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Fantasy मोहिनी

“यह सब तुम मुझ पर छोड़ दो। मैं आज ही किसी समय फिर वापिस चली जाऊँगी। मुझे उससे एक आवश्यक काम भी लेना है जिसके उपरान्त हो सकता है कि उसे फाँसी की सज़ा जो जाए।”

मैंने महसूस किया कि मोहिनी के होंठों पर एक अजीब सी मुस्कराहट फैली हुई है।

“मैं समझा नहीं।”

“इससे पहले भी तो अनेक बातें तुम नहीं समझे थे। इतनी बेचैनी भी क्या है। धीरे-धीरे सब बातें तुम्हारी समझ में आ जायेंगी।” मोहिनी ने बहुत रहस्यमय अंदाज में जवाब दिया फिर पूछा। “क्या तुमने डॉली को मेरे सम्बन्ध में सब कुछ बता दिया है?”

“हाँ!” मैंने स्वीकार किया। “यह सब उसी रोज की बात है जिस दिन पुलिस ने मुझे चरणदास की हत्या के आरोप में जबरदस्ती गिरफ्तार किया था।”

“पुरानी बातों को मत छेड़ो। अब हम फिर एक-दूसरे के दोस्त बन चुके हैं।”

“ हाँ!” मैंने भरी हुई आवाज़ में उत्तर दिया। “मेरा विचार है तुम्हारे हृदय में अभी तक मेरी ओर से कोई शंका है।”

“क्या मतलब?” मोहिनी ने चौंकते हुए पूछा। मैं गड़बड़ा गया। फिर जल्दी से संभलकर बोला –

“अगर मुझे दोस्ती न करनी होती तो तुम मुझे मजबूर तो नहीं कर रही थी।”

“हूँ! तो यह बात है मिस्टर राज! एक बात कह दूँ…।”

“कहो, क्या बात है?” मैंने अपने धड़कते हुए दिल पर अधिकार पाते हुए पूछा।

मोहिनी ने जिस भाव में मुझसे कुछ कहने की आज्ञा चाही थी वह बेहद रहस्यमय थी।

“कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुमने समय से मजबूर होकर मेरे साथ एक अस्थाई समझौता कर लिया हो।”

“तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैंने तुमसे किसी षड्यंत्र के तौर पर तुम्हारे साथ कोई दोस्ती की है? वैसे भी तुमसे कोई बात छिपी नहीं है।”

“मेरी बात छोड़ो, तुम अपने दिल की कहो।”

“वहम का इलाज़ तो लुकमान हकीम के पास भी नहीं था।” मैंने मोहिनी को वफ़ादारी का विश्वास दिलाने की खातिर बड़े जोरदार स्वर में उत्तर दिया।

मोहिनी पर मेरी बात का प्रभाव पड़ा, इसका इल्म तो मेरे फरिश्तों को भी नहीं था लेकिन इतना जरूर मैंने महसूस कर लिया था कि मोहिनी मेरा उत्तर सुनकर किसी सोच में डूब गयी थी। उसकी लाल-लाल नशीली आँखें लगातार मेरे चेहरे पर गड़ी हुई थीं कुछ क्षणों तक वह टकटकी बाँधे मुझे घूरती रही। फिर मुस्कुराकर बोली –

“वहम का इलाज़ लुकमान के पास था या नहीं, मुझे इससे कोई सरोकार नहीं। लेकिन मैं इतना जरूर बता सकती हूँ कि मेरे पास हर रोग का इलाज मौजूद है। यदि तुमने इस बार वादाखिलाफी की तो उसके लिये तुम्हें जीवन भर पछताना पड़ेगा।”

“लानत है तुम्हारे ऊपर जो मुझ पर संदेह कर रही हो।” मैं झूठा क्रोध दर्शाता हुआ बोला तो बेतहाशा खिलखिलाकर हँस दी। फिर बड़ी प्यार भरी नज़रों से देखती हुई बोली –

“आज तुमने पहली बार मुझ पर गुस्सा किया है राज। गुस्से में भी तुम कम अच्छे नहीं लगते।”

“विश्वास करो, तुमने मेरे ऊपर संदेह करके मेरी भावनाओं को ठेस पहुँचाई है।” मैं गंभीरता के साथ बोला।

“नाराज़ हो गये मुझसे, क्यों?” मोहिनी ने बड़ी गहराई से कहा।

“तुमने बात ही ऐसी की थी।”

मोहिनी ने मुझसे बड़े प्यार भरे अंदाज में कहा – “अच्छा, जाने भी दो! आगे जो कुछ भी होगा, तुम भी देखोगे और मैं भी।”
 
मेरा मैनेजर स्टेशन से सीट बुक कराकर वापिस आ गया। जितनी देर मैनेजर से बात करता रहा, मोहिनी खामोश खड़ी सुनती रही। जब मैनेजर चला गया तो मोहिनी ने पूछा –

“राज! यह शोलापुर जाने की आवश्यकता किसे पड़ गयी?”

“मैनेजर को। क्यों...?”

“और दूसरा टिकट किसका है?”

मेरे पास सिवाय इसके और कोई रास्ता न था कि मैं डॉली के शोलापुर जाने के प्रोग्राम को बता दूँ। दूसरी स्थिति में संभव था कि मोहिनी उस समय मेरी ओर से संदिग्ध हो जाती जब वह डॉली को घर पर न पाती। अतः मैंने बड़ी खूबसूरती से मोहिनी से कहा –

“डॉली के एक दूर के रिश्तेदार शोलापुर में रहते हैं। वह एक विवाह के सिलसिले में उनके यहाँ जा रही है।”

“डॉली के रिश्तेदार।” वह कुछ सोचने लगी। “अच्छा होंगे। मगर क्या तुम उसके साथ नहीं जा सकते जो मैनेजर को भेज रहे हो?”

“जिन हालात में मेरी और डॉली की शादी हुई, वह तुमसे छिपी नहीं है। इसलिए मैंने डॉली के साथ जाना मुनासिब नहीं समझा। हाँ, यदि उसने बाद में बताया, तो हो आऊँगा।”

मोहिनी मुझसे कुरेद-कुरेदकर डॉली की रवानगी के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार के प्रश्न करती रही और मैं बड़ी लापरवाही से जवाब देता रहा। अचानक वह मुझसे एक अजीब-सा सवाल कर बैठी –

“राज, यह चौहान के सम्बन्ध में तुम्हारा क्या विचार है?”

“क्यों?” मैंने आश्चर्य से पूछा। “तुम्हें अचानक चौहान सिंह का विचार कैसे आ गया?”

