शादी को एक हफ्ता बीत चुका था। अज़ानगढ़ की उस विशाल विला में दिन तो किसी तरह कट जाते थे, लेकिन रातें... रातें कामिनी के लिए किसी सजा से कम नहीं थीं।
हर रात वही पुरानी, घिसी-पिटी कहानी दोहराई जाती। प्रताप देर रात को शराब पीकर लड़खड़ाता हुआ कमरे में आता। वह थोड़ी देर कामिनी के जिस्म के साथ जबरदस्ती करने की भद्दी कोशिश करता, उसे नोचता, काटता, और जब उसका 'औजार' साथ नहीं देता, तो वह अपनी नामर्दी का गुस्सा कामिनी पर उतारते हुए गालियां बकता और सो जाता।
कामिनी हर सुबह अपने बदन पर प्रताप के नाखूनों के निशान और अपनी आत्मा पर एक कुंवारी औरत होने का बोझ लेकर उठती। उसकी प्यास बढ़ती जा रही थी, एक ऐसी प्यास जो पानी से नहीं बुझने वाली थी।
दोपहर के 2 बज रहे थे। राजस्थान का सूरज आग बरसा रहा था। विला के मर्द—राज सिंह (बड़े ठाकुर) और मुनीम—बाहर कचहरी या खेतों के काम से गए हुए थे। प्रताप अपने कमरे में एसी चलाकर नशे में धुत होकर घोड़े बेचकर सो रहा था। नौकर अपनी कोठरियों में आराम कर रहे थे।
पूरी विला में एक अजीब सा, भारी सन्नाटा था, सिवाय रसोई के।
कामिनी रसोई में अकेली थी। विला की रसोई बहुत बड़ी थी, पुरानी शैली की, जहाँ आज भी एक कोने में मिट्टी का चूल्हा था और दूसरे कोने में आधुनिक गैस स्टोव। दोपहर का खाना बन चुका था, लेकिन बर्तनों का ढेर लगा हुआ था।
विला का पुराना रसोइया (महाराज) आज बीमार था, इसलिए आज यह काम नई बहू के सिर आ गया था। सास ने हुक्म दिया था कि बहू को घर के काम आने चाहिए, चाहे वह कितने भी बड़े घर की क्यों न हो।
कामिनी सिंक के पास खड़ी बर्तन धो रही थी। रसोई में पंखा तो था, लेकिन चूल्हे की गर्मी और बाहर की लू ने वहां का तापमान बहुत बढ़ा दिया था।
उसने घर पहनने वाली एक हल्की पीली, सूती की प्रिंटेड साड़ी पहनी थी। यह साड़ी देखने में साधारण थी, लेकिन इस वक्त पसीने ने इसे जिस्म की दूसरी त्वचा बना दिया था। रसोई की गर्मी और शारीरिक मेहनत की वजह से कामिनी पसीने में तर-बतर थी।
उसका ब्लाउज, जो पीठ से गहरा कटा हुआ था, पूरी तरह भीग चुका था। पसीने की वजह से ब्लाउज का पतला कपड़ा उसकी गोरी पीठ से चिपक गया था, जिससे उसकी रीढ़ की हड्डी की लकीर और ब्रा की पट्टी का हुक साफ उभर रहा था। उसकी कमर पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं।
कामिनी ने अपने माथे से पसीना पोंछने के लिए हाथ उठाया। उसकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे से सरक कर नीचे लटक गया। उसे ठीक करने का होश उसे नहीं था, या शायद गर्मी इतनी थी कि वह चाहती थी कि हवा उसके बदन को छुए।
उसकी गर्दन से पसीने की एक नमकीन बूंद लुढ़की। वह बूंद उसकी कॉलर-बोन से होती हुई, उसके ब्लाउज के गले के अंदर रेंगती चली गई। कामिनी को एक गुदगुदी हुई। वह बूंद उसके दोनों स्तनों के बीच की संकरी और गहरी घाटी में जाकर रुक गई।
कामिनी ने एक गहरी सांस ली। उसका सीना जोर-जोर से ऊपर-नीचे हुआ। ब्लाउज तंग था। प्रताप भले ही नामर्द था, लेकिन उसने सुहागरात पर और उसके बाद की रातों में अपनी कुंठा निकालने के लिए कामिनी के स्तनों को इतनी जोर से मसला था कि वे अभी भी दुख रहे थे और थोड़े सूजे हुए थे। कपड़े की रगड़ से उसके निप्पल संवेदनशील हो गए थे और ब्लाउज के अंदर तन रहे थे।
"हे भगवान... यह ज़िंदगी..." कामिनी बड़बड़ाई। उसने एक भारी पीतल के बर्तन को उठाया और उसे जोर-जोर से रगड़ने लगी, अपना सारा गुस्सा और हताशा उस बर्तन पर निकाल रही थी। उसे अपनी जवानी बर्बाद होती दिख रही थी। उसे एक मर्द चाहिए था। एक ऐसा मर्द जो उसे बांहों में भरे तो उसकी हड्डियों में दर्द न हो, बल्कि एक सुकून मिले। एक ऐसा मर्द जो उसे पूरा कर सके।
तभी, रसोई के दरवाजे पर एक लंबी और चौड़ी परछाई पड़ी। किसी के भारी, रोबदार कदमों की आहट हुई।
कामिनी चौंक गई। उसके हाथ से साबुन छूट गया। उसने मुड़कर देखा।
दरवाजे पर राज सिंह खड़े थे।
वे अभी-अभी खेतों का मुआयना करके लौटे थे। उन्होंने एक सफेद मलमल का कुर्ता और धोती पहनी थी। धूप और धूल की वजह से उनका चेहरा लाल था, जो उनके पौरुष को और बढ़ा रहा था।
कुर्ते के ऊपर के तीन बटन छाती तक खुले थे, जिससे उनका पसीने से भीगा हुआ, घने काले बालों से भरा चौड़ा सीना दिख रहा था। उनकी आस्तीनें कोहनियों तक ऊपर मुड़ी हुई थीं, और उनकी मज़बूत कलाइयों पर नसें रस्सियों की तरह उभरी हुई थीं।
कामिनी घबरा गई। उसका पल्लू नीचे गिरा हुआ था और ब्लाउज पसीने से लगभग पारदर्शी हो रहा था। उसने जल्दी से अपने गीले और साबुन से सने हाथों से पल्लू उठाया और अपनी छाती को ढकने की कोशिश की, लेकिन इसमें हड़बड़ी ज्यादा थी।
"बा... बाबूजी..." कामिनी ने हकलाते हुए कहा (वह जेठ को बाबूजी कहती थी, राजस्थानी रिवाज के अनुसार। "आप? अभी? मुझे लगा आप कचहरी गए हैं।"
राज ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। उनकी शेर जैसी गहरी और काली आंखें सीधे कामिनी पर गड़ी थीं। उन्होंने देखा कि कैसे वह घबराई हुई है, कैसे उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही है।
उन्होंने देखा कि पसीने ने उसके ब्लाउज को उसकी छाती से चिपका दिया है, जिससे उसके भारी और कड़े स्तनों का गोल आकार साफ पता चल रहा है। उन्होंने देखा कि उसकी कमर पर साड़ी पसीने से गीली होकर उसकी त्वचा से चिपक गई है, उसके कर्व्स को उभार रही है।