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Adultery शीतल का समर्पण

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विकास हँसते हुए बोला- "मुझे क्या पता जान की इन्होंने दूसरी शादी क्यों नहीं की? लेकिन नहीं की और अकेले ही अपनी जिंदगी गुजर रहे हैं..."

शीतल की नजरों में अब वसीम खान का कद और ऊंचा हो गया। अगले दिन शीतल एक बजे के पहले काफी उधेड़बुन में थी। अपने दिमाग में चल रही जंग की वजह से वो अपनी पैंटी बा छत पे सूखने तो दे दी थी लेकिन अब क्या करें वो डिसाइड नहीं कर पा रही थी। कभी वा सोच रही थी की पैटी बा बापस नीचे ले आती है। फिर कभी सोचती की मेरी पैंटी बा को हाथ में लेने और उसपे अपना वीर्य गिरने से अगर वसीम चाचा को संतुष्टि मिलती है तो मैं इसमें खलल क्यों डाल? कहीं ऐसा ना हो की ये चीज भी छिन जाने से चा चा अपसेट हो जाएंग

अकेले इंसान के मन में बहुत सारी बातें चलती रहती हैं। इसीलिए जो वो कर रहे हैं करने देती है। मैं सोच लगी की मुझे पता ही नहीं है, और मैं उनके सामने जाऊँगी ही नहीं।

शीतल यही सब काफी देर से सोच रही थी- "वा जो कर रहे हैं उन्हें करने देने में ही उनकी भलाई है। और उन्हें थोड़े ही पता है की मुझे पता है। आह्ह... कितनी अच्छी खुश्बू आती है लेकिन उसस। पता नहीं कल क्या हो गया था मुझे। मैं अब ऊपर जाऊँगी ही नहीं और देर से अपने कपड़े उठाकर लाऊँगी तब तक वीर्य सूख गया होगा। फिर वो सोचने लगी की उन्हें तो पता ही नहीं है की मुझे उनकी हरकत के बारे में पता है। तो उन्हें अपना मजा लेने देती हूँ और मैं अपना मजा लेती हैं। उन्हें वीर्य गिराकर सुकून मिलता है और मुझे सूंघकर चाटकर। सोचते-सोचते एक बजने वाले थे।

शीतल अचानक उठी और जाकर चाट पेस्टोररूम में छिप गई। उसकी सांसें तेज चल रही थी और दिल जोरों से धड़क रहा था।

तय वक़्त में वसीम खान घर आया और रूम का दरवाजा खोलकर अंदर चला गया। शीतल की धड़कन और तेज हो गई। उसकी सांस लेने की आवाज भी लग रहा था जैसे बाहर जा रही हो। क्तीम लगी और गंजी पहनकर रूम से बाहर आ गया। फिर से उसनें पैंटी बा को उठा लिया और चूमता हुआ स्टाररणाम के दरवाजा के सामने खड़ा हो गया। उसने लंगी को साइड करके लण्ड को बाहर निकाला और आगे-पीछे करने लगा। आज शीतल को और अच्छे से लण्ड के दर्शन हो रहे थे। वसीम के लण्ड और शीतल के बीच में बस एक डेंद मीटर का अंतर होगा।

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शीतल के हिसाब से वसीम का लण्ड बहुत ही ज्यादा लंबा, काला, बहुत ही मोटा था और सामने से पूरा सुपाड़ा चमकता हुआ उसे दिख रहा था।

 
वसीम फुल स्पीड में मूठ मार रहा था और शीतल वीर्य के बाहर आने का इंतजार कर रही थी। उसे डर भी लग रहा था और मजा भी आ रहा था। वसीम के लण्ड ने पिचकारी की तरह तेज धार के साथ सफेद गादा वीर्य छोड़ दिया, जिसे बसौम ने ब्रा के दोनों कप में भर दिया और फिर तुरंत ही पैटी को लण्ड में दबाकर उसे भिगोने लगा। जब उसका लण्ड शांत हो गया तो उसने हमेशा की तरह शीतल की पैंटी ब्रा को उसकी जगह पे टांग दिया और रूम बंद करता हआ अंदर चला गया।

शीतल के लिए अब एक लम्हा भी गुजारना मुश्किल हो रहा था। वो सोची की वसीम चाचा तो अंदर चले गये

और अब 3:00 बजे बाहर आएंगे और दुकान जाएंगे। मैं कपड़े अभी ले जाऊँ या आधे घंटे बाद क्या फर्क पड़ता है? पशीनं सं तर बतर हो चुकी थी शीतल। किसी तरह उसने 5 मिनट गुजारे और फिर स्टाररूम से बाहर आकर ऐसे छत पे आई जैसे नामली नीचे से अपने कपड़े ले जाने के लिए आई हो। शीतल चुपचाप धीरे-धीरे करके अपने कपड़े उठाई और नीचे भागी।

वसीम खान रूम के अंदर से उसे कपड़े उठाते और नीचे ले जाते हए देख रहा था और उसके चेहरे पे मुश्कान फैल गई। ऐसी शातिर मश्कान जो शिकारी को तब होती है जब उसका शिकार चारा खाने लगता है।

