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Adultery मस्त पड़ोसन (पड़ोसन को दुल्हन बनाया )

एक दिन हम चारों मेरे घर में बैठ कर गपशप मार रहे थे। ज्योति कुछ नाश्ता लेने अचानक जब उठ खड़ी हुई तो उसे चक्कर आने लगे और लड़खड़ा कर वह टेबल का सहारा ले कर डाइनिंग कुर्सी पर लुढ़क कर बैठ गयी। उसका यह हाल देख हम सब सावधान हो गए तब ज्योति ने कहा की उसे काफी चक्कर आ रहे थे और गर्दन में सख्त दर्द हो रहा था।

ज्योति की बात सुन कर सेठी साहब फ़ौरन उठखड़े हुए और ज्योति जिस कुर्सी पर बैठी थी उसके पीछे जाकर उन्होंने ज्योति को आराम से बैठने को कहा। फिर अपने दोनों हाथों की हथेलियां ज्योति के दोनों कंधे पर रख कर अपनी उंगलियां और अंगूठे के दबाव से ज्योति के कंधे के कालर की हड्डियों की मांसपेशियों को दबा कर उनका मसाज करने लगे।

कुछ ही देर में जब वह फारिग हुए तब ज्योति ने अपनी गर्दन इधरउधर मोड़ कर देखि, फिर एकदम उठखडी हुई। थोड़ा चलने के बाद उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे और ख़ुशी भरी मुस्कान थी। ज्योति ने मेरी और मुड़कर मुझे कहा, “कमाल है! सारा दर्द एकदम गायब हो गया। ना कोई चक्कर और ना ही कोई दर्द! सेठी साहबके हाथों में तो जादू है!”

मैंने एक राहत की सांस ली, क्यूंकि पिछले कुछ दिनों से ज्योति को अक्सर ऐसा दर्द होता रहता था और कुछ देर तक, जब तक वह दर्द अपने आप ख़तम नहीं हो जाता, ज्योति बड़ी परेशान रहती थी।

ज्योति की बात सुनकर सेठी साहब ने कहा, “ज्योति , तुम्हें ब्लड सर्कुलेशन की कुछ दिक्कत है। अगर तुम यह मसाज एक महीने तक करवाती रहोगी और साथ में कुछ दवाइयां और कुछ आसान एक्सरसाइज करोगी तो सब ठीक हो जायेगा। इस मसाज में थोड़ी ताकत से मांसपेशियों को जोर से दबाने की जरुरत है। इस बिमारी को हलके में मत लेना। इसे अगर अभी नजर अंदाज किया तो आगे चल कर बड़ी प्रॉब्लम हो सकती है। मैं भाई साहब को यह मसाज कैसे करना वह सीखा दूंगा। वह रोज यह मसाज कर देंगे। बाकी एक्सरसाइज बगैरह मैं आपको समझा दूंगा।”

ज्योति ने मेरी बात सुन कर मेरी और देखा और बोली, “इनको कहाँ फुर्सत है? यह तो कल से चार दिन के लिए फिर से टूर पर जा रहे हैं।”

मैंने कहा, “सेठी साहब, वैसे भी आप करीब रोज घर तो आते ही हो, हमारा हालचाल पूछने। तो आप ही ज्योति को शाम को घर आ कर रोज मसाज कर दिया करना। अगर आपको तकलीफ ना हो तो। और ट्रीटमेंट बगैराह तो आप ही करना क्यूंकि मुझे दवाइयां और डॉक्टर से दूर रहना ही अच्छा लगता है।”

उस रात मैंने सोते ही मेरी बीबी की टाँग खींचनी शुरू की। मैंने कहा, “ज्योति , सेठी साहब तो वैसे ही तुम्हें छूने का कुछ ना कुछ बहाना ढूंढते रहते हैं। तुमने तो उन्हें बढ़िया मौक़ा दे दिया मसाज करने का। अब तो ना सिर्फ वह तुम्हारा कंधा बल्कि पुरे बदन का मसाज कर देंगे।“

ज्योति ने टेढ़ी नजर से मेरी और देखा और बिना कुछ बोले रजाई में सर घुसा कर सो गयी। सोते सोते बोली, “तुमने क्यों मना कर दिया मसाज सिखने से? इसका मतलब तुम चाहते हो की सेठी साहब ही मेरा मसाज करे। ऊपर से मुझे दोष देते हो?”

मैंने मेरी बीबी को मनाते हुए कहा, “अरे तुम तो बुरा मान गयी। मैं तो वैसे ही मजाक कर रहा था। हम बात कर रहे थे ना की सेठी साहब काफी रोमांटिक लगते हैं। अगर वह रोमांटिक हैं और अब उन्हें मौक़ा मिला है तुम्हारा मसाज करने का तो अच्छी बात है ना? वैसे ही बेचारे इतने सालों के बाद डॉली जी से बोर हो गये होंगे। तुम्हारे जैसी सेक्सी औरत अगर उनसे मसाज कराये तो वह खुश तो होंगे ही? इसमें कौनसी बुरी या गलत बात है?” मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है।”

रजाई में टेढ़ी हो कर घुसी हुई ज्योति ने कहा, ” देखो तुम ना सेठी साहब के बारे में उलटिपुलटि बात मत किया करो। मैं मानती हूँ की सेठी साहब बातचीत करने में कुछ ज्यादा ही रोमांटिक लगते हैं, पर वह हमेशा मेरे साथ बड़ी इज्जत से पेश आये हैं। अगर वह मालिश भी करेंगे तो कभी मेरा फायदा नहीं उठाएंगे, इसका मुझे पूरा यकीन है।’

मैंने कहा, “देखो तुम्हारी बात गलत नहीं है। पर मर्द आखिर मर्द होता है। जब किसी औरत से उसका शारीरिक आकर्षण बहुत ज्यादा हो जाता है तब नाजुक परिस्थिति में समझदार से समझदार आदमी भी अपना आपा खो बैठता है। वह अच्छा बुरा सोच नहीं पाता है। उसमें भी जो मर्द काफी शशक्त और वीर्यवान होता है उसका लण्ड उसके दिमाग पर हावी हो जाता है..

सेठी साहब वाकई में समझदार हैं, पर उनका लण्ड उन पर भारी पड़ सकता है क्यूंकि उनका लण्ड वैसे भी बहुत लंबा, मोटा और तगड़ा है और आसानी से सतुष्ट नहीं होता। तुम ज्यादा इत्मीनान से मत रहना। मैं तुम्हें बता रहा हूँ की सेठी साहब बहुत ज्यादा सेक्सी हैं। जब वह उकसा जाते हैं तो उनका अपने आप पर नियत्रण रखना भी बड़ा ही कठिन हो जाता है।”

ज्योति मेरी बात सुन कर कुछ गुस्से में बिस्तर में बैठ गयी और बोली, “तुम क्या बकते रहते हो? तुमने सेठी साहब का लण्ड कब देखा? तुम ऐसे ही फ़ालतू की बकवास कर मेरा दिमाग खराब मत करो।”

मैंने मेरी बीबी को शान्ति से समझाते हुए कहा, “कुछ दिन पहले डॉली जी उनके चाचाजी के यहां गयी थी ना, उस की अगली सुबह की बात है। मैं जब सुबह घूमने निकला तो सेठी साहब के ड्रॉइंगरूम में लाइट देख कर मैं उनके दरवाजे पर पहुंचा……” मैंने फिर मेरी पत्नी को उस सुबह की पूरी दास्तान सुनाई।

मेरी सारी बात सुन मेरी बीबी की नींद ही उड़ गयी। मैंने जब कहा की सेठी साहब का लण्ड वास्तव में सात से आठ इन्चा लंबा और करीब दो से तीन इंच मोटा था तो जैसे मेरी बीबी की सांसे थम सी गयीं। पता नहीं उसके मन में उस समय क्या विचार आ रहे होंगे?

वैसे तो कोई भी औरत किसी मर्द के ऐसे तगड़े लण्ड के बारे में सुन कर यही सोचने लगेगी की अगर ऐसा तगड़ा मर्द उसकी चुदाई करे तो क्या हाल होगा उसका? ख़ास तौर से जब मैंने मेरी पत्नी को कहा की जब सेठी साहब डॉली जी को चोदते हैं तो डॉली जी को नानी याद दिला देते हैं बिना थके या झड़े डॉली जी को चोदते ही रहते हैं। डॉली जी बेचारी त्राहिमाम त्राहिमाम हो जाती है।
 
ज्योति ने जब यह सूना तो ज्योति के चेहरे पर और ख़ास कर उसकी आखों में आतंक और आश्चर्य दोनों के ऐसे मिश्रित भाव मैंने देखे जो कोई भयानक हॉरर फिल्म में फिल्म की हीरोइन के चेहरे पर खुनी का सामना होने पर आते हैं।

बड़ी मुश्किल से अपने आप को सम्हालते हुए जैसे वह अपने आप को ही नसीहत दे रही हो वैसे बोली, “मुझे क्या लेनादेना? सेठी साहब जाने और डॉली जी जाने।”

फिर कुछ रुक कर बोली, “पर एक बात तो है की जब चुदाई हो तो तगड़ी ही होनी चाहिए। तुम तो कई बार शुरू होने से पहले ही झड़ जाते हो। तो सारा मजा ही किरकिरा हो जाता है। खैर मुझे क्या? पर तुम यह सब मुझे क्यों सूना रहे हो?”

मैंने एक गहरी साँस लेते हुए कहा, “बेचारी डॉली जी।”

मेरी बात सुन कर ज्योति गुस्सा करती हुई अपना मुंह बना कर बोली, “अगर डॉली जी पर इतना ही रहम आ रहा है तो तुम जाओ और आंसूं पोंछो बेचारी डॉली जी के।”

मैंने धीरे से कहा, “सेठी साहब चाहते हैं की मैं डॉली जी को कार चलाना सिखाऊं।”

ज्योति ने कुछ रूखी आवाज में कहा, “तो जाओ,सिखाओ डॉली जी…… को कार चलाना। मुझे तो तुम कार चलाना सीखा नहीं पाए और चले डॉली जी…… को कार सिखाने!” जब मेरी पत्नी अपना मुंह बना कर “डॉली जी” बोली तो बीबी के अंदर से जलन की बू आ रही थी।

उस हालात में मैंने चुप रह कर सो जाना ही ठीक समझा।

शादी से पहले

मेरी पत्नी ज्योति शादी से पहले काफी दबंग सी लड़की थी। दबंग से मेरा मतलब है उसे लड़कों के साथ घूमने में कोई झिझक नहीं होती थी। पर यह भी सच है की कोई लड़का उसके साथ नाजायज छूट की भी उम्मीद नहीं रख सकता था। ज्योति ने दो तीन लड़कों की ऐसी पिटाई की थी की ज्योति के पीछे पुरे कॉलेज में “मर्दानी” के नाम से मशहूर थी।

कॉलेज में पढ़ाई में ज्योति हमेशा अव्वल या दूसरे नंबर पर आती थी। हालांकि वह पढ़ाकू या किताबी कीड़ा नहीं थी। वह खेलकूद में, डांस गाने में काफी रूचि रखती थी और ऐसे कार्यक्रम में हिस्सा भी लेती थी। पुरे कॉलेज में ज्योति के बारे में काफी चर्चे होते रहते थे।

