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Fantasy मोहिनी

मैंने मोहिनी की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि उसे डॉली के आने और हमारे बीच होने वाली बात का पता कैसे चला क्योंकि उस समय तो वह खर्राटे लेकर सो रही थी।

“राज! तुम बम्बई जा रहे हो न?”

“हाँ!” मैंने अपने विचारों से चौकते हुए कहा।

“बड़ी खूबसूरत जगह है यह बम्बई भी।” मोहिनी खुशी से उछलते हुए बोली। “वहाँ हम दोनों के लिये मौज-मस्ती के सभी साधन हैं। अब तुम्हें बड़ा आदमी बनना पड़ेगा सेठ राज।”

मोहिनी से उलझना निरर्थक था। इसलिए मैंने उसकी बात सुनकर एक ठंडी साँस खींची, पत्रिका बंद करके तकिए के नीचे रखी फिर आराम करने के लिये लेट कर आँखें बंद कर लीं।

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बम्बई आए मुझे दस दिन हो चुके थे। किसी नये शहर में आकर किसी अजनबी को जो कठिनाइयाँ पेश आती हैं, उनका अनुभव मुझे भी था। चलते समय मेरे पास दो हजार और कुछ रुपये थे इसलिए बम्बई के स्टेशन से उतरकर मैंने टैक्सी पकड़ी और सीधा ताजमहल होटल पहुँचा जिसकी गणना उस महानगर के सबसे बड़े होटलों में की जाती है। तीन दिन तक मैंने ताज में निवास किया, चौथे दिन मोहिनी के सुझाव पर पूना गया, जो भारत में रेस का सबसे बड़ा केंद्र है। मेरे पास उस समय सात सौ रुपये थे। दिखावी रख-रखाव और ठाठ-बाठ के चक्कर में मैंने तेरह सौ रुपए पानी की तरह बहा दिए थे। मुझे पूरी आशा थी कि जब तक मोहिनी का अस्तित्व मेरे सिर पर उपस्थित है। मुझे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी। इसलिए पूना पहुँचकर मैंने रेस के अंदर एक ही दिन में हजारों रुपए बना लिये। मोहिनी के बताए घोड़ों ने मुझे एक ही दिन में मालदार बना दिया। रेस समाप्त हुई तो मैं वापिस आ गया। वह रात मैंने ताज में ही गुजारी। दूसरे दिन मोहिनी ने मुझे सुझाव दिया कि अब मुझे किसी खूबसूरत बंगले का प्रबंध कर लेना चाहिए। अंधा क्या चाहे 'दो आँख'। मोहिनी का यह सुझाव मेरी इच्छाओं के अनुरूप था। मैंने दो-चार दलालों से सम्बन्ध स्थापित किया और उसी बांद्रा क्षेत्र में एक खूबसूरत बंगले का सौदा करके उसके दाम चुका दिए और अगले दिन नये बंगले में पदार्पण कर दिया। एक महीने के भीतर मोहिनी द्वारा दिये गये सुझावों के द्वारा मेरे पास इतना धन आ गया कि मैंने अपने लिये एक खूबसूरत कार खरीद ली। बंगले में दो नौकर भी रख लिये और बंगले को हर प्रकार के आधुनिक सामान से सजा लिया। अब मैं राज कुमार से कुँवर राज बन चुका था।

रेस के अलावा अब मैंने सट्टा खेलना भी प्रारंभ कर दिया था। बड़े-बड़े होटलों में जाकर जुआ खेलना तो मेरा प्रिय मनोरंजन बन चुका था। कुल मिलाकर मैं जिस काम में भी हाथ डालता, वारे-न्यारे हो जाते। दो दिन के अंदर मेरा बैंक बैलेंस एक लाख तक जा पहुँचा। लेकिन यह सारी रकम मैंने एक बैंक में नहीं रखी। मोहिनी के सुझाव पर मैंने विभिन्न बैंकों से अपना अलग-अलग अकाउंट खोल दिया था। लेकिन जितने रुपए मेरी जेब में आते-जाते थे, मेरी भूख बढ़ती जाती थी। मैं जल्दी ही बड़ा आदमी बनना चाहता था इसलिए अब मैंने मोहिनी की खुशामद कुछ ज्यादा कर दी थी। विचित्र बात थी कि जितनी अधिक मेरी खुशामद बढ़ती मोहिनी की चंचलता बढ़ती जाती। वह मुझे रेस के घोड़े बताने में फिर दिलचस्पी लेने लगी। लेकिन अब तक जो रकम मैंने प्राप्त की थी उसके हिसाब से मेरे दिन बदल गये थे।

मैं अपने सभी छिपे हुए शौक पूरे कर रहा था। दौलत के अम्बार ने मुझे पागल बना दिया था। मुझे अब हर दिन नया और हर रात नयी रात मालूम पड़ती थी। मैं नित नयी चीजें खरीदता और अनोखे शौक पूरे करता। अब मुझमें घमंड भी बहुत आ गया था। मेरी हर रात मस्ती में गुजरने लगी। हसीन लड़किया ँ मेरे निकट आने लगीं और मेरी रातों ने मुझे जीने के लिये एक नये आराम में पहुँचा दिया। अब मैं था और मस्तियाँ थी, मैं था और मेरे ख्वाबों की दुनिया थी। कुछ दिनों बाद मोहिनी के सुझाव पर मैंने अपना व्यक्तिगत इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट का कारोबार भी प्रारंभ कर लिया था। जहाँ दस-बारह नौकर हर समय मेरे सामने हाथ बाँधे खड़े रहते थे। बिजनेस की आड़ मैंने इसलिए कि थी कि कोई मेरे ऊपर संदेह न कर सके। वरना मुझे कारोबार से कोई रुचि नहीं थी। उसका सारा काम ईमानदार मैनेजर करता था। मुझे अपने व्यक्तिगत शौकों से इतनी फुर्सत कहाँ थी कि मैं दफ्तर जाकर फाइलों में सिर खपाता।

