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Adultery Chudasi (चुदासी )

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एक बार मैं और नीरव ब्लू-फिल्म देख रहे थे तब उसमें चूत की चुसाई का दृश्य आया था। वो देखते हुये मैंने नीरव को कहा था- “मुझे भी वो लोग जैसा कर रहे हैं वैसा कर दो ना..."

मेरी बात सुनकर नीरव हँसने लगा और बोला- “पगली, ये सब ऐसे ही दिखाते हैं। इसमें डाला जाता है, चाटा नहीं जाता..." तब नीरव की बात सुनकर मैं खामोश हो गई थी। पर धीरे-धीरे नीरव डालना भी भूल गया था।

ये सब सोचते-सोचते मुझे कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला, और कितनी देर सोती रही वो भी पता नहीं।

करण ने आकर मुझे जगाया तब मैं जागी।

करण- “कैसी हो निशा डार्लिंग?” करण ने आते ही मेरी तबीयत का हाल पूछा।

मैं- “मैं तो ठीक हूँ, पर तुम कहां थे? बहुत दिनों बाद मेरी याद आई..” मैंने बनावटी गुस्से से कहा।

करण- “अब हमारी जरूरत कहां है आपको? दो दिन पहले अंकल और आज रामू... तुम्हारे तो आजकल मजे ही मजे हैं...” करण ने शरारत से कहा।

मैं- “नहीं करण ऐसी बात नहीं... वो अंकल तो बेचारे न जाने कितने सालों से सेक्स के बिना तड़प रहे थे। इसलिए...” मैंने करण का हाथ खींचा और उसे बेड पर बिठाते हुये कहा।

 
मैं- “मैं तो ठीक हूँ, पर तुम कहां थे? बहुत दिनों बाद मेरी याद आई..” मैंने बनावटी गुस्से से कहा।

करण- “अब हमारी जरूरत कहां है आपको? दो दिन पहले अंकल और आज रामू... तुम्हारे तो आजकल मजे ही मजे हैं...” करण ने शरारत से कहा।

मैं- “नहीं करण ऐसी बात नहीं... वो अंकल तो बेचारे न जाने कितने सालों से सेक्स के बिना तड़प रहे थे। इसलिए...” मैंने करण का हाथ खींचा और उसे बेड पर बिठाते हुये कहा।

करण- “वाह निशा वाह... पूरी दुनियां में तुम जैसी समाज-सेविका नहीं मिलेगी। तुम्हें तो अवार्ड मिलना चाहिए कि तुम कभी अपने लिए करती ही नहीं हो। कभी दीदी के लिए, तो कभी जोर जबरदस्ती होता है, और आज तो तूने एक नया बहाना निकाला की वो बेचारे को सेक्स किए कितने साल हो गये थे इसलिए? ऐसे लोग तो बहुत हैं दुनियां में सबसे चुदवाएगी क्या? सारी दुनियां प्यासी है। तुमने उन लोगों के लिए चूत की प्याऊ खोल रखी है। क्या?” करण व्यंग में बोले ही जा रहा था।

मैं- “मैं झूठ नहीं बोल रही करण, जो सच है वोही कह रही हूँ...” मैं करण के सीने पर मेरा सिर रखते हुये बोली।

करण- “चलो मैं मान लेता हूँ की तुम सच कह रही हो। पर अब जब भी करो अपने लिए करो, दूसरों के लिए नहीं...” कहकर करण ने एक हाथ से मुझे बाहों में ले लिया था और दूसरे हाथ से मेरी पीठ को सहलाने लगा। करण ने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए और मेरे दोनों होंठों को बारी-बारी चूसने लगा।

मैं भी पूरी तल्लीनता से उसके होंठ चूस रही थी। थोड़ी देर हम दोनों इसी मुद्रा में रहे।

फिर करण ने मुझे उससे अलग करते हुये कहा- “निशा जिससे भी सेक्स करो, दिल से करो दिमाग से नहीं। जिससे प्यार करो उसी से सेक्स करो..”

