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Adultery Chudasi (चुदासी )

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तीसरे दिन मैं खाना खा रही थी की बेल बजी। मैंने दरवाजा खोला तो रामू था। मैंने उसको ना बोल दिया की अब आना नहीं। मैंने उसको निकालकर कामवाली रखने का फैसला कर लिया था। खाना खाकर सारा काम कर तो लिया पर 4:00 बज गये और मैं थक गई। मैं बेड पे जाकर लेटी और करण आ गया।

करण- “कैसी हो जान?” करण ने आते ही पूछा।

मैं- “चले जाओ यहां से उस दिन जो हुवा वो...” मैं बात अधूरी छोड़कर रोने लगी।

करण मेरे नजदीक आया, मुझे बाहों में लेने लगा तो मैं खिसक गई।

मैं- “मुझे छूना मत करण..”

करण- “क्यों इतना गुस्सा कर रही हो निशा, मैंने क्या किया है जो इतना भड़क रही हो?” करण ने आगे बढ़कर मुझे बाहों में ले लिया।

मैं करण के सीने पर सिर रखकर रोते हुये बोली- “करण उस दिन रामू ने जो मेरे साथ किया वो तुम जानते हो, तुमने भी तो रामू को रोका नहीं...”

करण- “मैं रामू को रोकना चाहता था निशा, पर मैंने देखा की तुम भी उसके साथ मजा ले रही हो तो मैं चला गया..." करण ने कहा।

मैं- “क्या मैं उसके साथ मजे ले रही थी? तुम पागल तो नहीं हो गये? चले जाओ, चले जाओ, कभी मत आना अब यहां चले जाओ...” मैंने करण को गुस्से में आकर धकके लगाए और चले जाने को कहा।

करण- “मैं जानता था की निशा सच तुम सुन नहीं सकोगी। और सच ये है की नीरव तुम्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा, और ये भी सच है की तुम्हें रामू के साथ चुदते वक़्त जो संतुष्टि मिली, वो आज तक नीरव से नहीं मिली।

और सच ये भी है की..."

मैं- “तुम जाओ यहां से करण मुझे तुम्हारी एक भी बात नहीं सुननी...” कहते हुये मैं अपने कानों पर हाथ रखते हुये बेड से उठ गई।

शाम को मैं रसोई में खिचड़ी रखकर टीवी देखने बैठी, पर मेरा ध्यान करण की बातों पर ही था, मुझे उसकी आवाज सुनाई दे रही थी- “तुम रामू के साथ मजे ले रही थी... नीरव तुम्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा... उस दिन रामू ने तुम्हें जितना संतुष्ट किया उतना आज तक नीरव ने नहीं किया.” हर बात न जाने कितनी बार सुनाई दे रही थी।

तभी मुझे कुछ जलने की बास आई। मैंने किचन में जाकर देखा तो नीचे की तरफ से खिचड़ी जल गई थी। मैंने गैस बंद कर दिया और फिर से बाहर आकर टीवी देखने लगी। रात को नीरव के आते ही हम लोगों ने खाना खा लिया, जल्दी से काम निपटाकर मैं नींद की गोली लेकर सो गई।

दूसरे दिन सुबह उठी तो मैंने अपने आपको थोड़ा फ्रेश महसूस किया। दोपहर को काम निपटाकर अपार्टमेंट में आ रही दूसरी कामवालियों को काम करने को पूछा, पर किसी ने हाँ नहीं बोला। आजू-बाजू के अपार्टमेंट में भी जाकर आई, 3-4 कामवालियों को तो दोगुना पगार देने को भी बोला पर सबने “ना” ही बोला।

 
शाम को सब्जी लेकर आ रही थी, तब रामू लिफ्ट के पास बैठा बीड़ी पी रहा था। मैं जैसे ही लिफ्ट के पास पहुँची तो रामू ने उठकर लिफ्ट की जाली खोल दी। मैं उसके सामने देखे बगैर लिफ्ट में दाखिल हो गई।

रामू ने जाली बंद करते हुये पूछा- “कल से फिर काम पे आ जाऊँ मेमसाब?”

