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"हम अतिथियों से केवल अतिथि गृह में भेंट करते हैं," गुस्से से तिलमिलाते हुए मान्या बोली। "आपको हमारे शयनकक्ष में आने की अनुमति है, राजकुमार विजयेंद्र प्रताप।"
"कुछ दिनों बाद, आपकी कमसिन जवानी और इस हसीन जिस्म को हमारे शयनकक्ष की शोभा ही तो बनना है, शहज़ादी अपराजिता," राजकुमार विजयेंद्र की आँखों में एक हवसी मुस्कान थी।
"क्या कहा आपने?" मान्या के होंठ गुस्से से फड़कने लगे।
"हमारे कहने का अर्थ है," राजकुमार विजयेंद्र ने फौरन पैंतरा बदला और बड़े अदब से कहा, "हम आपके लिए और हमारे चचेरे भाई राजकुमार उदयभान, आपकी छोटी बहन शहज़ादी रम्यसुता के लिये विवाह का प्रस्ताव लेकर आये हैं।"
"ऐसा कभी नहीं होगा," मान्या का गुस्सा ज्वालामुखी की फुट पड़ा। "क्या हम जानते नहीं हैं आप दोनों भाईयों ने क्या क्या पाप किये हैं? अपनी प्रजा पर कैसे कैसे ज़ुल्म ढाये हैं, आपने। लगान न दे पाने वाले गरीब किसानों को आप जीवित ही शेर चीतों को खिला देते हैं। आपके सैनिक उनकी जवान बेटियों को उठाकर आपके राजमहल ले आते हैं और आप उनके शरीर से अपनी वासना की प्यास बुझाते हैं। और जब मन भर जाता है तो उन्हें ज़िंदा जला देते हैं।"
"राजा का फर्ज़ होता है अपने प्रजा की देखभाल करना। मगर प्रजा के कल्याण की चिंता छोड़कर आप दोनों दिन भर मदिरा में डूबे रहते हैं और जुआ खेलते रहते हैं। उसके बाद आप शिकार पर निकलते हैं, मगर स्त्री के शरीर का। जिस पर आपकी बुरी नज़र पड़ती है, आप उसे उठवा कर अपने शयन कक्ष की रौनक बना लेते हैं। विवाह की बात करने से पहले आप दोनों स्त्री का सम्मान करना सीखिए। धिक्कार है आप दोनों पर!"
मान्या पाँव पटकती हुई कमरे से बाहर जाने लगी तो राजकुमार विजयेंद्र ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया।
"अब जवानी के दिनों में ऐसी हसीन गलतियाँ कौन नहीं करता?" राजकुमार की नजरें मान्या के उभरे सीने पर जा रुकीं।
मान्या के सीने से चुनरी खिसक गई थी जिसकी वजह से उसकी तंग चोली से उसके बूब्स के उभार की झलक दिख रही थी। गुस्से में होने की वजह से मान्या की साँसें चढ़ गई थी और उसकी छाती ज़ोर ज़ोर से उठ गिर रही थी।
"और जो ऐसी गलती न करे उसकी जवानी भला किस काम की?" विजयेंद्र ने मान्या को अपने करीब खींच लिया और इतना कसकर बाँहों में भर लिया कि मान्या के कोमल बूब्स उसकी चट्टान जैसी मज़बूत छाती में धंस गए।
"शर्म नहीं आती तुझे, खुद को मर्द कहते हुए?" मान्या ने विजयेंद्र को धक्का देकर पीछे धकेल दिया और उसके मुँह पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। "अब किसी औरत को हाथ लगाने से पहले हमारा दिया ये उपहार याद कर लेना।"
मान्या ने विजयेंद्र को एक आखिरी बार गुस्से से घूरा और कमरे से बाहर चली गयी। रम्या और उसकी दासियाँ भी दोनों राजकुमारों को गुस्से से घूरते हुए वहाँ से चली गईं।
"हमारे इस अपमान की सज़ा तुझे अपने बदन से चुकानी होगी मान्या," विजयेंद्र घायल शेर की तरह गुर्राने लगा। "तेरी उफ़नती जवानी को अपने बिस्तर पर रौंद कर हमेशा के लिए ख़ामोश न कर दिया तो हम भी राजकुमार विजयेंद्र प्रताप नहीं।"