“मैंने सुना है उसकी गणना जेलखाने के बड़े जिस्म के सन्तरियों में होती है। तुम्हारी कमर भी तो उसने अपने जूतों की ठोकर से कई बार दोहरी की थी। लेकिन आदमी है सुर्ख और सफ़ेद। मोटा-ताज़ा खूब जानदार।”

चौहान सिंह का जिक्र छिड़ा तो मुझे हट्टे-कट्टे सन्तरी की ठोकरें याद आ गयीं, जिससे मेरा सामना हो चुका था। वह ठोकरें जो आमतौर से देर से उठने वाले कैदियों की रीढ़ की हड्डियों पर पड़ा करती थीं। यूँ भी वह बेहद खौफनाक सूरत का मालिक था। परन्तु केवल सूरत ही नहीं, वह आदत का भी बड़ा जालिम और कठोर आदमी था। कैदियों पर तनिक भी दया नहीं करता था। भयानक किस्म के अपराधी भी उससे थर्राते थे। जब वह अपने भारी-भरकम जूतों की ठोकर से कैदियों को मारता तो वह कष्ट से बिलबिला उठते। मुझे याद है कई कैदी उसकी ठोकर से बेहोश हो गये थे। खुद मेरी हालत भी एक बार खराब हो चुकी थी। मुझे चौहान सिंह के नाम से ही खौफ होता था। मैंने जानबूझकर मोहिनी को उसके बारे में विस्तारपूर्वक नहीं बताया और टालने की खातिर कहा –

“एक चौहान सिंह ही क्या, जेल के तो सारे सन्तरी जालिम होते हैं। परन्तु तुमने इस समय विशेष रूप से चौहान सिंह का नाम क्यों लिया?”

“यूँ ही! जरा ख्याल आ गया।” मोहिनी ने रहस्यपूर्ण स्वर में कहा।

मैं चौहान सिंह का उल्लेख करके अपने घावों पर नमक छिड़कना नहीं चाहता था। मैं उस विषय को टाल गया।

दो-तीन घंटे काम करके जब मैं ऑफिस से घर गया तो डॉली यात्रा के लिये सामान बाँध चुकी थी। उसने सदा की तरह बड़े प्रेम भरे ढंग से मेरा स्वागत किया। मोहिनी मेरे सिर पर मौजूद थी इसलिए मैंने डॉली को इधर-उधर की बातों में उलझाए रखा। फिर संकेतों द्वारा उसे बता दिया कि शोलापुर के लिये सीट बुक हो चुकी है।

शाम की चाय पीने के बाद मैं डॉली के साथ बाहर लॉन में बैठा बातचीत कर रहा था कि मोहिनी ने सिर से रेंगकर मेरे कानों के निकट आते हुए कहा –

“राज, एक बात मानोगे?”

“कहो।”

“मेरा जी चाहता है कि मैं कुछ देर के लिये डॉली के सिर पर चली जाऊँ।” यह सुनकर मैं एकदम गंभीर हो गया।

“ कदापि नहीं! मैं तुम्हें इसकी आज्ञा नहीं दूँगा।”

“यह आप किसकी आज्ञा के सम्बन्ध में बात कर रहे हैं।” डॉली ने मुझे आश्चर्य से घूरते हुए प्रश्न किया।

“कुछ नहीं!” मैं सिटपिटा कर बोला। “मैं दरअसल मोहिनी की बात का जवाब दे रहा था।”

“ओह...!” डॉली मुँह बनाकर खामोश हो गयी।

मोहिनी ने मुस्कुराते हुए मुझसे कहा – “राज, तुम वास्तव में भाग्यशाली हो जो डॉली जैसी सुन्दर पतिव्रता पत्नी तुम्हें मिल गयी। डॉली बहुत अच्छी लगती है, कितनी अच्छी है यह।”

मैं हूँ, हाँ करके मोहिनी की बातों का उत्तर देता रहा। डॉली खामोशी से निटिंग बुनाई करती रही। उसके चेहरे पर किसी प्रकार के भाव नहीं थे। परन्तु जिस तेजी से वह ऊन को झटक-झटककर सलाइयाँ चला रही थी, उससे अंदाजा होता था कि वह दिल ही दिल में अवश्य कुढ़ रही है। मेरी हालत भी उस समय उससे कुछ अलग नहीं थी। मोहिनी ने आज पहली बार डॉली के सिर पर जाने की आज्ञा चाही थी और उसके सम्बन्ध में प्रेममय बातें की थीं। मैं इससे यही परिणाम निकाल सकता था कि वह मुझे छेड़ने की खातिर ऐसा कह रही है। परन्तु मेरे दिल में मौजूद अनुभवों के अनुसार अनगिनत संदेह पैदा हो रहे थे।
 
“क्या सोच रहे हो राज? कोई ख़ास बात है क्या?”

“कुछ भी नहीं।” मैंने झुंझलाते हुए सरगोशी की।

“मुझे मालूम है...।” मोहिनी ने इठलाकर कहा। “तुम्हें मेरी यही बात बुरी लगी है कि मैंने डॉली के सिर पर जाने का विचार क्यों प्रकट किया था?”

“हूँ...!” मैंने धीमे स्वर में कहा।

“यह बात तो मैंने यूँ ही कह दी थी। तुम्हें परेशान करने में मुझे मजा आता है।” मोहिनी होंठों ही होंठों में मुस्कुराकर बोली। “मैं तुम्हारी पत्नी को अपना दुश्मन कैसे समझ सकती हूँ? वह तो बहुत मासूम है।”

मैंने विवशता-वश सिर हिलाया। मोहिनी कुछ देर तक मुझसे बातें करती रही और जब मैं ऊँघने लगा तो उसने कल्लन खां के सिर पर जाने का इरादा प्रकट किया।

मोहिनी के जाने के बाद भी मैं बहुत देर तक चुपचाप बैठा रहा। फिर डॉली के साथ उठकर भीतर आ गया। रात को जब डॉली शोलापुर जाने लगी, तो उस समय उसने मुझसे मोहिनी के सम्बन्ध में कुछ कहना चाहा, परन्तु मैंने उसे मना कर दिया। मुझे संदेह था कि कहीं मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व इन बातों से वाकिफ न हो जाए। हालाँकि यह केवल मेरा वहम था। कोई न कोई युक्ति तो कारगर हो ही जाती। डॉली के चेहरे पर उस समय उलझन और बेचैनी के जो भाव नज़र आ रहे थे, वह मेरा दिल ही जानता है। फिर भी मैं सहन कर गया, और ट्रेन की रवानगी के बाद घर आ गया। उस रोज तमाम रात मैं डॉली की सफलता और कुशलता के साथ उसकी वापसी के लिये ईश्वर से प्रार्थना करता रहा। क्या मैं मोहिनी की अदृश्य शक्ति से कभी छुटकारा प्राप्त कर सकूँगा या नहीं?

मैं सारी रात इसी चिन्ता में उलझा रहा। प्रातःकाल मैंने हल्के गरम पानी से स्नान किया तो मस्तिष्क पर छाया हुआ भारीपन कुछ कम हुआ। परन्तु नाश्ते की मेज पर पहुँचकर जैसे ही मेरी नज़र अखबार पर पड़ी मैं मारे आश्चर्य के उछल पड़ा और जल्दी-जल्दी उस समाचार को पढ़ने लगा, जिसकी हेडिंग मेरे लिये चौंका देने वाली थी।

