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कामिनी का सांस लेना भारी हो गया। उसे डर लग रहा था कि कहीं प्रताप नीचे न देख ले, या मेजपोश हिल जाए। उसने घबराहट में पानी का गिलास उठाया और पीने लगी।
"क्या हुआ बहू? मिर्च लगी?" राज ने पूछा, उनकी आंखों में एक शैतानी चमक थी।
"ज... जी... थोड़ा तीखा है," कामिनी ने झूठ बोला।
"मीठा खा लो," राज ने अपनी प्लेट से एक गुलाब जामुन उठाया और अपनी ही चम्मच से कामिनी की प्लेट में रख दिया। "मुंह मीठा करो।"
टेबल के नीचे, उनका पैर और ऊपर सरक गया। अब वे कामिनी की जांघ के अंदरूनी हिस्से को अपने अंगूठे से दबा रहे थे। वह हिस्सा बहुत संवेदनशील था।
कामिनी की योनि गीली होने लगी। यह जोखिम... यह डर... यह सब उसे पागल कर रहा था। राज का पैर अब खतरनाक हद तक ऊपर आ चुका था।
अचानक, राज ने अपना पैर उसकी दोनों जांघों के बीच फंसा दिया और दबाव बनाया। उनका पैर सीधे उसकी योनि के ऊपर (साड़ी के अंदर, लेकिन जांघों के बीच) था।
कामिनी की सिसकी निकलने ही वाली थी कि उसने अपने होंठ काट लिए। उसने मेज के नीचे अपना हाथ ले जाकर राज के पैर को रोकने की कोशिश की, लेकिन राज ने उसके हाथ को अपने पैर से दबा दिया।
"मुनीम जी," राज ने कहा। "जरा वो फाइल लाना जो मैंने कल दी थी। लाइब्रेरी में है।"
मुनीम जी उठकर दूसरे कमरे में गए। अब वहां सिर्फ तीन लोग थे। प्रताप अपने खाने में व्यस्त था।
राज ने अपना हाथ टेबल के नीचे डाला। उन्होंने कामिनी का हाथ (जो उनके पैर को रोकने गया था) पकड़ा और उसे खींचकर अपनी जांघ पर रख दिया।
"प्रताप," राज ने कहा। "तुम अपनी पत्नी का खयाल नहीं रखते। देखो, इसके हाथ कितने ठंडे हैं। बेचारी कमजोर हो गई है।"
प्रताप खाना खाने में व्यस्त था। उसने ऊपर देखा भी नहीं। "अरे, उसे एसी की आदत नहीं है भाईसाहब। गांव की है ना।"
राज ने कामिनी का हाथ अपनी जांघ पर और ऊपर खींचा। कामिनी की हथेली अब राज के कुर्ते के ऊपर थी, जांघों के बीच, ठीक उनके लिंग के ऊपर।
कामिनी को महसूस हुआ कि राज का लिंग कुर्ते और धोती के नीचे पूरी तरह खड़ा है। सख्त, गर्म और धड़कता हुआ।
"दबाओ इसे," राज ने बिना होठ हिलाए, सिर्फ आंखों से इशारा किया।
कामिनी कांप गई। पति सामने बैठा था। अगर उसने देख लिया तो?
