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हम फिर आगे बढने लगे ।
सफर था कि खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था ।
और फिर तकरीबन एक घंटे चलने के बाद हम जिस स्थान पर पहुंचे तो सामने चढाई थी ।
बायी तरफ पहाडियों थीं । पहाडियों पर जगह-जगह छोटे-बडे पत्थर बिखेरे हुए थे ।
पत्थरों का कब्रिस्तान-सा लग-रहा था वह ।
"अब किधर चलना है?" मैंने पूछा ।
"हमें चढाई चढकर दूसरी तरफ पहुंचना है । उसके बाद आगे का सफर होगा ।"
" चलो !"
हम चढाई चढने लगे ।
चढाई खडी थी ।
हमें एक-एक पैर जमाकर रखना पड़ रहा था । जरा-सी चूक हमारी मौत का सबब बन सकती थी ।
"मैंने कहा था ना मेडम कि रास्ता छोटा अवश्य है , लेकिन जोखिम भरा है ।" क्लाइव ने कहा ।
" तुम चलते रहो ।"
" मै रुका कहां हू। चल ही तो रहा हु ।" क्लाइव ने अपनी बात इस अंदाज में कही, थी कि मैं मुस्कुराये बगैर नहीं रह सकी ।
चढाई चढने में हमें आधे घण्टे से ऊपर का वक्त लगा था ।
कई बार तो हम फिसलते-फिसलते बचे थे । हम ऊपर पहुंचे ।
कुछ देर तक समतल जगह थी । उसके बाद ढलान था ।
चढाई चढने के कारण हमारी सांसें फूल गई थीं और हम यूं हांफ रहे थे मानो अभी-अभी भीलों लम्बी रेस लगाकर आये हों ।
क्लाइव एक चट्टान से पीठ सटाकर बैठ गया ।
"थक गये क्या?" मैंने पूछा ।
"इ. . इतनी ऊचाई चढकर आया हू।" वह अपनी ऊखडती हुई सांसों पर नियंत्रण करता हुआ बोला-" थकान तो होगी । "
मैं भी पत्थर से टिककर अपनी उखडी सांसों पर काबू करने लगी ।
"अ. . . आप भी थोडी देर बेठ जाइये। उसके बाद जागे चलेंगे ।" वह पुन: बोल उठा ।
मैं क्लाइव की बगल में चट्टान से पीठ सटाकर बैठ गई ।
"अभी तो मंजिल दूर है ।" क्लाइव धीरे से बोला ।
" तुम बार-बार मंजिल का रोना क्यों रोने लगते हो? मजिलं कितनी दूर सही, उसे तय तो करना ही पड़ेगा ।"
" 'मैँ रोना नहीं रो रहा । आपको बता रहा हूं ।"
" तुम बता तो चुके हो कितनी बार बताओगे बैसे ऐसा लगता है कि इस से जाने पर तुम खुश नहीं हो ।"
"ये बात नहीं मैडम ।।"
" यही बात है । तुम्हारे चेहरे के भाव साफ बता रहे हैं । तुम्हारे चेहरे पर कुढ़न और झुझलाहट के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे है । ये रास्ता भी तुम ही ने चुना था । अगर ये रास्ता इतना ही मुसीबतों से भरा था, किसी दूसरे रास्ते का चुनाव करते ।"
क्लाइव ने होंठ मीच लिये ।
"यहा तो दूर-दूर तक किसी इन्सान की परछाईं तक नजर नहीं आ रही है ।" सहसा वातावरण में एक स्वर उभरा----"मुझे नहीं लगता कि वे लोग इस तरफ आये हौं ।"
"वे इसी तरफ आ सकते हैं और क्रिस तरफ जायेंगे?" मेरे कानों से दूसरा स्वर टकराया । मैं चौंकी ।
वे आवाजें चट्टानों के पीछे से आई थीं । आवाजें सुनकर मुझे अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि बातें करने वाले सेनिक हैं । पट्ठे हमें तलाश करते हुए यहां तक आ धमके थे ।
मुसीबत पर मुसीबत ।
एक क्षण बगैर एक अटके से उठी ओर मैंने पलटकर चट्टान के दूसरी तरफ देखा । मेरा अंदाजा ठीक निकला था । दूसरी तरफ पांच सेनिक खड़े थे । वे चट्टान के नीचे खड़े आपस में बातें कर रहे थे । दूर तक खाली समतल जगह थीं ।
" सैनिक ।" क्लाइव उठकर खड़ा होता हुआ बोला ।
"हां !"