जेल के कम्पाउंड में एक हथियारबंद सन्तरी की दर्दनाक मौत, कातिल ने मकतुल के जिस्म का सारा खून पी डाला। मंगल स्टाफ रिपोर्टर द्वारा पिछली रात सेंट्रल जेल में हत्या की एक वारदात हुई जिसने पुलिस के और जेल स्टाफ को हिलाकर रख दिया। पुलिस प्रारम्भिक रिपोर्ट के अनुसार कल्लन खां नामक एक कैदी ने जो पहले दूसरी हत्या के जुर्म में गिरफ्तार है, कल रात लगभग बारह बजे के निकट जेल के सन्तरी चौहान सिंह की हत्या कर दी। हत्या का कारण अभी पता नहीं चल सका। पिछली रात को कल्लन खां की चीखें जेल के अहाते में सुनी गयी थी। जब चौहान सिंह, जो दूसरे सन्तरियों के साथ ड्यूटी पर मौजूद था, कल्लन खां की चीख सुनकर उसकी कोठरी की ओर गया तो देर तक वापिस नहीं आया। कुछ देर बाद दूसरा सन्तरी चौहान सिंह को खोजता हुआ जब कल्लन खां की कोठरी में पहुँचा तो उसने एक भयानक मंजर देखा। कोठरी का जंगला खुला हुआ था और चाबी ताले में लगी हुई थी।

बयान किया जाता है कि कोठरी के फर्श पर सन्तरी चौहान सिंह की लाश पड़ी हुई थी और ऐसा मालूम होता था, जैसे उसके जिस्म का सारा खून निचोड़ लिया गया हो। मकतुल चौहान सिंह के बराबर में कल्लन खां बेसुध पड़ा खर्राटे ले रहा था। दूसरा सन्तरी यह दृश्य देखकर अपने हवास पर काबू न रख सका और चीख-पुकार मचाता जेलर के पास पहुँचकर उसने विस्तारपूर्वक सारी बात बतायी। जेलर जब घटनास्थल पर पहुँचा और उसने कल्लन खां को जगाकर उस खूनी घटना के सम्बन्ध में पूछताछ की तो उसने चौहान सिंह की हत्या की अनभिज्ञता प्रकट की। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि कल्लन खां यदि हत्यारा था तो उसने फरार होने की चेष्टा क्यों नहीं की; और यदि कल्लन खां हत्यारा नहीं हैं, तो फिर हत्या किसने की? पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के साथ-साथ असली मामले की खोजबीन भी की जा रही है।

चौहान सिंह की सनसनीखेज हत्या का समाचार पढ़कर मेरे शरीर के रोंगटे खड़े हो गये। मैं समझ गया कि यह सब मोहिनी का कारनामा है। कल उसने मुझसे विशेष रूप से चौहान सिंह के सम्बन्ध में पूछा था और यह भी कहा था कि उसे कल्लन खां से एक आवश्यक काम लेना है, जिसके बाद उसे फाँसी की सजा भी हो सकती है। चौहान सिंह के जिस्म से खून गायब होने का प्रश्न तो औरों के लिये यक़ीनन हैरतअंगेज़ था, मगर मेरे लिये नहीं। मैं जानता था कि चौहान सिंह का खून किसने पिया है।

मैं ये भी समझ गया था कि मोहिनी ने मुझसे चार माह में एक इंसानी जिस्म के खून का वायदा क्यों लिया था जबकि उसे हर महीने, डेढ़ महीने के बाद अपने रहस्यमय अस्तित्व को जीवित रखने के लिये इन्सान के ताजा लहू की आवश्यकता पेश आती है। चौहान सिंह की हत्या ने यह बात स्पष्ट प्रकट कर दी थी कि मोहिनी चार माह में एक इंसानी ज़िन्दगी मेरे माध्यम से ख़त्म करेगी और बाकी प्रबंध दूसरे रास्ते से करेगी।

अचानक मेरा मस्तिष्क फिर परेशान हो गया। मोहिनी ने मुझसे डॉली के सिर पर जाने की आज्ञा क्यों माँगी थी? क्या उसने वास्तव में उस समय मुझसे मजाक किया था? अथवा इस बात से उसका कोई ख़ास मतलब था? कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे बाद अब वह डॉली को भी अपना माध्यम बनाने की चेष्टा कर रही हो, जो उसे किसी इन्सान का गाढ़ा-गाढ़ा-सा खून पी जाने पर उकसा दे?
 
अन्तिम विचार जो ज़हन में उभरा उसके साथ ही मेरी उलझनें बढ़ गयी। डॉली यदि इस समय मेरे पास होती तो मैं उसे अपनी चिन्ताओं के सम्बन्ध में अवश्य बताता। उस की अनुपस्थिति में बुरे-बुरे विचार मुझे चिंतित कर रहे थे। मैं सोच रहा था कि कहीं मोहिनी डॉली की वापसी से पहले ही उसे अपनी गन्दी छाप का शिकार बना डाले। कहीं ऐसा न हो कि मैं अब अपनी डॉली को दुबारा कभी हँसता-बोलता न देख सकूँ।

डॉली की दूरी ने मुझे बुरी तरह तड़पाया था। मेरा वश चलता तो मैं उड़कर डॉली के पास पहुँच जाता और उसे मोहिनी के मनहूस अस्तित्व से बचाकर रखता। लेकिन यह बात मेरे वश में नहीं थी। फिर एक ख्याल से मुझे सुकून मिला।

एक इन्सान के जिस्म का खून पी लेने के बाद मोहिनी की पच्चीस-तीस दिन की छुट्टी हो जाती थी।

समाचार-पत्र में छपने वाली खबर के अनुरूप वह पिछली रात ही चौहान सिंह का खून पी चुकी थी और अब वह कम से कम एक महीने तक चैन व शांति से रहेगी। जबकि डॉली ने मुझसे वायदा किया था कि वह शोलापुर में अधिक समय नहीं गुजारेगी; और उस महात्मा से ताबीज हासिल करते ही वापसी के लिये रवाना हो जाएगी।

बहरहाल यह पूरा दिन मैंने किस बेचैनी के साथ गुजारा यह मेरा दिल ही जानता है। या तो मुझे मोहिनी के नाम से एक हौल उठती, या मैं तमाम दिन यह प्रार्थना करता रहता कि वह जल्द से जल्द मेरे सिर पर दुबारा आ जाए, ताकि मैं डॉली की ओर से निश्चित हो सकूँ।

रात क्या आयी, मेरी उलझनों में और बढ़ोतरी हो गयी। घर जैसे काटने को दौड़ रहा था। उस दहशत से छुटकारा पाने के लिये मैंने कपड़े बदले और ड्राइवर को गाड़ी निकालने के लिये कहा, ताकि कुछ देर के लिये किसी दोस्त के पास हो आऊँ। लेकिन गाड़ी में बैठते ही मुझे महसूस हुआ कि मोहिनी मेरे सिर पर वापिस आ गयी है। वह इस समय मेरे सिर पर चहलकदमी कर रही थी। मेरी सारी चिन्ताएँ दूर हो गयीं और मैंने गाड़ी से बाहर निकलकर उसका दरवाजा बंद कर दिया।

“क्यों सरकार, क्या चलने का इरादा नहीं है?” ड्राइवर ने पूछा।

“नहीं! तुम गाड़ी गैराज में खड़ी करके आराम करो।” मैंने ड्राइवर से कहा और वापिस ड्राइंग रूम में आ गया। मोहिनी लगातार मेरे सिर पर चहलकदमी कर रही थी। उसने अपने दोनों हाथ कूल्हे पर रखे हुए थे और यूँ फुदक–फुदककर चल रही थी जैसे बहुत अधिक प्रफुल्लित हो।