"क्या सोच रही हो?" राज ने अपनी आवाज़ थोड़ी ऊंची की, जिससे प्रताप ने भी देखा। "मैं कह रहा हूँ कि तुम्हें अपने लिए कुछ नए जेवर खरीदने चाहिए। प्रताप, तुम इसे कल बाज़ार ले जाओ।"
"जी भाईसाहब, ले जाऊंगा," प्रताप ने कहा।
बातों की आड़ में, राज ने कामिनी के हाथ पर अपना हाथ रखकर दबाव डाला। कामिनी मजबूर हो गई। उसने अपनी उंगलियां मोड़ीं और राज के लिंग को कुर्ते के ऊपर से ही मुट्ठी में भर लिया।
राज की आंखें थोड़ी बंद हो गईं। उन्होंने एक गहरी सांस ली। "आह... खाना वाकई बहुत लज़ीज़ है। बहुत सुकून दे रहा है।"
कामिनी उनके लिंग को सहला रही थी, उसे दबा रही थी, और राज उसके सामने बैठकर खाना खा रहे थे। यह दृश्य कामिनी के लिए इतना कामुक था कि उसे लगा वह कुर्सी पर ही पिघल जाएगी। वह एक ही वक्त में डरी हुई थी और बेहद उत्तेजित भी।
तभी मुनीम जी वापस आ गए। कामिनी ने झटके से अपना हाथ खींचना चाहा, लेकिन राज ने उसे पकड़ रखा था। उन्होंने अपनी जांघों को सिकोड़कर उसके हाथ को वहां फंसा लिया।
कामिनी फंसी हुई थी। उसे इसी हालत में, एक हाथ से खाना खाना पड़ा, जबकि उसका दूसरा हाथ मेज के नीचे राज के गर्म और सख्त पौरुष की गर्मी ले रहा था।
खाना खत्म हुआ। राज उठे।
"मैं अपने कमरे में जा रहा हूँ," उन्होंने अंगड़ाई लेते हुए कहा। "थोड़ा आराम करूँगा। बहू, जरा मेरी दवा और पानी भिजवा देना। और सर दबाने भी आ जाना।"
यह कोड था। सीधा बुलावा।
कामिनी ने सिर हिलाया। वह जल्दी से उठी और रसोई में गई। उसका पूरा शरीर कांप रहा था। टेबल के नीचे का वह खेल उसे इतना उत्तेजित कर गया था कि उसकी पैंटी गीली हो चुकी थी।
उसने ट्रे में पानी और दवा ली। और राज के कमरे की तरफ बढ़ी।
गलियारे में उसे मुनीम जी मिले।
"बहू रानी," मुनीम जी ने उसे रोका। उनकी बूढ़ी आंखों में एक अजीब सा शक था। वे विला के पुराने वफादार थे, हवा का रुख पहचानते थे। "बड़े ठाकुर आज बहुत खुश लग रहे थे। और तुम भी... कुछ बदली-बदली लग रही हो।"
"जी... फसल अच्छी हुई है ना," कामिनी ने नज़रें झुका लीं। उसका दिल जोर से धड़क रहा था।
"फसल तो है ही," मुनीम जी ने धीरे से कहा। "लेकिन विला की हवा भी बदल गई है। संभलकर रहना बेटी। बड़े ठाकुर शेर हैं। और शेर जब शिकार करता है, तो निशान छोड़ देता है। और प्रताप बाबू... वो तो नासमझ हैं।"
"क्या हुआ बहू? मिर्च लगी?" राज ने पूछा, उनकी आंखों में एक शैतानी चमक थी।
"ज... जी... थोड़ा तीखा है," कामिनी ने झूठ बोला।
"मीठा खा लो," राज ने अपनी प्लेट से एक गुलाब जामुन उठाया और अपनी ही चम्मच से कामिनी की प्लेट में रख दिया। "मुंह मीठा करो।"
टेबल के नीचे, उनका पैर और ऊपर सरक गया। अब वे कामिनी की जांघ के अंदरूनी हिस्से को अपने अंगूठे से दबा रहे थे। वह हिस्सा बहुत संवेदनशील था।
कामिनी की योनि गीली होने लगी। यह जोखिम... यह डर... यह सब उसे पागल कर रहा था। राज का पैर अब खतरनाक हद तक ऊपर आ चुका था।
अचानक, राज ने अपना पैर उसकी दोनों जांघों के बीच फंसा दिया और दबाव बनाया। उनका पैर सीधे उसकी योनि के ऊपर (साड़ी के अंदर, लेकिन जांघों के बीच) था।
कामिनी की सिसकी निकलने ही वाली थी कि उसने अपने होंठ काट लिए। उसने मेज के नीचे अपना हाथ ले जाकर राज के पैर को रोकने की कोशिश की, लेकिन राज ने उसके हाथ को अपने पैर से दबा दिया।
"मुनीम जी," राज ने कहा। "जरा वो फाइल लाना जो मैंने कल दी थी। लाइब्रेरी में है।"
मुनीम जी उठकर दूसरे कमरे में गए। अब वहां सिर्फ तीन लोग थे। प्रताप अपने खाने में व्यस्त था।
राज ने अपना हाथ टेबल के नीचे डाला। उन्होंने कामिनी का हाथ (जो उनके पैर को रोकने गया था) पकड़ा और उसे खींचकर अपनी जांघ पर रख दिया।
"प्रताप," राज ने कहा। "तुम अपनी पत्नी का खयाल नहीं रखते। देखो, इसके हाथ कितने ठंडे हैं। बेचारी कमजोर हो गई है।"
प्रताप खाना खाने में व्यस्त था। उसने ऊपर देखा भी नहीं। "अरे, उसे एसी की आदत नहीं है भाईसाहब। गांव की है ना।"
राज ने कामिनी का हाथ अपनी जांघ पर और ऊपर खींचा। कामिनी की हथेली अब राज के कुर्ते के ऊपर थी, जांघों के बीच, ठीक उनके लिंग के ऊपर।
कामिनी को महसूस हुआ कि राज का लिंग कुर्ते और धोती के नीचे पूरी तरह खड़ा है। सख्त, गर्म और धड़कता हुआ।
"दबाओ इसे," राज ने बिना होठ हिलाए, सिर्फ आंखों से इशारा किया।
कामिनी कांप गई। पति सामने बैठा था। अगर उसने देख लिया तो?
