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Fantasy मोहिनी

“ऐसी तो बात नहीं। जिस तरह मैं डॉली की दोस्त हूँ और उसके लिये दिन-रात परेशान रहती हूँ। उस तरह आपका भी कोई न कोई ज़रूर होगा।”

और उस समय अचानक मुझे रामदयाल की याद आ गयी। एक लम्बे अर्से के बाद उस पुराने दोस्त की याद आई जो इसी शहर में रहता था और जिसके घर से मोहिनी की कहानी शुरू हुई थी लेकिन बहुत अर्से से मैं रामदयाल से नहीं मिला था। न जाने वह किस हाल में होगा। अब घर में होगा भी या नहीं।

बहरहाल मुझे रामदयाल पर पूरा भरोसा था। मैंने नीलू को उसका पता दे दिया।

नीलू चली गयी तो मैंने सोचा कि अगले दिन मैं रामदयाल से मिलकर आऊँगा। कलकत्ता में वह मेरा अकेला दोस्त था और कहने की बात नहीं कि हम दोनों जिगरी दोस्त थे। एक-दूसरे के भले-बुरे वक्त पर काम आते रहते थे।

अगले दिन मैं रामदयाल से मिलने की तैयारी कर ही रहा था कि एक लड़का मुझसे होटल में मिलने आया और एक खत थमाकर चलता बना। उसने बताया कि उसे नीलू ने भेजा है। मैंने खत खोलकर पढ़ा। मुझे नीलू ने बुलाया था। पत्र में लिखा था कि डॉली आज एक जगह आएगी जहाँ मैं उससे मिल सकता था। पत्र में उसने बंग्ले का पता भी दिया था।

मैंने सोचा उस तरफ़ से होकर रामदयाल के यहाँ निकल जाऊँगा। इन दिनों मैं शिवचरण की राख अपने साथ ही रखता था। जिसे मैंने एक रबड़ ट्यूब में भर ली थी और कमर पर उसे बाँधे रहता था।

होटल से निकलकर मैंने टैक्सी ली और उस पते की ओर चल पड़ा।

जब मैं उस बंग्ले के फाटक पर पहुँचा तो मैंने टैक्सी छोड़ दी। मेरा अनुमान था कि वह नीलू का घर होगा जहाँ डॉली उससे मिलने आई होगी।

बंगला सुनसान पड़ा हुआ था। बंगले का फाटक खुला था और कोई दरबान या नौकर कहीं नज़र नहीं आ रहा था। मैं थोड़ी हिचकिचाहट के बाद फाटक पार करता हुआ आगे बढ़ गया। जब मैं कोठी के बरामदे में पहुँचा और मैंने कॉल बेल दबाई तो चंद सेकेंड बाद ही दरवाज़ा खुला और एक मोटा तंदुरुस्त नौकर सामने खड़ा नज़र आया। उसकी वेशभूषा से पता चलता था कि वह नौकर है परंतु उसका चेहरा नौकरों वाला न लगता था। वह कोई छटा हुआ बदमाश मालूम पड़ता था। परंतु मैं यहाँ तक आने के बाद डॉली से मिले बिना वापस नहीं लौट सकता था।

मैंने उससे कुछ झिझकते हुए डॉली के बारे में पूछा।

“आइए, वह आपका ही इंतज़ार कर रही है।” नौकर बोला और उसने मेरे लिये रास्ता छोड़ दिया।

मेरे भीतर दाख़िल होने के बाद उसने दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया। मैंने इस बार कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। फिर वह मुझे दो-एक कमरों से गुजरता हुआ, एक कमरे के दरवाज़े पर छोड़ता हुआ बोला-

“अंदर चले जाइए, इसी कमरे में।”

