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Adultery एक रात ऐसी भी

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कामिनी- आहह...आप कितना अच्छा करते हो...

मैं- क्या करता हूँ जान...

कामिनी- जो आप कर रहे हो...

मैं- मैं क्या कर रहा हूँ जान...

कामिनी- आप चुदाई कर रहे हो...

मैं- किसकी चुदाई..

कामिनी(शरमा कर)- आअहह...अपनी बीवी की...

और कामिनी ने मूह घुमा कर मुझे किस कर दिया...

कामिनी अब बहुत खुल चुकी थी...वो चुदाई को एंजोई कर रही थी..और ये देख कर मैं बहुत खुश था...

मैं- कामिनी...फाड़ दूं तुम्हारी...

कामिनी- अब मुझसे क्यो पूछते है..मैं आपकी बीवी हूँ...जो मान हो करो ना..

मैं- नही...तुम बोलो...बिना मर्ज़ी के नही..

कामिनी- करो ना...ज़ोर से धक्के मारो जी..

मैने कामिनी को चूमा और तेज़ी से धक्के मारना शुरू कर दिया...

कामिनी- आहह..आअहह...आहह...ज़ोर से...

मैं- हाँ जान..ये लो...एसस्शह...ईएहह...

कामिनी- आहह..बहुत मज़ा आ रहा ....आअहह...आअहह...

मैं- एस्स ...एसस्स...ईीस्स...ईीस्स...

कामिनी- मेरा पानी...फिर से...ओह्ह्ह....ज़ोर से..ज़ोर से....

मैं- यस जान..ये लो...यीह..यीह...यीह...

और कुछ धक्को बाद कामिनी तीसरी बार झड गई...और मैं भी झड़ने के करीब आ गया तो मैने अपनी स्पीड बढ़ा दी...

मैं- यीह..यीहह...ईएह...ईएह..

कामिनी- उउउंम...उउंम..आअहह..आअहह...

मैं- मैं आया जान...कहाँ निकालु..

कामिनी- आअहह..अपनी बीवी के अंदर डाल दो जी...उउंम्म

यीहह...आआहह…त्ततहुूप्प्प…कचहुप्प्प…..ईएहहाअ…आहह…त्ततहुूप्प्प…त्ततहुूप्प्प….फ़फफूूककचह…फ़फफूूककच….ऊओ…ईीस्स…यईीसस…आअहह….ऊओ……फफफफकक्चाआप्प्प….

और ऐसी ही आवाज़ो के साथ मैने अपना पानी कामिनी की चूत मे भर दिया और फिर मैं कामिनी से लिपट कर लेट गया...
 
‘अब्बा’ का रिकार्ड बजता रहा ।

रिकार्ड पूरा बज चुकने के बाद अपने आप खामोश हो गया ।

वे दोनों सोफे पर लेटे रहे । सोफे पर इतनी जगह नहीं थी कि वे दोनों सहूलियत से उस पर लेट पाते, लेकिन अपनी असुविधाजनक स्थिति से उन दोनों में से किसी को भी कोई शिकायत नहीं थी । कामिनी का सिर राज के कन्धे पर टिका हुआ था और उसकी आंखें बन्द थी ।

राज बहुत सन्तुष्ट था । सहवास का आज जैसा मुकम्मल आनन्द उसे पहले कभी हासिल नहीं हुआ था । कामिनी के आज के व्यवहार में एक पत्नी जैसी निष्ठा के साथ-साथ एक नगर वधू जैसी चंचल मादकता भी थी । आज उसने सिर्फ एक पत्नी वाला फर्ज ही नहीं निभाया था, आज उसने एक फर्माबरदार बीवी की तरह अपने आपको सिर्फ अपने पति के हवाले ही नहीं कर दिया था, आज उसने जो कुछ किया था, उसे राज कोई नाम नहीं दे पा रहा था, लेकिन वह उसके लिए एक ऐसा अहसास था, जिससे वह पहले कभी दो-चार नहीं हुआ था, जिसके अस्तित्व तक को वह नहीं पहचानता था ।
 
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