उसके चेहरे पर बहुत इत्मीनान झलक रहा था। आँखों में खुमार टपक रहा था। उसका चेहरा जो कल शाम तक पीलापन लिये हुए था, इस समय खून-धारी अनार की मानिंद सुर्ख हो रहा था। गुलाबी होंठ गुलाब की पंखुड़ियों की तरह एक-दूसरे पर जमे हुए थे। मैं ख्यालों में मोहिनी के चेहरे को देखता रहा। वह उस आलम में मुझे बहुत अच्छी लग रही थी।

“कुछ सुना तुमने, कल्लन खां ने कल रात चौहान सिंह नाम के सन्तरी की हत्या करके उसके जिस्म का सारा खून पी लिया।” मैंने उसे छेड़ते हुए कहा।

मोहिनी मुस्कुराकर बोली – “ मैंने यह सब तुम्हारे लिये किया है। अब वह किसी तरह नहीं बच सकता।”

“मैं जानता हूँ। तुमने यह सब कुछ मुझे बचाने के लिये किया है।”

वह मेरे सिर पर पाँव पसारकर बोली – “अगर मैं ऐसा न करती तो तुम्हारे लिये चारों ओर कठिनाइयाँ होतीं।”

“क्या मतलब?” मैंने चौंककर पूछा।

“मिस्टर राज! यदि मैं कल्लन खां को सन्तरी की हत्या के केस में न उलझा देती तो मुझे उस समय तक उसके सिर पर ही रहना पड़ता जब तक अदालत कमला तथा चरणदास की हत्या के सिलसिले में अपना निर्णय न सुना देती। इसमें न जाने कितने दिल लग जाते। इसलिए मैंने कल्लन खां का किस्सा ही ख़त्म कर दिया।” मोहिनी ने मुस्कराकर मुझे परिस्थियों से आगाह करते हुए कहा। “कहो, अब तो तुम खुश हो?”

“एक पंथ और दो काज, इसी को कहते हैं।” मैंने उत्तर दिया। “तुम्हारा यह कदम वास्तव में बहुत उचित था। इस प्रकार न केवल कल्लन खां से मुझे छुटकारा मिल गया, बल्कि तुम्हें अपनी खुराक की प्राप्ति भी हो गयी।”

“खूब! अब तो तुम भी अक्लमन्दों जैसी बातें करने लगे हो।” मोहिनी ने शोखी से कहा।

“परन्तु एक बात का खतरा अभी भी बाकी है।” मैं कुछ सोचकर बोला। “क्या अब कल्लन खां अपने पिछले बयान से फिरने की चेष्टा नहीं करेगा?”

“करता है तो करने दो।” मोहिनी लापरवाही से बोली। “अब इस क़दर भयभीत होने की क्या आवश्यकता है? उसकी बात अब सुनेगा ही कौन? और यदि वह कमला और चरणदास के सम्बन्ध में भी बच गया तो चौहान सिंह की हत्या के सिलसिले में फँस जाएगा।”
 
मैं बहुत देर तक मोहिनी से बातें करता रहा। मैंने कपड़े बदलकर खाना खाया और सोने के इरादे से अपने शयनकक्ष में चला गया। उस समय मोहिनी मेरे सिर बायीं करवट लेटी लम्बे-लम्बे खर्राटे ले रही थी। खून पी लेने के बाद वह सदा लम्बी नींद लेने की आदी थी। इसलिए मैंने उसे छेड़ना उचित नहीं समझा और अपनी आँखें बंद कर लीं।

कितनी देर सोता रहा, मुझे कुछ याद नहीं। लेकिन दुबारा मेरी आँख उस समय खुली थी जब मैंने अपने सिर में बारीक-बारीक पंजों की तेज चुभन महसूस की थी। मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा। मेरे बेडरूम में उस समय हल्की रोशनी का नाईट बल्ब जल रहा था। मैं जल्दी ही समझ गया कि चुभन का कारण क्या है। मोहिनी जब भी क्रोधित होती थी तो मुझे ऐसा महसूस होता जैसे उसके पंजे मेरे सिर में गड़ रहे हों। मैं समझ गया कि मोहिनी यक़ीनन क्रोधित है। अवश्य उसे किसी बात का पता चल गया है।

मेरा संदेह सही साबित हुआ। वह उस समय मेरे सिर पर खड़ी मुझे भयानक दृष्टि से घूर रही थी। उसके सुन्दर नेत्रों में एक विशेष प्रकार की चमक मौजूद थी। एक ऐसी चमक जिसमें उलझन के भाव सम्मिलित थे। उसके चेहरे पर भी मुझे कुछ ऐसे ही भाव नज़र आये।

“क्यों मोहिनी, सब कुशल तो है?” मैंने उसे सम्बोधित किया।

मोहिनी ने शुष्क स्वर में पूछा – “डॉली शोलापुर किस लिये गयी है?”

“क्या मतलब...?” मोहिनी के इस आकस्मिक प्रश्न पर मैं चौंक पड़ा। परन्तु फिर तुरंत ही स्वयं पर अधिकार पाले हुए बोला। “मैं तुम्हें बता चुका हूँ कि वह अपने एक सम्बन्धी से मिलने गयी है। परन्तु इस समय तुम्हें डॉली का विचार कैसे आया?”

“तुम झूठ बोल रहे हो राज।” मोहिनी ने तीव्रता से कहा। “डॉली अपने किसी सम्बन्धी से मिलने नहीं गयी है। आश्चर्य है कि तुम मुझसे छिपाते हो, जिसे सब कुछ मालूम रहता है।”

“फिर तुम्हारा क्या ख्याल है?” मेरे दिल की धड़कन तेज होने लगी और हवास उड़ने लगे।

“अच्छा यही है कि तुम स्वयं ही यह बता दो कि वह किस काम से गयी है। क्योंकि उसके जाने का जो कारण तुमने बताया है, वह सरासर गलत है।” मोहिनी उलझे हुए स्वर में बोली।

“इन बातों से आखिर तुम्हारा उद्देश्य क्या है?” मैंने भयभीत स्वर में पूछा।

“मैं तुम्हारे मुँह से ही सुनना चाहती हूँ। तुमने उसे शोलापुर क्यों भेजा है?”

“हो सकता है कि शोलापुर में और भी कोई काम हो, परन्तु कम से कम मुझसे उसने यही कहा था कि वह अपने सम्बन्धी से मिलने जा रही है।” मैंने उलझते हुए उत्तर दिया।

“राज...!” मोहिनी बिगड़े हुए तेवर से बोली। “यदि तुम नहीं बताना चाहते हो तो मुझसे सुनो – डॉली शोलापुर में एक महात्मा के पास गयी है, ताकि तुम्हें ऐसा ताबीज दिला सके जिससे तुम्हें मुझसे छुटकारा मिल जाये। लेकिन तुम अपने इरादे में कभी कामयाब नहीं हो सकते। मुश्किल यह है कि तुमने अभी मुझे पहचाना नहीं। बहरहाल पहचान जाओगे। अब मुझे कुछ करना ही पड़ेगा।”

मेरा मस्तिष्क मोहिनी की बात सुनकर फक्क से उड़ गया। मेरी अक्ल पंगु होकर रह गयी। मोहिनी के निर्णयात्मक स्वर ने मुझे चिंतित कर दिया था और इससे पहले कि मैं अपने हवास पर काबू पाता और मोहिनी से कोई सफाई पेश कर सकता वह किसी छलावे की तरह फुदककर मेरे सिर से उतर गयी। ऐसा लगा जैसे कोई छिपकली मेरे शरीर में रेंगती हुई उतर गयी हो।

