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Adultery Chudasi (चुदासी )

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मैं हिचकिचाते हुये झुकी और दीदी के दाहिने निप्पल को मुँह में लेकर चूसने लगी, बारी-बारी दोनों निप्पल चूसकर ये जानने की कोशिश करने लगी की मर्यों का सबसे पसंदीदा खिलोना ये क्यों है?

दीदी- “अनिल्ल्ल

क्या कर रहे हो? निशा मैं मर जाऊँगी छोड़ो मुझे..." दीदी पागलों की तरह कराह रही थी।

मैं और जीजू उनकी बात पर ध्यान दिए बगैर हमारा काम कर रहे थे। थोड़ी देर बाद दीदी झड़ गई। झड़ते वक़्त दीदी ने मेरे बाल पकड़कर इतनी जोर से खींचे की उनके साथ मैं भी कराहने लगी। इस वक़्त रूम के अंदर का जो नजारा था वो देखकर कामदेव भी शर्मा जाएं, और उन्हें जीजू की तकदीर से ईर्षा आए ऐसा हसीन नजारा था। मैं और दीदी घुटनों के बल बैठी थी और जीजू लण्ड पकड़कर हमारे सामने खड़े थे।

ब्लू-मूवी जैसा दृश्य था, मैंने लण्ड पकड़कर सहलाया और मैंने उनके और नजदीक जाकर दीदी से पूछा- “दीदी आपको इसमें से किस चीज की गंध आ रही है?”

दीदी भी मेरी तरह थोड़ा नजदीक आई- “पेशाब और पसीने की..”

दीदी की बात सुनने के बाद मैंने जीजू के लण्ड को मुँह में ले लिया और तीन-चार बार कुल्फी की तरह चूसा, चारों तरफ से अच्छी तरह चूसकर मेरे थूक से लण्ड को गीला कर दिया- “अब बताओ किस चीज की गंध आ रही है?”

मेरे कहने पर दीदी फिर से नजदीक आई और बोली- “समझ में नहीं आ रहा...”

मैं- “कैसी आ रही है?"

दीदी- “अब पहले जितनी बुरी नहीं लग रही, अच्छी लग रही है...” दीदी ने कहा।

मैंने मेरी जबान निकाली और दीदी की तरफ देखते हुये लण्ड के सुपाड़े को चाटा और फिर आगे के छेद को सहलाया।

अब दीदी की आँखों में अलग सी तरस दिखने लगी थी।

मैं- “दीदी आप भी लो ना...” कहकर मैंने लण्ड को दीदी के हाथ में दे दिया।

दीदी ने लण्ड पकड़कर मेरी ही तरह उसके सुपाड़े को चूसा, थोड़ी देर ऐसे ही चूसने के बाद दीदी लण्ड को ज्यादा अंदर लेने लगी, और मैं खड़ी होकर जीजू को किस करने लगी। जीजू ने अपने दोनों हाथों से दीदी का सिर पकड़ लिया था और बड़े ही चाव से दीदी से अपना लण्ड चुसवा रहे थे। जीजू ने मुझे फिर से बैठने को कहा।

मैंने नीचे बैठकर देखा तो दीदी जीजू का पूरा लण्ड मुँह में लेकर फिर बाहर निकालती थी।

जीजू- “दोनों एक साथ चूसो...” कहकर जीजू ने दीदी के मुँह से लण्ड निकालकर अपने हाथ में पकड़ लिया और खड़े हो गये।

फिर एक तरफ से मैं और दूसरे तरफ से दीदी, हम दोनों एक साथ जीजू के लण्ड को चाटने लगीं। जीजू का स्टेमिना गजब का था, उनके मुँह से सिसकारियां निकलने लगी थीं, पर वो आउट हो जायें ऐसा लग नहीं रहा था।

मैं- “दीदी आप लण्ड के इस छेद को चाटो, जिससे जीजू की मस्ती बढ़ जाएगी...”

मेरी बात सुनकर दीदी जीजू के लण्ड के छेद को सहलाने लगी।

मैंने पूछा- “मजा आ रहा है ना दीदी?”