" लगता है कि ये हरामजादे हमारा पीछा छोड़ने वाले नहीं हैं ।"
क्लाइव ने अपना वाक्य पूरा किया ही था कि उनमें से एक सैनिक बोल उठा "अब क्या किया जाये?"
" हम लोगों को चट्टानों के पीछे जाकर देखना चाहिये । हो सकता है कि रीमा भारती चढाई चढकर उपर पहुची हो ।" दूसरे ने कहा ।
" अब सोच क्या रही हो मेडम?" क्लाइव फुसफुसाया---" इन पाचों को ऊपर पहुचा देते हैं ।"
" पाचो को उपर तो पहुचाना ही है, लेकिन गोलियां चलाना हमारे हक में ठीक नहीं होगा ,
क्योंकि आसपास दूसरे सेनिक भी हमेँ तलाश कर रहे होगे । गोलियों की आवाज सुनकर वे इसी तरफ भागेंगे । वो स्थिति हमारे लिये ठीक नही-रहेगी । इन्हें रास्ते से हटाने का कोई दूसरा रास्ता सोचना पडेगा ।"
"इन हालात में दूसरा कौन-सा रास्ता हो सकता है?" उसने आश्चर्य भरे स्वर में पूछा ।
" जरा सोचने दो ।"
मैं सोचने लगी ।
मेरी निगाहें सामने एक बड़े से पत्थर पर स्थिर होकृर रह गई । दूसरे क्षण मेरी आंखें चमक उठी ।
"इस पत्थर को नीचे लुढ़काने में मेरी मदद करो ।" मैं गन कंघे पर लटकाकर उस पत्थर पर दोनों हाथ रख़कर बोली ।
"इ. . .इस पत्थर को लुढकाने से क्या होगा?" चकराये-से क्लाइव ने पूछा ।
. , . "ये पत्थर ही उन सैनिकों की मौत का कारण बनेगा । बस इस पत्थर को नीचे की तरफ ढलान पर लुढ़काने की देर है ।"
क्लाइव. ने आगे कोई सवाल नहीं काया, ।
वह पत्थर नीचे लुढ़काने में मदद करने लगा ।
पत्थर काफी भारी था । हमने पत्थर लुढ़काने में अपनी .समूची ताकत लगा दी थी । आखिर हम पत्थर तुढ़काने में कामयाब हो गये । पत्थर अपने साथ धूल और मिट्टी के कण उडाता हुआ तेजी से नीचे की तरफ़ लुढ़कता चला गया ।
सेनिक वार्तालाप में व्यस्त थे । वे उस वक्त चोंकं जब पत्थर मौत बना उनके सिर पर पहुंच चुका था । उनके पास संभलने का वक्त ही नहीं था । पत्थर सैनिकों को अपनी चपेट में लेता चला गया । पांचों सैनिक उस पत्थर के नीचे दबे पड़े थे । कुछ पलों तक वे 'हाथ पटकते नजर आये, फिर उनके हाथों में हरकत नहीं हुई ।
पांचो लाशों में तब्दील हो चुके थे । तभी!-
'तढ़. . .तढ़. ..रेट. . .रेट. . . ।'
अभी मेरी निगाहें पत्थर की चपेट में आ आये सैनिकों पर थी कि बायीं ओर की चट्टानों की तरफ से गोलियां बरसने लगी । मैं एक क्षण का सौवां हिस्सा गंवाये बगैर जमीन पर बैठ गई ।
क्लाइव भी कम फुर्तीला नहीं निकला था ।
उसने मेरा अनुसरण किया था ।
गोलियों हमारे ऊपर से गुजर गई । हम दोनों चट्टानों की ओट में होकर जवाबी कार्यवाही में लग गए ।
"तुम लोग चारों तरफ से धिर चुके हो ।" सहसा वातावरण में एक कर्कश स्वर गूंजा-"तुम्हारी खैरियत इसी में है कि हथियार फेंककर अपने आपको हमारे हवाले कर दो, वरना बहुत बुरी मौत मारे जाओगेगे ।" . .