शीतल दौड़ती हुई नीचे आई और बाकी सारे कपड़े को टेबल पे फेंकी और पैंटी बा को देखने लगी। पैंटी अलग अलग जगह में भीगी हुई थी, लेकिन ब्रा के दोनों कप वीर्य में चिप-चिप कर रहे थे। शीतल वीर्य को सूंघने लगी और तुरंत ही नंगी हो गई। उसने बीर्य से भरे ब्रा को अपने चूची से चिपका लिया। शीतल सोफे पे सीधा लेट गई और पैटी को सूंघने चाटने लगी और फिर उसी पैंटी को पहन ली। फिर उसने ब्रा का चूचियों से अलग किया। शीतल की गोरी गोरी गोल मुलायम चचियां वीर्य लगने की वजह से चमक रही थीं। शीतल ब्रा को अपने चेहरे में रख ली और पैंटी को नीचे करके चूत में उंगली करने लगी।

शीतल पागलों की तरह कर रही थी। वो उठकर बैठ गई और पैटी को उतार दी और ब्रा को पहन ली। फिर वो वा के ऊपर से चूची मसलती हई चूत में उंगली करने लगी। चूत में पानी छोड़ दिया और शीतल शांत हुई।

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दौड़कर नीचे आने और पैटी ब्रा पे लगे वीर्य को सघने चाटने की हड़बड़ी के चक्कर में शीतल अपने घर का दरवाजा बंद करना भूल गई थी।

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शीतल के नीचे आने के दो मिनट बाद वसीम खान अपने कपड़े पहनकर चुपचाप नीचे आ गया और छुप कर शीतल को देखने लगा। वैसे तो उसे शीतल को देखने के लिए मेहनत करना पड़ता लेकिन दरवाजा खुला होने की वजह से वो पर्दै की आड़ में सब कुछ लाइव देख रहा था। शीतल के देर होने के बाद बसीम खान मुश्कुराता हुआ अपने रूम में चला गया। शिकार दाना चग चुका था और अब बस शिकार करने की देरी थी।

अपने रूम में आकर वसीम खान नंगा हो गया और बैंड पें लेटकर शीतल के हसीन जिम के सपने देखने लगा की कितना मजा आएगा इस कमसिन काली को चोदने में? कितना मजा आएगा जब ये अपनी टाँगें फैलाकर मेरा मसल लण्ड अपनी टाइट चूत में लेगी? आह्ह... कितना मजा आएगा जब में कुतिया बनाकर इसकी गाण्ड मारेगा? बहुत दिनों तक सस्ती रडियों को चोदकर लण्ड को शांत किया है, अब वक़्त आ गया है की मेरे इस लण्ड को मस्त माल मिले। मुझे शीतल शर्मा को अपनी रडी बनाना है और इसे दिन रात चोदते रहना है।

रंडी को क्या लगता है मुझे पता नहीं की वो स्टाररूम में छिपकर मुझे देख रही थी। इसलिए तो पूरा लण्ड उसके सामने कर दिया था मैंने। मजा तो तब आएगा मेरी रंडी शीतल, जब मेरा लण्ड तेरे हाथ में होगा और त उसे चूसकर उसका वीर्य सीधा अपने मुँह में लेगी।

 
थोड़ी देर बाद शीतल उठी तो फिर से उसे अपने आप में गुस्सा आ रहा था। लेकिन आज का गुस्सा कल से कम था। इन 24 घंटों में उसके दिमाग में बहुत उथल-पुथल मची हुई थी और शीतल अपने फेवर में अपने मन को समझा चुकी थी। शीतल नहाने जाने लगी तो उसकी नजर दरवाजे में पड़ी जो खुला था। उसका मुँह खुला रह गया, क्योंकी वो अब तक नंगी ही थी। हे भगवान... मैं पागल हो गई हैं। ऐसे दरवाजा खोलकर मैं नंगी घूम रही हैं और क्या-क्या कर रही हैं। कहीं किसी ने देखा तो नहीं? फिर वो सोचने लगी की अभी भला कौन आएगा क्योंकी मुख्य दरवाजा तो बंद ही था और वसीम चाचा तो 3:00 बजे नीचे उतरते हैं। वो रिलैक्स हो गई और दरवाजा बंद करके नहाने चली गई।

विकास के आने के बाद आज फिर शीतल और विकास का टापिक वसीम खान ही था। बातें करते-करते शीतल वसीम के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना चाह रही थी। इसलिये बिकास से पछी- "वसीम चाचा इतने साल अकॅलें रहे कसं? क्या इन्हें औरत की कमी महसूस नहीं होती होगी, तुम तो एक हफ्तें में पागल हए जा रहे थे..."

विकास हँस दिया और बोला- "जिसके पास तुम जैसी हसीन बीवी हो वो एक हफ्तं क्या एक दिन में ही पागल हो जाएगा। मैं बहुत खुशनशीब हूँ की तुम्हारे जैसी खूबसूरत लड़की मेरी बीवी है.."

अब हंसने की बारी शीतल की थी। वो हँसती हुई बोली- "इतनी भी खूबसूरत तो नहीं हूँ.."

विकास ने उसे पीछे से पकड़ लिया और बोला- "तुम माल हो, मस्त माल... गोरा चिकना बद्दन। तुम्हारी चिकनी पीठ, फिसलती हुई कमर और गोरी मुलायम छाती को देखकर मेरा लण्ड कई बार टाइट हो जाता है। मैं तुमसे दूर होकर तो पागल हो ही जाऊँगा."

ऐसी तारीफ सुनकर शीतल शर्मा गई। रात को शीतल विकास को बोली- "कल हम वसीम चाचा को अपने यहाँ खाना खिलाएंगे, रात में। तुम कल उन्हें बाल देना। जो इंसान इतने सालों से अकेला है, खद से सब कुछ कर रहा है, उसे हम कभी कभार लंच या डिनर तो खिला हो सकते हैं। वैसे भी वो हमारा मकान मालिक हैं और जब से हम आए हैं, तब से एक बार भी हमने उन्हें अपने घर नहीं बुलाया है.."

