• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

लाल हवेली

"सिर्फ दोस्त?"

"नेई बाप...अपुन उसका वास्ते बहुत कुछ किया इस वास्ते वो अपुन का अहसान मानता...क्या!"

"यानी भरोसा किया जा सकता है?"

"हां।"

उसके बाद उनकी वार्ता का क्रम टूट गया।

राज आखों पर दूरबीन लगाए सामने की ओर देखता रहा। समुद्र में दस किलोमीटर से भी अधिक दूरी तय की जा चुकी थी।

अभी तक पाल द्वारा बताए गए टापू का कोई पता नहीं था।

"जय..." थोड़ी देर बाद राज चिंतित स्वर में बोला-"पाल कहा है?"

"केबिन में नोटाक लगाएला है।"

"बुला उसे फौरन।"

जय तुरन्त जाकर पाल को बुला लाया। पाल खांसे निपोरता हुआ राज के सम्मुख पहुंचा। बोतल उसके हाथ में थी।

"तू उन लोगों में से है जो फ्री की फिनायल भी नहीं छोड़ते। बेसब्रे...चार-छ: बोतलें साथ घर ले जाना...अब इधर पीना छोड़ और टापू का पता लगा।" राज ने उसे हिकारत की नजरों से देखते हुए पूछा।

"-हैं-हे....सेठ टापू अभी आन वाला है। मैंने बराबर डायरेक्शन दिया हुआ है। कैप्टन सही लाइन पर स्टीमर लेकर जा रहा है। थोड़ा टाइम और लगेगा।" पाल बोतल से चूंट भरता हुआ बोला।

"दस किलोमीटर कब के पार हो चुके।"

"अब अंदाज है सेठ...दस के बीस किलोमीटर भी हो सकते हैं। फिकर छोड़ दो...लाओ दूरबीन...मैं अभी देखता हूं।"

अनमने भाव से राज ने दूरबीन उसके हवाले कर दी।

नशे की हालत में वह दूरबीन से उस दिशा में देखने लगा जिस दिशा में स्टीमर बढ़ रहा था। राज ने उसकी और से ध्यान हटाकर तेज हवाओं के बीच मुश्किल से ही सही लेकिन आखिरकार सिगरेट सुलगा ही ली। वह चिन्तित अवस्था में सिगरेट के कश लगाने लगा।

लगभग बीस मिनट बाद।

तब जबकि हल्की-हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गई थी, एकाएक ही दूरबीन आखों से हटाकर पाल जोशीले अंदाज में राज की ओर पलटा।

"लाल हवेली सेठ...आ गई लाल हवेली। ये लो दूरबीन...और देखो उस दिशा में।"

राज ने जल्दी से उसके हाथ से दूरबीन लेकर आखों से लगा ली।

.

.

दिशा में छोटा-सा जंजीर नेजर आने लगा।

"यही है लाल हवेली...?" उसने आतुरता से पूछा।

"हां सेठ...इसी टापू में है वह किला जिसे लाल हवेली कहते हैं। इसके आसपास कोई बोट नजर नहीं आ सकतीं।" पाल ने दो बूंट लगाने के बाद कहा।

"ऐसा क्यों...?"

"ऐसा इसलिए कि यहां के अंजाने खतरे से हर कोई घबराता है।। कई तो जिद्दी लोगों की बोटों तक का पता नहीं चल सका।"

"आई सी...।"

"टापू के आसपास भी जाना खतरे से खाली नहीं।"

"रात में?"

"दिन और रात का कोई फर्क नहीं। उस टापू के एरिए में जब भी जो भी जाता है उसका काम तमाम हो जाता है। लाश का पता नहीं चलता।"

"तू फिक्र मत कर...कम से कम मैं तुझे इतने बड़े खतरे में नहीं डालूंगा।"

"हहह...सेठ।"

"खतरे की सीमा से बहुत पहले स्टीमर को रुकवा दें।"

.

.

"ओ. के.।"

पाल चला गया।

उसके चले जाने के बाद राज विचारपूर्ण मुद्रा में जंजीरे की दिशा में देखने लगा।

थोड़ी दूर जाकर स्टीमर रुक गया।

फुहार पड़ रही थी। हवाओं में तेजी आती जा रही थी और अंधेरा घिरता जा रहा था।

"जय..!" थोड़ी देर बाद राज बोला "तूने यहीं रहना है। अंधेरा होते ही एक वोट पर मैं यहां से जंजीरे की तरफ निकल जाऊंगा।"

"अकेले...?"

"हां।"

"नेईं...अपुन तुमरे साथ चलगा...क्या! इधर तुमेरी दादागिरी नेई चल पाएगी। अपुन साथ छोड़ने वाला नेई।"

"तू समझता नहीं...वहां खतरा है।"

"तो क्या हुआ।"

"जान जा सकती है।"

"फिकर नेई ...अपुन साथ चलेंगा।" जय जिद पर अड़ गया।

राज ने उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया । वह अपनी तैयारी में लगा रहा और जय उसके पीछे-पीछे।

तब अंधेरा हो चुका था जब राज ने बोट नीचे उतरवायी। सबसे पहले वोट में से जय उतरा।

"वहां खतरा होगा...।" राज ने विरोध प्रकट करते हुए कहा-"तेरा इधर रहना जरूरी है।"

"अपुन तुमेरे साथ में रहेगा...जिधर तुम उधर अपुन। किधर भी कोई लफड़ा नेई।"

राज समझ गया कि उससे बहस करना बेकार ही होगा। वह स्टीमर के स्टॉफ और पाल को आवश्यक निर्देश देकर बोट में पहुंच गया।
 
वह थी तो मोटरबोट मगर उसे चप्पू से चलाकर जंजीरे की ओर बढ़ने की कार्यवाही आरंभ कर दी। बोट की एक भी लाइट जलाई नहीं गई थी। रात के अंधेरे में जबकि आकाश में बादल छाए हुए थे, केवल टार्च केयदा-कदा प्रयोग करने वाले प्रकाश से ही राज काम चला रहा था। उसने जय को भी यही हिदायत दी हुई थी कि वह भी वक्ती तौर पर ही अपनी टार्च काइस्तेमाल करेगा।

अंधेरे में बोट उस छोटे जजीरे की ओर धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी। निकट पहुंचने पर जजीरे की रोशनियां नजर आने लगीं।

लेकिन राज ने बोट को उस दिशा की ओर घुमा दिया जिधर रोशनियां नहीं थीं...यानी जिस ओर अंधेरा था।

जजीरे का वह तट घनी झाड़ियों से घिरा हुआ था। उन्हीं झाड़ियों के बीच मोटरबोट को छिपाकर वह जय के साथ जजीरे की जमीन पर जा पहुंचा। झाड़ियों के बाद थोड़ी दूर तक रेत थी फिर ऊंचे-ऊंचे दरख्त। उसके आगे जंगल जैसा इलाका।

