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“यह सब तुम मुझ पर छोड़ दो। मैं आज ही किसी समय फिर वापिस चली जाऊँगी। मुझे उससे एक आवश्यक काम भी लेना है जिसके उपरान्त हो सकता है कि उसे फाँसी की सज़ा जो जाए।”
मैंने महसूस किया कि मोहिनी के होंठों पर एक अजीब सी मुस्कराहट फैली हुई है।
“मैं समझा नहीं।”
“इससे पहले भी तो अनेक बातें तुम नहीं समझे थे। इतनी बेचैनी भी क्या है। धीरे-धीरे सब बातें तुम्हारी समझ में आ जायेंगी।” मोहिनी ने बहुत रहस्यमय अंदाज में जवाब दिया फिर पूछा। “क्या तुमने डॉली को मेरे सम्बन्ध में सब कुछ बता दिया है?”
“हाँ!” मैंने स्वीकार किया। “यह सब उसी रोज की बात है जिस दिन पुलिस ने मुझे चरणदास की हत्या के आरोप में जबरदस्ती गिरफ्तार किया था।”
“पुरानी बातों को मत छेड़ो। अब हम फिर एक-दूसरे के दोस्त बन चुके हैं।”
“ हाँ!” मैंने भरी हुई आवाज़ में उत्तर दिया। “मेरा विचार है तुम्हारे हृदय में अभी तक मेरी ओर से कोई शंका है।”
“क्या मतलब?” मोहिनी ने चौंकते हुए पूछा। मैं गड़बड़ा गया। फिर जल्दी से संभलकर बोला –
“अगर मुझे दोस्ती न करनी होती तो तुम मुझे मजबूर तो नहीं कर रही थी।”
“हूँ! तो यह बात है मिस्टर राज! एक बात कह दूँ…।”
“कहो, क्या बात है?” मैंने अपने धड़कते हुए दिल पर अधिकार पाते हुए पूछा।
मोहिनी ने जिस भाव में मुझसे कुछ कहने की आज्ञा चाही थी वह बेहद रहस्यमय थी।
“कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुमने समय से मजबूर होकर मेरे साथ एक अस्थाई समझौता कर लिया हो।”
“तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैंने तुमसे किसी षड्यंत्र के तौर पर तुम्हारे साथ कोई दोस्ती की है? वैसे भी तुमसे कोई बात छिपी नहीं है।”
“मेरी बात छोड़ो, तुम अपने दिल की कहो।”
“वहम का इलाज़ तो लुकमान हकीम के पास भी नहीं था।” मैंने मोहिनी को वफ़ादारी का विश्वास दिलाने की खातिर बड़े जोरदार स्वर में उत्तर दिया।
मोहिनी पर मेरी बात का प्रभाव पड़ा, इसका इल्म तो मेरे फरिश्तों को भी नहीं था लेकिन इतना जरूर मैंने महसूस कर लिया था कि मोहिनी मेरा उत्तर सुनकर किसी सोच में डूब गयी थी। उसकी लाल-लाल नशीली आँखें लगातार मेरे चेहरे पर गड़ी हुई थीं कुछ क्षणों तक वह टकटकी बाँधे मुझे घूरती रही। फिर मुस्कुराकर बोली –
“वहम का इलाज़ लुकमान के पास था या नहीं, मुझे इससे कोई सरोकार नहीं। लेकिन मैं इतना जरूर बता सकती हूँ कि मेरे पास हर रोग का इलाज मौजूद है। यदि तुमने इस बार वादाखिलाफी की तो उसके लिये तुम्हें जीवन भर पछताना पड़ेगा।”
“लानत है तुम्हारे ऊपर जो मुझ पर संदेह कर रही हो।” मैं झूठा क्रोध दर्शाता हुआ बोला तो बेतहाशा खिलखिलाकर हँस दी। फिर बड़ी प्यार भरी नज़रों से देखती हुई बोली –
“आज तुमने पहली बार मुझ पर गुस्सा किया है राज। गुस्से में भी तुम कम अच्छे नहीं लगते।”
“विश्वास करो, तुमने मेरे ऊपर संदेह करके मेरी भावनाओं को ठेस पहुँचाई है।” मैं गंभीरता के साथ बोला।
“नाराज़ हो गये मुझसे, क्यों?” मोहिनी ने बड़ी गहराई से कहा।
“तुमने बात ही ऐसी की थी।”
मोहिनी ने मुझसे बड़े प्यार भरे अंदाज में कहा – “अच्छा, जाने भी दो! आगे जो कुछ भी होगा, तुम भी देखोगे और मैं भी।”
मैंने महसूस किया कि मोहिनी के होंठों पर एक अजीब सी मुस्कराहट फैली हुई है।
“मैं समझा नहीं।”
“इससे पहले भी तो अनेक बातें तुम नहीं समझे थे। इतनी बेचैनी भी क्या है। धीरे-धीरे सब बातें तुम्हारी समझ में आ जायेंगी।” मोहिनी ने बहुत रहस्यमय अंदाज में जवाब दिया फिर पूछा। “क्या तुमने डॉली को मेरे सम्बन्ध में सब कुछ बता दिया है?”