हर नये हंगामों में उलझकर मैं न केवल यह भूल गया था कि मैं एक हत्या कर चुका हूँ बल्कि यह भी भूल गया था कि मैं मोहिनी के साथ एक खतरनाक वायदा भी कर चुका हूँ। यदि अब मुझे किसी की चिन्ता थी तो वह डॉली की थी। बम्बई पहुँचकर मैंने उसे अपने पते कि सूचना दे दी थी। मेरे आने के दस दिन बाद डॉली की ओर से दो पत्र मिल चुके थे। इन दोनों पत्रों में उसने अपना दिल निकालकर रख दिया था। उसने मुझे विश्वास दिलाया था कि कुछ दिनों में वह भी मेरे साथ बम्बई आ जाएगी। डॉली से एक बार मेरी फोन पर बात भी हुई थी। वह मेरे व्यवसाय की प्रगति का वर्णन सुनकर बहुत अधिक प्रसन्न हुई। दीपक की हत्या के सम्बन्ध में उसने यही बताया कि पुलिस अभी तक रहस्यमय हत्यारे की खोज नहीं कर सकी है और न ही उसका कोई सुराग मिला। यह शुभ समाचार सुनकर मैंने इत्मीनान की साँस ली।
 
ऊँची-ऊँची इमारतों वाला महानगर बम्बई। जिसे भारत का पेरिस भी कहा जाता है। मेरी हंगामाखेज जिंदगी के लिये उचित स्थान था। मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व ने मुझे इतनी जल्दी धरती से उठाकर आकाश पर बिठा दिया था कि मेरी सभी भावनाएँ मर चुकी थी। मैंने अपने घर एक उचित रकम भी भेजी थी। हाँ, मुझे डॉली याद आती थी और बहुत याद आती थी। बहुत सी लड़कियों की उपस्थिति के बाद भी मैं डॉली के खूबसूरत चेहरे को दिल से निकाल न सका। अब केवल एक ही अरमान बाकी रह गया था और वह अरमान था कि डॉली को किस प्रकार प्राप्त किया जाए? थोड़े ही समय में मैं सेठ कुँवर बन चुका था। मैं एशे-ओ-इशरत की जिंदगी गुजार रहा था। बम्बई के बड़े-बड़े सेठ मेरे अच्छे मित्र बन चुके थे। बड़े-बड़े अधिकारियों से परिचय हो चुका था। फिल्मी दुनिया के अनगिनत कलाकार भी मेरे साथी थे। मैं धीरे-धीरे बड़ा आदमी बनता जा रहा था। दिन यूँ ही गुजरते रहे।

डॉली और मेरे बीच पत्रों का क्रम जारी था। परन्तु अभी तक उसने अपने आने के बारे में कोई बात साफ-साफ नहीं लिखी थी। डॉली के पत्र मुझे बेचैन कर दिया करते थे। मेरे दिल की गहराईयों में उसके एक-एक अक्षर उतर जाते थे। दिल में एक कुरेद सी उठती थी। हालाँकि अब मुझे उसके लिये इतनी अधिक चिन्ता नहीं होनी चाहिए थी। इसलिए कि हर दिन और हर रात एक नयी डॉली मेरे इशारों पर नाचने को तैयार रहती थी।

उस रोज भी जब शाम को चौपाटी की सैर करके वापिस आया तो कमला नाम कि एक मराठी लड़की मेरे साथ थी। वह एक खूबसूरत और ठोस जिस्म की लड़की थी। उसके चेहरे पर हल्की सी मासूमियत थी। मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था कि इतनी सरलता पूर्वक वह मेरे अधिकार में आ जायेगी। वह बम्बई की खूबसूरत सुंदरियों में से एक थी; लेकिन जब मैंने उसे अपनी ओर आकर्षित करने के लिये दो-चार पुराने गुर इस्तेमाल किए तो पके आम की तरह मेरी झोली में आ गयी।

अब मैं उसे अपने साथ लिये बंगले की ओर आ रहा था। मार्ग पर मैंने कमला को बहुमूल्य उपहार खरीदकर दिए। जब कमला ने बीच मार्केट में गाड़ी रोकने के लिये कहा तो मैं समझ गया कि वह किसी खाते-पीते घराने की आधुनिक लड़की है, जिसे उपहारों में रुचि है। हाँ, तो मैंने गाड़ी खड़ी की और कमला को साथ लेकर एक दुकान के अन्दर प्रविष्ट हो गया।

“राज, तुम जानते हो वह लड़की कौन है?” उसी समय मोहिनी मेरे कान में फुसफुसाई। मुझे पता था कि मोहिनी की आवाज मेरे कानों के सिवा कोई नहीं सुन सकता। परन्तु उत्तर देते समय मेरी आवाज कमला तक अवश्य पहुँच जाती। इसलिए मैंने मोहिनी का उत्तर हाथ के संकेत से दिया। कि मैं उस लड़की के विषय में कुछ नहीं जानता।

“मैं बताती हूँ। तुम जरा सावधान रहना यह बड़ी चालाक और खतरनाक किस्म की लड़की है।”मोहिनी मुझे उसके सम्बन्ध में बताने लगी। “ इसके पिता का नाम लाला मोतीराम है। तुमने उसका नाम अवश्य सुना होगा। यह उसी की लड़की है। यह बेहद लाड़-प्यार और आजादी से बिगड़ गयी है इसका पिता बहुत बड़े सरकारी पद पर रह चुका है और बम्बई के बड़े-बड़े लोगों द्वारा दिए गये कर्जे के नीचे दबा है। शराब पीता है और माँग करता है। कमला का काम जीवनभर आवारागर्दी करना है। वास्तव में कमला उसकी नाजायज सन्तान है। मोतीराम इस भेद के खुलने के भय से कमला को मुँह-माँगी रकम देता है। और यही कारण है कि कमला अपने पिता से अलग रहती है।”मोहिनी मुझे कमला के सम्बन्ध में बड़ी लम्बी-चौड़ी बात बता रही थी। मैं उसकी बातें सुनता जा रहा था।
 