अपने पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों से अच्छे रिश्ते बनाना, मिलना जलना, खाना खिलाना शीतल और उसकी परिवार की आदत में शुमार था। लेकिन जब से शीतल यहाँ आई थी तो वो अपने आप में और अपने मेहमानों में ही बिजी थी। कभी वो विकास के साथ घूमने चली गई थी तो कभी उसके पेरेंट्स या विकास के पेरेंट्स यहाँ आ गये थे। वसीम का मुस्लिम होना भी एक वजह था।

विकास बोला- "क्या बात है, आजकल बसीम चाचा का ज्यादा ही ख्याल रखा जा रहा है?" उसने शरारती मुश्कान के साथ में कहा था।

लेकिन शीतल शर्मा गई और अंदर से डर भी गई थी। वो बोली- "क्या तुम भी कुछ भी बोल देते हो। कहाँ वो 50-55 साल का आदमी और कहाँ मैं?"

शीतल सोते समय बेड पे आने से पहले अपनी नाइटी को टीला कर ली और विकास से सटकर लेट गई। विकास के लण्ड में थोड़ी हलचल मच गई। दोनों रोज सेक्स नहीं करते थे। कभी कभार तो एक सप्ताह 15 दिन भी हो जाता था। लेकिन आज शीतल मूड में थी। विकास उसे किस करते हुए उसका बदन सहलाने लगा। शीतल ने खुद को नंगी होने दिया और विकास के नंगे होने का इंतजार करने लगी। वो अच्छे से करीब से विकास का लण्ड देखने लगी। उसे लगा की ये तो किसी बच्चे का लण्ड है।

वसीम का लण्ड उसकी नजरों के सामने घूम गया। विकास का लण्ड वसीम के लण्ड का आधा भी नहीं होगा और उसके सामने बिल्कल पतला था। विकास का लण्ड स्किन से टका हआ था। वो हाथ में लेकर सहलाने लगी और स्किन को पीछे खींचकर सुपाड़े को बाहर करने लगी तो विकास को दर्द होने लगा और उसने मना कर दिया।

शीतल उठकर बैठ गई और लण्ड को दोनों हाथों में लेकर सहलाने लगी। शीतल के इस रूप को देखकर विकास साइज्ड था। अब तक शीतल सेक्स में विकास का बस साथ देती थी, वो भी कभी कभार और आज तो खुद लीड कर रही थी। दो दिन पहले भी शीतल ने पहल की थी, लेकिन आज तो उसने हद ही कर दी थी।

विकास शीतल के ऊपर आ गया और लण्ड को चूत पे रगड़ते हुए अंदर डालने लगा। शीतल विकास के लण्ड को चूमना चाहती थी, उसके वीर्य की खुश्बू लेना चाहती थी, लेकिन विकास तब तक उसके ऊपर आ चुका था। विकास ने लण्ड अंदर डाल दिया और 8-10 धक्के लगाते ही उसके लण्ड ने पानी छोड़ दिया। शीतल का तो समझ में ही नहीं आया की हुआ क्या है? वो तो अभी तक शुल भी नहीं हुई थी की बिकास का खेल खतम हो गया। विकास बगल में हो गया और करवट बदलकर सो गया।
 
शीतल अपनी प्यासी चूत लिए रात भर करवट इधर से उधर बदलती रही।

दिन में शीतल फिर से दोपहर का इंतजार कर रही थी। अब उसके मन में कोई बंद नहीं चल रहा था। उसने खुद को समझा लिया था की क्सीम खान कई सालों से अकला है और मैंने उसकी सोई ख्वाहिशों को जगा दिया हैं, जिसे वो छिपकर मेरी पैंटी ब्रा पे उतरता है। मुझे उससे उसकी खुशी नहीं छीननी है और मैं उसके वीर्य का सूंघकर चाटकर खुश हो रही हैं। उसे नहीं पता की मुझे पता है तो दोनों अपना-अपना मजा ले रहे हैं और इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

वो अपने वक्त में एक बजे से कुछ पहले स्टोरम में जाकर छिप गई। बसीम आया और आते वक्त ही शीतल की पैंटी बा को देखता गया, जिसे शीतल ने आज और अच्छे से फैलाया हुआ था। शीतल चाहती थी की वसीम को जो सुख मिल रहा है वो अच्छे से मिलें। उसने ट्रांसपेरेंट पैटी बा को छत पे टंगा था।

रोज की तरह वसीम रूम से लुंगी गंजी में आया और शीतल की पैंटी चा को उठाकर स्टोररूम के दरवाजा के सामने खड़ा हो गया। आज शीतल काल की तरह तेज सांस नहीं ले रही थी और न ही आज उसकी धड़कन तेज थी। वसीम ने आज अपनी लुंगी को नीचे गिरा दिया और नीचे से पूरा नंगा हो गया और मूठ मारने लगा।

शीतल का मुँह खुला का खुला रह गया। वसीम के लण्ड को इतने साफ में देखकर उसकी धड़कन बढ़ गईं। 10 मिनट तक क्सीम पेंटी और ब्रा को चमता चाटता रहा और लण्ड को आगे-पीछे करता रहा।