दीदी- “हाँ निशा। तेरे जीजू के लण्ड को खा जाने का मन हो रहा है...” दीदी ने लण्ड को काटते हुये कहा।

मैंने ऊपर जीजू की तरफ देखा तो उन्होंने मुझे होंठ फड़फड़ाकर बैंक्स कहा।

मैं और दीदी फिर से पहले की तरह जीजू के लण्ड के अलग-अलग साइड को चाटने लगीं। मुझे अब डर लग रहा था की जीजू कहीं झड़ न जायें, नहीं तो हमारा खेल सिमट जाएगा। तभी अचानक जीजू पीछे हो गये और हम दोनों के बाल पकड़कर हमारे चेहरे एक दूसरे से चिपका दिए। मेरी और दीदी की जबान जीजू के लण्ड पे थी जो ऐसा करते ही एक दूसरे की जबान से मिल गई।

जीजू- “किस करो...” जीजू ने कहा।

मैं और दीदी एक दूसरे की जीभ से जीभ सहलाने लगीं। मैंने थोड़ा आगे होकर दीदी के सिर को पकड़ लिया और उनके मुँह में मैंने मेरी जीभ डालकर पूरे मुँह का जायजा ले लिया और फिर बाहर निकालकर उनके होंठों को मेरे होंठों की गिरफ्त में लेकर चूसने लगी। थोड़ी देर चूसने के बाद मैंने इरते हुये दीदी को छोड़ा। डर था की दीदी को बुरा लगा होगा, लेकिन दीदी के मुँह पे मुश्कुराहट देखकर वो डर गायब हो गया। दीदी ने टांगों को चौड़ी । करके जीजू की कमर को पकड़ लिया था, और जीजू अपने चूतड़ों को आगे-पीछे करके दीदी की चुदाई कर रहे थे। वो बीच-बीच में झुक के दीदी का चुंबन कर रहे थे।
 
मैं उन दोनों के करीब बैठकर ध्यान से जीजू का लण्ड किस तरह से अंदर और बाहर हो रहा है, वो देख रही थी। जीजू जब लण्ड को अंदर पेलते थे, तब दीदी सरक के थोड़ा ऊपर होती थी और जब जीजू लण्ड पीछे लेते थे तब दीदी उनके साथ नीचे सरक रही थी। चुदवाना तो औरतों की तकदीर है, लेकिन इतने करीब से चुदाई देखना हर किसी के तकदीर में नहीं होता।

जीजू पहले मेरी चुदाई करना चाहते थे, और दीदी भी मेरी चुदाई पहले देखना चाहती थी। लेकिन मैंने जीजू को पहले दीदी की चुदाई करने को कहा। क्योंकि मेरे बदन की तपिस और बेकरारी के आगे जीजू ज्यादा टिकते नहीं

और दीदी की चुदाई रह जाती।

जीजू- “निशा, मीना की चूचियों को चूस..." जीजू ने कहा।

मैं तो कब से यही सोच रही थी। मुझे दीदी के उरोजों का कोई आकर्षण नहीं था, लेकिन मेरे चूसने से वो जल्दी से झड़ जाएगी ऐसा मेरा मानना था। मैंने झुक कर दीदी का दाहिना उरोज मुँह में भर लिया और बायें उरोज को सहलाने लगी। दीदी के मुँह से एक करारी सिसकी निकल गई, और उनके हाथ जो अब तक कोई काम नहीं कर रहे थे, वो मेरे बालों को सहलाने लगे।

जीजू- “मीना हर रोज से ज्यादा मजा आ रहा है ना?” जीजू ने धक्का मारने की स्पीड तेज करते हुये कहा।

दीदी- “हाँ, अनिल आया... ऐसे ही करते रहो..” दीदी ने मेरे बालों को खींचते हुये कहा।

मैंने मेरा हाथ नीचे किया और जब जीजू का लण्ड बाहर निकलता था, तब मैं दीदी की चूत के बाहरी भाग को सहलाने लगती और लण्ड अंदर आता था तब हाथ खींच लेती थी।

जीजू अब जोर-जोर से दीदी की चुदाई करने लगे और मैंने उनके मम्मों की चुसाई तेज कर दी थी। और जिस स्पीड से अब दीदी कराहने लगी थी, उससे ये लग रहा था की वो उनकी मंजिल के बहत करीब हैं।

दीदी- “आअह्ह्ह.. मैं मर गई..” कहते हुये दीदी झड़ने लगी।

मैं दीदी की निप्पल को मुँह में लेकर चूसने लगी।

जीजू- “अब तेरी बरी है मेरी रानी...” जीजू ने चहकते हुये मेरी तरफ देखकर कहा।

मैं जीजू से खड़े रहकर चुदवाना चाहती थी, लेकिन जीजू ने मुझे दीदी की तरह ही लेटने को कहा- “तुम खड़ी रहोगी तो मीना तुम्हारी चूचियां चूस नहीं पाएगी, और ऐसा डबल मजा फिर तो न जाने तुम्हें कब मिलेगा...”