आधे घंटे के अन्दर-अन्दर कमला ने मुझसे कोई दो हजार की रकम खर्च करवा डाली थी। परन्तु मुझे यह रकम जाने की कोई चिन्ता न थी। उससे बड़ी-बड़ी रकमें तो मैं यूँ ही गवाँ चुका था। कमला को साथ लिये मैं अपने बंगले पर पहुँचा तो संयोग से उस समय मेरा कोई मुलाकाती वहाँ उपस्थित न था। मैंने कमला को अपने शयन-कक्ष में पहुँचा दिया फिर बाहर आकर अपने विशेष नौकर को हिदायत कर दी कि यदि मुझसे कोई मिलने आए तो उसे टाल दिया देना। नौकर को आवश्यक आदेश देकर मैं कपड़े बदलने अपने ड्रेसिंग-रूम में आ गया। कपड़े बदलकर में बेडरूम की ओर जा रहा था कि मोहिनी ने मुझे रोककर कहा - “राज एक अच्छी खबर सुनोगे?”

“क्या?”मैंने धीमे स्वर में पूछा। “तुम्हारी डॉली दो-चार दिन के भीतर-भीतर तुम्हारे पास आ जायेगी।”

“अच्छा! मगर तुम्हें कैसे मालूम हुआ?” मैंने आश्चर्यचकित होकर पूछा। मोहिनी जो मेरे सिर पर आलथी-पालथी मारकर बैठी थी मुस्कुराकर बोली –

“ओफ्फो! तुम यह क्यों भुल जाते हो कि मैं रहस्यमय शक्ति की स्वामी हूँ? संसार की कोई भी वस्तु, चाहे वह मुझसे हजारों मील दूर क्यों न हो, मेरी नजरों से दूर नहीं रहती।”

“तुम वास्तव में बहुत ग्रेट हो। माई डियर स्वीट मोहिनी!” मैंने मूड में आकर उत्तर दिया। मोहिनी से मैं उस जमाने में अच्छा-खासा बेतकल्लुफ़ हो गया था।

“एक बात पूछूँ?” मोहिनी ने मेरे बालों में अपनी नर्म-नर्म उंगलियाँ फेरते हुए कहा। मैं महसूस कर रहा था कि उसके होंठों पर एक चंचल मुस्कुराहट खिल रही थी।

“जो कुछ पूछना है जरा जल्दी से पूछो। तुम्हें पता है कमला मेरा इन्तजार कर रही है।” मैंने सामने दीवार को आँख मारते हुए कहा।

मोहिनी ने मेरे सिर पर एक चपत लगायी। फिर कोहनियों के बल झुककर बड़े रहस्यमय स्वर से पूछा - “तुम मेरी मौजूदगी में जो कुछ करते हो, उस पर तुम्हें शर्म नहीं आती।”

“अभी नहीं, फिर किसी समय सोचकर उत्तर दूँगा।” मैंने मोहिनी को टालने के लिये मजाक में कहा।

“कमला वास्तव में बड़ी स्वस्थ लड़की है। भरा पूरा माँसल शरीर। उसकी जवानी का उभार। उसके सुर्ख-सुर्ख गाल।” मोहिनी ने कहा।

“तो वह तुम्हें भी पसन्द है मोहिनी देवी।” मैं मुस्कुराकर बोला।

“हाँ, वह तुम्हारे पास आने वाली लड़कियों में सबसे अधिक पसंद आयी! उसके अन्दर ताजा खून है। गरम-गरम खौलता हुआ खून। खौलता हुआ वह खून जिसने उसके जिस्म को ज्वालामुखी बना दिया है।

“बहरहाल तुम जाओ। वह तुम्हारी राह देख रही है।”

“हिश!” मैंने हाथ के संकेत से उसे छेड़ते हुए कहा। फिर अपने शयन-कक्ष की ओर चला गया।
 
कमरे में प्रविष्ट हुआ तो मैंने देखा कि कमला बड़ी बेतकल्लुफी से एक सोफे पर लेटी हुई है। मुझे उस समय उसकी यह अदा बहुत पसन्द आयी। ऐसी लड़कियाँ वैसे भी मुझे बहुत पसन्द थीं। जिनमें कोई झिझक न हो। मैं मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ा और कमला के पास बैठते हुए सोफे की बगल में रखी तिपायी पर मौजूद शराब की बोतल उठा ली। मोहिनी लगातार अपनी कोहनियों पर चेहरा टिकाए ओंधी लेटी अपने पाँव हिला रही थी। मैं महसूस कर रहा था कि वह कमला को देखते हुए बुरी तरह बेचैन है, लेकिन मुझे उस समय कोई होश न था। कमला के हसीन और गुदाज जिस्म ने आज मुझे रोज की अपेक्षा कुछ अधिक ही मदहोश कर दिया था। वक्त की रफ्तार के साथ मेरा जोश और सुरूर बढ़ता रहा। कमला हर रूप से एक मॉडल लड़की थी।

कुछ देर रोमांटिक बातें कीं. इतने में मेरा लंड तो लोहे की रॉड सा सख्त हो चुका था. मैंने कमला को जफ्फी डाल ली. उसके होंठों का रस चूसने लगा.

आज उसने सलवार कमीज़ पहनी थी और नीचे ब्रा पहनी थी. मैं उसकी कमीज़ के अन्दर हाथ डाल कर उसके मम्मों से खेल रहा था. उसका हाथ भी जाने अंजाने मेरे लंड पर आ रहा था.