हालांकि उस चेतावनी का हम पर जरा भी प्रभाव नहीं पड़ा ।
किन्तु खतरा कभी भी हम लोगों के सिर पर पहुंच सकता था । मेरा मस्तिष्क तेजी से काम का रहा था ।
मैंने अपने आसपास का मुआयना क्रिया और इस नतीजे पर पहुंचीं कि वे हम लोगों तक आसानी से नहीं पहुच सकते थे । फिर भी उन सैनिकों का जिन्दा बचे रहना हमारे लिए घातक सिद्ध हो सकता था ।
"क्लाइब ! एक पल कुछ सोचकर मैं फुसफुसाईं ।
"यस मैडम !"
"जब तक हम चट्टान के पीछे छिपे सैनिकों को खत्म नहीं कर देते, तब तक हम यहां से हिल भी नहीं सकते । तुम अपना ध्यान रखना । अगर कोई भी सैनिक अपने आसपास नजर आये, वो बचना नहीं चाहिये । मैं उन से निबटती हु ।"
"मैं भी आपके साथ चलता हू।"
"तुम मेरे साथ नहीं चलोगे । तुम्हें यहां रहना ज़रूरी है । अगर हम दोनों साथ गये तो पीछे से सैनिक हम पर हल्ला बोल सकते हैं ।-तुम यहाँ रहोगे तो तुम उन्हें सम्भाल तो लोगे ।"
" मै समझ गया । आप जाइये मैडम!" मैं सोच चुकी थी कि मुझे क्या करना है? "
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सफर था कि खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था ।
और फिर तकरीबन एक घंटे चलने के बाद हम जिस स्थान पर पहुंचे तो सामने चढाई थी ।
बायी तरफ पहाडियों थीं । पहाडियों पर जगह-जगह छोटे-बडे पत्थर बिखेरे हुए थे ।
पत्थरों का कब्रिस्तान-सा लग-रहा था वह ।
"अब किधर चलना है?" मैंने पूछा ।
"हमें चढाई चढकर दूसरी तरफ पहुंचना है । उसके बाद आगे का सफर होगा ।"
" चलो !"
हम चढाई चढने लगे ।
चढाई खडी थी ।
हमें एक-एक पैर जमाकर रखना पड़ रहा था । जरा-सी चूक हमारी मौत का सबब बन सकती थी ।
"मैंने कहा था ना मेडम कि रास्ता छोटा अवश्य है , लेकिन जोखिम भरा है ।" क्लाइव ने कहा ।
" तुम चलते रहो ।"
" मै रुका कहां हू। चल ही तो रहा हु ।" क्लाइव ने अपनी बात इस अंदाज में कही, थी कि मैं मुस्कुराये बगैर नहीं रह सकी ।
चढाई चढने में हमें आधे घण्टे से ऊपर का वक्त लगा था ।
कई बार तो हम फिसलते-फिसलते बचे थे । हम ऊपर पहुंचे ।
कुछ देर तक समतल जगह थी । उसके बाद ढलान था ।
चढाई चढने के कारण हमारी सांसें फूल गई थीं और हम यूं हांफ रहे थे मानो अभी-अभी भीलों लम्बी रेस लगाकर आये हों ।
क्लाइव एक चट्टान से पीठ सटाकर बैठ गया ।
"थक गये क्या?" मैंने पूछा ।
"इ. . इतनी ऊचाई चढकर आया हू।" वह अपनी ऊखडती हुई सांसों पर नियंत्रण करता हुआ बोला-" थकान तो होगी । "
मैं भी पत्थर से टिककर अपनी उखडी सांसों पर काबू करने लगी ।
"अ. . . आप भी थोडी देर बेठ जाइये। उसके बाद जागे चलेंगे ।" वह पुन: बोल उठा ।
मैं क्लाइव की बगल में चट्टान से पीठ सटाकर बैठ गई ।
