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Adultery एक रात ऐसी भी

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“सर !” - एकाएक रागिनी बोली - “अखबार में उन दो बदमाशों का भी जिक्र छपा है जिन्होंने आप पर आक्रमण किया था । क्या यह बात आपने अपनी मिसेज को भी बताई थी ?”

“हां !” - राज बोला - “बताई थी ।”

“फिर तो हो सकता है कि आप ही के हित की खातिर उन्होंने वक्ती तौर पर चुपचाप कहीं चला जाना उचित समझा हो । अगर वे आपको बहुत चाहती हैं तो हो सकता है कि उनके गायब हो जाने के पीछे इस बात की दहशत हो कि कहीं आपका कोई अनिष्ट न हो जाए ।”

राज खामोश रहा । यह सम्भावना सब-इन्स्पेक्टर ठाकुर ने भी व्यक्त की थी, लेकिन तब उसने उसे झिड़ककर चुप करा दिया था । लेकिन अब उस लड़की के मुंह से वही बात सुनकर वह यह सोचने पर मजबूर हो गया कि ऐसा हो सकता था । उसे याद आया कि कामिनी ने यह बात बड़ी दहशत में सुनी थी कि जो मारकुटाई उन बदमाशों ने राज के साथ की थी वह तो सिर्फ नमूना थी, हकीकतन तो उसका उससे कहीं बुरा अन्जाम हो सकता था । लेकिन यह सवाल फिर भी उसके सामने सिर उठाए खड़ा था कि अगर ऐसी ही बात थी तो वह अपने कपड़े अपने साथ लेकर क्यों नहीं गई थी ।

और फिर वह गई कहां थी ?

अब उसे पुलिस का यह सोचना भी चिन्ता में डाल रहा था कि कामिनी के गायब होने के पीछे खुद उसका हाथ हो सकता था । उन्होंने मिसेज गोंसाल्वेज से जो सवाल पूछे थे, उनसे भी लगता था कि उनकी निगाह में कामिनी के गायब होने के पीछे उसका हाथ हो सकता था ।

“मेरी बड़ी बहन आपकी मिसेज को जानती थी ।”

“क्या ?” - राज की तन्द्रा टूटी । वह हड़बड़कार बोला - “क्या कहा ?”

“मैंने कहा मेरी बड़ी बहन आपकी मिसेज को जानती थी । छ: सात साल पहले वे दोनों क्लास फैलो थीं । वे बिशप काटन स्कूल में एक ही क्लास में पढती थीं । लेकिन आपकी मिसेज ने पढाई समाप्त करने से पहले ही स्कूल छोड़ दिया था ।”

“क्यों ?”

“मेरी बड़ी बहन कहती थी कि उस स्कूल का खर्चा आपकी मिसेज के घर वालों की बर्दाशत से बाहर हो गया था ।”

“बिशप काटन स्कूल छोड़कर कामिनी क्या कहीं और भर्ती हो गई थी ?”

“यह तो मुझे मालूम नहीं ।”

“तुम्हारी बहन को तो मालूम होगा ।”

“हां ! उसे तो मालूम होगा ।”

“मैं उससे बात करना चाहूंगा ।”

“लेकिन वह तो सिंगापुर में रहती है । हमारे जीजाजी तो शादी के छ: महीने बाद ही सिंगापुर चले गए थे ।”

“ओह !” - राज निराश स्वर में बोला ।

वह खामोश रही ।

“तुमने कभी कामिनी को देखा था ?” - राज ने पूछा ।

“जी नहीं ।”

“तुम्हें यह बात कैसे मालूम है कि कामिनी तुम्हारी बहन के साथ पढती थी ?”

“मेरी बहन ने ही मुझे बताया था । दो महीने पहले मेरी बहन कुछ दिनों के लिए कश्मीर आई थी । तब एक रोज उसने घर आकर जिक्र किया था कि उसे उस रोज उसकी एक पूरानी स्कूल मेट रिज पर मिली थी । मुझे उसने यह बात यह जताने के लिए बताई थी कि उसकी सहेली मेरे कालेज के एक प्रोफेसर की पत्नी बन चुकी थी ।”

“कामिनी के बारे में और क्या कहा था उसने ?”

“यही कि स्कूल में आपकी मिसेज बड़ी मेधावी छात्रा थीं और उसे अफसोस था कि उन्हें बीच में ही पढाई छोड़ देनी पड़ी थी ।”

“तुम्हें मालूम है उन दिनों कामिनी का घर कहां था ?”

“हां ! लक्कड़ बाजार में ।”

“लक्कड बाजार में कहां ?”

“यह तो मुझे मालूम नहीं । लक्कड़ बाजार का जिक्र भी मैंने बहुत पहले एक ही बाद सुना था जब मेरी बहन ने कहा था कि स्कूल पढने आने के लिए बेचारी कामिनी को, मेरा मतलब है, आपकी मिसेज को कश्मीर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पैदल चलकर आना पड़ता था ।”

“ओह !” - राज के स्वर में निराशा का साफ पुट था ।

“लेकिन उनका पता स्कूल के रिकार्ड में भी तो होगा ।”

“जरूर होगा, लेकिन उसके लिए मुझे कल तक इन्तजार करना पड़ेगा ।”

वह खामोश रही ।

राज को एक और जगह से भी कामिनी के बारे में कुछ इस प्रकार की जानकारी हासिल होने की सम्भावना दिखाई दे रही थी ।

जय शास्त्री नामक वकील को, जिसके पास कि कामिनी शादी से पहले नौकरी करती थी, उसके परिवार और उनके पते के बारे में जानकारी हो सकती थी ।

लेकिन उसके लिए भी सुबह उसका दफ्तर खुलने तक का इन्तजार करना जरूरी था ।

फिर वह मन ही मन याद करने की कोशिश करने लगा कि क्या वह बिशप काटन स्कूल के किसी अध्यापक को जानता था ।