मैंने कमला को खड़ा किया. मैंने उसकी कमीज़ उतार दी. काले रंग की ब्रा में से उसके गोरे गोरे मम्मे ऐसे लग रहे थे, जैसे कोयले की खान से हीरे निकल रहे हों.

मैंने कमला की ब्रा को भी एक झटके से निकाल दिया. ये नजारा देखने के लिए मैंने कितना इंतजार किया था. मैं कमला के दोनों मम्मों अपने हाथों में लेकर मसलने लगा. नर्म नर्म मुलायम मुलायम मम्मों को हाथों में लेकर बहुत ज्यादा मजा आ रहा था.

फिर मैं बेड पर बैठ गया और कमला खड़ी थी. इसलिए मेरा चेहरा उसके मम्मों के सामने था. मैंने उसके मम्मे चूसने शुरू किए. दिल कर रहा था कि एक ही बार में पूरा मम्मा मुँह में डाल लूं. लेकिन बड़े होने की वजह से ऐसा हो न सका. फिर भी जितना हो सकता था, मैंने उन्हें चूसने की कोशिश की.

फिर मैं खड़ा हो गया और अपनी शर्ट और बनियान निकाल दी. मुझे बहुत मज़ा आता है, जब लड़की के नंगे चूचे मेरी नंगी छाती पर टच करते हैं. मैं कमला के होंठों और गालों पर किस कर रहा था. कमला की आहें अब तेज़ हो रही थीं.

मैंने उसकी सलवार में हाथ डाला. उसकी फुद्दी एकदम गीली हो चुकी थी. मैंने कमला को दूसरी तरफ घुमाया और पीछे से जफ्फी डाल ली. अब मैं एक हाथ से उसके मम्मे मसल रहा था और दूसरे हाथ से उसकी सलवार के अन्दर उसकी फुद्दी का दाना मसल रहा था.

कमला बस ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’ किए जा रही थी. उसकी ऐसी आवाजें मुझे उत्तेजित कर रही थीं.

मैंने उसकी सलवार का नाड़ा खोल दिया. उसकी सलवार उसके पैरों में आ गिरी. मैंने उसके पैर नीचे करके उसे बेड पर बिठाया और पैरों में से उसकी सलवार निकाल दी.

अब मैंने कमला को लेटने को बोला. वो लेट गई. उसके पैर उठाकर मैंने बेड पर रख दिए. मैंने उसकी टांगें खोल दीं.

वाह क्या नज़ारा था … गुलाबी गुलाबी फुद्दी … एकदम चिकनी … उस पर एक भी बाल नहीं था. शायद उसने आज ही अपनी झांटों को साफ़ किया था.

मुझसे रहा नहीं गया. मैंने अपने होंठों को उसकी फुद्दी के होंठों पर लगा दिए. मैं कमला की फुद्दी को ऐसे चूस रहा था, जैसे किसी कुल्फी को चूस रहा हूं. मेरे हर चुप्पे पर कमला ‘ऊऊहह … अअम्म … आआहह..’ की आवाजें निकाल रही थी.

फिर कमला ने मेरे सर को अपनी फुद्दी पर कसके दबा लिया. मुझे पता चल गया कि कमला का रस छूट गया है. अब वो थोड़ी सुस्त हो गई.

मैंने बाथरूम में जाकर अपना मुँह धोया. अपनी पैंट उतार कर मैंने वहां टांग दी. अपने लंड को अच्छी तरह धोकर मैं कमला के पास आ गया. मेरी बड़ी इच्छा थी कि मैं अपना लंड कमला के मुँह में डालूं और मज़े लूं. मगर मैंने कुछ नहीं बोला.

कमला खुद कहने लगी- अब मेरी बारी है.

जब मैंने अपना लंड उसके मुँह के पास किया तो वो पीछे हट गई. वो बोली- इसको मेरी फुद्दी में मत डालना. ये तो बहुत मोटा और लम्बा है. मेरी फुद्दी का छेद तो बहुत छोटा है. अगर यह लंड मेरे उस छोटे से छेद में गया, तो मेरी तो फट जाएगी.

मैंने उसे हौसला दिया- ऐसा कुछ नहीं होगा. मुझ पर यकीन कर.

वो मान गई. बड़े इत्मीनान से उसने मेरे लंड को अपने हाथों में पकड़ा और अपने मुँह डाल लिया. वो मेरे लंड को धीरे धीरे अन्दर-बाहर करने लगी. वो मेरे लंड को अन्दर तक लेकर जा रही थी. वो एक सधी हुई गश्ती की तरह मेरा लंड चूस रही थी.

अब मेरा लंड उसकी फुद्दी में जाने को उतावला हो गया था. इसलिए मैंने उसके मुँह से अपना लंड निकाल लिया.

मैंने कमला से पूछा- इतना अच्छा लंड चूसना कहां से सीखा?

वो शरमाते हुए बोली कि हम कभी कभी पोर्न वीडियो देखती हैं, वहीं से ये सब सीखा.

फिर मैंने उसे बेड पर सीधा लिटा दिया. बड़े प्यार से मैंने उसकी टांगों को खोला. मैंने जब उसकी फुद्दी में उंगली डाली, तो मुझे पता चल गया था कि उसकी फुद्दी बहुत टाईट है. इसलिए अपना लंड डालने से पहले मैंने अपने जीभ पर बहुत सारा थूक लगाया और उसकी फुद्दी को अन्दर तक गीला कर दिया.
 
फिर मैं उसकी टांगों को ऊपर उठाकर अपने लंड को उसकी फुद्दी पर सैट करने लगा. मैंने अपने लंड को उसकी फुद्दी के छोटे से छेद पर सैट किया. ऊपर ऊपर से थोड़ा सा रगड़ने के बाद मैंने लंड को अन्दर डालने की कोशिश की. उसकी फुद्दी बहुत टाईट थी. इसलिए मुझे मज़ा भी उतना ज्यादा आने वाला था. धीरे धीरे करके मैंने अपने लंड का अगला हिस्सा उसकी फुद्दी में डाल दिया.

