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मैंने मोहिनी की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि उसे डॉली के आने और हमारे बीच होने वाली बात का पता कैसे चला क्योंकि उस समय तो वह खर्राटे लेकर सो रही थी।
“राज! तुम बम्बई जा रहे हो न?”
“हाँ!” मैंने अपने विचारों से चौकते हुए कहा।
“बड़ी खूबसूरत जगह है यह बम्बई भी।” मोहिनी खुशी से उछलते हुए बोली। “वहाँ हम दोनों के लिये मौज-मस्ती के सभी साधन हैं। अब तुम्हें बड़ा आदमी बनना पड़ेगा सेठ राज।”
मोहिनी से उलझना निरर्थक था। इसलिए मैंने उसकी बात सुनकर एक ठंडी साँस खींची, पत्रिका बंद करके तकिए के नीचे रखी फिर आराम करने के लिये लेट कर आँखें बंद कर लीं।
☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐☐
बम्बई आए मुझे दस दिन हो चुके थे। किसी नये शहर में आकर किसी अजनबी को जो कठिनाइयाँ पेश आती हैं, उनका अनुभव मुझे भी था। चलते समय मेरे पास दो हजार और कुछ रुपये थे इसलिए बम्बई के स्टेशन से उतरकर मैंने टैक्सी पकड़ी और सीधा ताजमहल होटल पहुँचा जिसकी गणना उस महानगर के सबसे बड़े होटलों में की जाती है। तीन दिन तक मैंने ताज में निवास किया, चौथे दिन मोहिनी के सुझाव पर पूना गया, जो भारत में रेस का सबसे बड़ा केंद्र है। मेरे पास उस समय सात सौ रुपये थे। दिखावी रख-रखाव और ठाठ-बाठ के चक्कर में मैंने तेरह सौ रुपए पानी की तरह बहा दिए थे। मुझे पूरी आशा थी कि जब तक मोहिनी का अस्तित्व मेरे सिर पर उपस्थित है। मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी। इसलिए पूना पहुँचकर मैंने रेस के अंदर एक ही दिन में हजारों रुपए बना लिये। मोहिनी के बताए घोड़ों ने मुझे एक ही दिन में मालदार बना दिया। रेस समाप्त हुई तो मैं वापिस आ गया। वह रात मैंने ताज में ही गुजारी। दूसरे दिन मोहिनी ने मुझे सुझाव दिया कि अब मुझे किसी खूबसूरत बंगले का प्रबंध कर लेना चाहिए। अंधा क्या चाहे 'दो आँख'। मोहिनी का यह सुझाव मेरी इच्छाओं के अनुरूप था। मैंने दो-चार दलालों से सम्बन्ध स्थापित किया और उसी बांद्रा क्षेत्र में एक खूबसूरत बंगले का सौदा करके उसके दाम चुका दिए और अगले दिन नये बंगले में पदार्पण कर दिया। एक महीने के भीतर मोहिनी द्वारा दिये गये सुझावों के द्वारा मेरे पास इतना धन आ गया कि मैंने अपने लिये एक खूबसूरत कार खरीद ली। बंगले में दो नौकर भी रख लिये और बंगले को हर प्रकार के आधुनिक सामान से सजा लिया। अब मैं राज कुमार से कुँवर राज बन चुका था।
रेस के अलावा अब मैंने सट्टा खेलना भी प्रारंभ कर दिया था। बड़े-बड़े होटलों में जाकर जुआ खेलना तो मेरा प्रिय मनोरंजन बन चुका था। कुल मिलाकर मैं जिस काम में भी हाथ डालता, वारे-न्यारे हो जाते। दो दिन के अंदर मेरा बैंक बैलेंस एक लाख तक जा पहुँचा। लेकिन यह सारी रकम मैंने एक बैंक में नहीं रखी। मोहिनी के सुझाव पर मैंने विभिन्न बैंकों से अपना अलग-अलग अकाउंट खोल दिया था। लेकिन जितने रुपए मेरी जेब में आते-जाते थे, मेरी भूख बढ़ती जाती थी। मैं जल्दी ही बड़ा आदमी बनना चाहता था इसलिए अब मैंने मोहिनी की खुशामद कुछ ज्यादा कर दी थी। विचित्र बात थी कि जितनी अधिक मेरी खुशामद बढ़ती मोहिनी की चंचलता बढ़ती जाती। वह मुझे रेस के घोड़े बताने में फिर दिलचस्पी लेने लगी। लेकिन अब तक जो रकम मैंने प्राप्त की थी उसके हिसाब से मेरे दिन बदल गये थे।