जीजू की बात सही भी थी। मैं दीदी की तरह लेट गई। जीजू मेरी टांगों के बीच आकर मेरी चूत पर लण्ड रगड़ने लगे, और फिर उन्होंने लण्ड को चूत के मुँह पर रखकर धीरे से धक्का मारा। उनका लण्ड एक-दो इंच जितना अंदर गया।

मैं- “लगता है जीजू आप थक गये हैं...” मैंने मजाक करते हुये कहा।

जीजू- “नहीं रे... मैं मीना की चूत में ऐसे ही धक्का लगाता हूँ, फिर भी पूरा अंदर तक घुस जाता है। मेरे दिमाग में वही रह गया था.." जीजू ने ये कहते हुये पूरा लण्ड अंदर तक घुसेड़ दिया था।
 
मैं- “जीजू, दीदी तो कम चुदवाती हैं फिर भी उनकी चूत ज्यादा चौड़ी क्यों है?” मैंने दीदी की तरफ देखकर कहा।

दीदी हमारी बात सुनकर मंद-मंद हँस रही थी।

जीजू- “बच्चा आने के बाद कोई भी औरत की चूत भोसड़ा बन जाती है। तुझे भी बच्चा होगा ना तब तेरी चूत भी भोसड़ा बन जाएगी..." जीजू बोलते हुये झुके और मुझे किस किया।

मैं- “तो मैं बच्चा पैदा नहीं करूंगी जीजू। मैं मेरी चूत का भोसड़ा नहीं बनाना चाहती...” मुझे मजा आ रहा था चुदवाते हुये ऐसी बातें करने में।

दीदी- “क्यों तुझे बच्चे नहीं पसंद?” दीदी मेरी बात सच मान बैठी।

मैं- “मैं तो मजाक कर रही हैं दीदी, बच्चे के बिना तो हमारा औरत होने का अहसास ही पूरा नहीं होगा...” मैं बहुत कुछ कहना चाहती थी, लेकिन उससे कहीं जीजू का जोश कम न हो जाय इसलिए मैं ज्यादा न बोली।

उसके बाद जीजू ने खूब जोरों से और मस्ती से मेरी चुदाई शुरू की। दीदी ने मेरे मम्मे चूसे साथ में कई बार होंठ भी चूसे, दस मिनट की चुदाई के बाद मैं और जीजू एक साथ झड़े।

सुबह उठते ही मम्मी का फोन आ गया- “कितने बजे आ रही हो?”

मैं- “दस बजे तक आ जाऊँगी...” मैंने कहा जो दीदी सुन रही थी।

तब दीदी ने पूछा- “किसका फोन है?”

मैं- “मम्मी का...” मैंने जवाब दिया।

दीदी- “मुझे दो..” कहते हुये दीदी ने मोबाइल मेरे हाथ से ले लिया और मम्मी को कहने लगी- “मम्मी, निशा और दो दिन यहीं रुकेगी...”

लगता था मम्मी ना बोल रही थी, क्योंकि दीदी उन्हें समझा रही थी। दीदी के गोरे चेहरे पे कल से ज्यादा कोमलता और चमक आज दिख रही थी। कोई अलग सा आनंद और पूर्ण संतोष झलक रहा था उनके चेहरे पर। कुल मिलकर वो मुझे आज जितना खूबसूरत कभी नहीं दिखी थी।

दीदी- “तुम्हें जाना होगा निशा, मम्मी को बुखार है...” दीदी ने मोबाइल मेरे हाथ में देते हुये कहा।

दीदी और जीजू में से किसी की भी इच्छा नहीं थी मुझे जाने देने की। लेकिन मैं जाना चाहती थी, क्योंकि मैं दूसरे दिन सुबह उनसे ये जानना चाहती थी की उन्होंने मेरे बिना भी सेक्स किया है की नहीं?

* *

घर पहुँचते ही मैंने मम्मी को आराम करने को कहा और मैं काम में लग गई। थोड़ी देर बाद खुशबू आई पर मुझे किचन में देखकर वापस चली गई। दोपहर को फ्री होते ही मैंने नीरव को मोबाइल किया, कोई खास बात नहीं हुई। फिर मैं सब्जी लेने गई और जब वापस आ रही थी तब मेरे पास एक चमचमाती गाड़ी आकर रुकी। मैंने गाड़ी की तरफ देखा तो अंदर अब्दुल बैठा हुवा था।

मैंने उस पर से नजर हटाई और आगे निकलने लगी।

अब्दुल- “अइ लड़की..” उसने आवाज लगाई।

मैंने ध्यान नहीं दिया।

अब्दुल- “सुन लड़की, ये बात तेरी अम्मी की है..”