मैंने कमला के चहरे को देखा. दर्द को उसके चेहरे पर साफ देखा जा सकता था. मगर उसने चीख नहीं मारी. मैं उसकी टांगों और जांघों को चूम रहा था. धीरे धीरे वो नार्मल हुई. मैंने बड़े प्यार से धीरे धीरे अपना लंड फुद्दी में डालता गया. वो भी धीरे धीरे दर्द सहते गई.

धीरे धीरे करके मेरा पूरा लंड उसकी फुद्दी में जा चुका था. ऐसा लग रहा था जैसे मेरे लंड को किसी ने जोर से दबा रखा हो. कमला की फुद्दी बड़ी टाईट थी. कमला के नार्मल होने पर मैं धीरे धीरे लंड को फुद्दी के अन्दर बाहर करने लगा. जैसे जैसे मेरा लंड अन्दर बाहर आ जा रहा था, मेरा मज़ा बढ़ता जा रहा था

इतनी टाईट फुद्दी थी और इतना मज़ा आ रहा था कि क्या बताऊं.

थोड़ी देर बाद कमला को भी मज़ा आने लगा. वो मस्त होकर ‘ऊऊम्म आहहहह हम्म’ कर रही थी. मैं घस्से पे घस्सा मारे जा रहा था. हम दोनों चुदाई के आनन्द में डूबे जा रहे थे.

तभी कमला ने एकदम से मुझे नीच बेड पर गिरा दिया और मेरे ऊपर आ गई. मेरे लंड को अपनी फुद्दी पर सैट करके उसके ऊपर बैठ गई. अब उसकी फुद्दी गीली हो चुकी थी, तो लंड को अन्दर जाने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई.

कमला अपनी फुद्दी और मेरे लंड पर लगा खून देखकर बिल्कुल भी नहीं घबराई. कमला मेरे लंड पर बैठ कर ऊपर नीचे होने लगी. मैं भी थोड़ा सा ऊपर आकर उसके मम्मों को चूसने लगा. मुझे तो बहुत मज़ा आ रहा था. कमला की बॉडी लेंग्वेज से पता चल रहा था कि वो भी स्वर्ग की सैर कर रही थी.

थोड़ी देर बाद मैंने उसे घोड़ी बना दिया. कमर से पकड़ कर मैंने अपना पूरा लंड उसकी फुद्दी में डाल दिया. फिर उसकी कमर से पकड़ कर घस्से मारने लगा. इतने में कमला ने मेरी कमर से पकड़ कर मुझे अपने से चिपका लिया. उसका पानी छूट गया था.

थोड़ी देर वैसे ही रहने के बाद मैंने उसे सीधा लिटा दिया और खुद उसके ऊपर आ गया. मैंने फिर से अपना लंड उसकी फुद्दी में डाल दिया. बुर गीली होने की वजह से मुझे अन्दर डालने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई. मैंने फिर से घस्से मारने शुरू कर दिए. जैसे जैसे मैं घस्से मार रहा था, वैसे वैसे कमला के मम्मे आगे पीछे हो रहे थे. उन्हें देखकर मैं और जोश से घस्से मार रहा था.

पांच मिनट बाद मेरा भी छूटने वाला हो गया था. मैंने 8-10 बड़े शॉट मारे और इसके साथ ही मैं छूट गया. मेरे वीर्य की काफी सारी पिचकारियां कमला की फुद्दी में निकल गईं.

मैं कमला के ऊपर ही लेट गया और उसकी गर्दन होंठों और गालों को चूमने लगा.

करीब दस मिनट बाद मैं उसके ऊपर से हटा. कमला के चहरे पर एक विनिंग स्माइल थी. हम दोनों ने अपने आपको साफ किया और कपड़े पहन लिए.
 
कमला मेरे साथ बहुत खुल गयी। इतना कि उसने अपनी गहरी सहेलियों का भी मुझसे परिचय कराने का वायदा कर लिया। मैंने अनुमान लगाया कि कमला यूरोप की बिगड़ती हुई लड़कियों से भी किसी कदर आगे है। मुझे यूरोपियन लड़कियों से भी मिलने का संयोग पड़ चुका था। इसलिए मैं यह बात दावे से कह सकता हूँ। मुझे खुशी थी कि कमला के माध्यम से हसीन लड़कियों के झुरमुट से मेरा परिचय होगा। यकीनन वह बहुत खूबसूरत और चंचल होंगी। लेकिन मेरी यह खुशी अधिक देर तक बरकरार नहीं रह सकी। मैंने महसूस किया कि मोहिनी मेरे सिर पर चित लेटी किसी गहरी सोच में गर्क थी। अचानक हड़बड़ाकर उठी, और रेंगती हुई मेरे कान के पास आयी और बहुत ही गंभीरता के साथ बोली –

“राज! रात के दो बज रहे हैं।”

“हूँ!” मैंने संक्षेप में उत्तर दिया।

“बहुत हो चुका!” मोहिनी ने गंभीरता के साथ कहा।” अब उठो और कमला को चलकर दोबारा चौपाटी छोड़ आओ।”

मोहिनी ने यह बात कुछ इस गंभीरता से कही कि मैं सोच में पड़ गया। आज से पहले उसने मुझे इस प्रकार के मामलों में कभी नहीं टोका था। फिर आज उसने ऐसा क्यों किया? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मुझे किसी आने वाले खतरे से आगाह कर रही हो। वह खतरा क्या हो सकता है?

