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राज उसे चूस रहे थे, काट रहे थे। उनका अनुभव बोल रहा था। वे जानते थे कि एक औरत को कैसे उत्तेजित किया जाता है। उनकी जीभ निप्पल के चारों तरफ घूम रही थी। कामिनी की योनि से पानी बह निकला। उसने अपनी टांगें अनजाने में राज की कमर पर लपेट लीं।
राज का सख्त लिंग अब कामिनी की साड़ी और पेटीकोट के ऊपर से उसकी योनि पर दबाव डाल रहा था। वह वहां एक सख्त रगड़ पैदा कर रहा था।
"साड़ी हटा," राज ने हुक्म दिया, अपना मुंह उसके स्तन से हटाते हुए। उनका मुंह लार से गीला था।
कामिनी ने कांपते हाथों से मना किया। "नहीं... प्लीज..."
राज ने खुद ही हाथ नीचे डाला और पेटीकोट की डोरी तोड़ दी। उन्होंने साड़ी को खींचकर कामिनी की टांगों से अलग कर दिया और फर्श पर फेंक दिया।
अब कामिनी पूरी तरह नंगी थी, सिर्फ गले में मंगलसूत्र था। राज ने उसे देखा। ऊपर से नीचे तक।
"सोना... खरा सोना..." राज ने उसकी जांघों को फैलाया। "और यह खजाना उस शराबी के लिए बेकार पड़ा था।"
कामिनी की योनि गुलाबी, साफ और गीली थी। वह कांप रही थी। राज ने अपनी उंगलियों पर कटोरी से बचा हुआ तेल लगाया।
"आज सिर्फ शुरुआत है," राज ने कहा, कामिनी की आंखों में देखते हुए। "आज मैं तुझे तोडूंगा नहीं। आज सिर्फ तैयार करूँगा। तेरी सील को थोड़ा ढीला करूँगा।"
उन्होंने अपनी दो उंगलियां कामिनी की कुंवारी योनि के मुहाने पर रखीं। कामिनी ने चादर भींच ली।
राज ने धीरे से, लेकिन मजबूती से एक उंगली अंदर डाली।
"आह! दर्द!" कामिनी सिसकी। वह बहुत तंग थी।
"सहो इसे," राज ने झुककर उसे चूमा। "दर्द ही मज़ा है।"
उन्होंने उंगली को अंदर-बाहर करना शुरू किया। तेल की वजह से फिसलन थी। कामिनी की सिसकियाँ अब आहों में बदलने लगी थीं। राज की उंगलियां उसके अंदर खेल रही थीं, उसे चौड़ा कर रही थीं, उसे आने वाले दिनों के लिए तैयार कर रही थीं।
राज ने अपना अंगूठा उसके 'दाने' पर रगड़ना शुरू किया। कामिनी का शरीर कांपने लगा। उसे एक ऐसा सुख मिल रहा था जो उसने कभी सोचा भी नहीं था। बिजली के झटके लग रहे थे।
"बाबूजी... मैं... मैं कुछ हो रहा है... मैं मर जाऊंगी..."
"होने दे," राज ने रफ़्तार तेज़ कर दी। "मर जा मेरी बांहों में।"
अचानक, कामिनी का शरीर अकड़ गया। उसने राज के कंधों पर दांत गड़ा दिए। एक ज़ोरदार झटके के साथ, उसने अपनी ज़िंदगी का पहला 'चरम सुख' महसूस किया। उसका पानी राज की उंगलियों पर बह निकला। उसकी योनि ने राज की उंगलियों को जकड़ लिया।
वह निढाल होकर गिर गई, हांफते हुए। पसीने से लथपथ।
राज उसके ऊपर झुके। उन्होंने अपनी उंगलियों पर लगा कामिनी का रस देखा और उसे चखा।
"मीठा है," राज ने मुस्कुराते हुए कहा। "बहुत मीठा।"
उन्होंने अपना लिंग उठाया, जो अभी भी पत्थर जैसा सख्त था। उन्होंने उसे कामिनी की गीली जांघों के बीच रगड़ा, उसकी योनि के होठों पर फेरा, लेकिन अंदर नहीं डाला।
"आज के लिए इतना ही," राज ने कहा, खुद पर काबू पाते हुए। "मैं नहीं चाहता कि तू कल लंगड़ा कर चले और सबको शक हो जाए। असली काम... हम अस्तबल में करेंगे। जब बारिश होगी। तब तेरी चीखें कोई नहीं सुनेगा।"
कामिनी अभी भी होश में नहीं थी। राज ने उसे उठाया।
"कपड़े पहन और भाग जा," राज ने कहा। "इससे पहले कि प्रताप जागे। और यह सब... हमारे बीच का राज़ है।"
कामिनी ने लड़खड़ाते हुए अपनी फटी हुई चोली और साड़ी उठाई और लपेटी। उसका शरीर अभी भी झनझना रहा था। जब वह दरवाजे तक पहुँची, तो उसने मुड़कर देखा।
राज बिस्तर पर बैठे थे, नंगे, तेल में चमकते हुए, अपने लिंग को सहलाते हुए जो अभी भी शांत नहीं हुआ था। वे किसी विजयी राजा जैसे लग रहे थे जिसने नया किला फतह किया हो।
"दरवाजा बंद करती जाना," राज ने कहा। "और कल... कल फिर तैयार रहना।"
कामिनी बाहर निकली। ठंडी हवा उसे छू रही थी, लेकिन उसके अंदर जो आग राज ने लगाई थी, वह अब बुझने वाली नहीं थी।
वह जानती थी कि वह अब उस नामर्द प्रताप की पत्नी नहीं, बल्कि बड़े ठाकुर की 'रखैल' बन चुकी है। और शर्मनाक बात यह थी कि उसे यह पद... पत्नी होने से ज्यादा पसंद आ रहा था। वह अपने कमरे में गई, प्रताप के बगल में लेटी, और राज के सपनों में खो गई।
◆◆◆
राज का सख्त लिंग अब कामिनी की साड़ी और पेटीकोट के ऊपर से उसकी योनि पर दबाव डाल रहा था। वह वहां एक सख्त रगड़ पैदा कर रहा था।
"साड़ी हटा," राज ने हुक्म दिया, अपना मुंह उसके स्तन से हटाते हुए। उनका मुंह लार से गीला था।
कामिनी ने कांपते हाथों से मना किया। "नहीं... प्लीज..."