ज्योति के माँ बाप ज्योति को पूरा सपोर्ट करते थे। घर में भी जब ज्योति पढ़ती थी तो इतनी एकाग्रता से पढ़ती थी की उसे खाने पिने का भी ध्यान नहीं रहता था। ज्योति की एक छोटी बहन और एक बड़ा भाई था। ज्योति घर में सब को आँख के तारे के समान प्यारी थी। एक जमाने में ज्योति के पुरखे बहुत बड़े जमींदार हुआ करते थे। पर अब वह सब ठाठ ख़तम हो चुका था।

कॉलेज के समय में ज्योति ने कॉलेज के ही एक शिक्षक के घर में एक्स्ट्रा क्लासेज ज्वाइन की थीं। शुरू में तो चार पांच लड़के लडकियां थीं पर बादमें आखिर में सिर्फ ज्योति ही रह गयी थी। पढ़ाई कराने वाले शिक्षक शादीशुदा थे पर उनकी बीबी और बच्चे गाँव में रहते थे और शिक्षक शहर में अकेले ही रहते थे और बच्चों को पढ़ाते थे।

ज्योति ने मुझे शादी के पहले ही साक्षात्कार में कबुल किया था की वह कुवारी नहीं थी। जाने अनजाने में उस शिक्षक के साथ तत्कालीन शारीरिक सम्बन्ध हुआ था। वह शिक्षक की ज्योति को पूरी एकाग्रता से पढ़ाने की लगन से इतनी प्रभावित हुई की एक कमजोर पल में दोनों युवा बदन एक दूसरे से सम्भोग करने से रोक नहीं पाए।

उनका वह अफेयर कुछ महीनों चला। एकदिन अचानक टीचर की बीबी गाँव से सर से मिलने आयी और उसे ज्योति और उसके पति के नाजुक संबंधों के बारे में पता लगा। टीचर की पत्नी ने अकेले में ज्योति से बात की और दो हाथ जोड़कर ज्योति से बिनती की की वह उसके पति से दूर चली जाए। ज्योति को इस बात का काफी गहरा सदमा पहुंचा और उसके बाद वह टीचर से कभी नहीं मिली।

यह सारी हकीकत ज्योति ने मुझे हमारी पहली मुलाक़ात में अकेले में ही साफ़ साफ़ बता दी, जब मैं मेरे माँ बाप के कहने के अनुसार लड़की देखने के लिए ज्योति के घर गया था। जब मैंने ज्योति के मुंह से यह सूना तो फ़ौरन मैंने ज्योति से कहा की यह ज्योति के लिए अयोग्यता नहीं पर सुयोग्यता का प्रतिक है।

मुझे इस बात से कोई शिकायत नहीं थी की शादी के समय मेरी पत्नी का कौमार्यभंग हो चूका था। बल्कि अगर मेरी होने वाली बीबी शादी से पहले सेक्स कर चुकी है तो मैं मानता हूँ की वह वाकई में प्यार करना जानती है और शारीरिक सम्भोग की कदर कर सकती है।

मेरी बात सुनकर ज्योति पहले ही साक्षात्कार में बिना कुछ सोचे समझे मुझसे लिपट गयी और बोली, “आप भले ही मुझे पसंद करें या ना करें, मैंने आपको पसंदकर लिया है। अब तय आपको करना है की मैं आपको पसंद हूँ या नहीं।” मेरा तो ज्योति को नापसंद करने का कोई सवाल ही नहीं था। और इस तरह हमारी शादी हो गयी।

आज की तारीख में

मैं महसूस कर रहा था की ज्योति के ह्रदय में सेठी साहब के लिए बड़ी इज्जत थी और वह सेठी साहब से बड़ी ही प्रभावित थी। शायद ज्योति के मन में कहीं ना कहीं सेठी साहब के लिए कुछ नरम भाव जरूर पैदा हुआ था जिसे मैं देख रहा था। इसका ख़ास कारण था सेठी साहब ज्योति से हमेशा प्यार भरी बातें करते थे हालांकि जब भी मिलते थे तो सेठी साहब ज्योति को जफ्फी देते थे और उसे डार्लिंग, हनी कह कर बुलाते थे पर ज्योति उनसे जफ्फी के समय भी उचित दुरी बनाये रखती थी। सेठी साहब ने कभी ज्योति से नाजायज छूट नहीं ली। वह ज्योति को बहुत सम्मान की नजर से देखते थे।

ज्योति जानती थी की सेठी साहब उसको लाइन भी मार रहे थे। पर ज्योति यह भी जानती थी की उसकी सहमति के बिना सेठी साहब उसका कोई फायदा नहीं उठाएंगे। सेठी साहब और डॉली के साथ हम कई बार रंगीन सा मजाक भी कर लेते थे।

सेठी साहब कई बार हमें पूछते, “आजकल रातको आप लोग ओवरटाइम तो नहीं कर रहे हो न?” कभी अगर हम दरवाजा खोल ने में देर करते तो कहते, “यार अंदर से ही कह देते की हम ज़रा चिपके हुए हैं तो हम बादमें आ जाते।”

तब ज्योति भी उनको कह ही देती, “सेठी साहब अब इतने साल हो गए शादी को। चिपकना चिपकाना तो दूर, अब तो साहब से बात करने में भी हफ़्तों लग जाते हैं। अब वह चिपकने का दौर ख़तम हो गया है।”

पढ़ते रखिये.. कहानी आगे जारी रहेगी!
 
एक दिन शाम को जब मैं ऑफिस से घर पहुंचा तो दरवाजा खोलते ही ज्योति मुझसे लिपट गयी और जोर शोर से रोने लगी। दर असल कुछ ही देर पहले ज्योति के पापा का फ़ोन आया की ज्योति के बड़े भाई का एक गंभीर एक्सीडेंट हुआ था और वह हॉस्पिटल में एडमिट थे। उनकी हालत नाजुक थी। ज्योति के भाई की माली हालत कोई ख़ास ठीक नहीं थी।

ज्योति का भाई उस समय दिल्ली से करीब ३५० किलो मीटर दूर राजस्थान में जयपुर से करीब ५० किलोमीटर दूर एक छोटे शहर में रहता था और कोई छोटीमोटी नौकरी करता था। वहाँ जाने के लिए कोई सीधी ट्रैन नहीं थी। हमारी पुरानी कार उतनी दुरी उन रास्तों पर बिना दिक्कत तय कर पाएगी उसका भरोसा मुझे नहीं था। हमने फ़ौरन तय किया की हम सराई कालेखां बस अड्डा चलेंगे और जो भी बस मिल जायेगी वह पकड़ कर ज्योति के भाई के पास सुबह तक पहुंचेंगे।

ज्योति ने डॉली जी को यह समाचार दे दिया और कहा की हम कुछ दिनों के लिए जा रहे थे और घर की चाभी उनको दे कर जाएंगे। अगर वापस आने में देर हुई तो एकाद हफ्ते बाद घर की साफ़ सफाई करवा देना। डॉली ने जब सेठी साहब को बताया तो फ़ौरन वह दोनों हमारे घर पहुंचे। मुझसे पूरी हकीकत समझने के बाद सेठी साहब ने मुझे पांच मिनट रुकने को कहा। सेठी साहब और डॉली अपने फ्लैट में गए। उन्हें गए हुए मुश्किल से पंद्रह मिनट लगे होंगे की सेठी साहब वापस आ गए।

आते ही सेठी साहब ने कहा, “तुम्हें बस में जाने की कोई जरुरत नहीं है। मैं तुम्हारे साथ मेरी टोयोटा कार भेज रहा हूँ। तुम्हें कार चलाने के भी जरुरत नहीं। मैं मेरे ड्राइवर को भी तुम्हारे साथ भेज रहा हूँ। वह कार चला लेगा। तुम अपनी कार मुझे दे दो। मैं दिल्ली में ऑफिस जाने के लिए तुम्हारी कार यूज़ कर लूंगा।”

मैं कुछ आगे बोलता इसके पहले सेठी साहब ने मुझे एक तरफ ले जा कर कहा, “देखो मामला एक्सीडेंट का है। हॉस्पिटल आजकल बहुत महंगे हो गए हैं। तुम्हें कुछ रुपयों की जरुरत पड़ेगी।” सेठी साहब ने मेरे हाथ में दो हजार रुपयों के १०० नोटों का एक बंडल पकड़ा दिया और बोले, “रखलो तुम्हारे काम आएंगे।”

मुझे पता था की ज्योति के पिता और भाई की आर्थिक हालत कोई ख़ास ठीक नहीं थी और वह रुपये जरूर काम आएंगे। एक्सीडेंट के समाचार मिलते ही ज्योति ने सबसे पहले मुझे यही पूछा था की क्या हम कुछ रुपये ले कर जा सकते हैं? हमने घर में जो पचीस तीस हजार रुपये के करीब थे वह ले लिए थे। पर मैं जानता था की उससे काम नहीं चलेगा।

मैंने सेठी साहब से वह नोटों का बंडल वापस करते हुए कहा, “सेठी साहब यह मामला ज्योति की रिश्तेदारी का है, इसमें मैं कुछ बोल नहीं सकता। आप सीधे ज्योति से बात कीजिये।”

सेठी साहब ने ज्योति को पास बुलाया और वही बंडल ज्योति को पकड़ा कर बोले, “देखो ज्योति , मामला एक्सीडेंट का है। हॉस्पिटल आजकल बहुत महंगे हो गए हैं। तुम्हें कुछ रुपयों की जरुरत पड़ेगी। इन्हें रखलो तुम्हारे काम आएंगे। अगर जरुरत ना पड़े या बच जाए तो वापस कर देना। देखो मना मत करना।”

ज्योति ने मेरी और देखा। ज्योति की आँखों में आंसू उभर आये वह दर्शाता था की वह रुपयों की जरुरत कितनी थी। पर ज्योति ने रुपयों का बंडल सेठी साहब के हाथ में वापस देते हुए बोली, “यह मैं कैसे ले सकती हूँ? वैसे ही आपके हम पर बड़े एहसान हैं। मैं इन्हें ले नहीं सकती। हम लोगों ने कुछ रुपयों का इंतजाम किया है, बाकी देख लेंगे। वहाँ से भी कुछ ना कुछ इंतजाम हो जाएगा।”

सेठी साहब ने कहा, “देखो ज्योति जिद मत करो। अभी इसे ले लो बाद में बेशक वापस कर देना।”

ज्योति ने अपनी जिद पर अड़े रहते हुए कहा, “सेठी साहब मैं किस अधिकार से इन्हें लूँ? आप हमारे पडोसी हैं और पडोसी सबसे पहला और सबसे बड़ा होता है यह सच है पर आखिर हम एक दूसरे के क्या लगते हैं? आपने यह पैसे कुछ ना कुछ काम के लिए रक्खे होंगे। मैं नहीं चाहती की हमारी वजह से आपको कोई परेशानी हो। नहीं सेठी साहब मैं यह नहीं ले सकती।”

सेठी साहब ने जब यह सूना और महसूस किया की ज्योति ज़िद पर अड़ी हुई है और पैसे नहीं लेगी, तो एकदम भावुक हो गए। वह रुपयों का बंडल ज्योति से ले कर वह हमारे घर से बाहर निकलते हुए बोले, “ज्योति , राज मुझे माफ़ करना। ज्योति , में जानता हूँ की आप को मतलब आपके मायके वालों को इन पैसों की जरुरत है। मेरे पास यह रुपये रखे हुए हैं और मुझे अभी इनकी जरुरत नहीं है..