ऐसे वीर्य गिराया की शीतल को साफ-साफ वीर्य निकलता दिख रहा था। शीतल की पूरी पैंटी गीली कर दी क्सीम ने। फिर वो अपने लंगी को पहनकर पैटी बा को टांग दिया और रूम में जाकर दरवाजा बंद कर लिया।

वसीम के लिए भी इंतजार करना अब मुश्किल हो रहा था। वो जानता था की शीतल उसके सामने छिपकर उसके लण्ड को देख रही है, और अगर वो स्टोररूम के दरवाजे को खोल दे तो शायद शीतल खुद को चुदवाने से रोक नहीं पाए। लेकिन वो काई रिस्क नहीं लेना चाहता था। वो शीतल को पानेंट रंडी बनाना चाहता था अपनी। अपनी रखैल अपनी पालतू कुतिया बनाना चाहता था जो उसके इशारे पे नाचे। बड़े शिकार को फंसाने के लिए उसे अच्छे से चारा डालकर अच्छे से इंतजार करना होगा और वो कोई गलती नहीं करना चाहता था। वो दरवाजा के पीछे से देखने लगा।

आज वसीम के अंदर गये हुए दो मिनट भी नहीं हुए थे की शीतल स्टोर रूम से बाहर आई और अपने कपड़े समंट कर नीचे चली गई। उसने दरवाजा को अच्छे से लाक कर लिया और बाकी कपड़ों को टेबल में फेंक कर पैंटी को अपने चेहरा पे रख ली और नंगी हो गई। पैंटी में लगा बीर्य उसके चेहरा को भिगोने लगा और उसकी खुश्ब उसके सीने में भरने लगी। शीतल नंगी होकर गोज की तरह चूत में उंगली करने लगी और वीर्य को चाटने लगी।

वसीम नीचं आया था लेकिन दरवाजा बंद होने की वजह से वो वापस चला गया था। उसने सोचा की देखने के लिए इतना मेहनत क्या करना।

चूत से पानी निकालने के बाद शीतल नंगी ही सो गई और शाम तक नंगी ही अपना काम करती रही। बसीम के वीर्य की खुश्बू ने उसके अंदर की काम ज्वाला को प्रज्वल्लित कर दिया था। विकास के आने से पहले वो नहाकर फ्रेश हो गई और शाम के दावत की तैयारी करने लगी।
 
चूत से पानी निकालने के बाद शीतल नंगी ही सो गई और शाम तक नंगी ही अपना काम करती रही। बसीम के वीर्य की खुश्बू ने उसके अंदर की काम ज्वाला को प्रज्वल्लित कर दिया था। विकास के आने से पहले वो नहाकर फ्रेश हो गई और शाम के दावत की तैयारी करने लगी।

शाम में विकास आया तो पता चला की उसने वसीम को अब तक इन्वाइट ही नहीं किया है। शीतल उससे झगड़ने लगी की मैं इतनी तैयारी कर रही हैं और तुमने गेस्ट को इन्वाइट ही नहीं किया। विकास ने तुरंत ही वसीम खान को काल किया। बिकास सोचने पे मजबूर हो गया की शीतल आजकल बसीम में कुछ ज्यादा ही इंटरेस्ट ले रही है। कहीं सच में दोनों के बीच कुछ है तो नहीं? उसके दिमाग में बहुत कुछ चलने लगा और उसके लण्ड में हलचल होने लगी की उसकी 23 साल की जवान और बेहद हसीन बीवी एक 50-55 साल के गैर मदं के चक्कर में है।

वसीम खान के पास विकास का फोन आया की आपका आज रात का खाना हमारे घर में ही होगा। वसीम में दाबत कबूल किया और मुश्करा उठा। अब वो दिन दूर नहीं था जब शीतल जैसी मस्त हसीन औरत उसके लण्ड के नीचे होने वाली थी। बसीम के मन में आगे का पूरा प्लान बन रहा था। उसका शिकार अब उसके पंजे से ज्यादा दूर नहीं था।

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शीतल में वसीम को डिनर पर बुलाया शीतल में बसीम पे दया दिखाते हुए मैं दावत रखी थी की वो अकेले रहते हैं इतने सालों से और खाना भी खुद बनाते हैं, तो हम हफ्ते में एक बार तो उन्हें अपने यहाँ खिला ही सकते हैं। शीतल की सोच अब बन गई थी की उनके मन में मेरे लिए अरमान हैं, तो मैं उन्हें पता नहीं लगने दूंगी की मुझे पता है और उनकी हेल्प करेंगी। उन्हें मुझे देखना पसंद है तो वो घर आएंगे तो अच्छे से देख सकेंगे, खुलकर बातें कर सकेंगे। इस तरह उन्हें शायद आराम मिले।

शीतल को क्या पता था की जो बीमारी वसीम को है में उसका इलाज नहीं है, बल्कि उस मर्ज को और आगे बढ़ाने का उपाय है। शायद पता भी हो लेकिन उसने अपने मन को यही समझा लिया था की वो इस तरह वसीम की मदद कर रही है।

विकास भी राजी था की सही बात है, कभी कभार तो हमें वसीम चाचा को लंच या डिनर तो कराना ही चाहिए। विकास भी खाना बनाने में अपनी बीवी की मदद कर रहा था। शीतल बहुत अच्छी साड़ी पहनी थी और बड़े प्यार से सारा खाना बनाया था। उसकी ये साड़ी भी डिजाइनर ही थी जिसमें क्लीवेज और पीठ दिख रही थी। शीतल लो-वेस्ट साड़ी ही पहनी थी। साड़ी का आँचल ट्रांसपेरेंट था जिससे शीतल की नाभि और क्लीवेज साफ दिख रही थी। हालाँकी ये कोई नई बात नहीं थी। शीतल हमेशा ऐसे ही कपड़े पहनती थी।

फिर भी विकास में मजाक में शीतल से कहा- "आज तो वसीम चाचा पे तुम बिजलियां गिराने वाली हो..."

