजबूर कर दिया मगर इससे पहले की वह कुछ काम की बात बता पाता उसके आका ने उसे गोली मार दी।‘‘

‘‘मुझे पूरी बात बताओ प्लीज, क्या हुआ था वहां?‘‘ जवाब में डॉली ने पूरी कहानी दोहरा दी।

‘‘तुम्हारा मतलब है वह असली अपराधी का नाम लेने जा रहा था तभी उसे सूट कर दिया।‘‘

‘‘एक्जेटली।‘‘ डॉली बोली।

”श्यामसिंह ने अपना जुर्म कबूल कर लिया।“

”अभी नहीं, अभी तो हमने उसे सिर्फ तुम लोगों को नजरबंद करने के लिए हिरासत में लिया है। क्या चार्ज लगाना है यह बाद में सोचेंगे। फिलहाल कुछ बातें हैं जिनका जवाब तुमसे मिलने की उम्मीद कर रहा हूं।“

‘‘पूछो सरकार।‘‘

‘‘प्रकाश का कत्ल किसने किया। श्यामसिंह का नाम मत लेना, हमने चेक करवाया है प्रकाश के कत्ल वाले दिन वो मुम्बई में था।...और मानसिंह की मौत वाले दिन वह हर वक्त पार्टी में मौजूद था। ऐसे में ना तो वो मानसिंह को छत से नीचे फेंक सकता था और ना ही प्रकाश का कत्ल कर सकता था।‘‘

‘‘नहीं कहूंगा इत्मिनान रखो! हकीकत तो ये है कि श्यामसिंह ने कोई कत्ल नहीं किया। डॉली को तहखाने में बंद करने की बात को अगर तुम नजरअंदाज कर दो तो पाओगे कि श्यामसिंह के खिलाफ तुम्हारे पास कोई केस ही नहीं है।

‘‘तो फिर प्रकाश का कातिल कौन है? मानसिंह का हत्यारा कौन है? और लाख रूपये का सवाल ये है कि इतना बवेला फैलाकर कातिल हासिल क्या करना चाहता था?‘‘

‘‘अच्छा सवाल है, इंवेस्टिगेशन ऑफिसर को सूट करता है।‘‘

‘‘अब जवाब भी दे डालो कोई सजता सा।‘‘

‘‘जवाब ये है कि मुझे नहीं मालूम।‘‘

‘‘क्या!‘‘

‘‘ठीक सुना मेरे पास तुम्हारे तीनों प्रश्नों में से किसी का जवाब नहीं है।‘‘

‘‘ओह माई गॉड, और कहां मैं सोच रहा था कि तुम कातिल के चेहरे से नकाब नोचने वाले हो।‘‘

‘‘वो भी करेगा ये बीर बालक, थोड़ा धैर्य रखिये।‘‘

‘‘कितना सौ-पचास साल?‘‘

‘‘नहीं बस कल तक बशर्ते की आप थोड़ा सहयोग करें।‘‘

‘‘और अभी तक जो मैं तुम्हारे साथ करता आ रहा हूं उसे क्या कहते हैं।‘‘

‘‘सॉरी मेरा मतलब थोड़े और सहयोग से है।‘‘

‘‘तुम मुझे बेवकूफ बनाने की कोशिश तो नहीं कर रहे।‘‘ वह संदिग्ध स्वर में बोला।

‘‘आप बन जायेंगे बेवकूफ।‘‘

‘‘हरगिज नहीं।‘‘

‘‘सो देयर।‘‘

‘‘ठीक है बोलो क्या चाहते हो।‘‘

मैंने बताया।

‘‘खामखाह का ड्रामा करने की क्या जरूरत है, तुम उसका नाम लो मैं अभी उसे गिरफ्तार करता हूं।‘‘

‘‘नहीं कर सकते, गिरफ्तार करना तो दूर तुम उसकी परछाईं भी नहीं छू सकते। उसके खिलाफ हमारे पास कुछ नहीं है, और सौ बात की एक बात ये कि अगर मैंने उसका नाम बता भी दिया तो तुम हरगिज भी यकीन नहीं करोगे।‘‘

‘‘फिर कैसे बात बनेगी?‘‘

‘‘एक ही तरीका है कि कातिल खुद साबित करे की वो कातिल है।‘‘

‘‘तुमने अपराधी का मोटिव अभी तक नहीं बताया।‘‘

‘‘वो अभी धुंधला-धुंधला सा है मेरे जहन में, उम्मीद है शाम से पहले तस्वीर साफ हो जायेगी।‘‘

‘‘ठीक है अभी चलता हूं मैं।‘‘

मैंने सहमति में सिर हिलाया और हवेली के गेट तक उसे छोड़ कर आया।

दोनों लड़कियां मुझे ही घूरती मिलीं।

‘‘क्या हुआ?‘‘

‘‘सच बताओ,‘‘ जूही बोली, ‘‘तुम चाचा जी को बचाने की कोशिश कर रहे हो या वे सचमुच अपराधी नहीं हैं।‘‘

‘‘मेरे ख्याल से कुछ बातों के लिए वो जिम्मेदार हैं, उन्हें असली अपराधी का छोटा सा सहयोगी समझ लो जिसने दौलत की लालच में उसका साथ देना कबूल किया।‘‘

‘‘फिर असली अपराधी कौन है।‘‘

‘‘शाम तक इंतजार करो।‘‘

मैं अपने कमरे की ओर बढ़ गया। फिर मैंने अपने पीडी भाई को कॉल लगाई। जवाब में उसने जो जानकारी दी सुनकर बांछें खिल गयीं। कॉल डिस्कनैक्ट कर मैंने सुशांत तिवारी को फोन किया आखिर उससे मेरा वादा था, एक एक्सक्लूजिव स्टोरी देने का।

‘‘कैसे हो गुरू?‘‘

‘‘टॉप ऑफ दी वर्ल्ड।‘‘ मैं बोला, ‘‘श्याम सिंह की गिरफ्तारी की खबर लगी?‘‘

‘‘हां लगी मगर पुलिस उसकी बाबत अपने मुंह पर ताला जड़े हुए है। अलबत्ता हम प्रेस वाले अपने-अपने ख्यालों के घोड़े दौड़ाकर कल के लिए कोई बढ़ियां सी सुर्खी तैयार करने में लगे हुए हैं, लेकिन तुम्हे तो सब पता होगा गुरू बताओ ना असल माजरा क्या है?‘‘