अगर ऐसे वक्त में अपने काम नहीं आये तो वह अपने कहाँ से हुए? मैंने आप दोनों का इतना करीबी और इतना अपना समझा था की ज्योति को तो मैं एक अधिकार से अपनी गर्ल फ्रेंड की तरह समझता था और उसको गर्ल फ्रेंड कह कर छेड़ता रहता था। पर आज मुझे पता चला की वह सब कही सुनाई बातें थी। ठीक है, अगर आप हमारे कुछ भी नहीं लगते और अगर आपको लगता है की हमारा आप पर और आपका हम पर कोई अधिकार नहीं है तो फिर तो आज से हमारा रिश्ता ख़तम..

जिस रिश्ते में अपनापन ना हो वह रिश्ता किस कामका? मैं तो वाकई में बेवकूफ था की समझ रहा था की हमारा एकदम करीब का रिश्ता है और आपका मुझ पर और मेरा आप पर एक विशेष अधिकार है। मैं सोचता था की हम एक दूसरे के सुख, दुःख, धन, प्यार सब कुछ शेयर कर सकते हैं। आज ज्योति ने यह पैसे लेने से मना कर यह जता दिया की हमारे रिश्ते की वाकई में कोई भी अहमियत नहीं है।”

ज्योति ने और मैंने देखा की इतने सख्त दिखने वाले सेठी साहब की आँखों में उस वक्त आंसू उमड़ पड़े। मैंने उससे पहले सेठी साहब को इतना भावुक होते हुए नहीं देखा था। जब सेठी साहब निराश और हताश हो कर हमारे घर से जाने लगे तो भाग कर ज्योति सेठी साहब के पास पहुंची। सेठी साहब से लिपट कर ज्योति बोली, “सेठी साहब आप क्या बात करते हैं? आप का हम पर पूरा हक़ है। मैंने आपका दिल दुखाया हो तो माफ़ करना।”

सेठी साहब के हाथ में से रुपयों का बंडल लेते हुए ज्योति बोली, “सेठी साहब, यह क्या कह रहे हैं आप? आगे से ऐसे शब्द मत बोलियेगा। आप का मुझ पर बल्कि हम दोनों पर पूरा हक़ है। आप मुझे गर्ल फ्रेंड कहते हैं ना? हाँ, मैं आपकी गर्ल फ्रेंड हूँ और हमेशा रहूंगी। मुझे आपकी गर्ल फ्रेंड होनेका गर्व है। आपका अधिकार है की बॉय फ्रेंड होने के नाते आप मुझसे जो चाहे जब चाहे कह सकते हैं और कर सकते हैं। पर प्लीज ऐसा मत कहिये की आपका हम पर कोई हक़ नहीं है। आपका हम पर पूरा हक़ है। मुझे मेरे कड़वे शब्दों के लिए माफ़ कर दीजिये प्लीज।”

सेठी साहब ने ज्योति की गीली आँखों से आंसू पोंछते हुए हंसने की कोशिश करते हुए कहा, “यह हुई ना गर्ल फ्रैंड वाली बात। चलो अब और कुछ मत बोलो और निकलो। ज्यादा पैसों की जरुरत पड़े तो मुझे फ़ोन करना। तुम्हारे या भाई साहब के अकाउंट में जमा करवा दूंगा। तुम जितने दिन रहो रहना। कार की चिंता मत करना।”

फिर सेठी साहब फिर मेरी और मुड़ कर हंस कर बोले, “जब वापस आओगे तो मैं मेरी कार ले लूंगा और तुम्हारी कार वापस कर दूंगा। तब तक तुम्हारी कार मेरे पास सिक्योरिटी के एवज में जमा रहेगी।”

सेठी साहब की बात सुन कर मेरी आँखों में से भी बरबस आंसू निकल पड़े। मैं उनके गले लग गया और बोला, “आपने तो आज हम को खरीद लिया। आप क्या बात करते हैं सेठी साहब। मेरा सब कुछ आपका ही तो है!”
 
करीब एक घंटे के बाद खाना खा कर हम सेठी साहब की कार में निकल पड़े। सेठी साहब के दिए हुए पैसे हॉस्पिटल का बिल चुकाने में और सेठी साहब की कार और ड्राइवर घर से हॉस्पिटल और हॉस्पिटल से दवाई इत्यादि लाने में, आने जाने में बहुत ही काम आ गए। ज्योति के भाई का ऑपरेशन कामयाब रहा और पांच दिन बाद हम वापस दिल्ली आ गये।

पर वापस आने पर हमारे और सेठी साहब के रिश्तों में आमूल परिवर्तन आ चुका था। आते ही ज्योति डॉली के गले से लिपट गयी और रोती हुई बोली, “दीदी अगर तुमने हमारी यह ऐन मौके पर मदद नहीं की होती तो पता नहीं क्या हो जाता।”

डॉली ने ज्योति को अपने से अलग कर सेठी साहब की और धकेलते हुए कहा, “शुक्रिया मेरा नहीं सेठी साहब का अदा करो। यह सब इन्हीं के कारण हुआ है। मैं तो सिर्फ उन्हीं के कहने के अनुसार कर रही थी।”

ज्योति मुड़कर सेठी साहब के पास गयी और सेठी साहब के हाथों को अपने हाथों में ले कर बोली, “सेठी साहब आप दोनों हमारे लिए दोस्त नहीं फ़रिश्ते साबित हुए हो। आप दोनों के कारण मेरे भाई की जान बच गयी। मैं पैसे तो चुकता कर दूंगी, पर इस एहसान का ऋण कभी चुका नहीं सकती।” उस समय मैंने मेरी बीबी की आँखों में सेठी साहब के लिए सच्चे प्यार और एहसानमंदी का इजहार देखा।

सेठी साहब के दिए हुए पैसे तो हमने चुकता कर दिए पर उस हादसे के बाद सेठी साहब से हमारी नजदीकियां तेजी से बढ़ने लगीं। जब मैं टूर पर नहीं होता था, तब करीब करीब हर हफ्ते या दो हफ्ते में एक बार, या तो हमारे घर में या उनके घरमें हम एक मूवी साथ में मिलकर जरूर देखते थे। उस दिन ड्रिंक्स और खाने का प्रोग्रम भी हो जाता था। ज्यादातर हम दोनों कपल अपनी अपनी बीबियों के साथ या तो ड्राइंग रूम में फर्श पर गद्दा बिछा कर उस पर लेट कर या तो बैडरूम में पलंग पर लेट कर मूवी देखते थे।

ज्योति के गाँव से वापस आने के एक या दो हफ्ते बाद एक बार ऐसे ही हम चारों मेरे घर के ड्राइंग रूम में गद्दे पर लेटे हुए थे की अचानक ही मेरे मुंह से निकल पड़ा, “सेठी साहब यार एक बात मेरी समझ में नहीं आयी। आपने इतनी कम जान पहचान में अपनी कार और इतने सारे पैसे हमें सौंप दिए, ऐसा कोई करता है क्या? आप कौनसी मिटटी से बने हो?”

मेरी बात सुन कर सेठी साहब उठ खड़े हुए। “अभी एक मिनट में आता हूँ” कह कर वह हमारे घर का दरवाजा खोल कर बाहर निकले। हम सब एक दूसरे का मुंह देखते ही रहे की सेठी साहब अपने घर से दुर्गा माँ की एक फोटो ले कर हमारे सामने उपस्थित हुए। देवी माँ की तस्वीर सामने एक स्टूल पर रख

देवी माँ को प्रणाम करते हुए सेठी साहब बोले, ” यह माँ दुर्गा हमारी कुलदेवी है। देखो भाई, मेरे लिए यह देवी माँ से कोई ज्यादा नहीं। मैं इस देवी माँ के सामने यह सौगंध खा कर कहता हूँ की आज इसी वक्त से तुम दोनों को मैं अपना क़बूल करता हूँ। इसका मतलब यह हुआ की मेरा जो भी कुछ है वह तुम्हारा है। तुम्हें उसे मांगने की जरुरत नहीं। तुम उसे बगैर मांगे ले जा सकते हो।”

हम तींनों सेठी साहब की यह बात स्तब्ध से सुनते रहे। यह अचानक सेठी साहब को क्या हो गया? कमरे में वातावरण एकदम गंभीर हो गया। माहौल को कुछ हल्का करने के लिए सेठी साहब की बात सुन कर ज्योति कुछ शरारती मूड में मुस्कुराती हुई बोली, “सेठी साहब, आप बगैर सोचे समझे ऐसे सौगंध मत खाओ। आप मेरे पति को नहीं जानते। वह बड़े चालू हैं। कहीं आपसे वह ऐसी चीज़ ना मांगलें जो आप दे ना पाओ।”

ज्योति की बात सुन कर सेठी साहब ज्योति की और मुड़ कर बोले, “ज्योति मैं जानता हूँ, तुम्हारा इशारा तुम्हारी भाभी डॉली की और है।” फिर हलका सा हँसते हुए बोले, “भाई साहब जब चाहें डॉली की सहमति ले कर उसे उड़ा ले जाएँ। मुझे कोई शिकायत नहीं होगी। मैं जो कह रहा हूँ उसमें डॉली की भी सहमति है। क्यों डॉली , क्या मैं गलत कह रहा हूँ?”

डॉली जी यह सुन कर ताली बजाते हुए ज्योति का हाथ थाम कर बोली, “ज्योति यह बढ़िया है। तुम्हारे पति मुझे और मेरे पति तुम्हें उड़ा लेजाने का प्लान करने में लग गए। चलो ऐसे ही सही, इस बहाने में हम दोनों को हवाई जहाज में घूमने का अवसर तो मिलेगा।”

तब सेठी साहब ने कुछ गंभीर आवाज में ख़ास कर ज्योति की और देख कर कहा, “देखो मुझे गलत मत समझना। यह बात मैंने अपनी तरफ से कही है। मैंने यह कहा है की हमारा सब कुछ सांझा है। मतलब मेरा जो है वह तुम्हारा है। पर इसका मतलब यह नहीं की मेरी नजर में तुम्हारा सब कुछ मेरा है। यह भूल कर भी मत सोचना की मैं तुम पर या जो तुम्हारा है उस पर कोई अधिकार जमाने की कोशिश कर रहा हूँ।“

सेठी साहब की बात सुन कर ज्योति ने मेरी और तीखी नजर से देखा। मैं ज्योति का इशारा समझ गया। मैंने खड़े हो कर सेठी साहब के हाथ थाम कर माँ दुर्गा को प्रणाम किया और कहा, “क्या सेठी साहब, यह आप क्या कह रहे हो? एक तरफ आप माँ दुर्गा की कसम खा कर कहते हो की हमारा सब कुछ सांझा है, और दूसरी तरफ तेरा मेरा करते हो? देखो सेठी साहब, माँ दुर्गा की कसम खा कर मैं भी कहता हूँ की जैसा आप सोचते हैं बिलकुल वैसा ही हम भी सोचते हैं..

यह सच है की हमारे पास उतना धन नहीं जितना भगवान् ने आपको दिया है। पर मेरा और ज्योति आपके हैं और हमारा सब कुछ आपका है और अगर हम लोग आपके लिए कुछ भी काम आये तो उससे ज्यादा ख़ुशी हमें और कुछ नहीं होगी। ज्योति पर आप का भी उतना ही हक़ है जितना मेरा। आप उसे परायी मत समझना। क्यों ज्योति , क्या मैंने कुछ गलत कहा?” मैंने ज्योति की और मुड़कर ज्योति से पूछा।

ज्योति ने मेरी बात का जबरदस्त समर्थन करते हुए कहा, “बिलकुल सेठी साहब, सिर्फ हमारा सब कुछ ही नहीं, मैं और राज हम दोनों भी आपके ही हैं। आप ने हमें अपने प्यार और अपनापन से खरीद लिया है।”

डॉली जी ने उसी हंसी मजाक के टोन में कहा, “ज्योति अगर तुम सेठी साहब की हो तो मैं कहाँ जाउंगी?”

