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तीसरे दिन मैं खाना खा रही थी की बेल बजी। मैंने दरवाजा खोला तो रामू था। मैंने उसको ना बोल दिया की अब आना नहीं। मैंने उसको निकालकर कामवाली रखने का फैसला कर लिया था। खाना खाकर सारा काम कर तो लिया पर 4:00 बज गये और मैं थक गई। मैं बेड पे जाकर लेटी और करण आ गया।
करण- “कैसी हो जान?” करण ने आते ही पूछा।
मैं- “चले जाओ यहां से उस दिन जो हुवा वो...” मैं बात अधूरी छोड़कर रोने लगी।
करण मेरे नजदीक आया, मुझे बाहों में लेने लगा तो मैं खिसक गई।
मैं- “मुझे छूना मत करण..”
करण- “क्यों इतना गुस्सा कर रही हो निशा, मैंने क्या किया है जो इतना भड़क रही हो?” करण ने आगे बढ़कर मुझे बाहों में ले लिया।
मैं करण के सीने पर सिर रखकर रोते हुये बोली- “करण उस दिन रामू ने जो मेरे साथ किया वो तुम जानते हो, तुमने भी तो रामू को रोका नहीं...”
करण- “मैं रामू को रोकना चाहता था निशा, पर मैंने देखा की तुम भी उसके साथ मजा ले रही हो तो मैं चला गया..." करण ने कहा।
मैं- “क्या मैं उसके साथ मजे ले रही थी? तुम पागल तो नहीं हो गये? चले जाओ, चले जाओ, कभी मत आना अब यहां चले जाओ...” मैंने करण को गुस्से में आकर धकके लगाए और चले जाने को कहा।
करण- “मैं जानता था की निशा सच तुम सुन नहीं सकोगी। और सच ये है की नीरव तुम्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा, और ये भी सच है की तुम्हें रामू के साथ चुदते वक़्त जो संतुष्टि मिली, वो आज तक नीरव से नहीं मिली।
और सच ये भी है की..."
मैं- “तुम जाओ यहां से करण मुझे तुम्हारी एक भी बात नहीं सुननी...” कहते हुये मैं अपने कानों पर हाथ रखते हुये बेड से उठ गई।
शाम को मैं रसोई में खिचड़ी रखकर टीवी देखने बैठी, पर मेरा ध्यान करण की बातों पर ही था, मुझे उसकी आवाज सुनाई दे रही थी- “तुम रामू के साथ मजे ले रही थी... नीरव तुम्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा... उस दिन रामू ने तुम्हें जितना संतुष्ट किया उतना आज तक नीरव ने नहीं किया.” हर बात न जाने कितनी बार सुनाई दे रही थी।
तभी मुझे कुछ जलने की बास आई। मैंने किचन में जाकर देखा तो नीचे की तरफ से खिचड़ी जल गई थी। मैंने गैस बंद कर दिया और फिर से बाहर आकर टीवी देखने लगी। रात को नीरव के आते ही हम लोगों ने खाना खा लिया, जल्दी से काम निपटाकर मैं नींद की गोली लेकर सो गई।
दूसरे दिन सुबह उठी तो मैंने अपने आपको थोड़ा फ्रेश महसूस किया। दोपहर को काम निपटाकर अपार्टमेंट में आ रही दूसरी कामवालियों को काम करने को पूछा, पर किसी ने हाँ नहीं बोला। आजू-बाजू के अपार्टमेंट में भी जाकर आई, 3-4 कामवालियों को तो दोगुना पगार देने को भी बोला पर सबने “ना” ही बोला।
करण- “कैसी हो जान?” करण ने आते ही पूछा।
मैं- “चले जाओ यहां से उस दिन जो हुवा वो...” मैं बात अधूरी छोड़कर रोने लगी।
करण मेरे नजदीक आया, मुझे बाहों में लेने लगा तो मैं खिसक गई।
मैं- “मुझे छूना मत करण..”
करण- “क्यों इतना गुस्सा कर रही हो निशा, मैंने क्या किया है जो इतना भड़क रही हो?” करण ने आगे बढ़कर मुझे बाहों में ले लिया।
मैं करण के सीने पर सिर रखकर रोते हुये बोली- “करण उस दिन रामू ने जो मेरे साथ किया वो तुम जानते हो, तुमने भी तो रामू को रोका नहीं...”
करण- “मैं रामू को रोकना चाहता था निशा, पर मैंने देखा की तुम भी उसके साथ मजा ले रही हो तो मैं चला गया..." करण ने कहा।
मैं- “क्या मैं उसके साथ मजे ले रही थी? तुम पागल तो नहीं हो गये? चले जाओ, चले जाओ, कभी मत आना अब यहां चले जाओ...” मैंने करण को गुस्से में आकर धकके लगाए और चले जाने को कहा।
करण- “मैं जानता था की निशा सच तुम सुन नहीं सकोगी। और सच ये है की नीरव तुम्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा, और ये भी सच है की तुम्हें रामू के साथ चुदते वक़्त जो संतुष्टि मिली, वो आज तक नीरव से नहीं मिली।
और सच ये भी है की..."
मैं- “तुम जाओ यहां से करण मुझे तुम्हारी एक भी बात नहीं सुननी...” कहते हुये मैं अपने कानों पर हाथ रखते हुये बेड से उठ गई।
शाम को मैं रसोई में खिचड़ी रखकर टीवी देखने बैठी, पर मेरा ध्यान करण की बातों पर ही था, मुझे उसकी आवाज सुनाई दे रही थी- “तुम रामू के साथ मजे ले रही थी... नीरव तुम्हें संतुष्ट नहीं कर पा रहा... उस दिन रामू ने तुम्हें जितना संतुष्ट किया उतना आज तक नीरव ने नहीं किया.” हर बात न जाने कितनी बार सुनाई दे रही थी।
तभी मुझे कुछ जलने की बास आई। मैंने किचन में जाकर देखा तो नीचे की तरफ से खिचड़ी जल गई थी। मैंने गैस बंद कर दिया और फिर से बाहर आकर टीवी देखने लगी। रात को नीरव के आते ही हम लोगों ने खाना खा लिया, जल्दी से काम निपटाकर मैं नींद की गोली लेकर सो गई।
दूसरे दिन सुबह उठी तो मैंने अपने आपको थोड़ा फ्रेश महसूस किया। दोपहर को काम निपटाकर अपार्टमेंट में आ रही दूसरी कामवालियों को काम करने को पूछा, पर किसी ने हाँ नहीं बोला। आजू-बाजू के अपार्टमेंट में भी जाकर आई, 3-4 कामवालियों को तो दोगुना पगार देने को भी बोला पर सबने “ना” ही बोला।