‘‘अपने कल के एडीशन में कम से कम हॉफ पेज बचाकर रखो।‘‘

‘‘अरे गुरू वो तो छपना शुरू भी हो गया होगा।‘‘

‘‘तो रोक दो, शाम तक तुम्हे ऐसी स्टोरी दूंगा कि ताजिंदगी मुझे याद करोगे। ठीक छह बजे लाल हवेली पहुंच जाना।‘‘

‘‘ठीक है गुरू मैं कॉल डिस्कनेक्ट करता हूं प्रेस रूकवानी होगी।‘‘

कहकर उसने कॉल डिस्कनैक्ट कर दी।
 
ठीक साढ़े छह बजे।

हवेली की टूटी हुई दीवार की तरफ दस-बारह लोगों के बैठने के लिए कुर्सियां रखवा दी गईं। एक-एक करके लोग आते जा रहे थे। साढ़े पांच बजे तक आठ लोग वहां आ चुके थे। ये सभी मानसिंह के कत्ल वाले दिन हवेली में चल रही पार्टी में उपस्थित बेहद सम्मानित लोग थे। सभी को श्यामसिंह की तरफ से यह कहकर बुलाया गया था, कि उसे मालूम है कि उसके भाई मानसिंह की हत्या की गई थी, और वह हत्यारे को पहचान गया था।

हत्यारा क्योंकि बहुत पॉवरफुल आदमी था इसलिए उसे डर था कि पुलिस उसपर हाथ नहीं डालेगी, उल्टा हत्यारा उसे भी मौत की नींद सुला सकता था। इसलिए वह समाज के गणमान्य लोगों के सामने अपने भाई मानसिंह और बेटे प्रकाश के कत्ल से पर्दा उठाना चाहता था। ताकि पुलिस हत्यारे को गिरफ्तार करने में कोई कोताही ना बरते।

बात क्योंकि मानसिंह के कत्ल से संबंधित थी इसलिए लोगों में उत्सुकता जागनी स्वभाविक थी। वहां बुलाये गये लोगों की हाजिरी शत-प्रतिशत थी। उन लोगों के बीच टूटी हुई दीवार की तरफ पीठ करके कुर्सी पर एक पुतला रखा गया था, जिसे श्यामसिंह का कोट-पैंट और हैट पहनाया गया था, बाकी सब लोग पुतले की ओर मुंह करके सामने की कतार में बैठे हुए थे। पुतले के सामने तीन-चार कुर्सियों की जगह खाली छोड़ दी गयी थी। वहां जो भी पहुंचा था उसकी निगाह पुतले पर पड़ी थी मगर किसी ने उसकी बाबत कोई प्रश्न नहीं किया था।

तभी इंस्पेक्टर जसवंत सिंह अपने मातहत सब-इंस्पेक्टर और एक हवलदार के साथ वहां पहुंचा और सीधा राज के बगल में जा खड़ा हुआ।

‘‘सीओ साहब ने कहा है कि वे डीएम साहब के साथ यहां पहुंच रहे हैं। उनके आने का इंतजार किया जाय, उसके बाद ही श्यामसिंह का बयान होगा, डीएम की मौजूदगी में! कुछ समझ में आ रहा है तुम्हारे? खामखाह तुम्हारी बात मानकर मैंने अपनी नौकरी खतरे में डाल ली है।‘‘

मैंने उसकी बात का जवाब नहीं दिया। पूरी खामोशी से एक सिगरेट सुलगा कर कस लगाने लगा।

‘‘अगर यहां वो सब घटित नहीं हुआ, जिसकी तुम उम्मीद कर रहे हो तो समझो तुमने मुझे बेरोजगार कर दिया?‘‘ - कोतवाल फुसफुसाता हुआ बोला - ‘‘ऊपर से यहां इतने बड़े-बड़े लोग मौजूद हैं उनके सामने मेरी जो छीछालीदर होगी सो अलग।‘‘

‘‘जनाब चंद मिनट और इंतजार कीजिए, और यहां के लोगों की चिंता मत कीजिए अगर सबकुछ मेरी उम्मीदों के मुताबिक नहीं भी हुआ तो कम से कम यहां मौजूद लोग आपको कुछ नहीं कहने वाले, इनका जो गुस्सा फूटेगा वो श्यामसिंह पर फूटेगा।‘‘

‘‘वो तो अभी से फूटता दिख रहा है। लोग बाग बार-बार पूछ रहे हैं कि उन्हें वहां बुलाकर श्यामसिंह कहां गायब हो गया।‘‘

‘‘पूछने दीजिए बस कुछ मिनट की ही तो बात है।‘‘

‘‘अभी वो श्याम सिंह के बारे में पूछ रहे हैं फिर पुतले के बारे में सवाल.....।‘‘

‘‘धांय।‘‘ उसकी बात अधूरी रह गयी। गोली सीधा पुतले के सिर के पिछले हिस्से से टकराई, पुतला उछलकर दूर जा गिरा।

टूटी हुई बाउंड्री के पार एक शेवरले बीट कार की हल्की सी झलक दिखाई दी। कोतवाल चीते की तरह छलांग लगाता हुआ उस पार पहुंचा, मैं उसके पीछे था। सब इंस्पेक्टर और हवलदार मेरे पीछे थे। जसवंत कूदकर जीप में जा बैठा, मगर आगे बढ़ते ही जीप लहराने लगी। उसके अगले दोनों पहिये कातिल बेकार कर चुका था।

ठीक तभी इम्पाला हमारी बगल में आकर रूकी। ड्राईविंग सीट पर डॉली सवार थी।

‘‘इंस्पेक्टर साहब जल्दी।‘‘

मेरी आवाज सुन वह हकबकाया सा कार में आ बैठा। डॉली एक्सीलेटर का पैडल दबाती चली गयी। सामने बीट तो हमें नहीं दिखाई दी अलबत्ता धूल का गुब्बार उठता जरूर नजर आ रहा था। डॉली दांत पर दांत जमाये कार की स्पीड बढ़ाए जा रही थी। वह खेत-खलिहानों के बीच से गुजरता रास्ता था जो सीधा लखनऊ हाइवे पर जा मिलता था। अचानक कार का एक पहिया किसी गड्ढे में पड़ा, कार बुरी तरह डगमगाई, एक पल तो हमें कार उलटती सी लगी मगर डॉली ने संभाल लिया।

‘‘स्पीड कम करो वरना हम सब मारे जायेंगे।‘‘ मैं चीख सा पड़ा। मगर डॉली ने जैसे मेरी बात सुनी ही नहीं। ना तो उसने स्पीड कम की और ना ड्राईविंग से अपना ध्यान भटकने दिया।