मैंने हँसते हुए कहा, “डॉली जी, अगर ज्योति सेठी साहब की हुई तो आप मेरी हुई। क्यों सेठी साहब आप को कोई एतराज तो नहीं?”

सेठी साहब हंस कर बोले, “वाह भाई यह तो कमाल ही हो गया। हमारी बीबियाँ तो सांझा हो गयीं? जब आप लोगों ने मिल कर यह तय कर ही लिया है तो मैं बीच में बोलने वाला कौन हूँ?”
 
ऐसे ही हंसी मजाक, छेड़छाड़ और हंसी मजाक में ही इशारों ही इशारों में कुछ गंभीरता का सिलसिला हम दोनों कपल के बीच शुरू हो चुका था। एक बार हमारे बेटे की स्कूल में पैरेंट टीचर मीटिंग में ज्योति और मुझे जाना था। स्कूल घर से थोड़ा दूर था। उस समय मैं टूर पर गया हुआ था। जब ज्योति को पता चला तो ज्योति ने मुझे फ़ोन किया की क्या मैं उस दिन आ सकूंगा?

मैंने कहा की मैं नहीं आ पाऊंगा पर अगर सेठी साहब फ्री हों तो उन्हें ले कर ज्योति जा सकती है। मैंने भी सेठी साहब को फ़ोन करके पूछा की अगर वह जा सकें तो ज्योति को जाने आने में दिक्कत नहीं होगी और स्कूल में भी अच्छा लगेगा। जब ज्योति ने सेठी साहब से बात की तो सेठी साहब फ़ौरन जाने के लिए राजी हो गए।

स्कूल में पहुँचते ही हमारा मुन्ना सेठी साहब को देख कर भाग कर उनसे लिपट गया। सेठी साहब टीचर से मुन्ना के प्रोग्रेस के बारेमें बात करने लगे। ज्योति बेचारी सेठी साहब के साथ बैठी हुई उन्हें देखती ही रही।

टीचर भी सेठी साहब को ही मुन्ना के पापा समझ कर सारी बातें करते रहे। जब मीटिंग खतम हुई तो टीचर ने ज्योति को मुबारकबाद देते हुए कहा की अक्सर माँ ही अपने बच्चों के बारे में बात करतीं हैं। पापा को बच्चों के बारे में ज्यादा मालुम नहीं होता। पर तुम्हारे हस्बैंड तो बेटे के स्टडी बारे में कितना इंटरेस्ट ले रहे हैं। उस समय ज्योति की टीचर को यह कहने की हिम्मत नहीं हुई की सेठी साहब दर असल मुन्ना के पापा नहीं एक पडोसी थे।

स्कूल से बाहर निकलते हुए जब ज्योति ने सेठी साहब से यह बात कही तो सेठी साहब ठहाका मार कर हंस पड़े और बोले, “चलो, भले ही गलत फहमी में कुछ देर के लिए ही सही पर इस बहाने मेरा तुम्हारे बॉय फ्रेंड से हस्बैंड में प्रमोशन हो गया।” सेठी साहब की बात सुन कर ज्योति के गाल शर्म के मारे लाल हो गए।

ज्योति कहाँ चुप रहने वाली थी? ज्योति ने कहा, “सेठी साहब बॉयफ्रेंड बनकर रहने में ही फायदा है। पूछो कैसे?”

सेठी साहब ने पूछा, “कैसे?”

ज्योति ने कहा, “बॉयफ्रेंड के पास गर्लफ्रेंड को एन्जॉय करने का अधिकार तो होता है पर कोई जिम्मेदारी नहीं होती। जब की हस्बैंड के पास अधिकार के साथ साथ बड़ी जिम्मेदारी भी होती है। तो आपको तो बॉयफ्रेंड बनकर रहने में ही फायदा है। बोलो आप क्या बनोगे?”

सेठी साहब ने ज्योति का हाथ अपने हाथ में लिया और ज्योति की आँखों में आँखें डाल कर बड़ी गंभीरता से बोले, “ज्योति तुमने मुझे शायद अब तक ठीक तरहसे नहीं समझा। मैं जिम्मेदारियों से भागनेवालों में से नहीं हूँ। बॉयफ्रेंड या हस्बैंड का तुम्हें एन्जॉय करने का अधिकार जो तुम मुझे देना चाहती हो उसके बिना भी मैं तुम्हारी सारी जिम्मेदारियां लेने के लिए तैयार हूँ। तुम एकबार आजमा कर तो देखो।”

सेठी साहब की बात सुन के एक बार ज्योति शर्म के मारी पानी पानी हो गयी। अपनी नजरें झुका कर कुछ दबी सी आवाज में जवाब देते हुए ज्योति ने कहा, “मैंने एक बार नहीं कई बार आजमा कर देखा है आपको सेठी साहब। हरबार आप अव्वल नंबर से पास हुए हो। आप मेरे सिर्फ हस्बैंड ही नहीं, आप मेरे सब कुछ बनने के लायक हो। पर हाँ, आपने मुझे कभी आजमाया नहीं सेठी साहब। मुझे आपके लिए कुछ करने का मौक़ा ही नहीं मिला। इसका मुझे अफ़सोस है।”

सेठी साहब ने ज्योति का हाथ थाम कर कहा, “देखो समय समय की बात है। आज मैं आपके काम आया, कल क्या पता मुझे आपकी जरुरत पड़े? वक्त का किसी को पता नहीं होता।”

ज्योति ने गाडी चला रहे सेठी साहब की जांघ पर एक हाथ रख कर कहा, “सेठी साहब, अगर कोई ऐसा वक्त आया की आप को हमारी मदद की जरुरत पड़े तो मैं आपको वचन देती हूँ की मेरी कोई भी चीज़ तो क्या, मेरी जान भी देनी पड़े तो मैं पीछे नहीं हटूंगी।”

सेठी साहब ने भावुक ज्योति का हाथ थामा और अपने हाथ में रखा। स्कूल से वापसी के दरम्यान ज्योति अपना एक हाथ सेठी साहब के हाथ में रखे हुए सेठी साहब के हाथ को अपने दूसरे हाथ से सँवारती रही। शायद उसका सेठी साहब को सम्पूर्ण आत्मीयता का संदेश देने का यह एक तरिका था।

जब ज्योति ने मुझे उसकी सेठी साहब से हुई इस बातचीत के बारे में बताया तो मैंने ज्योति को खिंच कर बाँहों में ले लिया और उसके के होँठों को चुम लिया और कहा, “वाकई में तुमने बहुत ही अच्छा किया। मैं आज तुमसे बहुत खुश हूँ।”

मेरी बात सुन कर मेरी बीबी के गाल शर्म से लाल हो गए। अपने आप को सम्हालते हुए हलका सा मुस्कुराती हुई वह बोली, “मैं मेरे पति की पसंद नापसंद अच्छी तरह जानती हूँ।”

एक बार नेट पर मैंने एक पोर्न मूवी देखि। वैसे स्टोरी का तो कोई ख़ास प्लॉट नहीं था पर वीडियो का टॉपिक मेरे मतलब का था। उसमें एक बीबी को उसका पति अपने दोस्त से कैसे चुदवाता है वह बताया था। वीडियो में खुली चुदाई के सिन थे। मेरे मन में आया की इसे ज्योति को तो जरूर दिखाना चाहिए।

उसी दिन रात को मैंने ज्योति से कहा की एक पोर्न मूवी है और उसे देखेंगे। ज्योति ने कोई जवाब नहीं दिया। इसका मतलब था की वह देखने के लिए तैयार थी। सोने के वक्त मैंने ड्राइंग रूम में ज्योति को ले जा कर टीवी स्क्रीन पर वह वीडियो की लिंक क्लिक की और वीडियो शुरू हो गया।

पढ़ते रखिये.. कहानी आगे जारी रहेगी!

उस पोर्न मूवी में कोई ख़ास कहानी तो थी नहीं। बस एक अमेरिकन फौजी दोस्त जो अफ़ग़ानिस्तान के लड़ाई के मैदान से छुट्टी पर वापस आया होता है तब अपने एक ख़ास करीबी दोस्त के घर जाता है वहाँ वह दोस्त की बीबी को कैसे चोदता है उसके बारे में वीडियो था।

शाम को जब दोस्त, दोस्त की पत्नी और फौजी साथ में ड्रिंक करने बैठते हैं तब दोस्त के बार बार कहने पर फौजी, दोस्त को अपनी कहानी सुनाता है। फौजी की एक सुन्दर गर्ल फ्रेंड थी जिससे फौजी बड़ा ही प्यार करता था। जब फौजी कुछ दिनों की ट्रेनिंग के बाद गर्ल फ्रेंड के पास वापस लौटता है तो अपनी गर्ल फ्रेंड को किसी और से चुदते हुए देख लेता है।

जब फौजी यह देखता है तो उसे बाड़ा आघात पहुंचता है और वह अफ़ग़ानिस्तान की पोस्टिंग ले लेता है। वहाँ अपनी जान की परवाह किये बिना वह खूब वीरता से लड़ कर कई दुश्मनों के सैनिकों को मार कर वह अनेक मैडल पाता है। पर गर्लफ्रेंड से धोखा खाने के कारण फौजी को जिंदगी से कोई लगाव नहीं रहा था और उसने दोस्त को कहा की अगली लड़ाई में वह अपनी जान देश के लिए कुर्बान करना चाहता था।

ऐसी करुणा भरी कहानी सुन कर बीबी का मन पसीज जाता है। फौजी का दोस्त भी अपनी बीबी को बार बार फौजी की विडम्बना का हवाला दे कर उसे फौजी के पास जा कर फौजी को सांत्वना देने के लिए कहता है। फौजी वैसे भी बड़ा शशक्त और तगड़ा मर्द था जिससे पत्नी भी आकर्षित हुई थी।
 
कुछ शराब का असर और कुछ अपने पति के उकसाने पर पत्नी वह फौजी दोस्त से आकर्षित हो कर फौजी के पास बैठ कर उसका हाथ ले कर सहानुभूति जताती है तो फौजी अपने दोस्त की पत्नी को खिंच कर अपनी बाँहों में ले लेता है।

फौजी और दोस्त की पत्नी कमर से कमर मिलाकर चिपक कर कामुक डांस भी करते हैं और आखिर में शर्माती, मुस्काती पत्नी फौजी की बाँहों में चली जाती है। धीरे धीरे दोस्त के बार बार उकसाने पर फौजी अपने दोस्त के सामने ही दोस्त की पत्नी के साथ छेड़खानी करते हुए एक के बाद एक कपडे उतार कर दोस्त की पत्नी को दोस्त के सामने ही चोदने लगता है।

कुछ ही देर में दोस्त भी नंगा हो कर अपनी पत्नी को फौजी के साथ मिलकर चोदना शुरू करता है। इस तरह रातभर फौजी और पति दोनों मिलकर बीबी की खूब चुदाई करते हैं।

जब मैंने वह मूवी ज्योति के साथ हमारे ड्राइंगरूम में फर्श पर गद्दा बिछा कर उस पर लेटे हुए पूरी देखि तो ज्योति का हाल देखने लायक था। ज्योति मुझसे चिपक कर कोई भयानक डरावनी मूवी देख रही हो ऐसे बड़ी बड़ी आँखें खोल कर बड़े ध्यान से देख रही थी। देखते हुए वह इतनी उत्तेजित नजर आ रही थी जैसा मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था।

मूवी देखने के बाद ज्योति मुझसे बार बार पूछ रही थी, “क्या ऐसा वाकई में होता है? क्या ऐसा हकीकत में हो सकता है? क्या कोई पति अपनी पत्नी को दूसरे मर्द से चुदवाते हुए देख सकता है? क्या कोई पत्नी अपने पति के सामने किसी गैर मर्द से चुदवाने के लिए राजी हो सकती है?”

