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सी. एम. एस {चूत मार सर्विस }

मैं अंदर से घबराया हुआ तो था किन्तु मेरे मन में ये उत्सुकता भी प्रबल हो रही थी कि अब ये तीनों नंगी पुंगी हसीनाएं मेरे साथ क्या क्या करेंगी। माया की बात मुझे अब तक याद थी जब उसने कोमल और तबस्सुम से ये कहा था कि अब मुझे सिर्फ ये सिखाना है कि किसी औरत को संतुस्ट कैसे किया जाता है। मतलब साफ़ था कि अब वो तीनों मुझे सेक्स का ज्ञान कराने वाली थीं। मैं मन ही मन ये सोच कर बेहद खुश भी हो रहा था कि अब ये तीनों मेरे साथ सेक्स करेंगी और मेरी सबसे बड़ी चाहत पूरी होगी। मैं क्योंकि नंगा ही था इस लिए मेरा लंड अपनी पूरी औकात पर खड़ा हो कर कुछ इस तरीके से ठुमकते हुए झटके मार रहा था जैसे वो उन्हें सलामी दे रहा हो।

"हम तीनों ये देख चुकी हैं कि तुम में संयम की कोई कमी नहीं है।" माया ने आगे बढ़ कर मुझसे कहा_____"हालाँकि पहली बार में तुम्हारी जगह कोई भी होता तो वो हम तीनों के द्वारा इतना कुछ करने से पहले ही अपना संयम खो देता। हम तीनों सबसे पहले यही देखना चाहते थे कि तुम में संयम रखने की क्षमता है या नहीं। अगर तुम में संयम की कमी होती तो हम तीनों तुम्हें संयम कैसे रखना होता है ये सिखाते। ख़ैर अब जबकि हमें पता चल चुका है कि तुम्हें कुदरती तौर पर सब कुछ मिला है और संयम की भी कोई कमी नहीं है। अब हम तुम्हें ये सिखाएंगे कि किसी औरत को सेक्स से खुश और संतुस्ट कैसे करना होता है।"

माया की बात सुन कर मैं कुछ न बोला बल्कि रेशमी कपड़े जैसी ब्रा में क़ैद उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को देखता रहा। उसे भी पता था कि मैं उसकी चूचियों को ही देख रहा हूं किन्तु उसे इस बात से जैसे कोई ऐतराज़ नहीं था।

"एक बात हमेशा याद रखना।" कुछ पलों की ख़ामोशी के बाद उसने फिर से कहा____"और वो ये कि कभी भी किसी लड़की या औरत के साथ ज़ोर ज़बरदस्ती में सेक्स न करना। क्योंकि ऐसा करना बलात्कार कहलाता है और इससे न तो तुम्हें ख़ुशी मिलेगी और ना ही उस औरत को। किसी के साथ बलात्कार करने से दो पल के लिए भले ही मज़े का एहसास हो लेकिन मज़े के बाद जब वास्तविकता का एहसास होता है तब ये बोध भी होता है कि हमने कितना ग़लत किया है। ख़ैर सेक्स का असली मज़ा दोनों पर्सन की रज़ामंदी से ही मिलता है। ईश्वर ने औरत को इतना सुन्दर इसी लिए बनाया होता है कि मर्द उसे सिर्फ प्यार करे। औरत प्यार में अपना सब कुछ मर्द को सौंप देती है।"

"हालाँकि दुनिया में तरह तरह की मानसिकता वाले लोग भी होते हैं।" कोमल ने कहा____"जिनमें औरतें भी होती हैं। कुछ मर्द और औरतें ऐसी मानसिकता वाली होती हैं जिन्हें अलग अलग तरीके से सेक्स करने में मज़ा आता है। कोई प्यार से सेक्स करता है तो कोई सेक्स करते समय पागलपन की हद को पार कर जाता है। उस पागलपन में लोग सेक्स करते समय एक दूसरे को बुरी तरह से कष्ट पहुंचाते हैं। उन्हें सेक्स में ऐसा ही वहशीपना पसंद होता है।"

"यहां पर तुम्हें दोनों तरह से सेक्स करने के बारे में सीखना ज़रूरी है।" तबस्सुम ने कहा____"क्योंकि आने वाले समय में तुम्हें ऐसे ही काम करने होंगे।"

"वो सब तो ठीक है।" मैंने झिझकते हुए कहा____"लेकिन मेरी सबसे बड़ी समस्या ये है कि मैं बहुत ही ज़्यादा शर्मीले स्वभाव का हूं जिससे मैं किसी औरत ज़ात से खुल कर बात करने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाता।"

"शर्म हर इंसान में होती है।" माया ने कहा____"फिर चाहे वो मर्द हो या औरत। ये एक कुदरती गुण होता है जो आगे चल कर वक़्त और हालात के साथ साथ घटता और बढ़ता रहता है। कुछ लोग सिचुएशन के अनुसार जल्दी ही खुद को ढाल लेते हैं और कुछ लोगों को सिचुएशन के अनुसार खुद को ढालने में थोड़ा वक़्त लगता है लेकिन ये सच है कि वो ढल ज़रूर जाता है। तुम भी ढल जाओगे और बहुत जल्दी ढल जाओगे।"

कहने के साथ ही माया मुस्कुराते हुए मेरी तरफ बढ़ी तो मेरी धड़कनें अनायास ही बढ़ चलीं। मैं उसी की तरफ देख रहा था और सोचने लगा था कि अब ये क्या करने वाली है? उधर वो मेरे पास आई और मेरा हाथ पकड़ कर हल्के से खींचते हुए बेड पर ला कर मुझे बैठा दिया।

"सपने तो ज़रूर देखते होंगे न तुम?" माया मेरे क़रीब ही बैठते हुए बोली____"और किसी न किसी के बारे में तरह तरह के ख़याल भी बुनते होगे?"

"मैं कुछ समझा नहीं?" माया की इस बात से मैं चकरा सा गया था।

"बड़ी सीधी सी बात है डियर।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा_____"हर कोई सपने देखता है। कभी खुली आँखों से तो कभी बंद आँखों से। हर लड़का एक ऐसी लड़की के बारे में सोच कर तरह तरह के ख़याल बुनता है जो दुनियां में उसे सबसे ज़्यादा खूबसूरत लगती है। तुम भी तो किसी न किसी लड़की के बारे में सोच कर अपने मन में तरह तरह के ख़याल बुनते होगे?"

"ओह! हां ये तो सही कहा आपने।" मैंने हल्के से शर्माते हुए कहा____"पर शायद मैं बाकी लड़कों से ज़्यादा लड़कियों के बारे में तरह तरह के ख़याल बुनता हूं। वो बात ये है कि मैं और तो कुछ करने की हिम्मत जुटा नहीं पाता इस लिए जो मेरे बस में होता है वही करता रहता हूं। यानि दिन रात किसी न किसी लड़की के बारे में सोच कर तरह तरह के ख़याल बुनता रहता हूं। वैसे आपने ये क्यों पूछा मुझसे?"

"अब तक तुमने।" माया ने जैसे मेरे सवाल को नज़रअंदाज़ ही कर दिया, बोली____"जिन जिन लड़कियों के बारे में सोच कर तरह तरह के ख़याल बुने हैं उन ख़यालों को अब सच में करके दिखावो।"

"दि...दिखाओ???" मैं जैसे हकला गया_____"मेरा मतलब है कि मैं भला कैसे...???"

"मैं भला कैसे का क्या मतलब है?" माया ने मुस्कुरा कर कहा____"क्या तुम ये चाहते हो कि कोई दूसरा लड़का आए और तुम्हारे सामने हम तीनों के साथ मज़े करे?"

"न..नहीं तो।" मैं एकदम से बौखला गया_____"मैं भला ऐसा कैसे चाह सकता हूं?"

"देखो मिस्टर।" माया ने समझाने वाले अंदाज़ से कहा____"हमारा तो काम ही यही है कि हम तुम जैसे लड़कों को सेक्स की ट्रेनिंग दें और वो हम अपने तरीके से दे भी देंगे लेकिन मैं चाहती हूं कि तुम ख़ुद अपने उन ख़यालों को सच का रूप दो जिन्हें तुमने अपने मन में अब तक बुने हैं। इससे तुम्हें ही फायदा होगा। तुम्हारा आत्मविश्वास भी बढ़ेगा और तुम्हारे अंदर की झिझक व शर्म भी दूर होगी।"

"मैं माया की बात से सहमत हूं।" कोमल ने कहा____"ये सच है कि हम तुम्हें ट्रेंड कर देंगे लेकिन अगर तुम खुद अपने तरीके से अपने उन ख़यालों को सच का रूप दो तो ये तुम्हारे लिए बेहतर ही होगा।"

माया और कोमल की बातों ने मुझे अजीब कस्मकस में डाल दिया था। ये सच था कि मेरा बहुत मन कर रहा था कि मैं उन तीनों के खूबसूरत जिस्मों के साथ खेलूं। उनकी सुडौल चूचियों को अपने हाथों में ले कर सहलाऊं और मसलूं लेकिन ऐसा करने की मुझ में हिम्मत नहीं हो सकती थी।

"अच्छा अब ये बताओ कि हम तीनों में से तुम्हें सबसे ज़्यादा कौन पसंद है?" माया ने मुस्कुराते हुए पूछा तो मैंने उसकी तरफ देखा, जबकि उसने उसी मुस्कान में आगे कहा_____"सच सच बताना और हां ये मत सोचना कि अगर तुमने हम में से बाकी दो को पसंद नहीं किया तो हमें बुरा लग जाएगा। चलो अब खुल कर बताओ।"

साला ये तो ऐसा सवाल था जिसका उत्तर देना तो जैसे टेढ़ी खीर था। मेरी नज़र में तो वो तीनों ही बला की खूबसूरत थीं। तीनो में से किसी एक को पसंद करना या चुनना मेरे लिए बेहद ही मुश्किल था। तभी मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि मुझे कौन सा उनमें से किसी से शादी करनी है। कहने का मतलब ये कि मुझे तो किसी एक को पसंद कर के शायद उसके साथ सेक्स ही करना है न तो फिर इसमें इतना सोचने की क्या ज़रूरत है? किसी एक को पसंद कर लेता हूं बाकी जो होगा देखा जाएगा। मैंने तीनों को बारी बारी से देखा। मैंने सोचा कि कोमल और तबस्सुम को तो मैं पूरा ही नंगा देख चुका हूं जबकि माया अभी भी ब्रा पेंटी पहने हुए है इस लिए मैंने सोचा इसको भी नंगा देख लेता हूं।

"देखिए बात ये है कि।" फिर मैंने झिझकते हुए कहा_____"मुझे तो आप तीनों ही सबसे ज़्यादा खूबसूरत लगती हैं। आप तीनों में से किसी एक को पसंद करना मेरे लिए बेहद ही मुश्किल है, फिर भी आप कहती हैं तो मैं बताए देता हूं कि मुझे सबसे ज़्यादा आप ही पसंद हैं।"

"मुबारक़ हो माया।" तबस्सुम ने मुस्कुराते हुए कहा_____"इस लड़के की सील तोड़ने का पहला मौका तुम्हें ही मिल गया।"

"सही कहा तबस्सुम।" कोमल ने जैसे ताना सा मारा_____"हम तीनों में से एक माया ही तो है जो सबसे ज़्यादा सुन्दर है और पसंद करने वाली चीज़ भी है। ये लड़का तो बड़ा ही चालू निकला।"

"देखिए आप लोग प्लीज़ बुरा मत मानिए।" उन दोनों की बातें सुन कर मैं जल्दी से बोल पड़ा था____"मैंने तो पहले ही कहा था कि मेरे लिए आप में से किसी एक को पसंद करना बेहद ही मुश्किल है।"

"अरे! तुम इनकी बातों पर ध्यान मत दो।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा____"ये दोनों तो मज़ाक में ऐसा बोल रही हैं तुम्हें। ख़ैर तो अब जबकि तुमने मुझे पसंद किया है तो आज के लिए मैं तुम्हारी हुई। आज के दिन अब तुम और मैं ही एक दूसरे के साथ रहेंगे। तुम ये समझो कि मैं वो लड़की हूं जिसके बारे में सोच कर तुम तरह तरह के ख़याल बुनते थे और अब जबकि मैं तुम्हारे ख़यालों से बाहर आ कर तुम्हारे पास ही हूं तो तुम मेरे साथ वो सब कुछ कर सकते हो जो ख़यालों में मेरे साथ करते थे।"

"क्या सच में???" मेरे मुख से जाने ये कैसे निकल गया, जबकि मेरे द्वारा इतनी उत्सुकता से कहे गए इस वाक्य को सुन कर कोमल और तबस्सुम ने एक साथ मुस्कुराते हुए कहा_____"ओए होए, देखो तो कितना उतावले हो उठे हैं ये जनाब।"

कोमल और तबस्सुम की ये बात सुन कर मैं बुरी तरह झेंप गया और शर्म से लाल हो गया। जबकि उन दोनों की बात सुन कर माया ने उन्हें डांटते हुए कहा____"क्यों छेड़ रही हो बेचारे को?"

"अच्छा ठीक है हम कुछ नहीं कहेंगी।" कोमल ने कहा____"लेकिन हां ये ज़रूर कहेंगे कि थोड़ा सम्हाल के करना। तुम तो जानती हो कि इस बेचारे की अभी सील भी नहीं टूटी है।"

कोमल ने ये कहा तो तबस्सुम ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी। इधर उसके हसने से मैं और भी बुरी तरह से शर्मा गया। मैं समझ गया था कि कोमल के कहने का मतलब क्या था और क्यों उसकी बात से तबस्सुम हंसने लगी थी। ख़ैर माया ने उन दोनों को फिर से डांटा और दोनों को कमरे से जाने को कह दिया। उन दोनों के जाने के बाद माया ने कमरे को अंदर से बंद किया और पलट कर मेरे पास आ कर बेड पर बैठ गई। मेरे दिल की धड़कनें फिर से ये सोच कर बढ़ गईं कि अब इसके आगे शायद वही होगा जिससे मेरी सबसे बड़ी चाहत पूरी होगी। इस बात को सोच कर ही मेरे मन में खुशी के लड्डू फूटने लगे थे।

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अध्याय - 07

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अब तक,,,,,

कोमल ने ये कहा तो तबस्सुम ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी। इधर उसके हसने से मैं और भी बुरी तरह से शर्मा गया। मैं समझ गया था कि कोमल के कहने का मतलब क्या था और क्यों उसकी बात से तबस्सुम हंसने लगी थी। ख़ैर माया ने उन दोनों को फिर से डांटा और दोनों को कमरे से जाने को कह दिया। उन दोनों के जाने के बाद माया ने कमरे को अंदर से बंद किया और पलट कर मेरे पास आ कर बेड पर बैठ गई। मेरे दिल की धड़कनें फिर से ये सोच कर बढ़ गईं कि अब इसके आगे शायद वही होगा जिससे मेरी सबसे बड़ी चाहत पूरी होगी। इस बात को सोच कर ही मेरे मन में खुशी के लड्डू फूटने लगे थे।

अब आगे,,,,,

"चलो अब शुरू करो।" बेड पर मेरे एकदम पास बैठते ही माया ने मेरी तरफ देखते हुए कहा तो मेरे दिल की धड़कनें पहले से भी ज़्यादा तेज़ हो गईं। मैं अच्छी तरह समझ गया था कि उसने किस चीज़ को शुरू करने को कहा था किन्तु मेरे लिए ये सब शुरू करना अगर इतना ही आसान होता तो मैं यहाँ इस हाल में होता ही क्यों?

"क्या हुआ? तुम शुरू क्यों नहीं कर रहे?" मुझे कुछ न करते देख माया ने फिर से कहा_____"देखो डियर, तुम यहाँ सेक्स की ट्रेनिंग लेने आए हो और तुम्हारे लिए सबसे अच्छी बात ये है कि तुम्हें जिसके साथ सेक्स करने की ट्रेनिंग लेनी है वो तुम्हारा पूरा साथ देगी। यूं समझो कि तुम अपनी मर्ज़ी से जो चाहो मेरे साथ कर सकते हो। मैं तुम्हें किसी भी चीज़ के लिए मना नहीं करुंगी। दुनियां में बहुत ही कम ऐसे लोग होते हैं जिनके नसीब में इतना अच्छा मौका मिलता है। अगर तुम इसी तरह सेक्स के नाम पर शर्म करोगे तो फिर कैसे तुम किसी औरत के साथ सेक्स कर पाओगे और कैसे उसे संतुष्ट कर पाओगे? एक दिन तुम्हारी शादी भी होगी तो क्या तुम अपनी बीवी के साथ भी सेक्स नहीं करोगे? ऐसे में तो लोग तुम्हें नपुंसक और हिंजड़ा कहेंगे। वो ये भी कहेंगे कि तुम मर्द नहीं बल्कि गांडू हो जो किसी औरत के साथ सेक्स ही नहीं कर सकता बल्कि दूसरे मर्दों से खुद अपनी ही गांड मरवाता है। क्या तुम सच में गांडू बनना चाहते हो?"