मैं ठहर गई उसकी बात सुनकर।

अब्दुल- “दो दिन में मेरे नीचे लेटने के लिए आ जा, नहीं तो ऐसा खेल खेलूंगा की तुम्हारी अम्मी और अब्बू मर जाएंगे..."

मैं- “क्या करोगे तुम?” मुझे गुस्सा आ गया उसकी बात सुनकर।

अब्दुल- “तुम्हारी अम्मी को बदनाम कर दूंगा, सबको बता दूंगा की वो मेरी रखैल है। अगर दो दिन के अंदर तुम मेरे नीचे सोने नहीं आई तो यही करूंगा...” कहकर अब्दुल निकल गया और मुझे गहरी दुविधा में डाल गया।

*
 
शाम को मम्मी को लेकर मैं डाक्टर के पास गई, मम्मी ना ना कह रही थी की ज्यादा बुखार नहीं है। लेकिन मैं जिद करके मम्मी को डाक्टर के पास ले गई। वापस आकर हम लिफ्ट के अंदर घुसे और जाली बंद करके मैं।

तीसरे माले का बटन दबा ही रही थी की तभी आवाज आई- “लिफ्ट लिफ्ट...”

मैंने फिर से जाली खोल दी। मैंने उस तरफ देखा जहां से आवाज आई थी, मुझे मेरी आँखों पर विस्वास नहीं हो रहा था, सामने से पप्पू आ रहा था। उसने लिफ्ट के पास आकर मुझे देखा, तो मैंने नफरत से उस पर से नजर हटा दी।

मम्मी- “अंदर आ जाओ बेटे...” मम्मी शायद उसे पहचानती थी।

पप्पू- “मुझे काम है आंटी, मैं बाद में आता हूँ.” कहकर पप्पू वापस मुड़ गया।

मैंने जाली बंद करके बटन दबाया, पूछा- “ये यहां रहता है?”

मम्मी- “हाँ, यहीं रहता है...” मम्मी ने कहा।

मैं- “कौन से माले पे?” मैंने पूछा।

मम्मी- “सातवें माले पे। अरे याद आया तुम्हें कल मिला तो था ये, तुम भूल गई?” मम्मी ने कहा।

मैं- “मुझे कब मिला?”

मम्मी- “ये प्रेम था, तुम कल पूछ तो रही थी इसके बारे में..." मम्मी ने याद दिलाया।

मम्मी की बात सुनकर मैं सन्न हो गई की ये प्रेम था और मेरे हिसाब से ये पप्पू था। मुझे अब जल्दी से खुशबू को मिलना था और उसे बताना था की उसका प्रेम क्या है? मैं रसोई कर रही थी लेकिन मेरा ध्यान पप्पू पे था, मुझे लग रहा था की पप्पू उस दिन मुझसे झूठ बोलकर निकल गया था, या फिर वो खुशबू से प्यार का नाटक । कर रहा है। दोनों में से एक बात ही सच्ची हो सकती है, वो भी फाइनल था। कुछ बता सकती थी तो खुशबू बता सकती थी। लेकिन वो मुझे देखकर भड़कती थी। कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

तभी मेरा मोबाइल बजा, देखा तो रीता का फोन था।

हेलो..” मैंने कहा।

रीता- “क्यों मुझे याद किया था निगोड़ी...” रीता की आवाज आई।

मैं- “मैं यहां आई हूँ, तुम कहां थी दो दिन?” मैंने कहा।

रीता- “तुम यहां हो और मैं तेरे घर से करीब हूँ, दो मिनट में आई...” कहकर रीता ने काल काट दी। दस मिनट में ही रीता घर पे आ गई।

हम दोनों ने एक दूसरे को बाहों में भर लिया और फिर अकेले में अंदर जाकर बैठे।

रीता- “बता निगोड़ी, तेरे मिट्ठू मियां कैसे हैं?” रीता ने पलंग पर बैठते हुये पूछा।

मैं- "नीरव मुंबई में है...” मैंने बाजू में बैठते हुये कहा।

रीता- “मुझे मालूम है कि तू ही आएगी, जीजू को तू ऐसे तो छोड़ती ही नहीं...”

मैं- “मैंने तुम्हें फोन किया था, बंद आ रहा था..” मैंने उसे फोन किया था वो जताने के लिए कहा।

रीता- “मुझे मालूम है, मिस काल के मेसेज आते हैं मेरे मोबाइल में, मैं भी मुंबई गई थी, मोबाइल भूल गई थी। यहां..." रीता ने कहा।
 
मैं- “तू कब हूँढ़ रही है मिट्ठू मियां?”

रीता- “वोही देखने मुंबई गई थी यार..”

मैं- “देखा, पसंद आया?”