शीतल भी मुश्करा दी। उसका इरादा तो यही था।

वसीम खान अपने बढ़त पे घर आ गया और फ्रेश होकर विकास के घर आ गया। वसीम में सफेद कुर्ता पाजामा पहना था। दरवाजा पे नाक करते ही शीतल दौड़कर दरवाजा खोली। विकास टीवी देख रहा था और जितनी देर में बो उठता तब तक शीतल दरवाजा खोल चुकी थी।

वसीम के ऊपर दरवाजा खुलते ही जैसे बिजली गिर पड़ी। शीतल को देखकर उसके जिम में सिहरन हो गई। बसीम ने शीतल को जब भी देखा था तो दूर से देखा था। इतने करीब से ये पहला मौका था उस हश्न का दीदार करने का। शीतल भी बिजली गिराने को तैयार ही थी।

ट्रांसपेरेंट साड़ी के अंदर से झांकता गोरा चिकना कमसिन बदन, माँग में सिदर, माथे में लाल बिंदी, आँखों में काजल, होठों पे मरून लिपस्टिक, गले में एक चैन क्लीवेज तक और मंगलसूत्र ब्लाउज़ के ऊपर, कसे हुए ब्लाउज़ के ऊपर से झांकती हुई चूचियां, गोरा चिकना पेट नाभि के नीचे तक, दोनों हाथों में पूरी चूड़ियां और पैरों में पायल। शीतल साक्षात अप्सरा लग रही थी। वसीम उसे देखता ही रह गया। उसे इस तरह की उम्मीद नहीं थी। उसका मन हआ की अभी ही शीतल को बाहों में भर ले और उसे चूमना स्टार्ट कर दे।

शीतल जब मुश्कराती हई खनकती आवाज में- "आइए ना चाचाजी." बोलती हई दरवाजे के आगे से हटी तब वसीम झटके से होश में आया।
 
वसीम- "औन्न... हाँन..' बोलता हुआ अंदर आया।

शीतल अंदर जाती हुई विकास को आवाज लगाई- "उठिए ना, देखिए वसीम चाचा आए हैं, आप कब से टीबी हो देख रहे हैं...

वसीम पीछे से शीतल की चमकती पीठ और कमर में हो रही थिरकन का मजा ले रहा था।

विकास तब तक वसीम का स्वागत करने के लिए उठ चुका था और वसीम को बोला- "आइए अंकल, बैठिए, कैसे

बसीम अब सम्हल चुका था और- "सब बदिया। आप सुनाइए?" बोलता हआ सोफे पे बैठ गया।

विकास और वसीम बातें करने लगे। तब तक शीतल किचेन से एक ट्रे में पानी और कोल्ड-इिंक उलास में ले आई

और बसीम को बड़े अदब से सर्व की। शीतल के झुकते ही उसकी चूचियां ब्लाउज़ से बाहर निकल जाने को आतुर हो जाती थी। वसीम और विकास ने कोल्ड ड्रिंक और पानी ले लिया तो फिर शीतल किचेन की तरफ वापस चल दी।

वसीम का मन हुआ की कोल्ड ड्रिंक लेते वक्त शीतल के ब्लाउज़ में झाँके या जब वो वापस जा रही थी तो उसकी गाण्ड की हलचल को देखें। लेकिन ऐसा करना उसकी चाल का हिस्सा नहीं था। उसने बड़ी मुश्किल से खुद पे काबू किया और ऐसे रिएक्ट किया जैसे कुछ हो ही जा रहा हो।

शीतल भी एक ग्लास में कोल्ड ड्रिंक लेकर बाहर आ गई और सामने बैठकर उस बातचीत का हिस्सा बनने की कोशिश करने लगी। उसका मकसद बस यही था की वो वसीम की नजरों के सामने रहैं, ताकी वसीम शीतल को अच्छे से देख पाए।

लेकिन वसीम ना तो शीतल की तरफ देख रहा था और ना ही उससे बात कर रहा था।

थोड़ी देर बाद शीतल उठी और बड़े प्यार से उसे खाना सर्व की। वसीम और विकास साथ में खाना खाए। शीतल जानबूझ कर वसीम के सामने ज्यादा और देर तक झकती थी ताकी वसीम उसके जिश्म को देख सकें।

वसीम बिल्कुल शरीफ बंदे की तरह बैठ रहा और शीतल पे एक नजर डालने के बाद उसने शीतल की तरफ देखा भी नहीं। लेकिन विकास का ध्यान बस शीतल पे ही था। शीतल एक तो वैसे ही इतनी खूबसूरत थी और उसमें ये साड़ी और फुल मेकप में वो कयामत ढा रही थी।

वसीम के लिए खुद को रोके रखना बहुत ही मुश्किल था लेकिन अगर शिकार को अच्छे से दबोचना है तो सही बक़त का इंतजार करना चाहिए ये सोचते हुए वो खुद पे काबू किए रहा।

विकास और बसीम में कई तरह की बातें होती रही और धीरे-धीरे बात वसीम के जिंदगी में आ गई और बसीम ने बताया की अपनी बेगम के इंतकाल के बाद उसने दुबारा निकाह नहीं किया।

विकास ने पूछ लिया- "इतना लंबा वक्त हो गया तो कभी शारीरिक कमी महसूस नहीं हुई.."