मैं अपने सभी छिपे हुए शौक पूरे कर रहा था। दौलत के अम्बार ने मुझे पागल बना दिया था। मुझे अब हर दिन नया और हर रात नयी रात मालूम पड़ती थी। मैं नित नयी चीजें खरीदता और अनोखे शौक पूरे करता। अब मुझमें घमंड भी बहुत आ गया था। मेरी हर रात मस्ती में गुजरने लगी। हसीन लड़किया ँ मेरे निकट आने लगीं और मेरी रातों ने मुझे जीने के लिये एक नये आराम में पहुँचा दिया। अब मैं था और मस्तियाँ थी, मैं था और मेरे ख्वाबों की दुनिया थी। कुछ दिनों बाद मोहिनी के सुझाव पर मैंने अपना व्यक्तिगत इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का कारोबार भी प्रारंभ कर लिया था। जहाँ दस-बारह नौकर हर समय मेरे सामने हाथ बाँधे खड़े रहते थे। बिजनेस की आड़ मैंने इसलिए कि थी कि कोई मेरे ऊपर संदेह न कर सके। वरना मुझे कारोबार से कोई रुचि नहीं थी। उसका सारा काम ईमानदार मैनेजर करता था। मुझे अपने व्यक्तिगत शौकों से इतनी फुर्सत कहाँ थी कि मैं दफ्तर जाकर फाइलों में सिर खपाता।
हर नये हंगामों में उलझकर मैं न केवल यह भूल गया था कि मैं एक हत्या कर चुका हूँ बल्कि यह भी भूल गया था कि मैं मोहिनी के साथ एक खतरनाक वायदा भी कर चुका हूँ। यदि अब मुझे किसी की चिन्ता थी तो वह डॉली की थी। बम्बई पहुँचकर मैंने उसे अपने पते कि सूचना दे दी थी। मेरे आने के दस दिन बाद डॉली की ओर से दो पत्र मिल चुके थे। इन दोनों पत्रों में उसने अपना दिल निकालकर रख दिया था। उसने मुझे विश्वास दिलाया था कि कुछ दिनों में वह भी मेरे साथ बम्बई आ जाएगी। डॉली से एक बार मेरी फोन पर बात भी हुई थी। वह मेरे व्यवसाय की प्रगति का वर्णन सुनकर बहुत अधिक प्रसन्न हुई। दीपक की हत्या के सम्बन्ध में उसने यही बताया कि पुलिस अभी तक रहस्यमय हत्यारे की खोज नहीं कर सकी है और न ही उसका कोई सुराग मिला। यह शुभ समाचार सुनकर मैंने इत्मीनान की साँस ली।
“राज! तुम बम्बई जा रहे हो न?”
“हाँ!” मैंने अपने विचारों से चौकते हुए कहा।
“बड़ी खूबसूरत जगह है यह बम्बई भी।” मोहिनी खुशी से उछलते हुए बोली। “वहाँ हम दोनों के लिये मौज-मस्ती के सभी साधन हैं। अब तुम्हें बड़ा आदमी बनना पड़ेगा सेठ राज।”
मोहिनी से उलझना निरर्थक था। इसलिए मैंने उसकी बात सुनकर एक ठंडी साँस खींची, पत्रिका बंद करके तकिए के नीचे रखी फिर आराम करने के लिये लेट कर आँखें बंद कर लीं।
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बम्बई आए मुझे दस दिन हो चुके थे। किसी नये शहर में आकर किसी अजनबी को जो कठिनाइयाँ पेश आती हैं, उनका अनुभव मुझे भी था। चलते समय मेरे पास दो हजार और कुछ रुपये थे इसलिए बम्बई के स्टेशन से उतरकर मैंने टैक्सी पकड़ी और सीधा ताजमहल होटल पहुँचा जिसकी गणना उस महानगर के सबसे बड़े होटलों में की जाती है। तीन दिन तक मैंने ताज में निवास किया, चौथे दिन मोहिनी के सुझाव पर पूना गया, जो भारत में रेस का सबसे बड़ा केंद्र है। मेरे पास उस समय सात सौ रुपये थे। दिखावी रख-रखाव और ठाठ-बाठ के चक्कर में मैंने तेरह सौ रुपए पानी की तरह बहा दिए थे। मुझे पूरी आशा थी कि जब तक मोहिनी का अस्तित्व मेरे सिर पर उपस्थित है। मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी। इसलिए पूना पहुँचकर मैंने रेस के अंदर एक ही दिन में हजारों रुपए बना लिये। मोहिनी के बताए घोड़ों ने मुझे एक ही दिन में मालदार बना दिया। रेस समाप्त हुई तो मैं वापिस आ गया। वह रात मैंने ताज में ही गुजारी। दूसरे दिन मोहिनी