"अभी तो मंजिल दूर है ।" क्लाइव धीरे से बोला ।
" तुम बार-बार मंजिल का रोना क्यों रोने लगते हो? मजिलं कितनी दूर सही, उसे तय तो करना ही पड़ेगा ।"
" 'मैँ रोना नहीं रो रहा । आपको बता रहा हूं ।"
" तुम बता तो चुके हो कितनी बार बताओगे बैसे ऐसा लगता है कि इस से जाने पर तुम खुश नहीं हो ।"
"ये बात नहीं मैडम ।।"
" यही बात है । तुम्हारे चेहरे के भाव साफ बता रहे हैं । तुम्हारे चेहरे पर कुढ़न और झुझलाहट के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे है । ये रास्ता भी तुम ही ने चुना था । अगर ये रास्ता इतना ही मुसीबतों से भरा था, किसी दूसरे रास्ते का चुनाव करते ।"
क्लाइव ने होंठ मीच लिये ।
"यहा तो दूर-दूर तक किसी इन्सान की परछाईं तक नजर नहीं आ रही है ।" सहसा वातावरण में एक स्वर उभरा----"मुझे नहीं लगता कि वे लोग इस तरफ आये हौं ।"
"वे इसी तरफ आ सकते हैं और क्रिस तरफ जायेंगे?" मेरे कानों से दूसरा स्वर टकराया । मैं चौंकी ।
वे आवाजें चट्टानों के पीछे से आई थीं । आवाजें सुनकर मुझे अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि बातें करने वाले सेनिक हैं । पट्ठे हमें तलाश करते हुए यहां तक आ धमके थे ।
मुसीबत पर मुसीबत ।
एक क्षण बगैर एक अटके से उठी ओर मैंने पलटकर चट्टान के दूसरी तरफ देखा । मेरा अंदाजा ठीक निकला था । दूसरी तरफ पांच सेनिक खड़े थे । वे चट्टान के नीचे खड़े आपस में बातें कर रहे थे । दूर तक खाली समतल जगह थीं ।
" सैनिक ।" क्लाइव उठकर खड़ा होता हुआ बोला ।
"हां !"
" लगता है कि ये हरामजादे हमारा पीछा छोड़ने वाले नहीं हैं ।"
क्लाइव ने अपना वाक्य पूरा किया ही था कि उनमें से एक सैनिक बोल उठा "अब क्या किया जाये?"
" हम लोगों को चट्टानों के पीछे जाकर देखना चाहिये । हो सकता है कि रीमा भारती चढाई चढकर उपर पहुची हो ।" दूसरे ने कहा ।
" अब सोच क्या रही हो मेडम?" क्लाइव फुसफुसाया---" इन पाचों को ऊपर पहुचा देते हैं ।"
" पाचो को उपर तो पहुचाना ही है, लेकिन गोलियां चलाना हमारे हक में ठीक नहीं होगा ,
क्योंकि आसपास दूसरे सेनिक भी हमेँ तलाश कर रहे होगे । गोलियों की आवाज सुनकर वे इसी तरफ भागेंगे । वो स्थिति हमारे लिये ठीक नही-रहेगी । इन्हें रास्ते से हटाने का कोई दूसरा रास्ता सोचना पडेगा ।"
"इन हालात में दूसरा कौन-सा रास्ता हो सकता है?" उसने आश्चर्य भरे स्वर में पूछा ।
" जरा सोचने दो ।"
मैं सोचने लगी ।
मेरी निगाहें सामने एक बड़े से पत्थर पर स्थिर होकृर रह गई । दूसरे क्षण मेरी आंखें चमक उठी ।
"इस पत्थर को नीचे लुढ़काने में मेरी मदद करो ।" मैं गन कंघे पर लटकाकर उस पत्थर पर दोनों हाथ रख़कर बोली ।