मैंने मुँह से कोई जवाब दिए बगैर “हाँ” में सिर हिलाया और तीसरे फ्लोर का बटन दबाया। दूसरे दिन रामू के आने से पहले मैंने साड़ी पहन ली, सामान्य तौर पर मैं घर में हमेशा गाउन ही पहनती हूँ, और जब तक राम् घर में काम करता रहा, तब तक मैं दरवाजा बंद करके बेडरूम में चली गई।

रामू ने काम खतम करते ही दरवाजे पर खटखट करके कहा- “मैं जा रहा हूँ मेमसाब, घर बंद कर लीजिए...”

उसके जाने के 5 मिनट बाद मैंने बाहर निकालकर दरवाजा बंद किया, फिर तो ये रूटीन हो गया। वो हर रोज आता तो मैं बेडरूम में चली जाती। जाते वक़्त वो कहकर जाता तो मैं बाहर जाकर दरवाजा बंद कर लेती। 15 दिन निकल गये, मैं थोड़ी नार्मल हो गई। पर अभी भी मैं रामू के सामने देखती नहीं थी। उसके घर में आते ही मैं नजरें नीची करके बेडरूम में चली जाती थी, और जाने के थोड़ी देर बाद ही बाहर निकलती थी। कभी कभार लिफ्ट के पास बैठे हुये मिल जाता तो मैं सीढ़ियां चढ़ जाती।

फिर आज का दिन बहुत ही खराब उगा। सुबह से आज कुछ अच्छा नहीं हो रहा था। और सुबह को जो हुवा ना... वो तो मेरी ही गलती थी और गलती भी कितनी बड़ी... किसी को पता चले तो मेरे बारे में कुछ भी सोच ले। मैं रसोई करते हुये सुबह जो हुवा उसके बारे में सोच रही थी।

 
उसके जाने के 5 मिनट बाद मैंने बाहर निकालकर दरवाजा बंद किया, फिर तो ये रूटीन हो गया। वो हर रोज आता तो मैं बेडरूम में चली जाती। जाते वक़्त वो कहकर जाता तो मैं बाहर जाकर दरवाजा बंद कर लेती। 15 दिन निकल गये, मैं थोड़ी नार्मल हो गई। पर अभी भी मैं रामू के सामने देखती नहीं थी। उसके घर में आते ही मैं नजरें नीची करके बेडरूम में चली जाती थी, और जाने के थोड़ी देर बाद ही बाहर निकलती थी। कभी कभार लिफ्ट के पास बैठे हुये मिल जाता तो मैं सीढ़ियां चढ़ जाती।

फिर आज का दिन बहुत ही खराब उगा। सुबह से आज कुछ अच्छा नहीं हो रहा था। और सुबह को जो हुवा ना... वो तो मेरी ही गलती थी और गलती भी कितनी बड़ी... किसी को पता चले तो मेरे बारे में कुछ भी सोच ले। मैं रसोई करते हुये सुबह जो हुवा उसके बारे में सोच रही थी।

सुबह हर रोज की तरह बेल बजते ही मैं दूध लेने गई। जल्दी-जल्दी में मैं गाउन पहनना भूल गई, और सिर्फ नाइटी, जो घुटने से 2" इंच ऊपर तक की ही है, पहनकर दरवाजा खोल दिया।

चाचा की आँखें फट गई, वो मुझे घूर-घूर के देख रहे थे। फिर भी मुझे मालूम न पड़ा की मैं आधी नंगी हूँ। मैंने चाचा को दूध लिखने का कार्ड दिया, तो वो उनके हाथों से गिर गया। गिर गया या गिरा दिया? उन्होंने झुक के कार्ड लेते समय मेरी नाइटी पकड़ ली और ऊपर कर दी।

वो तो अच्छा हुवा की रात को हम कुछ किए बगैर ही सो गये थे तो मैंने अंदर पैंटी पहनी हुई थी, और तब मुझे मालूम पड़ा की मैं क्या पहनकर आई हूँ। मैंने चाचा के हाथ से नाइटी खींची और दूध को वहीं छोड़कर रूम में । दौड़ी और गाउन पहनकर बाहर आई, तब तक तो चाचा चले गये थे।

मुझे लगा की मैं सबको ज्यादा ही छूट दे देती हूँ। वो शंकर टिफिन लेते हुये कभी कभार मेरा हाथ दबा देता है, पर मैं उसे भी कुछ नहीं बोलती। मैंने सोचा कि आज आने दो शंकर को कुछ भी उल्टा सीधा करेगा तो एक तमाचा लगा देंगी।