‘‘ये मोहतरमा कार लेकर अचानक कहां से आ टपकी?‘‘ जसवंत सिंह बोला।

‘‘ये हमारा बैकअप प्लान था, वरना तुम्हारी जीप की वजह से हम हाथ मल रहे होते।‘‘

‘‘अब मुझे क्या पता था कि इतने शार्ट टाइम में वो ऐसा भी कुछ कर सकता था।‘‘

‘‘तुम्हारी जीप बेकार करना उसके लिए बहुत जरूरी था।‘‘

‘‘नहीं, अगर पुलिस की जीप सही भी होती तो शायद हम उसकी कार का पीछा नहीं कर पाते। इतनी भयानक ड्राईविंग की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था।‘‘

तभी अगली कार दिखाई देनी शुरू हो गयी। मगर फासला बहुत ज्यादा था। एक बार अगर वो हाइवे पर पहुंच जाता तो उसे पकड़ना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर साबित होने वाला था।

जसवंत सिंह ने अपना मोबाइल निकाला और अगली कार के बारे में बताकर किसी को निर्देश देने लगा। करीब डेढ़ मिनट तक दोनों कारें यूंही दौड़ती रहीं।

फिर दोनों कारों के बीच का फासला घटना शुरू हुआ। थोड़ी देर बाद ज्योंही अगली कार रिवाल्वर की रेंज में आई, जसवंत सिंह ने पहिए का निशाना लेकर गोली चला दी। निशाना अचूक था, अगली कार के पिछले बायें पहिए के परखच्चे उड़ गये। कार ने बाईं तरफ को झोल खाया, ड्राइवर ने संभालने की कोशिशें तो बहुत की होंगी, मगर कार की स्पीड इतनी ज्यादा थी कि वह कार को पलटने से नहीं बचा सका। कार ने कई बार पलटा खाया और आखिरकार उलटी होकर गतिशून्य हो गयी।

डॉली ने उससे थोड़ी दूरी पर अपनी कार रोक दी।

‘‘कौन होगा भीतर।‘‘

‘‘गेस करो।‘‘

‘‘नहीं कर सकता, ये पहेलियां बूझने का टाइम नहीं है।‘‘

‘‘तू क्या कहती है?‘‘ मैं डॉली से बोला।

‘‘कोई शर्त लगाओ तो गेस करूं?‘‘

‘‘चल लगाई, तू जीती तो मैं तुझे किस दूंगा और अगर मैं जीता तो तू मुझे किस देगी।‘‘

‘‘शटअप।‘‘कहकर वो तनिक रूकी फिर बोली, ‘‘सीओ साहब के अलावा और कौन हो सकता है।‘‘

‘‘क्या बकवास कर रही हो।‘‘ जसवंत सिंह लगभग चीख सा पड़ा।

‘‘अरे तूने कैसे जाना?‘‘

‘‘क्या मतलब है भई, तुम दोनों वही कह रहे हो ना, जो मैं समझ रहा हूं।‘‘

‘‘जाकर खुद देख लीजिए जनाब।‘‘

वो सहमति में सिर हिलाता कार की ओर बढ़ गया।

‘‘अब बता कैसे जाना?‘‘

‘‘इट्स वैरी सिम्पल बॉस, हर अपराध किसी ऐसे व्यक्ति की तरफ इशारा कर रहा था जो बेहद ताकतवर था। दिलावर हो सकता था मगर वह तो पहले ही मारा जा चुका था। श्यामसिंह हो सकते थे, मगर फिर हवेली में आज यह ड्रामा नहीं होता। जसवंत सिंह हो सकते थे मगर वह तो तुम्हारे प्लान में शामिल थे। अब ले-देकर एक ही आइटम था जो हर जगह फिट किया जा सकता था, सीओ दी ग्रेट महानायक सिंह राजपूत।‘‘

मैं मंत्रमुग्ध सा डॉली की ओर देखता रह गया।

‘‘धन्य है वो मां जिसने तुझे जन्म दिया, तेरे पांव कहां हैं मैं उन्हे....।‘‘

‘‘अरे यहां नहीं‘‘ वो हड़बड़ाकर बोली, ‘‘हवेली चलकर जीभरकर चाट लेना।‘‘

‘‘क्या?‘‘

‘‘मेरे तलवे।‘‘

‘‘ठहर जा साली।‘‘

‘‘ओह तो अब मुझसे शादी का ख्वाब देखना बंद कर दिया।‘‘

‘‘ये किसने कहा।‘‘

‘‘अब साली कहा है तो जाहिर है मेरी बड़ी बहन से शादी करने का मन हो आया होगा।‘‘

‘‘तेरी बड़ी बहन भी है कोई।‘‘

‘‘हां जिसकी कार उधार मांगकर लाये हो।‘‘

अभी मैं कुछ और कहता कि तभी जसवंत सिंह मेरे पास आ खड़ा हुआ।

‘‘वही है, पर मेरी समझ में नहीं आ रहा कि....।‘‘

‘‘क्या बात है इंस्पेक्टर साहब अपने अफसर को कातिल मानने में मन लरज रहा है क्या?‘‘

उसने जवाब नहीं दिया, मोबाइल निकालकर व्यस्त हो गया।

मैं और डॉली उसे वहीं छोड़कर हवेली लौट आए। अब तक सभी लोग वहां से जा चुके थे। सुशांत तिवारी बेसब्री से चहलकदमी करता हुआ मेरा इंतजार कर रहा था।

‘‘अरे गुरू कहां रह गये थे।‘‘

‘‘तुम्हारा ही काम कर रहा था।‘‘

मैं उसे लेकर अपने कमरे में आ गया। सविस्तार उसे सारी कहानी सुना दी। सुनकर वो यूं भौचक्का हुआ, कि मैं बयान नहीं कर सकता। इस वक्त उसके चेहरे की चमक देखते बनती थी।

रात दस बजे बकायदा फोन पर इजाजत लेकर जसवंत सिंह वहां पहुंचा। तब तक हम दीवानखाने में ही मौजूद थे, और डिनर का इंतजार कर रहे थे। जसवंत सिंह के लिए भी थाली लगा दी गयी। सब ने खामोशी के साथ डिनर किया फिर कॉफी आ गयी।