अब क्या होगा? मेरा दिमाग घूम गया। मैं सोच रहा था कि मोहिनी अब शोलापुर पहुँचकर डॉली से कोई खतरनाक प्रतिशोध लेगी। मेरे दिलो-दिमाग में अजीब तूफ़ान मचा था। तुरंत रूप से मैं यही फैसला कर सका कि मुझे समय गँवाये बिना शोलापुर के लिये रवाना हो जाना चाहिए। इसलिए मैंने जल्दी से उठकर स्टेशन फोन किया जहाँ से उत्तर मिला कि शोलापुर के लिये अगली गाड़ी सुबह सात बजे रवाना होगी।
 
मैंने फोन बंद करके घड़ी पर नज़र डाली। उस समय रात के दो बज रहे थे। समय व्यतीत करने के लिये मैंने सिगरेट फूँकने शुरू कर दिए और केवल यही सोचता रहा कि अब मोहिनी डॉली पर क्या जुल्म ढाएगी। एक-एक पल गिन के रात गुजरी तो मैंने अटैची केस लिया और बाहर आ गया।

नौकर के कहने पर मैंने एक कप चाय ज़हर मार के पी। अभी मैं चाय ख़त्म न कर पाया था कि नौकर ने अख़बार लाकर मेरे सामने रख दिया। मैंने जैसे ही समाचार-पत्र पर नज़र डाली, मेरा मस्तिस्क चकरा गया।

कल्लन खां ने जिस दोहरे क़त्ल का इकबाल कर लिया था अब अपने पिछले बयान से बदल लिया। क़त्ल की उन खौफनाक वारदातों में एक रहस्यमय युवती का हाथ है।

हेडिंग के नीचे क्या खबर थी, उसे पढ़ने के लिये न तो मेरे पास समय था और न ही मेरी हिम्मत हो रही थी कि मैं उसे पढ़ूँ। मैंने समाचार-पत्र को लपेटकर हाथ में लिया और अटैची उठाकर तेजी से बाहर आ गया। अब मुझे जल्द से जल्द बम्बई छोड़ देना चाहिए। पुलिस इस सिलसिले में मुझे अवश्य उलझाएगी।

इधर मुझे डॉली की चिन्ता थी जो किसी भी समय मोहिनी की तबाही का निशान बन सकती थी। मैं अजीब उलझन में घिर गया था।

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अखबार में यह खबर पढ़ते ही कि कल्लन खां अपने पिछले बयान से मुकर गया है। मेरे रहे-सहे हवास भी उड़ गये। अब मुझे यह खतरा भी हो सकता था कि कहीं पुलिस दुबारा मुझे हिरासत में न ले ले। दूसरी तरफ यह भी चिन्ता थी कि मोहिनी का रहस्यमय अस्तित्व डॉली को अपनी तबाही का निशान न बना दे। थोड़ी देर के लिये मेरा मस्तिष्क बिल्कुल फेल होकर रह गया, जैसे उस पर बर्फ जम गयी हो। फिर मैं हड़बड़ाकर उठा और नौकर को सामान गाड़ी में रखने की हिदायत देकर स्टेशन के लिये रवाना हो गया।

रास्ते भर मेरी जो हालत रही वह मैं ही जानता हूँ। उसका अंदाजा लगाना दूसरे की वश की बात नहीं। हर चौराहे पर मुझे जहाँ भी पुलिस का सिपाही खड़ा नज़र आता, मेरे दिल की धड़कने तेज हो जातीं और मैं गाड़ी की रफ़्तार तेज कर देता।

हालाँकि अदालत ने मुझे बाइज्ज़त तौर पर बरी कर दिया था लेकिन इसके बावजूद मेरी हालत उस समय मुजरिम जैसी थी जो कोई खतरनाक जुर्म करने बाद हर व्यक्ति की निगाहों से बचता फिर रहा हो। मैं किसी तरह स्टेशन पहुँच गया। गाड़ी प्लेटफॉर्म पर आ चुकी थी। मैंने कुली के जरिये सामान उतरवाकर फर्स्ट क्लास के कम्पार्टमेंट में रखवा दिया। फिर नौकर को जरूरी हिदायत देकर विदा किया और जल्दी से कम्पार्टमेंट में प्रविष्ट होकर प्लेटफ़ॉर्म की तरफ की खिड़की का शटर गिरा दिया। संयोग से मैं उस कम्पार्टमेंट में अकेला था। यदि कोई दूसरा हमसफ़र होता तो यक़ीनन मेरी वहशत को महसूस कर लेता। मेरी नज़र बार-बार अपनी कलाई घड़ी पर पड़ रही थी। गाड़ी के चलने का समय सात बजे था, जिसमें केवल पाँच मिनट शेष थे। लेकिन यह पाँच मिनट गुजारना मेरे लिये जान का बवाल बन गया था। एक-एक पल मेरे लिये भारी हो रहा था। कम्पार्टमेंट के दरवाजे पर एक मामूली सा खटका भी होता तो मारे भय के काँप उठता। फिर किसी तरह पाँच मिनट भी गुजर गये।

अन्तिम सिटी के बाद गाड़ी हरकत में आयी तो मैंने चैन की एक लम्बी साँस ली और अपनी सीट पर ढेर होकर मोहिनी के बारे में सोचने लगा। गाड़ी के साथ-साथ मेरा ज़हन भी उड़ा चला जा रहा था। तरह-तरह के ख्यालात और वहम मुझे परेशान कर रहे थे। मुझे इस कल्पना से ही खौफ हो जाता था कि कहीं इस बार डॉली को अपनी भूख के लिये न चुन बैठे। मेरी उलझनों में बढ़ोतरी होती जा रही थी।

जेल से रिहाई के बाद मैंने यह पक्का निश्चय कर लिया था कि चाहे परिस्थिति कैसी भी हो मैं मोहिनी की भयानक इच्छा पूरी न करूँगा। मगर मोहिनी के सामने मेरी इच्छा का क्या महत्त्व था? अब जबकि डॉली पर आ बनी थी, मैं सोच रहा था कि उसे बचाने के लिये मुझे मोहिनी की इच्छाओं के आगे सिर झुकाना ही होगा।

कुछ भी हो, मैं डॉली के लिये बेकसूर और बेगुनाह लोगों का खून बहाने से भी नहीं हिचकूँगा। मुझे मोहिनी से सौदा करना ही पड़ेगा। मुझे डॉली का जीवन अपने जीवन से प्यारा था।

बम्बई से शोलापुर तक के सफ़र का एक-एक पल मेरे लिये बड़ा जानलेवा साबित हुआ। किसी न किसी प्रकार गाड़ी अपनी मंजिल पर पहुँची तो मैं तेजी से नीचे उतरा। एक कुली द्वारा अपना सामान ऑटो-रिक्शा में रखवाया फिर कुली को पैसे देकर उसमें बैठ गया।

“कहाँ चलूँ साहब?” ऑटो-रिक्शा वाले ने पूछा तो मेरी समझ में नहीं आया कि कौनसी जगह बताऊँ। मैं शोलापुर के गली-कूचों से बिल्कुल अनभिज्ञ था। डॉली शोलापुर में किस जगह ठहरी होगी, यह बात जानना आसान काम नहीं था। इसलिए एक पल के लिये मैं गुम-सा हो गया फिर तुरंत ही ख्याल आया, यक़ीनन डॉली ने शोलापुर में अपने ठहरने के लिये किसी अच्छे होटल को ही चुना होगा।

मैंने रिक्शे वाले से पूछा – “यहाँ का सबसे बड़ा होटल कौन-सा है?”