उसे ऐसा कोई नाम याद न आया ।

वैसे अगर उसे कोई नाम याद आ भी जाता तो वह कोई बहुत आशाजनक बात न होती । जरूरी नहीं था कि कामिनी उसी अध्यापक की क्लास में रही होती और अगर रही भी होती तो जरूरी नहीं था कि अध्यापक को अपनी छ:-सात साल पहले की क्लास की किसी एक स्टूडेंट की याद रही होती ।

राज ने कार को रायबहादुर द्वारकानाथ की कोठी के सामने ले जाकर रोका ।

वहां पहुंचते ही रागिनी फिर भयभीत हो उठी और पत्ते की तरह कांपने लगी ।

“चलो ।” - राज बोला ।

“मैं नहीं जाऊंगी ।” - वह आतंकित स्वर में बोली - “पापा मेरी चमड़ी उधेड़ देंगे ।”

“वे तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे । रागिनी , मैं जब तक उनसे वायदा नहीं ले लूंगा कि वे तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे, मैं यहां से नहीं जाऊंगी ।”

वह फिर भी अपने स्थान से न हिली ।

“आओ ।” - राज ने उसे बांह पकड़कर जबरन कार से निकाला ।

सौभाग्यवश उसके मम्मी-पापा दोनों ही उस वक्त कोठी पर मौजूद थे ।

राज का परिचय पाकर वे खुश हुए, राज के साथ बड़ी इज्जत से पेश आए, लेकिन साथ ही इस बात पर हैरान भी हुए कि रागिनी उनके साथ वहां पहुंची थी ।

राज के अनुरोध पर वे एक अलग कमरे में पहुंचे । वहां तनहाई में राज ने धीरे-धीरे उन्हें सब बात समझाई ।
 
रायबहादुर साहब का पारा आसमान में चढ गया । वे उसी क्षण उस छोकरे की गर्दन मरोड़ देने की धमकियां देने लगे जिसने उसकी बेटी के साथ ऐसी बदसलूकी की थी । वे अपनी बेटी को भी फौरन वहां तलब करना चाहते थे लेकिन खुद उनकी पत्नी ने उन्हें ऐसा करने से रोका ।

उसके बाद पूरा एक घन्टा राज माता-पिता को पुत्री का हिताहित समझाता रहा । उसने रागिनी की खातिर उन बातों तक को न्यायोचित सबित करके दिखाया, हकीकतन जिनके हक में वह खुद ही नहीं था ।

लेकिन उस बैठक का अन्त भला ही हुआ । रायबहादुर साहब का गुस्सा ठन्डा हो गया । उन्होंने वादा किया कि वे अपनी बेटी को उस संकट की घड़ी में न सिर्फ उसके मददगार बनकर दिखायेंगे बल्कि वे यह भी देखेंगे कि क्या कुणाल के लिए कुछ किया जा सकता था ।

वहां से विदा होने से पहले रागिनी की खातिर राज ने उसकी मां से यह तक जिद की कि वह उसके सामने रागिनी को गले लगाएं और उसे अभयदान दें ।

तब कहीं रागिनी की जान में जान आई ।

उस वक्त उसकी निगाह में राज की हैसियत किसी फरिश्ते से कम नहीं थी । उसने कहा भी कि कामिनी की यह सबसे बड़ी खुशकिस्मती थी कि उसे राज जैसा देवता-स्वरूप पति मिला था ।

राज फिर अपनी कार में आ सवार हुआ ।

घर जाने का अभी उसका मन नहीं था । घर जाकर करता भी क्या वह ? और ड्रिंक करता, और फिर कामिनी की याद में दुखी होता हुआ, उसके किसी खतरनाक अन्जाम की दहशत खाता हुआ, सो जाता ।

उसने लक्कड़ बाजार जाने का फैसला किया । वह जानता था वहां कामिनी के परिवार का घर तलाश करना भुस के ढेर में सुई तलाश करने जैसा था, लेकिन फिर भी उसने वहां जाने का फैसला किया ।

उसे एक बात से कोई नतीजा हासिल होने की बड़ी उम्मीद थी ।

कामिनी सिन्धी थी और उसकी असाधारण जात सिपाई मलानी एक बार सुन लेने के बाद कोई आसानी से नहीं भूल सकता था । शायद लक्कड़ बाजार में रहते किसी सिन्धी से ही मालूम हो सके कि सिपाई मलानी कहां रहते थे ?

वह समर हिल से विपरीत शिमले के लगभग दूसरे सिरे पर स्थित लक्कड़ बाजार पहुंचा । उसने कार एक स्थान पर खड़ी कर दी और पैदल आगे बढा ।

मैं कामिनी के घर का पता लगाकर ही रहूंगा - उसने मन ही मन दोहराया - इसके लिए मुझे लक्कड़ बाजार के एक-एक घर का दरवाजा क्यों न खटखटाना पड़े ।

चन्द ही घन्टों में कितने अनोखी बातें उसे अपनी बीवी के बारे में मालूम हो चुकी थीं ।

वह एक गैंगस्टर की रखैल रह चुकी थी

दिल्ली की किसी ज्वेल रॉवरी से उसका सम्बन्ध था ।

दो निहायत घटिया बदमाश उससे वाकफयित होने का दावा करते थे ।

एक कोई लम्बे बालों वाला छोकरा उसकी गैरहाजिरी में चोरों की तरह उसके घर में घुसकर कामिनी से मिलने आता था ।

कामिनी उन दस हजार रुपयों के साथ गायब थी जिनके बारे में उसके अपने कथनानुसार वह कुछ भी नहीं जानती थी ।

पुलिस के कथनानुसार कामिनी ने अपने स्वार्थ के लिए उससे शादी की थी, यानी कि उसे उल्लू बनाया था ।

उस घड़ी में राज उन तमाम बातों पर विश्वास कर सकता था, लेकिन एक बात ऐसी थी जिस पर वह खुद कामिनी के कहने पर विश्वास नहीं कर सकता था ।

वह यह नहीं मान सकता था कि कामिनी को उससे मुहब्बत न थी ।

कामिनी की हर बात झूठी, षड्यंत्रभरी हो सकती थी लेकिन उसकी मुहब्बत झूठी नहीं थी । उसका प्यार फरेब नहीं था । उसने मन-वचन-कर्म से राज को अपना पति माना था । दुनिया की कोई भी औरत इतनी बड़ी अभिनेत्री नहीं हो सकती थी कि वह अपने पति के पहलू में लेटकर हर क्षण प्यार का एक झूठा नाटक रचती रह सके ।

वह पुकार पुकारकर इस बात की दुहाई दे सकता था कि कामिनी उससे दिल से मुहब्बत करती थी । इस हकीकत को झुठलाने की कोशिश करने वाले का वह मुंह तोड़ सकता था, वह उसकी काली जुबान खींच सकता था ।

लेकिन घूम-फिरकर एक सवाल फिर उसके जहन में हथोड़े की तरह बजने लगता था ।

कामिनी गायब कहां हो गई ?