रीता- “निगोड़ी, वो लड़के ने मेरा दिल चुरा लिया है, पहली ही नजर में मैं उसके प्यार में पड़ गई..” रीता के चेहरे पे प्यार का खुमार था।

मैं- “तो फिर कर लो शादी...”

रीता- “उसने अभी हाँ नहीं कहा...” रीता ने निराशा से कहा।

मैं- “ना भी तो नहीं कहा ना... वो हाँ ही कहेगा मेरी इस कुँवारी चुलबुली दोस्त को...” मैंने मुश्कुराते हुये कहा।

रीता- “कुँवारी तो तू है..” रीता ने कहा।

मैं- “मैं... वो कैसे?”

रीता- “इस तरफ देखो..” रीता ने मिरर की तरफ हाथ करके कहा- “आज भी तुम कोई प्यारी सी गुड़िया जैसी दिखती हो, मैं लड़का होती ना तो तुझे भगा ले जाती...”

मैं- “मैं नहीं आती तो?”

रीता- “तो मैं तुझे उठा ले जाती...” कहकर रीता जोर-जोर से हँसने लगी।

मैं- “कैसे हैं अमित भैया और भाभी?”

रीता- “अच्छे हैं, मैं चलती हूँ, कब घर आ रही हो?"

मैं- “खाना खाए बगैर जाने नहीं देंगी...” मैंने कहा।

रीता- “नहीं यार मुझे देरी हो रही है."

मैं- “चल, फटाफट बना देती हूँ, खाना खाकर ही जाना...”

रीता- “ओके बाबा, मिलकर बनाते हैं, जल्दी बन जाएगा...”

उसके बाद मैंने और रीता ने जल्दी से खाना बनाया और फिर खाया। खाना खाते हुये मैंने उससे विजय के बारे में पूछा- “विजय तुम्हें परेशान तो नहीं करता ना?”

रीता- “वो तो फिर से कहीं भाग गया है, दिखता नहीं आजकल...”

मैं- “फिर भी ध्यान रखना...” मैंने उसे चेतावनी देते हुये कहा।

रीता- “आए तो सही, फिर मालूम पड़े कि मुझे नहीं उसे ध्यान रखना पड़ेगा..” रीता ने अपनी धुन में कहा। खाना खतम होते ही रीता निकल गई। उसे देरी हो रही थी।

*

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रात के दस बजे थे, मम्मी-पापा अंदर थे। मैं बाहर बैठी टीवी देख रही थी, तभी मैंने पप्पू को नीचे उतरते देखा, वो मोबाइल में देखता हुवा नीचे उतर रहा था। मुझे लगा की शायद वो खुशबू को मिस काल मार रहा होगा, नीचे बुलाने के लिए। मैंने मेरे घर का दरवाजा थोड़ा सा खुल्ला रखकर बंद कर दिया। मेरा अंदाजा सही निकला। दो मिनट के बाद खुशबू बाहर निकली, उसने चारों तरफ देखकर मुड़कर दरवाजे को बंद किया, और फिर मुड़ी तो मैंने मेरे घर का दरवाजा खोल दिया। मुझे देखकर खुशबू का चेहरा फीका पड़ गया और घूमकर उसने दरवाजा खोला और वो वापस अपने घर के अंदर चली गई।

मैं- “मैं आई मम्मी...” कहकर मैंने मेरे घर का दरवाजा भिड़ाया और सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी।

सीढ़ी उतरते हुये मैंने मेरा चेहरा न दिखे उतना दुपट्टा सिर पे ओढ़ लिया। मैं जल्दी-जल्दी सीढ़ियां उतर रही थी, मुझे डर था की कहीं खुशबू पप्पू को मोबाइल करके कह न दे की मैं नहीं आ रही। पहला माला आया, उसके बाद मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई। मैं एक-एक सीढ़ी गिन-गिन के उतरने लगी।

ग्राउंड फ्लोर पहुँचने में पाँच सीढ़ी बाकी थी तभी पप्पू ने मुझे खींचा, मैंने उसे देखा तो नहीं था पर मेरा अंदाजा था, और कहा- “कितनी देर लगा दी?”

मुझे जहां पप्पू ने अंदर खींच लिया था वो सीढ़ी के नीचे का खाली हिस्सा था, जिस पर दरवाजे भी लगाए हुये थे। पप्पू ने दरवाजा बंद करके लाइट चालू की और मैंने मेरे चहरे पर से दुपट्टा हटाया। दुपट्टा हटते ही मुझे देखकर पप्पू अपने आपको ठगा सा महसूस करने लगा, और फटी-फटी आँखों से मुझे देखता ही रहा।

मैं- “क्यों पप्पू, यहां क्या कर रहे हो?” मैंने मेरी आँखें नचाते हुये कहा।

पप्पू- “आंटी, आप मुझे परेशान क्यों कर रही हो?" पप्पू ने डरते हुये कहा।

मैं- “मैं तुम्हें परेशान कर रही हैं, या तुम मुझे कर रहे हो?”