"आपकी इस इच्छा को पूरा करने में मैं आपकी मदद करूँगी, राजकुमार।"
एक औरत की आवाज़ सुनकर राजकुमार विजयेंद्र पीछे मुड़ा। उसके पीछे एक 50 - 55 साल की औरत खड़ी थी जो रेशम की साड़ी पहने हुए थी और सोने के ज़ेवरों से लदी हुई थी। उसकी आँखें काजल से भरी, होंठ पान के कत्थे से सुर्ख थे और बालों में गजरा सजा था। मगर, उसकी आँखों में हैवानियत भरी थी।
"प्रणाम राजकुमार," वो औरत बड़ी मीठी सी मुस्कान के साथ आगे आयी और बड़े अदब से सर झुकाकर बोली। "मेरा नाम अजितेश्वरी देवी है। मैं भानुगढ़ की राजनर्तकी कुमारी आर्द्रपाणिनी की माँ हूँ।"
"आप हमारी मदद क्यों करना चाहती हैं?" राजकुमार ने शक की नज़रों से उस औरत को तोला।
"मैं, महाराज भानुप्रतापदेव की शुभचिंतक हूँ," अजितेश्वरी ने अपने पाखंड पर पर्दा डालने के लिए गदगद होने का नाटक किया।
"महाराज के बहुत उपकार हैं, मेरे परिवार पर। जब हम मुश्किल वक़्त से गुज़र रहे थे तब महाराज ने ही हमें सहारा दिया था। महराज की बेटियाँ, मेरी अपनी बेटियों जैसी ही हैं।"
"उनकी शादी आप दोनों जैसे शूरवीर राजकुमारों से हो जाए तो मेरे लिए इससे अधिक खुशी की बात और क्या होगी? यदि यहाँ की शहज़ादियों का विवाह, समरपुर के राजकुमारों से हो जाता है तो दोनों पड़ोसी राज्यों में जो अनबन और तनाव है वो भी दूर हो जाएगा। हर तरह से ये रिश्ता शहज़ादियों के लिए उत्तम है।"
"मगर, शहज़ादियों को तो हम दोनों फूटी आँख नहीं भाते," विजयेंद्र ने खीजते हुए कहा। "फ़िर वो कैसे हम से विवाह करने के लिए राज़ी होंगी?"
"अरे! वो तो नादान बच्चियाँ हैं," अजितेश्वरी बड़े प्यार से मुस्कायी। "उन्हें अच्छे बुरे की समझ कहाँ? जवानी के जोश में अपने होश खो बैठी हैं। उनको आपकी बाँहों तक पहुँचाने का ज़िम्मा मैं लेती हूँ, राजकुमार।"
"हम आपके कहने का अर्थ नहीं समझे," विजयेन्द्र भौहें सिकोड़े अजितेश्वरी को घूरने लगा।
"जवानी का नशा होता ही ऐसा है कि किसी के भी होश छीन ले," अजितेश्वरी की मक्कारी उसकी आँखों में झलक रही थी। "और नशे में अपने होश गवांकर आपकी बाँहों में ही आ गिरेंगी दोनों। तब आप उन्हें हमेशा के लिए अपना बना लेना।"
"आप ये क्या पहेलियाँ बुझा रहीं हैं," विजयेंद्र झल्लाने लगा। "हमें तो कुछ समझ नहीं आ रहा।"
"आप आज रात शहज़ादी मान्या के शयनकक्ष आ जाईये," अजितेश्वरी का कमीनापन उसकी आँखों से उसके होंठों की मुस्कान में उतर आया। "बाकी हम सम्भाल लेंगे।"
"जिस शहज़ादी ने हमें बेइज़्ज़त कर के निकाल दिया," विजयेंद्र ने बड़ी हैरानी से अजितेश्वरी को देखते हुए कहा, "क्या आपको लगता है वो रात के समय हमें अपने शयन कक्ष में आने देगी।"
"आप आज की पूरी रात शहज़ादी के साथ उनके शयनकक्ष में ही बिताएंगे," अजितेश्वरी ने पूरे विश्वास के साथ कहा। "और शहज़ादी कोई ऐतराज़ नहीं जतायेगीं। मेरा विश्वास कीजिये राजकुमार, कल के सूरज के उगते ही वो आपसे विवाह करने को राजी हो जाएगी।"
इतना कहकर अजितेश्वरी वापस जाने को मुड़ी और एक ज़ालिम मुस्कान के साथ खुद से बोली, "और रास्ता भी क्या रह जायेगा बेचारी के पास!”