“अपनी-अपनी पसंद की बात है साहब। वैसे तो यहाँ तीन-चार बड़े होटल मौजूद हैं।”

“ठीक है! तुम मुझे उन होटलों में ले चलो। जो भी पसंद आ गया, वहीं ठहर जाऊँगा।” मैंने जल्दी से कहा, फिर उसे संतुष्ट करने के लिये बोला। “चिन्ता मत करो, मैं तुम्हें किराये के अलावा इनाम भी दूँगा!”

“आप ही लोगों का सेवक हूँ साहब!” रिक्शे वाले ने कहा फिर रिक्शा आगे बढ़ा दिया।

रिक्शा विभिन्न सड़कों से गुजरता रहा। मुझे कुछ नहीं मालूम था कि वह सड़कें कैसी थीं और शोलापुर कैसा शहर था। मुझे तो जल्द से जल्द डॉली से मिलने की बेचैनी हो रही थी। दो बड़े होटलों में भी डॉली का पता न चला तो मैं तीसरे होटल पहुँचा और फिर जब वहाँ भी मायूसी हाथ लगी तो मेरा दिल डूबने लगा। मैं होटल से बाहर आया तो इस बार रिक्शे वाले ने मुझे कुछ गहरी नज़रों से देखा।

“कैसा रहा साहब? क्या यह होटल भी आपको पसंद नहीं आया?”

“नहीं!” मैं रिक्शे में बैठते हुए मुर्दानी आवाज़ में बोला। “किसी और होटल में ले चलो।”

“अब तो बड़े होटलों में से केवल एक ही होटल रह गया है साहब।”

“चलो उसे भी देख लेते हैं।” मैंने मुर्दानी आवाज़ में कहा तो रिक्शा दुबारा हरकत में आ गया।

कुछ देर तक ख़ामोशी रही, फिर रिक्शे वाले ने कुछ अजीब अंदाज में मुझे सम्बोधित किया – “साहब, एक बात पूछूँ?”

“क्या?” मैं बेदिली से बोला।

“कहीं आपको किसी विशेष प्रकार के होटल की तलाश तो नहीं है?”

“क्या मतलब?” मैंने कुछ न समझते हुए पूछा।
 
“बड़े और छोटे होटलों पर चूँकि आये दिन पुलिस के छपे पड़ते रहते हैं, इसलिए खुफिया धंधा अब केवल मध्यम दर्जे...।”

“बको मत...!” मैं उसका मतलब भाँपकर तिलमिला गया। फिर गुस्सा पीता हुआ बोला। “तुमने मेरे बारे में जो अनुमान लगाया है, वह बिल्कुल गलत है। मैं ऐसे टाइप के लोगों में से नहीं हूँ।”

रिक्शे वाले ने कोई उत्तर नहीं दिया, परन्तु उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह मेरे व्यवहार से नाराज़ हो गया है। फिर भी मैंने इस बात का फैसला कर लिया था कि चौथे होटल में पहुँचकर मैं रिक्शे को छोड़ दूँगा। यदि डॉली मिल जाती है तो ठीक है, वरना उसे तलाश करने के लिये कोई और सवारी पकड़ूँगा।

जब चौथे होटल पर रिक्शा रुका तो मैंने अपना सामान नीचे उतार लिया और रिक्शे वाले को किराये के अलावा दस रुपये अधिक पुरस्कार के रूप में देकर चलता किया। तत्पश्चात होटल के एक नौकर को सामान के निकट छोड़कर मैं धड़कते हुए दिल से भीतर गया ताकि डॉली के बारे में मालूम कर सकूँ।

मैं सोच रहा था, यदि डॉली इस होटल में भी न मिली तो क्या होगा? मैं उसे शोलापुर में कहाँ-कहाँ तलाश करता फिरूँगा? लेकिन मेरी परेशानी अधिक देर न रही। होटल के क्लर्क ने रजिस्टर देखते हुए मुझे बताया कि मिसेज डॉली राज इसी होटल के कमरा नम्बर २४ और २५ में ठहरी हुई हैं। परन्तु इस समय वह कहीं बाहर गयी हुई हैं।

यह सुनकर कि डॉली इसी होटल में है, मेरी प्रसन्नता की कोई सीमा न रही। मैंने जब मैनेजर से मिलकर बताया कि मैं डॉली का पति हूँ तो उसने बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया और इत्मीनान करने के बाद मुझे इस बात की आज्ञा दे दी कि मैं डॉली के संग एक ही कमरें में ठहर सकता हूँ। बल्कि होटल के एक नौकर को बुलाकर उसे आदेश दिया कि मेरा सामान ऊपर पहुँचा दिया जाए। एक नौकर सामान लेने बाहर गया तो मैनेजर स्वयं मुझे डॉली के कमरे तक छोड़ने आया। कमरे का लॉक उसने डुप्लीकेट चाबी से खोल दिया था।

सामान कमरे में रखवाकर मैं कुछ देर तक डॉली की प्रतीक्षा करता रहा, फिर दुबारा नीचे पहुँचकर क्लर्क से पूछा – “क्या आप बता सकते हैं कि डॉली कितनी देर से बाहर गयी हुई है?”

“मैंने टाइम नोट नहीं किया था सर। वैसे मेरा ख्याल है, उनको गये हुए दो घंटे से अधिक हो चुके हैं।”

“क्या उनके साथ मेरा मैनेजर भी था?” मैंने अपनी घड़ी पर नज़र डालते हुए सवाल किया, जो उस समय शाम के ठीक पाँच बजा रही थी।

“एक साहब तो थे उनके साथ।” क्लर्क ने मुझे गौर से देखते हुए मद्धिम स्वर में उत्तर दिया।

“जाते समय उन्होंने कुछ कहा तो नहीं था?” मैंने बेचैनी भरे स्वर में पूछा।

“जी नहीं!”

क्लर्क से बातचीत करके मैं बाहर आकर बड़ी देर तक होटल के लॉन में टहलता रहा। जब भी कोई टैक्सी होटल में दाखिल होती तो मेरा दिल धड़कने लगता। मेरे मस्तिष्क में नाना प्रकार के संदेह उत्पन्न हो रहे थे। मैं बड़ी बेचैनी से डॉली का वापसी की राह देख रहा था। जब आठ बजे तक वह वापिस न लौटी तो मेरी परेशानी संदेह की सीमा तक बढ़ गयी। मैं दुबारा ऊपर कमरे में टहलने लगा। एक-एक मिनट मुझे एक-एक युग की तरह लग रहा था।

बाहर कॉरिडोर में जब भी किसी के क़दमों की आवाज़ उभरती, मैं लपककर दरवाजे पर आ जाता। फिर मायूस होकर दुबारा अन्दर आ जाता। साढ़े आठ बजे तक मैं परेशान हालत में टहलता रहा। फिर अचानक दरवाजे पर उभरने वाली क़दमों की आहट ने मुझे चौंका दिया। मैंने घूमकर देखा तो डॉली – मेरी आत्मा, मेरी ज़िन्दगी, दरवाजे पर खड़ी मुझे आश्चर्यचकित दृष्टि से देख रही थी।