तब मैंने मैंने मेरी बीबी ज्योति को अपनी बाँहों में उठा कर बैडरूम में ले जा कर उसे पलंग पर रखते हुए ज्योति की आँखों में आखें डाल कर कहा, “अगर तुम किसी मर्द से चुदवाना चाहो तो मैं तुम्हें किसी और मर्द से चुदती हुई देख सकता हूँ। पति पत्नी में सही अंडरस्टैंडिंग हो, पत्नी को पति में पूरा विश्वास हो और अगर पत्नी अपने मन पसंद किसी गैर मर्द से चुदवाना चाहे तो क्यों नहीं चुदवा सकती? तुम चुदाई के नाम से इतनी डरती क्यों हो? जानेमन तुम कौनसी दुनिया में जी रही हो? आज कल तुम देखती नहीं? टीवी पर और कई जगह खुले आम मर्द और औरत सेक्स के सिन करते हैं? इतना ही नहीं, वह अपनी शक्ल भी नहीं छिपाते। बल्कि कई तो अपना नाम भी जाहिर करते हैं। जो पोर्न फ़िल्में करते हैं वह काफी फेमस हो जाते हैं..

हिंदी फिल्मों में भी तो पोर्न फिल्म के कलाकार काम करके खूब पैसे कमाते हैं। खैर पैसों की बात छोडो, अपनी मर्जी से भी अगर पत्नी किसी मर्द से आकर्षित होती है और उससे चुदवाना चाहती है और पति अगर पत्नी के मन की बात समझता है तो उसे ख़ुशी से अपनी पत्नी को उस मर्द से चुदवाने इजाजत देनी चाहिए। वैसे ही पत्नी भी पति को सहमति देती है। चोदने चुदवाने के कारण उन पति पत्नी में मन मुटाव नहीं होना चाहिए बल्कि उन अनुभवों को याद कर, उन की बात कर पति पत्नी अपनी चुदाई को ज्यादा एन्जॉय करना चाहिए।”

मेरी बात सुनकर ज्योति ने कहा, “अच्छा? पर वह तो सब तो हाई सॉसाइटी में होता होगा। मध्यम क्लास के परिवार में ऐसा कहाँ होता है?”

तब मैंने मेरी बीबी को कहा, “डॉली जी यही तो कह रही थीं तुम्हें? और देखो हमारे पड़ोस में ही शादीशुदा मर्द और औरतों के आपसी में गैरों से सम्बन्ध के कई किस्से हैं जो मैं अगर सुनाने बैठ गया तो डार्लिंग,तुम हैरान रह जाओगी। करते सब हैं, पर चोरी चुपके। कोई मर्द या औरत जाहिर थोड़े ही करेंगे की मैं फलां फलां को चोदता हूँ या उस से चुदवाती हूँ?”

मेरी बात सुनकर वह दांतो तले उंगली दबा गयी, और बोली, “बापरे! यह सब तो मुझे पता ही नहीं था।”

मेरी बात सुनकर ज्योति कुछ हैरानगी से मुझे देखती रही। मैंने कहा, “देखो मैं एक एक्ज़ाम्पल के तौर पर बात कर रहा हूँ। सेठी साहब के साथ आज हम इतना घुलमिल गए हैं तो क्या तुम्हें नहीं लगता की हमारे बीच भी ऐसा कुछ कभी हो सकता है? क्या तुम्हें नहीं लगता की कभी कोई नाजुक वक्त में मसाज करवाते हुए सेठी साहब तुम्हें अपनी बाँहों में ले लें और तुम भी उस समय एक इमोशन के बहाव में बह कर उनको रोक ना पाओ..

और फिर एक से दो और दो से तीन होते हुए बात यहां तक बढ़ जाए की बदन और कपड़ों का कोई होशोहवाश ही ना रहे और जो हम सोचते हैं नहीं हो सकता वह हो जाए? क्या यह असंभव है? देखो मैं कोई इल्जाम नहीं लगा रहा। पर मुद्दा यहाँ यह है की क्या ऐसा हो सकता है या नहीं। मैं कहता हूँ हो सकता है। तुम बोलो, क्या ऐसा नहीं हो सकता?”

मैने देखा की मेरी बात पूरी तरह सुनकर मेरी बीबी मुझ से आँखें चुराती हुई नज़रे नीची कर बोली, “होने को तो कुछ भी हो सकता है, पर क्या ऐसा होना ठीक है?”

मैंने कहा, “क्यों ठीक नहीं है? अब ज़माना बदल गया है। आखिर जब जवाँ मर्द औरत एक दूसरे के इतने करीब हों और कुछ ऐसा माहौल बन जाए तो सेक्स हो ही जाता है। अगर तुम्हारे और सेठी साहब के बीच में क्या ऐसा नहीं हो सकता? और अगर ऐसा हो जाए तो कौनसा आसमान टूट पडेगा? अरे जब तुमने शादी से पहले एक मानसिक बहाव में बह कर उस शिक्षक से शारीरिक सम्बन्ध जोड़े तो कौनसा आसमान टूट पड़ा था? आज हम उस बात के बारे में कहाँ कुछ सोचते हैं?”

मेरी बात सुन कर ज्योति जैसे कुछ देर तक सन्न सी मुझे बड़ी बड़ी आँखों से देखती रह गयी। कुछ बोल नहीं पायी। कुछ देर बाद जब मैं भी ज्योति के जवाब की उम्मीद करता हुआ उसे देख रहा था तब मेरी बात का सीधा जवाब देने का बजाय मुझ पर बिगड़ती हुई ज्योति बोली, “वह शादी के पहले की बात थी। अब मैं शादीशुदा हूँ।”

मैंने कहा, तो क्या हुआ? शादी के बाद तुम्हारे सींग निकल आये हैं क्या? तुम तो वही हो जो पहले थी। खैर तुम्हारी बात भी गलत नहीं है। पहले तुम्हें अकेले ही ऐसा डिसिशन लेना होता था। अब तुम्हें पति का भी ख्याल रखना पड़ता है। पर जब मैं तुम्हारे साथ हूँ और अगर मुझे कोई एतराज नहीं हो और मैं ही तुम्हें सेठी साहब से चुदवाने के लिए कहता हूँ तो फिर तुम्हें परेशानी किस बात की? सच तो यह है की जवानी चार दिन की है।

जिंदगी में ऐसे साथीदार बड़ी ही मुश्किल से मिलते हैं जिन पर पूरा भरोसा किया जा सकता है, जिन से चुदाई के सम्बन्ध हो सकते हैं। मैं तो मानता हूँ की सही साथीदार हो तो एन्जॉय करने का ऐसा मौक़ा छोड़ना नहीं चाहिए। देखो तुम्हीं कह रही थी की डॉली और सेठी साहब इस वक्त बच्चे को लेकर एक अजीब सी उलझन में फंसे हुए हैं..

अगर इस वक्त हमने उनका साथ दिया तो उनकी समस्या भी सुलझ जायेगी। वैसे ही उनके हम पर बड़े अहसान हैं और अगर हम थोड़ा कुछ कर सकें तो उनकी जिंदगी बन जायेगी, और हम एन्जॉय भी करेंगे। मैं तुम्हें वादा करता हूँ की अगर ऐसा कुछ भी हुआ तो तुम्हें चिंता करने की जरुरत नहीं।

ऐसा देख कर मुझसे ज्यादा खुश और कोई नहीं होगा। यह मेरा तुम्हें वचन है। अभी हम मिले हैं, अगर कहीं हमारा अथवा उनका ट्रांसफर हो गया तो फिर बिछड़ जाएंगे। यह जिंदगी छोटी है। पता नहीं कितनी देर हम साथ में रहेंगे। तुम मानती तो हो ना की उनसे से हम सब कुछ शेयर कर सकते हैं?”

ज्योति ने मुंह टेढ़ा कर कटाक्ष में कहा, “ठीक है यार, बस भी करो। देखो यह सारी बातें हमारे बस में नहीं। जैसा तुमने कहा माहौल और मूड़ पर सब आधारित है। जो होगा जब होगा होगा। अब मैं यह समझ गयी की तुम क्या चाहते हो। तुम्हें मौक़ा मिला तो डॉली जी को चोदने की इजाजत मैं तुम्हें देती हूँ बस? यार जो करना है करो पर इसका ढंढेरा पीटने की क्या जरुरत है?”

मैंने कहा, “मैं ढंढेरा नहीं पिट रहा बस सिर्फ यही कह रहा हूँ की जब सेठी साहब ने डार्लिंग कहा तब तुम जैसे बिदक गयी वैसे अगर सेठी साहब और कोई मरदाना हरकत करे या तुम्हें जकडले, बूब्स सेहला दे या किस करले तो बिदकना मत। अब तो हम ने सब शेयर करने की बात मानी है तो तुम भड़क मत जाना या पीछे मत हट जाना। तुम जानती हो सेठी साहब कितने सेंसिटिव हैं।”

ज्योति ने कुछ आत्मविश्वास दिखाते हुए कहा, “तुम बेकार परेशान हो रहे हो। उसकी चिंता तुम मत करो। यह बात मैं तुमसे ज्यादा अच्छी तरह जानती और समझती हूँ और सेठी साहब को भी मैं अच्छी तरह से हैंडल कर सकती हूँ। सेठी साहब का मेरे साथ मरदाना हरकतें करना मेरे लिए कोई नयी बात नहीं है। पर हाँ मुझे एक बात बताओ, मानलो अगर सेठी साहब ने मेरे साथ कोई ऐसी वैसी हरकत की और कुछ इधरउधर हो गया तो तुम्हें जलन तो नहीं होगी ना? फिर बाद में शिकायत मत करना।”

ज्योति की जुबान से जब यह निकल ही गया तब मुझे तसल्ली हो गयी की आखिर बात आगे बढ़ सकती है, अगर सेठी साहब कुछ करें तो। मैंने कहा, “कमाल है, मैं ही तुम्हें कह रहा हूँ की आगे बढ़ो और मुझसे ही तुम सवाल कर रही हो? मुझे कोई शिकायत नहीं, मुझे तो बल्कि ख़ुशी होगी।”

इस बात के तीन चार दिन के बाद की बात है। एक दिन ऑफिस से घर लौटते हुए मुझे ज्योति का फ़ोन आया। उसे फिर से वही पीठ में दर्द और चक्कर आ रहे थे। मैंने फ़ौरन सेठी साहब को फ़ोन किया और ज्योति के दर्द के बारे में बताया और कहा की वह ज्योति को फ़ौरन अटेंड करें। तक़दीर से सेठी साहब अपने घर पहुंचे ही थे। मेरा फ़ोन पाते ही वह ज्योति के पास जा पहुंचे।