वसीम बस हँस पड़ा। उसने बताया की दो-तीन औरतों के साथ निकाह की बात चली लेकिन हर बार बात बिगड़ जाती थी। उसकी सारी कहानियों का सार यह था की उसने कभी किसी के साथ चीटिंग या बेईमानी नहीं की और हर औरत के साथ वो साफ और स्पष्ट तरीके से पेश आया था। लेकिन उन औरतों ने ही वसीम को चीट किया था।

विकास का ककोल्ड मन जागर्ने लगा और उसे लगा की उसकी बीवी इस तरह सजकर एक मुस्लिम मर्द के सामने खुद को पेश कर रही है। विकास का लण्ड अंदर टाइट हो चला।

वसीम थोड़ी देर बाद अपने कमरे में चला गया।
 
शीतल खाने बैठी तो विकास ने उससे कहा- "आज तो तुम वसीम चाचा में कयामत टा रही थी.."

शीतल हँस पड़ी और फिर मजाक में बोल दी- "लेकिन फिर भी बसीम चाचा ने तो देखा भी नहीं। बो कितने शरीफ और जेक इंसान हैं..."

विकास को शीतल की ये हँसी अजीब लगी और उसने भी हँसते हए मजाक में पूछा- "क्या तुम वसीम चाचा के लिए ही इतना सजी थी?"

शीतल मुश्कुरा दी और हँसकर बोली- "ही... तुम्हारे लिए इतना क्यों सजू? तुम तो ऐसे ही मुझे इतना प्यार करते हो..."

बात मजाक में कही गई थी लेकिन विकास की आँखों के सामने ये दृश्य चलने लगा की कैसे शीतल खाना खिलाते वक़्त झक रही थी बार-बार। वो अकेला बैठकर टीवी देख रहा था लेकिन उसकी आँखों के सामने ये दृश्य चल रहा था की वसीम के सामने झुकने पे शीतल का आँचल उड़ गया और वो हड़बड़ा कर वसीम पे गिर पड़ी थी, और वसीम उसकी चूचियों को मसलने और चूसने लगा। अपनी हसीन बीवी का उस बटे मर्द के साथ ये बात सोचकर विकास का लण्ड टाइट हो रहा था। वो खाना खाती हई शीतल को गौर से देखने लगा और सोचने करने लगा की कैसे वसीम उसके चिकने जिम को मसल रहा है, और कैसे शीतल उस बढ़े आदमी के साथ मस्ती कर रही है।

सोने जाते वक्त शीतल अपने सारे कपड़े उतार दी और नाइट सूट पहनकर सोने आ गई। उसे गुस्सा आ रहा था की उसकी इतनी मेहनत बेकार गई। कितने जतन से वो सजी थी, ताकी बसीम उसे देखकर अच्छा महसूस कर पाए लेकिन उसने देखा तक नहीं। उसे लगा था की शीतल को इस तरह अच्छे से देखकर उसे आराम मिलेगा। लेकिन उसे क्या पता था की यहाँ तो बसीम किसी तरह खुद पे काबू किए रहा, लेकिन रूम में जाते ही वो नंगा हुआ और शीतल का नाम जप्ते हुए लण्ड से वीर्य निकालकर बर्बाद कर दिया।

विकास का लण्ड टाइट था। उसने चोदने के लिए शीतल के जिश्म पे हाथ लगाया।

दी, और सोचने लगी- "मझ नहीं चदवाना इस बच्चे टाइम के लण्ड से। दो मिनट होगा नहीं की खुद तो सो जायेगा और मैं मरती रहगी। एक वा वसीम चाचा हैं जिनके पास इतना बड़ा मोटा मूसल टाइप का लण्ड है और जिसका वीर्ष वो मेरे पैंटी बा पे निकलता है, लेकिन सामने मैं हूँ तो देखता भी नहीं। दोनों का काम बस मुझे तड़पाना है। वो अकेले में तड़पेंगा लेकिन ये चैन की नींद सोएगा। इसलिए तुम भी तड़पो पातिदेव..." और शीतल सोतती हुई सो गई।

वसीम रूम में घुसते ही नगा हो गया और लण्ड आगे-पीछे करने लगा। उसका लण्ड फुल टाइट था- "आह्ह... मेरी रांड, क्या माल लग रही थी त... जी तो चाह रहा था की उसी वक़्त पटक कर तुझे चोद दूं। लेकिन क्या करेंगे जान, तर इस हसीन जिश्म को ऐसे नहीं पाना चाहता। जो त झुक कर चूची दिखा रही थी उसे जरन मसलंगा, और चुसंगा, बस तू थोड़ी और पक जा मेरी बडी बनने के लिए। फिर तेरे पूरे जिम में मेरा अधिकार होगा.."

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अगले दिन दोपहर होते ही शीतल वसीम के लण्ड का दर्शन करने अपनी जगह पहुँच गई। अब शीतल को बिल्कुल इर नहीं लगता था और वो ऐम स्टोरम में जा रही थी जैसे में कोई नार्मल सिंपल काम हो। उसने अपने मन में सोच लिया था की अगर वसीम में उसे देख भी लिया तो भी कोई परवाह नहीं। क्योंकी वसीम गलत काम कर रहा है, मैं नहीं। मैं तो ये पता लगाने छत पे छपकर बैठी थी की आखिर वो है कौन जो रोज मेरी पैंटी बा को गोली करता है?