राज ने खुद ही हाथ नीचे डाला और पेटीकोट की डोरी तोड़ दी। उन्होंने साड़ी को खींचकर कामिनी की टांगों से अलग कर दिया और फर्श पर फेंक दिया।
अब कामिनी पूरी तरह नंगी थी, सिर्फ गले में मंगलसूत्र था। राज ने उसे देखा। ऊपर से नीचे तक।
"सोना... खरा सोना..." राज ने उसकी जांघों को फैलाया। "और यह खजाना उस शराबी के लिए बेकार पड़ा था।"
कामिनी की योनि गुलाबी, साफ और गीली थी। वह कांप रही थी। राज ने अपनी उंगलियों पर कटोरी से बचा हुआ तेल लगाया।
"आज सिर्फ शुरुआत है," राज ने कहा, कामिनी की आंखों में देखते हुए। "आज मैं तुझे तोडूंगा नहीं। आज सिर्फ तैयार करूँगा। तेरी सील को थोड़ा ढीला करूँगा।"
उन्होंने अपनी दो उंगलियां कामिनी की कुंवारी योनि के मुहाने पर रखीं। कामिनी ने चादर भींच ली।
राज ने धीरे से, लेकिन मजबूती से एक उंगली अंदर डाली।
"आह! दर्द!" कामिनी सिसकी। वह बहुत तंग थी।
"सहो इसे," राज ने झुककर उसे चूमा। "दर्द ही मज़ा है।"
उन्होंने उंगली को अंदर-बाहर करना शुरू किया। तेल की वजह से फिसलन थी। कामिनी की सिसकियाँ अब आहों में बदलने लगी थीं। राज की उंगलियां उसके अंदर खेल रही थीं, उसे चौड़ा कर रही थीं, उसे आने वाले दिनों के लिए तैयार कर रही थीं।
राज ने अपना अंगूठा उसके 'दाने' पर रगड़ना शुरू किया। कामिनी का शरीर कांपने लगा। उसे एक ऐसा सुख मिल रहा था जो उसने कभी सोचा भी नहीं था। बिजली के झटके लग रहे थे।
"बाबूजी... मैं... मैं कुछ हो रहा है... मैं मर जाऊंगी..."
"होने दे," राज ने रफ़्तार तेज़ कर दी। "मर जा मेरी बांहों में।"
अचानक, कामिनी का शरीर अकड़ गया। उसने राज के कंधों पर दांत गड़ा दिए। एक ज़ोरदार झटके के साथ, उसने अपनी ज़िंदगी का पहला 'चरम सुख' महसूस किया। उसका पानी राज की उंगलियों पर बह निकला। उसकी योनि ने राज की उंगलियों को जकड़ लिया।
वह निढाल होकर गिर गई, हांफते हुए। पसीने से लथपथ।
राज उसके ऊपर झुके। उन्होंने अपनी उंगलियों पर लगा कामिनी का रस देखा और उसे चखा।
"मीठा है," राज ने मुस्कुराते हुए कहा। "बहुत मीठा।"
उन्होंने अपना लिंग उठाया, जो अभी भी पत्थर जैसा सख्त था। उन्होंने उसे कामिनी की गीली जांघों के बीच रगड़ा, उसकी योनि के होठों पर फेरा, लेकिन अंदर नहीं डाला।
"आज के लिए इतना ही," राज ने कहा, खुद पर काबू पाते हुए। "मैं नहीं चाहता कि तू कल लंगड़ा कर चले और सबको शक हो जाए। असली काम... हम अस्तबल में करेंगे। जब बारिश होगी। तब तेरी चीखें कोई नहीं सुनेगा।"
कामिनी अभी भी होश में नहीं थी। राज ने उसे उठाया।
"कपड़े पहन और भाग जा," राज ने कहा। "इससे पहले कि प्रताप जागे। और यह सब... हमारे बीच का राज़ है।"
कामिनी ने लड़खड़ाते हुए अपनी फटी हुई चोली और साड़ी उठाई और लपेटी। उसका शरीर अभी भी झनझना रहा था। जब वह दरवाजे तक पहुँची, तो उसने मुड़कर देखा।
राज बिस्तर पर बैठे थे, नंगे, तेल में चमकते हुए, अपने लिंग को सहलाते हुए जो अभी भी शांत नहीं हुआ था। वे किसी विजयी राजा जैसे लग रहे थे जिसने नया किला फतह किया हो।
"दरवाजा बंद करती जाना," राज ने कहा। "और कल... कल फिर तैयार रहना।"
कामिनी बाहर निकली। ठंडी हवा उसे छू रही थी, लेकिन उसके अंदर जो आग राज ने लगाई थी, वह अब बुझने वाली नहीं थी।
वह जानती थी कि वह अब उस नामर्द प्रताप की पत्नी नहीं, बल्कि बड़े ठाकुर की 'रखैल' बन चुकी है। और शर्मनाक बात यह थी कि उसे यह पद... पत्नी होने से ज्यादा पसंद आ रहा था। वह अपने कमरे में गई, प्रताप के बगल में लेटी, और राज के सपनों में खो गई।
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