उन दोनों ने अपनी-अपनी पीठ पर किट लादी हुई थीं। चायनीज लाइट मशीनगन उनके हाथों में थी। गनों की बैरल पर शक्तिशाली टाचें भी लगी हुई थीं। मन के ट्रेगर पर हल्का -सा दबाव डालते ही शक्तिशाली टार्च काम करने लग जाती थी।

एक अन्य बटन भी था जिसको पुरा करके टार्च को किसी भी हालत में बंद रखा जा सकता था।

सूखे पत्तों वाले क्षेत्र में वे अत्याधिक सावधानी के साथ चलने लगे। वे कम से कम आहट उत्पन्न करना चाहते थे। पैदल यात्रा करते हुए अन्तत: वे लाल हवेली कहलाने वाले विशाल किले के विशाल फाटक के समीप जा पहुंचे। झाड़ियों की ओट से उन्होंने देखा, फाटक पर कड़ा पहरा था। दो गनर हर वक्त फाटक के सामने सावधानमुद्रा में चक्कर लगा रहे थे।

"सामने से तो लाल हवेली में दाखिल हो पाना मुश्किल काम है।" राज फुसफुसाहट भरे स्वर में बोला-"कोई और रास्ता ही तलाश करना पड़ेगा।"

"अपुन सामने से भी जा सकता बाप...दोनों गार्ड को शूट करने का और...।"

"बस-बस...रहने दे। चल इधर से।"

"पन अपन..."

"शटअप!"

.

.

.

.

.

जय खामोश हो गया।

राज वहां से आगे बढ़ चुका था। वह उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
लाल हवेली का चक्कर लगाते हुए अन्ततः राज ने पिछले भाग में एक जगह चुन ली जिधर से वह उस विशाल किले के भीतर दाखिल होने में सफल हो गया। वह खतरे बाली जगह थी। पीछे गहरी खाई। किनारे से खड़ा एक ऊंचा घनी टहनियों वाला दरख्त जिस पर चढ़ना मुश्किल काम था। चढ़ते हुए अगर फिसलता तो गहरी खाई में अंतिम संस्कार की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। उन सभी खतरों को पार करके वे दोनों किले की दीवार पर जा पहुंचे। कगूरेदार किले की चौड़ी दीवार पर कंगूरों की ओट में से उन्होंने अंदर झांका। उस भाग में ड्रम पेटियां और दूसरे प्रकार का सामान भरा पड़ा था। उसके आगे रिहायशी कमरे थे ...फ्लैट भी बने हुए थे। चारों तरफ रोशनी ही रोशनी फैली थी। आगे वाले भाग से आवाजें आ रही थीं जैसे परेड करायी जा रही हो।

उस अग्रभाग की तरफ किले की दीवार से ही बढ़ना आरंभ किया मगर शीघ्र ही सामने एक बड़ी दीवार आ गई जो कि दायीं ओर वाली दीवार से बायीं ओर वाली दीवार की ओर चली गई थी।

उस क्रॉस होती चौड़ी दीवार के बीचों बीच एक गुमटी थी और उस गुमटी पर एक गमटी सावधान की मुद्रा में किसी सैनिक की भांति खड़ा था। स्पष्ट था कि गुमटी से आगे निकलने पर उनके देख लिए जाने का खतरा पैदा हो जाना था। ज्यादा आगे बढ़ने पर निश्चित रूप से खतरा था।

"जय।" राज फुसफुसाकर बोला।

"हुकुम बाप?" जय उसी की भाति धीमे स्वर में बोला।

"ये गुमटी वाला गनर हमारे रास्ते का रोड़ा बन रहा है।"

"उड़ा डालने...?"

"नहीं...उड़ा डालने से खतरा उमड़ पड़ेगा। हमारे लिए लेने के देने पड़ जाएंगे।"

"फिर?"

"तू इधर ही ठहर...पीजीशन संभाले रहना।"

"बरोबर।"

"तूने बायीं तरफ का मोर्चा संभालना है। मैं दायीं तरफ से घूमकर जब गुमटी के दायीं तरफ पहुंच जाऊं तब तू बायीं तरफ आहट की गरज से एक पत्थर फेंकना।"

"उससे क्या होएंगा?"

"जो होगा...पता चल जाएगा। फिलहाल तू नजर बनाए रखने का काम कर और एक पत्थर को तलाश ले।" इतना कहकर राज दायीं ओर से गुमटी की ओर बढ़ने लगा। बीच-बीच में वह बम भी लगाता जा रहा था।

गुमटी वाले मोड़ पर पहुंचकर उसने कंगूरे से उचककर जय की ओर देखा। जय तुरन्त समझ गया कि वह उसके लिए सिग्नल है, उसने तुरन्त पहले से तलाशा हुआ पत्थर गुमटी की बायीं ओर को उछाल दिया। रात के सन्नाटे में पत्थर दीवार से टकरा नीचे। पड़े किसी खाली ड्रम से टकराया।

तेज आहट उत्पन्न हुई। गनर ने तुरन्त आहट की दिशा में देखा।

उसकी टार्च का शक्तिशाली प्रकाश अपने बायीं ओर का निरीक्षण करने लगा। जय कंगूरों की ओट में तरह दीवार की सतह से चिपक चुका था।

राज के लिए खुला रास्ता था। बिना आहट किए वह गनर की पीठ पीछे आगे बढ़ा। कमर में बंधी डबल होलस्टर बैल्ट की हिप पॉकेट की ओर शिकारी चाकू था। उसने चाकू खींच निकाला। गनर अभी-भी बायीं ओर उत्पन्न होने वाली आहट का कारण जानने की कोशिश में बायीं ओर को देख रहा था।

अचानक!

अचानक ही वह अपने पीछे किसी की उपस्थिति का भान पाकर फुर्ती से मुड़ा लेकिन तब तक राज उसका मुंह दबोच कर लम्बा चालू उसके पेट में उतार चुका था।

एक झटके के साथ वह तना और फिर शिथिल पड़ता चला गया। सावधानी के साथ राज ने उसके मुंह से अपना हाथ हटाया। फिर उसकी लाश को गुमटी के एक कोने में डालकर वह गुमटी वाली दीवार के दूसरी ओर देखने लगा। दूसरी ओर एक छोटा सा मैदान था। मैदान में दूधिया प्रकाश पुंज दिन का सा प्रकाश उत्पन्न कर रहे थे। उस प्रकाश में फौजी ट्रैनिंग जैसी कार्यवाही चल रही थी।

लगभग सौ सैनिक परेड कर रहे थे। ए. के. 47 उनके कंधों पर लटक रही थीं। उन्हें किसी भी प्रकार असैनिक नहीं माना जा सकता था।

उस दृश्य को देखकर राज हैरत में पड़ गया। लाल हवेली या सैनिक अड्डा!