अभी यह सभी प्रश्न मेरे मस्तिष्क में चकरा रहे थे कि मोहिनी ने दोबारा कहा–

“राज! क्या तुमने मेरी बात नहीं सुनी?” मोहिनी के उत्तर में मैंने हामी भरे अंदाज में सिर को जुंबिश दी।

“उठो डार्लिंग। चलो मैं तुम्हें घर छोड़ आऊँ।”

“अहूँ।” कमला ने एक गहरी अंगड़ाई ली फिर अपनी खुमार भरी निगाहों से मुझे घूरते हुए बोली। “ओह नो डार्लिंग, अभी तो केवल दो बजे हैं! सुबह होने में बहुत देर बाकी है।”

“हाँ! लेकिन मुझे अचानक याद आ गया कि मुझे साढ़े तीन बजे एक दोस्त को रीसिव करने के लिये एयरपोर्ट जाना है।” मैंने बहाना बना दिया। हालाँकि यह बात मेरे फरिश्तों को भी मालूम नहीं थी कि रात के साढ़े तीन बजे कोई फ्लाईट आती भी है या नहीं।\

“दोस्त तुम्हें मुझसे अधिक प्यारा है?” कमला ने अपनी दोनों बाहें मेरे कन्धे पर डालते हुए कहा।

“बहुत जरूरी बात है कमला। मामला यदि दोस्ती का ही होता तो मैं टाल जाता। लेकिन वह मेरा सम्बन्धी भी है और शायद एक-दो दिन वह यहीं ठहरेगा।”

“तुम शायद उकता गये हो।” कमला इठलाकर बोली।

“कैसी बात करती ही जान? तुमसे कौन कमबख्त उकता सकता है।”

“अच्छी बात है। फिर चलो।” कमला ने बुझे स्वर में उत्तर दिया। फिर उठकर बैठ गयी। मैं खामोशी से उठकर ड्रेसिंग रूम में आया और कपड़े चेंज करने लगा।
 
Raaj36 wrote: ↑ 29 Aug 2020 10:08
Aap bahot achha likhti hain .... Maine aapki story "Agiya Betaal" parhi bahot achhi lagi. Abhi main aapke dwara likhi kahani "Mohini" parh raha hun. Rahasyamayi shaktiyon ka is kahani ka plot bahot achha lag raha ha ... par aapse request hai ki kahani mein ashleel drashyon ki jagah romantic scenes daaliye. agar sex scenes kahani ki zaroorat ho to kam se kam bad words ka prayog na karein. kuchh double meaning words use karte hue romantic scenes likhengi to kahani aur bhi achhi lagegi.
 
अचानक मैंने महसूस किया जैसे मोहिनी मेरे सिर पर टहल-टहलकर कुछ सोच रही है। मुझे महसूस हुआ जैसे उसके हसीन चेहरे पर उस समय गहरी गंभीरता छाई हुई है। कभी-कभी वह रुककर एक हाथ की मुट्ठी बनाकर दूसरे हाथ की हथेली पर मारती है फिर दोबारा टहलने लग जाती है। एक-दो बार मैंने भी यही महसूस किया जैसे वह किसी भीतरी बेचैनी में अस्त-व्यस्त हो। आज से पहले मैंने मोहिनी को कभी बेचैन नहीं महसूस किया था। इसलिए कपड़े बदलने के बाद मैंने उसे बड़ी गंभीरता से उसे सम्बोधित किया।

“क्या बात है मोहिनी?”तुम बड़ी बेचैन नज़र आ रही हो।

“हाँ राज! परन्तु समय व्यर्थ न करो। जितनी जल्दी सम्भव हो सके कमला को चौपाटी ले चलो।”मोहिनी के स्वर से बेचैनी और बेताबी टपक रही थी।

“क्या कोई विशेष बात है?”

मैं महसूस कर रहा था कि वह मेरी सुस्ती पर बुरी तरह झुंझला रही है। फिर भी मैंने उसकी बढ़ी हुई बेचैनी का कारण पूछा। “मोहिनी, क्या तुम कमला के सिलसिले में किसी खतरे की बू सूंघ रही हो?

“राज!” इस बार मोहिनी ने क्रोधित स्वर में केवल मेरा नाम ही लिया था।

“अच्छा बाबा! चल रहा हूँ। गुस्सा क्यों करती हो?” मैंने जल्दी से कहा और कदम बढ़ाता हुआ अपने बेडरूम में आ गया। जहाँ कमला भी अपना लिबास पहन चुकी थी। उसके चेहरे से अभी तक खुमार टपक रहा था। यदि मुझे मोहिनी का विचार न होता तो मैं किसी कीमत पर भी उस समय कमला के खूबसूरत जिस्म को अपने से अलग करने के सम्बन्ध में न सोचता। परन्तु मोहिनी की आज्ञा अंतिम आज्ञा थी।

उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस मुझमें न था। वह मेरे लिये सब कुछ थी, इसलिए मैंने अपने दिल पर काबू किया और कमला को लेकर बाहर आ गया। दूसरे ही मिनट मेरी गाड़ी चौपाटी की ओर फर्राटे भर रही थी। जिस समय मैं चौपाटी पहुँचा उस समय रात के ढाई बज रहे थे। चारों ओर सन्नाटा फैला हुआ था। उस सन्नाटे से समुन्द्र की मौजों की सांय-सांय सड़ाप-सड़ाप करती आवाजें बड़ी भयानक मालूम हो रही थीं। मैं कार को लेकर समुन्द्र तट के बिल्कुल करीब चला गया। फिर मैंने एक बड़े रेतीले टीले की आड़ में गाड़ी रोक दी। यह सब मैंने मोहिनी के आदेश पर किया था। जब मैंने गाड़ी रोककर कमला को नीचे उतरने को कहा तो वह चौककर बोली –

“यह तुम मुझे चौपाटी पर क्यों लाए हो डियर?” इससे पहले कि मैं कमला की बात का उत्तर देता। मोहिनी ने मेरे कानों में सरगोशी की।