"न..नहीं नहीं।" मैं एकदम से बौखलाते हुए बोल पड़ा_____"मैं ऐसा नहीं बनना चाहता।"

"तो फिर मर्द बनो डियर।" माया ने मेरे चेहरे को अपने एक हाथ से सहलाते हुए कहा_____"भगवान की कृपा से तुम्हें इतना तगड़ा हथियार मिला है तो अब तुम भी साबित करो कि तुम एक मुकम्मल मर्द हो और अपने इस हलब्बी लंड के द्वारा किसी भी औरत की चीखें निकाल सकते हो। दुनियां की हर औरत को तुम अपने इस हलब्बी लंड की दीवानी बना दो। जब ऐसा हो जाएगा तो देखना दुनियां की हर औरत ख़ुद ही अपना सब कुछ तुम्हें देने को तैयार रहेगी।"

माया के द्वारा खुल कर कही गई इन बातों ने मेरे अंदर एक जोश सा भर दिया था और मुझे पहली बार एहसास हुआ कि वो सच कह रही थी। यानी सच में मुझे ईश्वर ने एक ऐसा लंड दिया था जिसके बलबूते पर मैं किसी भी औरत की चीखें निकाल सकता था। ऐसे हलब्बी लंड के होते हुए भी अगर मैं मुकम्मल मर्द न बन सका तो फिर ये मेरे लिए डूब मरने वाली बात ही होगी। इस ख़याल के साथ ही मैंने एक गहरी सांस ली और मन ही मन फ़ैसला कर लिया कि अब मुझे मुकम्मल मर्द बनना है। मुझे अपने अंदर से इस शर्मो हया को निकाल कर दूर फेंक देना होगा।

मैंने आँखें बंद कर के दो तीन गहरी गहरी साँसें ली और फिर झटके से आँखें खोल कर माया की तरफ देखा। इस बार मेरे देखने का अंदाज़ पहले से काफी अलग था। मैं अपने अंदर एक निडरता महसूस करने लगा था। माया मेरे चेहरे के बदले हुए भावों को ही देख रही थी। मेरी नज़रें उसके खूबसूरत चेहरे पर जम सी गईं थी। कुछ पलों तक मेरी नज़रें उसके चेहरे पर ही जमी रहीं उसके बाद मेरी नज़र उसके रसीले होठों पर पड़ी। मैंने महसूस किया जैसे उसके वो रसीले होंठ मुझे इशारा करते हुए कह रहे हों कि आओ और मुझे अपने मुँह में भर कर चूस लो।

मैंने एक बार फिर से गहरी सांस ली और अपने दोनों हाथ बढ़ा कर माया के चेहरे को थाम लिया। मेरे ऐसा करते ही माया के रसीले होठों पर मुस्कान थिरक उठी जिससे मेरे अंदर के जज़्बात मचल से उठे और मैंने एक पल की भी देरी न करते हुए लपक कर उसके होठों पर अपने होठों को रख दिया। यकीनन माया को मुझसे इतनी जल्दी इस सबकी उम्मीद न रही होगी लेकिन मैंने तो अब सोच लिया था कि मुझे मुकम्मल मर्द बनना है।

माया के रसीले होंठों को जैसे ही मैंने अपने होंठों से छुआ तो मेरे जिस्म में एक सुखद अनुभूति हुई। जीवन में पहली बार मैं किसी लड़की के होठों पर अपने होठ रखे हुए था। मैं बयां नहीं कर सकता था कि उस वक्त मुझे कितना अच्छा महसूस हुआ था। उसके बाद तो जैसे सब कुछ अपने आप ही होता चला गया। माया के होठों में शराब से भी ज़्यादा नशा था जिसने मुझे मदहोश करना शुरू कर दिया था। मेरे अंदर लेश मात्र भी कहीं शर्म नहीं रह गई थी बल्कि जिस्म का हर रोयां मदहोशी में ये कह उठा कि अब रुकना नहीं क्योंकि इसमें उन्हें बेहद मज़ा आने लगा है।

माया कुछ पलों तक बुत सी बनी रही और जब मैंने उसके होठों को अपने मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दिया तो जैसे उसे होश आया। उसने फ़ौरन ही अपने दोनों हाथों से मेरे सिर को थाम लिया और मेरे बालों में उंगलियां फिराते हुए मेरा साथ देने लगी। उधर माया के शहद जैसे मीठे होठों को चूसने में मुझे इतना मज़ा आने लगा था कि मैं एकदम से पागलों की तरह उन्हें चूसे ही चला जा रहा था। मेरे पूरे जिस्म में मज़े की लहर जैसे सागर की लहरों की तरह हिलोरें ले रही थी।

मुझे कोई होश नहीं था कि माया के होठों को चूसते हुए मैं किस हद तक जुनूनी हो उठा था। मुझे उसके होठ इतने मीठे और लजीज़ लग रहे थे कि मैं बस उन्हें खा ही जाना चाहता था। कुछ ही पलों में मेरी साँसें मेरे काबू से बाहर होने लगीं लेकिन मैं रुका तब भी नहीं बल्कि लगा ही रहा। उधर माया की भी साँसें भारी हो चलीं थी लेकिन वो भी मुझे रोक नहीं रही थी बल्कि मेरी तरह वो भी मेरा साथ दे रही थी। हम दोनों बेड पर बैठे हुए थे और मैं इस हद तक जूनून के हवाले हो चुका था कि प्रतिपल मैं उसके ऊपर हावी होता जा रहा था जिसका नतीजा ये निकला की कुछ ही देर में मैंने माया को उसी बेड पर गिरा दिया।

माया बेड पर सीधा गिरी तो हम दोनों के होठ एक दूसरे के होठों से अलग हो गए। होठ अलग हुए तो जैसे एक तूफ़ान कुछ पलों के लिए थम सा गया। मैंने आँखें खोल कर माया की तरफ देखा तो बेड पर लेटी हुई मुझे दो दो माया नज़र आ रही थी। मैं समझ न पाया कि ये माया के होठों को चूसने से उसका नशा मुझ पर चढ़ गया था या सच में दो दो माया प्रकट हो गईं थी। मैंने नशे की खुमारी जैसे आलम में उसकी तरफ देखा तो मेरी नज़र उसकी ब्रा में कैद बड़ी बड़ी चूचियों पर पड़ी जो तेज़ चलती साँसों की वजह से जल्दी जल्दी ऊपर नीचे हो रहीं थी।

माया की चूचियों ने भी जैसे मुझे मूक आमंत्रण दे दिया और मैंने भी उनके आमंत्रण को नहीं ठुकराया बल्कि आव देखा न ताव एक झटके से उन पर टूट पड़ा। माया की चूचियों पर रेशमी कपड़े की ब्रा इस तरह से बंधी हुई थी कि उसके किनारों से उसकी आधे से ज़्यादा चूचियां बाहर को झाँक रहीं थी। मैंने अपने दोनों हाथों से उन्हें थाम लिया। मुझे अपनी हथेलियों में ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी बहुत ही मुलायम चीज़ पर मेरा हाथ पड़ गया हो जिसके एहसास ने मेरे जिस्म के हर ज़र्रे पर एक बार फिर से मज़े की लहरों को दौड़ा दिया। मैंने माया की दोनों चूचियों को मुट्ठी में भरा और ज़ोर ज़ोर से मसलना शुरू कर दिया जिसकी वजह से माया के मुख से सिसकियों के साथ साथ दर्द में डूबी मीठी सी कराहें निकलने लगीं।

माया ने एक बार फिर से मेरे सिर को थाम लिया और मेरे चेहरे को अपनी छातियों की तरफ झुकाने लगी। उसके झुकाने से मैं समझा तो कुछ नहीं लेकिन इतना ज़रूर हुआ कि मैं उसकी चूचियों के खुले हुए हिस्से को ज़रूर चूमने और चाटने लगा था। कुछ देर उसकी चूचियों को चाटने के बाद मैंने चेहरा उठाया और उस रेशमी कपड़े की ब्रा के ऊपर से ही माया की एक चूची को मुँह में भर कर ज़ोर से काट लिया जिससे माया की घुटी घुटी सी चीख निकल गई और वो एकदम से उछल पड़ी।

"आह्ह्ह्ह इतनी ज़ोर से मत काटो डियर।" माया ने कराहते हुए कहा_____"ये तो सलीके से प्यार करने वाली चीज़ है। इन्हें जितना प्यार करोगे उतना ही हम दोनों को मज़ा आएगा। अभी प्यार वाला सेक्स करो उसके बाद अगर तुम्हारा दिल करे तो वहशीपन वाला भी कर लेना।"

माया की इन बातों का मैंने कोई जवाब नहीं दिया बल्कि उसकी बात मान कर उसकी चूची को काटना बंद कर दिया। उसकी बातों ने एक पल के लिए मुझे होश में ला दिया था और उस एक पल ने मुझे ये भी एहसास करा दिया था कि मुझे इस तरह किसी के कोमल अंगों को काटना नहीं चाहिए। ख़ैर मैंने अपने ज़हन से इस बात को झटका और फिर से माया की चूचियों को दबाना और मसलना शुरू कर दिया। मुझे माया की बड़ी बड़ी खरबूजे जैसी चूचियों को दबाने और मसलने में बड़ा ही मज़ा आ रहा था। मन कर रहा था कि मैं उन्हें मसलता ही रहूं। एकाएक मुझे ख़याल आया कि मुझे माया की चूचियों से उस रेशमी कपड़े को हटा देना चाहिए क्योंकि अभी तक मैंने माया की चूचियों को पूरी तरह नंगा नहीं देखा था। ये सोच कर मैंने फ़ौरन ही माया की चूचियों से उस रेशमी कपड़े वाली ब्रा को पकड़ कर ऊपर खिसका दिया जिससे माया की दोनों खरबूजे जैसी चूचियां उछल कर मेरी आँखों के सामने आ ग‌ईं।

दूध की तरह गोरी चूचियों को देखते ही मुझे मेरा गला सूखता हुआ सा प्रतीत हुआ। मैंने लपक कर उसकी एक चूची के भूरे निप्पल को पूरा ही मुँह में भर लिया और उसे इस तरह से चूसना शुरू कर दिया जैसे कोई छोटा सा बच्चा अपनी मां का दूध निचोड़ निचोड़ कर पीना शुरू कर देता है। हालांकि माया के निप्पल से दूध नहीं निकल रहा था लेकिन मैं किसी बच्चे की तरह ही चूसे जा रहा था और उधर माया भी मेरे सिर पर वैसे ही प्यार से हाथ फेरने लगी थी जैसे वो मुझे अपना बच्चा समझ कर मुझे अपना दूध पिला रही हो। काफी देर तक मैं माया की उस चूची को चूसता रहा और माया मेरे सिर पर अपना हाथ फेरते हुए सिसकारियां भरती रही उसके बाद मैंने उसकी दूसरी चूची के निप्पल को भी मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दिया।

मज़ा अथवा आनंद क्या होता है ये मैं आज महसूस कर रहा था। अपनी कल्पनाओं में मैंने न जाने कितनी ही बार अलग अलग लड़कियों को सोच कर उनके साथ न जाने क्या क्या किया था लेकिन जो मज़ा हक़ीक़त में मिल रहा था वो मेरी कल्पनाओ में तो हो ही नहीं सकता था।

"तुम तो किसी बच्चे की तरह मेरी चूचियों को पी रहे हो डियर।" माया ने मेरे सिर पर वैसे ही प्यार से हाथ फेरते हुए कहा_____"जबकी तुम्हें एक मर्द की तरह मेरे साथ पेश आना चाहिए। तुम ये मत भूलो कि तुम्हें एक मुकम्मल मर्द बनना है और हर औरत को सेक्स में संतुष्ट करना है।"

"मैं भूला नहीं हूं इस बात को।" मैंने उसकी चूची से अपना चेहरा उठा कर उससे कहा____"लेकिन इस वक़्त मैं सिर्फ वो कर रहा हूं जिसे मैंने पहले कभी नहीं किया था। पहले मुझे जी भर के एक लड़की के इन खूबसूरत अंगों को देखने के साथ साथ प्यार तो कर लेने दो उसके बाद मैं एक मर्द की तरह भी तुमसे पेश आऊंगा।"

"अच्छा तो ये बात है।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा____"चलो कोई बात नहीं। तुम पहले अपनी उन हसरतों को ही पूरा कर लो जिन्हें पूरा करने की तुमने अपने मन में ख़्वाहिश की रही होगी। मुझे इसमें कोई ऐतराज़ नहीं है।"

माया की बात सुन कर मैंने उसे शुक्रिया कहा और इस बार थोड़ा ऊपर खिसक कर मैंने फिर से उसके रसीले होठों को मुँह में भर लिया। वो कहते हैं न कि सूखी रोटियां खाने वाले को जब घी में सनी हुई गरमा गरम रोटियां मिलती हैं तो वो उन पर ऐसे टूट पड़ता है जैसे दोबारा उसे वैसी रोटियां नसीब ही नहीं होंगी। मेरी हालात भी कदाचित वैसी ही थी। हालांकि सच में ऐसा नहीं था बल्कि सच तो ये था कि अब से तो मेरे नसीब में न जाने ऐसे कितने ही जिस्म मिलने वाले थे जिनके साथ मुझे मज़े भी करना था और उन जिस्मों की मालकिनों को संतुष्ट भी करना था।

माया के होठों का जाम पीने के बाद मैं फिर से नीचे आया और एक बार फिर से उसकी दोनों चूचियों को मसलते हुए उन्हें चूमने चाटने लगा। किसी भी लड़की या औरत की सुडौल चूचियां मुझे सबसे ज़्यादा पसंद थीं और सबसे ज़्यादा आकर्षित भी करती थीं। मैं अक्सर ये तक सोच बैठता था कि काश इतनी खूबसूरत चूचियां मेरे सीने में भी होतीं तो मैं दिन रात उन्हें अपने हाथों में ले कर सहलाता रहता।

कुछ देर मैंने माया की दोनों चूचियों को मसला और चूमा चाटा उसके बाद मैं नीचे की तरफ बढ़ा। मेरा लंड न जाने कब से मुझसे रहम की भीख मांग रहा था जिस पर मेरा कोई ध्यान ही नहीं था। मैं तो अभी अपनी ख़्वाहिश ही पूरी करने में लगा हुआ था। उसकी ख़्वाहिशों का ख़याल तो मुझे बाद में ही आना था। नीचे आया तो देखा माया का चिकना पेट दूध की तरह गोरा था जिस पर एक गहरी सी नाभि थी। मुझसे रहा न गया तो मैंने फ़ौरन ही उसके पेट पर अपना चेहरा रख दिया और मुँह से उसके पूरे पेट को चूमने चाटने लगा। मेरी इस क्रिया से माया की एक बार फिर से सिसकियां निकलने लगीं और उसका जिस्म झटका सा खाने लगा। मैं उसके पूरे पेट को चूमा और चाट रहा था। उसकी नाभि के चारो तरफ मैं अपनी जीभ फिरा रहा था। ये सब करना मुझे पहले से पता था। ऐसा नहीं था कि मैं एकदम से ही अनाड़ी था। हम सभी दोस्त गन्दी गन्दी किताबों में ये सब बहुत बार देख और पढ़ चुके थे। इस लिए मुझे अच्छी तरह पता था कि लड़कियों के साथ क्या क्या किया जाता है। ये तो हमारी ख़राब किस्मत ही थी कि शर्मीले स्वभाव की वजह से कभी भी किसी लड़की के साथ सेक्स करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था।

मैंने माया की गहरी नाभि में अपनी पूरी जीभ घुसा दी तो माया ने फ़ौरन ही अपने दोनों हाथों से मेरे सिर को पकड़ लिया और उसे अपने पेट पर दबाने लगी। शायद मेरे ऐसा करने से उसे भी बेहद मज़ा आने लगा था। उसका पेट बड़ी तेज़ी से सांस लेने की वजह से ऊपर नीचे हो रहा था। नाभि के नीचे रेशमी कपड़े की ही उसकी पेंटी थी जहां से बड़ी ही मादक खुशबू आ रही थी। मैंने उन गन्दी किताबों में पढ़ा था कि जब लड़की हद से ज़्यादा गरम हो जाती है या उत्तेजित हो जाती है तो उसकी चूत से कामरस का रिसाव होने लगता है और ये खुशबू उसी कामरस से निकल कर आती है। मेरे मन में ये देखने की बड़ी तीव्र जिज्ञासा जाग उठी कि एक लड़की की चूत किस तरह की होती है। हालांकि गन्दी किताबों में मैंने चूत देखी थी लेकिन असलियत में तो मैंने कभी नहीं देखा था।