मुझे घर पहुँचते काफी देर हो गयी। मैं जब घर पहुंचा तो सेठी साहब घर से ज्योति का मसाज कर बाहर निकल रहे थे। मैंने दरवाजे की बेल बजाई। कुछ ही देर में ज्योति ने दरवाजा खोला। ज्योति के पीछे सेठी साहब भी दिखाई दिए। सेठी साहब ने आपने दोनों हाथ उठाते हुए कहा, “तुम्हारी पत्नी की मैंने जो सेवा करनी थी की। अब वह एकदम ठीक है।”

उस रात को सब काम निपटा कर जब ज्योति सोने को आयी तो मैं बड़े आश्चर्य से उसे देखता ही रहा। ज्योति की आँखों में मुझे वह उन्माद और कामवासना का शुरुर नजर आ रहा था जो शादी के बाद कुछ महीनों तक मैंने एन्जॉय किया था। ज्योति के चेहरे के भाव से और उसके पहनावे से यह साफ था की उस रात उस पर काम वासना का उन्माद छाया हुआ था। जाहिर था उस रात वह मुझसे बेतहाशा चुदवाना चाहती थी। ज्योति ने एक छोटी सी नाइटी पहन रक्खी थी और अंदर कुछ भी नहीं पहना हुआ था।
 
बैडरूम की बत्ती बुझा कर जब मेरी बीबी मेरे करीब आयी तो लेटने के बजाए वह मुझ पर चढ़ गयी और बड़ी शिद्दत से मुझसे लिपट कर पागल की तरह मुझे चूमने लगी और बड़े प्यार से बहकी बहकी आवाज में अश्पष्ट शब्दों में मेरे कान में कभी मुझे “जानू’ तो कभी “माय डार्लिंग” “माय बेबी” कह कर मुझे उकसाने लगी। जाहिर था की मसाज के दरम्यान कुछ ऐसा हुआ था जिसके कारण मेरी बीबी काफी उत्तेजित हो चुकी थी और उसे अपनी चूत की खुजली को कैसे भी जल्द से जल्द शांत करना था।

मेरी बीबी की नाइटी को उसके बदन से फारिग कर मेरी बीबी के नंगे बदन को मैं अपने हाथों से महसूस करने लगा। ज्योति ने भी मेरे पाजामे का नाड़ा खोल मेरे खड़े सख्त लण्ड को अपनी उँगलियों में लिया और उसे सहलाने लगी।

ज्योति एक चुदासी कुतिया की तरह मुझसे चुदवाने के लिए बेताब हो रही थी। यही मौक़ा था की मैं मेरी बीबी की उत्तेजना को और भड़काऊं और ज्योति को सेठी साहब से चुदवांने के बारे में बात करके मेरी बीबी के मन की बात समझने की कोशिश करूँऔर यह भी जानने की कोशिश करूँ की उस शाम कुछ हुआ की नहीं?

मैंने मेरी बीबी की टाँगीं चौड़ी कीं और उनके बीच मेरा सर डालकर मैं अपनी जीभ से ज्योति की चूत की पंखुड़ियों के बीच से रिस रहे स्त्री रस का आस्वादन करने लगा। मेरी जीभका स्पर्श महसूस करते ही ज्योति बोल उठी, “क्या करते हो? ऊपर चढ़ जाओ और मुझे चोदो प्लीज?”

मैंने पूछा, “क्या बात है? आज मेरी तक़दीर अचानक ही कैसे खुल गयी? आज मेरी रानी चुदाई के लिए इतनी बेताब कैसे है जी? कुछ बात तो है।”

ज्योति कुछ शर्माती हुई बोली, “हाँ, बात तो है। बात ही कुछ ऐसी है जी। पर तुम पहले मुझे मत तड़पाओ। अंदर डालो और चोदो मुझे तो बताऊँ। सुनोगे तो तुम्हारा जोश भी बढ़ जाएगा।”

मैंने पूछा, “अच्छा? बताओं ना जानेमन ऐसी क्या बात हुई?” हालांकि मुझे शायद कुछ आईडिया था की मेरी बीबी मुझे क्या कह सकती है।

ज्योति ने मुझे लिटा कर मेरी टांगों के बीच में जा कर मेरे लण्ड को अपने हाथों में पकड़ा और मेरे लण्ड को अपने मुंह में ले कर वह बड़ी शिद्दत से चुसने लगी। अपना मुंह ऊपर नीचे कर वह मेरे लण्ड को उस रात जबरदस्त वी.आई.पी. ट्रीटमेंट दे रही थी। मुझे इतना ज्यादा सुख बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मैंने पूछा, “री, अब बताओ भी आखिर क्या हुआ?”

ज्योति एकदम मेरे पास आयी और मेरे लण्ड से मुंह सटाकर बोली, “तुम कहते थे ना, की आखिर सेठी साहब भी एक मर्द हैं। आज उन्होंने अपनी मर्दानगी दिखा दी।”

ज्योति की बात सुनकर मेरी जान हथेली में आ गयी। मैंने आश्चर्य से पूछा, “क्या कहती हो? क्या सेठी साहब ने तुम्हें चोद दिया?”

ज्योति एकदम गुस्से में बोली, “क्या बकवास करते हो? ऐसा कुछ नहीं हुआ। अरे उन्होंने अपनी मर्दानगी मतलब मर्दों वाली हरकतें की आज मेरे साथ।”

मैंने पूछा, “अच्छा? क्या किया उन्होंने?”

ज्योति ने मुझे उस शाम हुई सारी कहानी शब्दशः सुनाई। मेरी पत्नी की कहने से मुझे यह महसूस हुआ की उसने कुछ भी नहीं तोडा मरोड़ा और सारी कहानी जैसे हुई थी वही मुझे कही।

ज्योति ने कहा, “आज जब मैंने तुम्हें फ़ोन किया तब मुझे बड़ा जबरदस्त दर्द हो रहा था। मुझसे बैठा नहीं जा रहा था। मेरी हालत बहुत खराब थी। तुमने फ़ौरन फ़ोन कर सेठी साहब को बताया और वह दो ही मिनट में आ पहुंचे। तुम तो जानते ही हो की जब मुझे दर्द होता है तो मैं कैसे तड़पती हूँ। सारे कपडे निकाल फेंकने का मन करता है।“ आगे ज्योति ने कहा उसे सुनकर मेरा लण्ड भी खड़ा हो गया।

सेठी साहब ने आते ही ज्योति की हालत देखि। ज्योति कभी लेट जाती तो कभी आधी बैठती थी। पीठ कमर और छाती में शूल की तरह जो दर्द हो रहा था उससे तंग आकर अपनी साडी उसने निकाल दी थी, की शायद उससे कुछ आराम मिले।

ज्योति के बाल बिखरे हुए थे, कपाल और गर्दन से पसीने की धार जैसे बह रही थी। ब्लाउज और ब्रा गीले होने के कारण ज्योति के खूबसूरत मम्मे (स्तन मंडल) की झाँखी हो रही थी। ज्योति के स्तनोँ के निप्पल की श्यामल रूपरेखा दिखाई दे रही थी। सेठी साहब ने आते ही सबसे पहले ही ज्योति के स्तनोँ को और निप्पलों को जब इतने साफ़ अंदाज में पहली बार देखा तो उनके भी पसीने छूट गए।
 
यह शायद पहली बार हो रहा था की सेठी साहब किसी सुन्दर औरत को फिजियोथेरपी करते हुए इतने अधिक उत्तेजित हुए हों। पर ज्योति का उस समय के रूप का दर्शन अद्भुत्त था। ऐसा लगता था जैसे कोई कामपीड़ित स्त्री किसी कामदेव के सामने कामातुर होकर रतिक्रीड़ा की इच्छा से बल खाती हुई उपस्थित हुई हो। पसीने के कारण ज्योति का ब्लाउज भी गिला हो रहा था।

ज्योति को देखते ही बरबस सेठी साहब का लण्ड उनकी निक्कर में हलचल करने लगा। बड़ी मुश्किल से उसे सम्हालते हुए सेठी साहब ने ज्योति को अपनी दोनों बाँहों में उठा लिया और पहले बैडरूम में खुद पलंग पर बैठे और फिर ज्योति को अपने करीब आगे बिठाया। ऐसा लगता था जैसे सेठी साहब ने ज्योति को अपनी गोद में बिठाया हो।

मैंने पूछा, “क्या बात करती हो? सेठी साहब ने तुम्हें अपनी गोद में बिठा दिया?”

ज्योति ने मेरी आँखों में आँखें डाल कर जैसे कहीं मैं कोई शक तो नहीं कर रहा हूँ ऐसे मेरी और देखा और बोली, “हाँ यार, जब गर्दन और पीठ पर मसाज करना होता है तो ऐसे ही बैठना पड़ता है ना? एकदम गोद में नहीं पर लगभग ऐसे ही जैसे गोद में हूँ। मेरा पिछवाड़ा बिलकुल उनके उसके ऊपर टिका हुआ था।”

मैंने मेरी बीबी को उकसाते हुए पूछा, “तुम्हारा पिछवाड़ा उनके उसके ऊपर टिका था, मतलब?”

ज्योति ने हवा में हाथ उठाकर अपनी हताशा जताते हुए कहा, “अरे यार, तुम तो मुझसे खुल्लमखुल्ला बुलवा कर ही रहोगे! मेरे कहने का मतलब था की मेरी गाँड़ उनके लण्ड पर टिकी हुई थी।”

मैंने कहा, “ओके, चलो आगे बढ़ो। फिर क्या हुआ?”

ज्योति ने जारी रखते हुए कहा, “राज इतना दर्द होते हुए भी जब ऐसा हुआ तो मैं वाकई में घबड़ा गई, क्यूंकि मेरे गोद में बैठते ही उनका वह एकदम खड़ा होने लगा।”

मैंने ज्योति को चिढ़ाने के लिए पूछा, “वह कौन? कौन खड़ा हो गया?”

ज्योति ने घूंसा मारते हुए चिढ कर कहा, “तुम जानते नहीं क्या खड़ा हो गया? मुझे चिढ़ाओ मत। मैं वैसे ही परेशान हूँ तुम और मत परेशान करो मुझे।”

मैंने कहा, “तो ठीक है, बोलो ना की सेठी साहब का लण्ड खड़ा हो गया? उसमें कौनसी शर्म है? जैसे मेरा लण्ड वैसे उनका लण्ड है। वैसे तो तुम मुझसे एकदम खुल कर बात करती हो।”

ज्योति ने नजरें चुराते हुए कहा, “तुम कितने गंदे हो! जब तक मैं गन्दी गन्दी बात नहीं करुँगी तुम मेरा पीछा छोड़ोगे नहीं। ठीक है भाई, सेठी साहब का लण्ड खड़ा हो गया और जैसे ही मैं उनकी गोद में बैठी तो उनका लण्ड मेरी गाँड़ की दरार में घुसने लगा। मैंने घाघरा पैंटी बगैरह पहना था उस समय। सेठी साहब ने भी पयजामा पहना था। फिर भी।”

मैंने कहा, “मैंने तो तुम्हें पहले ही बता दिया था की सेठी साहब का लण्ड कोई आम मर्द की तरह नहीं है। इतने कपडे बीच में होती हुए भी अगर सेठी साहब का लण्ड को तुमने अपनी गाँड़ की दरार में महसूस किया तो फिर तुम्हें भी मानना पडेगा की वह लण्ड अच्छा खासा लम्बा और मोटा तो होगा।”

मैंने पूछा, “फिर क्या हुआ?”