“राज! तुम कमला को लेकर समुन्द्र के साथ-साथ कुछ दूर और आगे निकल चलो।” मोहिनी का यह आदेश मुझे कुछ विचित्र-सा लगा। परन्तु मैं कमला की उपस्थिति में उससे उसका कारण न पूछ सका और बड़ी बेतकल्लुफी से कमला की कमर में हाथ डालकर समुन्द्र के किनारे-किनारे आगे बढ़ने लगा।

“अरे, यह तुम कहाँ ले जा रहे हो?” कमला ने मेरे बाजू में कसमसाते हुए कहा।

“बस यूँ ही।” मैंने सपाट स्वर में कहा। मेरा मस्तिष्क लगातार मोहिनी में उलझा हुआ था। जो बराबर मेरे सिर पर इधर-उधर टहलने में व्यस्त थी।

“यदि तुम्हें रात का बाकी का हिस्सा यहाँ आकर गुजरना था तो पहले ही कह देते। मुफ्त में अच्छा-खासा मूड खराब कर दिया।”

“मनोरंजन के लिये यह स्थान मुझे कुछ अधिक ही भाता हैं।” मैंने बात बनायी।
 
“किसी दिन धर लिये गये तो सारा मनोरंजन धरा रह जाएगा।” कमला बोली। “पुलिस के सादा लिबास वाले यहाँ शिकारी कुत्तों की तरह घात लगाए बैठे रहते हैं और अवसर मिलते ही आवारा लोगों को दबोच लेते हैं। जानते हो फिर क्या होता है? दस-बीस हजार का नुक़सान या फिर रात भर हवालात की हवा खानी पड़ती है।”

“तुम्हारे लिये दस-बीस लाख भी खर्च कर सकता हूँ।”

“सच माई डियर?” कमला ने बड़े रूमानी अंदाज में कहा।

कमला से इधर-उधर की बातें करता हुआ मैं कार से लगभग दो फर्लांग आगे निकल आया था। जब भी मैं रुकने की चेष्टा करता मोहिनी मुझे और आगे चलने को कह देती। फिर जब हम एक वीरान और किसी अंधेरे हिस्से से गुजर रहे थे तो मोहिनी ने अचानक मुझसे रुकने को कहा और बोली –

“राज! तुम्हें पता है, मुझे इन्सानी खून की जरूरत पड़ती है। खून ही मेरी गीजा है और आज मुझे भूख लग रही है। तुम कमला को मारकर मेरे लिये गीजा का प्रबंध करोगे।”

मोहिनी की बात सुनकर मैं यूँ उछल पड़ा जैसे मेरा पाँव बिजली के नंगे तार को छू गया हो। मेरा मस्तिष्क कलाबाजियाँ खाने लगा। अब मेरी समझ में यह बात आ गयी थी कि मोहिनी क्यों बेचैन थी और क्यों उसने मुझे कमला को चौपाटी तक लाने की जिद्द की थी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ? मेरी निगाहों के सामने वह दृश्य घूम गया जब मैंने मोहिनी के उकसाने पर डॉली के मंगेतर दीपक को मौत के घाट उतार दिया था और अगले दिन अखबार में छपने वाला विवरण पढ़कर मेरे जिस्म के रोंगटे खड़े हो गये थे। मैं अभी तक दिल की धड़कनों पर काबू न पा सका।

“जल्दी करो राज! कमला का खून मेरे लिये महीने भर के लिये काफी होगा। यह जगह भी बिल्कुल वीरान और सुनसान है इसलिए तुम कमला को सरलतापूर्वक ठिकाने लगा सकते हो।”मोहिनी ने कहा।

“क्या तुम कल तक मुझे सोचने का समय नहीं दे सकती?” यह वाक्य मैं बेचैनी भरी हालत में कह गया।

कमला ने सुना तो आश्चर्य से मेरी सूरत देखते हुई बोली –

“किस बात को सोचने के लिये तुम्हें कल का समय चाहिये?”

“कुछ नहीं!” मैं बुरी तरह गड़बड़ा गया।

“राज! क्या तुम मेरी आज्ञा नहीं मानोगे?” मोहिनी के स्वर में इस बार ऐसी खौफनाक गुर्राहट थी जैसे कोई खूंखार जंगली बिल्ली अपने सामने कमजोर बिल्ली को देखकर कंठ से निकालती है। उसी के साथ मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मोहिनी अपने बारीक-बारीक पंजे मेरे सिर में चुभो रही हो। जिसकी चुभन हर पल तेज होती जा रही थी।

अचानक मेरी हालत ऐसी हो गयी थी जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने मुझ पर सम्मोहन कर लिया हो। मेरे सोचने-समझने की शक्ति समाप्त होती चली गयी। मैं किसी मशीनी अंदाज में घुमा और कमला को खतरनाक दृष्टि से घूरने लगा। मेरे मस्तिष्क में केवल एक ही वाक्य संघर्ष हो रहा था –

‘राज! कमला को मर डालो।’

“यह तुम मेरी ओर इस तरह घूर कर क्यों देख रहे हो?” कमला ने गौर से मेरी ओर देखते हुए पूछा।

मैंने कमला की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। मेरे सिर में नुकीले पंजों की चुभन अत्यन्त तीव्र और कष्टदायक होती जा रही थी और फिर अचानक मुझपर पागलों की सी हालत सवार हो गयी। मेरा चेहरा लाल सुर्ख हो गया। मैं काँपने लगा। मैंने झपटकर कमला की गर्दन को पूरी शक्ति से अपने मजबूत पंजों में दबोच लिया और उंगलियों के घेरे को तंग करता चला गया। कमला का जिस्म मेरे शिकंजे पर तड़प रहा था उसके हलक से घरघराहट की उखड़ी-उखड़ी आवाजें निकल रही थीं। उसकी आँखें भय, दहशत और कष्ट के कारण पलकों से बाहर उबल पड़ी थीं। फिर अचानक कमला का जिस्म दो-चार जोरदार झटके लेकर मेरे हाथों में झूलने लगा।