“हाँ!” मैंने स्वीकार किया। “यह सब उसी रोज की बात है जिस दिन पुलिस ने मुझे चरणदास की हत्या के आरोप में जबरदस्ती गिरफ्तार किया था।”
“पुरानी बातों को मत छेड़ो। अब हम फिर एक-दूसरे के दोस्त बन चुके हैं।”
“ हाँ!” मैंने भरी हुई आवाज़ में उत्तर दिया। “मेरा विचार है तुम्हारे हृदय में अभी तक मेरी ओर से कोई शंका है।”
“क्या मतलब?” मोहिनी ने चौंकते हुए पूछा। मैं गड़बड़ा गया। फिर जल्दी से संभलकर बोला –
“अगर मुझे दोस्ती न करनी होती तो तुम मुझे मजबूर तो नहीं कर रही थी।”
“हूँ! तो यह बात है मिस्टर राज! एक बात कह दूँ…।”
“कहो, क्या बात है?” मैंने अपने धड़कते हुए दिल पर अधिकार पाते हुए पूछा।
मोहिनी ने जिस भाव में मुझसे कुछ कहने की आज्ञा चाही थी वह बेहद रहस्यमय थी।
“कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुमने समय से मजबूर होकर मेरे साथ एक अस्थाई समझौता कर लिया हो।”
“तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैंने तुमसे किसी षड्यंत्र के तौर पर तुम्हारे साथ कोई दोस्ती की है? वैसे भी तुमसे कोई बात छिपी नहीं है।”
“मेरी बात छोड़ो, तुम अपने दिल की कहो।”
“वहम का इलाज़ तो लुकमान हकीम के पास भी नहीं था।” मैंने मोहिनी को वफ़ादारी का विश्वास दिलाने की खातिर बड़े जोरदार स्वर में उत्तर दिया।
मोहिनी पर मेरी बात का प्रभाव पड़ा, इसका इल्म तो मेरे फरिश्तों को भी नहीं था लेकिन इतना जरूर मैंने महसूस कर लिया था कि मोहिनी मेरा उत्तर सुनकर किसी सोच में डूब गयी थी। उसकी लाल-लाल नशीली आँखें लगातार मेरे चेहरे पर गड़ी हुई थीं कुछ क्षणों तक वह टकटकी बाँधे मुझे घूरती रही। फिर मुस्कुराकर बोली –
“वहम का इलाज़ लुकमान के पास था या नहीं, मुझे इससे कोई सरोकार नहीं। लेकिन मैं इतना जरूर बता सकती हूँ कि मेरे पास हर रोग का इलाज मौजूद है। यदि तुमने इस बार वादाखिलाफी की तो उसके लिये तुम्हें जीवन भर पछताना पड़ेगा।”
“लानत है तुम्हारे ऊपर जो मुझ पर संदेह कर रही हो।” मैं झूठा क्रोध दर्शाता हुआ बोला तो बेतहाशा खिलखिलाकर हँस दी। फिर बड़ी प्यार भरी नज़रों से देखती हुई बोली –
“आज तुमने पहली बार मुझ पर गुस्सा किया है राज। गुस्से में भी तुम कम अच्छे नहीं लगते।”
“विश्वास करो, तुमने मेरे ऊपर संदेह करके मेरी भावनाओं को ठेस पहुँचाई है।” मैं गंभीरता के साथ बोला।
“नाराज़ हो गये मुझसे, क्यों?” मोहिनी ने बड़ी गहराई से कहा।
“तुमने बात ही ऐसी की थी।”
मोहिनी ने मुझसे बड़े प्यार भरे अंदाज में कहा – “अच्छा, जाने भी दो! आगे जो कुछ भी होगा, तुम भी देखोगे और मैं भी।”