मैं टिफिन भर ही रही थी और बेल बजी। मैं समझ गई की शंकर टिफिन लेने आ गया है, इंतेजार तो मुझे उसका हर रोज होता है, पर आज इंतेजार का मकसद अलग था। मैंने जल्दी-जल्दी टिफिन पैक करके दरवाजा खोला और शंकर के हाथों में टिफिन थमाया। आज मैं खुद चाहती थी की वो मेरे हाथों को छुये, इसलिए मैंने थोड़ा ज्यादा हाथ आगे किया। शंकर ने टिफिन लेते हुये मेरे हाथ को छुवा। हर रोज तो मैं टिफिन देते ही हाथ को जल्दी से खींच लेती थी, पर आज मैं ऐसे ही खड़ी रही।

मैंने सोचा था कि थोड़ा ज्यादा नाटक करने की कोशिश करे तब मैं उसे फटकारूंगी। तभी आंटी (मिसेज़ गुप्ता) कचरा डालने बाहर आईं और मैं हड़बड़ा गई। मैंने घबराहट में शंकर के हाथों पर जोरों से नाखून मारके हाथ खींच लिया और मैंने आज ही के दिन दूसरी गलती कर दी।

शंकर ने उल्टा अर्थ निकाला- “आप तो बहुत तेज हो मेडम...” धीरे से कहते हुये वो सीढ़ियों से उतर गया।

शंकर के जाने के बाद रामू आया और हर रोज की तरह मैं अंदर चली गई, और जाते वक़्त वो दरवाजा बंद करने का कहकर गया। फिर बाकी का दिन शांती से गुजर गया। रात को नीरव ने बताया की कल रात वो 5 दिन के लिए बिजनेस टूर पे जा रहा है।

 
नीरव की बात सुनकर मैं टेन्शन में आ गई। पहले जब नीरव जाता था तब मैं घर पर अकेली रहती थी, पर आजकल जो हो रहा था, उस स्थिति में घर पे अकेले रहने से मुझे डर लगने लगा था। मैंने नीरव को कहामुझे अहमदाबाद छोड़ दो, मैं मेरे मम्मी-पापा के पास रहना चाहती हूँ, और वापसी में तुम अहमदाबाद से मुझे लेते आना...”

नीरव को मेरी बात ठीक लगी तो उसने कहा- “कल रात को जाएंगे पैकिंग कर लेना...”

अब मुझे सिर्फ कल सुबह की चिंता थी। फिर 5 दिन के बाद तो टेन्शन कम हो जाएगी। सुबह हर रोज के समय गोपाल चाचा दूध देने आए। मैं लेने गई पर उन्होंने मेरे सामने देखा तक नहीं, तो मुझे थोड़ी शांति हुई। दोपहर को मैंने थोड़ी देर पहले ही टिफिन भर दिया, और बाहर दरवाजे पर लटका दिया। शंकर वहीं से लेकर निकल । गया। दोपहर को रामू के जाते ही मैं पैकिंग करने लगी। तभी बेल बजी।

मैंने दरवाजा खोला तो गुप्ता अंकल थे, उनके हाथ में कुछ कपड़ा था- “बेटी ये तुम्हारा है क्या?” कहते हुये अंकल ने कपड़े को दो उंगली के बीच करके खोला। कपड़ा पूरा खुल गया, वो ब्रा थी।

मुझे गुस्सा तो बहुत आया पर गुस्से को काबू में करते हुये मैं बोली- “मेरा नहीं है...”

अंकल- “क्यों ना बोल रही हो बेटी, इसका साइज भी तो 34सी ही है..” अंकल ने साइज लिखा था, वहां गंदे तरीके से इशारा करके पूछा, जहां साइज लिखा था वहां दो उंगली से गोल किया और फिर ब्रा की कटोरी को दो बार पुस किया।

मेरा दिमाग घूम गया की ये बूढ़ा मेरी साइज का भी ध्यान रखता है, और कैसे-कैसे गंदे इशारे करता है? मैंने आजू-बाजू में देखा की कुछ मिल जाए तो बूढ़े का सिर फोड़ दें, लेकिन कुछ दिखा नहीं तो मैंने जोरों से दरवाजा बंद कर दिया, और अंदर जाते हुये मन ही मन बोली- “हरामी बूढा...”