‘‘शुरू हो जाओ भाई‘‘ काफी की चुस्कियां लेता जसवंत सिंह बोला, ‘‘अब और सस्पेंश मुझसे बर्दाश्त नहीं होता।‘‘

‘‘क्या जानना चाहते हो।‘‘

‘‘सबकुछ सिलसिलेवार ढंग से सुना डालो, जो बात मुझे मालूम हो वह भी कह डालो ताकि घटनाक्रम की टूटी हुई कड़ियां आपस में जोड़ी जा सकें।‘‘

मैंने उसकी उत्सुकता का आनंद लेते हुए पहले बेहद स्लो मोशन में एक सिगरेट सुलगाया फिर बोलना शुरू किया। इतनी मेहनत जो की थी मैंने, थोड़ा भाव खाना तो बनता था।

‘‘तो जनाबे हाजरीन पेश है राज भाई बकवास वाला की फेमस स्टाइल में लाल हवेली का खूनी वृतांत। वो वाकया जो कि सदियों में एक बार जन्म लेता है और लोगों के दिलों पर दहशत कि अमिट छाप छोड़ जाता है। रहस्य-रोमांच और एक्शन से भरपूर! मगर ध्यान रहे कहीं सांस लेना ना भूल जाएं आप।

”अब कुछ बकोगे भी या ड्रामा ही करते रहोगे।“

”बकूंगा जनाब आखिरकार बकने के लिए ही तो मैंने इस नाश्वर जगत में अवतार लिया है।“

तत्काल उसने कड़ी निगाहों से मुझे घूरा। पुलिसिया जो था, भला हेकड़ी दिखाने से कैसे बाज आ जाता। उसका यही एहसान क्या कम था जो उसने ये नहीं पूछ लिया कि - बाकी का किस्सा यहीं बयान करोगे या हवालात में।

बहरहाल मैंने बताना शुरू किया।
 
‘‘इस खूनी सिलसिले की शुरूआत हुई आज से करीब छह महीने पहले। जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ‘एएसआई‘ की एक टीम लखनऊ से सीतापुर पहुंची। उनका काम था यहां की प्राचीन इमारतों मंदिरों इत्यादि का सर्वे करके उनकी मौजूदा हालत की रिपोर्ट तैयार कर दाखिल दफ्तर करना। उनमें से अगर किसी की हालत ज्यादा खस्ता होती तो विभाग उन प्राचीन-ऐतिहासिक धरोहरों की मरम्मत कराता। उन्हें नष्ट होने से बचाता।‘‘

‘‘उस टीम में से दो लोग जिनके नाम प्रशांत और ब्रजभूषण थे, अपने काम को अंजाम देते हुए लाल हवेली तक जा पहुंचे। पता नहीं हवेली का मुख्य द्वार बंद था या किसी ने दस्तक देने के बावजूद दरवाजा नहीं खोला, असली बात मैं नहीं जानता। मगर नतीजा ये हुआ कि वे लोग हवेली में दाखिल नहीं हो पाये।‘‘

‘‘तब वे लोग यूंही टहलते हुए बाहर से ही हवेली का मुआयना करने लगे। वहां जाने किस बात ने उनके भीतर उत्सुकता जगाई कि उन दोनों ने हवेली और आस-पास के इलाके को मैटल डिटेक्टर से खंगालने का फैसला किया और कैम्प में वापस लौट गये।‘‘

‘‘अगले रोज वे लोग मैटल डिटेक्टर के साथ वहां पहुंचे। जब उन दोनों ने हवेली के आस-पास की जमीन को खंगालना शुरू किया तो जल्दी ही उन्हें वहां बहुत सारे ‘गैर-चुम्बकीय‘ तत्वों के होने का आभास मिला। जो कि सोना, तांबा, एलिम्यूनिम कुछ भी हो सकता था। उन्होंने जब और जांच की तो उन्हें यकीन हो आया कि वह सारा मैटल-भंडार हवेली के नीचे दफ्न था।‘‘

‘‘इत्तेफाक से उसी वक्त महानायक सिंह उधर से गुजरा और उन्हें संदिग्ध हालत में देखकर पूछताछ की तो उन्होंने सारी बात उसे बता दी। सुनकर उसके कान खड़े हो गये। उसने किसी तरह दोनों को अपने झांसे में लिया और इस बारे में और अधिक जानकारी हासिल करने को कहा। जवाब में दोनों ने हवेली का चार सौ साल पुराना इतिहास खंगालना शुरू किया तो पता चला कि राजा नरसिंह सिंह राजपूत के शासनकाल में इस महल का निर्माण कराया गया था। उनके वंशज यहां से करीब पैंसठ मील दूर उत्तर-पश्चिम में जिसे अब हरदोई के नाम से जाना जाता है, अपने पुश्तैनी महल में रहा करते थे।

चार सौ साल पूर्व जब इस महल के निर्माण के बाद राजा नरसिंह सिंह राजपूत सपरिवार यहां रहने आए तो उनके पास सोने-चांदी व हीरे-जवाहरात के रूप में बहुत बड़ा खजाना था। एक ऐसा खजाना जिसका कोई भी जिक्र आगामी वर्षों में कभी भी सुनने को नहीं मिला था। लिहाजा दोनों कूदकर इस नतीजे पर पहुंच गये कि हो ना हो वही खजाना इस हवेली के गर्भ में कहीं गहरा दफ्न था। उन दोनों ने महानायक सिंह को भी यह यकीन दिला दिया कि हवेली के नीचे बहुत बड़ा खजाना दफ्न था। दोनों नहीं जानते थे कि ऐसा कहकर वो अपना डैथ वारेंट खुद साइन कर रहे थे।‘‘

‘‘अगले ही रोज दोनों की गोलियों से बिंधीं लाशें बरामद हो गयीं। पुलिस-पब्लिक-मीडिया सब हैरान थे। भला बाहर से आये उन लोगों की यहां किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी। घटनास्थल से लूटपाट का भी कोई संकेत पुलिस को नहीं मिला था। हत्यारे को तलाश कर पाना तो दूर, आप का डिपार्टमेंट उनकी हत्याओं का मोटिव तक नहीं तलाश पाया था! कहिए की मैं गलत कह रहा हूं।‘‘

‘‘नहीं तुम्हारी बात एकदम दुरूस्त है‘‘ कोतवाल बोला, ‘‘ये बताओ उन दोनों का कत्ल साहब ने खुद किया था या किसी से करवाया था।‘‘