चूत को देखने की हसरत जब प्रबल हो उठी तो मैंने माया के पेट से अपना चेहरा उठा कर चूत की तरफ बढ़ाना शुरू कर दिया। मेरा दिल अनायास ही तेज़ी से धड़कने लगा था। मेरे अंदर अब डर या घबराहट जैसी कोई बात नहीं रह गई थी। ऐसा शायद इस लिए कि अब मैं माया के साथ इस क्षेत्र में आगे निकल चुका था और मुझे किसी भी तरह से रोका नहीं गया था। चूत के ऊपर रेशमी कपड़े की पेंटी के पास जैसे ही मेरा चेहरा आया तो मेरे नथुनों में कामरस की खुशबू और भी तेज़ी से समाने लगी जिसकी वजह से मुझ पर एक अजीब सा नशा चढ़ने लगा।

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"ट्रिन्निंग...ट्रिन्निंग" अचानक ही टेबल पर रखे फ़ोन की घंटी ज़ोरों से बज उठी तो डायरी में विक्रम सिंह की कहानी पढ़ रहा शिवकांत वागले जैसे उछल ही पड़ा। उसने फ़ोन को बड़े ही गुस्से से देखा। उसके चेहरे पर बेहद ही अप्रसन्नता के भाव उभर आए थे। वो कहानी पढ़ने में इतना खो गया था कि इस वक़्त उसे फ़ोन का एकाएक इस तरह बज उठना बहुत ही नागवार गुज़रा था। कहानी इस वक़्त ऐसे मुकाम पर थी कि उसके असर से खुद वागले का जिस्म गरम हो उठा था और उसके पैंट में उसके खड़े हुए लंड का उभार साफ़ दिख रहा था।

"हैलो।" फिर उसने किसी तरह अपने गुस्से वाले भावों को दबाते हुए फ़ोन को उठा कर कान से लगाते हुए कहा तो उधर से उसके कान में उसके बेटे चंद्रकांत वागले की आवाज़ पड़ी।

"हैलो पापा मैं चंद्रकांत बोल रहा हूं।" उधर से उसके बेटे ने कहा____"आज आप सुबह ब्रेकफास्ट कर के नहीं गए और ना ही श्याम को दोपहर का खाना लाने के लिए भेजा।"

"हां वो मुझे किसी ज़रूरी काम से सुबह जल्दी ही निकलना था।" शिवकांत भला अब अपने बेटे से क्या कहता, इस लिए बहाना बनाते हुए आगे कहा_____"और दोपहर में भी मुझे अपने ऑफिस में नहीं रहना था इस लिए श्याम को नहीं भेजा। ख़ैर तुम फ़िक्र मत करो बेटा। मैंने बाहर ही लंच कर लिया है।"

शिवकांत वागले ने इतना कहने के बाद फोन का रिसीवर केड्रिल पर रख दिया। वो जानता था कि ये फ़ोन उसकी बीवी सावित्री ने अपने बेटे से लगवाया था और उसे इस बात से ये सोच कर बुरा भी लगा था कि सावित्री ने खुद उससे बात क्यों नहीं की? वो सावित्री से नाराज़ था और चाहता था कि सावित्री खुद उसे मनाए लेकिन ऐसा फिलहाल हुआ नहीं था। ख़ैर फ़ोन रखने के बाद वागले कुछ देर जाने क्या सोचता रहा उसके बाद उसने विक्रम सिंह की डायरी को ब्रीफ़केस में रखा और श्याम को बुला कर उसे किसी ढाबे से खाना लाने के लिए पैसे दिए। उसने श्याम को ख़ास तौर पर ये कहा कि वो अपनी मैडम से यानी वागले की बीवी से इस बात को न बताए कि वो आज कहां गया था या उसने कहां खाना खाया था? श्याम जो कि जेल का ही एक मामूली सा सिपाही था उसने वागले के कहने पर अपना सिर हां में हिलाया और केबिन से बाहर चला गया।

श्याम के आने के बाद वागले ने खाना खाया और जेल का चक्कर लगाने के लिए निकल गया। करीब एक घंटे बाद वागले अपने केबिन में आया और ब्रीफ़केस से विक्रम सिंह की डायरी निकाल कर उसे फिर से पढ़ने लगा।

☆☆☆
 
रेशमी कपड़े वाली पैंटी में छुपी माया की चूत से बड़ी ही मादक खुशबू आ रही थी जो मुझे प्रतिपल मदहोश सा किए जा रही थी। रेशमी कपड़े वाली पैंटी का रंग सुनहरा था जो माया की चूत को ढंकने में सक्षम तो था किन्तु पूरी तरह से नहीं। उस पैंटी के किनारों से माया की चूत के अगल बगल वाला हल्का सुर्ख भाग साफ़ दिख रहा था जिससे मेरे दिल की धड़कनें एकदम से थमने लगीं थी। सुनहरे कपड़े की वजह से मुझे माया का कामरस तो नज़र न आया लेकिन चूत पर चिपके होने की वजह से मुझे समझने में ज़रा भी देरी नहीं हुई कि माया इस वक़्त बेहद गरम हो चुकी है जिसकी वजह से उसका कामरस उसकी पैंटी को इस कदर भिगो दिया है जिससे उसकी पैंटी उसकी चूत पर चिपक गई है।

कुछ पलों तक मैंने गौर से उस चिपके हुए सुनहरे कपड़े को देखा और फिर हल्के से मैंने उस कपड़े पर यानी कि माया की चूत पर अपना चेहरा रख दिया। पहले तो मेरे चेहरे पर हल्का सा ठण्डा एहसास हुआ और फिर जैसे ही मेरा चेहरा पूरी तरह माया की चूत पर धर गया तो मेरे होठों और नाक पर गर्मी का एहसास हुआ। माया की चूत मानो धधक रही थी। मेरे पूरे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई और अचानक ही जाने मुझे क्या हुआ कि मैंने अपनी जीभ निकाली और उस गीले सुनहरे कपड़े को चाटने लगा। मुझे मेरी जीभ में बड़े ही अजीब से स्वाद का एहसास हुआ जो खारा भी था और थोड़ा खट्टा भी था। उधर मेरे जीभ द्वारा इस तरह चाटने से माया के जिस्म में भी झटका लगा था और उसने फ़ौरन ही अपने दोनों हाथ बढ़ा कर मेरे सिर को पकड़ कर अपनी चूत पर दबा लिया। एक तरफ से उसने अपनी दोनों टांगों को उठा कर मेरे सिर के दोनों तरफ से मेरे सिर को ही जकड़ लिया था।

मैं माया की चूत से निकले उस खटमिट्ठे कामरस को इस तरह चाटे जा रहा था जैसे वो मेरे लिए कोई अमृत था। उधर माया ज़ोर ज़ोर से सिसकियां लेते हुए मेरे सिर को हाथों से दबाए जा रही थी और साथ ही साथ अपनी टांगों की जकड़न को और भी बढ़ाती जा रही थी। मैं काफी देर तक माया की चूत को चाटता रहा उसके बाद मैंने अपने दाहिने हाथ की ऊँगली से माया की चूत को ढंके उस गीले रेशमी कपड़े को हटाया तो मेरी आँखों के सामने एक ऐसी चीज़ नज़र आई जो गुलाबी रंग की थी और उस पर न तो कहीं किसी बाल का एक रेशा था और ना ही कोई दाग़ था। एकदम चिकनी और गुलाबी चूत को मैं इस तरह देखने लगा था जैसे उसने मुझे अपने सम्मोहन में ले लिया हो। तभी माया ने मेरे सिर को फिर से अपनी चूत की तरफ दबाया तो मुझे होश आया।

मैंने किसी तरह चेहरा उठा कर माया की तरफ देखा। माया बेड पर आँखे बंद किए लेटी हुई थी। उसके चेहरे के भाव साफ़ साफ़ बता रहे थे कि इस वक़्त वो किस दुनियां में डूबी हुई है। चेहरे के नीचे उसकी पर्वतों की तरह शिखर वाली दूधिया चूचियां उसके ज़रा से हिलने पर थिरक जाती थी। मेरे जिस्म में ये सब देख कर एक रोमांच की लहर दौड़ गई और मैंने दोनों हाथ बढ़ा कर झट से उसकी दोनों चूचियों को पकड़ कर मसलना शुरू कर दिया। माया के मुख से सिसकियां निकलने लगी। उसने एक हाथ से मेरे सिर को अपनी चूत पर दबाया और दूसरे हाथ को ले कर मेरे उन हाथों पर रख लिया जिन हाथों से मैं उसकी बड़ी बड़ी चूचियां मसले जा रहा था।

माया ने अपने एक हाथ से मेरे सिर को अपनी चूत पर दबाया तो मैंने उसकी चूत को फिर से चूमना चाटना शुरू कर दिया। इस बार मेरी जीभ उसकी चूत की फांकों को खोल भी रही थी और उस पर घर्षण भी करती जा रही थी। माया की चूत बेहद गरम थी जिसका ताप मुझे अपनी जीभ पर महसूस हो रहा था। जीवन में मैं पहली बार किसी लड़की की चूत पर अपनी जीभ फिरा रहा था। मैं अक्सर सोचा करता था कि किताबों में जिस तरह लिखा होता है कि मर्द औरत की चूत को बड़े ही मज़े से चाटते हैं तो क्या ये सच में ऐसा ही होता होगा? क्या मर्द को किसी औरत की चूत चाटने में घिन न लगती होगी? आख़िर कोई मर्द औरत की उस जगह को कैसे इतना मज़े से चाट सकता है जिस जगह से औरत पेशाब करती है? ये तो हद दर्ज़े की घिनौनी बात हुई लेकिन इस वक़्त मेरी ये सोच जाने कहां गुम हो गई थी? इस वक़्त तो मैं ख़ुद ही माया की चूत को ये सोच कर मज़े से चाटे जा रहा था कि वो कोई अमृत है और उस अमृत को चाटने से मैं अमर हो जाऊंगा।

मैं इतने जुनूनी अंदाज़ से माया की चूत चाटे जा रहा था कि माया का कुछ ही देर में बुरा हाल हो गया। वो अपनी कमर को हवा में उठा उठा कर बेड पर पटकने लगी थी और साथ ही मेरे सिर को पूरी ताकत से अपनी चूत पर घुसेड़े दे रही थी। मेरा पूरा चेहरा माया के कामरस से लिसलिसा हो गया था जिसकी मुझे कोई ख़बर ही नहीं थी। एकाएक ही मैंने महसूस किया कि माया का जिस्म एकदम से अकड़ गया है और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता माया के जिस्म को झटके लगने शुरू हो ग‌ए। झटकों के साथ ही माया की चूत से ढेर सारा कामरस निकल कर मेरे मुँह में भरने लगा। अपने मुँह में आए इस गाढ़े और गरम कामरस से मैं एकदम से बौखला गया और जल्दी से अपना सिर माया की चूत से हटाना चाहा लेकिन तभी माया ने अपनी दोनों टांगों के बीच फंसे मेरे सिर को और भी बुरी तरह से जकड़ लिया। मैंने बहुत कोशिश की लेकिन मैं माया की पकड़ से अपना सिर आज़ाद न कर सका। इस वक़्त माया में जाने कहां से इतनी ताकत आ गई थी कि उसने मुझे बुरी तरह अपनी टांगों के बीच जकड़ लिया था। मरता क्या न करता वाली हालत में मैं वापस ढीला हो कर उसकी बहती चूत पर ढेर हो गया। कुछ देर बाद जब माया के जिस्म पर लगने वाले झटके बंद हुए तो माया की जकड़ अपने आप ही ढीली पड़ती चली गई। माया की जकड़ ढीली हुई तो मैंने फ़ौरन ही अपना सिर उसकी चूत से उठा कर उसकी तरफ देखा।

मैं तो बुरी तरह हांफ ही रहा था लेकिन माया मुझसे कहीं ज़्यादा बुरी तरह हांफ रही थी। आँखें बंद किए वो इस तरह पड़ी थी जैसे उसमें अब कोई शक्ति ही न बची हो। लम्बी लम्बी सांस लेने की वजह से उसकी छातियां ऊपर नीचे हो रहीं थी। मैं भौचक्का सा माया की तरफ देखे जा रहा था। तभी मुझे अपने चेहरे और होठों पर चिपचिपा सा महसूस हुआ तो मेरा हाथ मेरे चेहरे पर गया। मैंने अपने चेहरे और मुँह के आस पास हाथ फिराया तो मुझे एहसास हुआ कि मेरा चेहरा तो माया के कामरस से पूरी तरह सन गया है।

काफी देर बाद जब माया की हालत ठीक हुई तो उसने अपनी आँखें खोल कर मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में मेरे लिए मुझे ढेर सारा प्यार झलकता हुआ नज़र आया। मैंने जब उसकी तरफ देखा तो उसके होठों पर गहरी मुस्कान उभर आई। कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहने के बाद वो उठी और झपट कर मुझे अपने गले से लगा लिया।

"ओह! तुम तो कमाल हो डियर।" फिर उसने मीठे स्वर में कहा_____"मैं सोच भी नहीं सकती थी कि तुम पहली बार में ही मुझे इस तरह से ढेर कर दोगे। मैं हैरान हूं कि ये सब तुमने पहली बार में कैसे कर लिया?"

"मुझे नहीं पता।" मैंने धीमे स्वर में कहा_____"पता नहीं क्या हो गया था मुझे? मैं खुद अपने आप पर हैरान हूं कि ये सब मैंने कैसे किया?"

"तुमने मुझे असीम सुख दिया है डियर।" माया ने मुझे खुद से अलग करने के बाद मेरे चेहरे को अपनी हथेलियों में लेते हुए कहा____"मैंने ट्रेनिंग के दौरान न जाने कितने ही मर्दों के साथ सेक्स किया है लेकिन बिना सेक्स किए इस तरह से पहली बार मुझे इतना आनंद मिला है। मेरा रोम रोम अभी भी उस मज़े को महसूस कर के आनंदित हो रहा है। तुम सच में छुपे रुस्तम हो डियर। मुझे तो लगता है कि तुम्हें कुछ सुखाने की ज़रूरत ही नहीं है बल्कि तुम्हें तो सब कुछ आता है। ख़ैर अच्छा है कि तुम्हें ये सब करना आता है। चलो अब मैं भी तुम्हें वैसा ही सुख और वैसा ही आनंद देती हूं जैसा तुमने मुझे दिया है।"

"पहले मुझे अपना चेहरा तो अच्छे से साफ़ कर लेने दो।" मैंने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा_____"तुम्हारे कामरस से मेरा पूरा चेहरा ही भींग गया है। तुमने मुझे अपनी टांगों के बीच में इस तरह जकड़ लिया था कि मैं चाह कर भी अपना चेहरा तुम्हारी टांगों से छुड़ा नहीं पाया।"

"ओह! माफ़ करना डियर।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा_____"उस वक़्त मैं मज़े के सातवें आसमान में थी जिसकी वजह से मुझे किसी चीज़ का होश ही नहीं रह गया था। ख़ैर तुम चिंता मत करो, मेरी वजह से अगर तुम्हारा चेहरा ख़राब हुआ है तो मैं ही इसे साफ़ भी करुंगी।"

कहने के साथ ही माया ने मुझे बेड पर लिटा दिया और मेरी आँखों में देखते हुए वो मेरे चेहरे पर झुकती चली गई। मेरी धड़कनें ये सोच कर फिर से बढ़ चलीं कि अब माया मेरे साथ क्या क्या करेगी? उसके झुकने से मेरी आँखें अपने आप ही बंद हो गईं और तभी मेरे होठों पर उसके बेहद ही मुलायम होठों का गरम स्पर्श महसूस हुआ जिससे मेरे पुरे जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई। माया ने पहले दो तीन बार मेरे होठों को चूमा और फिर अपनी जीभ निकाल कर मेरे चेहरे के हर हिस्से पर फिराने लगी। मैं समझ गया कि वो मेरे चेहरे पर लगे अपने कामरस को चाट चाट कर मेरा चेहरा साफ़ कर रही है। मैं ये सोच कर बेहद ही रोमांचित हो उठा कि एक लड़की अपना ही कामरस चाट रही है।

मेरे जिस्म में मज़े की लहरें दौड़ने लगीं थी जिसकी वजह से फ़ौरन ही मेरा लंड तन कर खड़ा हो गया। माया मेरे बाएं तरफ बेड पर अधलेटी सी थी इस लिए शायद उसे मेरा खड़ा हुआ लंड नहीं दिख रहा था। माया पूरी तन्मयता से मेरे चेहरे पर लगे अपने कामरस को चाट रही थी और मैं उसके इस तरह चाटने से बेहद ही आनंद का अनुभव कर रहा था। उसकी चूचियां मेरे सीने पर कभी छू जातीं तो कभी धंस जातीं जिससे मेरा मज़ा दुगुना हो जाता था। कुछ देर बाद जब माया ने मेरे चेहरे से अपना सारा कामरस चाट लिया तो वो मेरे होठों को चूमते हुए मेरे गले की तरफ बढ़ी और गले से फिर सीने पर आ गई। माया मेरे सीने के हर हिस्से पर अपनी जुबान फेर रही थी और जब उसकी जुबान मेरे निप्पल पर चलती तो मेरे जिस्म का रोयां रोयां मज़े की तरंग में नाच उठता। मेरा लंड तो मज़े की इस तरंग में झटके पर झटके खा रहा था। मुझसे रहा न गया तो मैंने अपने दोनों हाथों से माया के सर को थाम लिया।