और वह एक तरफ़ चला गया।

मुझे थोड़ी सी झिझक महसूस हुई परंतु फिर कुछ साहस बढ़ाया और कमरे का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हो गया। यह कमरा कुछ इस तरह का था कि एकदम उजाले से अंधेरे में पहुँचकर कुछ पल के लिये मुझे कुछ नज़र नहीं आया। परंतु फिर जब मैंने अपने पीछे दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ सुनी तो चौंक पड़ा।

और फिर एकदम से मेरे पाँव तले की ज़मीन खिसक गयी।

मेरे सामने डॉली नहीं, डॉली का बाप खड़ा था और उसकी आँखों से शोले दहक रहे थे। उसके होंठों पर जहरीली मुस्कराहट खेल रही थी। फिर मैंने घबड़ाकर दायें-बायें देखा। कमरे में चार हट्टे-कट्टे मुस्टंडे नज़र आए जो हाथ बाँधे खड़े थे।

“यह... यह... मेरे साथ... धोखा।” मैं हकलाया।

“धोखे के बच्चे, हरामजादे, सुअर की औलाद! अपनी माँ के...!” डॉली का बाप दहाड़ा। “मैंने तुझे कहा था कि शहर छोड़कर भाग जा, इसी में तेरी भलाई है। तूने इसके बजाय डॉली को फोन किया। अब देख डॉली नहीं, तेरी मौत तेरे सामने खड़ी है।”

मैं लड़खड़ाकर दरवाज़े की तरफ़ हटा। परंतु दरवाज़ा पहले ही बंद हो चुका था और वे चारों पहलवान हाथ खोल चुके थे। वे धीरे-धीरे मेरी तरफ़ बढ़ रहे थे। मुझे मौत इंच-इंच अपने निकट आती महसूस हो रही थी।

“सेठजी, मुझे क्षमा कर दो! मैं फिर कभी इस तरह नहीं करूँगा।”

“बुजदिल, कायर! बस इतनी मोहब्बत है तुझे डॉली से ? उसके लिये जान भी नहीं दे सकता ? देख यहाँ तू चाहे जितना भी चिल्ला, जितना गिड़गिड़ा, तेरी कोई सुनने वाला न होगा। चाहे तो बहादूरों की तरह इन लोगों से मुकाबला कर। कुछ देर तक तो जान बची रहेगी; और तुझे यह रंज नहीं रहेगा कि तू कुत्ते की मौत मारा गया।”

वह मुझ पर टूट पड़े। मैंने इकलौते हाथ से अपने बचाव का संघर्ष शुरू कर दिया। लातें चलाईं, चीख-पुकार मचाई। परंतु तब तक डॉली का बाप कहकहे लगाता रहा और घूँसे मुझ पर कहकहे बरसाते रहे। उन्होंने मेरे जोड़-जोड़ पर प्रहार किया। एक के पास लोहे की छड़ थी जिससे वह मेरी कमर, मेरी हड्डियाँ तोड़ डाल रहा था। आख़िरकार मैं चेतना शून्य हो गया।

फिर जब मेरी आँख खुली तो मैं कूड़े की ढेर पर पड़ा था। मेरा सारा शरीर पके हुए फोड़े के मानिंद दुख रहा था। चारों तरफ़ रात का अंधकार फैला हुआ था। मैं कुछ देर तक उसी प्रकार बेसुध पड़ा रहा। मैंने उठना चाहा तो मेरे शरीर के दुखते अंगों ने साथ नहीं दिया और फिर होश में आने के बाद मैं बड़ी मुश्किल से कूड़े के ढेर से घिसटता हुआ बाहर आया। कदाचित उन लोगों ने मुझे मरा हुआ समझकर वहाँ फेंक दिया था।
 
मुझे अपने आप पर हैरानी हुई कि मैं किस तरह ज़िंदा बच गया। काश, कि मैं मर गया होता। मैं कई बार जलालत कि मौत मर चुका था। फिर भी अपने जीवन का बोझ कोढ़ की तरह धो रहा था। शायद मेरी किस्मत में अभी और दुख लिखे थे।