डॉली को सही सलामत देखकर ऐसा मालूम हुआ जैसे स्वर्ग मिल गया हो। मैंने लपककर दीवानगी के आलम मैं उसे अपने आगोश में समेट लिया।

“त... तुम ठीक-ठाक तो हो?” मैंने उसे गुमसुम देखकर पूछा।

“आप कब आए?” उसने मेरी बात नज़रअंदाज करते हुए ढीले-ढाले स्वर में पूछा।

“मैं आज दोपहर की गाड़ी से पहुँचा हूँ। बड़ी भाग-दौड़ के बाद इस होटल तक पहुँचा।” मैंने तेजी से कहा। फिर पूछा – “यहाँ तुम्हें कोई कष्ट तो नहीं हुआ? तुम कुछ घबराई सी नज़र आ रही हो।”

“आपके यहाँ अचानक आने का कारण क्या है?” डॉली ने मेरे प्रश्न का उत्तर देने की बजाय कुछ अजीब-सा प्रश्न किया।

“क्या तुम्हें मुझे यहाँ देखकर ख़ुशी नहीं हुई?” मैंने झुंझलाते हुए कहा।

“नहीं, यह बात नहीं हैं!” डॉली इस बार भयभीत अंदाज में मुझसे लिपट गयी। फिर सिसकती हुई बोली – “राज, भगवान के लिये मुझे बचा लो! यहाँ से जितनी जल्दी संभव हो सके, भाग चलो।”

“क्यों?” मैंने घबराते हुए स्वर में पूछा। “तुम इस तरह भयभीत क्यों हो? क्या कुछ हो गया?”

“समय नष्ट न करो राज। वह... वह... विक्रम!” डॉली अपना वाक्य अधूरा छोड़कर सिसकने लगी।

किसी भयभीत बच्चे की तरह वह मेरे सीने से चिपटी हुई थी। उसका सारा बदन काँप रहा था।

विक्रम मेरे मैनेजर का नाम था। डॉली जब केवल ‘विक्रम’ कहकर खामोश हुई तो मेरे ज़हन में एक पल के भीतर न जाने कितने विचार उभरकर आपस में गड्ड-मड्ड हो गये।

“विक्रम कहाँ है? मुझे क्लर्क ने बताया कि तुम उसके साथ बाहर गयी थीं।”

“हाँ!” डॉली कठिनाई से कहकर दुबारा सिसकने लगी तो मैंने परेशानी और उलझन के मिले-जुले भाव में प्रश्न किया।
 
“भगवान के लिये कुछ बताओ तो सही? आखिर तुम इतनी भयभीत क्यों हो?”

“राज!” डॉली डबडबाई आँखों से मेरे चेहरे पर नज़रें जमाती हुई बोली। “मैं बेगुनाह हूँ, मुझे बचा लो राज! मैंने विक्रम को... ग.. ग... गोली मारकर उसकी हत्या कर दी है।”

“तुमने विक्रम को गोली मारकर उसकी हत्या कर दी। मगर क्यों? यह तुम क्या कह रही हो? क्या तुम होश में हो?” मैंने घबराई हुई आवाज़ में पूछा तो डॉली रुक-रुककर बोली –

“व... वह कमीना, मेरी इज्ज़त लूटना चाहता था!”

डॉली का जवाब सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। मैं बिल्कुल चकराकर रह गया; लेकिन दूसरे ही क्षण परिस्थिति को देखकर एक नतीजा निकाल लिया। डॉली ने जो कुछ कहा था वह सत्य ही होगा, इसलिए कि उसमें शत-प्रतिशत मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व की शरारत नज़र आ रही थी। विक्रम को मैं बहुत अच्छी तरह जानता था। वह एक शरीफ और वफादार युवक था, इसलिए यह आशा नहीं की जा सकती थी कि उसने डॉली पर बुरी नज़र डाली हो। यक़ीनन मोहिनी ने उसे इस काम पर आमदा किया था। यदि विक्रम के ऊपर मुझे पूर्ण रूप से विश्वास न होता तो मैं डॉली को उसके साथ शोलापुर क्यों भेजता?

तो मोहिनी ने इस तरह अपना प्रतिशोध लिया। सारी बात साफ थी। उसी ने विक्रम के सिर पर सवार होकर उसे डॉली की आबरू लूटने के घिनौने जुर्म पर उकसाया होगा। फिर प्रकट है डॉली ने अपनी लाज बचाने के लिये उसे शूट कर दिया होगा।

मैं अभी इन्हीं बातों पर विचार कर रहा था कि डॉली ने दुबारा कहा – “राज... भगवान गवाह है कि मैंने हालात से मजबूर होकर विक्रम को गोली मारी, वरना...।”

“मुझे विश्वास है डॉली कि तुम ठीक कह रही हो।” मैंने डॉली को तसल्ली दी तो वह बेअख्तियार फूट पड़ी सिसकती हुई बोली –

“भगवान के लिये यहाँ से कहीं भाग चलो राज! वरना पुलिस मुझे गिरफ्तार कर लेगी। मुझे फाँसी हो जायेगी राज। मैं मौत से नहीं डरती लेकिन... लेकिन आपसे जुदाई की कल्पना मात्र भी मेरे लिये असहनीय है। उससे तो बेहतर है कि आप मुझे अपने हाथों से मार डालो। इस प्रकार मेरी आत्मा को चैन तो मिल जाएगा।”

“घबराओ मत डॉली! मैं तुम्हें हर कीमत पर बचा लूँगा। ईश्वर के लिये साहस मत खोओ।”

मैं डॉली को तसल्ली देने लगा परन्तु स्वयं मेरा मस्तिष्क उस समय काम नहीं कर रहा था। अब शोलापुर में अधिक रुकना खतरे की बात थी। इसलिए मैं डॉली को समझा-बुझाकर नीचे आ गया। होटल का बिल अदा किया, फिर ऊपर आकर जल्दी से सामान बाँधने के बाद डॉली को साथ लेकर सीधा स्टेशन की ओर चल दिया।

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भाग्य अच्छा था जो मुझे स्टेशन पहुँचते ही बम्बई जाने की गाड़ी तैयार मिल गयी। मैंने दो टिकट ख़रीदे और गाड़ी में बैठकर बम्बई के लिये रवाना हो गया। उस समय बम्बई जाना मेरे लिये खतरनाक सिद्ध हो सकता था। बहुत संभव था कि कल्लन खां के बयान के बाद पुलिस मेरी खोज में हो। परन्तु बम्बई जाने के अलावा मैं कहीं और जा भी तो नहीं सकता था।

डॉली बुरी तरह भयभीत थी। कम्पार्टमेंट में हमारे अलावा एक मद्रासी जोड़ा भी मौजूद था इसलिए मैं डॉली से कोई बात न कर सका। लेकिन दो स्टेशनों के बाद वह जोड़ा उतर गया तो हम अकेले रह गये। डॉली की स्थिति लगातार ख़राब होती जा रही थी। उसके चेहरे का रंग पीला पड़ चुका था। बार-बार वह मुझे भयभीत निगाहों से घूरने लगती। मुझसे उसकी हालत देखी नहीं जा रही थी। मोहिनी ने मुझे जिस स्थिति में फँसाया था, उससे बचने का कोई रास्ता नहीं दिखायी पड़ता था। फिर मैंने स्वयं पर काबू पाकर डॉली को समझाते हुए कहा –