मेरे पूरे जिस्म को चूमते चाटते माया मेरे झटका खाते हुए लंड पर पहुंच ग‌ई। उसने अपने कोमल हाथों से जब मेरे लंड को पकड़ा तो मेरे जिस्म में एक बार फिर से झुरझुरी हुई। मैंने बड़ी मुश्किल से आँखें खोल कर माया की तरफ देखा। वो मेरे लंड को सहलाते हुए मुझे ही देख रही थी। मेरी नज़र जब उससे मिली तो उसके होठों पर मुस्कान उभर आई। उसने अपने जिस्म से पता नहीं कब अपनी ब्रा और पैंटी को उतार कर फेंक दिया था जिसकी वजह से उसकी बड़ी बड़ी चूचियां मुझे साफ़ दिख रहीं थी। उसकी दोनों चूचियां मेरे मसलने से लाल सुर्ख पड़ गईं थी और एक चूची पर तो मेरे काटने का निशान भी दिख रहा था। मैं अपने काटे हुए निशान को देख कर मुस्कुरा उठा। मुझे मुस्कुराते देख उसने इशारे से ही पूछा कि क्या हुआ तो मैंने न में सिर हिला कर इशारे से ही बताया कि कुछ नहीं।

मेरे देखते ही देखते माया मेरे लंड पर झुकी और अपना मुँह खोल कर उसने मेरे लंड के मोटे से टोपे को अपने मुँह में भर लिया। उसके गरम गरम मुँह पर जैसे ही मेरा लंड घुसा तो मज़े से मेरी आँखें फिर से बंद हो गईं। उधर उसने मेरे टोपे को मुँह में भरने के बाद अंदर ही अपनी जीभ से उसके छेंद को कुरेदना शुरू कर दिया जिसकी वजह से मेरे मुँह से सिसकियां निकलने लगीं। मज़े की तरंग ने मुझे एक झटके से सातवें आसमान में पंहुचा दिया। कुछ देर अपनी जीभ से मेरे लंड के छेंद को कुरेदने के बाद माया ने मेरे लंड को मुँह से निकाल दिया। उसके ऐसा करने से मैंने एकदम से अपनी आँखें खोल कर उसकी तरफ देखा। असल में मैं चाहता था कि अभी जिस मज़े में मैं पहुंच गया था उसी मज़े में मैं डूबा रहूं। मेरी तरफ देख कर माया शायद मेरे मनोभावों को समझ गई थी इस लिए उसने फिर से मेरे लंड को अपने मुँह में भर लिया।

मेरा लंड इतना मोटा और बड़ा था कि उसके मुँह में उसका टोपा ही समा पा रहा था। माया ने कोशिश करते हुए टोपे के साथ साथ मेरे लंड के कुछ और हिस्से को अपने मुँह के अंदर लिया और फिर अपना सिर नीचे ऊपर करते हुए मेरे लंड को कुल्फी की तरफ चूसने लगी। उसके गरम गरम मुख में मेरा लंड था और इसके बारे में सोच कर ही मैं मज़े के सागर में मानो गोते लगाने लगा था। मैंने फ़ौरन ही अपने हाथों को बढ़ा कर माया के सिर को पकड़ा और उसे अपने लंड पर दबाने लगा।

मज़े की तरंग में प्रतिपल मैं अपने होश खोता जा रहा था और पूरा ज़ोर लगा कर माया के मुँह में अपने लंड को और भी अंदर घुसेड़ता जा रहा था। आँखें बंद किए मैं अपनी कमर को उठा उठा कर माया के मुँह में अपना लंड पेल रहा था। मेरे मुँह से मज़े में डूबी सिसकारियां पूरे कमरे में गूंजने लगीं थी और उसी के साथ मेरी भारी होती साँसें भी। मुझे अब इस बात का कोई इल्म नहीं था कि मेरे इस तरह ज़ोर देने पर माया की क्या हालत हुई जा रही होगी बल्कि मुझे तो इस वक़्त सिर्फ अपने मज़े की ही पड़ी थी। मेरे जिस्म का लहू बड़ी तेज़ी से मेरे लंड की तरफ दौड़ता हुआ जा रहा था। उधर माया के मुँह से अजीब अजीब सी आवाज़ें निकल रही थी और मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वो मेरे लंड को अपने मुँह से निकालने की ज़द्दो जहद कर रही हो। अचानक ही उसने अपने दांत मेरे लंड पर गड़ाए तो मेरे मुख से घुटी घुटी सी चीख निकल गई और मैंने झट से उसके सिर को छोड़ दिया।

माया ने एक झटके से मेरे लंड को अपने मुँह से निकाल दिया। मैंने झटके से आँखें खोल कर उसकी तरफ देखा तो चौंक गया। उसका चेहरा बुरी तरह लाल सुर्ख पड़ा हुआ था और वो बुरी तरह हांफ रही थी। उसकी आँखों से आंसू के कतरे बहे हुए दिख रहे थे। उसकी हालत देख कर मैं ये सोच कर एकदम से घबरा गया कि इसे क्या हो गया है?

"तुम तो मेरी जान ही लेने पर उतारू हो गए डियर।" उसने अपनी उखड़ी हुई साँसों को सम्हालते हुए और ज़बरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा_____"मज़े की तरंग में इतना भी अपना होश नहीं खो देना चाहिए कि अपने सेक्स पार्टनर का कोई ख़याल ही न रह जाए।"

"म..मुझे माफ़ कर दो।" मैंने जल्दी से उठ कर उससे शर्मिंदा हो कर कहा_____"मुझे सच में इस बात का ख़याल ही नहीं रह गया था कि अपने मज़े में मैं तुम्हें तक़लीफ दिए जा रहा हूं। प्लीज़ मुझे माफ़ कर दो। अब से ऐसा नहीं होगा।"

"कोई बात नहीं डियर।" माया ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"मैं समझ सकती हूं कि पहली बार में ये सब तुमसे अंजाने में हो गया है। ख़ैर चलो फिर से शुरू करते हैं।"

माया की बात सुन कर मैंने राहत की सांस ली और सिर को हिलाते हुए चुप चाप बेड पर लेट गया। मेरे लेटते ही माया ने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी तरफ देखते हुए उसने मेरे लंड को फिर से थाम लिया। मेरा लंड थोड़ा ढीला सा पड़ गया था जोकि उसके हाथ में आते ही फिर से ठुमकने लगा था।

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अध्याय - 08

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अब तक,,,,,

"कोई बात नहीं डियर।" माया ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"मैं समझ सकती हूं कि पहली बार में ये सब तुमसे अंजाने में हो गया है। ख़ैर चलो फिर से शुरू करते हैं।"

माया की बात सुन कर मैंने राहत की सांस ली और सिर को हिलाते हुए चुप चाप बेड पर लेट गया। मेरे लेटते ही माया ने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी तरफ देखते हुए उसने मेरे लंड को फिर से थाम लिया। मेरा लंड थोड़ा ढीला सा पड़ गया था जोकि उसके हाथ में आते ही फिर से ठुमकने लगा था।

अब आगे,,,,,

माया बड़े प्यार से मेरी तरफ देखते हुए मेरा लंड सहलाए जा रही थी और मैं आँखें बंद कर के ये सोचने लगा था कि साला समय भी क्या चीज़ है जिसके बारे में कोई भी इंसान ये नहीं कह सकता कि कब क्या हो जाए? मैंने तो इस बात का तसव्वुर भी नहीं किया था कि मेरे जीवन में कभी ऐसा भी वक़्त आएगा जब एक खूबसूरत लड़की मेरे लंड को इस तरह से अपने हाथ में ले कर सहलाएगी और मुझे मज़े के सातवें आसमान में पहुंचा देगी। एक वक़्त था जब मैं लड़की ज़ात से खुल कर बात करने में भी शर्माता था और आज ये वक़्त है कि वही लड़की ज़ात मुझे सेक्स का ज्ञान दे रही थी और मैं बिना शर्माए उससे अपना लंड सहलवाते जा रहा था।

मैं ये सोच ही रहा था कि तभी मेरे मुँह से मज़े में डूबी सिसकी निकल गई। माया ने मेरे लंड को अपने मुँह में भर लिया था और अब वो उसका चोपा लगा रही थी। उसने मेरे लंड को दोनों हाथों से कस कर पकड़ लिया था और मेरे लंड के टोपे को इस तरह से चूसे जा रही थी कि पूरे कमरे में दो तरह की आवाज़ें गूंजने लगीं थी। एक तो मेरी सिसकारियों की और एक उसके चोपा लगाने की। मैं एक पल में ही मज़े के सागर में गोते लगाने लगा था। मेरे अंडकोषों में बड़ी तेज़ी से झुरझुरी हो रही थी। मेरे मुँह से तेज़ तेज़ आहें और सिसकारियां निकल रहीं थी और मैं बेड पर पड़ा जैसे छटपटाने सा लगा था।

मुझसे बरदास्त न हुआ तो मैंने जल्दी से हाथ बढ़ा कर माया के सिर को पकड़ा और उसे अपने लंड से हटाने के लिए ज़ोर लगाया तो माया ने अपने मुँह से मेरे लंड को निकाल दिया और मेरी तरफ मुस्कुराते हुए देखा।

"क्या हुआ डियर?" माया ने मुस्कुराते हुए पूछा____"क्या तुम्हें मेरे ऐसा करने से मज़ा नहीं आ रहा?"

"अ..ऐसी बात नहीं है।" मैंने अपनी साँसों को और ख़ुद की हालत को काबू करते हुए कहा_____"मज़ा तो मुझे इतना आ रहा है कि मैं उसके बारे में बता ही नहीं सकता लेकिन मैं ये जानना चाहता हूं कि क्या आज सारा दिन हम यही करते रहेंगे? मेरा मतलब है कि क्या हम इसके आगे नहीं बढ़ेंगे?"

"बिल्कुल बढ़ेंगे डियर।" माया ने उसी मुस्कान के साथ कहा_____"मैं तो बस तुम्हें मज़ा देने के लिए तुम्हारे इस हलब्बी लंड को मुँह में ले कर चूस रही थी। अगर तुम्हारा मन इससे आगे बढ़ने का है तो ठीक है, चलो वही करते हैं।"

माया ने ये कहा तो मैंने खुश हो कर हां में सिर हिला दिया। असल में मैं अब सच में यही चाहता था कि अब मैं वो करूं जो हर लड़के की ख़्वाहिश होती है, यानी किसी लड़की की चूत में अपना लंड डाल कर उसे हचक हचक के चोदना। हालांकि मेरे लिए ये सब एक नया अनुभव था और मुझे इसमें बेहद मज़ा भी आ रहा था लेकिन अब ये सब मुझे ऊबता सा लगने लगा था। अब तो मुझे यही लग रहा था कि कितना जल्दी मैं इस माया की चूत में अपने लंड को डाल दूं और उसके ऊपर सवार हो कर उसकी धुआंधार चुदाई शुरू कर दूं।

"एक बात हमेशा याद रखना डियर।" माया मेरी तरफ आते हुए बोली_____"और वो ये कि तुम जिस फील्ड के लिए आए हो उसमें तुम्हें अपने मन का नहीं करना है बल्कि औरत के मन का करना होगा। औरत जिस तरह से चाहेगी तुम्हें उस तरह से उसे खुश करना होगा। औरत के खुश होने पर या संतुष्ट होने पर ही ये माना जाएगा कि तुम अपनी सर्विस देने में कामयाब हुए हो। अगर तुम्हारी वजह से कोई औरत खुश न हुई और उसने शिकायत का कोई पैग़ाम भेज दिया तो समझो कि इसके लिए तुम्हें संस्था द्वारा सज़ा भी दी जाएगी।"

"य..ये क्या कह रही हो तुम?" मैं माया की ये बातें सुन कर बुरी तरह हैरान हो गया था।

"यही सच है डियर।" माया मुझसे सट कर बैठते हुए बोली____"हालाँकि हम लोग ये बातें किसी को भी नहीं बताते लेकिन क्योंकि तुम ख़ास हो इस लिए मैंने तुम्हें बता दिया है और हां इस बात का ज़िक्र तुम संस्था में किसी से भी मत करना वरना इसका अंजाम अच्छा नहीं होगा।"

"बड़ी अजीब बात है।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा_____"क्या ये भी संस्था का कोई नियम है?"

"शायद अभी तुम्हें संस्था के सारे नियम कानून नहीं बताये गए हैं।" माया ने कहा_____"वरना मेरी बात सुन कर तुम इस तरह हैरान नहीं होते। ख़ैर कोई बात नहीं, जल्द ही तुम्हें सारे नियम कानून पता चल जाएंगे। चलो अब छोड़ो ये बातें और अपनी मर्ज़ी से वो करो जो तुम करना चाहते हो।"

माया इतना कह कर बेड पर सीधा लेट गई थी। उसका गोरा और मादक जिस्म ऐसा था कि मैं चाह कर भी उसके बदन से नज़र नहीं हटा सकता था। उसके सीने पर गर्व से तने हुए बड़े बड़े पर्वत शिखर इतने सुडौल और सुन्दर थे कि मुझसे रहा न गया। मैंने झुक कर फ़ौरन ही उसकी एक चूची के निप्पल को मुँह में भर लिया। अपने दूसरे हाथ से मैंने माया की दूसरी चूची को मसलना शुरू कर दिया। एक हाथ से मैं उसके पेट और नाभि को सहलाने लगा। माया के जिस्म में इसका असर हुआ तो उसने मेरे सिर पर अपना एक हाथ रख लिया जबकि दूसरे हाथ से उसने बेड की चादर को अपनी मुट्ठी में भर लिया।

माया की चूचियों को चूमते हुए मैं जल्दी ही नीचे आया और उसकी रस से भरी चूत को कुछ पल देखने के बाद मैंने उस पर अपना मुँह रख दिया। अपनी जीभ निकाल कर मैंने उसकी चूत की फांकों के बीच नीचे से ऊपर की तरफ फेरा तो माया के जिस्म में कंपकंपी सी हुई। इधर मेरे मुँह में उसकी चूत के रस का खटमिट्ठा स्वाद भर गया। मैंने अपने एक हाथ की दो उंगलियों से उसकी चूत की फांकों को फैलाया तो मुझे उसके अंदर सुर्ख रंग का लिसलिसा सा मंज़र नज़र आया। मेरे बदन में एक झुरझुरी सी हुई और मैंने अपनी एक ऊँगली उसके छेंद पर डाल दिया जिससे माया के जिस्म में फिर से कंपकंपी हुई। उसकी चूत में एक ऊँगली डालने के बाद मैंने उसे यूं ही अंदर घुमाया। मेरी पूरी ऊँगली उसके कामरस से भींग गई थी। मैंने ऊँगली निकाल कर देखा और उसे मुँह में भर लिया। कामरस के स्वाद से बड़ा अजीब सा एहसास हुआ मुझे। मेरा मन किया कि मैं माया की चूत को खा ही जाऊं लेकिन ऐसा करना मुमकिन नहीं था।

मैं अब और बरदास्त नहीं कर सकता था इस लिए मैं उठा और माया की दोनों टांगों को फैला कर उसके बीच में आ गया। मेरा लंड इतना कठोर हो गया था कि अब मुझे उसमें दर्द सा होने लगा था। मेरे पास किताबी ज्ञान था जिसके सहारे मैंने एक हाथ से अपने लंड को पकड़ा और दूसरे हाथ से माया की चूत की फांकों को फैला कर अपने लंड को उसके छेंद के पास टिकाया। मेरी धड़कनें इस वक़्त काफी तेज़ी से चल रहीं थी और इस वक़्त मैं अजीब ही हालत में पहुंच गया था। चूत के छेंद पर लंड के टोपे को टिका कर मैंने अपनी कमर को आगे की तरफ हल्के से ढकेला तो मेरा हाथ माया की चूत से छूट गया जिससे मेरा लंड भी फिसल गया। मैंने चेहरा उठा कर माया की तरफ देखा तो उसे अपनी तरफ ही मुस्कुराते हुए देखता पाया। उसे इस तरह मुस्कुराते देख मुझे शर्म सी महसूस हुई और मैंने फ़ौरन ही उसकी तरफ से नज़रें हटा ली।