मैं- “प्यार... प्यार तो मैं सिर्फ नीरव से ही करती हूँ, करण...” मैंने कहा।

करण- “और किसी से भी नहीं करती?” करण ने एक पेचीदा सवाल पूछ डाला।

मैं- “और... और जीजू और तुम, तुम दोनों भी मुझे पसंद हो। पर करण तुम कहां हो? बताओ मुझे कहां हो तुम

और जीजू, तुमने आज सुबह देखा था ना दीदी ने मुझे क्या-क्या बोला?” ये सब बोलते हुये मैं रो पड़ी।

करण- "तो निशा उल्टा करो, जिससे सेक्स करो उससे प्यार करो। तुम सेक्स करते वक़्त सिर्फ अपने बारे में ही सोचती हो, अब सामने वाले के बारे में भी सोचा करो। सामने वाला तुम्हें जो मजा देता है तुम भी उसे दो...” करण ने कहा।

मैं- “अब छोड़िए इन बातों को मेरे सेक्स टीचर, तुम कुछ भूल रहे हो करण...” मैंने चंचलता से करण को कहा।

करण- “मुझे सब कुछ याद है निशा रानी... आज तुम्हारी बर्थ-डे है, मेनी मेनी हैपी रिटर्न्स आफ द ई, आप जियो हजारों साल और साल के दिन हों पचास हजार..” करण ने मेरे सिर को अपने सीने से लगाया और कहा।

मैं- “बहुत-बहुत शुक्रिया जनाब का..” मैंने मुश्कुराकर कहा।

करण- "तुम्हारी उमर तो बताओ निशा?” करण ने पूछा।

मैं- “लड़कियों की उमर नहीं पूछी जाती जनाब, फिर भी तुम ही बताओ...” मैंने कहा।

 
करण- “साड़ी में 21 साल, जीन्स में 19 साल और स्कूल ड्रेस पहन लोगी ना तो 15 साल...” करण ने अपने गाल पर उंगली रखकर सोचने की मुद्रा बनाते हुये कहा।

मैं- “साड़ी में 21 साल? इतनी बड़ी नहीं हूँ मैं, कह देती हूँ मैं..” मैंने बनावटी गुस्से से कहा।

करण- “ये तो बताओ कि नीरव ने आज तुम्हें क्या दिया?” करण ने पूछा।

मैं- “वो तो शाम को आते वक़्त लेकर आएगा, फिर हम होटेल में भी जाने वाले हैं...” मैंने कहा।

करण- “तो फिर आज का सबसे पहला गिफ्ट तुम्हें रामू ने दिया ना?” करण ने मुश्कुराते हुये पूछा।

मैं- “ये क्या करण? हमेशा तुम ऐसी बातें करके मुझे चिढ़ाते रहते हो, उसे कोई गिफ्ट कहता है भला?”

करण- “ये तुम्हारी तृप्ति गिफ्ट नहीं है तो क्या है? ये इतने सारे ओगैस्म क्या हैं? कभी सोचा था की एक घंटे के अंदर तुम दो-दो बार झड़ जाओगी? ये गिफ्ट ही तो है.." करण बोले ही जा रहा था।

तभी मोबाइल की रिंग बज उठी, मैं मेरी सपनों की दुनियां से वापस लौट आई, और मैंने मोबाइल उठाकर देखा तो नीरव की काल थी।

मैं- “हाँ, बोलो नीरव..” मैंने कहा।

नीरव- “अभी 5:00 बजे हैं, जल्दी-जल्दी तैयार हो जाओ फिल्म देखने जाते हैं..” नीरव ने कहा।

मैं- “नहीं... फिल्म में नहीं जाना, तुम जल्दी घर आ जाओ..” मैंने कहा।

नीरव- “ओके बेबी... मैं जल्दी से आ रहा हूँ.” कहकर नीरव ने काल काट दी।

थोड़ी देर बाद नीरव आया तब तक मैं तैयार हो चुकी थी।

नीरव मेरे लिए गिफ्ट लेकर आया था, जो मुझे बहुत पसंद आई। फिर हम दोनों ने बाहर खाना खाया और रात को बेड पर नीरव आज भी उंगली से ही सेक्स करना चाहता था, पर मैंने उससे जिद करके मेरी चुदाई करवाई। हर रोज सेक्स न करने की वजह से आज भी वो जल्दी से झड़ गया और उसने मेरी चूत को अपने वीर्य से भर दिया। पर आज मैं इतनी संतुष्ट थी की मैंने नीरव से कोई फरियाद नहीं की। और वैसे भी मैं तो उसका वीर्य मेरी चूत में लेना चाहती थी। क्योंकि कल मैं किसी और से प्रेगनेंट हो जाऊँ तो उसे मुझ पर कोई शक न हो।

दूसरे दिन सुबह जब मैं उठी तब मुझे हर रोज से ज्यादा ताजगी महसूस हो रही थी। नीरव के जाने के बाद रसोई करते हुये मैं कल करण के साथ हुई बातें याद कर रही थी- “निशा, जिसे तुम प्यार करती हो वो तुम्हारी बदन की भूख न मिटा सकता हो तो, उससे प्यार करो जो तुम्हारी वासना की आग को ठंडा कर रहा हो...”