“सुनो राज! तुम इसके ऐसे ठोकर मारो कि खून निकल आए। मैं इस बार कोई निशान नहीं छोड़ना चाहती।”
 
मैंने मोहिनी के आदेश का पालन करते हुए जोर से कमला के जिस्म को जमीन पर गिराकर ठोकर मारी। खून का फव्वारा उबल पड़ा। कमला की आत्मा अपने शरीर को छोड़ कर स्वर्ग सिधार चुकी थी। मैं अब दोबारा होश में आ गया था। यह सोचकर कि मैंने कमला को मार डाला है। मैं काँप उठा। बौखलाहट में मैंने कमला के बेजान जिस्म को उसी तरह छोड़ दिया और भयभीत होकर कई कदम पीछे हटता चला गया।

“राज!” मोहिनी की फुसफुसाहट मेरे कानों में फैलती चली गयी। “तुमने वास्तव में मेरे लिये एक बहुत बड़ा काम किया है। मैं तुम्हारी अहसानमंद हूँ।”

“भगवान के लिये तुम मेरा पीछा छोड़ दो। मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूँ!” मेरी आवाज़ बेबसी से भरी हुई थी और मैं उसी आलम में बोला था।

“यह असम्भव है राज!” मोहिनी ने जल्दी से कहा। “तुम मेरे साथ दोस्ती निभाने का वायदा कर चुके हो और यह दोस्ती उसी समय समाप्त होगी। जब मैं चाहूँगी।” मोहिनी ने तेजी से उत्तर दिया फिर अपने होंठो पर जुबान फेरती हुई बोली। “अब तुम यहाँ से भाग जाओ। कहीं ऐसा न हो कि कमला की हत्या के जुर्म में तुम पकड़े जाओ और तुम्हें फाँसी हो जाए। इससे पहले तुम भाग जाओ।” कोई लिजलिजी सी चीज जैसे कोई छिपकली मेरे शरीर पर रेंगती हुई उतर गयी।

“ओह, मेरे भगवान! मैं क्या करूँ?” मैंने दिल ही दिल में कहा। एक नज़र रेत पर पड़ी हुई बेजान कमला पर डाली फिर तेजी से घूमकर अपनी कार की ओर दौड़ने लगा। कमला की लाश को मोहिनी के हवाले करते ही मैं कार की तरफ दौड़ पड़ा था। कुछ क्षणों पहले तक चौपाटी के अन्धकार में डूबी स्वप्निल हवा मेरी भावनाओं को गुदगुदा रही थी। परन्तु यह सब कुछ मेरे लिये इस कदर खौफनाक हो गया था कि मैं जल्द से जल्द वहाँ से दूर निकल जाना चाहता था। मोहिनी के अलावा स्वयं कमला ने भी मुझे याद दिलाने की कोशिश की थी कि रात सन्नाटे में सादा लिबास वाले चौपाटी के क्षेत्र में शिकारी कुत्तों की तरह जरायम की गन्ध को सूँघते फिरते हैं और पकड़े जाने की सूरत में मुल्जिम को भारी हानि उठानी पड़ती है।

यदि मैं कमला जैसी हसीन व गुदाज जिस्म वाली युवती के साथ मौज-मस्ती लेता पकड़ा जाता तो फिर कोई चिन्ता की बात न होती। मैं कमला के जिस्म के बदले पुलिस का मुँह दौलत के अम्बार तले सरलतापूर्वक बन्द कर देता लेकिन इस समय मेरी हैसियत एक कातिल की थी और पकड़े जाने की सूरत में यकीन था कि फाँसी का फंदा मेरा भाग्य बन जाता। इसलिए मैं बदहवासी में भागा जा रहा था।

जिस जगह मैंने मोहिनी की आज्ञा पर कमला को ठिकाने लगाया था। वहाँ से कार का फासला कुछ अधिक नहीं था। परन्तु भय और दहशत ने उस साधारण सी दूरी को मेरे लिये अच्छा-खासा लम्बा बना दिया था। हर पल मुझे यही लगता कि अचानक अंधेरे से अनगिनत कानून के रक्षक निकलकर मुझे अपने शिकंजे में जकड़ लेंगे। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। मैं किसी तरह हाँफता अपनी कार तक पहुँच ही गया। जल्दी से कार का दरवाजा खोलकर मैंने स्वयं को अगली सीट पर गिराया फिर गाड़ी स्टार्ट की और तीव्र गति से वापसी के लिये खुली सड़क पर डाल दिया। मेरा मस्तिष्क उस समय अजीब सी उलझनों में फँसा हुआ था। मुझे कमला का ख्याल आता जो बिल्कुल बेगुनाह थी, बेबस थी। मरने से पहले आखिरी बार उस गरीब ने मुझे जिन निगाहों से देखा था उनमें झलकने वाली उलझन अभी तक मेरे मानो-मस्तिष्क पर छाई हुई थी। मुझे अपने शयन-कक्ष में कमला की हसीन मुस्कुराहट याद आती और फिर एकदम से मेरा ज़हन मोहिनी के बारे में उलझकर रह जाता था।

मोहिनी, जिसके रहस्यमय अस्तित्व ने अभी कुछ क्षण पहले मेरे हाथों कमला को मौत के घाट उतरवा दिया था और फिर जब मैंने यह सोचा कि मोहिनी इस समय बड़े आराम से चौपाटी पर कमला की लाश से खून का एक-एक कतरा अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिये चूस रही होगी तो मेरा एक-एक रोआँ भय से काँप उठा।
 
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