किसी तरह घिसटते-घिसटते मैं म्यूनिसपैल्टी के नल तक पहुँच गया। जहाँ मैंने अपना खुश्क गला तर किया तो जिस्म में कुछ जान सी पड़ती हुई महसूस हुई। मेरी ज़ेब से पर्स निकाल लिया गया था। अब मैं खाली हाथ था। होटल में पहुँचना और जल्दी पहुँचना मेरे लिये आवश्यक था। वहाँ मेरा थोड़ा-बहुत सामान और गुजारे भर के लिये पैसे रखे थे।

डॉली के डैडी को यह तो मालूम ही था कि मैं किस होटल में, किस कमरे में ठहरा हूँ। मैं जल्दी ही उस जगह को छोड़ देना चाहता था। और अब मैं गिरते-पड़ते होटल का रास्ता तय कर रहा था।

जिस समय मैं होटल पहुँचा भोर का उजाला फैलने लगा था। मैं चुपचाप होटल में प्रविष्ट हुआ। मेरा हुलिया बिल्कुल भिखारियों जैसा हो रहा था। सारा चेहरा चोटों के कारण नीला पड़ गया था। जगह-जगह खरोंच थी। इस हालत में कोई मुझे देख लेता तो...

किसी तरह मैं छिपता-छिपाता अपने कमरे तक पहुँचा। परंतु यह देखकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि होटल के कमरे पर ताला पड़ा है। मुझे यह समझते देर नहीं लगी थी कि वहाँ पहुँचने से पहले ही दौलत के लम्बे हाथ वहाँ तक पहुँच चुके थे। और अगर अब मैं वहाँ दिखाई दिया तो मेरी खैर न होगी। यह वह ताला था जो कमरा खाली होने पर लगाया जाता था। अब इसकी उम्मीद करना बेकार ही था कि मेरा सामान मुझे मिल जाएगा। ऐसा करने में यह अवश्य ही साबित हो जाएगा कि मैं ज़िंदा हूँ। पुलिस में रिपोर्ट करने का भी यही अर्थ था। फिर मैं चाँदी के हाथों भला कैसे बचा रहता।

मैं चुपचाप वहाँ से खिसक गया। और उस हालत में मुझे एक बार फिर मोहिनी की याद आई। काश, कि मोहिनी मेरे पास होती। फिर मैं गिन-गिनकर इन लोगों से बदला लेता। मोहिनी। मोहिनी जैसे मेरे अपाहिज की बैशाखियाँ थीं।

मोहिनी को याद करते ही मैंने कमर पर लगी वह रबड़ की ट्यूब देखी और फिर संतोष की साँस खींची। वह ज्यों की त्यों मौजूद थी। अगर मैंने वह राख होटल के कमरे में ही छोड़ दी होती तो फिर ईश्वर ही जानता है कि मुझ पर कितने जुल्म टूटने वाले थे।

काली का मंदिर खुलने में अभी दो दिन बाकी थे। मैं सोचने लगा कि यह दो दिन कहाँ बिताऊँ। और फिर मैं रामदयाल के घर की ओर चल पड़ा। थका-हारा, गिरता-पड़ता, छिपता-छिपाता मैं किसी तरह रामदयाल के घर पहुँचा। सड़कों पर ट्रैफिक उमड़ने लगा था। लोगों के दफ़्तर जाने का समय हो गया था।

रामदयाल के घर का दरवाज़ा बंद था। मैंने दरवाज़ा खटखटाया।

कुछ देर बाद ही रामदयाल ने बड़बड़ाते हुए दरवाज़ा खोला और मुझे घूरते हुए दहाड़ा।

“कमबख्त, सुबह होती नहीं कि अपना मनहूस सूरत दिखाने चले आते हैं। अच्छा-खासा आदमी है तू। भीख माँगते लाज नहीं आती। चल अगला दरवाज़ा देख।”

रामदयाल ने दरवाज़ा बंद करना चाहा कि मैंने तुरंत उसे टोका- “रामदयाल, तुम्हें भ्रम हो गया है। मैं भिखारी नहीं हूँ, अलबत्ता मेरी हालत भिखारियों जैसी ज़रूर हो रही है।”

रामदयाल चौंक पड़ा। अब उसने मुझे गौर से देखा– “कौन है तू ? मेरा नाम कैसे जानता है ?”