उसके जहन में जैसे विस्फोट सा हुआ। आखिरकार सैनिक कार्यवाही वहां कौन करवा रहा था। अभी वह किसी नतीजे तक पहुंच नहीं पाया था कि जय उसके समीप आ पहुंचा।

"क्या देखेला है बाप...इधर तो लफड़ाइच लफड़ा है।" उसने अत्यंत धीमे स्वर में कहा।

"ये सैनिक ट्रेनिंग...?" राज अचरज भरे स्वर में बोला-"आखिर कौन दे रहा है यही ट्रेनिंग और किन लोगों को दे रहा है। मकसद क्या है इन लोगों का?"

"उसकः खलास कर डाला नेई तो वही बताता।" जय ने गनर की लाश की ओर संकेत करते हुए कहा।

"चल आगे बढ़।"

"किधर?"

"तू उस तरफ से और मैं इस तरफ से...और सुन...कहनियों के बल दीवार के ऊपर रेंगते हुए आगे बढ़ना है क्योंकि ये सबसे खतरनाक क्षेत्र है किले का...यहां लगभग एक सौ जीड़ी आखें इधर-उधर घूम रही हैं। अगर इन्हें हमारी भनक लग गई तो हम छलनी-छलनी हो जाएंगे। हमें अगली सांस लेने का मौका भी हासिल नहीं हो सकेगा।"
 
"फिकर नेई बाप...अपुन निकल जाएंगा और किसी को कानों कान खबर भी नेई होएंगी।"

"फिर निकल..."

जय एक बार फिर बायीं ओर को निकल गया। राज ने किले की दायीं ओर वाली दीवार की ओर कदम बढ़ा दिए। फिर वह जब दूसरी साइड की दीवार पर पहुंचकर आगे बढ़ा तो जो काम उसने जय को करने के लिए कहा था वही उसने खुद भी किया। यानी वह कोहनियों के बल घिसटता हुआ किले की उस मोटी-सी दीवार पर आगे बढ़ने लगा।

मैदान में चार टुकड़ियों को चार अलग-अलग लोग ट्रेनिंग देने में व्यस्त थे। ट्रेनिंग देने वालों की तेज तीखी आवाजें वहां रह-रहकर कड़क फौजियों की तरह उभर रही थीं। चारों टुकड़ियां अलग-अलग आदेशों का पालन कर रही थीं। कदम ताल के साथ ही भारी जूतों की सम्मिलित आवाजें एक मिला-जुला शोर उत्पन्न कर रही थीं।

राज को मैदान वाली दीवार पार करने में खासा वक्त लग गया। मैदान के दूसरी तरफ एक बार फिर विशाल दीवार थी लेकिन इस दीवार पर ना तो गुमटी थी और ना ही कोई पहरेदार। दूसरी तरफ बड़े-बड़े फ्लैट बने हुए थे। कुछ लोग आ रहे थे...कुछ जा रहे थे।

राज ने जय को दूर से ही आगे बढ़ते रहने का संकेत किया। वह स्वयं भी आगे ही बढ़ता रहा। अगली दीवार आने से पूर्व ही राज ऊपर से नीचे को लटका और फिर सावधानी के साथ नीचे वाली छत पर कूद गया। दूसरी और से जय ने उतरने के लिए उस साइड में लगे खम्भे की मदद ली। बन्दर की तरह छलांग लगाकर उसने खम्मा पकड़ा और बिना आहट किए नीचे को फिसलता चला गया।

राज को फ्लैट की छत से नीचे उतरने में थोड़ा समय लगा। उसमें बम लगाने का समय भी सम्मिलित था। जिस रास्ते होकर वह गुजर रहा था, उस पूरे रास्ते में वह बम लगाता जा रहा था। लम्बी दीवार पर कितनी ही जगह उसने बम लगाए हुए थे। नीचे आते ही उसे जय मिल गया।

"अभी किधर चलना है?" जय ने फुसफुसाहट भरे स्वर में पूछा।

"इधर से चल...।" राज ने अंधेरे भाग की ओर संकेत करत हुए कहा और फिर वह ओट लेता हुआ आगे बढ़ने लगा।

थोड़ी दूरी पर एक विशेष बिल्डिंग नजर आयी। दो माले की उस बिल्डिंग का हॉल काफी बड़ा था। वहां का रखरखाव देखते हुए लगता था या तो वहां का हैडक्वार्टर था या फिर वहां फैली व्यवस्थाओं का कोई विशेष भाग।

बिल्डिंग के दरवाजे पर दो गार्ड गने संभाले बड़ी मुस्तैदी से खड़े थे।

राज घूमकर पिछले भाग में पहुंचा।

उसने सोचा था कि पिछले भाग से आसानी से भीतर दाखिल हो सकेगा।

लेकिन!

एक गार्ड उधर भी था।

"तू सावधान रहना...।" राज ने जय से फुसफुसाहट भरे स्वर में कहा।

"बरोबर।"

"में जाता हूं उससे मिलने।"

"मिलने!" जय के चेहरे पर गहन आश्चर्य के भाव आ गए।

जब तक वह कुछ समझ पाता तब तक राज ओट में से निकलकर चक्कर लगाते गार्ड की ओर बढ़ चुका था।

"ऐ...कौन हो तुम और यहां क्या कर रहे हो?" गार्ड ने अपनी गन उसकी ओर तानते हुए कठोर स्वर में कहा।

राज ने तुरन्त दोनों हाथ ऊपर उठा दिए। उसकी गन पीठ पर लटकी हुई थी। वह तो मानो खुद को गार्ड के हवाले करने की गरज से ही उसकी तरफ बढ़ा था। उसके हाथ उठाते ही गार्ड सावधान हो गया। गार्ड की टार्च का प्रकाश उसके सिर से पांव तक घूम गया।

"कौन हो तुम?" गार्ड ने गन का सेफ्टी कैच हटाते हुए सदिग्ध स्वर में पूछा।

"सच बताऊं।"

"हां-हां...सच ही बताओ?"