क्या वाकई उसके अधिकार में दस लाख रुपए के हीरे थे ?

और वे दस हजार रुपये क्या यह कश्मीर से दूर कहीं कूच कर जाने के लिए इस्तेमाल करना चाहती थी ?

लेकिन कपड़े ! अपने कपड़े क्यों नहीं ले गई वह ? कल की बर्फीली रात में कपड़ों के बिना वह घर से बाहर कदम कैसे रख पाई ?

उसका दिमाग भन्ना गया ।

आशा और निराशा के एक अजीब-से झूले में झूलता हुआ वह आगे बढा ।

उस वक्त बर्फ नहीं पड़ रही थी इसलिए बाजार में चहल-पहल थी ।

बाजार के एक सिरे से शुरू होकर उसने बड़ी तरतीब से सिपाई मलानी परिवार का पता जानने की कोशिश आरम्भ की ।

सिपाही ! कौन सिपाही ?

सिपाही नहीं, सिपाई मलानी ! सिन्धी !

एक मलीकानी तो सामने के घर में रहता है ।

उधर बालानी साहब रहते हैं ।

सिपाई मलानी ?

काम क्या करते हैं ? देखने में कैसे हैं ?

नहीं मालूम ।

फिर कैसे मालूम होगा साहब ?

सिपाई मालानी ?

वो सामने वाली लाइन में सीधे चले जाइए । वहां डाकखाने की बगल के मकान में जाकर पूछिए ।

अन्धेरे में आशा की एक किरण !

राज उस मकान तक पहुंचा ।

वह एक दो-मंजिला, लकड़ी का चरमराता-सा, बड़े विशिष्ट पहाड़ी अन्दाज का मकान था ।

उसने देखा ऊपर की मंजिल पर तो अन्धेरा था लेकिन नीचे की खिड़कियों में रोशनी थी ।

राज ने झिझकते हुए दरवाजे पर दस्तक दी ।
 
वह भटक रहा था कामिनी के घर की तलाश में, लेकिन फिर भी मन ही मन वह प्रर्थना कर रहा था कि वह फटेहाल जगह कामिनी का घर न हो, वह लकड़ी का चरमराता हुआ मकान उसकी ससुराल न हो ।

उसने दरवाजा फिर पहले से ज्यादा जोर से खटखटाया ।

इस बार दरवाजा खुला और मकान की हालत से ही मेल खाता हुआ एक जर्जर बूढा चौखट पर प्रकट हुआ । उसने यूं राज की तरफ देखा जैसे वह राज के आर-पार झांक रहा हो ।

“नमस्ते जी !” - राज बोला - “आप सिपाई मलानी साहब हैं ?”

बूढे ने मूर्खों की तरह पलकें झपकाईं । फिर जैसे उसने राज के आर-पार झांकना बन्द कर दिया और उसकी निगाह राज के चेहरे पर टिक गई । फिर वह कुछ बोला, जिसका एक शब्द भी राज की समझ में नहीं आया । शायद वह सिन्धी बोल रहा था । लेकिन उसके मुंह खोलते ही देसी शराब का ऐसा भयंकर भभूका राज के नथुनों से टकराया कि उसका दिमाग भन्ना गया ।

“सिपाई मलानी साहब ?” - वह फिर बोला - “सिप्पी साहब ?”

बूढे ने सहमति में सिर हिलाया ।

“आपकी कामिनी नाम की कोई बेटी है ?”

बूढ़े ने फिर यूं पलकें झपकाई जैसे सवाल उसकी समझ में न आया हो । पता नहीं वह भाषा नहीं समझ पा रहा था य उसने नशा जरूरत से ज्यादा किया हुआ था, जिसकी वजह से उसका भेजा उसका साथ नहीं दे रहा था । फिर एकाएक उसने गर्दन घुमाई और इतनी ऊंची, लेकिन फटे बांस जैसी आवाज में बोला कि राज हड़बड़ाकर एक कदम पीछे हट गया - “पुटड़ा !”

कहीं एक दरवाजा खुला । फिर एक युवक बूढे के पीछे प्रकट हुआ ।

युवक पर निगाह पड़ते ही राज के नेत्र फैल गए । निश्चय ही वह वही लम्बे बालों वाला हिप्पियों जैसा युवक था जिसका जिक्र मिसेज गोंसाल्वेज ने किया था । वह उस वक्त भी बेहद टाइट जीन और चमड़े का कोट पहने था ।

“बूढा सिन्धी के अलावा कोई जुबान नहीं जानता और कम सुनता है ।” - युवक बूढे के पीछे बोला - “क्या चाहिए ? क्यों दरवाजा भड़भड़ा रहे थे ? क्यों...” - एकाएक युवक ठिठक गया । तब शायद पहली बार उसकी निगाह राज के चेहरे पर पड़ी - “झूले लाल !” - उसके मुंह से निकला - “यह तो कामिनी का घरवाला है । प्रोफेसर ! बड़ा आदमी ! आओ, आओ जीजाजी !”