 
दूसरे दिन सुबह जब मैं उठी तब मुझे हर रोज से ज्यादा ताजगी महसूस हो रही थी। नीरव के जाने के बाद रसोई करते हुये मैं कल करण के साथ हुई बातें याद कर रही थी- “निशा, जिसे तुम प्यार करती हो वो तुम्हारी बदन की भूख न मिटा सकता हो तो, उससे प्यार करो जो तुम्हारी वासना की आग को ठंडा कर रहा हो...”

करण की आवाज़ मेरे मस्तिष्क में गूंज रही थी। करण मर्द है और उसके लिए सेक्स से ज्यादा कुछ नहीं। पर। हम औरतें तो प्यार पाने के लिए सेक्स करती हैं, और मर्द सेक्स के लिए प्यार जताते हैं। यही तो फर्क है हम औरतों और मर्दो में। पर मुझे तो दोनों चाहिए... सेक्स भी चाहिए और प्यार भी चाहिए। पर मेरी विडंबना तो । देखो कि मुझे दोनों को लिए दो अलग-अलग इंसानों की जरूरत पड़ती है। मैं न जाने क्या-क्या सोचती रही और कितनी देर तक सोचती रही, बीच-बीच में मेरा रूटीन काम करती रही।

शंकर आया तो उसे टिफिन दे दिया और मैंने खाना भी खा लिया। तभी मेरा ध्यान घड़ी पर गया तो एक बज चुका था, रामू अभी तक नहीं आया था। हर रोज तो 12:30 बजे के आसपास आ जाता था तो आज कहां गया होगा? कभी कभार देरी करता होगा तो मेरा ध्यान भी नहीं जाता होगा। पर आज मुझे उसका इंतेजार था, और 15 मिनट हो गई पर रामू नहीं आया। मुझे हर एक सेकेंड घंटे के समान लग रहा था।

तभी लिफ्ट आई और रामू दिखाई दिया। मैं मन ही मन खुश हो गई, पर मैं अपनी खुशी उसके सामने जाहिर करना नहीं चाहती थी। मैं उठकर हर रोज की तरह रूम में चली गई और उस पल का इंतेजार करने लगी की रामू काम खतम होते ही दरवाजा खटखटाएगा और अंदर आ जाएगा।

थोड़ी देर बाद रामू ने दरवाजा खटखटाया- “जा रहा हूँ मेडम...”

मैंने एकाध मिनट के बाद दरवाजा खोला। मैंने सोचा था की रामू बाहर होगा पर वहां कोई नहीं था। मैं दरवाजे पर गई, वहां रामू नहीं था। मैं समझ गई की वो अंदर होगा। दरवाजा बंद करके जल्दी-जल्दी अंदर गई पर वहां कोई नहीं था। फिर मैंने सारा घर छान मारा पर रामू कहीं नहीं था। मैं निराश होकर बेड पर लेट गई।

मैं सोचने लगी- “रामू ने ऐसा क्यों किया होगा? क्यों चला गया होगा? क्या उसे मुझसे ज्यादा कान्ता अच्छी। लगती होगी?” ढेरों सवालों ने मुझे घेर लिया था, पर मेरे पास कोई जवाब नहीं था। मेरे बदन में आग सी लगी हुई थी। मुझे दोनों टांगों के बीच इंडे की जरूरत महसूस हो रही थी।

मैंने मेरा गाउन ऊपर उठाया, अंदर कुछ नहीं पहना था। मैंने मेरी उंगलियों से मेरी चूत के बाहरी भाग को सहलाया। ज्यादा बालों की वजह से कम मजा आया। मैंने मेरी उंगली चूत के अंदर डालकर आगे-पीछे करनी शुरू कर दी। मैं बहुत कम मास्टरबेट करती हूँ, पर जब भी करती हूँ तब किसी की कल्पना करते हुये करती हूँ।

पर आज मेरी आँख बंद करते ही कितने सारे लण्ड मुझे दिखाई दिए। उंगली चूत के अंदर-बाहर करते हुये वो सारे लण्ड देखते हुये मैं जल्दी से झड़ गई।