"सच ये है कि मैं आई. एस. आई. पाकिस्तान खुफिया ऐजेंसी का जासूस हूं।"

"झूठ...! आई. एस. आई. खुद अपने ही अड्डे में अपने जासूस को किसी चोर की तरह क्यों भेजेगी...आई. एस. आई का जासूस तो यहां अदब और एहतराम के साथ आएगा। तुम कोई मक्कार आदमी हो...सच बताओ कान, हो वरना गोली मार दूंगा।"

गार्ड ने गन को ऐन उसके सीने की तरफ तान दिया। सिर्फ ट्रेगर दबाने भर की देरी थी।

"तो ये आई. एस. आई. द्वारा संचालित अड्डा है और शायद भारत में ये उसका सबसे बड़ा अड्डा है ताक वह भारत के अंदर ही आतकंवादियों को ट्रेनिंग देकर उन्हें आसानी से भारत के अंदर दाखिला दिला दे।"

"तुमने ठीक समझा...और अब मैं भी समझ चुका हूं कि तुम आई. एस. आई. के नहीं बल्कि हिन्दुस्तानी खुफिया महकमे से ताल्लुक रखते कोई ऐजेंट हो।"

___ "कमाल का दिमाग है तुम्हारा...तुमने मुझे कितनी आसानी से पहचान लिया।"

"जितनी आसान से पहचाना है उतनी ही आसानी से तुम्हारे जिस्म को गोलियों से छलनी भी कर सकता हूं।"

"ताज्जुब है...मैं यहां आया दूसरे काम से था और जनकारी दूसरी हासिल हो गई।"

"किस काम से आए थे?"

"नहीं बताऊंगा।"

"बताओ वरना गोली मार दूंगा।"
 
"नहीं-नही...गोली मत चलाना। मैं बताता हूं। दरअसल मैं यहां इंस्पेक्टर सतीश मेहरा की तलाश में आया था। हालांकि मुझे लोगों ने बहुत समझाया था कि लाल हवेली में जाना मौत को दावत देने के बराबर है मगर मैं न माना। देखो दोस्त! अब मुझे। अपना अंजाम तो मालूम ही है...सिर्फ इतना बता दो कि मैं अपनी तलाश से कितनी दूरी पर था?"

"मतलब?"

"मेरा मतलब, क्या मैं इंस्पेक्टर सतीश मेहरा के आसपास कहीं पहुंच पाया था या नहीं?"

"वो उस तरफ पीछे की जेल में है।"

"जिस तरफ अंधेरा है?"

"हां...वहीं जेल है। तुम्हारा सतीश मेहरा वहीं है। मेरी पिछली ड्यूटी जेल में ही थी।"

"थै क्यू, आई. एस. आई के कारिन्दे...।"

"कोई हरकत मत करना।" गार्ड एकाएक ही सावधान होता हुआ बोला।

उसे अपने आसपास खतरे का अहसास तो हो गयाथा मगर वह संभलकर पीछे घूम पाता-तब तक जय उसकी कनपटी पर अपनी गन के बट का प्रहार कर चुका था। वार के तुरन्त बाद वह कटे हुए वृक्ष की भांति ढह गया।

राज ने फुर्ती से उसके हाथ बांधकर उसके मुंह पर चौड़ा-सा टेप चिपका दिया और उसे घसीटकर इमारत के पिछले भाग में सफाई का सामान आदि रखने वाले कलोजेट में बंद कर दिया।

"अब समझ में आया कि ये आई. एस. आई के जेरेसाया किसी दहशतगर्द इरादे का खुफिया अड्डा है। दहशतगर्द यहां से बड़ी आसानी से भारत की सीमा में दाखिल कराए जा सकते हैं।" राज जय को समझाता हुआ जल्दी-जल्दी कहने लगा-" मारा लक्ष्य उस तरफ जेल में है लेकिन मैं ये जानने का तमन्नाई हूं कि इस बिल्डिंग के अंदर क्या हो रहा है।"

"अंदर चलने का।"

"दाखिल होने के लिए रास्ता नजर नहीं आ रहा है।"

दोनों बिल्डिंग के पिछले भाग में भीतर दाखिल होने का रास्ता तलाश करने लगे। जब कोई रास्ता नजर नहीं आया तो उन्होंने पाइप के रस्से ऊपर पहुंचकर सीढ़ियों के रास्ते नीचे उतरना शुरू किया। सीढियों के पहले मोड़ की साइड में रोशनदान नजर आया और रोशनदान के समीप पहंचने पर राज ने देखा एक बड़ा हॉल...हॉल के अंदर चार आदमी बड़ी-सी टेबल के इर्द-गिर्द मौजूद थे।

"हमारी ये मुहिम पूरी तरह कामयाबी के साथ अपने अगले दौर की तरफ बढ़ रही है...।" उन चार में से एक अपनी भारी आवाज में कह रहा था "दहशतगर्दो की हमारी पहली यूनिट अपनी ट्रेनिंग के इस्तिताम परपहुंच चुकी है। महज हुक्म आने की देरी है। जैसे ही कराची से हुक्य आएगा...हम अपनी इस यूनिट को गुरुनानी के जेरेसाया मुम्बई से हिन्द की सरजमीं पर उतार देंगे। इस तरह हिन्द सरकार हमारे लिए कारगिल सैक्टर में फौजों की दीवार खड़ी करती रह जाएगी और हम हिन्द की जड़ों में पहुंचकर उसे मिटा डालने के मंसूबे पर पेश दर पेश आगे बढ़ते चले जाएंगे। मुजाहिदीन की दूसरी यूनिट किसी भी वक्त लाल हवेली के मुकाम पर आ सकती है।"

"उसके लिए हमें और असलहों की जरूरत होगी उस्मान अली साहब...।" सामने बैठा व्यक्ति बोला।

कथित उस्मान अली हकीकतन आई. एस. आई का आला अफसर था। पाकिस्तानी खुफिया ऐजेंसी ने उस्मान अली बिल्लोच की अहम कारगुजारी के तहत मुम्बई कमान का चीफ उसे ही तैनात कर दिया था और उसने मुम्बई अन्डरवर्ल्ड की सर्वोच्च शक्ति गुरुनानी से पैकट कर लाल हवेली को अपना ठिकाना बना डाला। कितनी तेजी से कितना कुछ कर डाला उसने। उस मान बिल्लोच डरावने अंदाज में हंसा फिर बोला-"तुम असलहे की बात करते हो...अरे, इस हाल के इसी फर्श के नीचे इतना असलहा और गोला बारूद मौजूद है कि हम आधे हिन्दुस्तान को उसके जरिए खाको-गारत कर डालें।"

"इतना सारा एम्यूनीशन है यहां?"