‘‘इस बाबत मेरा अंदाजा ये कहता है कि यह काम महानायक सिंह ने खुद किया होगा। यह कोई ऐसा काम नहीं था जिसके लिए वह किसी और पर भरोसा करता। फिर अभी तक तो दिलावर से उसका गठबंधन भी नहीं हुआ था। वरना हम इसे दिलावर का किया धरा समझ सकते थे।‘‘

‘‘ठीक है आगे बढ़ो।‘‘

‘‘अब खजाने पर कब्जा जमाने के लिए यह बहुत जरूरी था कि लाल हवेली पूरी तरह उसके अधिकार में हो। वह जानता था कि अगर उसने सीधे-सीधे लाल हवेली खरीदने की कोशिश की तो उसका छुपे रह पाना मुश्किल हो जायेगा। जो सुनेगा वही हैरान रह जायेगा कि भला पुलिस के एक उच्चाधिकारी को इस पुरानी जर्जर हवेली में क्या दिलचस्पी हो आई। लिहाजा उसने दिलावर सिंह से सांठ-गांठ की, मगर मुझे यकीन है कि खजाने वाली बात उसने दिलावर को भी नहीं बताई होगी।‘‘

‘‘उसने दिलावर को ये कहानी सुनाई की भारत सरकार लाल हवेली वाले इलाके में अपना शूगर मिल लगाना चाहती है। अगर हवेली और उसके आस-पास की जमीनें खरीद ली जायं तो करोड़ों का मुनाफा कमाया जा सकता था।‘‘

‘‘उसकी बात मानने में दिलावर को दोतरफा फायदा दिखाई दिया। पहला ये कि उसे मोटा माल कमाने का मौका मिल रहा था और दूसरा ये कि उसकी सांठ-गांठ एक पुलिस अधिकारी से होने जा रही थी जो भविष्य में उसके बहुत काम आ सकता था। लिहाजा उसने झट हामी भर दी होगी।‘‘

‘‘मगर तुम्हारा अफसर इतने से संतुष्ट नहीं था। उसे अंदाजा था कि मानसिंह से हवेली खरीदना कोई आसान काम साबित नहीं होने वाला था। लिहाजा उसने दिलावर को श्यामसिंह से मिलने मुम्बई भेजा। दिलावर ने श्याम सिंह को लाल हवेली का सौदा कराने को कहा होगा और बदले में कोई बहुत मोटी रकम ऑफर की होगी। आम हालात में श्याम सिंह उसकी बात मानने से इंकार कर सकते थे। मगर उन दिनों हालात आम कहां थे। उनका बिजनेस चौपट हो चुका था, किसी बड़े कर्जे में भी घिरे रहे हों तो कोई बड़ी बात नहीं है। खुद को फाइनेंशियल क्राइसिस से उबारने के लिए उन्हें बहुत सारे रूपयों की जरूरत थी। ये जरूरत उन्हें दिलावर के जरिए पूरी होती दिखाई दी। नतीजा ये हुआ कि उन्होंने दिलावर को हामी भर दी।‘‘

‘‘इसके बाद सबसे पहले श्याम सिंह और उनके सेक्रेटरी रतन शेखावत के जरिये ‘सिगमा एण्ड ब्रदर्स‘ नाम की एक कंपनी का रजिस्ट्रेशन करवाया गया और हवेली के आस-पास की काफी सारी जमीनें खरीद ली गयीं।‘‘

‘‘मगर हवेली के आस-पास की जमीनों का उनको क्या करना था?‘‘

‘‘कुछ नहीं मगर शूगर मिल वाली बात को साबित करने के लिए ऐसा करना जरूरी था।‘‘

‘‘और इस काम में पैसा किसने लगाया?‘‘

‘‘कुछ तुम्हारे अफसर ने और बाकी दिलावर सिंह ने लगाया होगा।‘‘

‘‘वो तैयार हो गया होगा इतनी बड़ी इंवेस्टमेंट के लिए?‘‘

‘‘‘हो ही गया होगा, तभी तो कहानी आगे बढ़ी। क्योंकि तुम्हारे अफसर ने चाहे पुलिस की नौकरी में कितना भी माल क्यों ना कमाया हो, इतनी बड़ी इंवेस्टमेंट उसके बूते की बात नहीं थी। फिर दिलावर को इसमें कोई नुकसान नजर नहीं आया होगा। वह जानता था कि जमीनें वापस बेचकर अपनी मूल रकम तो वसूल कर ही सकता था।‘‘

‘‘पैसा जब इन दोनों ने लगाया तो ‘सिगमा‘ का मालिक किसी और को क्यों बनाया?‘‘

‘‘जाहिर है महानायक सिंह राजपूत जो खेल खेल रहा था उसमें वह सात पर्दों के पीछे छिपा रहना चाहता था। ताकि अगर कोई इस मामले की छानबीन पर उतर भी आए तो श्याम सिंह और उनके सेक्रेटरी से आगे ना पहुंच सके।‘‘

‘‘और मान लो दोनों दगाबाजी पर उतर आते तो।‘‘

‘‘आप भूल रहे हैं जनाब कि ये काम उन्होंने दिलावर के कहने पर किया था जिससे बाहर जाने की वे सोच भी नहीं सकते थे। फिर हो सकता है - ऐसा ना हो - इसके लिए कोई और इंतजाम भी किया गया हो।‘‘

‘‘ऐसा ही रहा होगा! आगे बढ़ो।‘‘

‘‘इतना सबकुछ निपट गया तो, श्यामसिंह को कहा गया कि वो अपने भाई को हवेली बेचने के लिए तैयार करें। मगर यहां आकर सबकुछ गड़बड़ हो गया। श्यामसिंह ने बहुतेरी कोशिशें कीं, मगर मानसिंह ने अपने भाई की एक ना सुनी और हवेली बेचने से साफ इंकार कर दिया।‘‘

‘‘तब दिलावर और महानायक सिंह ने मिलकर एक योजना बनाई, जिसके जरिए मानसिंह को ब्लैकमेल करके हवेली बेचने के लिए मजबूर किया जा सकता था। मगर अपनी योजना को अमली जामा पहनाने के लिए उन्हें एक अंदर के आदमी की जरूरत थी। उन्होंने इस बारे में श्यामसिंह से बात की तो उन्होंने प्रकाश को यहां भेज दिया।‘‘