पप्पू- “मैं आपको परेशान कर रहा हूँ? कैसे?”

मैं- “तुम मुझसे झूठ क्यों बोले की तुम ‘गे' हो...” मैंने गुस्से से कहा।

पप्पू- “मैं आपसे झूठ क्यों बोलूंगा? कोई मर्द झूठ क्यों बोले की वो 'गे' है? मैं सच में 'गे' हूँ..." कुछ हद तक पप्पू की बात ठीक भी थी।

मैं- “तुम झूठ बोल रहे हो...”

पप्पू- “मैं सच बोल रहा हूँ आंटी...”

मैं- “तुम्हें लड़कियां नहीं पसंद?”

पप्पू- “हाँ, मुझे लड़कियां नहीं पसंद...”

मैं- “तो फिर खुशबू के साथ प्यार का नाटक क्यों करते हो?”

मेरी बात सुनकर पप्पू ऐसे भड़का जैसे मैंने उसके पैरों के पास बाम्ब फोड़ा हो।

पप्पू- “कौन खुशबू? मैं नहीं जानता किसी खुशबू को.” पप्पू ने थोड़ी देर बाद संभाल के कहा।

मैं- “वोही खुशबू जो समझकर तूने मुझे अंदर खींचा, तीसरे माले पे रहती है वो खुशबू...” मैंने कहा।

पप्पू- “सच में आंटी, मैं नहीं जानता किसी खुशबू को, मुझे लड़कियों में कोई इंटरेस्ट नहीं..." पप्पू ऐसे बात कर रहा था की उस पर विस्वास करने का दिल हो रहा था।

मैं- “मैं अभी ही खुशबू को बुलाकर लाती हूँ, उसके सामने तुम ये कहना...” मैंने दरवाजा खोलने की चेष्टा करते हुये कहा।

पप्पू- “नहीं प्लीज़... आंटी, उसे बुलाकर आप मेरी इज्ज़त का फालूदा कर देंगी...” पप्पू ने दरवाजा पकड़ते हुये कहा।

मैं- “वो जो भी हो, तुम उसे फैसा रहे हो, तुम्हें उसकी माफी तो मांगनी ही पड़ेगी, मैं बुला लाती हूँ..” मैंने कहा।
 
पप्पू- “प्लीज़.. आंटी..”

मैं- “ये प्लीज़.. प्लीज़... क्या लगा रखा है? हटो तुम...”

पप्पू- “समझने की कोशिश करो आंटी...” पप्पू गदगद हो गया।

मैं- “मैं किसी लड़की की जिंदगी बर्बाद नहीं होने देंगी..” मैंने जोर से कहा।

पप्पू- “उसकी जिंदगी बर्बाद नहीं हो रही, मैं उसे प्यार करता हूँ..” पप्पू बोला।

मैं- “पर तू तो 'गे' है रे..” मैंने नाटकिय अंदाज में कहा।

पप्पू- "मैं 'गे' नहीं हूँ..”

मैं- “तुम 'गे' ही हो...”

पप्पू- “मैं नहीं हूँ...”

मैं- “मैंने देखा था उस दिन तुम्हारा खड़ा भी नहीं हो रहा था, और तुम भी तो कहते हो...” मैंने कहा।

पप्पू- “मैं झूठ बोल रहा था...” ।

मैं- “क्यों? क्यों झूठ बोल रहे थे?”

पप्पू- “आपके करण...” तीखी आवाज में पप्पू बोला।

मैं- “मेरे करण क्यों?”

पप्पू- “आप मुझसे सेक्स करना चाहती थी इसलिए...”

मैं- “उसमें ऐसा झूठ बोलने की क्या जरूरत थी? मैं अच्छी नहीं लगती हूँ क्या?”

पप्पू- “आप तो परियों की रानी जैसी लगती हो, लेकिन मैं खुशबू को धोखा देना नहीं चाहता था.." पप्पू ने कहा।

मैं- “पर तुम्हारा खड़ा क्यों नहीं हुवा था?”

पप्पू- “डर के मारे, मैं डर गया था...”