"हां...इतना सारा एम्यूनीशन है। कई क्विंटल तो आर. डी. एक्स. आ चुका है। आओ दिखाता उस्मान बिल्लोच ने मेज के नीचे लगा बटन दबाया तो हॉल के फर्श में पांच गुणा सात फुट का एक रिक्त स्थान उत्पन्न हो गया।

राज गौर से उसकी एक-एक हरकत को देखता जा रहा था।
 
उस्मान बिल्लोच अपने बाकी तीन साथियों को आर. डी. एक्स. का भण्डार दिखाने के लिए सीढियों से उस अण्डरग्राउंड भाग में उतर गया।

उसके उतरते ही राज ने जय को वहीं पोजीशन लेने को कहा और स्वयं बिना आहट किए फुर्ती से बाकी की आधी सीढ़ियां उतरकर हॉल के अंदर दाखिल हो गया।

हाल उस वक्त खाली था। उसने अंडरग्राउण्ड भाग में झांका। नीचे बहुत बड़ा हाल था और उसमें बारूद ही बारूद थी। विनाश ही विनाश। उस्मान बिल्लोच अपने साथियों को अंदरले भाग में ले गया था। इसलिए वे उसे नजर नहीं आ रहे थे।



वहां उसने अतिरिक्त फुर्ती दिखाई। वह नीचे उतरा और अन्दर डायनामाइट के पीछे दो बम लगाकर बाहर निकल आया।

दो बमों के अलावा उसने और अधिक बम लगाने की जरूरत नहीं समझी। क्योंकि वह जानता था कि बारूद को महज एक चिंगारी की जरूरत थी । फिर वहां तो दो-दो बम लगे थे।

वह जल्दी से बाहर निकला। उसे पूरी संतुष्टि हो चुकी थी। बाहर निकलने के लिए उसने इमारत के पिछले भाग में लगे पाइप की ही मदद ली। बाहर आने के बाद उन दोनों ने उस दिशा में बढ़ना शुरू कर दिया जिस दिशा में गार्ड ने जेल के बारे में बताया था। बीच-बीच में खासी रोशनी थी। उन्हें रोशनी से बच-बचकर चलना पड़ रहा था। अंत में उन्हें जेल तक सकुशल पहुंच जाने में कामयाबी हासिल हो ही गई।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

चार बैरकों को ऊंची-ऊंची बैरीकेटिंग की बा उंड्री से घेरकर एक अस्थाई किस्म की जेल बनाई गई थी। जेल के मुख्य द्वार पर चार गार्ड मौजूद थे।

दो गार्ड अन्दर भी पहरे पर चक्कर लगा रहे थे। राज ने जय को आसपास के क्षेत्र में बम लगाने का आदेश देने के बाद एक अंधेरे कोने में पोजीशन संभाल लेने को कहा था।

उसकी तैयारी जेल क कोने के समीप पहुंचकर पूरी हुई।

वह कोहनियों के बल रेंगता हुआ जेल के पिछले भाग की बैरीकेटिंग के समीप जा पहुंचा। उसने बैरीकेटिंग का निचला तार काटने के लिए किट के अंदर से कैची निकाली।

सर्वत्र सन्नाटा था।

कैंची को तार पर जमाते समय तो कोई-आहट न हुई, किन्तु जब दांत पर दांत जमाकर उसने तार काटा तो तेज खटाक् की ध्वनि उभरी। उस ध्यनि ने अंदर पहरा देते दोनों गनर्स को चौंका दिया। वे तुरन्त बैरीकेटिंग की और बढ़े।

राज फुर्ती से कोहनियों के बल घिसटता हुआ बैक हो गया। उस घड़ी उसका दिल धाड़-धाड़कर पसलियों से टकरा रहा था। ओट में पहुंचकर उसने राहत कोई सांस ली।

गार्डों की दूर से उभरती आवाजें सुनाई पड़ी उसे फिर वे दोनों वापस लौट गए।

दस मिनट की प्रतीक्षा के उपरांत वह एक बार फिर बैरीकेटिंग की ओर बढ़ा। निचला तार जिस स्थान पर उसने काटा था वहीं से उसने जेल के कैम्पस में प्रवेश किया।

कोहनियों के बल ही आगे बढ़ता हुआ वह पिछली दीवार के समीप पहुंचा। दीवार खासी ऊची थी। उस पर चढ़ने का कोई साधन नहीं था। पेशाब की वहां फैली दुर्गन्ध बता रही थी कि दीवार के दूसरी तरफ जेल का यूरीनल था।

उसने किट के अंदर से प्लास्टिक की डोरी व एनकर निकाला। एन्कर को डोरी से बांधकर उसने उसे दीवार की दूसरी ओर उछाल दिया। पहले ही प्रयास में उसे सफलता मिल गई। एंकर कहीं किसी जगह अटक गया था।

राज रस्सी के सहारे दीवार पर जा चढ़ा और रस्सी को ऊपर ही एक कील में बांधकर सावधानी के साथ फिसलकर दूसरी तरफ उतर गया। वास्तव में वह यूरीनल वाला भाग ही था। उस समय वहां कोई भी नहीं था। वह आगे बढ़ने के बारे में सोच ही रहा था कि भारी बूटों की खट्-खट् ने उसे चौंका दिया। एक गार्ड उसी ओर चला आ रहा था।

वह तुरन्त हिप पॉकेट पर झूलते चाकू को उसके खोल से खींचकर पूरी तरह सावधान हो गया। आपरेशन पर चलने से पहले उसने व्हिस्की के दो लार्ज पैग ले लिए थे। अब उसे प्रतीत हो रहा था कि उसका सुरूर धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। उसने जल्दी से चांदी वाल क्वार्टर निकालकर चार-पांच बूंट भर लिए। भारी जूतों की आहटें निकट आती जा रही फिर सीटी की धुन भी सुनाई देने लगी।

फिर जैसे ही उसने अंदर कदम रखा। राज ने अचानक विचार बदलते हुए चाकू के स्थान पर गन के बट का प्रहार उसकी खोपड़ी पर किया। अगले ही पल वह कटे वृक्ष की भांति गिरा। राज ने तेजी से उसके कपड़े बदलने शुरू कर दिए। वह कपड़े बदलने के साथ-साथ बाहर झांकने का काम भी करता जा रहा था।

शीघ्र ही वह गार्ड की यूनिफार्म पहन चुका था। उसने मूर्छित गार्ड के हाथ-पांव बांधकर उसे बाथरूम में बंद कर दिया। इतनी रात गए नहाने के लिए कोई पागल ही आ सकता था, अन्य कोई नहीं।

हाल फिलहाल कोई जान नहीं सकता था कि गार्ड के साथ क्या हुआ। उस गार्ड की वर्दी और गन आदि के अतिरिक्त राज ने उसके पास से बरामद चाबियो का गुच्छा भी ले लिया था। तैयार होकर उसने गार्ड वाली कैप अपने चेहरे पर झुकाकर लगायी। फिर वह जूतों की खट-खट की चिन्ता किए बिना बैरकों की ओर चल पड़ा।

पहली बैरक में चार कैदी थे।

उसने गौर से चारों का निरीक्षण किया और आगे बढ़ गया। उनमें कोई भी सतीश मेहरा नहीं था। दूसरी बैरक में भीड़ कुछ ज्यादा थी। वहां उसे रुकना पड़ा। सतीश मेहरा की हल्की झलक उसे मिली थी। वह पिछले भाग में दीवार से टिका आंखेंबंद किए बैठा-बैठा सो रहा था। कुछ कैदी इधर-उधर टहल रहे थे, इस वजह से वह सतीश को सीधा देख नहीं पा रहा था। उसने सतीश को गौर से देखने की गरज से दरवाजे के एकदम करीब से अंदर झांका। इस बार वह सतीश को पहचान गया। ।
 
"ऐ...।" उसने दरवाजे के करीब खड़े कैदी से कहा-"उसे बुला..."