ज्योति ने फिर अपनी नजरें नीची कर कहा, ‘खैर तुम तो जानते हो की जब मुझे यह दर्द होता है तो मेरा क्या हाल होता है। मैंने सेठी साहब से कहा की मुझे चक्कर आ रहे हैं, मेरी पीठ, कमर और साइड पर एकदम शूटिंग पैन हो रहा है और मैं उसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही हूँ। उन टाइट कपड़ों में मुझे साँस लेने में भी दिक्कत सी लग रही है।”

ज्योति ने कहा की सेठी साहब ने उसकी बात सुनकर फ़ौरन कहा, “तुम्हें एतराज ना हो तो ब्लाउज और ब्रा निकाल दो। फिर मेरी आँखों में आँखें डाल कर कहते हैं की अगर तुम्हे दिक्कत है तो मैं अपनी आँखों पर पट्टी बाँध दूंगा।”

जब ज्योति ने यह सूना तो ज्योति क्या कहती? ज्योति ने कहा, “सेठी साहब, कहावत है की डॉक्टर से पेट नहीं छिपाते। अब मैं आपसे क्या छिपाऊं? मुझे आप पर पूरा भरोसा है। अब मैंने अपने आपको आपको सौंप दिया। अब आपको जैसा ठीक लगे ऐसे करो।”

ज्योति से इजाजत मिलते ही सेठी साहब ने आगे झुक कर पहले ज्योति के ब्लाउज के बटन खोल दिए। बटन खोलते ही ज्योति ने स्तनोँ का बोझ कुछ हल्का महसूस किया। ज्योति ने पीछे मुड़कर सेठी साहब की और देखा और राहत की एक गहरी सांस ली। सेठी साहब ने महसूस किया की ज्योति पीड़ा से वाकई परेशान थी। सेठी साहब ने फ़ौरन ब्रा का हुक भी खोल दिया। ज्योति के पके हुए बड़े खड़भुजा जैसे दोनों स्तन सख्त बन्धन से आजाद होते ही बाहर कूद पड़े।

सेठी साहब की नजर बचाते हुए बाजू में रखे तौलिये से ज्योति ने उन्हें फुर्ती से ढकने की कोशिश की। पर चूँकि तौलिया कुछ दुरी पर रखा हुआ था तो ज्योति को उसे हासिल करने में कुछ मशक्क्त करनी पड़ी और थोड़ा सा खिसक कर उसे ले कर स्तनोँ को ढ़कने में कुछ समय भी लगा। उस अंतराल में सेठी साहब को ज्योति के गोरे गोरे अल्लड़ मस्त फुले हुए पर फिर भी सख्ती से खड़े स्तनों के और उसके ऊपर गुब्बारे की बाहर की और खींची हुई चॉकलेटी रंग की निप्पलों के भी दर्शन की अच्छी खासी झांकी तो हो ही गयी।

ज्योति के गोरे गोरे कोमल से पर सख्त खींचे हुए स्तन देख कर सेठी साहब अपने हाथों को बड़ी ही मुश्किल से उन्हें मसल ने से रोक पाए। स्तन इतने भरे और फुले हुए थे जैसे वह दूध से भरे हुए हों। स्तनों के ऊपर बीच में स्थित उद्द्ण्ड चॉकलेटी रंग की निप्पलेँ जैसे सेठी साहब के हाथों और होठों को चुनौती से रहीं थीं की “आओ मुझे जोर से मसलो और खूब चुसो और काटो।” उन्हें देख कर भी कुछ ना कर पाने के कारण सेठी साहब के मन में जैसे भीषण अन्तर्युद्ध चल रहा था।

एक तो ज्योति के दो अल्लड़ स्तनोँ को उनकी पूरी छटा में देखना और फिर ज्योति की गाँड़ का सेठी साहब के लण्ड से रगड़कर छूना सेठी साहब तो जैसे तैसे झेल गए पर सेठी साहब का लण्ड कहाँ से बर्दाश्त कर पाता? जैसे ही सेठी साहब ज्योति के ऊपर से कंधे पर मसाज करने के लिए झुके तो सेठी साहब के काफी कण्ट्रोल करते हुए भी उनका लण्ड सेठी साहब के कण्ट्रोल के बाहर हो गया। सेठी साहब के ढीले से पयजामे में से फुला हुआ सख्त नारियल के पेड़ की तरह खड़ा सेठी साहब का लण्ड ज्योति ने अपनी गाँड़ की दरार पर महसूस किया।

अनायास ही ज्योति ने पीछे मुड़कर देखा तो सेठी साहब का लण्ड सेठी साहब के स्लैक्स में से अपनी लम्बाई दिखाता हुआ कपडे के अंदर लटकता हुआ पयजामे का एक बड़ा तम्बू बनाया हुआ दिख रहा था। अपने पूर्व रस रिसने के कारण सेठी साहब की दो जाँघों के बीच में पयजामे पर लण्ड ने बनाया हुआ तम्बू चिकनाहट से गीला भी हो चुका था।

ज्योति ने सेठी साहब के तनाव भरे चेहरे को देख कर यह भी महसूस किया की उस समय वह ज्योति को इस हालत में देख कर बड़ी ही विवशता की विकत स्थिति में से गुजर रहे थे। शर्म और व्याकुलता के मारे ज्योति बेचारी कुछ बोल नहीं पा रही थी।

सेठी साहब ने महसूस किया की ज्योति की नजर जो उनके दो जाँघों के बीच में लटके हुए तम्बू पर पड़ी थी तो घभराहट और अटपटाहट के मारे उन्होंने अपनी दोनोँ जाँघों को जोड़ कर कोशिश की ज्योति उनके लण्ड की वह स्थिति देख ना पाए। वह समझ गए की उनका लण्ड ज्योति की गाँड़ की दरार को कौंच रहा था और उसे ज्योति ने महसूस किया था।

वह बोल पड़े, “सॉरी, ज्योति , वैरी सॉरी यार” कहते हुए वह अचानक उठ खड़े हुए और अपनी निक्कर और उसमें उनका खड़ा हुआ लण्ड एडजस्ट कर ठीक करने में लग गए। ज्योति ने पीछे मुड़कर सेठी साहब को यह गुत्थमगुत्थी करते हुए देखा। सेठी साहब अपनी निक्कर में लण्ड को कैसे ठीक करते? वह तो जैसे जैसे सेठी साहब कण्ट्रोल करने की कोशिश कर रहे थे और बड़ा होता जा रहा था और सेठी साहब के कण्ट्रोल में नहीं आ रहा था।

तब अचानक सेठी साहब झुंझला कर एकदम दबी आवाज में बोल पड़े, “ससुरा, कुत्ते की औलाद, कण्ट्रोल ही नहीं हो रहा! साले चुपचाप दब के बैठ, इतना उछलता क्यों है?” ज्योति समझ नहीं पायी की सेठी साहब किसे गालियां निकाल रहे थे। शायद उनसे अपने आपको सम्हाला नहीं जा रहा था। सेठी साहब का हाल देख कर ज्योति ना चाहते हुए भी मुस्कुरा पड़ी। खैर ज्योति भी समझती थी की इस हालात में कैसे कोई मर्द अपने आपको सम्हाले?
 
ज्योति को पीठ का इतना ज्यादा दर्द हो रहा था की उससे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। ज्योति ने सेठी साहब से कहा, “सेठी साहब छोड़िये उसको। उसकी चिंता मत कीजिये। उसको तो मैं झेल लुंगी, पर यह दर्द नहीं झेला जा रहा। पहले मुझे इस दर्द से फारिग कीजिये प्लीज।”

ज्योति ने जब यह कहा तब सेठी साहब अपने लण्ड को कण्ट्रोल करने की चिंता से कुछ हद तक निश्चिन्त हुए और अपने काम पर ध्यान देने लगे। सेठी साहब ने ज्योति को अपने आगे छाती पर लेटने को कहा जिससे वह ज्योति की पीठ और कन्धों पर अच्छी तरह मसाज कर सके। सेठी साहब के पास कुछ हर्बल तेल था जिसे उन्होंने ज्योति की पीठ पर काफी मात्रा में गिराया।

बहते हुए तेल की धारा में हाथ डालकर उसे ज्योति की पूरी पीठ पर हल्के से हथेली में लेकर पूरी पीठ पर फैलाने लगे। धीरे धीरे अपना अंगूठा ज्योति के कन्धों के पीठ वाले हिस्से पर रख कर अपनी अंगूठे की बाजू वाली उंगली से सही पॉइंट पर दबाकर सेठी साहब एकक्यूप्रेशर की तकनीक से दबाव देने लगे। धीरे धीरे दबाव बढ़ता गया और ज्योति के मुंह से हलकी सी सिसकारी भी निकल पड़ी।

ज्योति के हाल भी बड़े ही अजीब थे। एक और सेठी साहब के खड़े सख्त लण्ड का ज्योति की गाँड़ के ऊपर रगड़ना, दूसरे सेठी साहब के ज्योति के स्तनों को देख लेना और फिर मालिश करते हुए उनके हाथ अनायास ही कई बार ज्योति के स्तनोँ को छूने से ज्योति की सिसकारियां अक्सर कामुकता की कराहट जैसे निकल जाती थीं।

तेल को नीचे फ़ैल कर गिरने से रोकने के लिए बार बार सेठी साहब को ज्योति की छाती तक अपनी हथेली ले जानी पड़ती थी। कई बार इसके कारण सेठी साहब का हाथ ज्योति के स्तनों को छू लेते थे। सेठी साहब ने डरते हुए पूछा, “ज्योति , देखो मालिश करते हुए कई बार मेरा हाथ तुम को इधर उधर छू सकता है। प्लीज इसे गलत मत समझना। तुम कहोगे तो मैं हाथों को दूर ही रखूंगा।”

ज्योति की हालत तो वैसे ही खराब थी। ज्योति ने दबी हुई आवाज में कहा, “सेठी साहब, आप भी कमाल हो! हाथों को दूर रखोगे तो मालिश कैसे करोगे? मैंने कोई शिकायत की क्या? आप इतने क्यों परेशान हो रहे हो? मैं समझ सकती हूँ। आप चिंता मत करो। आप अपना काम करो। प्लीज बेकार में हिचकिचाओ मत।”

ज्योति की इस तरह खुली इजाजत मिलने पर सेठी साहब ने राहत की गहरी साँस ली। अब वह कुछ हद तक निश्चिंत हो गए। सेठी साहब ने ज्योति की पीठ, कंधे और कमर पर अच्छी तरह से मालिस की और ऐसा करते हुए हालांकि सेठी साहब ने ज्योति के स्तनोँ पर मसाज तो नहीं किया पर कई बार उन्हें ज्योति के स्तनोँ को छूना पड़ा।

सेठी साहब का लण्ड भी पूरी मसाज के दरम्यान खड़ा का खड़ा ही रहा और अक्सर ज्योति की गाँड़ की दरार में ठोकर मारता रहा। पर सेठी साहब ने यह ध्यान रखा की उनसे कोई ऐसी हरकत ना हो जिससे ज्योति को कोई शिकायत का मौक़ा मिले।

कुछ ही देर में ज्योति का दर्द गायब हो गया। सेठी साहब ने जब ज्योति के बदन के ऊपर से अपना वजन हटा लिया तो ज्योति ने एक गहरी राहत की साँस ली। तौलिये को अपनी छाती पर ही रखे हुए ज्योति सेठी साहब की और मुड़ी और उनकी बाँहों में जा कर उनसे लिपट कर बोली, “सेठी साहब आपने मुझे नयी जिंदगी दे दी। यह दर्द मेरी बर्दाश्त से बाहर हो गया था। आपका बहुत बहुत शुक्रिया। मेरी समझ में नहीं आ रहा की मैं इसका बदला कैसे चुकाऊँगी।”

यह कह कर ज्योति ने अनायास ही सेठी साहब के गाल पर एक उन्माद पूर्ण चुम्मी की और उठ कर दूसरे कमरे में कपडे पहनने चली गयी। उस समय सेठी साहब किंकर्तव्यमूढ़ बनकर बैठे हुए ज्योति के बारे में सोचने लगे।

बीबी से यह कहानी सुन कर मेरा लण्ड भी अपना रस रिसने लगा। ज्योति उसे सहलाती रहती थी और कभी कभी झुक कर उसे चुम भी लेती थी। इस बात को कहते कहते ज्योति भी काफी उत्तेजक दशा में थी यह मैं अनुभव कर रहा था।

मैंने ज्योति से पूछा, “क्या तुम्हें पता है की सेठी साहब कुत्ता बगैरह कह कर किसे कोस रहे थे?’