सुबह पापा स्टेशन पे लेने आए, नीरव सीधा मुंबई जाने वाला था। घर पे पहुँचते ही मैं, मम्मी और पापा बातें करने बैठ गये। बीच में मम्मी एक बार उठीं, और चाय-नाश्ता लाई और हमलोग 11:30 बजे तक बातें करते। रहे। फिर मम्मी ने रसोई बनाई। मैंने खाना खाया और सो गई।

थोड़ी देर बाद कुछ जोरों की आवाज आई, और मेरी नींद टूट गई। मैंने घड़ी में देखा तो 4:00 बजे थे। तभी बाहर से मम्मी की आवाज आई- “तुम अभी जाओ, मेरी बेटी घर पे है...”

मैं सोच में पड़ गई कि कौन होगा जिससे मम्मी मेरे घर में होने की बात कर रही हैं। मैं धीरे से उठी और धीरे से दरवाजे को धक्का दिया। दरवाजा खुला तो थोड़ा ही पर बाहर देखने के लिए काफी था।

आदमी- “तेरी बेटी घर पे है तो मैं क्या करूं, तुम्हें पैसे चाहिए की नहीं?” कोई आदमी मेरी माँ को धमकाते हुए कह रहा था।

कौन है ये आदमी, जो मेरी मम्मी से इस तरह से बात कर रहा है? मैं सोचने लगी। मैं उस आदमी को गौर से देखने लगी। वो आदमी दिखने में बहुत रईस लग रहा था, 6' फुट लंबा कद, गोरा और कद्दावर शरीर, सिर और दाढ़ी के सफेद बाल, काले कपड़े (कुर्ता और पायजामा), ज्यादातर उंगलियों में सोने और हीरे की अंगूठियां और गले में 10-12 तोले की चैन से लगता था की वो कोई बड़ा आदमी होगा।

मम्मी- “तुम कल आकर कर लेना, कल निशा बाहर जाने वाली है तब आ जाना। अभी जाओ प्लीज़...” मेरी माँ उससे धीमी आवाज में बोलते हुये समझाने की कोशिश कर रही थी।

आदमी- “ज्यादा नाटक मत कर, और एक बात समझ ले। मैं तुझे पड़ोसी के नाते पैसा देता हूँ, बाकी तुम जैसी बूढ़ी को चोदने के पैसे कौन देगा? अब जल्दी कर, नहीं तो तेरी बेटी को जगाकर उसके मुँह में घुसा दूंगा...” वो

आदमी गुस्से से बोला।

उस आदमी के मुँह से मेरी बात सुनकर मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई। शायद मेरी माँ डर रही थी की कहीं मैं जाग ना जाऊँ, इसलिए वो उस आदमी के पैरों पे घुटनों के बल बैठ गई और माँ ने उस आदमी का पायजामा निकाल दिया। मेरी माँ की पीठ मेरी तरफ थी और वो आदमी मेरी तरफ मुँह करके खड़ा था, इसलिए और कुछ तो दिखाई नहीं दिया पर माँ का मुँह आगे-पीछे होने लगा, जिससे मैं समझ गई की माँ उस आदमी का लिंग । चूस रही है। मेरी आँखों में पानी आ गया। मैंने देखना बंद कर दिया और दरवाजे पर पीठ के बल बैठ गई। मेरी आँखों में से आँसू पानी की तरह बहने लगे।

इस उमर में मेरी माँ के ये हाल? वो मेरी माँ को बूढ़ी बोल रहा था और वो तो उससे ज्यादा उमर का था। कैसी दुनियां की रीत है, यहां औरतें बूढ़ी होती हैं मर्द कभी नहीं। औरतों को कठपुतली बना दिया है इन मर्दो ने। सोचते हुये मैंने फिर से दरवाजे की दरार में से देखा।

 
तब उस आदमी की नजर वहां ही थी और हमारी नजरें मिल गईं। वो मेरे सामने मुश्कुराते हुये मेरी माँ के मुँह को पकड़कर लिंग को जोर-जोर से हिलाने लगा। मैं वहां से हट गई और फिर से अंदर जाकर सो गई।