"किसे...उसे?"

"अबे उसे नहीं...वो जो पुलिस की वर्दी पहने

"अच्छा...दरोगा जी को...अरे ऐई दारोगा साहेब...इधर आवा!"

___ सतीश मेहरा उठकर निकट पहुंचा। तब उसने गौर से राज को देखा।

धीरे-धीरे उसकी आंखें हैरत से फैलती चली गईं। वह कुछ कहने ही वाला था कि राज ने तुरन्त बायीं पलक दबाकर उसे इशारा किया। फिर बोला "चलो...तुम्हें बड़े साहब ने बुलाया है।" कहते हुए उसने चाबियों का गुच्छा निकालकर बैरकका ताला खोलने का प्रयास शुरू कर दिया।

चौथी चाबी ताले में लग गई। उसने फुर्ती से दरवाजा खोलकर सतीश को बाहर निकाला और उसे लेकर यूरीनल वाली साइड से बाहर निकल आया। बीच में सतीश ने बोलने की कोशिश की मगर राज ने उसे खामोश रहने का इशारा कर दिया। बैरीकेटिंग पार करते समय अनायास ही सतीश की पीठ के घाव में बैरीकेटिंग का नुकीला कांटा लग जाने से उसके मुख से तीखी कराहसी निकल गई। उसे पहरे वाले गार्ड ने सुन लिया।

"कौन है उधर...!" गार्ड दौड़कर आगे आता हुआ चिल्लाकर बोला-"ठहर जाओ वरना गोली मार दूंगा...।"

बाहर अंधेरेमें पोजीशन लिए बैठे जय ने देखा कि राज और सतीश दोनों ही उस गार्ड की ए. के. 47 रायफल के निशाने पर थे।

वह फायर करने चा रहा था कि जय ने ट्रेगर पर उंगली दबा दी।

तड़-तड़-तड़ की ध्वनि के साथ ही गार्ड दो-तीन झटके खाकर वहीं ढेर हो गया। उसकी ए. के. 47 से सिर्फ एक फायर हो सका था वो भी ट्रेगर दबते वक्तगन की बैरल आसमान की तरफ थी। गोली हवा को चीरती हुई ऊपर निकलती चली गई। उसके साथ ही भगदड़ मच गई।

सायरन गूंज उठा। यूं लगा जैसे हवाई हमला शुरूर हो गया हो।

सतीश मेहरा पूरी शक्ति लगाकर दौड़ रहा था। वह दूसरी बार उन आतकंवादियों की गिरफ्त में आना नहीं चाहता था। उसके पीछे था राज और राज के पीछे जय। उस अड्डे पर आदमियों की कोई कमी नहीं थी। वे सभी भाड़े के सैनिक थे...ट्रेनिंगशुदा भाड़े के सैनिका वहां उन्हें अतिरिक्त ट्रेनिंग दी जा रही थी। उनसे बच पाना नामुमकिन था। लेकिन! राज ने जो जाल बिछाया था वह भी कम नहीं था। एक रिमोट उसके हाथ में आ गया। दूसरा जय को पहले जय ने बटन दबाना आरंभ किया।

पीछे-दौडते कितने ही गार्ड लगातार होने वाले तीन-चार विस्फोटों के जाल में फंस गए।

आकाश की ऊंचाइयों में विस्फोट के साथ ही आग औरधुआंउमड़ता घुमड़ता चला गया। उसके बीच अनगिनत शरीरों के टुकड़े उड़ते चले गए।

राज ने तेजी से सतीश मेहरा को कवर किया-"मेरे साथ रहो सतीश...अलग-थलग भागने से खतरे में फंस जाओगे।"

"ऐसा क्यों?"

"इसलिए कि हम लोगों को उन बमों की स्थिति मालूम है जो हमने लगाए हैं। तुम्हें नहीं। मालूम इसलिए तुम उस क्षेत्र में फंसकर घायल हो सकते हो।"

"ओ. के! मैं समझ गया।"

"इधर से आओ।" सतीश राज के साथ-साथ दौड़ने लगा।

जय तबाही मचाता चल रहा था। उसका रिमोट फुर्ती से काम करता जा रहा था।

विस्फोटों का तांता लगा हुआ था।

आई. एस. आई. की उस यूनिट में हाहाकर मच गया था। यूनिट के कार्यकर्ता अपने दुश्मनों को पकड़ने उनके पीछे दौड़ने के बारे में भूलकर अपनी सुरक्षा के लिए इधर-उधर छिपने लगे।

राज ने सोचा था कि जो दो बम वह भूमिगत गोला-बारूद के स्टोर में लगा आया था, उन्हें वह सबसे बाद में चलाएगा। मगर जय के एक बम ने उस्मान बिल्लोच वाली बिल्डिंग को भी अपने लपेटे में ले लिया।

बस! वहीं अनर्थ हो गया।

बारूद के ढेर को चिंगारी लग गई और बारूद सुलग उठा।

फिर क्या था। जैसे लंका दहन आरंभ हो गया हो। विस्फोटों का न रुकने वाला क्रम जारी हो गया। जमीन थर्रा उठी। आकाश आग के शोलों से पट गया। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे लाल हवेली टापू का अस्तित्व समाप्त होने जा रहा था। टापू में आग और धुआ उबलता हुआ मलवा राज सतीश और जय को जला रहा था।

जहां बोट छिपायी थी वहां तक पहुंच पाना मुश्किल हो रहा था।

जब भी वह पीछे पलटकर देखता, उसे लपटें और अधिक ऊंची होती दिखाई देतीं।

फिर!

तब जब वह मोटरबोट पर पहुंचा, उसे लगा नया जीवन मिल गया हो उस। मोटरबोट का इंजन चालू करके उसने पूरी रफ्तार दे दी।

मोटरबोट तोप से छूटे गोले की भाति निकल भागी। समुद्र में भी दूर-दूर तक शोले उछल रहे थे। मोटरबोट समुद्र की लहरों को रौंदती हुई तेजी से स्टीमर की ओर बढ़ी चली जा रही थी।

राज ने सतीश मेहरा को उसकी बहन से मिलवा दिया।

डॉली भाई से चिपटकर खूब रोई। भाई के मिलने की खुशी में उसके आंसू थम ही नहीं रहे थे। जय को राज ने बाकी हालात जानने को भेज दिया था।

शोलों से वह कुछ अधिक ही जल गया था इसलिए उसकी मरहम पट्टी भी जरूरी थी।

__ "तुम लाल हवेली की बाबत हैडक्वार्टर रिपोर्ट कर दो सतीश...।" राज सिगरेट सुलगाता हुआ बोला-"बताना कि तुम्हें किस तरह उस्मान अली के बनाए पाकिस्तानी अड्डे में कैद रखा गया था। तुम कहनाकि तुम उनके बारूद में आग लगाकर किसी तरह बच निकले। मेरा या जय का नाम लेने की जरूरत नहीं है।"

"क्यों तपन भाई?"