“हाँ, तुम भी भला मुझे कैसे पहचानोगे ? एक जमाना हो गया लेकिन तब तेरा हाथ, मेरी आँखें सलामत थीं। मेरे बदन पर चीथड़े हुए कपड़े न होते थे। क्या तुम अपने दोस्त राज को भूल गए ?”

“म... राज!” रामदयाल उछल पड़ा, “अरे राज! राज, यह तुम हो ? हे भगवान, यह क्या गत बना रखी है तुमने ? इतने दिन कहाँ रहे तुम ? कहाँ चले गए थे ? मुझे कोई चिट्टी-पत्री तो भेजी होती।”

और फिर रामदयाल ने मुझे खींचकर सीने से लगा लिया। तुरंत ही वह मुझे अंदर ले गया।

“अरी माया, ओ माया! सुनती हो, मेरा दोस्त आया है। मैं तुमसे कहाँ करता था न...”

“अभी आई।” अंदर से किसी स्त्री का स्वर सुनाई दिया।

“तुम्हारी भाभी है।” रामदयाल ने कहा– “लेकिन यार, यह चोटों के निशान किस तरह के हैं ? तुम तो जख्मी मालूम पड़ते हो।”

“मैं सब कुछ तुम्हें बताऊँगा रामदयाल। पहले जरा नहा-धो लूँ। फिर बैठकर आराम से बातें होंगी। भाभी मुझे इस हुलिए में देखेगी तो क्या सोचेगी ?”

रामदयाल ने मुझे बाथरूम का रास्ता दिखा दिया।

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रामदयाल की पत्नी माया एक सुघड़ घरेलू महिला थी। परंतु एक पढ़ी-लिखी सुंदर स्त्री भी थी। दोनों मियाँ-बीवी अकेले रहते थे। घर-संसार खुशहाल था। दोनों ने मेरी अच्छी-खासी सेवा की।

रामदयाल को मैंने अपनी ज़िंदगी की सारी दास्तान सुना डाली। मैंने उससे मोहिनी का भेद भी बता दिया था। और वह हैरत से मेरी कहानी सुनता रहा।

मोहिनी की कहानी इसी घर से शुरू हुई थी। जब रामदयाल की माँ ने मुझसे कहा था कि मैं जाप करके मोहिनी को प्राप्त कर सकता हूँ। परंतु वह बात मैंने मज़ाक में टाल दी थी। क्योंकि जादू-टोने, तंत्र-मंत्र को मैं कोरी बकवास समझता था और रामदयाल भी इन चीज़ों से दूर रहता था। रामदयाल की माँ की मृत्यु एक आकस्मिक मृत्यु थी। जब मैंने उसे बताया कि उसकी माँ की मौत का कारण भी मोहिनी थी क्योंकि वह भी मोहिनी को सिद्ध करना चाहती थीं। और फिर मरघट में चिता जलाने के बाद अगली ही सुबह मोहिनी मेरे सिर पर छिपकली की तरह चिपक गयी थी तो रामदयाल को इन बातों पर विश्वास न हुआ।

लेकिन जब मैंने अपनी सारी दास्तान सुनाई तो उसे यक़ीन करना पड़ा क्योंकि वह जानता था कि मैं झूठ नहीं बोलता।

“और अब एक बार फिर मैं मोहिनी को पाने के लिये संघर्ष कर रहा हूँ रामदयाल। मेरे दोस्त, एक बार यदि वह मुझे मिल गयी तो फिर मेरी ज़िंदगी में हर बहार मेरे कदम चूमेगी। मैं उसे कभी अपने से जुदा नहीं होने दूँगा। वरना मेरी ज़िंदगी सिवाय एक लाश के कुछ नहीं...”