राज मुंह बाए बुत बना दरवाजे के सामने खड़ा रहा ।Chapter 2

जिस कमरे में राज को लाकर बिठाया गया, वहां एक खस्ता हाल डायनिंग टेबल पड़ी थी । उसी कमरे की बगल में कहीं किचन थी, जहां से मछली पकने की बड़ी नाकाबिले-बर्दाश्त गन्ध आ रही थी । बूढा एक कुर्सी पर बैठ गया था । मेज पर उसके सामने ठर्रे की खुली बोतल और गिलास पड़ा था । वह सिन्धी में कुछ बोला ।

“बूढा कह रहा है ।” - चमड़े के कोट वाला युवक बोला - “उसे तुम्हारे आगमन से बड़ी खुशी हुई है । तुम्हारे जैसा दामाद हासिल होना उसके लिए बहुत इज्जत की बात है ।”

राज खामोश रहा ।

बूढा फिर बोला ।

“यह तुम्हें शराब पीने को कह रहा है ।” - युवक बोला - “यह देसी शराब है, जो यह खुद घर पर खींचता है । बड़ा ताबड़तोड़ नशा करती है ।”

“शुक्रिया !” - राज शुष्क स्वर में बोला - “मुझे नहीं चाहिये ।”

“तुम्हें क्यों चाहिए होगी ?” - युवक व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला - “तुम तो विलायती पीते होगे ।”

“तुम कामिनी के भाई हो ?” - राज ने पूछा ।

“हूं तो सही ।” - वह बोला - “लेकिन कामिनी का बस चलता तो वह मुझसे कभी अपना कोई रिश्ता न मानती । इज्जतदार जो बन गई है वो । लक्ख दी लानत हुई ऐसी इज्जतदारी पर कि बहन को भाई से रिश्तेदारी में शर्म आने लगे और भाई को अपनी बहन से मिलने के लिए चोरों की तरह उसके घर में घुसना पड़े ।”

राज को एकाएक बड़ी राहत महसूस हुई । मिसेज गोंसाल्वेज के अन्दाजे-बयां से तो ऐसा लगता था, जैसे राज की गैरहाजिरी में कामिनी से कोई उसका यार मिलने आता था - लेकिन अब वह जानता था कि जो आदमी हर हफ्ते या हफ्ते में दो बार उसकी गैरहाजिरी में कामिनी से मिलने आता था वह कामिनी का भाई था ।

“नाम क्या है तुम्हारा ?” - राज ने पूछा ।

“सतीश ।”

राज ने गौर से उसे देखा तो पाया कि उसकी मैली-कुचैली हालत में भी उसकी सूरत कामिनी से बहुत मिलती थी ।

“यह हम क्या सुन रहे हैं ? कामिनी कहां गायब हो गई है ? क्या कर दिया है तुमने उसे ?”

“वह यहां नहीं आई ?”

“यहां भला क्यों आती वो ? हम लोगों से तो वह कब का नाता तोड़ चुकी है ।”

“ओह !”

“वह तुम्हें छोड़कर क्यों चली गई ? क्या किया था तुमने ? मार-पीटा तो नहीं तुमने उसे ?”

“पागल हुए हो ! मैं इंसान हूं, जानवर नहीं ।”

“हां, हां... जानवर तो हम हैं जो तुम लोगों के नजदीक भी फटकने के काबिल नहीं ।”

राज खामोश रहा । उस बारे में उसका खामोश रहना ही उचित था । कामिनी पता नहीं उन लोगों से कैसा रिश्ता रखती थी और उनसे क्या कहती थी ।

“कुछ तो हुआ होगा ।” - सतीश जिद भरे स्वर में बोला ।

“कुछ नहीं हुआ था । रात को हम अच्छे-भले सोये थे । सुबह जब मैं उठा था तो मैंने कामिनी को फ्लैट से गायब पाया था ।”

“लेकिन अखबार में तो बड़ी अजीब-अजीब बातें छपी हैं ।”

“वह अखबार ही ऐसा है । उसमें वही बात छपती है, जो अजीब हो और अगर अजीब न हो तो अजीब बना दी जाती है ।”

“मछली जल रही है ।” - एकाएक सतीश अपने बाप की बांह टहोकता हुआ बोला ।

बूढा अपने स्थान से उठा । उसने मेज पर से अपनी बोतल और गिलास उठा लिया । उसने एक बार मुस्कराकर राज की तरफ देखा और वहां से बाहर निकल गया ।

पीछे राज और सतीश बैठे रह गए ।

“साला एकदम निकम्मा बाप है ।” - सतीश उस बन्द दरवाजे को घूरता हुआ, जिसके पीछे बूढा गायब हुआ था, नफरत भरे स्वर में बोला - “साला जहन्नुम में भी जायेगा तो बोतल हाथ में लेकर ।”

“तुम सच कह रहे हो न ।” - राज व्यग्र स्वर में बोला - “कि कामिनी यहां नहीं आई ?”

“मैं भला झूठ क्यों बोलूंगा ?” - वह राज को घूरता हुआ बोला ।

“या उसने फोन किया हो ?”

“फोन ! क्या कहने ? यह तुम्हें फोन के काबिल जगह लगती है ?”

“ओह !”

“पिछले मंगलवार मैं तुम्हारे घर गया था । उसके बाद से मैंने कामिनी की सूरत नहीं देखी है ।”

राज ने गौर से उसकी तरफ देखा । वह तुरन्त निगाहें चुराने लगा । क्या छोकरा कुछ छिपा रहा था ? उसने सोचा कि वह उसे दो-चार हाथ जमाकर उससे सच उगलवाने की कोशिश करे, लेकिन फौरन ही यह खयाल उसने अपने दिमाग से निकाल दिया । लड़का हट्टा-कट्टा तन्दुरुस्त जवान था । उसको पीटने की कोशिश में राज उससे पिट सकता था ।

“यहां का पता तुम्हें कैसे मालूम हुआ ?” - एकाएक सतीश उत्सुक स्वर में बोला - “एक बात तो पक्की है, कामिनी ने तो बताया नहीं होगा ।”

राज ने उत्तर नहीं दिया ।

तभी बूढा वहां वापस लौटा । उसने राज के सामने कॉफी का एक गिलास रख दिया । वह उसकी ओर देखकर मुस्कराया और सिन्धी में कुछ बोला ।

“यह कह रहा है” - सतीश बोला- “कि तुमने इसके गरीबखाने में कदम रखकर इसकी बड़ी इज्जत की है ।”

“इन्हें मालूम है कि कामिनी गायब है ?”