"उसकी वजह है...मैं बाद में बता दूंगा।"

"लेकिन क्या वजह है?"

"कहां न बाद में बता दूंगा।"

सतीश चला गया।

उसके जाते ही राज उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। एक हाथ से कार ड्राइव करते हुए उसने मोबाइल निकालकर जोगलेकर से सम्पर्क स्थापित किया।

"जोगलेकर...।"

"हां...मैं बोल रहा हूं लायन साहब।"

"आवाज पहचान ली?"

"आपकी आवाज तो सपने में भी पहचान लूंगा।"
 
“लाल हवेली की खबर है तेरे मालिक को?"

"हां...आपने किया लाल हवेली का अंत लायन साहब?"

"बस हो गया।"

"यही नहीं सतीश मेहरा की आजादी की रिपोर्ट भी आ गई।"

"कैसे?"

"वहां कोई आदमी बच गया था जिसने रिपोर्ट भेजी है।"

"बच गया...!" राज शंकित स्वर में बड़बड़ाया।"

"हां...बच गया।"

"फिर वह जरूर उस्मान अली ही होगा।"

"कौन-उस्मान अली?"

"पाकिस्तानी खुफिया महकमे की भारत शाखा का चीफ।"

"ओह गॉड।"

"और कोई बात...?"

"आपसे मैं सम्पर्क बना नहीं सकता था। फिर भी...बहुत कोशिश की मगर मैं कामरेड को बचा न सका।"

"क्या मतलब?"

"कामरेड करीम अपना अखबार खुद बेचने के लिए सड़कों पर घूमने लगे थे। रंजीत सावन्त के आदेश पर जग्गू जगलर ने कामरेड को मार डाला।"

राज काठ होकर रह गया।

"जूग्गू जगलर।" वह दांत पीसकर गुर्राया।

"लायन साहब...खास खबर है...ध्यान से सुनिए।"

"सुन रहा हूं..तू बोल।"

"जग्गू जगलर रंजीत सावन्त के साथ सतीश मेहरा को खत्म करने जा रहा है।"

"कहां?"

"शायद पुलिस स्टेशन के बाहर।"

"शुक्रिया जोगलेकर।"

"लायन साहब!" दूसरी ओर से जोगलेकर का तड़प भरा स्वर उभरा।

"देबू की चिन्ता हैं न तुझे?"

'हां लायन साहब।"

"आज वह तेरे घर पहुंच जाएगा।"

"सच...!"

"हां...तूने बहुत खास खबर दी है मुझे इसलिए...। ऐक बात बोल...?"

"क्या लायन साहब?"

"देबू की वापसी के बाद भी खबर देगा या बदल जाएगा?"

"जरूर दूंगा। मैं तो पहले भी कह रहा था कि देबू को लौटा दें...मैं अपना काम करता रहूंगा।"

-

"तब सतीश वापस नहीं मिला था।"

"अब...?"

"अब मिल गया है। तुमसे बात करने के बाद मैं देबू वाले ठिकाने पर ही फोन करूंगा।"

"मुझे...मुझे बिश्वास नहीं हो रहा है।"

"अपनी आंखसे देख लेगा तो हो जाएगा विश्वास...उससे पूछना, कैसे राजकुमारों की तरह रखा गया था उसे। किसी भी बात की तकलीफ नहीं होने दी।"

.

"थैक्यू लायन साहन...!" "और, मुझे कामरेड करीम को मौत का दु:ख मिला...हाह...।"

"लायन साहब...।"

"उसे बोल दे जोगलेकर...बोल दे धरम सावन्त को कि कामरेड का खून आसानी से नहीं बहेगा। मैं उसके खून की एक-एक बूंद का बदला लेकर रहूंगा।"

"मैं...मैं तुम्हारे साथ हूं लायन।"

राज ने मोबाइल ऑन करके सिकन्देर से देबू के लिए सम्पर्क बनाया। वह देबू की रिपोर्ट देना चाहता था कि जबकि जय ने पलटकर उसे कामरेड का दुःख भरा समाचार सुनाया।

"मुझे मालूम है जय...तू ऐसा कर कि कामरेड के परिवार का ख्याल कर। मैं कामरेड का ऋणी हूं...उसके जीवन की ज्योति मेरी वजह से ही बुझी है। तू उधर संभाल और देबू को उसके घर । पहुंचवा दे। मैं जगलर का हिसाब करके आता हूं।"

"ओ. के. लायन।"
 
सम्पर्क काटकर राज ने अपना सारा ध्यान सामने दौड़ती सतीश की मोटरसाइकिल पर लगा दिया। सतीश अब पुलिस स्टेशन के निकट पहुंचता जा रहा था।

राज ने कार की पछिलीसीट से राकेट लांचर और एक शक्तिशाली गन उठाकर अपने बराबर वाली सीट पर रख ली।

तमाम हालात से अंजानसतीश मेहरा पुलिस स्टेशन के गेट की ओर मुड़ने लगा।

तभी!

सामने की दिशा से तीन कारें एक साथ झपटी। कारों से गनों की बैरलें झांक रही थीं।

बीच वाली कार से जग्गू जगलर आधा बाहर निकला हुआ था।

राज ने कार में ब्रेक लगाए, अपनी गन उठाई और फिर जग्गः जगलर वाली कार को लक्ष्य करके ट्रेगर दबा दिया।

धमाके के साथ गन के दहाने से धुएं का घेरा फैलता चला गया।

लक्ष्य जग्गू जगलर की कार थी जो कि धमाके के साथ ही हवा में किसी तिनके की तरह उड़कर विस्फोट के साथ ही टुकड़ों में विभक्त हो गई

जग्गू जगलर की आखिरी चीख भी सुनाई न पड़ी।। सतीश तेजी से अपनी मोटर साइकिल पुलिस स्टेशन के अंदर ले गया।

राज ने दूसरी कार को निशाना बनाया। वह भी हवा में तैर गई।

इस बीच कितनी ही गोलियोंने राज की कार की विण्ड स्क्रीन को छलनी कर डाला।

राज राकेट लांचर संभालकर कार के दरवाजे से बाहर निकल आया लेकिन रहा दरवाजे की ओट में ही। गोलियां कार के दरवाजे से टकराकर इधर-उधर छिटक रही थीं।

सतीश ने भी पुलिस स्टेशन से फायरिंग शुरू कर दी थी।

राज ने राकेट लांचर से पहला राकेट चलाया। पहले ही राकेट ने तीसरी कार के परखच्चे उड़ा डाले।