थोड़ी देर बाद मम्मी अंदर आई, और मुझे सोते हुये देखकर बाहर चली गईं। 15-20 मिनट बाद मैं उठकर बाहर गई। बाहर मम्मी चटाई डालकर सोई हुई थी। मेरी आँखें फिर से छलक उठी। मुझे मेरी मम्मी पर गुस्से के बजाय सहानुभूति हो रही थी। मैं जानती थी की उसके पास और कोई रास्ता नहीं है। मैंने चाय बनाई और फिर मम्मी को जगाया, और हम दोनों ने साथ मिलकर चाय पी। रात को खाना खाकर मैं और पापा बातें कर रहे थे तभी वो दोपहर वाला आदमी आया।

पापा एकदम से खड़े हो गये- “आइए अब्दुल भाई बैठिए.”

उस आदमी को इतना सम्मान देते हुये पापा को देखकर मेरे मन में कड़वाहट छा गई।

अब्दुल- “नहीं मैं बैठूगा नहीं। वो तो बिटिया रानी आई हैं तो मिलने आ गया...” फिर मेरी तरफ देखकर बोलाराजकोट रहती हो ना, कभी कभार आना होता है। ससुराल में तो सब अच्छे हैं ना? परेशानी हो तो बोल देना...”

मुझे बहुत शर्म आ रही थी उस आदमी से आँख मिलाने में। मैं नीचे देखकर नाखून से जमीन को खुरचने की नाकाम कोशिश कर रही थी

अब्दुल- “नाराज हो क्या हमसे बिटिया रानी? मासाल्लाह आप तो बहुत खूबसूरत हो। अल्लाह हर कदम पे बचाए आपको बुरी नजरों से। लीजिए बिटिया ये आप हमें पहली बार मिल रही हैं उस खुशी में...” कहते हुये उसने । 500 का नोट मेरे सामने किया।

मेरे सिर फटा जा रहा था इस इंसान के दोगले रूप से।

अब्दुल- “ले लो बिटिया... शर्माजी बिटिया को कहिए हम कोई गैर नहीं और उससे कहिए की हम सामने के फ्लैट पर ही रहते हैं...” मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो उसने फिर कहा।

पापा- “बेटा ले लो अब्दुल चाचा कह रहे हैं तो ले लो...” पापा ने कहा।

पापा के कहने पर मैंने पैसे ले लिए। पैसे लेते ही अब्दुल (ऐसे हरामी इंसान को चाचा कहने का मन नहीं करता) चला गया।

पापा- “बहुत अच्छा इंसान है बेटा, दिन में एकाध बार तो आता ही है मेरा हाल पूछने..” पापा ने कहा।

मैं- “मुझे मालूम है की वो कितना अच्छा है..” मैं मन ही मन बोली।

रात को मम्मी ने दीदी की बात निकाली, पूरे दिन में पहली बार मम्मी ने दीदी को याद किया वो भी पापा सो गये उसके बाद- “मीना यहां आने को बहुत तड़पती है बेटा, पहले तो कभी कभार चोरी छुपे मिल जाती थी, पर एक बार तेरे जीजू को मालूम पड़ गया और उसके बाद तो वो कभी नहीं आई। तेरे पापा को तो मीना से कुछ ज्यादा ही लगाव था। वो मन ही मन कुढ़ते रहते हैं."

 
मैंने जीजू का मुँह खींचा और उनके होंठ को चूसने लगी और उनकी पीठ को नाखून से कुरेदने लगी। जीजू भी शायद झड़ने ही वाले थे, उनके फटके की स्पीड बढ़ गई और थोड़ी ही देर में मैं और जीजू एक साथ झड़ गये।

जीजू- “सच में निशा तूने मुझे बहुत तड़पाया है." जीजू मेरे बाजू में सोते हुये मेरी निप्पल की चारों तरफ उंगली से सहलाते हुये बोले।

मैंने भी शरारत से कहा- “मुझे भी मालूम होता ना की आप इतने गरम हो तो, मैं कब की दौड़ी आ गई होती। जीजू मुझे ये दे दो... ये मैं मेरे साथ ले जाना चाहती हूँ..” मैंने मेरे हाथ को नीचे करके लिंग को दबाते हुये कहा।