‘‘दिलावर ने प्रकाश को अपनी सारी योजना बताई तो वह उसके इशारे पर नाचने को तैयार हो गया। अब इस योजना को अमली जामा पहनाने के लिए जरूरत थी एक लड़की की। जिसे कोई ना जानता हो जो अचानक गायब हो जाय तो किसी की कान पर जूं तक ना रेंगनी वाली हो। उनकी ये मुश्किल प्रकाश ने यह कहकर आसान कर दी कि वह मुम्बई से अपनी गर्ल फ्रेंड रोजी को बुलाकर इस काम के लिए तैयार कर लेगा।‘‘

‘‘इसके बाद रोजी को मुम्बई से दिल्ली बुलाया गया और उसे एक किराये के कमरे में शिफ्ट कर दिया गया। योजना का अगला पड़ाव, मानसिंह को किसी भी तरह इतना बीमार कर देना था, जिससे वे अस्पताल में भर्ती कराये जा सकें। मेरा अपना अंदाजा है उन्हें खाने में या विस्की में मिलाकर कोई ऐसी चीज दे दी गयी, जिसके हलक से नीचे जाते ही वे तड़पने लगे। उन्हें अस्पताल ले जाया गया। जहां डॉक्टर को किसी तरह बहला-फुसला कर या रिश्वत देकर इस बात के लिए तैयार किया गया कि वह पूछने पर कहे कि अभी मानसिंह की हालत नाजुक थी उनको दस-पंद्रह दिनों तक अस्पताल में ही रहना पड़ेगा। जैसे भी सही मगर उन्होंने डॉक्टर को तैयार कर लिया।‘‘

‘‘डाक्टर कौन था?‘‘

‘‘रतन यादव सर्वोदय नर्सिंग होम वाला‘‘ जवाब जूही ने दिया, ‘‘उसी ने पापा से आकर कहा था कि उनकी हालत बेहद खराब थी। उन्हें दस-पंद्रह रोज अस्पताल में ही बिताने होंगे।‘‘

‘‘बहरहाल मानसिंह वहां रूकने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने उसी वक्त हवेली जाने की जिद पकड़ ली। प्रकाश ने उन्हें समझाने का बहुत ड्रामा किया मगर वे नहीं माने। तब प्रकाश ने उनकी तीमारदारी के लिए हवेली में एक नर्स रखने की शर्त सामने रख दी जिसके लिए थोडी़ ना-नुकर के बाद मानसिंह ने हामी भर दी।‘‘

‘‘इसके बाद उसने रोजी को नर्स बताकर हवेली में स्थापित कर दिया।‘‘

‘‘हे भगवान!‘‘ जूही के मुंह से सिसकारी सी निकली, ‘‘इतना बड़ा विश्वासघात, इतना बड़ा धोखा।‘‘

‘‘रोजी हवेली में आ गई फिर क्या हुआ?‘‘ जसवंत सिंह ने पूछा।

जवाब में मैंने जूही की ओर देखा तो उसने रोजी के कत्ल और उसकी लाश प्रकाश द्वारा ठिकाने लगाने की सारी नौटंकी बयान कर दी। सुनकर कोतवाल यूं हैरान हुआ जैसे हमारे सिर पर अचानक सींग निकल आये हों।

‘‘जिस वक्त यह ड्रामा चल रहा था, उस वक्त आस-पास कहीं छिपा बैठा राकेश कैमरे से फोटो ले रहा था। अब उनके पास तस्वीरों की सूरत में मानसिंह को ब्लैकमेल करने की वजह मिल गयी थी। मगर अफसोस की उनका आखिरी हथियार भी कारगर साबित नहीं हुआ।‘‘

इस बार बच्चू सिंह को हवेली का सौदा करने के लिए मानसिंह के पास भेजा गया। उसने मानसिंह के सामने हवेली खरीदने की ख्वाहिश जताई, तो जैसा कि उसे पूरी उम्मीद थी मानसिंह ने साफ मना कर दिया। उसने दाम बढ़ाया हवेली की तीनगुनी कीमत तक देने को तैयार हो गया मगर मानसिंह ने हवेली नहीं बेचनी थी तो बस नहीं बेचनी थी। तब उसने उन तस्वीरों को हथियार की तरह मानसिंह के सामने लहराया। मगर उसका ये वार भी खाली गया। बुजुर्गवार बड़े ही सख्त जान निकले, उन्होंने बच्चू को किसी भी कीमत पर हवेली बेचने से मना कर दिया। बेटी को जेल भिजवा देने की धमकी का भी उनपर कोई असर नहीं हुआ।‘‘

‘‘कहने का आशय ये है कि साम-दाम-दंड-भेद में से ‘दंड‘ को छोड़कर सारे पैंतरे उनपर आजमाये जा चुके थे। मगर नतीजा सिफर रहा। महानायक सिंह को अपना सपनों का महल धराशाही होता दिखाई दिया। मगर था तो आखिर वो पुलिसिया, इतनी जल्दी हार कैसे मान लेता।‘‘

तत्काल जसवंत सिंह ने खा जाने वाली निगाहों से मुझे देखा।

‘‘माफ कीजिए जनाब! जुबान फिसल गयी थी। हां तो मैं कह रहा था कि महानायक सिंह हार मानने को तैयार नहीं था। अब उसने ‘दंड‘ वाला आखिरी रास्ता चुना। समस्या को जड़ से ही उखाड़ फेंकने का मन बना लिया। जल्दी ही उसने एक ऐसा प्लान तैयार कर लिया, जिससे मानसिंह की मौत को दुर्घटना का जामा पहनाया जा सके। उसे लगभग यकीन था कि पिता के बाद बेटी से हवेली का सौदा करना आसान काम साबित होना था।‘‘

‘‘एक बार मानसिंह के कत्ल का फैसला करने के बाद अब उसे इंतजार था सही मौके का। और वो मौका उसे तब दिखाई दिया, जब उसे पता चला की उन्नीस जुलाई को हवेली में पार्टी थी, जिसमें नगर के सभी सम्मानित लोगों को आमंत्रित किया गया था। महानायक ने उसी रात को मानसिंह का कत्ल करने का फैसला किया। अपनी योजना को अमली जामा पहनाते हुए उसने एक ट्रक ड्राइवर से सांठ-गांठ की और उसे एक लाख रूपयों के बदले हवेली के बाएं विंग की बाउंड्री वॉल तोड़ने को तैयार कर लिया।‘‘