मैंने फिर से अपने लंड को माया की चूत के छेंद पर अच्छे से टिकाया और इस बार ज़रा सावधानी से अपनी कमर को आगे की तरफ ढकेला तो मेरे लंड का टोपा उसकी चूत में घुस गया। टोपा घुसते ही मेरे होठों पर मुस्कान उभर आई और मैंने फिर से नज़र उठा कर माया की तरफ देखा। इस बार उसे मुस्कुराता देख मुझे शर्म नहीं महसूस हुई बल्कि ऐसा लगा जैसे मैंने बहुत बड़ी फ़तह हासिल कर ली हो। खै़र मेरे लंड का टोपा उसकी चूत में घुसा तो मैंने अपने लंड से अपना हाथ हटा लिया और माया की दोनों जाँघों को पकड़ कर अपनी कमर को और भी आगे की तरफ धकेला तो मेरा लंड फिर से उसकी चूत में अंदर की तरफ घुसा। मैंने महसूस किया कि माया की चूत अंदर से बेहद गरम है और उसने चारो तरफ से मेरे लंड को जकड़ लिया है।

तीन चार बार में मैंने आहिस्ता आहिस्ता अपने लंड को आधे से ज़्यादा माया की चूत में उतार दिया था। माया के मुख से हर बार सिसकी निकल जाती थी। जब मेरा लंड आधा उसकी चूत में उतर गया तो माया ने मुझे धीरे धीरे धक्का लगाने को कहा तो मैं अपनी कमर को धीरे धीरे आगे पीछे करने लगा। गीली और गरम चूत पर मेरा लंड बहुत ज़्यादा तो नहीं लेकिन कसा हुआ ज़रूर लग रहा था और जैसे जैसे मैं उसे अंदर बाहर कर रहा था वैसे वैसे मुझे मज़ा आ रहा था। देखते ही देखते मज़े में आ कर मैंने तेज़ तेज़ धक्के लगाने शुरू कर दिए। मैंने महसूस किया कि अब ये मेरे लिए मुश्किल काम नहीं है और शायद यही वजह थी कि मेरे धक्कों की रफ़्तार पहले की अपेक्षा तेज़ हो गई थी। माया की मांसल जाँघों को पकड़े मैं तेज़ तेज़ धक्के लगाए जा रहा था। हर धक्के के साथ मेरा लंड और भी गहराई में उतरता जा रहा था जिसकी वजह से माया के मुँह से सिसकारियों के साथ साथ अब आहें भी निकलने लगीं थी।

किसी लड़की के साथ चुदाई करने में सच में इतना मज़ा आता है ये मुझे अब पता चल रहा था। मेरे आनंद की कोई सीमा नहीं थी। मैं आनंद में अपने होश खोता जा रहा था और धीरे धीरे मुझमें एक जूनून सा सवार होता जा रहा था। उसी जूनून के तहत मैं और भी तेज़ी से माया की चूत में अपने लंड को अंदर बाहर करता जा रहा था। मैंने नज़र उठा कर माया की तरफ देखा तो उसे मज़े में अपनी आँखें बंद किए पाया। उसकी बड़ी बड़ी खरबूजे जैसी चूचियां मेरे हर धक्के पर उछल पड़ती थीं। चूचियों का उछलना देख कर मुझे और भी ज़्यादा जोश चढ़ गया और मैं और भी तेज़ी से धक्के लगाने लगा।

पूरे कमरे में माया की मज़े में डूबी आहें और सिसकारियां गूँज रहीं थी। बीच बीच में वो ये भी बोलती जा रही थी कि हां डियर ऐसे ही, बहुत मज़ा आ रहा है। उसके ऐसा कहने पर मैं दोगुने जोश में धक्के लगाने लगता। मैं ख़ुद भी बुरी तरह हांफने लगा था लेकिन मज़ा इतना आ रहा था कि मैं रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। काफी देर तक यही आलम रहा। उसके बाद माया ने मुझे रुकने को कहा तो मैं रुक गया। मुझे उसका यूं रोकना अच्छा तो नहीं लगा था लेकिन जब मैंने उसे घोड़ी बनते हुए देखा तो मुझे किताब में बने चित्र की याद आई और मैं मुस्कुरा उठा। घोड़ी बनते ही माया ने मुझसे कहा कि मैं पीछे से उसकी चूत में अपना लंड डाल कर चुदाई करूं तो मैंने ऐसा ही किया। मेरे मोटे लंड की वजह से उसकी चूत का छेंद खुला हुआ साफ़ दिख रहा था जिसकी वजह से मुझे उसके छेंद पर अपना लंड डालने में कोई परेशानी नहीं हुई।

माया घोड़ी बनी हुई थी और मैं उसकी कमर को दोनों हाथों से पकड़े तेज़ तेज़ धक्के लगा रहा था। काफी देर तक मैं ऐसे ही धक्के लगाता रहा। माया जब थक गई तो उसने फिर से मुझे रुकने को कहा।

"तुम सच में कमाल हो डियर।" माया ने सीधा हो कर लेटते हुए कहा_____"मैंने ऐसा मर्द नहीं देखा जिसका पहली बार में इतना गज़ब का स्टेमिना हो। काश तुम हमेशा के लिए मेरे पास ही रहते।"

"तुम एक ऐसी लड़की हो माया।" मैंने माया को उसके नाम से सम्बोधित करते हुए कहा____"जिसने मुझे जीवन में पहली बार सेक्स का इतना सुख दिया है। इस लिए तुम्हारे लिए मेरे दिल में हमेशा एक ख़ास जगह रहेगी। अगर तुम्हें संभव लगे तो मुझे ज़रूर याद करना। मैं जहां भी रहूंगा तुम्हारे पास ज़रूर आऊंगा।"

"यही तो मुश्किल है डियर।" माया ने जैसे अफ़सोस जताते हुए कहा_____"यहाँ से जाने के बाद कोई भी मर्द हमारे पास वापस नहीं आता और ना ही हमने कभी उन्हें बुलाने की कोशिश की। ऐसा नहीं है कि हमें कभी उन मर्दों की याद नहीं आती लेकिन नियम कानून के डर से हमने कभी भी उन्हें बुलाने का नहीं सोचा। दूसरी बात ये भी थी कि उनसे सम्बन्ध स्थापित करने का हमारे पास कोई जरिया नहीं था। ख़ैर छोड़ो ये सब बातें और इस असीम सुख का आनंद लो। जब तक यहाँ हो तब तक तो तुम हमारे ही रहोगे न।"

माया की इस बात ने मेरा दिल खुश कर दिया था। मैंने उसके होठों को प्यार से चूम लिया और एक बार फिर से उसकी चूत में अपना लंड डाल कर चुदाई का कार्यक्रम शुरू कर दिया। इस बार मैंने पहले से भी ज़्यादा जोश में आ कर माया की हचक हचक कर चुदाई की थी। माया इस बार ज़्यादा देर तक ठहर नहीं पाई और झटके खाते हुए झड़ने लगी थी। झड़ते वक़्त उसने अपनी दोनों टांगों के बीच मेरी कमर को जकड़ लिया था। जब वो झड़ कर शांत हो गई तो मैंने फिर से धक्के तेज़ कर दिए। क़रीब पांच मिनट बाद ही मुझे लगने लगा कि अब मैं भी झड़ने की कगार पर आ गया हूं। मेरे मुँह से निकलती सिसकारियों से ही माया को पता चल गया कि मैं झड़ने वाला हूं इस लिए उसने फ़ौरन ही मुझे अपनी चूत से मेरा लंड निकालने को कहा तो मैंने न चाहते हुए भी अपना लंड निकाल लिया।

मैंने लंड निकाला तो माया जल्दी से उठी और मेरे लंड को पकड़ कर अपने मुँह में भर लिया। मैं इस वक़्त बेहद आनंद और जोश में था इस लिए जैसे ही उसने मेरे लंड को अपने मुँह में भरा तो मैंने उसके सिर को पकड़ कर उसके मुख को ही चोदना शुरू कर दिया। जल्दी ही मैं मज़े की चरम सीमा पर पंहुच गया और फिर एक लम्बी आह भरते हुए मेरा पूरा जिस्म अकड़ गया। मैं जैसे आसमान से धरती पर गिरने लगा। मुझे कोई होश नहीं था कि मैंने कितने झटके खाए और मेरे लंड का सारा पानी कहां गया। चौंका तब जब माया ने मुझे ज़ोर का धक्का दिया। उसके धक्के से मैं बेड पर भरभरा कर गिर गया। उधर माया का मुँह मेरे लंड से निकले कामरस से लबालब भरा हुआ था और उसके मुख से बाहर भी निकल कर बेड पर गिरता जा रहा था। उसका चेहरा लाल सुर्ख पड़ा हुआ था। आँखें बंद करते वक़्त मुझे एहसास हुआ कि शायद एक बार फिर से मैंने माया की हालत ख़राब कर दी थी जिसके लिए मुझे बेहद अफ़सोस और शर्मिंदगी हुई।

☆☆☆
 
शिवकांत वागले ने फ़ौरन ही डायरी को बंद कर दिया और लम्बी लम्बी सांसें लेते हुए कुर्सी की पिछली पुश्त से अपनी पीठ टिका लिया। इस वक़्त उसकी हालत बड़ी अजीब सी दिख रही थी। चेहरे पर पसीना उभरा हुआ था। ऐसा लग रहा था जैसे उसके अंदर का तापमान इस वक़्त बढ़ गया था। हालांकि सच तो यही था कि उसके अंदर का तापमान बढ़ चुका था। विक्रम सिंह की डायरी में उसकी गरमा गरम कहानी पढ़ कर उसकी ख़ुद की हालत ख़राब हो गई थी। दो दो जवान बच्चों का बाप होते हुए भी वागले अपने अंदर सेक्स की गर्मी महसूस कर रहा था। कहानी में तो विक्रम सिंह और माया चरम सीमा में पहुंच कर तथा आनंद को प्राप्त कर के शांत पड़ गए थे लेकिन यहाँ वागले का हाल बेहाल सा नज़र आ रहा था। उसका अपना लंड पैंट के अंदर अकड़ा हुआ था।

वागले ने अपनी मौजूदा हालत को ठीक करने के लिए आँखें बंद कर ली किन्तु आँखें बंद करते ही उसकी बंद पलकों के तले कहानी के वो सारे मंज़र एक एक कर के दिखने लगे जिन्हें अभी उसने पढ़ा था। वागले ने फ़ौरन ही अपनी आँखें खोली और केबिन में इधर उधर देखने के बाद उसने टेबल पर रखे पानी के गिलास को उठा कर पानी पिया। माथे पर उभर आए पसीने को उसने रुमाल से पोंछा और फिर अपनी बेचैनी को दूर करने के लिए उसने एक सिगरेट जला ली। सिगरेट के लम्बे लम्बे कश लेने के बाद उसने ढेर सारा धुआँ हवा में उड़ाया। न चाहते हुए भी बार बार उसकी आँखों के सामने कहानी में लिखा एक एक मंज़र घूमने लगता था। वागले सोचने लगा कि विक्रम सिंह जैसा इंसान एक डायरी में अपनी इस तरह की आप बीती कैसे लिख सकता है जबकि उसे ख़ुद इस बात का एहसास हो कि अगर उसका लिखा हुआ किसी ने पढ़ लिया तो उसके बारे में क्या सोचेगा?

शिवकांत वागले को समझ में नहीं आ रहा था कि अगर विक्रम सिंह को उसे अपने अतीत के बारे में ही बताना था तो वो दूसरे तरीके से लिख कर भी बता सकता था लेकिन इस तरह सेक्स से भरी कहानी लिखने का क्या मतलब था उसका? आख़िर उसके ज़हन में इस तरह से अपनी आप बीती लिखने की मूर्खता क्यों आई होगी? वागले को याद आया कि जिस दिन विक्रम सिंह ने उसे ये डायरी दी थी उस दिन उसने जाते समय उससे ये भी कहा था कि चाहे जैसी भी परिस्थितियां बनें लेकिन वो उसे खोजने की कभी कोशिश न करे। वागले को समझ न आया कि आख़िर विक्रम सिंह ने उससे ऐसा क्यों कहा होगा? क्या इसके पीछे भी कोई ऐसी बात हो सकती है जिसके बारे में फिलहाल वो सोच नहीं पा रहा है?

शिवकांत वागले की बेचैनी जब सिगरेट पीने के बाद भी शांत न हुई तो वो कुर्सी से उठ कर जेल का चक्कर लगाने के लिए निकल गया। इसके पहले वो डायरी को ब्रीफ़केस में डालना नहीं भूला था। शाम तक वागले जेल में ही इधर उधर चक्कर लगाता रहा और दूसरे कुछ ख़ास कै़दियों से मिलता जुलता रहा। उसके बाद वो ब्रीफ़केस ले कर अपने सरकारी आवास की तरफ निकल गया।

घर पर आया तो सावित्री ने ही दरवाज़ा खोला। वागले ने एक नज़र सावित्री पर डाली और फिर बिना कुछ बोले ही अपने कमरे की तरफ बढ़ गया। उसका बेटा चंद्रकांत और बेटी सुप्रिया शायद घर पर नहीं थी वरना इस वक़्त वो वागले को ड्राइंग रूम में ज़रूर दिख जाते। ख़ैर वागले ने कमरे में जा कर अपनी वर्दी उतारी और तौलिया ले कर बाथरूम में घुस गया।

इधर सावित्री किचेन में उसके लिए चाय बनाने लगी थी और सोचती भी जा रही थी कि क्या उसका पति सच में उससे नाराज़ है या फिर ये उसका वहम है? हालांकि जब उसने दरवाज़ा खोला था तो वागले ने उससे कोई बात नहीं की थी और इसी बात से सावित्री को लगने लगा था कि उसका पति शायद सच में ही उससे नाराज़ है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अब वो अपने पति से किस तरह बात करे?

नहा धो कर और पजामा कुर्ता पहन कर वागले कमरे से निकला और घर से बाहर लान में एक तऱफ रखी कुर्सी पर बैठ गया। सावित्री उसी के निकलने का इंतज़ार कर रही थी। जैसे ही वो बाहर गया तो सावित्री भी ट्रे में दो कप चाय ले कर बाहर निकल गई। लान में वागले के पास आ कर उसने ट्रे को अपने पति के सामने किया तो वागले ने बिना कुछ बोले चुपचाप ट्रे से चाय का कप उठा लिया। सावित्री ने ट्रे से अपना कप ले कर ट्रे को वही सेंटर टेबल पर रख दिया और उस पार रखी एक कुर्सी पर बैठ गई।

शिवकांत वागले ने जब सावित्री को अपने सामने वाली कुर्सी पर बैठते देखा तो वो अपनी कुर्सी से उठ गया। सावित्री ये देख कर चौंकी और उसने वागले की तरफ देखते हुए धीमे स्वर में कहा_____"कहां जा रहे हैं? अब क्या मेरा चेहरा भी नहीं देखना चाहते हैं?"

वागले ने सावित्री की इस बात को सुन कर एक नज़र उसकी तरफ देखा और बिना कुछ कहे अंदर की तरफ चला गया। पति के इस तरह चले जाने से सावित्री को बहुत बुरा लगा। आज सारा दिन वो यही सब सोच कर उदास रही थी और इस वक़्त पति का ऐसा बर्ताव देख कर उसका गला भर आया था। हालांकि वो जानती थी कि दोष उसी का है। माना कि उसके दो दो जवाब बच्चे थे लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं हो सकता था न कि बच्चों के जवान हो जाने की वजह से उनका अपना कोई निजी जीवन ही नहीं रहा या अपनी कोई हसरतें ही नहीं रहीं? सावित्री जानती थी कि वागले कभी इस तरह उसे सेक्स के लिए नहीं कहता था बल्कि वो तभी कहता था जब कभी ख़ुद उसका मन होता था वरना दोनों के बीच अब सेक्स न के बराबर ही होता था। सावित्री तो कभी भी इसके लिए पहल नहीं करती थी और वागले अगर पहल करता था तो सावित्री हमेशा ही उसे जवाब में बच्चों का हवाला दे कर इसके लिए मना कर देती थी। इसके पहले वागले कभी भी इस तरह उससे नाराज़ नहीं हुआ था किन्तु इस बार शायद सावित्री ने सच में उसका दिल दुख दिया था।

सावित्री की आँखों में आंसू तो आए लेकिन कुर्सी से उठ कर वागले के पीछे जाने की उसमें हिम्मत न हुई। किसी तरह उसने चाय ख़त्म की और फिर अंदर जा कर रात के लिए खाना बनाने में लग गई। उधर वागले दूसरे कपड़े पहन कर घर से बाहर कहीं निकल गया।

रात में वागले उस वक़्त आया जब खाना खाने का वक़्त हो गया था। खाना खाने के बाद वो कमरे में गया और पैंट की जगह पजामा पहन कर बाहर आया। ड्राइंग रूम में रखे सोफे पर वो बैठ गया और टीवी चला कर उसमें न्यूज़ देखने लगा। न्यूज़ देखने में वो इतना खो गया कि उसे वक़्त का पता ही नहीं चला और शायद आगे भी उसे पता न चलता अगर सावित्री आ कर स्विच बोर्ड से टीवी का बटन न बंद कर देती।

"सोने का वक़्त हो गया है।" सावित्री ने शांत भाव से कहा_____"कमरे में चलिए। मैंने दूध का गिलास वहीं स्टूल में रख दिया है।"

"ज़रुरत नहीं है।" वागले ने रूखे भाव से कहा____"मैं यहीं सोऊंगा।"

"अब भला ये क्या बात हुई?" सावित्री ने कातर भाव से वागले की तरफ देखा तो वागले ने सपाट लहजे में कहा____"बात कुछ नहीं हुई। मुझे यहीं पर सोना है। तुम जाओ और सो जाओ।"

"पहले तो कभी आप यहाँ नहीं सोए।" सावित्री ने कहा____"फिर आज क्यों यहाँ पर सोने को कह रहे हैं?"