उसने सोचा था कि पहलाराकेट चलाकर वह दुश्मन को बौखलाएगा और दूसरे से निशाने पर चोट कर देगा।

लेकिन काम पहले वार से ही हो गया।

सब कुछ खत्म सा हो गया था।

अचानक ही उसकी नजर उन तीनों कारों से दूर एक भागती हुई कांटेसा पर पड़ी।

राज ने तेजी से अपनी कार उसके पीछे दौड़ा दी। सतीश उसे आवाज देता पीछे छूट गया।

आगे दौड़ने वाली कांटेसा में था रंजीत सावन्त।

राज ने माउजर निकालकर हाथ में ले लिया।

__ वह कांटेसा के पिछले पहिए का निशाना लेने की कोशिश कर रहा था। इस बीच उसके कानों में पुलिस का कर्कश सायरन बजकर शोर मचाने लगा। निश्चित रूप से राज दी लायन को घेरने की कार्यवाही अमल में लायी जा रही थी। और अब उसके पास वक्त बहुत कम था। उसने जल्द से जल्द अपना काम पूरा करके मुम्बई से निकल जाना था।

कांटेसा का पहिया निशाने पर आया।

अगले ही पल ट्रेगर दबा। माउजर के दहाने ने आग उगली।

तेज रफ्तार से दौड़ती कांटेसा एकाएक ही उलटकर दूर तक फिसलती चली गई। सामने से आती कार ने उससे बचने की बहुत कोशिश की मगर टक्कर हो ही गई। राज ने अपनी कार कांटेसा के एकदम करीब ही रोकी।

रंजीत सावन्त अंदर फंसा पड़ा था।

राज ने झुककर उसका कालर पकड़ा और उसे कांटेसा से खींचकर बाहर निकाल लिया।

सायरन की आवाजें निकट पहुंचती जा रही थीं। घबराहट में उसने रंजीत सावन्त को तलाशी लेने के बाद अपनी कार में धकेला और फिर वहां से भाग निकला।

उसकी कार हवा से बातें कर रही थी।

"सुन कबाड़िए...।

" माउजर रंजीत की खोपड़ी की ओर तानता हुआ वह हिंसक स्वर में गुर्राया-"अगर तूने किसी प्रकार की मक्कारी दिखाने की कोशिश की तो भेजा उड़ा डालूंगा! समझा कुत्ते

रंजीत ने सहमे हुए अंदाज में गर्दन हिला

"समझ गया।"

"दूसरी वार्निंग नहीं दूंगा...गोली चला दूंगा।"

"मैं एकदम न्यूट्रल हूं...गोली मत चलाना। मेरी जात से तुम्हें कोई नुकसान नहीं होगा।"

राज ने कार की रफ्तार बढ़ा दी।

उसने पीछे मुड़कर देखा।

पुलिस की तीन कारें आगे-पीछे दौड़ती हुईं उसके पीछे झपटी आ रही थीं। तीनों के सायरन चीख रहे थे।

कारों की वो रेस धरम सावन्त की कोठी तक चली। राज अपनी कार कोठी के पोर्टिको तक दौड़ाए लिए चला गया। जब बाहर निकला तो उसका माउजर रंजीत की गर्दन पर था।

"जो यहां है वहीं ठहर जाए बरना...।" उसने धमकी दी तो आगे दौड़ते गनर ठिठककर रुक गए। वह रंजीत को खींचता हुआ भीतर दाखिल हुआ। अपने पीछे उसने कोठी का मजबूत दरवाजा बंद कर दिया।

तभी!

धरम सावन्त उसके सामने आया।

"मेरे भाई को छोड़ दे लायन...!" उसने गन राज के सीने की ओर तानते हुए कहा।
 
तभी!

धरम सावन्त उसके सामने आया।

"मेरे भाई को छोड़ दे लायन...!" उसने गन राज के सीने की ओर तानते हुए कहा।

हंसा राज।

"मेरा निशाना चूकता नहीं।"

"नहीं चूकता होगा लेकिन मुझे तो निशाना लगाने की जरूरत ही नहीं। ट्रेगर दबाते ही काम कर डालूंगा।"

"नहीं...उसे मत मारना।"

"नहीं मारने की कीमत है।"

"क्या ?"

"जिस स्तर से भी तूने सतीश के खिलाफ कार्यवाही की है, उसे खत्म करवा! लेकिन ठहर...ये बाहर पुलिस वाले बहुत शोर मचा रहे हैं...पहले उन्हें यहां से जाने कोबोल।"

धरम सावन्त समझ रहा था कि ट्रम्पर्काड राज के हाथ में है...नतीजतन वह बाहर निकला और किसी तरह पुलिस को वहां से विदा कर दिया।

"पुलिस चली गई...।" उसने राज से कहा।

"तो अब फोन करके सतीश के खिलाफ की गई कार्यवाही भी निपटा।"

उसने फोन पर किसी से बात करके सतीश का रास्ता साफ कराया।

उसके बाद!

लगभग दस मिनट बीते...दो-तीन फायर हुए...फिर खामोशी छा गई।

करीब ही छिपी पुलिस कोठी में दाखिल हुई।

अन्दर!

रंजीत और धरम सावन्त की लाशें टंगीथीं।

एक गत्ते के बोर्ड पर लिखा था हम पाकिस्तानी एजेंट हैं। हम देशद्रोही हैं।

हमने लाल हवेली में पाकिस्तानियों को पनाह दी। हमें हमारे किए की सजा मिल गई।

पुलिस ने राज की बहुत तलाश किया लेकिन वह किसी छलावे की भांति गायब हो चुका था।

पुलिस स्टेशन में सतीश की टेबल पर रखा फोन बज उठा।

"हैलो...इंस्पेक्टर सतीश स्पीकिंग...।" वह रिसीवर कान से लगाता हुआ बोला।

"मैं हूं सतीश।" दूसरी ओर से राज का स्वर उभरा।

"ओह आप...!"

"पहचान लिया?"

"तपन सिन्हा के नाम से खूब छलते रहे।"

"सब ठीक है न?"

"हां।"

"तुम पर कोई चार्ज?"

"सारे चार्ज खत्म हो गए।"

"अपनी असलियत मुझे तो बता ही सकते थे न।"

"कोई फर्क नहीं पड़ता।"

"पड़ता है...मुझे पड़ता है। मैं मिलना चाहता हूं

__ "मुम्बई से बाहर हूं...फिर भी पुलिस से आंख-मिचौनी चल रही है। कभी मौका लगा तो जरूर मिलूंगा। जय से कहना कामरेड करीम के परिवार का ध्यान रखे।"

"जो आज्ञा लायन।"

"फिर मिलेंगे..."

सतीश हैलो-हैलो ही करता रहा, दूसरी ओर से सम्पर्क काट दिया गया।

..................!!! समाप्त !!! ...................
 
Back
Top