"इ. . .इस पत्थर को लुढकाने से क्या होगा?" चकराये-से क्लाइव ने पूछा ।
. , . "ये पत्थर ही उन सैनिकों की मौत का कारण बनेगा । बस इस पत्थर को नीचे की तरफ ढलान पर लुढ़काने की देर है ।"
क्लाइव. ने आगे कोई सवाल नहीं काया, ।
वह पत्थर नीचे लुढ़काने में मदद करने लगा ।
पत्थर काफी भारी था । हमने पत्थर लुढ़काने में अपनी .समूची ताकत लगा दी थी । आखिर हम पत्थर तुढ़काने में कामयाब हो गये । पत्थर अपने साथ धूल और मिट्टी के कण उडाता हुआ तेजी से नीचे की तरफ़ लुढ़कता चला गया ।
सेनिक वार्तालाप में व्यस्त थे । वे उस वक्त चोंकं जब पत्थर मौत बना उनके सिर पर पहुंच चुका था । उनके पास संभलने का वक्त ही नहीं था । पत्थर सैनिकों को अपनी चपेट में लेता चला गया । पांचों सैनिक उस पत्थर के नीचे दबे पड़े थे । कुछ पलों तक वे 'हाथ पटकते नजर आये, फिर उनके हाथों में हरकत नहीं हुई ।
पांचो लाशों में तब्दील हो चुके थे । तभी!-
'तढ़. . .तढ़. ..रेट. . .रेट. . . ।'
अभी मेरी निगाहें पत्थर की चपेट में आ आये सैनिकों पर थी कि बायीं ओर की चट्टानों की तरफ से गोलियां बरसने लगी । मैं एक क्षण का सौवां हिस्सा गंवाये बगैर जमीन पर बैठ गई ।
क्लाइव भी कम फुर्तीला नहीं निकला था ।
उसने मेरा अनुसरण किया था ।
गोलियों हमारे ऊपर से गुजर गई । हम दोनों चट्टानों की ओट में होकर जवाबी कार्यवाही में लग गए ।
"तुम लोग चारों तरफ से धिर चुके हो ।" सहसा वातावरण में एक कर्कश स्वर गूंजा-"तुम्हारी खैरियत इसी में है कि हथियार फेंककर अपने आपको हमारे हवाले कर दो, वरना बहुत बुरी मौत मारे जाओगेगे ।" . .
हालांकि उस चेतावनी का हम पर जरा भी प्रभाव नहीं पड़ा ।
किन्तु खतरा कभी भी हम लोगों के सिर पर पहुंच सकता था । मेरा मस्तिष्क तेजी से काम का रहा था ।
मैंने अपने आसपास का मुआयना क्रिया और इस नतीजे पर पहुंचीं कि वे हम लोगों तक आसानी से नहीं पहुच सकते थे । फिर भी उन सैनिकों का जिन्दा बचे रहना हमारे लिए घातक सिद्ध हो सकता था ।
"क्लाइब ! एक पल कुछ सोचकर मैं फुसफुसाईं ।
"यस मैडम !"
"जब तक हम चट्टान के पीछे छिपे सैनिकों को खत्म नहीं कर देते, तब तक हम यहां से हिल भी नहीं सकते । तुम अपना ध्यान रखना । अगर कोई भी सैनिक अपने आसपास नजर आये, वो बचना नहीं चाहिये । मैं उन से निबटती हु ।"
"मैं भी आपके साथ चलता हू।"
"तुम मेरे साथ नहीं चलोगे । तुम्हें यहां रहना ज़रूरी है । अगर हम दोनों साथ गये तो पीछे से सैनिक हम पर हल्ला बोल सकते हैं ।-तुम यहाँ रहोगे तो तुम उन्हें सम्भाल तो लोगे ।"
" मै समझ गया । आप जाइये मैडम!" मैं सोच चुकी थी कि मुझे क्या करना है? "
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