“नहीं । यह अनपढ है । अखबार नहीं पढ सकता । चार अक्षर सिन्धी पढ-लिख लेता है और बस ।”

“यहां पुलिस नहीं आई ?”

सतीश मुस्कराया और फिर बोला - “पुलिस तुम्हारे जितनी होशियार नहीं । पुलिस को यहां का पता कभी नहीं हो सकता ।”

“हूं ।”

“कॉफी पियो ।”

राज ने गिलास उठा लिया । गिलास में से उठती महक बता रही थी कि काफी अच्छी थी । उसने गिलास को अपने होंठों की तरफ बढाया तो पाया कि गिलास के किनारे पर लिपस्टिक लगी हुई थी । उसने चुपचाप उंगली से गिलास के किनारे को छुआ और बड़ी गौर से उसका मुआयना किया ।

वह लिपस्टिक ही थी ।

न जाने क्यों उसे वह घर और उसका वातावरण बड़ा रहस्यपूर्ण लग रहा था ।

“तुम्हारे खयाल से” - सतीश बोला - “वे दो आदमी कौन थे, जिन्होंने कचहरी के कम्पाउंड में तुम पर हाथ डाला था ?”

“मुझे नहीं मालूम ।” - राज सहज भाव से बोला - “पुलिस का खयाल है कि वे कुणाल सिंह और सुन्दरलाल नाम के दो गैंगस्टर हो सकते थे, लेकिन पुलिस ने मुझे विक्रम सिंह‍ और सुन्दर लाल की जो तस्वीरें दिखाई थीं वे मुझे उन दोनों बदमाशों की नहीं लगी थीं ।”

“विक्रम सिंह तो उन दोनों बदमाशों में हो ही नहीं सकता था ।”

“क्यों ?”

“क्योंकि वह तो ज्वेल रॉबरी की घटना के फौरन बाद ही मारा गया था ।”

“तुम्हें कामिनी के पुलिस रिकार्ड के बारे में मालूम है ?”

“मालूम है, लेकिन पुलिस रिकार्ड में जो कुछ है, सब झूठ है, बकवास है ।”

“तुम्हारे कह देने भर से वह झूठ और बकवास कैसे हो जायेगा ?”

“छोड़ो । बहस से क्या हासिल होने वाला है । तुम अपने दिल पर हाथ रखकर कहो कि क्या कामिनी ने तुम्हें अच्छी बीवी बनकर नहीं दिखाया ?”

“सरासर दिखाया ।”

“फिर ? तुम पैसे वाले आदमी हो । तुम गरीबी की लानत को और गरीब आदमी की मुश्किलों को नहीं समझ सकते । जिन्दगी की कुछ गलतियां ऐसी होती हैं, जो सिर्फ गरीब आदमी ही कर सकता है । कुछ गुनाह ऐसे होते हैं जो अपनी छाप सिर्फ गरीब आदमी पर छोड़ते हैं, लेकिन तुम इन बातों को क्या समझोगे ? तुम्हें क्या मालूम गरीबी क्या होती है । तुम तो पैसे वाले आदमी हो ।”

“मैं एक मामूली आदमी हूं ।”

“बिड़ला-डालमिया के मुकाबले में मामूली आदमी होओगे । हमारे मुकाबले में तो तुम राजा हो ।”

“मैं...”

“जिस आदमी के माल पर तिमंजिला मकान हो, जिसके फलों के बाग हों और जो कालेज में प्रोफेसर हो, हमारी अक्ल में वो पैसे वाला आदमी होता है ।”

राज चुप रहा ।

“गरीबी ने हो सकता है कि कामिनी से भी कभी कोई गलत काम करवाया हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह बुरी लड़की बन गई ।”

“मैंने ऐसा कब कहा ?”

“कहना भी नहीं ।”

“नहीं कहूंगा । वह मेरी धर्मपत्नी है । उसकी इज्जत मेरी इज्जत है ।”

“ठीक । अब सुर में बोले हो ।”

“देखो, तुम मुझसे कुछ छिपा तो नहीं रहे ? तुम वाकई नहीं जानते कि कामिनी कहां है ?”

“मैं तुमसे भला कुछ क्यों छिपाऊंगा ? इसमें मुझे क्या फायदा ? उसके गायब हो जाने की हमें भी उतनी चिन्ता है, जितनी कि तुम्हें । आखिर वह हमारा खून है ।”

“तुम्हारे परिवार में और कौन-कौन हैं ?”

“कामिनी के अलावा तो बस हम बाप-बेटा ही हैं । हमारी मां तो बेचारी कब की मर चुकी है ।”

“कामिनी को स्कूल की पढाई बीच में ही क्यों छोड़ देनी पड़ी थी ?”

“क्योंकि घर की हालत खस्ता हो गई थी । एक तो यह बूढा ढंग से कुछ कमाता नहीं था और जो कुछ कमाता था उसकी शराब पी जाता था । मेरी मां नौकरी करती थी, उसकी वजह से घरबार चल रहा था - लेकिन जब वह मर गई तो हमारे लिए बिशप काटन जैसे फैन्सी स्कूल की कामिनी की फीस भरना मुहाल हो गया । उसने पढाई छोड़ दी और नौकरी करने लगी ।”

“इतनी कम उम्र में ?”

“क्या करते ? मजबूरी थी ।”

“क्या नौकरी की थी उसने ?”

“एक दुकान पर सेल्स-गर्ल की ।”

“तुम कामिनी से छोटे हो या बड़े ?”

“बड़ा, एक साल ।”

“तुम कुछ नहीं करते थे ?”

