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मैं- “मुझे वहीं जाना है..” मैंने मेरी बात दोहराई।
अब्दुल- “वैसे मेरे होते हुये कोई टेन्शन नहीं लेने का, फिर भी तू कहती है तो ओके...” कहते हुये अब्दुल ने गाड़ी की स्पीड बढ़ाई।
करीबन छ बजे हम होटेल युवराज पहुँच गये। गाड़ी पार्क करके अब्दुल ने रूम बुक करवाया, रूम तीसरे माले पर था, हम लिफ्ट में बैठकर तीसरे माले पर पहुँचे और तभी अब्दुल का मोबाइल बज उठा। अब्दुल ने थोड़ा दूर जाकर मोबाइल पे बात की तो उसके चेहरे पर चिंता और लझन के भाव दिख रहे थे। मुझे लग रहा था की शायद उसे खुशबू के बारे में पता चल गया है, जो भी हो अब क्या हो सकता था?
अब्दुल मेरे नजदीक आया और मुझसे कहा- “मुझे काम है, तुम बाहर से आटो पकड़ लो...”
मैं आटो में घर वापिस आई। तभी मेरी आटो के बाजू में अब्दुल की गाड़ी आकर रुकी। मैं आटो से उतरी तब मेरे साथ गाड़ी में से खुशबू भी निकली जिसे देखकर में ठिठक गई। उसका चेहरा देखकर ऐसा लग रहा था की वो खूब रोई है और इस वक़्त उसकी आँखों में आँसू सूख गये थे।
सुबह के 11:00 बजे थे, मैंने कल शाम से अब तक खुशबू के घर की तरफ कितनी बार देखा होगा, उसकी गिनती नहीं की थी। अगर की होती तो 300 से ऊपर होती। कल शाम के बाद एक बार भी खुशबू का घर खुल्ला
नहीं था, और ना ही कोई उसके घर आया था।
कल शाम खुशबू को गाड़ी से उतरते देखा, तब से किसी अज्ञात भय ने मेरे मस्तिष्क को घेर रखा था। प्लान के मुताबिक खुशबू को इस वक़्त पप्पू के साथ होना चाहिए था। पर हो सकता है दोनों किसी वजह से पकड़े गये होंगे तो पप्पू कहां है? पप्पू को मारा तो नहीं होगा ना अब्दुल ने? मुझे सबसे ज्यादा टेन्शन यही बात की हो रही थी।
हम एक साथ ही लिफ्ट में ऊपर चढ़े। लेकिन अब्दुल साथ में था तो मैं खुशबू को कुछ पूछ ना सकी। खुशबू की आँखों के आँसू बहुत कुछ बता रहे थे, पर मैं समझ नहीं पा रही थी। थोड़ी देर बाद मैं पप्पू के घर भी गई थी, लेकिन उसका घर बंद था। अब्दुल के करण खुशबू के घर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। दोनों में से किसी का भी मोबाइल नंबर मेरे पास नहीं था की मैं जान सकू की उन दोनों के साथ क्या हुवा था?
निशा फिल्म देखने आएगी?” रीता का मोबाइल आया।
मेरा मूड नहीं था जाने का लेकिन मैं पप्पू और खुशबू को थोड़ी देर के लिए भूलना चाहती थी- “फर्स्ट शो में जाएंगे..."
रीता- “ओके, गोलमाल-श्री की टिकेट ला दें..”
मैं- “हाँ..."
रीता- “लाकर फोन करती हैं, बाइ..” रीता ने काल काट दी।
अच्छा हुवा उसका मोबाइल आया, नहीं तो मैं ये सब सोच-सोचकर पागल हो जाती। फिल्म देखने जाना था और खाना भी मुझे ही बनाना था तो मैं जल्दी से खाना बनाने लगी। मैं यहां जब भी आती मम्मी मुझे किचन में पैर भी रखने नहीं देती थी, लेकिन इस बार उसकी तबीयत ठीक नहीं थी तो मैं ही खाना बना रही थी। खाना बनाकर पापा, मम्मी और मैं खाना खाने बैठे।
पापा- “तुम्हारी मम्मी को डाक्टर के पास ले जाना है, ले जाओगी?” पापा ने पूछा।
मेरी जगह मम्मी ने जवाब दिया- “निशा ने फिल्म देखने जाने का पोग्राम बनाया है, आप आफिस से छुट्टी ले लो..."
पापा- “किसके साथ जाने वाली हो बेटा?”
मैं- “रीता के साथ पापा...”
पापा- “तुम फिल्म देख आओ, मैं जाता हूँ तेरी मम्मी के साथ...” पापा ने खड़े होते हुये कहा।
थोड़ी देर बाद पापा और मम्मी निकले। मैं रीता के काल की राह देखती हुई घर का दरवाजा खुला रखकर खुशबू के घर की तरफ नजर गड़ाए बैठी थी। तभी लिफ्ट के ठहरने की आवाज आई और फिर जाली खुलने की आवाज आई। मैंने खड़े होकर लिफ्ट की तरफ नजर की तो उस तरफ से जो आ रहा था उसे देखकर मेरी आँखें फट गई, वो मेरे ही घर की तरफ आ रहा था।
उसने घर के अंदर आकर दरवाजा बंद कर दिया और मेरे नजदीक आकर कहा- “निशा कुछ करो, नहीं तो मैं पागल हो जाऊँगा...” उसके मुँह से मेरे लिए निशा का संबोधन सुनकर मैं आश्चर्य में पड़ गई, वो पप्पू था।
अब्दुल- “वैसे मेरे होते हुये कोई टेन्शन नहीं लेने का, फिर भी तू कहती है तो ओके...” कहते हुये अब्दुल ने गाड़ी की स्पीड बढ़ाई।
करीबन छ बजे हम होटेल युवराज पहुँच गये। गाड़ी पार्क करके अब्दुल ने रूम बुक करवाया, रूम तीसरे माले पर था, हम लिफ्ट में बैठकर तीसरे माले पर पहुँचे और तभी अब्दुल का मोबाइल बज उठा। अब्दुल ने थोड़ा दूर जाकर मोबाइल पे बात की तो उसके चेहरे पर चिंता और लझन के भाव दिख रहे थे। मुझे लग रहा था की शायद उसे खुशबू के बारे में पता चल गया है, जो भी हो अब क्या हो सकता था?