"क्योंकि यही पर मेरा सोने का मन है।" वागले ने कहा____"अब जाओ यहाँ से।"

"भगवान के लिए ऐसी बातें मत कीजिए?" सावित्री ने इस बार थोड़ा दुखी भाव से कहा____"बच्चे पास में ही अपने कमरे में है। अगर उन्होंने सुन लिया कि आप यहाँ सोने की बात कह रहे हैं तो वो क्या सोचेंगे?"

"तो क्यों सुना रही हो उन्हें?" वागले ने उखड़े हुए भाव से कहा____"जब मैंने कह दिया कि मुझे यहीं पर सोना है तो क्यों मुझे कमरे में सोने को कह रही हो? अब जाओ यहाँ से या फिर अगर चाहती हो कि बच्चे सुन ही लें तो ऐसे ही लगी रहो। मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।"

"मैं मानती हूं कि मुझसे ग़लती हुई है।" सावित्री की आँखों में आंसू भर आए____"इस लिए मैं अपनी ग़लती को स्वीकार करती हूं और अब से वही करुँगी जो आप चाहेंगे। अब भगवान के लिए गुस्सा थूक दीजिए और कमरे में चलिए।"

"तुम्हें क्या लगता है कि मैं तुमसे उस वजह से गुस्सा हूं?" वागले ने कहा____"नहीं, तुम ग़लत सोच रही हो। तुम्हारी इच्छाएं मर गई हैं तो इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है बल्कि दोष तो मेरा है जिसे अभी तक तृष्णा ने अपना शिकार बना रखा है, लेकिन तुम फ़िक्र मत करो। मैं अपनी ज़रूरत कहीं और से पूरी कर लूंगा। आज की दुनियां में पैसे से सब कुछ मिल जाता है।"

"हे भगवान! ये क्या कह रहे हैं आप?" सावित्री के चेहरे पर हैरत के भाव उभर आए____"इतनी सी बात के लिए आप ऐसा कैसे सोच सकते हैं?"

"क्यों नहीं सोच सकता?" वागले ने दो टूक भाव से कहा_____"मेरी ज़िन्दगी है, मैं जैसा चाहूं सोच सकता हूं। इसमें तुम्हें कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। जिस तरह तुम अपनी सोच के अनुसार जीवन जी रही हो उसी तरह हर इंसान को अपनी सोच के अनुसार जीवन जीने का हक़ है।"

"मैं कह तो रही हूं कि अब से जो आप कहेंगे मैं वही करुंगी।" सावित्री ने बेचैनी से कहा_____"फिर ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं आप?"

"मुझे अब तुमसे कुछ नहीं चाहिए।" वागले ने स्पष्ट रूप से कहा____"अब जाओ यहाँ से, मेरा दिमाग़ मत ख़राब करो।"

"क्या हुआ पापा?" तभी ड्राइंग रूम में चंद्रकांत की आवाज़ गूँजी तो सावित्री ने चौंकते हुए पीछे मुड़ कर देखा। पीछे कमरे के दरवाज़े पर चंद्रकांत खड़ा था। अपने बेटे को देख कर और उसकी बात सुन कर जहां सावित्री ये सोच कर बुरी तरह घबरा गई कि कहीं उसके बेटे ने सारी बातें तो नहीं सुन ली तो वहीं वागले पर जैसे अपने बेटे की इस आवाज़ से कोई फर्क ही नहीं पड़ा।

"कुछ नहीं बेटा।" वागले ने उसकी तरफ देखते हुए सामान्य भाव से कहा_____"वो हम ऐसे ही इधर उधर की बातें कर रहे थे। तुम जाओ अपने कमरे में, और आराम से सो जाओ।"

"जी पापा।" चंद्रकांत ने बड़े अदब से कहा और वापस अपने कमरे में जा कर उसने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया।

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अब तक,,,,,

"कुछ नहीं बेटा।" वागले ने उसकी तरफ देखते हुए सामान्य भाव से कहा_____"वो हम ऐसे ही इधर उधर की बातें कर रहे थे। तुम जाओ अपने कमरे में, और आराम से सो जाओ।"

"जी पापा।" चंद्रकांत ने बड़े अदब से कहा और वापस अपने कमरे में जा कर उसने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लिया।

अब आगे,,,,,,

"ये आप बिलकुल भी ठीक नहीं कर रहे हैं।" बेटे चंद्रकांत के दरवाज़ा बंद करते ही सावित्री ने वागले की तरफ देखते हुए जैसे आहत भाव से कहा_____"इतनी सी बात के लिए आप इतनी बड़ी ज़िद कर के क्यों बैठ गए हैं?"

"क्या तुमने सोच लिया है कि तुम इस वक़्त मुझे यहाँ पर शान्ति से नहीं बैठने दोगी?" वागले ने शख़्त भाव से कहा_____"और अगर सच में सोच लिया है तो ठीक है मैं इस घर से ही चला जाता हूं।"

"नहीं नहीं भगवान के लिए कहीं मत जाइए।" वागले जैसे ही सोफे से उठा तो सावित्री ने झट से उसके पैर पकड़ लिए_____"मैं कबूल कर चुकी हूं न कि मुझसे ग़लती हुई है और मैं ये भी कह चुकी हूं कि अब से मैं वही करुँगी जो आप कहेंगे। इस लिए मुझ पर दया कीजिए और मेरे साथ अंदर कमरे में चलिए। इस उम्र में ये सब करना आपको ज़रा भी शोभा नहीं देता।"

"मुझे क्या शोभा देता है और क्या नहीं इसका तो तुम्हें बहुत अच्छी तरह से ख़याल है।" वागले ने जैसे ताना मारते हुए कहा_____"लेकिन बाकी और किन चीज़ों का तुम्हे ख़याल रखना चाहिए क्या इसका भी ख़याल है तुम्हें?"

"अगर मुझे पता होता कि आपका वो सब करने का बहुत ही मन था।" सावित्री ने धीमे स्वर में नज़रें झुका कर कहा____"तो मैं उस वक़्त आपको बिलकुल भी मना न करती। मैं तो यही समझी थी कि हर रोज़ की तरह आप उस वक़्त भी मुझे बस परेशान ही कर रहे थे इस लिए मैंने वो सब कहा था। मुझे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि आप उतनी सी बात पर इस तरह नाराज़ हो जाएंगे।"

"बात सिर्फ इतनी नहीं है।" वागले ने सोफे पर बैठते हुए कहा_____"बल्कि ये भी है कि तुमने फ़ोन कर के मुझसे एक बार भी बात करना ज़रूरी नहीं समझा। दोपहर को तुमने अपने बेटे से फ़ोन करवाया और उससे ये पता लगवाया कि मैंने श्याम को खाना लाने के लिए क्यों नहीं भेजा? इतनी सी बात तुम ख़ुद भी तो फ़ोन पर मुझसे पूंछ सकती थी लेकिन तुमने नहीं पूछा। इसका तो यही मतलब हुआ न कि तुम्हें मेरी नाराज़गी से या किसी भी बात से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता?"

"नहीं नहीं ऐसी बात नहीं है।" सावित्री ने जल्दी से कहा____"आप ग़लत समझ रहे हैं। मैं तो सुबह ही आपको फ़ोन करने वाली थी लेकिन डर की वजह से आपको फ़ोन करने की मुझ में हिम्मत ही नहीं हुई। यही वजह थी कि मैंने हमारे बेटे को फ़ोन करने के लिए कहा था।"

सावित्री की बात सुन कर शिवकांत वागले ने मन ही मन सोचा कि शायद इतनी डोज सावित्री के लिए अब काफी हो गई है। हालांकि सावित्री से इस तरह बेरुख़ी से बात करने में उसे ख़ुद भी तक़लीफ हो रही थी। सावित्री जैसी भी थी लेकिन वो उसे बहुत मानता था। उसने सावित्री से इतनी कठोरता में बात करने के लिए खुद को बड़ी मुश्किल से कठोर बनाया था। ख़ैर उसने अब और ज़्यादा बात को न बढ़ाने का फैसला किया और फिर सावित्री से बिना कुछ बोले उठा और कमरे की तरफ बढ़ गया। इधर सावित्री ने जब उसे कमरे में जाते देखा तो उसने राहत की सांस ली और खुद भी कमरे की तरफ तेज़ी से बढ़ गई।

सावित्री जब कमरे में पहुंची तो उसने वागले को बेड पर लेटा हुआ पाया। ये देख कर वो मन ही मन खुश हुई और फिर कमरे के दरवाज़े को अंदर से बंद कर के वो भी बेड पर जा कर वागले के बगल से लेट गई। उसने सोच लिया था कि अब से वो किसी भी चीज़ के लिए अपने पति को मना नहीं करेगी। इस लिए बेड पर लेटते ही उसने वागले की तरफ करवट ली और अपने पति की तरफ देखने लगी।

"सुनिए।" वागले को ख़ामोशी से आँखें बंद किए देख उसने आहिस्ता से कहा____"वो मैं ये कह रही हो कि सब कुछ भुला कर मुझे प्यार कीजिए न।"

सावित्री के इस तरह कहने से वागले जो आँखें बंद किए लेटा हुआ था वो मन ही मन मुस्कुराया किन्तु बोला कुछ नहीं और ना ही उसने अपनी आँखें खोली। असल में वो खुद पहल नहीं करना चाहता था। वो चाहता था कि उसका दबदबा अभी फिलहाल ऐसे ही बना रहे। वो नहीं चाहता था कि सावित्री को ये भनक लग जाए कि ये सब वो नाटक कर रहा था ताकि सावित्री इस सबसे थोड़ा डर जाए और खुद ही वो सब करने के लिए राज़ी हो जाए।

"सुनिए न।" सावित्री खिसक कर वागले के क़रीब आती हुई बोली____"अब नाराज़गी छोड़ दीजिए न। मैं अब से वही करुँगी जो आप कहेंगे।"

"कोई ज़रूरत नहीं है।" वागले ने नाटक को जारी किए हुए कहा_____"चुपचाप सो जाओ और मुझे भी सोने दो।"

"अच्छा सुनिए तो।" सावित्री एकदम वागले से चिपक कर उसके सीने पर अपना हाथ फिराते हुए बोली_____"मैं ये कह रही हूं कि आप मुझे भी ऐसा कोई उपाय बताइए जिससे मेरा भी मन वो सब करने को किया करे।"

"क्या करने को?" वागले मन ही मन सावित्री की इस बात से चौंका था और मारे उत्सुकता के पूंछ बैठा था, जिसके जवाब में सावित्री ने धीमे से कहा____"वही, प्यार करने को।"

"अब ये क्या बकवास है?" वागले ने मानो खीझते हुए कहा____"चुपचाप सो जाओ।"

"ऐसे कैसे सो जाऊं?" सावित्री ने वागले के सीने से अपना हाथ उठा कर वागले के चेहरे को सहलाते हुए कहा____"मुझे आपसे जानना है कि मैं ऐसा क्या करूं जिससे मेरा भी मन हर वक़्त आपसे प्यार करने को किया करे? मुझे भी इस बारे में कोई उपाय बताइए न।"

सावित्री की बात सुन कर वागले को मन ही मन मज़ा तो आया लेकिन उसे ये न समझ आया कि वो इस बारे में सावित्री को जवाब के रूप में क्या उपाय बताए? वो बड़ी तेज़ी से सोचने लगा था कि सावित्री को ऐसा क्या बताए जिससे उसे उसके जवाब से संतुष्टि मिल जाए।

"क्या हुआ?" सावित्री ने वागले को ख़ामोश देखा तो उसने इस बार सिर उठा कर वागले की तरफ देखा और कहा____"बताइए न। आप इस तरह चुप क्यों हैं? क्या अभी भी नाराज़ हैं मुझसे?"

सावित्री की इतनी मासूमियत से कही गई इस बात को सुन कर वागले का दिल मानो बुरी तरह पसीज गया और उसके जज़्बात मचल उठे। उसने अपनी आँखें खोल कर और सिर को थोड़ा ब्यवस्थित करते हुए कहा_____"मेरी समझ में इसका कोई उपाय नहीं होता मेरी जान। ये तो बस एक एहसास है। एक ऐसा एहसास जिसके कई रूप होते हैं। हम जिसे प्यार करते हैं उसके लिए हमारे दिल में प्यार का एहसास होता है और उस एहसास के तहत इंसान के ज़हन में तरह तरह के जज़्बात उभरने लगते हैं। जैसे मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूं तो मेरे अंदर तुम्हारे प्रति उस प्यार के एहसास के तहत ये ख़याल उभरते हैं कि मैं अपने प्यार को तुम्हारे सामने अपने तरीके से ज़ाहिर करूं।"

"ये तो ठीक है।" सावित्री ने कहा____"लेकिन जिनसे हम प्यार नहीं करते उनके प्रति हमारे अंदर किस तरह के ख़याल उभरते हैं?"

"ये तो किसी ब्यक्ति विशेष को देखने के बाद ही पता चलता है।" वागले ने सोचते हुए कहा____"जिनसे हमारे जैसे सम्बन्ध होते हैं उनके प्रति हमारे अंदर वैसे ही ख़याल उभरते हैं।"

"ख़ैर छोड़िए।" सावित्री ने जैसे पहलू बदला____"अब ये बताइए कि इस वक़्त मेरे प्रति कैसे ख़याल उभर रहे हैं आपके अंदर?"

"सच सच बताऊं या यूं ही?" वागले ने धड़कते दिल से ये कहा तो सावित्री ने मुस्कुराते हुए कहा____"सच सच ही बताइए न। झूठ मूठ का क्यों बताएँगे?"

सावित्री की बात सुन कर वागले ने उसको पकड़ कर उसे सीधा किया और फिर उठ कर उसके चेहरे की तरफ झुकते हुए कहा_____"तुम्हारे प्रति मेरे अंदर कैसे ख़याल उभर रहे हैं ये मैं कर के दिखाऊंगा।"

कहने के साथ ही वागले ने सावित्री के गुलाबी होठों पर अपने होंठ रख दिए। वागले के ऐसा करते ही सावित्री के जिस्म में झुरझुरी सी हुई और उसने अपनी आँखें बंद कर ली। उसने वागले को रोकने का सोचा भी नहीं था।

वागले जो विक्रम सिंह की गरमा गरम कहानी पढ़ कर जाने कब से भरा बैठा था उसने सावित्री के होठों को मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दिया। उसके ज़हन में एकदम से माया का ख़याल उभर आया था और फिर वो खुद को विक्रम सिंह समझ बैठा था। सावित्री पहले तो चौंकी थी फिर उसने अपने आपको जैसे पूरी तरह से वागले के सुपुर्द कर दिया। वो भी देखना चाहती थी कि वागले में आज अचानक इस तरह बदलाव कैसे आ गया था?