“मुझे कहां नौकरी देता था कोई ? भाई साहब, लड़की के लिए फिर भी नौकरी हासिल करना आसान होता है ।”

“तुम लोग तो शुरू से ही कश्मीर के रहने वाले हो । तुम्हारे खयाल से कामिनी कहां गई हो सकती है ।”

“भाई साहब, यह सुर बदलो । मैंने एक बार कह दिया न कि मुझे इस बारे में कुछ नहीं मालूम ।”

राज ने खामोशी से कॉफी का एक घूंट पिया ।

“लेकिन तुम कामिनी की तलाश में इतने मरे क्यों जा रहे हो ?” - सतीश बोला ।

“वह मेरी बीवी है !” प- राशर बोला ।

“यह तो ठीक है, लेकिन वह कोई बच्चा नहीं । एक जवान-जहान बालिग लड़की है । अगर कहीं चली गई है तो वापस भी आ जायेगी । इन्तजार करो भाई साहब !”

“इन्तजार उस सूरत में किया जा सकता है, जब मुझे इस बात पर विश्वास हो कि वह जहां गई है, अपनी मर्जी से गई है । लेकिन मेरा दिल गवाही दे रहा है कि हो सकता है कि उसके साथ कोई जोर-जबरदस्ती की गई हो और वह मुसीबत में हो ।”

“तुम उन दो बदमाशों की वजह से फिक्रमन्द हो, जो तुम पर झपटे थे ?”

“हां ।”

“पुलिस के रिकार्ड में मौजूद तस्वीरों में तुम्हें उन दोनों की सूरतें दिखाई दी थीं ?”

“नहीं ।”

“उन्होंने मार-पिटाई तुमसे की थी, लेकिन असल में धमका वे कामिनी को रहे थे ?”

“हां । उन्होंने कहा था कि जो व्यवहार उन्होंने मेरे साथ किया था, वह तो उस कहर का महज नमूना था जो मुझ पर टूटने वाला था ।”

“और उन्होंने तुम्हें दस हजार रुपये भी दिए थे ?”

“हां । कामिनी को देने के लिए । उस रकम को किसी यादव वाले काम का हिस्सा बताकर ।”

“कमाल है ! मेरी समझ में तो एक ही बात आती है दिल्ली की ज्वेल रॉबरी वाला माल कामिनी के अधिकार में है और वे दोनों बदमाश या तो उस डकैती में शामिल थे और या फिर वे विक्रम सिंह के आदमी हैं, जो विक्रम सिंह के मर जाने की वजह से उस माल पर अपना हक जताना चाहते हैं । विक्रम सिंह से उलझने का तो उन बदमाशों का कभी हौसला नहीं हुआ होगा, लेकिन उसकी मौत के बाद कामिनी से निपटना उन्हें आसान काम लग रहा होगा । यह बात तो तुम्हें पुलिस ने बताई ही होगी कि उस डकैती में लुटे हीरे आज तक बरामद नहीं हुए हैं ।”

“लेकिन कामिनी के पास उन हीरों को क्या काम ? वह उन्हें अपने पास क्यों रखेगी भला ?”

“क्यों नहीं रखेगी ? दस लाख का माल खामखाह किसी के हाथ लग जाए तो क्या वह उसे कूड़े में फेंक देगा ?”
 
राज ने सहमति में सिर हिलाया । उसने देखा कि बूढा कुर्सी पर बैठा बैठा ही सो गया था । उसकी ठोडी उसकी छाती पर टिकी हुई थी और वह धीरे-धीरे खर्राटे भर रहा था ।

एकाएक उसे एक अजीब-सा एहसास होने लगा कि किसी की निगाहें उस पर केन्द्रित थीं । उसने बेचैनी से पहलू बदला और घूमकर पिछली दीवार में मौजूद एक दरवाजे की तरफ देखा ।

दरवाजा बन्द था ।

“क्या बात है ?” - सतीश ने तीव्र स्वर में पूछा ।

“घर में और कौन है ?” - राज ने पूछा ।

“कोई नहीं । क्यों ?”

“मुझे यूं लगा था जैसे मुझे कोई देख रहा हो ।”

सतीश हंसा ।

उसकी हंसी ऐसी थी कि राज खिसिया गया । उसने कॉफी का आखिरी घूंट पिया और गिलास मेज पर रख दिया । गिलास के किनारे पर लगी लिपस्टिक के बारे में वह अभी भी सोच रहा था ।

“मैं तुम्हें एक राय दूं ?” - एकाएक सतीश बोला ।

“किस बारे में ?”

“कामिनी के बारे में ।”

“कैसी राय ?”

“कामिनी के पुलिस रिकार्ड की वजह से अपने मन में कभी कोई दुर्भावना न पालना । उसने कोई अपराध नहीं किया है ।”

“बिना अपराध किए कोई पुलिस रिकार्ड में कैसे आ सकता है ?”

“तुम्हारी बात सही है, लेकिन मेरी भी बात सही है ।”

“दोनों बातें कैसे सही हो सकती हैं ?”

“देखो मैं तुम्हारे जितना होशियार और पढा-लिखा आदमी नहीं । मैं तुम्हें तरीके से नहीं समझा सकता । लेकिन यह कामिनी की बदकिस्मती है कि उसके चरित्र पर लांछन आ रहा है ।”

राज के चेहरे पर आश्वासन के भाव न आए । ऐसा कैसे हो सकता था कि कामिनी ने कुछ न किया हो । उसके दो अपराध तो उसके रिकार्ड में ही लिखे हुए थे । ऊपर से वह एक गैंगस्टर की रखैल बताई जा रही थी और ज्वेल रॉबरी में उसका हाथ बताया जा रहा था ।

“देखो” - सतीश बोला - “जितनी खुश कामिनी पिछले तीन महीनों से थी, उतनी खुश मैंने उसे अपनी जिन्दगी में कभी नहीं देखा था । उसने अपनी निगाह में कभी किसी की ऐसी अहमियत नहीं मानी जैसी उसने तुम्हारी मानी थी । प्रोफेसर साहब, तुम उसके लिए भगवान का दर्जा रखते थे । वह तुम्हारी पूजा किया करती थी । यह मेरा कोई अन्दाजा नहीं है । यह मेरी उसके मुंह से सुनी बात है । उसकी निगाह में तुम उसका वो हासिल थे, जिसके लिए लोग हजारों मिन्नते मांगते हैं ।”

“अगर ऐसी बात थी तो उसने मुझ पर अपना विश्वास क्यों नहीं जाहिर किया ? अगर उस पर कोई मुसीबत आ पड़ी थी तो उसने मुझे क्यों नहीं बताया ? अपनी उस कठिन घड़ी में उसने मुझे क्यों नहीं शरीक किया ?”

