“मैं क्या कुछ कर सकती हूँ इसे जानने की आज तक किसी ने कोशिश ही कब की है। मुझसे किसी ने ऐसे जटिल काम लिये ही कब हैं। जिसने भी मोहिनी को पाया, बस शराब, दौलत, औरत के चक्कर में फँसा रहा और यही छोटे-छोटे काम मुझसे लेता रहा। किसी ने मेरी ताकत देखी ही कब है।
“हाँ...राज! दुनिया में कुछ ऐसी चीजें हैं जो मैं नहीं कर सकती। परन्तु मेरी भी अपनी सीमाएँ हैं और उन सीमाओं में रहकर मैं सब कुछ कर सकती हूँ। मैं क़त्ल नहीं कर सकती परन्तु करवा सकती हूँ। मैं जिसके चाहे दिमाग को अपने अधीन बना सकती हूँ। इन सब कामों के लिये जरुरी है कि मुझे उसके सिर पर जाना पड़ता है। मैं जाप करने वाले किसी ऋषि-मुनि, मुल्ला–पादरी या तांत्रिक के मण्डल में नहीं जा सकती। परन्तु मैं यह बता सकती हूँ कि कौन कहाँ और कब जाप कर रहा है।
“तुम्हें प्राप्त करने के लिये मैं अब किसी को जाप नहीं करने दूँगा मोहिनी।”
“राज!” तुम बहुत भोले हो, “मेरे भोले राजा, इस दुनिया में जिसमें तुम जीते हो, ब्रह्माण्ड में यही एक अकेली दुनिया नहीं है परन्तु उन सब पर कुछ न कुछ पाबंदियाँ हैं। तुम इन गहरी बातों को नहीं समझ सकते। जंगलों में तपस्या करने वाले ऋषि-मुनियों, साधू-संतों को तुम क्या समझते हो ? उनसे पूछो, मोहिनी क्या चीज है ? किस दुनिया में रहती है ? तांत्रिक से पूछो, कंकालनियाँ, योगनीयाँ क्या होती हैं ? क्यों उन्हें सिद्ध किया जाता है ? ऐसी कई अदृशय दुनिया हैं राज जिसके बारे में जानने के लिये और जिसमे झाँकने के लिये बड़े-बड़े तप किये जाते हैं। इस समय मोहिनी तुम्हारी दासी है, तुम्हारी कनीज है और जो तुम अपनी कनीज को हुक्म दोगे वह बजा लाएगी। हुक्म करो मेरे आका, कनीज आपके सामने हाज़िर है।”
मैं कुछ क्षण तक मौन रहा। कभी-कभी मोहिनी ऐसी बातें करती थी जो बहुत उलझी हुई होती थी। इसलिए कहता हूँ कि वह मेरे लिये हमेशा एक रहस्यमय पहेली बनी रही।
“तो फिर सुनो कनीज, मेरी बांदी, मेरी दासी, मेरी जान! मेरा सबसे पहला हुक्म यह है कि त्रिवेणी दास को छुड़ा लो।”
“जो हुक्म आका।” मोहिनी ने अदब से लखनवी अंदाज में झुकते हुए कहा, “कल सुबह त्रिवेणी को अदालत में पेश किया जायेगा। उसी समय नया हत्यारा अदालत में भेज दूँगी जो अपराध स्वीकार कर लेगा और नया हत्यारा त्रिवेणी का नौकर रामदास होगा।”
“लेकिन पिस्तौल पर उँगलियों के निशान।”
“तुम देखते रहो, मोहिनी क्या करती है। अच्छा, अब मैं चलती हूँ। मुझे बहुत सारे काम करने हैं।”
फिर मोहिनी एक छिपकली की तरह मेरे सिर से रेंगती हुई नीचे उतर गयी।
फिर शाम हो गयी। रात घिर आई। मैं काफी देर तक होटल के टेरेस पर टहलता रहा। भविष्य की कल्पनाओं में खोया रहा। डिनर के बाद मैं कमरे में सोने आया। मोहिनी अभी तक नहीं लौटी थी। मैं बिस्तर पर लेटकर सो गया। अगली सुबह मेरी आँख खुली तो मैंने कल्पना के झरोखे में मोहिनी को देखा। मोहिनी अभी तक नहीं लौटी थी। मैं कुछ बेचैन हो गया।
दोपहर तक यह बेचैनी बनी रही। फिर अचानक मोहिनी के पंजो की चुभन महसूस हुई तो मैंने चौंककर देखा। मोहिनी ही थी। काफी थकी सी नजर आ रही थी जैसे उस रात भागती रही हो।
“कनीज हुक्म बजा लायी है।” मोहिनी ने कहा, “सारी रात दौड़ करनी पड़ी। अब तक मैं उनमे से कई सिरों पर चहलकदमी करती रही तब जाकर मामला सुलझा।
“पिस्तौल पर से त्रिवेणी की उँगलियों के निशान साफ किये और रामदास के इकबाली बयान दिलवाये। इंस्पेक्टर भी बड़ा हेकड़ निकल। त्रिवेणी जैसे आरोपी भला कब हाथ आते हैं। उसकी हालत भी सही करनी पड़ी तब जाकर मामला सुलझा।”
“बाद में अगर उसने बयान पलट दिए मोहिनी तो ?”
“हर मुकदमे में ऐसा ही होता है।” मोहिनी बोली, “अब तुम क्यों फ़िक्र करते हो ? चलो, आज कहीं जश्न मनाने चलते हैं।”
“जश्न नहीं मोहिनी। मुझे दूसरे बहुत काम हैं।”
“डॉली की याद आ रही है न।” मोहिनी मुस्कुरायी।
“तुम्हें कैसे मालूम ? ओह...! भला मैं भी कितना मूर्ख हूँ। यह भी कोई पूछने का प्रश्न हुआ। हाँ मोहिनी, यह बेचैनी बड़ी मुश्किल से गुजर रही है।”
“जानती हूँ लेकिन सब ठीक हो जायेगा। अब तुम चिंता न करो। फ़िलहाल तो मुझे कलवन्त की याद आ रही है।”
“कलवन्त कौर ?”
“हाँ राज! तुमने इतनी सुंदर लड़की पहले कभी न देखी होगी। त्रिवेणी उसके पीछे बड़े पंजे फाड़े था पर वह त्रिवेणी के काबू में नहीं आई थी। वह है ही ऐसी चीज। मोहिनी ने होंठ पर जुबान फेरते हुए बड़े चटखारे के साथ कहा। एक बार उसे देख लो तो तुम सब कुछ भूल जाओगे।”
“डॉली से अधिक सुंदर।”