 
थोड़ी देर बाद अंकल की काल आई, मैं चहक उठी। क्योंकि मुझे अंकल के साथ चुदाई करने से ज्यादा मजा फोन सेक्स में आया था। शायद उसकी वजह ये भी हो सकती है की वो मेरे लिए एक नया खेल था, और आजकल मैं हर रोज नये-नये खेल सीख रही थी।

मैं- “हाँ कहिए अंकल, आंटी कैसी हैं?” मैंने पूछा।

अंकल- “फिर से तेरी आंटी कोमा में चली गई है बिटिया। कहीं मुझे अकेला छोड़कर चली तो नहीं जाएगी ना? ये डर सारा दिन मुझे सताता रहता है। मैंने बहुत ही पाप किए हैं, भगवान उसकी सजा मुझे इस तरह न दे दे...” अंकल की आवाज में दर्द था।

मैं- “नहीं-नहीं अंकल, ये कैसी बातें कर रहे है आप? आंटी बहुत जल्दी ही ठीक हो जाएंगी...” मैंने अंकल को सांत्वना देते हुये कहा।

अंकल- “भगवान करे और तेरी बात सही हो जाय, तुम लोग नहीं आए दो दिन से...” अंकल ने कहा।

मैं- “नीरव को कहीं जाना नहीं होगा तो, रात को जरूर आएंगे अंकल। कुछ लाना हो तो बताना, हम लेकर आएंगे...” मैंने कहा।

अंकल- “नहीं बिटिया, कुछ नहीं लाना। थोड़ी देर आप लोग आओगे तो मन लगा रहेगा...” अंकल ने कहा।

मैं- “फिर भी अंकल, जरूरत हो तो कहना। आते वक़्त लेकर आएंगे, रखती हूँ.” मैंने कहा।

अंकल- “हाँ, बिटिया...” कहकर अंकल ने काल काट दी।

मैं सोच में पड़ गई की बूढ़ा कुछ उल्टा सीधा नहीं बोला। सच में सुधर गया क्या? मुझे तो यकीन नहीं हो रहा था। पर आज उनकी बातों में बहुत ही दर्द नजर आ रहा था। फिर मैंने सोचा कि जो भी होगा रात को जाएंगे। तब सब पता चल जाएगा।

9:00 बजे नीरव आया, खाना खाकर हम हास्पिटल गये। अंकल आंटी का हाथ पकड़कर स्टूल पर बैठे हुये थे। हमें देखकर उनके चेहरे पे थोड़ी सी मुश्कान आई। आंटी की हालत तो वैसी की वैसी थी। उनको देखकर ऐसा लग रहा था की न जाने कितने सालों से थककर वो आराम कर रही हैं।

 
9:00 बजे नीरव आया, खाना खाकर हम हास्पिटल गये। अंकल आंटी का हाथ पकड़कर स्टूल पर बैठे हुये थे। हमें देखकर उनके चेहरे पे थोड़ी सी मुश्कान आई। आंटी की हालत तो वैसी की वैसी थी। उनको देखकर ऐसा लग रहा था की न जाने कितने सालों से थककर वो आराम कर रही हैं।

केयूर (अंकल का बेटा) का भेजा हुवा आदमी बैठा हुवा था। हमारे जाते ही अंकल ने उससे कहा- “तुम तुम्हारी बहन को मिल आओ, एकाध घंटा हैं ये लोग, तब तक वापस आ जाना.." और फिर हमारी तरफ होते हुये बोले

ये आदमी आया तब से यहां से बाहर नहीं निकाला था, उसकी बहन यहीं पर रहती है पर मिलने नहीं गया। बहुत अच्छा इंसान है...”

अंकल की बात पूरी होते ही वो खड़ा हुवा और बाथरूम में जाकर फ्रेश होकर बाहर निकल गया।

नीरव- “डाक्टर क्या कह रहे हैं?” नीरव ने पूछा।

अंकल- “वही पुराने आलाप बजा रहे हैं की उमर की वजह से ठीक होने में समय लगेगा ही..." अंकल ने कहा।

नीरव- “अंकल दूसरे डाक्टरों को दिखाना चाहिए मेरे खयाल से..." नीरव ने कहा।

अंकल- “इस उमर में मैं कितना दौडू बेटा? परसों तक केयूर आ जाएगा, फिर वो जहां-जहां दिखाना है वहां-वहां दिखाएगा...” अंकल ने कहा और फिर पलंग पर से खड़े हुये जैसे की अचानक उन्हें कुछ याद आया हो। फिर कहा- “तुम दोनों बैठो बेटा, मैं दवाई लेकर आता हूँ..”