जीजू- “फिर तेरी दीदी क्या करेगी पगली?” कहकर जीजू ने मेरे गुदा-द्वार में उंगली घुसेड़ दी।

मैं- “अब चलिए जीजू जाते हैं, आप दीदी को लेकर जल्दी से घर आइए...” मैंने जीजू का हाथ वहां से खींचकर कहा।

जीजू- “हाँ चलो...कहकर जीजू खड़े होकर कपड़े पहनने लगे। मैंने भी कपड़े पहन लिए और फिर जीजू मुझे घर छोड़कर दीदी को लेने चले गये।

रात को जब मुझे मालूम पड़ा की मम्मी और दीदी भी जानते हैं की जीजू की क्या इच्छा है? तब मैंने बहुत सोचने के बाद फाइनल किया की चाहे मुझे जो भी करना पड़े, पर मैं दीदी को फिर से घर ले आऊँगी। और फिर आज दोपहर को जब जीजू को मिली तो देखा की जीजू आज भी उतने ही चार्मिंग और खूबसूरत दिख रहे हैं, जितने 6 साल पहले दिखते थे। फिर तो मैंने मन ही मन सोच ही लिया की मैं आज पूरे दिल से जीजू से मिलूंगी, उन्हें इतना खुश कर देंगी की वो पुराने सारे गिले सिकवे भूल जाएंगे और फिर जीजू ने भी मुझसे बहुत अच्छा बर्ताव किया और सच्चे दिल से कहूँ तो मैंने भी जीजू के साथ खूब मजा लूटा।।

शाम को जब मैं घर पे आई तब पापा नहीं थे। मम्मी और घर की हालत देखकर ऐसा लग रहा था की अब्दुल अभी ही घर से गया है, और ये बात मुझे कांटे की तरह चुभी। मैंने मन ही मन सोचा की मैं नीरव से कहकर । मम्मी-पापा को पैसे भेजूंगी, पर इस उमर में मैं मम्मी को ऐसे काम नहीं करने देंगी। चाहे कुछ भी करना पड़े मैं मम्मी को उस दोगले इंसान के नीचे सोने नहीं देंगी।

पापा के आने के थोड़ी देर बाद दीदी, जीजू और पवन आए। उनसे मिलकर मम्मी-पापा को जो खुशी हासिल हुई वो देखकर मुझे लगा की आज मैंने जो किया वो मुझे बहुत पहले करना चाहिए था। और पवन को तो हम लोग पहली बार देख रहे थे क्योंकी मेरी शादी के बाद पवन पहली बार आया था। मम्मी ने खाना बनाया, सबने साथ मिलकर खाया। खाना खाने के बाद मैं पानी लेने किचन में गई।

तब दीदी पीछे से आई और मुझसे गले लगकर बोली- “निशा आज तूने जो किया है, वो दुनियां की कोई भी बहन नहीं करती..."

मैंने देखा की दीदी की आँखों से पानी छलक गया है। मैंने वो पोंछते हुये कहा- “अब ये कहो दीदी की तुम राजकोट कब आती हो, जीजू को लेकर...”

मेरी बात सुनकर ना जाने क्यों दीदी का मुँह बिगड़ गया, फिर मुझे समझ में आया की मैंने दीदी को जीजू के साथ राजकोट आने को कहा तो वो उसे पसंद नहीं आया।

दीदी के जाने के बाद मैंने और मम्मी ने ढेर सारी बातें की। पापा सो गये उसके बाद हम दो घंटे तक बातें करते रहे। बातें करते वक़्त मुझे ऐसा लग रहा था की मम्मी मुझसे जीजू के बारे में बात करके मुझे शुक्रिया अदा करना चाहती हैं, पर मम्मी कह ना सकी।

* * *

* *

 
दूसरे दिन सुबह जब मैं चाचा के घर से वापिस आकर लिफ्ट में घुसी की तुरंत अब्दुल भी लिफ्ट में आ गया। उसको देखकर मेरा मूड खराब हो गया। अगर मुझे पहले से मालूम होता की वो आने वाला है तो मैं सीढ़ियां चढ़ जाती।