“जो कुछ होना था हो गया। अब आगे जो कुछ होगा देखा जाएगा। तुम बेकार चिन्ता कर रही हो।”

“राज!” डॉली ने मुझसे बेअख्तियार लिपटते हुए कहा। “वायदा करो राज कि तुम मुझे मेरी गिरफ्तारी से पहले ही अपने हाथों से मार डालोगे।”

“इसकी नौबत नहीं आएगी।” मैंने उसे प्रेम भरे स्वर से सम्बोधित किया। “तुम्हारे बचाव के लिये मैं सब कुछ कर गुजरूँगा। लेकिन शर्त यही है कि तुम खुद पर काबू रखो।”

डॉली देर तक मुझसे लिपटी रही। मैं उसे तसल्ली देता रहा तब जाकर कहीं उसकी स्थिति थोड़ी बहुत सुधरी। मैंने जानबूझकर अभी तक उसे यह नहीं बताया था कि मेरे अचानक शोलापुर पहुँचने का कारण क्या था। परन्तु डॉली ने जब बार-बार पूछा तो मैंने इस ख्याल से कि कहीं वह कभी अनजाने में मोहिनी की शैतानी शक्ति का शिकार न हो जाये, उसे सभी परिस्थितियों से आगाह कर दिया।

“तो क्या विक्रम की इस हरकत की जिम्मेदार मोहिनी है?” उसने पूरी बात सुनने के बाद आश्चर्य से कहा।

“हाँ! मेरा यही विचार है।”

“फिर अब क्या होगा?”

“मेरा ख्याल है कि अब हमें बम्बई से भी कहीं दूर चले जाना चाहिए। मेरे विरुद्ध चूँकि वहाँ एक केस बन चुका है इसलिए अब वहाँ रहना हमारे लिये खतरे से खाली नहीं।”

डॉली ख़ामोशी से कुछ सोचती रही। वह कुछ कहना चाहती थी कि मैंने पूछा – “क्या तुमने उन महात्मा से भेंट की जिनसे मिलने तुम शोलापुर आयी थी?”

“मैं विक्रम को साथ लेकर उन्हीं महात्मा से मिलने के इरादे से निकली थी लेकिन...।”

“विक्रम को तुमने कहाँ गोली मारी थी?” मैंने अचानक कुछ सोचकर डॉली की बात काटते को हुए पूछा।

“कदाचित वह पार्क था। विक्रम जिस समय होटल से चला था उस समय बिल्कुल शांत था लेकिन रास्ते में उसने अचानक एक पार्क के पास कार रुकवायी और मुझे साथ लेकर एक सुनसान स्थान की ओर बढ़ चला। मैं समझी कि महात्मा कहीं उधर ही रहते होंगे। परन्तु एक सुनसान स्थान पर जाकर उसने बिल्कुल अचानक मुझसे जबरदस्ती शुरू कर दी। मैंने अपने पर्स से पिस्तौल निकाला और...।” डॉली इतना कहकर फूट-फूटकर रोने लगी।

“तुम्हारा पिस्तौल कहाँ हैं?”

“व... वह, मैं वहीं फेंक आयी थी।” डॉली ने भयभीत स्वर में कहा।

मेरा दिल अचानक धक्क से रह गया। पिस्तौल का घटनास्थल पर पाया जाना निःसंदेह डॉली को फाँसी के फंदे पर ले जाता। मैं अभी गुत्थी को सुलझाने की कोशिश कर रहा था कि डॉली ने दुबारा मुझे सम्बोधित किया।

“राज! क्या आपको विश्वास है कि आप मुझे फाँसी के फंदे से बचा लेंगे?” उसके स्वर में दर्द था।

“क्यों नहीं! दौलत की ताकत के आगे दुनिया की कोई और ताकत नहीं ठहर सकती। तुम बिल्कुल भी परेशान न हो। सब कुछ ठीक हो जाएगा।”

अब यह तो ईश्वर ही जानता है कि डॉली मेरा उत्तर सुनकर संतुष्ट हुई थी या नहीं, परन्तु मैंने उसकी खामोशी से अनुमान लगाया कि वह किसी सीमा तक सुकून महसूस कर रही थी।

बम्बई तक हमारे बीच कोई बात नहीं हुई। रास्ते भर मुझे यह खटकता रहा कि कहीं मोहिनी दुबारा कोई वार न कर बैठे। मैंने डॉली को भी समझा दिया था कि वह मोहिनी के रहस्यमय अस्तित्व से भविष्य में बहुत सावधान रहे और यदि वह उसे अपने सिर पर महसूस करे तो तुरंत मुझे एक विशेष संकेत द्वारा बता दे।

बम्बई पहुँचकर वह रात हमने जिस उलझन में गुजारी, वह हम ही जानते हैं। अगले दिन सुबह होते ही मैंने और डॉली ने मिलकर तीन सूटकेस में आवश्यक कपड़े और कीमती जेवरात रखे। एक बिस्तरबंद में दो बिस्तर लपेटे और एक एयरबैग में दूसरी आवश्यक चीजें रखीं। इन कामों से निपटकर मैं डरते-डरते बाहर निकला और उन तमाम बैंकों से अपनी तमाम जमा-पूँजी निकाल लाया जिनमें मेरा हिसाब था। दिल्ली के लिये मैंने दो सीटें पिछली रात ही बुक करा ली थीं।

घर पहुँचकर मैंने शेष तैयारियाँ भी पूरी कीं और जब फ्लाइट की रवानगी में एक घंटा शेष रह गया तो मैं डॉली को साथ लेकर सांताक्रुज हवाई अड्डे के लिये रवाना हो गया।

प्रातःकाल से अब तक मैंने किसी अखबार पर नज़र नहीं डाली थी। लेकिन एयरपोर्ट पहुँचकर मैंने सावधानी से एक अखबार खरीद लिया।

डॉली के चेहरे पर लगातार चिन्ता के भाव मौजूद थे। उसमें विक्रम की मौत का और भविष्य में पेश आने वाले परिणामों का इतना गहरा प्रभाव लिया था कि वह बरसों की बीमार मालूम होती थी। जब तक प्लेन ने उड़ान नहीं भरी वह चुपचाप बैठी रही। मगर प्लेन के उड़ान भरते ही उसने यूँ एक लम्बी साँस खिंची जैसे किसी बड़ी चिन्ता से मुक्ति मिली हो।

मैंने एक बार फिर फुसफुसाकर उसे शांत रहने को कहा। फिर अखबार, जिसे अब तक मैंने लपेटकर हाथों में दबा रखा था, उसे खोला और जल्दी-जल्दी हेडिंग पर नज़र डालने लगा।

तीसरे पृष्ठ पर मुझे वह समाचार मिल गया जिसकी मुझे खोज थी। मैंने भयपूर्ण दृष्टि से समाचार पढ़ा तो मेरी अक्ल चकरा कर रही गयी। डॉली का कहना था कि उसने किसी पार्क के वीराने में विक्रम को गोली मारी थी और अपना पिस्तौल भी वहीं फेंक आयी थी। परन्तु समाचार-पत्र में छपने वाला समाचार उस बयान से कतई भिन्न था।
 
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