अंकल दरवाजा खोलकर बाहर निकल ही रहे थे की नीरव ने कहा- “लाइए अंकल मैं ला देता हूँ...”

अंकल ने तुरंत अपने पाकेट में से दवाई का कागज निकाला और नीरव को थमाकर फिर से पलंग पर बैठ गये।

कागज लेकर नीरव खड़ा हुवा और दरवाजे पर जाकर दरवाजा खोलकर बाहर निकल ही रहा था कि अंकल फिर से बोले- “बेटा सिविल हास्पिटल जाकर लाना, वो लोग 10% लेस देते हैं। बहुत ही महँगी दवाइयां हैं, कम से कम 1500 का फायदा होगा...”

अंकल की बात सुनकर मेरे चेहरे पर मुश्कुराहट आ गई और मैं मन ही मन बोली- “हरामी बूढ़ा...”

नीरव- “ओके अंकल...” इतना कहकर नीरव निकल गया।

नीरव के जाने के बाद अंकल पलंग पर से उठे और किसी फिल्मी हीरो की अदा से दोनों हाथों को चौड़ा करके खड़े हो गये। मैं उनकी इस अदा पर मर मिटी और उनको सामने देखकर जोरों से हँसने लगी और फिर खड़ी होकर उनसे लिपट गई।

थोड़ी देर तक हम दोनों लिपटकर ऐसे ही खड़े रहे फिर मैंने अंकल को कहा- “दरवाजे का लाक खुला है अंकल...”

अंकल मुझसे अलग होकर दरवाजे पर लाक लगाकर आए और मेरे पास जमीन पर बैठ गये और मेरा हाथ पकड़कर मुझे खींचा तो मैं भी बैठ गई।

अंकल- “सो जाओ बिटिया..” अंकल ने कहा तो मैं जमीन पर लेट गई।

अंकल ने झुक के मेरे पेट पर चुंबन लिया और फिर थोड़ा और झुक के नाभि पर भी चुंबन लिया और बोलेएक तुम और दूसरी तुम्हारी आंटी, नाभि के नीचे से साड़ी पहनती हो, बाकी ज्यादातर गुज्जू लड़कियां तो नाभि को साड़ी में ही छुपा देती हैं, जैसे नाभि नहीं चूत हो...”

अंकल की बातें हमेशा मजेदार ही होती हैं। अंकल ने मेरी साड़ी जांघ तक ऊपर उठाई और फिर उसे सहलाने लगे और फिर वो भी मेरे बाजू में लेट गये और मेरे होंठों पर होंठ रखकर किस करने लगे।

मैंने भी अंकल को बाहों में भींच लिया। अंकल मेरे उरोजों को दबाते हुये मेरे ब्लाउज के बटन खोलने लगे, तो मैंने उन्हें रोका- “अंकल, नीरव कभी भी आ सकता है...”

 
मैंने भी अंकल को बाहों में भींच लिया। अंकल मेरे उरोजों को दबाते हुये मेरे ब्लाउज के बटन खोलने लगे, तो मैंने उन्हें रोका- “अंकल, नीरव कभी भी आ सकता है...”

अंकल ने बटन खोलना छोड़कर मेरी साड़ी को कमर तक ऊपर कर दी और मेरी पैंटी को निकालकर साइड में रख दी और मेरी चूत को उनकी हथेली से मसलने लगे।

मैंने सिसकते हुये पूछा- “नाटक करने की क्या जरूरत थी अंकल, सीधा कहते तो मैं दोपहर को आ जाती ना... अभी तो नीरव का टेन्शन रहेगा...”

अंकल ने उनके पैंट की जिप खोली और उनका लण्ड निकाला और मेरे ऊपर आकर मेरी चूत पर लण्ड को रगड़ते हुये बोले- “थोड़ा थ्रिल के लिए, और साथ में तेरे पति को बेवफूक बनाने का मजा लेने के लिए...”