ज्योति ने मेरी तरफ प्रश्नार्थ भाव में देखा। मैंने कहा, “वह अपने शैतान लण्ड को कोस रहे थे। वह उसे बैठने के लिए जबरदस्ती कर रहे थे।”

ज्योति अपनी बड़ी बड़ी आँखें फुलाते हुए मेरी और देख कर बोली, “अरे बापरे! ओह….. तुम क्या कह रहे हो? वह अपने लण्ड को कण्ट्रोल करने की कोशिश कर रहे थे? मतलब अगर आज सेठी साहब अपने आप पर कण्ट्रोल ना कर पाते तो मेरी तो बजा ही दी होती उन्होंने।”

मैंने कहा, “बिलकुल, मैं तो बड़ा हैरान हूँ। कोई भी मर्द कितना भी संयम रखे, ऐसे मौके पर अपना नियत्रण कर ही नहीं सकता। ऐसा मौक़ा कोई मर्द छोड़ता है? एक खूबसूरत औरत अपने आधे कपडे निकाले तुम्हारे सामने ऐसी लेटी हुई है की तुम्हारा लण्ड उसकी चूत से रगड़ रहा है, बस देर है तो उसका घाघरा ऊपर करने की और पैंटी निकालने की। तो कौन मर्द ऐसी औरत को चुदाई किये बगैर छोड़ेगा?”

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मेरी बात सुन कर ज्योति की साँसें फूलने लगीं। उसे महसूस हो रहा था की मैं जो कुछ कह रहा था वह सब सच था। ज्योति खुद जानती थी की दरअसल बात तो यह थी की उस समय का जो माहौल था उसमें सेठी साहब से कहीं ज्यादा ज्योति खुद उस समय की उत्तेजना और उन्माद का शिकार थी।

सेठी साहब को ज्यादा कुछ करने कीजरूरत नहीं थी। एक खूबसूरत औरत आधी नंगी उनके लण्ड से सट कर औंधी लेटी हुई थी। सेठी साहब को तो सिर्फ उसका घाघरा ही उठाना था और पैंटी को नीचे करके अपना लण्ड उसकी चूत में घुसेड़ देना था।

अगर सेठी साहब ने एक क़दम और आगे बढ़ा कर ज्योति के सारे कपडे निकाल दिए होते और मसाज करते हुए ज्योति को नंगी कर अपनी बाँहों में ले लेते तो ज्योति उन्हें चोदने से रोक ना पाती। बल्कि एक अभिसारिका की तरह ज्योति सामने चलकर अपने आप को सेठी साहब को सौंप देती। सेठी साहब को ज्योति का नंगा बदन पाने के लिए ज्यादा कुछ संघर्ष नहीं करना पड़ता।

ज्योति ने कहा, “राज, अब आगे बहुत सम्हालना पडेगा। यह एक जबरदस्त अनुभव है। कभी आगे से मैं ऐसा नहीं करुँगी। आज तो वाकई में मैं खुद ही पागल हो रही थी। सेठी साहब की गरम गरम साँसें, उनके तगड़े लण्ड का मेरी गाँड़ और चूत से टकराना और कभी कभार उनका मसाज करते हुए मेरी चूँचियों को छू जाना मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रहा था। अगर आज सेठी साहब ने अपने आप पर संयम ना रखा होता और उन्माद में आ कर अगर मेरे सारे कपडे उतार दिए होते तो तुम्हारी बीबी उनको रोक ना पाती और सेठी साहब से चुद जाती।”

मैंने कहा, “बेबी, तुम इतनी चिंता क्यों करती हो? चुद जाती तो चुद जाती। तुम अगर सेठी साहब से चुद जाती तो क्या हो जाता?”

तगड़ी चुदाई के बाद थकी हुई मेरी बीबी आधी नींद में थी। ज्योति ने अपनी आँखें मूँदे हुए आधा सोते और आधा जागते हुए कहा, “नहीं राज, तुम जितना इजी ले रहे हो यह बात उतनी आसान नहीं है। तुम मर्द लोग सेक्स को एक खेल की तरह समझते हो। एक औरत के लिए वह मानसिक रूप से एक बड़ा मकाम है।

औरत के लिए वह एक स्वाभिमान की बात है और जिंदगी भर उसे याद दिलाया जाता है की एक बार वह फलांफलाँ से चुदवा चुकी है। खैर आज तो मैं उस दाग लगने से बच गयी पर अब आगे मुझे सम्हालना है। मुझे सेठी साहब का धन्यवाद देना पडेगा की यह जानते हुए भी की मैं बड़ी ही कमजोर स्थिति में थी, उन्होंने मेरा गलत फायदा उठाने की कोशिश नहीं की।”

मैंने कहा, “बेबी तुम्हारी बात गलत नहीं है। पर तुम इसे नकारात्मक दृष्टि से देख रही हो। अगर सेठी साहब ने तुम्हें वाकई में ही चोद दिया होता तो क्या तुम्हें ऐसा लगता है की भविष्य में वह तुम्हें इस बात को ले कर कभी बदनाम करते? या क्या मैं कभी तुम्हारा दोष निकालता की तुमने सेठी साहब से चुदवाया था?”

ज्योति की आँखों में तब तक गहरी नींद सवार हो रही थी। ज्योति ने ऊपर उठ कर मुझे होंठों पर चूमते हुए लचङती आवाज में कहा, “खैर यह तो मैं जानती हूँ की तुम दोनों में से कोई भी मेरी बदनामी नहीं करोगे।”

मैंने ज्योति के होँठों को चूसते हुए कहा, “तो फिर तुम सेठी साहब से चुदवाने से क्यों डरती हो? जाओ मौक़ा मिलते ही जी भर के चुदवा लो सेठी साहब के तगड़े लण्ड से। मैं तुम्हारा पति तुम्हें कहता हूँ।”

मुझे पता नहीं मेरी बात मेरी बीबी ने सुनी की नहीं क्यूंकि उसी समय ज्योति लुढ़क पड़ी और खर्राटे मारने लगी। शायद वह मुझे यह जताना नहीं चाहती थी की उसने वह सूना और अच्छी तरह समझ भी लिया।

उस वाकये के फ़ौरन बाद करीब एक हफ्ते तक मैं बाहर रहा। बीच में मेरी सेठी साहब से और ज्योति से फ़ोन पर बात होती रहती थी।उस दरम्यान मैंने महसूस किया की दोनों उस हादसे के बारे में काफी सोचने लगे थे। अब शायद मामला कुछ गंभीरता पकड़ने लगा था। मैं जब वापस आया तब मैंने महसूस किया की अब जब भी ज्योति और सेठी साहब मिलते तो दोनों एक दूसरे से कुछ ज्यादा ही धीर गंभीरता से बरतने लगे। वह बचपना और शरारत कुछ हद तक कम हो गयी थी। ज्योति जब भी सेठी साहब के सामने होती तो अपनी नजरे शर्म से निची करने लगी।

ज्योति का भाई अब हॉस्पिटल से घर आ चुका था। ज्योति का मन कर रहा था की वह उसके मायके एक बार और जाए और कुछ दिन वहाँ रहे। पर ज्योति बच्चे के साथ कैसे जायेगी बगैरह हम तय नहीं कर पा रहे थे। मैं छुट्टी ले नहीं सकता था। एक शाम को हम ज्योति के जाने के बारे में बात कर ही रहे थे की सेठी साहब हमारे घर आ पहुंचे।

जब उन्होंने सूना की ज्योति मायके जाना चाहती है तो उन्होंने ताली बजाते हुए कहा, “अरे भाई वाह, क्या बात है! मेरा कल जयपुर जाने का प्रोग्राम बन रहा है। मुझे कुछ ऑफिस का काम है। वहाँ मैं तीन दिन रहूंगा। ज्योति का घर जयपुर के नजदीक ही है। अगर ज्योति आना चाहती है तो मैं ज्योति को उसके घर छोड़ कर जयपुर चला जाऊंगा और अगर ज्योति तीन दिन में वापस आना चाहती है तो उसे वापस भी ले आउगा। हम यहां से जल्दी सुबह निकालेंगे और दुपहर तक ज्योति को उसके घर पहुंचा कर मैं जयपुर चला जाऊंगा।”

सेठी साहब की बात सुनकर ज्योति ख़ुशी से उछल पड़ी। फ़ौरन हमने सेठी साहब का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और दूसरे दिन सुबह पांच बजे ज्योति और सेठी साहब के निकलने का प्रोग्राम फाइनल हो गया। रात को जब हम सोने गए तो ज्योति बहुत खुश थी। बिस्तर में पहुँचते ही वह मुझसे लिपट गयी और बोली, “मेरे जाने की बड़ी ही अच्छी व्यवस्था तो हो गयी पर तुम्हें घर में अकेला छोड़ कर जाना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। खैर, डॉली जी तो यहीं है, तो तुम्हारे खाने पिने बगैरह का इंतजाम तो हो ही जाएगा।”

मैंने मेरी बीबी को चिढ़ाते हुए पूछा, “यह खाने पिने के साथ बगैरह लगाने से तुम्हारा क्या मतलब है? तुम कहीं कुछ उलटपुलट तो नहीं सोच रही हो ना?”

ज्योति ने आँखें मटकते हुए कहा, “यह ‘बगैरह’ तो तुम पर निर्भर करता है। तुम भी अकेले, डॉली जी भी अकेली, आगे क्या करना है वह तो तुम ही जानो। वैसे और कुछ नहीं कर पाए तो तुम इस दरम्यान डॉली जी को कार चलाना सिखाने के लिए तो जा ही सकते हो। कार के साथ साथ अगर और कुछ भी सिखा पाए तो और भी अच्छा है।”

मेरी बीबी के तीखे ताने सुन कर मेरे पुरे जहन में आग लग गयी। मैंने पूछा, “क्या तुम मुझे चुनौती दे रही हो?”

ज्योति ने मेरी नजर से नजर मिलाकर कहा, “नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। मैं जानती हूँ की आप मुझे मिस करोगे। पर देखो मैं कुछ दिन नहीं हूँ तो आपको सिर्फ यही कहना चाह रही थी की आपको कोई रोक टोक करने वाला नहीं है। बाकी आपकी जैसी मर्जी।”
 
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