S
StoryPublisher
Guest
“सर !” - एकाएक रागिनी बोली - “अखबार में उन दो बदमाशों का भी जिक्र छपा है जिन्होंने आप पर आक्रमण किया था । क्या यह बात आपने अपनी मिसेज को भी बताई थी ?”
“हां !” - राज बोला - “बताई थी ।”
“फिर तो हो सकता है कि आप ही के हित की खातिर उन्होंने वक्ती तौर पर चुपचाप कहीं चला जाना उचित समझा हो । अगर वे आपको बहुत चाहती हैं तो हो सकता है कि उनके गायब हो जाने के पीछे इस बात की दहशत हो कि कहीं आपका कोई अनिष्ट न हो जाए ।”
राज खामोश रहा । यह सम्भावना सब-इन्स्पेक्टर ठाकुर ने भी व्यक्त की थी, लेकिन तब उसने उसे झिड़ककर चुप करा दिया था । लेकिन अब उस लड़की के मुंह से वही बात सुनकर वह यह सोचने पर मजबूर हो गया कि ऐसा हो सकता था । उसे याद आया कि कामिनी ने यह बात बड़ी दहशत में सुनी थी कि जो मारकुटाई उन बदमाशों ने राज के साथ की थी वह तो सिर्फ नमूना थी, हकीकतन तो उसका उससे कहीं बुरा अन्जाम हो सकता था । लेकिन यह सवाल फिर भी उसके सामने सिर उठाए खड़ा था कि अगर ऐसी ही बात थी तो वह अपने कपड़े अपने साथ लेकर क्यों नहीं गई थी ।
और फिर वह गई कहां थी ?
अब उसे पुलिस का यह सोचना भी चिन्ता में डाल रहा था कि कामिनी के गायब होने के पीछे खुद उसका हाथ हो सकता था । उन्होंने मिसेज गोंसाल्वेज से जो सवाल पूछे थे, उनसे भी लगता था कि उनकी निगाह में कामिनी के गायब होने के पीछे उसका हाथ हो सकता था ।
“मेरी बड़ी बहन आपकी मिसेज को जानती थी ।”
“क्या ?” - राज की तन्द्रा टूटी । वह हड़बड़कार बोला - “क्या कहा ?”
“मैंने कहा मेरी बड़ी बहन आपकी मिसेज को जानती थी । छ: सात साल पहले वे दोनों क्लास फैलो थीं । वे बिशप काटन स्कूल में एक ही क्लास में पढती थीं । लेकिन आपकी मिसेज ने पढाई समाप्त करने से पहले ही स्कूल छोड़ दिया था ।”
“क्यों ?”
“मेरी बड़ी बहन कहती थी कि उस स्कूल का खर्चा आपकी मिसेज के घर वालों की बर्दाशत से बाहर हो गया था ।”
“बिशप काटन स्कूल छोड़कर कामिनी क्या कहीं और भर्ती हो गई थी ?”
“यह तो मुझे मालूम नहीं ।”
“तुम्हारी बहन को तो मालूम होगा ।”
“हां ! उसे तो मालूम होगा ।”
“मैं उससे बात करना चाहूंगा ।”
“लेकिन वह तो सिंगापुर में रहती है । हमारे जीजाजी तो शादी के छ: महीने बाद ही सिंगापुर चले गए थे ।”
“ओह !” - राज निराश स्वर में बोला ।
वह खामोश रही ।
“तुमने कभी कामिनी को देखा था ?” - राज ने पूछा ।
“जी नहीं ।”
“तुम्हें यह बात कैसे मालूम है कि कामिनी तुम्हारी बहन के साथ पढती थी ?”
“मेरी बहन ने ही मुझे बताया था । दो महीने पहले मेरी बहन कुछ दिनों के लिए कश्मीर आई थी । तब एक रोज उसने घर आकर जिक्र किया था कि उसे उस रोज उसकी एक पूरानी स्कूल मेट रिज पर मिली थी । मुझे उसने यह बात यह जताने के लिए बताई थी कि उसकी सहेली मेरे कालेज के एक प्रोफेसर की पत्नी बन चुकी थी ।”
“कामिनी के बारे में और क्या कहा था उसने ?”
“यही कि स्कूल में आपकी मिसेज बड़ी मेधावी छात्रा थीं और उसे अफसोस था कि उन्हें बीच में ही पढाई छोड़ देनी पड़ी थी ।”
“तुम्हें मालूम है उन दिनों कामिनी का घर कहां था ?”
“हां ! लक्कड़ बाजार में ।”
“लक्कड बाजार में कहां ?”