शीतल अपनी जगह पे बैठ गई। रोज की ही तरह वसीम आया और फिर कपड़े चेंज करके अपने काम में लग गया। आज उसका लण्ड जरा ज्यादा टाइट था, शीतल का कल का रूप देखकर। उसने पैंटी ब्रा को भीगा दिया और अपनी जगह पर टांग कर अपने रूम में चला गया और दरवाजा बंद कर लिया।

दो ही मिनट बाद शीतल स्टाररूम से बाहर निकली और आज सिर्फ पैंटी ब्रा लेकर नीचे चली गई। बाकी कपड़े उसने छत पे ही छोड़ दिए। सीदियों पे ही शीतल कपड़े में लगे वीर्य को सूंघने और चाटने लगी। उसे वसीम में बहुत गुस्सा आ रहा था? ये क्या पागलपन है यार। सामने होती है तो देखता भी नहीं, बात करना तो दूर की चीज है और गोज पैटी ब्रा में वीर्य गिराता है। इतनी ही आग है मन में मुझे लेकर तो मेरे से बात करो, मुझे देखा तो शायद आराम मिले, शायद अच्छा लगे। और अगर शरीफ ही बनें रहना है तो पं भी मत करो। मन में तो पता नहीं कितने अरमान पाल रखा होगा मेरे बारे में, कितनी तरह से चोद चुका होगा, लेकिन बाहर से इतना शरीफ बनता है की कहना ही नहीं?

शीतल भी रोज की तरह नीचे आकर नंगी हई और वीर्य चाटते हए वसीम के बारे में सोचती रही और चूत में पानी निकालने के बाद नंगी ही रही।

3:00 बजे शीतल के घर का दरवाजा नाक हआ। शीतल नंगी ही लेटी टीवी देख रही थी। वो हड़बड़ा गई और जल्दी से कपड़े टूटने लगी। वो पैंटी ब्रा पहनती तो लेट होता। इसलिए वो हड़बड़ी में बस नाइटगाउन पहनतें हए पूछी- "कौन है?"

उधर से वसीम की आवाज आई- "मैं हैं, वसीम खान..."

शीतल का दिल जोरों से धड़क गया की ये क्यों आए हैं? कहीं मुझे देख तो नहीं लिया? शायद सिर्फ पैंटी ब्रा लाई उठाकर तो इन्हें पता लग गया होगा की मुझे पता है। पता नहीं क्या बोलेगा? शीतल हड़बड़ाती हुई दरवाजा खोली- "आइए ना वसीम चाचा, अंदर आइए..."

वसीम बोला- "नहीं, बस जा रहा है। रात में आने में थोड़ी देर हो जाएगी। बस यही बोलने आया था। तो दरवाजा बंद कर लीजिएगा और मैं काल करेंगा तो दरवाजा खोल दीजिएगा..."

शीतल बोली- "ठीक है, कोई बात नहीं खोल देंगी। आइए ना चाप तो पीकर जाइए..."

वसीम- "ना ना चलता हैं अभी..." बोलता हुआ चला गया।
 
शीतल की जान में जान आई वसीम के जाने के बाद। लेकिन उसके मन उदास हो गया की अंदर आकर बैठकर कुछ बात तो करतें कम से कम। बैंकार में कपड़े पहनी। नंगी ही दरवाजा खोल देती, नहीं तो कम से कम कपड़े तो टीले रखती। पूरा टक ली। बेचारे एक तो कभी आते नहीं और आए भी तो मुझे कुछ तो दिखा ही देना चाहिए था। मैं इतनी हड़बड़ा गईं थी की दिमाग ही काम नहीं किया? और शीतल वसीम के ख्यालों में फिर से खो गईं।

बाहर जाते हए वसीम का लण्ड टाइट हो चुका था। शीतल अपने हिसाब से वसीम को कुछ नहीं दिखा पाई थी, लेकिन वसीम को हरामी नजर एक झटके में ये ताड़ गया था की रंडी ने अंदर कुछ नहीं पहना था। चूचियों की गोलाई में सटी नाइट गाउन को देखकर हो वा समझ गया की अंदर ब्रा नहीं था और इसलिए वसीम का लण्ड और टाइट हो गया था। रोड पे आने से पहले उसने अपने लण्ड को पायजामा में अइजस्ट किया और दुकान की तरफ चल पड़ा।

वसीम सोचने लगा- "रडी पक्का अंदर नगी होगी। चुदवाने के लिए मरी तो जा रही है लेकिन हाए रे संस्कारी नारी, कुछ बोल नहीं पा रही। बाकी कपड़े छोड़कर सिर्फ पैंटी बा इसलिए ले गई ताकी मैं जान स. की वो जानती है और मेरी हिम्मत बढ़ जाए। लेकिन मेरी रांड़, इतनी आसानी से तुझं थोड़ी मेरा लण्ड दें दंगा। जब तक तू पूरी मेरी रोड़ नहीं बन जाती तब तक तू तड़पेगी। तड़प तो मैं तुझसे ज्यादा रहा है गड़। तुझं घोड़ी जल्दी करनी चाहिए थी, तरी स्पीड बढ़ानी पड़ेगी?"