‘‘उधर का ही क्यों?‘‘

‘‘क्योंकि इकलौती वही जगह थी जहां की बाउंड्री और भीतर इमारत के बीच महज दस फीट का फासला था। ऊपर से उधर की दीवार एकदम जर्जर हालत में थी, बहुत सारे पत्थर पहले से ही उखड़े पड़े थे। उसे यकीन था कि वो दीवार ट्रक का झटका नहीं झेल पायेगी। दूसरी अहम बात ये थी कि उधर से पहली मंजिल की बॉलकनी तक पहुंचना और वहां से सीढ़ियों के रास्ते छत तक पहुंच जाना बहुत ही आसान काम साबित होना था।‘‘

‘‘मान लो फिर भी दीवार नहीं टूटती तो वह क्या करता?‘‘

‘‘बेशक तब प्रकाश की मदद लेना उसकी मजबूरी होती। या वह कोई और चाल चलता। कहने का आशय ये है कि मानसिंह के मौत का दिन मुकर्रर हो चुका था।‘‘

‘‘उसे बुजुर्गवार की रोज रात आठ बजे छत पर टहलने वाली आदत के बारे में भी प्रकाश ने ही बताया होगा।‘‘

‘‘और कौन बताता।‘‘

‘‘ओके आगे बढ़ो‘‘ कहकर वो चुप हो गया।

‘‘बहरहाल जो भी हुआ उसका नतीजा सामने आया और बुजुर्गवार की जान चली गयी। पुलिस और पब्लिक दोनों ने उनकी मौत को दुर्घटना ही माना जैसा कि महानायक सिंह चाहता था।‘‘

‘‘मानसिंह की मौत के करीब दस दिन बाद बच्चू सिंह फिर हवेली आया। उसने वो सारे पैंतरे जूही पर आजमाये जो पहले ही मानसिंह पर आजमाकर नाकामी का मुंह देख चुका था। दाल उसकी इस बार भी नहीं गली। जूही पर उसकी किसी भी धमकी का असर नहीं हुआ। उसने भी पिता की तरह दो टूक कह दिया कि वह किसी भी कीमत पर हवेली नहीं बेचेगी।‘‘

‘‘खलीफा लोग हैरान थे, परेशान थे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि हवेली का मालिकाना हक कैसे हांसिल किया जाय। उनके लिए जूही को जहन्नुम का रास्ता दिखाना आसान था। मगर महानायक सिंह को यह डर रहा होगा कि अगर बाप के पीछे-पीछे बेटी के साथ भी कोई हादसा प्लान किया गया तो मीडिया में यह बात चर्चा का विषय बन जानी थी। ऐसे में केस कोतवाली से लेकर सीबीआई को सौंपा जा सकता था। नतीजा ये होता कि उनका छिपे रह पाना मुश्किल हो जाता।‘‘

‘‘इस बार उन्होंने एक नई एकदम हैरान कर देने वाली योजना बनाई। इस योजना में उन्होंने इस बात को खूब कैश किया कि जूही दुनिया जहान की बातों से एकदम कोरी थी। अलौकिक शक्तियों में विश्वास रखने वाली, भूत प्रेतों से डरने वाली, सीधी-सादी मासूम सी लड़की थी।‘‘

कहकर मैंने उसे नर-कंकालों से लेकर, रोजी की लाश दिखाई देने तक की सारी कहानी कह सुनाई। उसे उस प्रोजेक्टर के बारे में भी बताया जिसपर चलती फिल्म से एक बार तो मैं भी धोखा खाकर दो गोलियां तक चला बैठा था।

वो मुंह बाये सुनता रहा।

‘‘उनकी योजना में विघ्न तब आया जब जूही ने डॉली को यहां रहने के लिए बुला लिया। आते ही इसने जूही को काफी हद तक संभाल लिया और जल्दी ही ये बात इसकी समझ में आ गई, कि जूही के खिलाफ हवेली में कोई बड़ा खेल खेला जा रहा था। लिहाजा इसने फोन करके मुझे भी यहां बुला लिया। यह बात किसी तरह प्रकाश को पता चल गयी जो कि उसने आगे दिलावर को ट्रांसफर कर दी।‘‘

उस रात जब मैं सीतापुर पहुंचा तो वहां राकेश अपने कुछ साथियों के साथ पहले से ही बाईपास पर मेरा इंतजार कर रहा था। उसने मुझपर गोलियां चलाकर मुझे डराने की कोशिश की थी। अलबत्ता उसकी इस कोशिश में मेरे द्वारा चलाई गई एक गोली उसकी टांग में जा घुसी थी। जिसके बाद वे लोग वहां से भाग खड़े हुए थे। फिर आप वहां पहुंच गये आगे क्या हुआ आपको मालूम ही है।‘‘

‘‘मगर राकेश को कैसे पता था कि तुम किस वक्त वहां पहुंचोगे।‘‘

‘‘मेरे ख्याल से नहीं पता था। मगर वहां उनकी मौजूदगी बेसबब नहीं हो सकती थी।‘‘

‘‘पता हो सकता था।‘‘ जूही बोली, ‘‘क्योंकि मैंने प्रकाश को तुम्हारे बारे में बताते हुए कहा था कि तुम नौ दस बजे तक यहां पहुंचोगे इसलिए वह सदर दरवाजा खोलने के लिए तुम्हारे आने तक जगा रहे। उसने आगे ये बात राकेश को बता दी होगी।‘‘

‘‘ठीक है पर अगर ये बाइपास पर नहीं रूकता तो वो क्या कर लेते।‘‘

‘‘मेरे ख्याल से उनकी निगाह शहर में दाखिल हो रही हर ऐसी कार पर रही होगी, जो दिल्ली नम्बर की हो। अब ऐसी सौ-पचास कारें तो नहीं आई होंगी उस रोज।‘‘

‘‘हो सकता है एक भी ना आई हो।‘‘

‘‘एक्जेटली! रही सही कसर इस बात ने पूरी कर दी कि मैंने वहां एक वाइन शॉप वाले से लाल हवेली का पता पूछ लिया। तब कुछ लोग वहीं पास में बैठे हुए थे, जिनपर ध्यान देने की उस वक्त कोई वजह नहीं थी। तब मैंने यही सोचा कि वे आस-पास के दुकानदार हैं जो बैठकर गप्पे हांक रहे थे। मगर अब लगता है वही राकेश एंड पार्टी थी।‘‘

‘‘तुम्हें महानायक सिंह पर शक कैसे हुआ?‘‘

‘‘जनाब माफी चाहता हूं, ये कहते हुए मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि मुझे महानायक सिंह पर जरा भी शक नहीं था। शक तो मुझे आप पर था। जितना ज्यादा मैं आपके बारे में सोचता, उतना ही मेरा यह विचार पुख्ता होता चला जाता कि सब किया धरा आप का ही है।‘‘