मैं- “मैं कैसे मान हूँ की तुम अभी जो कह रहे हो वो सच है?” मैंने विस्फारित नयनों से कहा।

पप्पू- “मैं कसम खाता हूँ खुशबू की.” पप्पू ने दयनीय आवाज में कहा।

मैं- “मैं नहीं मानती, मैं जा रही हूँ खुशबू के पास...” कहते हुये मैं दरवाजा खोलकर बाहर निकलने लगी।

तब पप्पू ने मुझे अंदर खींचा तो मैं थोड़ी वापस अंदर आई, पप्पू ने दरवाजा बंद कर दिया और मुझे धक्का मारकर दीवार पे सटा दिया और मेरे चेहरे से नजदीक मुँह करके बोला- “मैंने कहा ना मैं ‘गे' नहीं हूँ, मैं खुशबू के बिना जी नहीं सकता...” उसकी आँखें आग उगल रही थी।
 
पप्पू- “मैं कसम खाता हूँ खुशबू की.” पप्पू ने दयनीय आवाज में कहा।

मैं- “मैं नहीं मानती, मैं जा रही हूँ खुशबू के पास...” कहते हुये मैं दरवाजा खोलकर बाहर निकलने लगी।

तब पप्पू ने मुझे अंदर खींचा तो मैं थोड़ी वापस अंदर आई, पप्पू ने दरवाजा बंद कर दिया और मुझे धक्का मारकर दीवार पे सटा दिया और मेरे चेहरे से नजदीक मुँह करके बोला- “मैंने कहा ना मैं ‘गे' नहीं हूँ, मैं खुशबू के बिना जी नहीं सकता...” उसकी आँखें आग उगल रही थी।

मैंने कुछ बोले बिना उसके चेहरे को मेरे दो हाथों के बीच ले लिया और उसके होंठ पर मेरे होंठ रख दिया, उसके होंठों का रसपान करने लगी। पप्पू ने ना तो विरोध किया, ना रिस्पोन्स दिया।

मैंने मेरा हाथ नीचे किया और उसके पैंट का बक्कल और चैन खोल दिए फिर हाथ अंदर डालकर पप्पू के लण्ड को सहलाने लगी। कुछ ही सेकंडों में पप्पू गरम होने लगा, उसका लण्ड बड़ा होने लगा और वो मेरे होंठों को चूसने लगा। ज्यादा समय और जगह नहीं थी हमारे पास, तो मैंने मेरी सलवार का नाड़ा खोल दिया और सलवार नीचे गिर गई।

फिर मैंने पप्पू का लण्ड पकड़ा और मेरी चूत पे उसे घिसने लगी। फिर उसे चूत के होंठ पर रखा

और पप्पू को धक्का मारने को कहा। दो-तीन धक्कों में ही पप्पू का लण्ड पूरा अंदर घुस गया।

मैं- “पहली बार है?” मैंने पप्पू से पूछा।

पप्पू ने सिर हिलाकर 'हाँ' कहा।

मैं- “बस ऐसे धक्के लगाते रहो...” कहकर उसके चूतड़ों को पकड़ लिया और उसके धक्कों के साथ खींचने लगी।

मैंने मेरी जबान निकाली और पप्पू को उसे चूसने को कहा। पप्पू मेरी जबान चूसते हुये मेरे मम्मों को कपड़ों के साथ दबाते हुये मुझे चोदने लगा। मैं उसके चूतड़ों को पीछे से पकड़ रखी थी, क्योंकि जल्दी-जल्दी करने की लय में उसका लण्ड बाहर निकल जाता था। पहली बार था उसका, उसे अभी कैसे करना है, वो आता नहीं था साथ में वो बहुत उत्तेजित हो गया था। हम दोनों नौ-दस मिनट में ही हमारी चरमसीमा पर पहुँच गये, क्योंकी उसके लिए पहली बार था और मैं भी उसका पहली बार है यही सोचकर हर रोज से कम समय में झड़ गई।

दूसरे दिन चाय बनाते हुये मुझे चुदाई खतम होने के बाद पप्पू जिस तरह से रोया था, वो याद करके मुझे हँसी आ रही थी। झड़ने के थोड़ी देर बाद मैंने पायजामा ऊपर किया और फिर नाड़ा बँधा, तब तक पप्पू ने भी पैंट पहन लिया था। मैं पप्पू की तरफ देखते हुये मुश्कुराई तो उसकी आँखें डबडबा गईं।

मैं- “क्या हुवा?” मैंने पूछा।

पप्पू- “मैंने खुशबू को धोखा दिया...” कहते हुये पप्पू फफक-फफक करके रोने लगा।
 
उसका वर्ताव देखकर मुझे हँसी आ रही थी, साथ में उसपर दया भी आ रही थी। थोड़ी देर रोने के बाद वो शांत हुवा तो मैंने उससे पूछा- “बहुत प्यार करते हो खुशबू से?”