ने मुझे सुझाव दिया कि अब मुझे किसी खूबसूरत बंगले का प्रबंध कर लेना चाहिए। अंधा क्या चाहे 'दो आँख'। मोहिनी का यह सुझाव मेरी इच्छाओं के अनुरूप था। मैंने दो-चार दलालों से सम्बन्ध स्थापित किया और उसी बांद्रा क्षेत्र में एक खूबसूरत बंगले का सौदा करके उसके दाम चुका दिए और अगले दिन नये बंगले में पदार्पण कर दिया। एक महीने के भीतर मोहिनी द्वारा दिये गये सुझावों के द्वारा मेरे पास इतना धन आ गया कि मैंने अपने लिये एक खूबसूरत कार खरीद ली। बंगले में दो नौकर भी रख लिये और बंगले को हर प्रकार के आधुनिक सामान से सजा लिया। अब मैं राज कुमार से कुँवर राज बन चुका था।
रेस के अलावा अब मैंने सट्टा खेलना भी प्रारंभ कर दिया था। बड़े-बड़े होटलों में जाकर जुआ खेलना तो मेरा प्रिय मनोरंजन बन चुका था। कुल मिलाकर मैं जिस काम में भी हाथ डालता, वारे-न्यारे हो जाते। दो दिन के अंदर मेरा बैंक बैलेंस एक लाख तक जा पहुँचा। लेकिन यह सारी रकम मैंने एक बैंक में नहीं रखी। मोहिनी के सुझाव पर मैंने विभिन्न बैंकों से अपना अलग-अलग अकाउंट खोल दिया था। लेकिन जितने रुपए मेरी जेब में आते-जाते थे, मेरी भूख बढ़ती जाती थी। मैं जल्दी ही बड़ा आदमी बनना चाहता था इसलिए अब मैंने मोहिनी की खुशामद कुछ ज्यादा कर दी थी। विचित्र बात थी कि जितनी अधिक मेरी खुशामद बढ़ती मोहिनी की चंचलता बढ़ती जाती। वह मुझे रेस के घोड़े बताने में फिर दिलचस्पी लेने लगी। लेकिन अब तक जो रकम मैंने प्राप्त की थी उसके हिसाब से मेरे दिन बदल गये थे।
मैं अपने सभी छिपे हुए शौक पूरे कर रहा था। दौलत के अम्बार ने मुझे पागल बना दिया था। मुझे अब हर दिन नया और हर रात नयी रात मालूम पड़ती थी। मैं नित नयी चीजें खरीदता और अनोखे शौक पूरे करता। अब मुझमें घमंड भी बहुत आ गया था। मेरी हर रात मस्ती में गुजरने लगी। हसीन लड़किया ँ मेरे निकट आने लगीं और मेरी रातों ने मुझे जीने के लिये एक नये आराम में पहुँचा दिया। अब मैं था और मस्तियाँ थी, मैं था और मेरे ख्वाबों की दुनिया थी। कुछ दिनों बाद मोहिनी के सुझाव पर मैंने अपना व्यक्तिगत इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का कारोबार भी प्रारंभ कर लिया था। जहाँ दस-बारह नौकर हर समय मेरे सामने हाथ बाँधे खड़े रहते थे। बिजनेस की आड़ मैंने इसलिए कि थी कि कोई मेरे ऊपर संदेह न कर सके। वरना मुझे कारोबार से कोई रुचि नहीं थी। उसका सारा काम ईमानदार मैनेजर करता था। मुझे अपने व्यक्तिगत शौकों से इतनी फुर्सत कहाँ थी कि मैं दफ्तर जाकर फाइलों में सिर खपाता।
हर नये हंगामों में उलझकर मैं न केवल यह भूल गया था कि मैं एक हत्या कर चुका हूँ बल्कि यह भी भूल गया था कि मैं मोहिनी के साथ एक खतरनाक वायदा भी कर चुका हूँ। यदि अब मुझे किसी की चिन्ता थी तो वह डॉली की थी। बम्बई पहुँचकर मैंने उसे अपने पते कि सूचना दे दी थी। मेरे आने के दस दिन बाद डॉली की ओर से दो पत्र मिल चुके थे। इन दोनों पत्रों में उसने अपना दिल निकालकर रख दिया था। उसने मुझे विश्वास दिलाया था कि कुछ दिनों में वह भी मेरे साथ बम्बई आ जाएगी। डॉली से एक बार मेरी फोन पर बात भी हुई थी। वह मेरे व्यवसाय की प्रगति का वर्णन सुनकर बहुत अधिक प्रसन्न हुई। दीपक की हत्या के सम्बन्ध में उसने यही बताया कि पुलिस अभी तक रहस्यमय हत्यारे की खोज नहीं कर सकी है और न ही उसका कोई सुराग मिला। यह शुभ समाचार सुनकर मैंने इत्मीनान की साँस ली।