“यह तो मुझे मालूम नहीं । लक्कड़ बाजार का जिक्र भी मैंने बहुत पहले एक ही बाद सुना था जब मेरी बहन ने कहा था कि स्कूल पढने आने के लिए बेचारी कामिनी को, मेरा मतलब है, आपकी मिसेज को कश्मीर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पैदल चलकर आना पड़ता था ।”
“ओह !” - राज के स्वर में निराशा का साफ पुट था ।
“लेकिन उनका पता स्कूल के रिकार्ड में भी तो होगा ।”
“जरूर होगा, लेकिन उसके लिए मुझे कल तक इन्तजार करना पड़ेगा ।”
वह खामोश रही ।
राज को एक और जगह से भी कामिनी के बारे में कुछ इस प्रकार की जानकारी हासिल होने की सम्भावना दिखाई दे रही थी ।
जय शास्त्री नामक वकील को, जिसके पास कि कामिनी शादी से पहले नौकरी करती थी, उसके परिवार और उनके पते के बारे में जानकारी हो सकती थी ।
लेकिन उसके लिए भी सुबह उसका दफ्तर खुलने तक का इन्तजार करना जरूरी था ।
फिर वह मन ही मन याद करने की कोशिश करने लगा कि क्या वह बिशप काटन स्कूल के किसी अध्यापक को जानता था ।
उसे ऐसा कोई नाम याद न आया ।
वैसे अगर उसे कोई नाम याद आ भी जाता तो वह कोई बहुत आशाजनक बात न होती । जरूरी नहीं था कि कामिनी उसी अध्यापक की क्लास में रही होती और अगर रही भी होती तो जरूरी नहीं था कि अध्यापक को अपनी छ:-सात साल पहले की क्लास की किसी एक स्टूडेंट की याद रही होती ।
राज ने कार को रायबहादुर द्वारकानाथ की कोठी के सामने ले जाकर रोका ।
वहां पहुंचते ही रागिनी फिर भयभीत हो उठी और पत्ते की तरह कांपने लगी ।
“चलो ।” - राज बोला ।
“मैं नहीं जाऊंगी ।” - वह आतंकित स्वर में बोली - “पापा मेरी चमड़ी उधेड़ देंगे ।”
“वे तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे । रागिनी , मैं जब तक उनसे वायदा नहीं ले लूंगा कि वे तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे, मैं यहां से नहीं जाऊंगी ।”
वह फिर भी अपने स्थान से न हिली ।
“आओ ।” - राज ने उसे बांह पकड़कर जबरन कार से निकाला ।
सौभाग्यवश उसके मम्मी-पापा दोनों ही उस वक्त कोठी पर मौजूद थे ।
राज का परिचय पाकर वे खुश हुए, राज के साथ बड़ी इज्जत से पेश आए, लेकिन साथ ही इस बात पर हैरान भी हुए कि रागिनी उनके साथ वहां पहुंची थी ।
राज के अनुरोध पर वे एक अलग कमरे में पहुंचे । वहां तनहाई में राज ने धीरे-धीरे उन्हें सब बात समझाई ।
“हां !” - राज बोला - “बताई थी ।”
“फिर तो हो सकता है कि आप ही के हित की खातिर उन्होंने वक्ती तौर पर चुपचाप कहीं चला जाना उचित समझा हो । अगर वे आपको बहुत चाहती हैं तो हो सकता है कि उनके गायब हो जाने के पीछे इस बात की दहशत हो कि कहीं आपका कोई अनिष्ट न हो जाए ।”
राज खामोश रहा । यह सम्भावना सब-इन्स्पेक्टर ठाकुर ने भी व्यक्त की थी, लेकिन तब उसने उसे झिड़ककर चुप करा दिया था । लेकिन अब उस लड़की के मुंह से वही बात सुनकर वह यह सोचने पर मजबूर हो गया कि ऐसा हो सकता था । उसे याद आया कि कामिनी ने यह बात बड़ी दहशत में सुनी थी कि जो मारकुटाई उन बदमाशों ने राज के साथ की थी वह तो सिर्फ नमूना थी, हकीकतन तो उसका उससे कहीं बुरा अन्जाम हो सकता था । लेकिन यह सवाल फिर भी उसके सामने सिर उठाए खड़ा था कि अगर ऐसी ही बात थी तो वह अपने कपड़े अपने साथ लेकर क्यों नहीं गई थी ।
और फिर वह गई कहां थी ?
अब उसे पुलिस का यह सोचना भी चिन्ता में डाल रहा था कि कामिनी के गायब होने के पीछे खुद उसका हाथ हो सकता था । उन्होंने मिसेज गोंसाल्वेज से जो सवाल पूछे थे, उनसे भी लगता था कि उनकी निगाह में कामिनी के गायब होने के पीछे उसका हाथ हो सकता था ।
“मेरी बड़ी बहन आपकी मिसेज को जानती थी ।”
“क्या ?” - राज की तन्द्रा टूटी । वह हड़बड़कार बोला - “क्या कहा ?”
“मैंने कहा मेरी बड़ी बहन आपकी मिसेज को जानती थी । छ: सात साल पहले वे दोनों क्लास फैलो थीं । वे बिशप काटन स्कूल में एक ही क्लास में पढती थीं । लेकिन आपकी मिसेज ने पढाई समाप्त करने से पहले ही स्कूल छोड़ दिया था ।”
“क्यों ?”