‘‘तौबा! मुझे कभी एहसास तक नहीं होने दिया कि तुम मुझपर शक कर रहे हो।...... अच्छा ये बताओ जूही पर हमला किसने किया था।‘‘

‘‘इसे लेकर मैं थोड़ा कंफ्यूज हूं जनाब। वो हमला हवेली के दाहिने हिस्से से करीब सौ मीटर की दूरी पर मौजूद एक नीम के पेड़ पर बैठकर टेलीस्कोप वाली राइफल से किया गया था। वो काम अगर महानायक सिंह का नहीं था तो दिलावर के दोनों शूटर्स जमील या सलाउद्दीन में से किसी एक का हो सकता है। कोई बड़ी बात नहीं कि उस वक्त दूसरा कार के भीतर बैठा रहा हो। अलबत्ता एक बात तय है कि जिसने छत पर जूही को गोली मारी थी उसी ने प्रकाश का कत्ल किया था।‘‘

‘‘तुम्हारा ज्यादा ऐतबार किस पर है।‘‘

‘‘सीओ साहब पर।‘‘

‘‘ठीक अंदाजा लगाया तुमने! मरने से पहले उन्होंने मानसिंह और प्रकाश की हत्या तथा जूही को गोली मारने की बात स्वीकार की थी।‘‘

‘‘और क्या बताया?‘‘

‘‘कुछ नहीं, इतना बोलकर ही दम तोड़ दिया था।‘‘

‘‘ओह!‘‘

‘‘मगर एक बात समझ में नहीं आई। प्रकाश तो उनके पाले में था...।‘‘

‘‘था मगर अब वो उनके पाले से निकलने का मन बना चुका था।‘‘

कहते हुए मैंने वो स्टॉम्प पेपर उसके सामने रख दिया। जिसके जरिए खलीफा लोग उस हवेली का मालिक बनने का सपना देख रहे थे। साथ ही उससे संबंधित कहानी सुना दी जो मुझे रोजी से सुनने को मिली थी।

‘‘तुमने अभी भी नहीं बताया कि तुम्हें सीओ साहब पर शक कब हुआ?‘‘

‘‘कल! जब आपने हम तीनों को तहखाने से आजाद कराया था। अगर आप अपराधी होते तो आपके लिए ऐसा करना बिल्कुल जरूरी नहीं था। आप हमें वहीं फंसे रहने देते। बड़ी हद दस दिनों में हम भूख प्यास से वैसे ही दम तोड़ देते।‘‘

‘‘वहां से बाहर निकलते ही मेरे दिमाग में पहला सवाल यही कौंधा कि अगर आप नहीं तो कौन है? जो आपकी जगह पूरी तरह कातिल की तस्वीर में फिट बैठता है। तब मेरे दिमाग में एक ही नाम कौंधा-सीओ महानायक सिंह राजपूत।‘‘

‘‘जरा याद कीजिए आपका अफसर किस कदर भागा-भागा फिर रहा था। आपने कहा भी था कि-‘आजकल सीओ साहब बहुत सारा फील्ड वर्क खुद भी कर लेते हैं, सारा काम मुझपर ही नहीं थोप देते‘- मेरा सवाल है क्यों? सीओ साहब को क्या पड़ी थी कि वे हर तरफ भागे-भागे फिरते। कोतवाली इंचार्ज से भी पहले मौकायेवारदात पर पहुंच जाएं और फिर कैसे पहुंच जाते थे उन्हें क्या कोई सपना आना था?‘‘

उसने सहमति में सिर हिलाया।

‘‘मुझे तो उसी वक्त समझ जाना चाहिए था जब दिलावर के दोनों शूटर्स की मौत के वक्त वो जैसे आसमान से वहां टपक पड़ा था। वो मुझे रिवाल्वर से टकोहता हुआ कमरे के अंदर चलने को मजबूर कर रहा था। वो तो ऐन मौके पर एक पत्रकार ने वहां पहुंचकर उसका खेल बिगाड़ दिया वरना यकीनन उस रोज वो मेरा कत्ल करने की फिराक में था।‘‘

‘‘अब खजाने वाले हौव्वे का क्या करोगे तुम लोग?‘‘

‘‘इस बारे में तो आपको ही जूही की मदद करनी होगी। अगर ऐसा कोई खजाना सचमुच है तो वो सरकार को सौंप देना ही बेहतर होगा।‘‘

सहमति में सिर हिलाता वो उठकर खड़ा हो गया।

‘‘दिल्ली पहुंचकर अपना हाल-चाल देते रहना। मैंने तुम्हें ठीक पहचाना था। तुम सचमुच काबिल नौजवान हो, उससे भी कहीं ज्यादा जितना मैंने सोचा था।‘‘

वो बाहर निकल गया।

अगले रोज।

मैं दिल्ली वापस लौटना चाहता था। डॉली भी अब इस नामुराद शहर में और नहीं रूकना चाहती थी। मगर जूही के जिद के आगे झुकना पड़ा। हम हफ्ता भर और वहां रूक गये। वो सात दिन हमने सैर-सपाटे में व्यतीत किये। जूही ने उन सात दिनों को यादगार बनाने में कोई कसर रख नहीं छोड़ी थी। आठवें दिन जब हम दिल्ली के लिए रवाना हुए थे तो वह किसी मासूम बच्चे की तरह बिलख-बिलख कर रो रही थी।

इस वक्त हम इम्पाला में सवार थे। कार डॉली चला रही थी। मैं उसके पहलू में बैठा खामोशी से सिगरेट के कश ले रहा था।

”राज“ - वो सामने सड़क पर निगाहें जमाये हुए बोली - ”लगता है कोई अपना बिछड़ गया हो, नहीं?

”सो तो है।“

”तुम्हे तो उसकी ज्यादा याद आ रही होगी।“

”हाँ, बहुत ज्यादा।“

”क्यों?“ - वो बदले स्वर में बोली - ”वो क्या तुम्हारी कोई सगे वाली थी?“

”हे भगवान“ - मैंने आह भरी - ”सच ही कहा है, ”त्रिया चरित्रं पुरुषोस्य भाग्यं दैवो न जानयति कुतो मनुष्य?‘‘

”क्या कहा?“

”कुछ नहीं गाड़ी चला, खामखाह एक्सीडेंट कर बैठेगी।“

☺!! समाप्त !!☺
 
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