सोचता हआ वसीम दुकान चल पड़ा और अपने प्लान को माडिफाई करने लगा। वो प्लान जिसमें एक सीधी सादी शरीफ पवित्र टाइप की लड़की को उसे अपनी रंडी बनाना था। उसके तन मन को अपने सामने समर्पित करवाना था। शीतल का समर्पण चाहिए था उसे।

रात में फिर शीतल विकास से वसीम के बारे में ही बात कर रही थी। शीतल ने कहा- "आज वसीम चाचा लेंट में आएंगे। दरवाजा बंद कर लेने बोले हैं। जब वो आएंगे तो काल कर लेंगे तब दरवाजा खोल देने बोले हैं..."

विकास- "ठीक है। ज्यादा रात होगी बन्या उन्हें?"

शीतल- "ये तो पूरी नहीं। बस इतना बोलें और चले गये। मैं तो अंदर आने बोली भी लेकिन आए नहीं.."

विकास मुश्कुरा दिया, और बोला- "अरे बाह... आकर बोल गये। कल देखकर गये तुम्हें तो आज फिर से देखने का मन किया होगा। क्या पहनी हुई थी तुम आज?"

शीतल बनावटी गुस्से में बोली- "नंगी थी... तुम्हें और कुछ तो सूझता है नहीं। तुमने देखा था ना उस दिन वा देखते भी नहीं मेरी तरफ..."

विकास- "तुम्हें दिखाकर थाई ना देखते होंगे। तुम्हारी जैसी हर को कोई बिना देखें रह ही नहीं सकता। लेकिन उसे शर्म आती होगी की वो उतना उम्रदराज होकर भी तुम्हें देख रहा है। लेकिन एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की लार तो जरगर टपकती होगी उनकी। मर्द जात ऐसे ही होते हैं। तुम्ही खोल देना दर बाजा, एक बार और देख लेंगे तुम्हें...

शीतल को विकास की बात में दम नजर आया- "उन्हें उम्र की वजह से शर्म आती होगी। हैं भी तो वो मेरे से गर्ने उम्र के। उफफ्फ... इसीलिए वो इंसान अंदर ही अंदर तड़प रहा होगा। मुझे ही कुछ करना होगा उनके लिए? सोचती हुई फिर वो विकास को बोली- "मुझे तो उन पर दया आती है। मुझे देखतें तक नहीं, बात करना तो दूर की बात हैं। लेकिन इतने सालों में अकेले ही अंदर-अंदर घट रहे हैं। मेरी छोड़ो, तुमसे भी तो बात करके मन का बोझ हल्का कर सकते हैं.."

विकास हम्म्म... बोलता हुआ करवट बदलकर सोने लगा और शीतल अभी का प्लान बनाने लगी- "दोपहर में तो वा हड़बड़ी में थी लेकिन अभी उसके पास पूरा टाइम था। विकास अब सुबह ही जागने वाला था। शीतल का मन हआ की सच में नंगी ही जाकर दरवाजा खोल दूं। देखती ह बूढ़े मियां फिर देखते हैं की नहीं?" सोचकर वो खिलखिला दी।

शीतल वही नाइटगाउन पहनी हुई थी। विकास के सो जाने के बाद वो उठी और ब्रा उतार दी। फिर वा बाडी लोशन लेकर अपने सीने पे और चूचियों पे अच्छे से लगा ली। उसकी चूचियां तो ऐसे ही गोरी थीं, अब और चमक उठी। फिर उसने चेहरे को साफ किया और कीम और डी.ओ. लगा ली। अब शीतल ने नाइटगाउन के सामने के हिस्से को थोड़ा नीचे खीच लिया और कालर को थोड़ा फैलाली। अब उसकी दोना गोलाइयां गहराईके साथ दिख रही थीं। शीतल अब दरवाजा खोलने के लिए तैयार थी। शीतल को नींद ही नहीं आ रही थी।

सीतल मन ही मन सोच रही थी की कैसे दरवाजा खोलेंगी और क्या करेंगी? लेकिन शीतल की इतनी हिम्मत नहीं हई की बसीम से काई भी बात सीधी कर पाए। बा अपने नाइटी का ठीक कर ली और ब्रा पहनने लगी। उसे लगा की अगर मैं ऐसे गई तो कहीं वो मुझे गलत टाइप की ना समझ लें। फिर शीतल को खपाल आया की मैं तो सज संवर कर बैठी हैं, तो उन्हें लगेगा की मैं तो जाग कर उनका इंतजार कर रही थी। अगर मैं नींद में बही की किसी तरह की गलती हो सकती है। उसने फिर से बा को उतार दिया और नाइटगाउन को टोली कर ली। अब चलने पे उसकी चूचियां आराम से गोल-गोल घूम रही थी और क्लीवेज खुले होने से चूचितों में हो रही शिरकन साफ-साफ दिख रही थी। शीतल अपने बाल बिखरा दी और चेहरे को भी पानी से धोकर उनींदा टाइप का चेहरा बनाने लगी। रात के 11:00 बज गये थे और वसीम का अब तक काल नहीं आया था। शीतल अपनी पेंटी भी उतार दी थी। वो दो-तीन बार बाहर झांक कर भी आ गईथी वसीम आए या नहीं।

उसने सोचा की में ही पूछ लेती हैं लेकिन फिर उसने ये इरादा त्याग दिया। थोड़ी देर बाद विकास के मोबाइल में काल आया। शीतल दौड़कर फोन उठाई तो वसीम चाचा लिखा हआ था। शीतल अपनी साँसों को कंट्रोल की और उनींदी आवाज में "हेला" बोली।
 
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