उधर वागले कुछ देर तक सावित्री के होठों को चूमता चूसता रहा और जब उसकी साँसें भर आईं तो उसने चेहरा ऊपर कर लिया। उसने आँखें खोल कर सावित्री की तरफ देखा तो उसे अपनी आँखे बंद किए पाया। उसकी साँसें भी चढ़ी हुईं थी। बल्ब की रौशनी में उसका चेहरा हल्का सुर्ख पड़ा हुआ दिख रहा था। साँसें दुरुस्त हुईं तो उसने भी आँखें खोल कर वागले की तरफ देखा। वागले से नज़रें चार होते ही उसके चेहरे पर शर्म के भाव उभर आए और होठों पर मुस्कान नाच उठी।

"तुम्हारे इन होठों में आज भी शहद जैसी वही मिठास है जो तब थी जब तुम मेरी बीवी बन कर मेरी ज़िन्दगी में आई थी।" वागले ने सावित्री की गहरी आँखों में देखते हुए प्यार से कहा____"हमारे बच्चे क्या हुए जैसे हमारे बीच का सारा सिस्टम ही बिगड़ गया।"

"किसी के भी जीवन में वक़्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता।" सावित्री ने वागले की आँखों में जैसे झांकते हुए कहा_____"वक़्त के साथ साथ हर चीज़ का सिस्टम भी बदल जाता है। उन चीज़ों के बारे में हमें बहुत कुछ सोचना भी पड़ता है और समझौता भी करना पड़ता है।"

"जानता हूं।" वागले ने सावित्री के दाहिने गाल को अपने एक हाथ से सहलाते हुए कहा____"किन्तु एक चीज़ जीवन के आख़िर तक बनी रहती है जिसे हम प्यार कहते हैं। ये प्यार ही है जिसके सहारे दुनियां का हर सिस्टम अपनी जगह पर ब्यवस्थित है। ख़ैर, ज़माना बदल गया है मेरी जान। आज के बच्चे भी ये समझते हैं कि उनके माता पिता को भी एक दूसरे की प्यार की ज़रूरत महसूसत होती है जिसके लिए उन्हें अपने माता पिता को उचित और मालूल समय देना चाहिए। आज कल तो ऐसे भी बच्चे होते हैं जो बड़े होने के बाद अपने माता पिता को अपना दोस्त समझने लगते हैं और उनसे हर तरह की बातें बड़ी आसानी से साझा करते हैं।"

"करते होंगे।" सावित्री ने कहा____"पर हमारे बच्चे ऐसे तो नहीं हैं न और ना ही हम ऐसे हैं कि अपने बीच की ऐसी बातों को उनके बीच सहजता से ज़ाहिर कर दें।"

"किसी के भी बच्चे या किसी के भी माता पिता शुरू से ऐसे नहीं होते।" वागले ने मानो समझाते हुए कहा____"बल्कि इन सब बातों के बारे में गहराई से सोच कर ही वो इसकी शुरुआत करते हैं ताकि माता पिता का अपने बच्चों के बीच एक ऐसा ताल मेल बना रहे जिससे उन्हें बड़ी से बड़ी बात के लिए एक दूसरे से कहने सुनने में संकोच करने जैसी सिचुएशन पैदा न हो।"

"तो क्या अब आप भी हमारे बच्चों के बीच इसी तरह का ताल मेल बनाने का सोच रहे हैं?" सावित्री ने सवालिया निगाहों से वागले को देखा।

"नहीं।" वागले ने मुस्कुराते हुए कहा____"मैं फिलहाल ये सोच रहा हूं कि इस वक़्त अपनी खूबसूरत बीवी को जी भर के प्यार करूं और हां ये भी चाहता हूं कि मेरी बीवी भी उसी तरह मुझसे प्यार करे।"

"आपको जो करना है कीजिए।" सावित्री ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"मैं आपको किसी चीज़ के लिए रोकूंगी नहीं।"

"ऐसे नहीं भाग्यवान।" वागले ने कहा____"बल्कि ऐसे कि उस प्यार में तुम्हें भी उतना ही आनंद और सुख प्राप्त हो जितना की मुझे प्राप्त होगा। एक तो तुमने घर परिवार और बच्चों के अलावा कुछ और सोचना ही बंद कर दिया है इस लिए तुम्हारे अंदर के प्यार वाले वो एहसास ही लुप्त हो गए हैं। उन्हें अपने अंदर फिर से जगाओ मेरी जान। हम दोनों के जीवन का कोई भरोसा नहीं है, इस लिए मैं चाहता हूं कि जब तक साँसें हैं और जब तक मुमकिन हो सके तब तक हम एक दूसरे के बीच प्यार को इस तरह बनाए रखें कि एक पल के लिए भी एक दूसरे से जुदा न रह सकें।"

"मैं पूरी कोशिश करुँगी कि अब से ऐसा ही हो।" सावित्री ने कहा____"किन्तु एक बात बताइए कि इतने सालों बाद अचानक से ऐसा क्या हो गया है जिसकी वजह से आपके अंदर प्यार करने का इस क़दर भूत सवार हो गया है?"

"क्या तुम्हें लगता है कि इसकी कोई ख़ास वजह है?" वागले ने उल्टा सवाल करते हुए पूछा।

"हां क्यों नहीं।" सावित्री ने वागले के चेहरे के भावों को जैसे गौर से पढ़ते हुए कहा____"मुझे तो पूरा यकीन है कि कुछ तो ऐसा हुआ है जिसकी वजह से अचानक से आप पर ये बदलाव आया है, वरना आज से पहले आप कभी भी ये सब करने के नाम पर मुझसे इस तरह नाराज़ नहीं हुए थे।"

सावित्री की बात सुन कर वागले तुरंत कुछ बोल न सका था, बल्कि सावित्री के चेहरे को ये सोच कर देखता रह गया था कि अब वो सावित्री को कैसे बताए कि ये सब विक्रम सिंह की डायरी पढ़ने से हुआ है? हालांकि कई बार उसके अपने मन में भी ये ख़याल उभरे थे कि उसके अंदर आए इन बदलावों की वजह क्या विक्रम सिंह की कहानी पढ़ना है? क्या सच में विक्रम सिंह की कहानी ने उसके अंदर सेक्स की एक उत्तेजना को जाग्रत कर दिया है? वागले इस बारे में न जाने कितनी ही बार सोच चुका था और वो इस बात को स्वीकार भी कर चुका था कि ये सब विक्रम सिंह की डायरी पढ़ने का ही नतीजा था किन्तु कहीं न कहीं विक्रम सिंह की कहानी ने उसे ये भी एहसास कराया था कि सेक्स एक ऐसी चीज़ है जो उम्र नहीं देखता बल्कि वो अपनी ज़रूरत को पूरा करने के लिए रास्ता और उपाय देखता है। विक्रम सिंह की कहानी ने उसे एहसास कराया था कि औरत और मर्द अपनी हवस को पूरा करने के लिए जाने क्या क्या कर डालते हैं। हवस का नशा जब इंसान के दिलो दिमाग़ पर हावी हो जाता है तो वो सही और ग़लत नहीं देखता बल्कि वो उस नशे का इलाज़ ही खोजता है।

"क्या हुआ?" वागले को एकदम से कहीं गुम हो गए देख सावित्री ने कहा____"कहां खो गए आप?"

"आं..हां।" वागले हल्के से चौंका____"नहीं, कहीं नहीं। असल में काफी समय से मैं इस बारे में सोच रहा था और तुमसे कह भी रहा था लेकिन तुम हमेशा की तरह मना कर देती थी और मैं भी ये सोच कर फिर कुछ नहीं कहता था कि तुम दिन भर के कामों की वजह से बुरी तरह थक जाती हो इस लिए क्यों तुम्हे परेशान करना? ख़ैर मैंने सोच लिया है कि मैं घर के काम के लिए एक नौकरानी रख दूंगा जिससे तुम पर ज़्यादा बोझ न पड़े।"

"अरे! इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।" सावित्री ने बुरी तरह चौंकते हुए कहा____"आप किसी नौकरानी वौकरानी को मत रखना। घर के काम इतने भी ज़्यादा नहीं होते हैं कि मैं थक जाऊं और वैसे भी काम करना तो ज़रूरी ही है न। काम नहीं करुँगी तो खा खा के मोटी हो जाउंगी, और कुछ दिन बाद ऐसी हालत हो जाएगी कि उठना बैठना भी बंद हो जाएगा मेरा।"

"मैं कुछ नहीं सुनना चाहता।" वागले ने कहा____"मैंने सोच लिया है कि घर के सभी बड़े बड़े काम करने के लिए एक नौकरानी रख दूंगा। तुम्हारा काम सिर्फ खाना बनाने का रहेगा, क्योंकि मुझे तो तुम्हारे हाथ का बना हुआ खाना ही पसंद है।"

वागले की बात सुन कर सावित्री ने कुछ बोलने का मन तो बनाया पर फिर चुप रह गई। उसके चेहरे पर एकदम से ऐसे भाव आए थे जैसे वो वागले पर बलिहार हो जाने वाली हो।

"तो शुरू करें?" सावित्री को प्यार से अपनी तरफ देखते देख वागले ने मुस्कुराते हुए कहा तो सावित्री उसकी बात सुन कर मुस्कुरा उठी और हां में अपनी पलकों को झपका दिया।

वागले ने झुक कर फिर से सावित्री के होठों को चूम लिया। इस वक़्त वो सावित्री के बगल से अधलेटा हुआ सा था। उसकी कमर के ऊपर का हिस्सा उठा हुआ था और सावित्री की तरफ झुका हुआ था। एक हाथ सावित्री के ऊपर से होते हुए उसके दूसरी तरह बेड पर टिका हुआ था, जबकि दूसरा हाथ कुहनी के बल इस तरफ तकिए के पास ही था।
 
वागले कुछ पलों तक सावित्री के होठों को प्यार से चूमता चूसता रहा। सावित्री एकदम शांत पड़ी थी। तभी वागले का दूसरी तरफ वाला हाथ उठा और सावित्री की छाती पर आ गया। सावित्री के जिस्म पर इस वक़्त क्रीम कलर की नाइटी थी जिसकी डोरी उसने पेट के पास बाँध रखी थी। नाइटी के अंदर उसने सफ़ेद रंग की ब्रा पहन रखी थी जो ऊपर उसकी नाइटी के खुले गले से दिख रही थी।

वागले ने नाइटी के ऊपर से सावित्री की दाहिनी छाती को सहलाना शुरू किया तो सावित्री के जिस्म में एकदम से झुरझुरी होने लगी। वो जो पहले एकदम से शांत पड़ी थी उसका एक हाथ फ़ौरन ही वागले के उस हाथ के ऊपर आ गया जो हाथ उसकी छाती को सहला रहा था। सावित्री के सीने में बड़ी बड़ी छातियां थी जो वागले के पूरे हाथ में समां नहीं रही थी। इस उम्र में भी उसकी छातियों में हल्का कसाव था। वागले को शायद उसकी छाती सहलाने में मज़ा आया था इस लिए उसने थोड़ा ज़ोर ज़ोर से मसलना शुरू किया तो सावित्री ने अपने होठों को वागले के होठो से आज़ाद करके सिसकी ली।

सावित्री ने जैसे ही अपने होठों को वागले के होठों से अलग किया तो वागले उसके गले को चूमना शुरू कर दिया। सावित्री का दूसरा हाथ फ़ौरन ही वागले के सिर पर आ गया और वो उस हाथ से वागले के सिर के बालों को मुठियाने लगी। उधर वागले सावित्री के गले को चूमते हुए सावित्री के सीने की तरफ आया। एक हाथ से उसने नाइटी के छोर को पकड़ कर एक तरफ किया तो उसका सीना ब्रा समेत दिखने लगा। वागले पर जैसे नशा चढ़ने लगा था इस लिए वो बिना रुके सावित्री की छाती के हर हिस्से को चूमने लगा था। उसका एक हाथ अभी भी सावित्री की दाहिनी चूची को ज़ोर ज़ोर से मसले जा रहा था।

वागले ने सावित्री की चूची से हाथ हटा कर नाइटी की डोरी को पकड़ कर खींचा तो वो बड़े आराम से खुल गई। उसके बाद वागले ने सिर उठा कर नाइटी के दोनों सिरों को पकड़ कर सावित्री के बदन से हटा दिया जिससे सावित्री का गदराया हुआ गोरा बदन बल्ब की रौशनी में चमकने लगा। वागले ने ध्यान से सावित्री के जिस्म को देखा। आज भी उसके जिस्म में पहले जैसा ही आकर्षण था। सावित्री का जिस्म भरा हुआ तो था किन्तु एक्स्ट्रा चर्बी कहीं पर भी नहीं थी।

सावित्री ने आँखें खोल कर जब वागले को देखा तो उसे अपने बदन को गौर से निहारता पाया। ये देख कर सावित्री को शर्म महसूस हुई जिससे उसने फ़ौरन ही अपनी नाइटी के छोर को पकड़ कर अपने बदन को ढंकना चाहा लेकिन वागले ने फ़ौरन ही उसका हाथ पकड़ लिया।

"मुझसे क्यों छुपा रही हो मेरी जान?" वागले ने मुस्कुराते हुए कहा____"क्या तुम भूल गई हो कि तुम्हारे इस खूबसूरत बदन के हर हिस्से को मैं जाने कितनी ही बार देख चुका हूं?"

"हां लेकिन फिर भी मुझे शर्म आ रही है।" सावित्री ने अपनी गर्दन को दूसरी तरफ घुमा कर मुस्कुराते हुए कहा____"आपको तो जैसे अब कोई लाज ही नहीं आती।"

"अगर मैं भी शरमाऊंगा तो फिर तुम्हें खुल कर प्यार कैसे करुंगा?" वागले ने सावित्री के गुदाज पेट पर हाथ फेरते हुए कहा_____"तुम्हें देख कर मैं हमेशा ये सोच कर गर्व करता हूं कि तुम जैसी हसीन बीवी किस्मत से मुझे मिली है। एक मैं हूं कि दिन-ब-दिन बूढ़ा होता जा रहा हूं और एक तुम हो कि दिन-ब-दिन जवान होती जा रही हो। मुझे तो अब ये सोच कर डर सताने लगेगा कि मेरी इस जवान बीवी को कहीं कोई मुझसे छीन कर न ले जाए।"

"धत्।" सावित्री ने लजा कर कहा____"ये कैसी बातें करते हैं आप? ऐसा कुछ नहीं होने वाला और ना ही मैं ऐसा होने दूंगी।"

"और अगर दुर्भाग्य से ऐसा हुआ तो?" वागले जाने क्या सोच कर ये पूछ बैठा था।

"ऐसा नहीं होगा।" सावित्री ने जैसे दृढ़ भाव से कहा____"और अगर दुर्भाग्य से ऐसा हुआ तो ये भी समझ लीजिए कि वो दिन मेरी ज़िन्दगी का आख़िरी दिन होगा।"

सावित्री की ये बात सुन कर वागले ये सोच कर मन ही मन बेहद खुश हो गया कि उसकी बीवी उससे कितना प्यार करती है और उसके प्रति कितनी वफादार है। एक पति को इससे ज़्यादा भला और क्या सबूत चाहिए होता है? वागले उसकी बात से इतना गद गद हो उठा था कि उसने फ़ौरन ही आगे बढ़ कर पहले सावित्री के माथे को प्यार से चूमा और फिर उसके होठों को हल्के से चूम लिया। उसके बाद वो वापस नीचे आया और सफ़ेद रंग की ब्रा में कैद सावित्री की छातियों के बीच की दरार को चूमने लगा। एक हाथ से वो उसकी चूची को मसल भी रहा था और दूसरी को ब्रा के ऊपर से ही चूम रहा था।

वागले इस वक़्त बेहद खुश था और उसका बस चलता तो वो जाने क्या क्या कर जाता। उसके ज़हन में बार बार विक्रम सिंह की डायरी में लिखी कहानी के अंश घूम जाते थे। उसने अपने जीवन में कभी भी सावित्री के साथ वैसा कुछ नहीं किया था जिस तरह विक्रम सिंह ने अपनी डायरी में लिखा था। उसने तो बस एक ही तरह की क्रिया की थी। सावित्री की चूचियों को पहले मसलना और फिर उसकी चूत में अपना लंड डाल कर उसे चोदना। पांच मिनट में ही उसका काम तमाम हो जाता था। उसने ये जानने समझने की कभी कोशिश नहीं की थी कि उसके द्वारा किए गए सेक्स से उसकी बीवी को संतुष्टि होती थी या नहीं। हालांकि सावित्री ने भी उससे इस बारे में कभी कुछ नहीं कहा था। विक्रम सिंह की डायरी पढ़ने के बाद ही उसने जाना था कि किसी औरत के साथ एक मुकम्मल मर्द सेक्स करते समय क्या क्या करता है और किस तरह से औरत को संतुष्ट करता है?