"क्या सोच रही हो?" राज ने अपनी आवाज़ थोड़ी ऊंची की, जिससे प्रताप ने भी देखा। "मैं कह रहा हूँ कि तुम्हें अपने लिए कुछ नए जेवर खरीदने चाहिए। प्रताप, तुम इसे कल बाज़ार ले जाओ।"
"जी भाईसाहब, ले जाऊंगा," प्रताप ने कहा।
बातों की आड़ में, राज ने कामिनी के हाथ पर अपना हाथ रखकर दबाव डाला। कामिनी मजबूर हो गई। उसने अपनी उंगलियां मोड़ीं और राज के लिंग को कुर्ते के ऊपर से ही मुट्ठी में भर लिया।
राज की आंखें थोड़ी बंद हो गईं। उन्होंने एक गहरी सांस ली। "आह... खाना वाकई बहुत लज़ीज़ है। बहुत सुकून दे रहा है।"
कामिनी उनके लिंग को सहला रही थी, उसे दबा रही थी, और राज उसके सामने बैठकर खाना खा रहे थे। यह दृश्य कामिनी के लिए इतना कामुक था कि उसे लगा वह कुर्सी पर ही पिघल जाएगी। वह एक ही वक्त में डरी हुई थी और बेहद उत्तेजित भी।
तभी मुनीम जी वापस आ गए। कामिनी ने झटके से अपना हाथ खींचना चाहा, लेकिन राज ने उसे पकड़ रखा था। उन्होंने अपनी जांघों को सिकोड़कर उसके हाथ को वहां फंसा लिया।
कामिनी फंसी हुई थी। उसे इसी हालत में, एक हाथ से खाना खाना पड़ा, जबकि उसका दूसरा हाथ मेज के नीचे राज के गर्म और सख्त पौरुष की गर्मी ले रहा था।
खाना खत्म हुआ। राज उठे।
"मैं अपने कमरे में जा रहा हूँ," उन्होंने अंगड़ाई लेते हुए कहा। "थोड़ा आराम करूँगा। बहू, जरा मेरी दवा और पानी भिजवा देना। और सर दबाने भी आ जाना।"
यह कोड था। सीधा बुलावा।
कामिनी ने सिर हिलाया। वह जल्दी से उठी और रसोई में गई। उसका पूरा शरीर कांप रहा था। टेबल के नीचे का वह खेल उसे इतना उत्तेजित कर गया था कि उसकी पैंटी गीली हो चुकी थी।
उसने ट्रे में पानी और दवा ली। और राज के कमरे की तरफ बढ़ी।
गलियारे में उसे मुनीम जी मिले।
"बहू रानी," मुनीम जी ने उसे रोका। उनकी बूढ़ी आंखों में एक अजीब सा शक था। वे विला के पुराने वफादार थे, हवा का रुख पहचानते थे। "बड़े ठाकुर आज बहुत खुश लग रहे थे। और तुम भी... कुछ बदली-बदली लग रही हो।"
"जी... फसल अच्छी हुई है ना," कामिनी ने नज़रें झुका लीं। उसका दिल जोर से धड़क रहा था।
"फसल तो है ही," मुनीम जी ने धीरे से कहा। "लेकिन विला की हवा भी बदल गई है। संभलकर रहना बेटी। बड़े ठाकुर शेर हैं। और शेर जब शिकार करता है, तो निशान छोड़ देता है। और प्रताप बाबू... वो तो नासमझ हैं।"