पप्पू- “हाँ..” कहकर वो नीचे जमीन पर बैठ गया।

मैं भी उसके बाजू में बैठ गई और फिर पूछा- “तुम्हारे घरवालों को मालूम है?”

पप्पू- “नहीं...”

मैं- “तुम्हें मुस्लिम लड़की से शादी करने देंगे तुम्हारे घर वाले?"

पप्पू- “हाँ नहीं कहेंगे."

मैं- “खुशबू के घरवाले मान जाएंगे?”

पप्पू- “वो भी नहीं मानेंगे...”

मैं- “तो तुम लोग क्या करोगे?”

पप्पू- “भाग जाएंगे...”

मैं- “डर नहीं लगेगा?"

पप्पू- “खुशबू डर रही है, मैं तो किसी से नहीं डरता...”

मैं- “खुशबू के बाप से भी नहीं?”

पप्पू- “नहीं अब्दुल चाचू से भी नहीं...”

मैं- “वो तो गुंडा है."

पप्पू- “मैं प्यार करता हूँ खुशबू से, किसी से नहीं डरता...”

मैं- “खुशबू के पापा क्या करते हैं?”

पप्पू- “वसूली करते हैं."

मैं- “वसूली... वो क्या?”

पप्पू- “कोई पैसा न देता हो तो वो दिला देता है, अब्दुल चाचू के साथ पाँच-छे आदमी काम करते हैं, पोलिस वाले भी उनसे डरते हैं...”

मैं- “तेरी लाइफ में तो पंगे ही पंगे है, पप्पू...” मैंने इतना कहा और फिर रुक के फिर से कहा- “ओके, आज से हम फ्रेंड..” और मैंने मेरा हाथ आगे किया।

पप्पू कुछ देर तक ऐसे ही खामोश बैठा रहा।

मैं- “सच्चे दोस्त..” मैंने फिर से कहा।

पप्पू- “दिल से दोस्ती...” कहते हुये उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।

मैं- “कल खुशबू को मेरे पास भेजना, मैं उसे मिलना चाहती हूँ...” मैंने कहा।

पप्पू- “कह दूंगा...” इतना बोलकर पप्पू खड़ा हुवा, पहले थोड़ा सा दरवाजा खोला और बाहर देखकर पूरा खोलकर बाहर निकला।
 
मैं भी पीछे-पीछे खड़ी हुई फिर हम दोनों ग्राउंड फ्लोर पे आए और लिफ्ट में बैठे- “तुम अभी छोटे हो इसलिए । तुम्हारी जिंदगी में सेक्स से ज्यादा प्यार की अहमियत है। मेरी उमर के होगे ना तब प्यार से ज्यादा सेक्स की जरूरत महसूस करोगे..” मैंने इतना कहा तब तक तीसरा माला आ गया था, तो मैं जाली खोलकर बाहर निकल गई।

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मम्मी रूम में थी तब मैंने दीदी को फोन लगाया- “हेलो...”

दीदी- “हाय निशु..” दीदी की आवाज में गजब की मस्ती थी।

मैं- “कैसी गई रात?” दीदी की आवाज सुनकर मुझमें भी वो मस्ती आ गई।

दीदी- “मस्त, तीन राउंड लिए.."

मैं- “तीन बार चोदा तुझे जीजू ने...” दीदी की बात सुनकर मैं इतना खुश हो गई की मैं खुल्लम खुल्ला बोल गई।

दीदी- “हाँ, बहुत मजा आया..”

मैं- “और क्या-क्या किया?”

दीदी- “69 किया..."

मैं- “वो क्या दीदी?” मैं दीदी के मुँह से खुल्ला सुनना चाहती थी।

दीदी- “हम दोनों ने एक दूसरे के अंग को चूसा...”

मैं- “मैं समझी नहीं दीदी...”

दीदी- “मैंने अनिल का लण्ड चूसा और उसने मेरी चूत चाटी...” दीदी ने कहा।

मैं हँसने लगीं।

दीदी- “शैतान...” दीदी ने प्यार से कहा।

मैं- “मुझे शैतान क्यों बोला? मैं आपसे नहीं बोलूंगी..” मैंने बच्चों की तरह कहा।।

दीदी- “भूल हो गई माफ कर दो...” दीदी मजाक में इतना बोली, पर आगे उनकी आवाज गंभीर हो गई- “निशा तुम मुझसे छोटी हो, लेकिन तूने बड़ी बहन के फर्ज निभाए हैं..”

मैं- “छोड़ो दीदी ऐसी बातें। मुझे तो बस आप लोगों की जिंदगी में खुशियां चाहिए..”
 
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