“यह सब मुझे नहीं मालूम । लेकिन कसम है झूलेलाल की, कामिनी की तुम्हारे प्रति भावनाओं के बारे में जो मैंने कहा सच कहा है ।”

तभी राज को फिर लगने लगा कि वह किसी की निगाहों में था । वह सोचने लगा, क्या वह नशे में था ? उसने केवल दो पेग ब्रांडी पी थी - लेकिन अपनी परेशानी की दिमागी हालत में कहीं वह बहुत बड़े-बड़े दो पैग तो नहीं पी गया था ? उसने अपनी आंखें बन्द कर लीं और अपनी चेतना को केन्द्रित करके सोचने की कोशिश की कि क्या वह नशे में था ।

वह इसी नतीजे पर पहुंचा कि ब्रांडी का सुरूर उसे जरूर था लेकिन नशे में वह हरगिज नहीं था ।

उसने एक बार फिर घूमकर पिछले दरवाजे की तरफ देखा और फिर फौरन ही उसने अपना विचार बदल दिया ।

वह जरूर नशे में था ।

नशे की वजह से जरूर उसकी मति भ्रष्ट हो गई थी । एक बार आंखें मूंद लेने की वजह से जरूर चेतना से उसका नाता टूट गया था । उसे आंखें बन्द नहीं करनी चाहिए थीं, क्योंकि अब वह खुली आंखों से सपना देख रहा था । क्योंकि पिछले दरवाजे पर, जो कि उस वक्त खुला था, उसे कामिनी खड़ी दिखाई दे रही थी ।

उसने आंखें मिचमिचाई और जोर से अपने सिर को झटका दिया । उसने फिर सामने देखा ।

पिछले दरवाजे की चौखट पर से कामिनी गायब न हुई ।

उसने देखा वह घटिया ड्रेसिंग गाउन पहने थी और उसे देखकर मन्द-मन्द मुस्करा रही थी । उस घटिया ड्रेसिंग गाउन में भी वह इन्तहाई खूबसूरत लग रही थी । आखिर क्यों न लगती ? उसकी बीवी थी ही खूबसूरत । सही मायनों में खूबसूरत ।

“मैंने तुम्हें कहा था” - एकाएक सतीश कर्कश स्वर में बोला - “तुम अपने कमरे से बाहर न निकलना !”

उसने जैसे सतीश की बात सुनी ही नहीं । वह अपनी ओर अपलक देखते राज को देखकर मुस्कराई । फिर उसने धीरे से अपने ड्रेसिंग गाउन की डोरी खींची । गाउन सामने से खुल गया ।

उसने गाउन के दोनों सिरों को खिड़की के पल्लों की तरह खोल दिया और आशापूर्ण ढंग से राज को देखने लगी ।

राज सकते में आ गया । गाउन के नीचे वह एकदम नंगी थी और वह बड़े लुभावने अन्दाज से, जैसे खास तौर से राज के लिए, अपने नंगे, पुष्ट शरीर की नुमायश कर रही थी ।

“अपने कमरे में जाओ ।” - सतीश कहर भरे स्वर में बोला ।

उसके चेहरे से आशापूर्ण मुस्कराहट तुरन्त गायब हो गई ।

उसके होंठ यूं कांपे जैसे वह रोने लगी हो । फिर उसने यूं गाउन के दोनों सिरों को एक-दूसरे से मिलाया जैसे पर्दा बन्द कर रही हो ।

उसने मशीनी अन्दाज से गाउन की डोरी बांधी, वापस घूमी और चौखट लांघकर भीतर कहीं गायब हो गयी ।

राज एक झटके से अपने स्थान से उठा, लेकिन इससे पहले कि वह उसके ऊपर झपट पाता, सतीश लपका और उसका रास्ता रोककर खड़ा हो गया ।

“तुमने मुझसे झूठ बोला” - राज इतनी जोर से गर्जा कि खर्राटे भरते बूढे ने हड़बड़ाकर आंखें खोल दीं - “तुम तो कहते थे कि कामिनी यहां नहीं थी । और क्या कर दिया है तुमने उसे ? उसे कोई नशा-नशा तो नहीं खिला दिया तुमने ?”

“मेरी बात सुनो ।” - सतीश तीखे स्वर में बोला ।

“मेरे रास्ते से हटो ।” - राज ने उसे परे धकेलने की कोशिश की लेकिन कामयाब न हो सका ।

“अरे ! वो कामिनी नहीं है ।”

“क्या बक रहे हो ? क्या मैं अन्धा हूं ?”

“तुम अन्धे नहीं हो, लेकिन तुम्हारी आंखें धोखा खा रही हैं । वह कामिनी नहीं उसकी छोटी बहन छाया है । दोनों की सूरतें हूबहू मिलती हैं । केवल उम्र का फर्क है । छाया कामिनी से चार साल छोटी है । तुमने उसे गौर से देखा होता तो तुम्हें खुद ही महसूस हो जाता कि वह तुम्हारी बीवी नहीं थी । तुम्हारी बीवी क्या वैसी कोई हरकत करती जो छाया ने अभी की थी ?”

राज ने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया । वह कुछ क्षण उल्लुओं की तरह पलकें झपकाता हुआ सतीश को देखता रहा और फिर बोला - “यह कामिनी की छोटी बहन थी ?”

“हां । छाया नाम है इसका । बेचारी पागल है । दिमाग हिला हुआ है इसका ।”

“लेकिन तुम तो कहते थे कि परिवार में तुम्हारे और तुम्हारे बाप के अलावा कोई नहीं था ।”

“मैंने झूठ बोला था । ऐसी बहन के बारे में झूठ न बोलता तो और क्या करता ?”