अब्दुल- “तुम और तुम्हारी माँ दोनों कैसी हो?” कहते हुये अब्दुल हँसते हुये मुझे घूरने लगा।

मैंने सोचा की ऐसे हरामी को तो नजरअंदाज ही करना चाहिए, तो मैंने उसके सामने देखा तक नहीं। तभी लिफ्ट दो और तीन फ्लोर के बीच रुक गई। मैंने लिफ्ट के बटन की तरफ देखा तो स्टाप के बटन पर अब्दुल की उंगली थी।

मैं- “लिफ्ट चालू करो...” मैंने गुस्से से कहा।

अब्दुल कोई जवाब दिए बगैर मेरे करीब आ गया और मेरे आजू-बाजू में उसने हाथ रख दिया और कहा- “लड़की तू चाहती है की तेरे अब्बू की दवाई होती रहे और तेरी अम्मी को कोई उल्टे-सुल्टे काम ना करने पड़े तो एक बार मुझे खुश कर दे...

मैं अब्दुल के सामने देखकर मुश्कुराई और फिर नीचे झुक के उसके कदमों के पास घुटनों के बल बैठ गई। अब्दुल ने अपनी आँखें बंद कर ली और मैंने मेरे दाहिने पैर को आगे करके झुकी-झुकी ही अब्दुल के दो हाथों के बीच से बाहर निकलकर लिफ्ट का 5 नंबर का बटन दबा दिया।

लिफ्ट के चलते ही अब्दुल को मालूम पड़ गया और वो मेरी तरफ होते हुये बोला- “तुझे अपनी अम्मी को चुदवाने का बड़ा शौक लगता है?”

दोपहर को मैं दीदी के घर गई। वहां हम दोनों बहनों ने बातों ही बातों में बचपन की यादें ताजा की। दीदी के साथ बातों-बातों में कब शाम हो गई, मालूम ही नहीं पड़ा। फिर दीदी रसोई बनाने लगी और मैं पवन के साथ खेलने लगी। थोड़ी ही देर में खाना बन गया और हम तीनों ने साथ मिलकर खाया। मैं जीजू से मिलकर जाना चाहती थी, पर कल दीदी का मुँह बिगड़ गया था। वो याद आते ही मन खट्टा हो गया और मैं जीजू के आने से पहले ही घर वापिस आ गई।

रात को नींद नहीं आ रही थी। कल जीजू के साथ बिताए हुये एक-एक पल याद आ रहे थे। मेरा दिल कह रहा था की जीजू कहीं से आ जायें और मुझे अपनी बाहों में लेकर मेरी योनि में अपना लिंग डाल दें। मैंने मेरा हाथ नीचे किया और उंगली को योनि में डाला, तो योनि गीली थी। मैं मेरे दूसरे हाथ से मेरे उरोजों को दबाते हुये मसलने लगी और जीजू के साथ बिताए हुये पलों को याद करती हुई उंगली को योनि में अंदर-बाहर करने लगी। थोड़ी देर ऐसा करने के बाद मैं झड़ गई। मेरे बदन की आग तो ठंडी हो गई, पर शाम से जो आग मन में लगी थी वो बुझ नहीं रही थी।

झड़ने के बाद मैं जीजू को छोड़कर अब्दुल के बारे में सोचने लगी। मैंने उसकी बीवी को देखा नहीं था। सोचा की कल सुबह उन्हें बता दें या फिर पोलिस में रिपोर्ट कर दें। पर दुविधा ये थी की उससे माँ की बदनामी भी तो हो सकती थी, और अब्दुल भी कहां जबरजस्ती कर रहा था। बहुत सोचने के बाद मुझे लगा की इसका एक ही हल है कि मैं मम्मी-पापा को पैसे भेजूंगी तो ही मम्मी मजबूरी में उस दरिंदे के नीचे नहीं सोएंगी।

दूसरे दिन दोपहर को जीजू का फोन आया- “कैसी हो सालीजी? जीजू की याद आ रही की नहीं?"

मैं भी जीजू का फोन आते ही खिल उठी- “बहुत ही याद आ रही है जीजू आपकी और आपके.....” मैंने मेरी बात को मस्ती से अधूरी छोड़ दी।

जीजू- “किसकी, बताओ ना?” जीजू ने पूछा।

 
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