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"क्या कहा आपने?" मान्या के होंठ गुस्से से फड़कने लगे।
"हमारे कहने का अर्थ है," राजकुमार विजयेंद्र ने फौरन पैंतरा बदला और बड़े अदब से कहा, "हम आपके लिए और हमारे चचेरे भाई राजकुमार उदयभान, आपकी छोटी बहन शहज़ादी रम्यसुता के लिये विवाह का प्रस्ताव लेकर आये हैं।"
"ऐसा कभी नहीं होगा," मान्या का गुस्सा ज्वालामुखी की फुट पड़ा। "क्या हम जानते नहीं हैं आप दोनों भाईयों ने क्या क्या पाप किये हैं? अपनी प्रजा पर कैसे कैसे ज़ुल्म ढाये हैं, आपने। लगान न दे पाने वाले गरीब किसानों को आप जीवित ही शेर चीतों को खिला देते हैं। आपके सैनिक उनकी जवान बेटियों को उठाकर आपके राजमहल ले आते हैं और आप उनके शरीर से अपनी वासना की प्यास बुझाते हैं। और जब मन भर जाता है तो उन्हें ज़िंदा जला देते हैं।"
"राजा का फर्ज़ होता है अपने प्रजा की देखभाल करना। मगर प्रजा के कल्याण की चिंता छोड़कर आप दोनों दिन भर मदिरा में डूबे रहते हैं और जुआ खेलते रहते हैं। उसके बाद आप शिकार पर निकलते हैं, मगर स्त्री के शरीर का। जिस पर आपकी बुरी नज़र पड़ती है, आप उसे उठवा कर अपने शयन कक्ष की रौनक बना लेते हैं। विवाह की बात करने से पहले आप दोनों स्त्री का सम्मान करना सीखिए। धिक्कार है आप दोनों पर!"
मान्या पाँव पटकती हुई कमरे से बाहर जाने लगी तो राजकुमार विजयेंद्र ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ लिया।
"अब जवानी के दिनों में ऐसी हसीन गलतियाँ कौन नहीं करता?" राजकुमार की नजरें मान्या के उभरे सीने पर जा रुकीं।
मान्या के सीने से चुनरी खिसक गई थी जिसकी वजह से उसकी तंग चोली से उसके बूब्स के उभार की झलक दिख रही थी। गुस्से में होने की वजह से मान्या की साँसें चढ़ गई थी और उसकी छाती ज़ोर ज़ोर से उठ गिर रही थी।
"और जो ऐसी गलती न करे उसकी जवानी भला किस काम की?" विजयेंद्र ने मान्या को अपने करीब खींच लिया और इतना कसकर बाँहों में भर लिया कि मान्या के कोमल बूब्स उसकी चट्टान जैसी मज़बूत छाती में धंस गए।
"शर्म नहीं आती तुझे, खुद को मर्द कहते हुए?" मान्या ने विजयेंद्र को धक्का देकर पीछे धकेल दिया और उसके मुँह पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। "अब किसी औरत को हाथ लगाने से पहले हमारा दिया ये उपहार याद कर लेना।"
मान्या ने विजयेंद्र को एक आखिरी बार गुस्से से घूरा और कमरे से बाहर चली गयी। रम्या और उसकी दासियाँ भी दोनों राजकुमारों को गुस्से से घूरते हुए वहाँ से चली गईं।
"हमारे इस अपमान की सज़ा तुझे अपने बदन से चुकानी होगी मान्या," विजयेंद्र घायल शेर की तरह गुर्राने लगा। "तेरी उफ़नती जवानी को अपने बिस्तर पर रौंद कर हमेशा के लिए ख़ामोश न कर दिया तो हम भी राजकुमार विजयेंद्र प्रताप नहीं।"
"आपकी इस इच्छा को पूरा करने में मैं आपकी मदद करूँगी, राजकुमार।"