अब्दुल मेरे नजदीक आया और मुझसे कहा- “मुझे काम है, तुम बाहर से आटो पकड़ लो...”
मैं आटो में घर वापिस आई। तभी मेरी आटो के बाजू में अब्दुल की गाड़ी आकर रुकी। मैं आटो से उतरी तब मेरे साथ गाड़ी में से खुशबू भी निकली जिसे देखकर में ठिठक गई। उसका चेहरा देखकर ऐसा लग रहा था की वो खूब रोई है और इस वक़्त उसकी आँखों में आँसू सूख गये थे।
सुबह के 11:00 बजे थे, मैंने कल शाम से अब तक खुशबू के घर की तरफ कितनी बार देखा होगा, उसकी गिनती नहीं की थी। अगर की होती तो 300 से ऊपर होती। कल शाम के बाद एक बार भी खुशबू का घर खुल्ला
नहीं था, और ना ही कोई उसके घर आया था।
कल शाम खुशबू को गाड़ी से उतरते देखा, तब से किसी अज्ञात भय ने मेरे मस्तिष्क को घेर रखा था। प्लान के मुताबिक खुशबू को इस वक़्त पप्पू के साथ होना चाहिए था। पर हो सकता है दोनों किसी वजह से पकड़े गये होंगे तो पप्पू कहां है? पप्पू को मारा तो नहीं होगा ना अब्दुल ने? मुझे सबसे ज्यादा टेन्शन यही बात की हो रही थी।
हम एक साथ ही लिफ्ट में ऊपर चढ़े। लेकिन अब्दुल साथ में था तो मैं खुशबू को कुछ पूछ ना सकी। खुशबू की आँखों के आँसू बहुत कुछ बता रहे थे, पर मैं समझ नहीं पा रही थी। थोड़ी देर बाद मैं पप्पू के घर भी गई थी, लेकिन उसका घर बंद था। अब्दुल के करण खुशबू के घर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। दोनों में से किसी का भी मोबाइल नंबर मेरे पास नहीं था की मैं जान सकू की उन दोनों के साथ क्या हुवा था?
निशा फिल्म देखने आएगी?” रीता का मोबाइल आया।
मेरा मूड नहीं था जाने का लेकिन मैं पप्पू और खुशबू को थोड़ी देर के लिए भूलना चाहती थी- “फर्स्ट शो में जाएंगे..."
रीता- “ओके, गोलमाल-श्री की टिकेट ला दें..”
मैं- “हाँ..."
रीता- “लाकर फोन करती हैं, बाइ..” रीता ने काल काट दी।
अच्छा हुवा उसका मोबाइल आया, नहीं तो मैं ये सब सोच-सोचकर पागल हो जाती। फिल्म देखने जाना था और खाना भी मुझे ही बनाना था तो मैं जल्दी से खाना बनाने लगी। मैं यहां जब भी आती मम्मी मुझे किचन में पैर भी रखने नहीं देती थी, लेकिन इस बार उसकी तबीयत ठीक नहीं थी तो मैं ही खाना बना रही थी। खाना बनाकर पापा, मम्मी और मैं खाना खाने बैठे।
पापा- “तुम्हारी मम्मी को डाक्टर के पास ले जाना है, ले जाओगी?” पापा ने पूछा।
मेरी जगह मम्मी ने जवाब दिया- “निशा ने फिल्म देखने जाने का पोग्राम बनाया है, आप आफिस से छुट्टी ले लो..."
पापा- “किसके साथ जाने वाली हो बेटा?”
मैं- “रीता के साथ पापा...”
पापा- “तुम फिल्म देख आओ, मैं जाता हूँ तेरी मम्मी के साथ...” पापा ने खड़े होते हुये कहा।
थोड़ी देर बाद पापा और मम्मी निकले। मैं रीता के काल की राह देखती हुई घर का दरवाजा खुला रखकर खुशबू के घर की तरफ नजर गड़ाए बैठी थी। तभी लिफ्ट के ठहरने की आवाज आई और फिर जाली खुलने की आवाज आई। मैंने खड़े होकर लिफ्ट की तरफ नजर की तो उस तरफ से जो आ रहा था उसे देखकर मेरी आँखें फट गई, वो मेरे ही घर की तरफ आ रहा था।
उसने घर के अंदर आकर दरवाजा बंद कर दिया और मेरे नजदीक आकर कहा- “निशा कुछ करो, नहीं तो मैं पागल हो जाऊँगा...” उसके मुँह से मेरे लिए निशा का संबोधन सुनकर मैं आश्चर्य में पड़ गई, वो पप्पू था।