अंकल का लण्ड मैंने नीचे हाथ डालकर पकड़ा और मेरी चूत के द्वार पर लगाया। अंकल ने अपने चूतड़ों को। थोड़ा उठाकर धक्का दिया और उनका लण्ड मेरी चूत में दाखिल हो गया। वो थोड़ी देर ऐसे ही रुक गये और फिर उन्होंने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए। मैंने अंकल को मेरी बाहों के घेरे में ले लिया था, और हम दोनों के होंठ एक दूसरे के होंठों से चिपके हुये थे। अंकल एक हाथ से मेरे उरोजों को कपड़ों के ऊपर से सहलाते हुये धक्के पर धक्के लगा रहे थे।

तभी दरवाजे को खटखटाने की आवाज आई और मैं इर गई की कौन आया होगा, नीरव या वो आदमी जो अपनी बहन को मिलने गया था या फिर कोई और? अंकल भी फटाफट मेरे ऊपर से खड़े होकर अपने कपड़े ठीक करने लगे।

मैं भी खड़ी होकर उनका अनुकरण करने लगी। मैंने कपड़ों को ठीक करके बालों में से हेयर पिन निकालकर बालों को उंगलियों से सवांरा और फिर से पिन को बालों में डाल दिया और अंकल को इशारे से धीरे ना मैं?”

अंकल भी पलंग पर बैठ गये थे और मेरी तरफ देखकर उन्होंने अपनी मुंडी हिलाकर 'हाँ' का इशारा किया। तब तक दरवाजे पर दूसरी बार खटखटाने की आवाज आई। मैं दरवाजे पर जाकर लाक खोल ही रही थी की तभी मेरी नजर मेरी पैंटी पर पड़ी। मैंने अंकल को उसे दिखाकर हाथ के इशारे से उसे लेने को कहा।

अंकल दौड़े और जल्दी से पैंटी लेकर फिर से पलंग पर बैठ गये।

मैंने दरवाजा खोला तो सामने नीरव था, उसे देखकर मेरा डर बढ़ गया की कहीं वो पूछ ना बैठे की इतनी देर क्यों लगाई दरवाजा खोलने में?

पर नीरव ने अंदर आकर थोड़ा अलग बोला- “अंकल यहां पास में ही एक शाप है, उससे बिनती की तो उसने भी लेस दे दिया अब वहीं से लाना.." नीरव ने अंकल को दवाई का बिल दिया तो अंकल ने अपने पाकेट में से पैसे निकाले और नीरव को देने लगे।

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नीरव ने पैसों को लेते हुये कहा- “बाद में दे देना अभी जरूरत हो तो रखिए..”

अंकल ने निराशा से कहा- “नहीं बेटा, पैसों की कोई प्राब्लम नहीं, पूरा इंतजाम है...”

नीरव शायद उनकी ये निराशा आंटी की बीमारी की वजह से समझ रहा होगा, पर सच तो मैं जानती थी की अंकल क्यों इतने निराश हो गये हैं। मैं अंकल के पैंट के ऊपर से दिख रहे उभरे भाग को देखकर मंद-मंद मुश्कुरा रही थी।

मेरी मुश्कान देखकर अंकल अकड़ रहे थे। तभी नीरव बाथरूम में गया तो अंकल धीरे से फुसफुसाए- इतना क्यों हँस रही हो?

मैंने शरारत से कहा- “आज अंकल का प्लान फेल हो गया इसलिए...”

अंकल ने कहा- “तुम अंकल को नहीं जानती... मैं अभी भी तुझसे मेरी मूठ मरवा सकता हूँ...”

मैंने पूछा- “नीरव के सामने...”

अंकल- “हाँ, उसके सामने...”

मैं- “हो ही नहीं सकता...”

अंकल- “तुम मुझे चैलेंज करती हो?” अंकल इतना बोले थे कि नीरव बाहर आ गया तो अंकल ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

नीरव आकर मेरे बाजू में बैठ गया और बोला- “वो भाई नहीं आए अब तक?”

अंकल ने कहा- “थोड़ी देर में आ जाएंगे फिर आप दोनों निकलो...” कहकर अंकल नीरव से हमारे बिजनेस के बारे में पूछने लगे और साथ में वो केयूर के बारे में भी बात करते रहे।

थोड़ी देर बाद अंकल खड़े हुये और बोले- “बिटिया तुम आई हो तो आंटी के कपड़े चेंज कर देते है...” आंटी को हास्पिटल से दिया हुवा गाउन पहनाया हुवा था।

वो देखकर मैं बोली- “अंकल इसे चेंज करने की क्या जरूरत है? और इसको तो नर्स ही चेंज कर देती होगी ना?” मैंने मन ही मन अंकल को चैलेंज दे दी थी और मुझे इसमें भी उनकी कोई साजिश नजर आ रही थी और मुझे इस नये खेल को ज्यादा रोचक बनाना था।

 
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