कुछ ही देर में वागले के ज़हन में माया और विक्रम सिंह उभर आए और वो एकदम से जूनूनी अंदाज़ में वैसा ही करने लगा जैसे विक्रम सिंह ने अपनी कहानी में माया के साथ किया था। बेड पर लेटी उसकी बीवी अपने पति के द्वारा की जा रही ऐसी क्रियाओं से चौंक उठती थी लेकिन वो कुछ कह नहीं रही थी उसे। उसे खुद भी उसके द्वारा ऐसा करने में एक अलग ही मज़ा आने लगा था।

वागले ने सावित्री की ब्रा को उतार दिया था और अब वो उसकी एक चूची के निप्पल को मुँह में भरे बड़ी तेज़ी से चूस रहा था। उसका एक हाथ सावित्री की पेंटी के ऊपर से उसकी चूत को सहला रहा था। दो तरफ के हमले से सावित्री एक अलग ही रंग में डूबी नज़र आने लगी थी। उसका पूरा जिस्म छटपटा सा रहा था और वो आँखें बंद किए एक अलग ही मज़े में खोती जा रही थी।

सावित्री की दोनों चूचियों को जी भर के चूसने के बाद वागले नीचे आया और उसके गुदाज पेट और नाभि को चूमने चाटने लगा। सावित्री को पेट में गुदगुदी होने लगी थी या कुछ और लेकिन उसके द्वारा इस तरह चूमने चाटने से उसका पेट झटका ज़रूर खा रहा था। उसके मुख से सिसकारियां फूट रहीं थी। सावित्री एकदम से उस वक़्त उछल पड़ी जब वागले ने अपना हाथ पेंटी के अंदर डाल कर सावित्री की बालों से घिरी चूत पर रख दिया था। उसने जल्दी से अपना हाथ बढ़ा कर वागले के हाथ को पकड़ लिया।

"आह्ह ये क्या रहे हैं आप?" सावित्री ने बड़ी मुश्किल से कहा____"वहां से हाथ हटा लीजिए न। वो हाथ रखने की जगह नहीं है।"

"ये तुमसे किसने कहा?" वागले ने सिर उठा कर उसकी तरफ देखते हुए कहा____"अगर जिस्म का कोई अंग हाथ रखने लायक न होता तो भगवान इसे बनाता ही क्यों? अरे! भाग्यवान ये तो ऐसी जगह है जहां से इंसानों का उदय होता है। भला ऐसी महान जगह हाथ रखने लायक कैसे नहीं होगी? तुम बस आनंद लो मेरी जान।"

कहने के साथ ही वागले ने अपने हाथ को ज़ोर दिया तो उसका हाथ फ़ौरन ही सावित्री की गीली हो गई चूत पर जा पहुंचा। सावित्री ने उसके हाथ से अपना हाथ हटा लिया था। वागले ने उसके चहेरे की तरफ देखा तो उसे दूसरी तरफ अपना चेहरा किए पाया। सावित्री ने कस कर अपनी आँखों को बंद कर लिया था, जैसे वो किसी भी कीमत पर वागले के उस हाथ को अपनी चूत पर रखा हुआ नहीं देखना चाहती थी। वागले के होठों पर ये सोच कर गहरी मुस्कान उभर आई कि उसकी बीवी आज भी किसी कुवारी लड़की की तरह शर्मा रही है। उसे सावित्री पर बेहद प्यार आया और शायद यही वजह थी कि उसने फ़ौरन ही ऐसा काम किया जिसकी सावित्री को स्वप्न में भी उम्मीद नहीं थी। वो तेज़ी से नीचे खिसका था और इससे पहले कि सावित्री को इसकी भनक लगती उसने बड़ी तेज़ी से उसकी चूत पर अपना मुँह रख दिया था।
 
अपनी चूत पर गर्म साँसों का एहसास होते ही सावित्री को जैसे किसी बात का एहसास हुआ था इस लिए फ़ौरन ही तकिए से सिर उठा कर नीचे की तरफ देखा और जैसे ही उसकी नज़र अपनी चूत पर झुके अपने पति पर पड़ी तो वो हक्की बक्की सी रह गई। होश तब आया उसे जब वागले ने उसकी चूत को चूम लिया था। सावित्री को ज़बरदस्त झटका लगा। वो एकदम से उछल कर बेड पर बैठ गई। उधर उसके इस तरह बैठते ही वागले चौंक पड़ा था। उसने फ़ौरन ही पलट कर उसकी तरफ देखा।

"छी...! ये क्या किया आपने?" सावित्री ने आश्चर्य मिश्रित भाव के साथ साथ बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा_____"ऐसा कैसे कर सकते हैं आप?"

"क्यों तुम्हें अच्छा नहीं लगा?" वागले ने हल्के से मुस्कुराते हुए पूछा तो सावित्री ने आँखें फैलाते हुए कहा____"हे भगवान! क्या आपके ऐसा करने से मुझे अच्छा लगेगा? मुझे तो यकीन नहीं हो रहा कि आपने ऐसा किया है। सच सच बताइए, ऐसा क्यों किया आपने? क्या आपको ज़रा भी उस गन्दी जगह पर अपना मुँह रखने पर घिन नहीं आई?"

"मेरे मन ने कहा कि वैसा करूं।" वागले ने मानो भोलेपन से कहा____"इस लिए कर दिया। हालांकि कुछ पलों के लिए मन ज़रूर मचला था लेकिन मैं भी देखना चाहता था कि उस जगह पर मुँह रखने से या उस जगह को चूमने से कैसा लगता है?"

"हे भगवान! पता नहीं आज कल आपको क्या हो गया है।" सावित्री ने अपनी नाइटी को फिर से पहनते हुए कहा____"अभी तक तो मैं यही समझ रही थी कि शायद आपको वो सब करने का बहुत मन करता होगा इस लिए आपने मुझे ज़ोर दिया था, पर अभी जो आपने किया उससे मैं समझ गई हूं कि कुछ तो हुआ है आपके साथ। भगवान के लिए बताइए मुझे कि आज कल ये क्या हो गया है आपको?"

"तुम बेवजह ही इतना ज़्यादा सोच रही हो भाग्यवान।" वागले ने कहा____"ऐसी कोई भी बात नहीं है। असल में मैंने ये सब कहीं पढ़ा था इस लिए आज अचानक ही जब मुझे याद आया तो मैंने सोचा एक बार मैं भी वैसा कर के देखता हूं कि कैसा लगता है।"

"आज से पहले तो कभी आपको ये सब याद नहीं आया था।" सावित्री ने शक भरी नज़रों से वागले की तरफ देखते हुए कहा____"फिर आज ही ये अचानक से आपको कैसे याद आ गया? मुझे सच सच बताइए कि असल बात क्या है। अगर नहीं बताएँगे तो सोच लीजिए मैं आपको हमारे बच्चों की कसम दे दूंगी।"

"अब ये क्या बात हुई यार?" वागले मन ही मन घबरा तो गया था किन्तु प्रत्यक्ष में कठोरता से कहा____"तुमने खुद कहा था कि तुम मुझे किसी भी बात के लिए नहीं रोकोगी। फिर अब क्यों रोक रही हो और क्यों इस तरह बच्चों की कसम देने की बात कर रही हो? अगर तुम्हें यही सब करना था तो उस वक़्त क्यों मुझे झूठा अस्वाशन दिया था?"

वागले की बात सुन कर एकदम से सावित्री को अपनी बात याद आई तो वो एकदम से चुप हो गई। उधर वागले झूठा गुस्सा दिखाते हुए बेड से उतरा और कमरे से बाहर चला गया। वागले के इस तरह जाते ही सावित्री ये सोच कर घबरा गई कि कहीं उसका पति फिर से उससे नाराज़ न हो जाए इस लिए वो भी तेज़ी से कमरे से निकल कर वागले के पीछे लपकी। उसे अब ये सोच कर अपने आप पर गुस्सा आ रहा था कि उसने ऐसी बातें अपने पति से की ही क्यों जिसकी वजह से उसका पति उससे फिर से नाराज़ हो जाए?

☆☆☆
 
वागले कमरे से निकल कर सीधा किचेन में गया था। उसने फ्रिज से पानी निकाल कर पीना शुरू ही किया था कि तभी पीछे से उसे सावित्री के आने की आहट सुनाई पड़ी। उसने पीछे मुड़ कर देखने की कोई ज़रूरत नहीं समझी। उधर सावित्री किचेन के दरवाज़े पर आ कर खड़ी हो गई थी।

"तुम यहाँ क्यों आई हो?" पीनी पी लेने के बाद वागले ने जब सावित्री को किचेन के दरवाज़े पर खड़ा देखा तो उससे कहा।

"मैं आपको लेने आई हूं।" सावित्री ने धीमे स्वर में कहा____"मैं चाहती हूं कि हमारा जो काम अधूरा रह गया है उसे हम दोनों मिल कर पूरा करें और हां, इस बार मैं आपको किसी बात पर गुस्सा हो जाने का मौका नहीं दूंगी।"

"और अगर तुमने फिर से कोई नाटक किया तो?" वागले ने जैसे उसको परखते हुए कहा।

"तो आप मेरे साथ ज़बरदस्ती कर के जो चाहे कर लीजिएगा।" सावित्री ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा____"अब चलिए कमरे में।"

"पहले अच्छी तरह सोच लो।" वागले ने सपाट लहजे में कहा_____"बाद में अगर तुमने मुझे किसी बात के लिए रोका या मेरा कहा नहीं माना तो फिर अच्छा नहीं होगा।"

"मैंने सोच लिया है।" सावित्री ने दृढ़ भाव से कहा____"अब न तो मैं आपको किसी बात के लिए रोकूंगी और ना ही आपके कहे को इंकार करुंगी।"

सावित्री की बात सुन कर वागले उसे कुछ पलों तक अपलक घूरता रहा उसके बाद वो उसके बगल से निकल कर कमरे की तरफ बढ़ गया। उसे कमरे की तरफ जाता देख सावित्री भी ख़ुशी ख़ुशी उसके पीछे कमरे की तरफ चल पड़ी।

"अपने सारे कपड़े उतार दो।" कमरे का दरवाज़ा बंद करके जैसे ही सावित्री बेड की तरफ पलटी तो वागले ने जैसे उसे हुकुम सा दिया, जिसे सुन कर सावित्री एकदम से हकबका गई। वो हैरानी भरे भाव से वागले की तरफ देखने लगी थी।

"क्या हुआ?" उसे कुछ न करता देख वागले ने जैसे उसे होश में लाते हुए कहा____"अभी बाहर तो बड़ा कह रही थी कि तुम वही करोगी जो मैं कहूंगा तो अब क्या हुआ?"

वागले की बात सुन कर सावित्री के चेहरे पर असमंजस के भाव उभरे किन्तु फिर उसने वागले की तरफ देखते हुए धीरे धीरे अपनी नाइटी की डोरी खोल कर उसे उतारने लगी। नाइटी के अंदर उसने सफ़ेद रंग की ब्रा और ब्लैक कलर की पेंटी पहन रखी थी। जैसे ही उसके गोरे बदन से नाइटी सरक कर फर्श पर गिरी तो सावित्री का जिस्म नुमायां हो उठा और साथ ही सावित्री का चेहरा लाज से झुक गया। वागले ख़ामोशी से उसी की तरफ देख रहा था और मन ही मन खुश भी हो गया था। हालांकि उसे सावित्री को यूं मजबूर करने का कोई इरादा नहीं था किन्तु उसके ज़हन में ये ख़याल जैसे घर कर गया था कि अब वो अपनी खूबसूरत बीवी के साथ बंद कमरे में वैसा ही प्रेम और वैसा ही सेक्स करेगा जैसा आज के वक़्त में होता है। उसकी इस सोच में विक्रम सिंह की डायरी में लिखी उसकी कहानी का बड़ा ही योगदान था।

"अब बेड पर आ जाओ।" वागले ने सावित्री को जैसे फिर हुकुम दिया। सावित्री उसकी बात मानते हुए हल्के क़दमों से बेड की तरफ बढ़ी। जबकि वागले ने कहने के साथ ही अपने कपड़ों को उतारना शुरू कर दिया था। उसका दिल ये सोच सोच कर धड़कने लगा था कि वो सावित्री के साथ जो जो करना चाहता है क्या वो सब सावित्री उसे करने देगी और क्या सावित्री उसके कहे अनुसार खुद भी करेगी?

कुछ ही देर में आलम ये था कि सावित्री ब्रा पेंटी में बेड पर नज़रें झुकाए बैठी थी और उधर वागले भी अपने कपड़े उतार कर अब सिर्फ एक कच्छे में बैठा था। उसका कच्छा कपड़े का सिलाया हुआ था।

"मैं जानता हूं सावित्री कि तुम्हें इस तरह किसी बात के लिए मजबूर करना अच्छी बात नहीं है।" वागले ने धीमे स्वर में कहा____"किन्तु यकीन मानो मैं जो भी करना चाहता हूं उससे हमें एक अलग ही आनंद आएगा। अब तक हमने अपने जीवन को कितना नीरस सा बनाया हुआ था किन्तु अब मैं चाहता हूं कि हम अपने जीवन में कुछ तो ऐसा करें जिससे हमारे बीच की ये नीरसता दूर हो। मैं जानता हूं कि शुरुआत में ये सब तुम्हारे लिए थोड़ा अजीब और थोड़ा मुश्किल सा होगा किन्तु मुझे यकीन है कि कुछ समय में ही तुम्हें इस सब में बेहद आनंद आने लगेगा।"

"ठीक है।" सावित्री ने उसकी तरफ देखते हुए धीमे स्वर में कहा____"आपको जो ठीक लगे कीजिए। मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करुँगी कि आप जो करना चाहते हैं उसमें किसी भी तरह की समस्या न हो।"

"बहुत बढ़िया।" वागले ने अंदर ही अंदर खुश होते हुए कहा____"तो चलो शुरू करते हैं।"

कहने के साथ ही वागले ने सावित्री को कन्धों से पकड़ कर उसे बेड पर सीधा लेटा दिया। सावित्री इस वक़्त छुई मुई सी दिख रही थी। उसके चेहरे पर हल्की शर्म दिख रही थी। ख़ैर वागले ने उसे बेड पर लेटाया और फिर झुक कर उसके होठों को चूमने लगा। उसका एक हाथ सावित्री के गोरे और गुदाज बदन पर घूमने लगा था। उधर उसके ऐसा करते ही सावित्री के जिस्म में झुरझुरी सी होने लगी थी। वागले उसके होठों को अब चूसने लगा था और सावित्री जैसे अपनी साँसें थामे चुप चाप बेड पर पड़ी थी।

वागले कुछ देर तक सावित्री के होठों को चूमता चूसता रहा उसके बाद वो नीचे आया और सावित्री की ब्रा को एक हाथ से पकड़ कर ऊपर सरका दिया जिससे उसकी बड़ी बड़ी छातियां बेपर्दा हो ग‌ईं। वागले ने लपक कर उसकी एक छाती के निप्पल को मुँह में भर लिया। सावित्री के मुख से सिसकी निकल गई। उसने झट से अपना एक हाथ वागले के सिर पर रख कर अपनी उस छाती पर दबाया। वागले मज़े से उसके निप्पल को चूसते हुए दूसरे हाथ से उसकी दूसरी छाती को मसले जा रहा था।

कुछ ही देर में कमरे में सावित्री की सिसकारियां गूजने लगीं। हालांकि वो बहुत कोशिश कर रही थी कि उसके मुख से कोई आवाज़ न निकले किन्तु न चाहते हुए भी उसके मुख से ये सिसकियां निकल ही जाती थीं। कदाचित उसे भी अब मज़ा आने लगा था। उसकी आँखें बंद थीं और वो अपनी गर्दन को इधर उधर करती जा रही थी।

वागले उसकी चूचियों को चूमते चाटते नीचे की तरफ आया और सावित्री के पेट और उसकी नाभि पर अपनी जीभ को फेरने लगा। सावित्री का पेट बड़ी तेज़ी से सांस लेने की वजह से ऊपर नीचे हो रहा था। उधर वागले ने उसकी गहरी नाभि को अपनी जीभ से कुरेदते हुए अपना एक हाथ उसकी चूची से हटा कर सावित्री की चूत पर पेंटी के ऊपर से रखा और उसे हल्के हल्के सहलाने लगा। उसके ऐसा करते ही सावित्री को झटका लगा और उसने झट से अपनी टांगों को सिकोड़ने की कोशिश की। कुछ ही देर में वागले का वो हाथ सावित्री की चूत से निकले कामरस से गीला होता महसूस हुआ और साथ ही उसकी नाक में उस कामरस की खुशबू भी समाई।

वागले ने अपना चेहरा उठा कर सावित्री की तरफ देखा। सावित्री शख़्ती से अपनी आँखें बंद किए बेड पर पड़ी हुई थी। उसने एक हाथ से बेड की चादर को मुट्ठियों में पकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ को बढ़ा कर उसने वागले के उस हाथ पर रख लिया था जो हाथ उसकी चूत को सहला रहा था।

"कैसा लग रहा है मेरी जान?" वागले ने सावित्री को देखते हुए मुस्कुरा कर कहा तो सावित्री ने अपनी आँखों को और शख़्ती से बंद कर लिया और गर्दन को दूसरी तरफ लाजवश घुमा लिया। उसके होठ कांप रहे थे। वागले उसे देख कर मुस्कुरा उठा। वो जानता था कि इस मामले में सावित्री से कुछ भी पूछना बेकार था क्योंकि वो शुरू से ही इस मामले में बेहद शर्म करती थी।

"अरे! कुछ तो बोलो।" वागले ने मुस्कुराते हुए कहा तो सावित्री ने आँखे बंद किए हुए ही कहा____"आपको तो लाज नहीं आती लेकिन मुझे आती है। इस लिए आपको जो करना है कीजिए, मुझसे कुछ मत पूछिए।"
 
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