एक औरत की आवाज़ सुनकर राजकुमार विजयेंद्र पीछे मुड़ा। उसके पीछे एक 50 - 55 साल की औरत खड़ी थी जो रेशम की साड़ी पहने हुए थी और सोने के ज़ेवरों से लदी हुई थी। उसकी आँखें काजल से भरी, होंठ पान के कत्थे से सुर्ख थे और बालों में गजरा सजा था। मगर, उसकी आँखों में हैवानियत भरी थी।
"प्रणाम राजकुमार," वो औरत बड़ी मीठी सी मुस्कान के साथ आगे आयी और बड़े अदब से सर झुकाकर बोली। "मेरा नाम अजितेश्वरी देवी है। मैं भानुगढ़ की राजनर्तकी कुमारी आर्द्रपाणिनी की माँ हूँ।"
"आप हमारी मदद क्यों करना चाहती हैं?" राजकुमार ने शक की नज़रों से उस औरत को तोला।
"मैं, महाराज भानुप्रतापदेव की शुभचिंतक हूँ," अजितेश्वरी ने अपने पाखंड पर पर्दा डालने के लिए गदगद होने का नाटक किया।
"महाराज के बहुत उपकार हैं, मेरे परिवार पर। जब हम मुश्किल वक़्त से गुज़र रहे थे तब महाराज ने ही हमें सहारा दिया था। महराज की बेटियाँ, मेरी अपनी बेटियों जैसी ही हैं।"
"उनकी शादी आप दोनों जैसे शूरवीर राजकुमारों से हो जाए तो मेरे लिए इससे अधिक खुशी की बात और क्या होगी? यदि यहाँ की शहज़ादियों का विवाह, समरपुर के राजकुमारों से हो जाता है तो दोनों पड़ोसी राज्यों में जो अनबन और तनाव है वो भी दूर हो जाएगा। हर तरह से ये रिश्ता शहज़ादियों के लिए उत्तम है।"
"मगर, शहज़ादियों को तो हम दोनों फूटी आँख नहीं भाते," विजयेंद्र ने खीजते हुए कहा। "फ़िर वो कैसे हम से विवाह करने के लिए राज़ी होंगी?"
"अरे! वो तो नादान बच्चियाँ हैं," अजितेश्वरी बड़े प्यार से मुस्कायी। "उन्हें अच्छे बुरे की समझ कहाँ? जवानी के जोश में अपने होश खो बैठी हैं। उनको आपकी बाँहों तक पहुँचाने का ज़िम्मा मैं लेती हूँ, राजकुमार।"
"हम आपके कहने का अर्थ नहीं समझे," विजयेन्द्र भौहें सिकोड़े अजितेश्वरी को घूरने लगा।
"जवानी का नशा होता ही ऐसा है कि किसी के भी होश छीन ले," अजितेश्वरी की मक्कारी उसकी आँखों में झलक रही थी। "और नशे में अपने होश गवांकर आपकी बाँहों में ही आ गिरेंगी दोनों। तब आप उन्हें हमेशा के लिए अपना बना लेना।"
"आप ये क्या पहेलियाँ बुझा रहीं हैं," विजयेंद्र झल्लाने लगा। "हमें तो कुछ समझ नहीं आ रहा।"
"आप आज रात शहज़ादी मान्या के शयनकक्ष आ जाईये," अजितेश्वरी का कमीनापन उसकी आँखों से उसके होंठों की मुस्कान में उतर आया। "बाकी हम सम्भाल लेंगे।"
"जिस शहज़ादी ने हमें बेइज़्ज़त कर के निकाल दिया," विजयेंद्र ने बड़ी हैरानी से अजितेश्वरी को देखते हुए कहा, "क्या आपको लगता है वो रात के समय हमें अपने शयन कक्ष में आने देगी।"
"आप आज की पूरी रात शहज़ादी के साथ उनके शयनकक्ष में ही बिताएंगे," अजितेश्वरी ने पूरे विश्वास के साथ कहा। "और शहज़ादी कोई ऐतराज़ नहीं जतायेगीं। मेरा विश्वास कीजिये राजकुमार, कल के सूरज के उगते ही वो आपसे विवाह करने को राजी हो जाएगी।"
इतना कहकर अजितेश्वरी वापस जाने को मुड़ी और एक ज़ालिम मुस्कान के साथ खुद से बोली, "और रास्ता भी क्या रह जायेगा बेचारी के पास!”
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