“मेरी बड़ी बहन कहती थी कि उस स्कूल का खर्चा आपकी मिसेज के घर वालों की बर्दाशत से बाहर हो गया था ।”
“बिशप काटन स्कूल छोड़कर कामिनी क्या कहीं और भर्ती हो गई थी ?”
“यह तो मुझे मालूम नहीं ।”
“तुम्हारी बहन को तो मालूम होगा ।”
“हां ! उसे तो मालूम होगा ।”
“मैं उससे बात करना चाहूंगा ।”
“लेकिन वह तो सिंगापुर में रहती है । हमारे जीजाजी तो शादी के छ: महीने बाद ही सिंगापुर चले गए थे ।”
“ओह !” - राज निराश स्वर में बोला ।
वह खामोश रही ।
“तुमने कभी कामिनी को देखा था ?” - राज ने पूछा ।
“जी नहीं ।”
“तुम्हें यह बात कैसे मालूम है कि कामिनी तुम्हारी बहन के साथ पढती थी ?”
“मेरी बहन ने ही मुझे बताया था । दो महीने पहले मेरी बहन कुछ दिनों के लिए कश्मीर आई थी । तब एक रोज उसने घर आकर जिक्र किया था कि उसे उस रोज उसकी एक पूरानी स्कूल मेट रिज पर मिली थी । मुझे उसने यह बात यह जताने के लिए बताई थी कि उसकी सहेली मेरे कालेज के एक प्रोफेसर की पत्नी बन चुकी थी ।”
“कामिनी के बारे में और क्या कहा था उसने ?”
“यही कि स्कूल में आपकी मिसेज बड़ी मेधावी छात्रा थीं और उसे अफसोस था कि उन्हें बीच में ही पढाई छोड़ देनी पड़ी थी ।”
“तुम्हें मालूम है उन दिनों कामिनी का घर कहां था ?”
“हां ! लक्कड़ बाजार में ।”
“लक्कड बाजार में कहां ?”
“यह तो मुझे मालूम नहीं । लक्कड़ बाजार का जिक्र भी मैंने बहुत पहले एक ही बाद सुना था जब मेरी बहन ने कहा था कि स्कूल पढने आने के लिए बेचारी कामिनी को, मेरा मतलब है, आपकी मिसेज को कश्मीर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पैदल चलकर आना पड़ता था ।”
“ओह !” - राज के स्वर में निराशा का साफ पुट था ।
“लेकिन उनका पता स्कूल के रिकार्ड में भी तो होगा ।”
“जरूर होगा, लेकिन उसके लिए मुझे कल तक इन्तजार करना पड़ेगा ।”
वह खामोश रही ।
राज को एक और जगह से भी कामिनी के बारे में कुछ इस प्रकार की जानकारी हासिल होने की सम्भावना दिखाई दे रही थी ।
जय शास्त्री नामक वकील को, जिसके पास कि कामिनी शादी से पहले नौकरी करती थी, उसके परिवार और उनके पते के बारे में जानकारी हो सकती थी ।
लेकिन उसके लिए भी सुबह उसका दफ्तर खुलने तक का इन्तजार करना जरूरी था ।
फिर वह मन ही मन याद करने की कोशिश करने लगा कि क्या वह बिशप काटन स्कूल के किसी अध्यापक को जानता था ।
उसे ऐसा कोई नाम याद न आया ।
वैसे अगर उसे कोई नाम याद आ भी जाता तो वह कोई बहुत आशाजनक बात न होती । जरूरी नहीं था कि कामिनी उसी अध्यापक की क्लास में रही होती और अगर रही भी होती तो जरूरी नहीं था कि अध्यापक को अपनी छ:-सात साल पहले की क्लास की किसी एक स्टूडेंट की याद रही होती ।
राज ने कार को रायबहादुर द्वारकानाथ की कोठी के सामने ले जाकर रोका ।
वहां पहुंचते ही रागिनी फिर भयभीत हो उठी और पत्ते की तरह कांपने लगी ।
“चलो ।” - राज बोला ।
“मैं नहीं जाऊंगी ।” - वह आतंकित स्वर में बोली - “पापा मेरी चमड़ी उधेड़ देंगे ।”
“वे तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे । रागिनी , मैं जब तक उनसे वायदा नहीं ले लूंगा कि वे तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे, मैं यहां से नहीं जाऊंगी ।”
वह फिर भी अपने स्थान से न हिली ।
“आओ ।” - राज ने उसे बांह पकड़कर जबरन कार से निकाला ।
सौभाग्यवश उसके मम्मी-पापा दोनों ही उस वक्त कोठी पर मौजूद थे ।
राज का परिचय पाकर वे खुश हुए, राज के साथ बड़ी इज्जत से पेश आए, लेकिन साथ ही इस बात पर हैरान भी हुए कि रागिनी उनके साथ वहां पहुंची थी ।
राज के अनुरोध पर वे एक अलग कमरे में पहुंचे । वहां तनहाई में राज ने धीरे-धीरे उन्हें सब बात समझाई ।