“इस बात का क्या सबूत है कि तुम अब भी झूठ नहीं बोल रहे हो ? सिर्फ तुम्हारे कहने भर से मैं कैसे मान लूं कि वो कामिनी नहीं थी । हो सकता है तुमने कामिनी को कोई उल्टी-सीधी नशे की चीज पिलाकर इस हालत में पहुंचा दिया हो ।”

सतीश ने असहाय भाव से राज की तरफ देखा ।

“अच्छी बात है” - अन्त में वह बोला - “मैं तुम्हें छाया के पास फिर ले चलता हूं ताकि तुम गौर से उसे देखकर यह विश्वास कर सको कि वह तुम्हारी बीवी नहीं है । लेकिन भगवान के लिए उसे हाथ मत लगाना ।”

“क्यों ?”

“क्योंकि किसी मर्द का हाथ उसे लगने से उसे कुछ हो जाता है । मर्द के स्पर्श से उसका पागलपन और भी ज्यादा बढ जाता है । अभी तुमने देखा ही था कि तुम्हारे पर निगाह पड़ते ही उसने क्या हरकत की थी ।

राज ने सहमति में सिर हिलाया ।

“चलो ।” - सतीश बोला ।

राज उसके साथ हो लिया ।

उन्होंने उस कमरे में कदम रखा जिसकी चौखट पर वह प्रकट हुई थी । उससे आगे एक और कमरा था जहां एक पुराने जमाने के अन्दाज का लकड़ी का विशाल पलंग बिछा हुआ था ।

राज दरवाजे के भीतर एक कदम रखते ही ठिठककर खड़ा हो गया ।
 
वह बड़े निर्विकार भाव से पलंग के एक किनारे पर नीचे टांगे लटकाये बैठी थी । राज पर निगाह पड़ते ही उसके चेहरे पर पहले जैसी ही रहस्यपूर्ण मुस्कराहट प्रकट हुई । वह फौरन पलंग पर लम्बी लेट गई । इस‍ बार उसने अपने गाउन की डोरी खींच कर खोली नहीं । इस बार उसने अपने दोनों हाथों से उसका निचला सिरा पकड़ा और उसे अपनी गर्दन तक ऊपर उठा दिया । उसने निमन्त्रणपूर्ण भाव से राज की तरफ देखा, उसके गले से अजीब-सी घरघराहट की आवाज निकली और वह बड़े निर्लज्ज भाव से पलंग पर यूं हिलने लगी जैसे उसका शरीर पुरूष के सहवास के लिए तड़फ रहा हो ।

“ओह माई गॉड !” - राज आतंकित स्वर में बोला । वह फौरन घूमा और यूं कमरे से बाहर भागा जैसे भूत देख लिया हो ।

सतीश उसके पीछे लपका ।

राज वापस यथास्थान जा बैठा था । उसने अपने हाथों से अपना सिर थाम लिया था और धीरे-धीरे बुदबुदा रहा था - “ओह माई गॉड ! ओह माई गुड गॉड !”

“बेचारी बहुत दयनीय हालत में है” - सतीश बोला - “उसकी हालत देखकर अच्छों-अच्छों का दिमाग हिल जाता है ।”

“हुआ क्या है इसे ?” - राज ने बिना सिर उठाए पूछा ।

“भगवान जाने । यह बचपन से ही ऐसी हालत में है ।”

“कभी किसी डाक्टर को नहीं दिखाया ?”

“कई डाक्टरों को दिखाया है । हर किसी ने यही कहा है कि इसका पागलपन लाइलाज है ।”

“तौबा ।”

“हमें बड़ी कड़ी निगरानी करनी पढती है इसकी । हमारी जरा सी भी निगाह चूक जाने पर यह कुछ भी कर सकती है ।”

“करती यही कुछ है जो इसने अभी किया था ?”

“हां । किसी भी मर्द को अपने सामने पाकर यह अपना जिस्म नंगा कर देती है और...”

“चुप करो ।”

सतीश खामोश हो गया ।

“जुबान से कुछ नहीं कहती ?” - राज ने फिर पूछा ।

“बोल नहीं सकती ये ।”

“गूंगी है ?”

“गूंगी तो नहीं है । लेकिन हमेशा अपने मुंह से घरघराहट की सिर्फ वही आवाज निकालती है जो तुमने अभी सुनी थी - शारीरिक परमानन्द की आवाज ।”

“दाता !”

“अब तो तुम्हें तसल्ली हो गई कि वह कामिनी नहीं ?”

“हां । सॉरी ।”

“कामिनी तो घर से निकलकर इस नर्क से निजात पा गई” - सतीश यूं धीरे से बोला जैसे बड़बड़ा रहा हो - “और फिर तुमसे शादी हो जाने के बाद तो सुख-चैन की बंसी बजाने लगी, लेकिन पीछे देख लो क्या छोड़ गई है वो मेरे लिए । एक निकम्मा शराबी बाप । एक पागल बहन ।”

राज एकाएक उठ खड़ा हुआ ।

“घबरा गए ?” - सतीश व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला - “लेकिन तुम क्यों घबराते हो जीजाजी ? हमारी मुश्किलें हमारी मुश्किलें हैं । उन्हें हम तुम्हारे गले मढने की कोशिश नहीं करने वाले । न ही हम तुमसे कोई रहम की भीख मांगने वाले हैं ।”

“मैं चलता हूं ।”

“अच्छी बात है ।”

“जाने से पहले एक दरख्वास्त मैं तुमसे करना चाहता हूं ।”

“क्या ?”

“कामिनी की कोई खोज-खबर लगे तो मुझे फौरन खबर करना ।”

“अच्छा ।”

राज वहां से विदा हो गया ।

बाहर सांय-सांय करती ठंडी बर्फीली हवा चल रही थी ।

कभी राज पहाड़ी हवा की उस सांय-सांय को प्रकृति के संगीत का दर्जा दिया करता था । आज वही आवाज उसे यूं लग रही थी जैसे कोई विधवा विलाप कर रही थी ।

***
 
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