“इस सिलसिले में जो तुम चाहोगे, मैं तुम्हारी सहायता करूँगा। इसे अपना ही घर समझना...”

रामदयाल ने मेरे लिये नए रेडिमेड कपड़े ख़रीद लिये। मेरे दवा-दारू का प्रबंध भी कर दिया और तीन दिन बाद मैं फिर से तरोताज़ा हो गया।

तीन दिन बाद जो मैंने सबसे पहला काम किया वह काली के मंदिर का रुख़ किया। मंदिर में भीड़-भाड़ थी। मैंने एक पुजारी को साथ लिया और फिर उसकी सहायता से मैंने शिवचरण की राख काली के भेंट चढ़ा दी।

मेरा ख़्याल था कि इस काम में ज़रूर कुछ बाधाएँ आएँगी, परंतु ऐसा कुछ न हुआ।

रामदयाल की माँ के पास पहले भी बहुत से पुजारी आया करते थे। उनमें से एक को रामदयाल जानता था। उसी के कारण यह काम बड़ी सरलता से संपन्न हो गया।

जब मैं मंदिर से निकला तो मैंने अपने आपको काफ़ी हल्का-फुल्का और तरोताजा महसूस किया जैसे एक बड़ा बोझ मेरे सिर से उतर गया हो। मेरा अनुमान था कि मंदिर से निकलते ही मोहिनी त्रिवेणी को छोड़कर तुरंत ही मेरे सिर पर आ जाएगी। परंतु ऐसा नहीं हुआ तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। एक-दो दिन तक मुझे इस बात का बड़ा धक्का लगा रहा। पर जब मोहिनी मेरे सिर पर नहीं आई तो मैं घोर निराशा में घिर गया।

मैं सोचने लगा कि मेरे कार्य में कहीं कोई भूल तो नहीं हो गयी। फिर अचानक मुझे हरि आनन्द के कहे हुए यह शब्द याद आए कि जैसे ही मैं राख काली के मंदिर में चढ़ाऊँ तो तब त्रिवेणी से मिलूँ। मैं यह बात भूल ही गया था।
 
फिर अगले ही रोज़ मैंने रामदयाल को सारी बातें समझाकर पूना के लिये प्रस्थान किया। अंजाम कुछ भी हो सकता था पर मुझे त्रिवेणी के सामने जाना ही था। जो मेरे इतने दिन ग़ायब रहने पर अवश्य ही शंकित हो गया होगा। शायद त्रिवेणी को न भी मालूम हुआ हो। लेकिन इस बात की संभावनाएँ कम थी क्योंकि मोहिनी उसके पास थी और मोहिनी के द्वारा वह सबकुछ मालूम कर सकता था।

पूना पहुँचने के बाद मैं धड़कते दिल से त्रिवेणी के बंगले पर पहुँचा। इस बार मुझे उसके पास पहुँचने में किसी प्रकार की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। सूचना मिलते ही त्रिवेणी ने मुझे तुरन्त बुला लिया।

धड़कते हुए दिल से मैं त्रिवेणी के सामने गया। उसके चेहरे पर गंभीरता थी। उसने मेरा स्वागत इस अंदाज में नहीं किया जिसकी मुझे आशा थी। मेरा ख्याल था कि शिवचरण की मौत का समाचार उसे मिल गया होगा और वह गर्मजोशी से दोस्ताना अंदाज में मेरा स्वागत करेगा जैसा कि उसने पहले वचन दिया था। पर जिस दृष्टि से उसने मुझे देखा उसमें दोस्ती का कोई भाव नहीं था। उसके तेवर देखकर मुझे अनुमान लगाने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं हुई कि वह मुझसे नाराज है। मैं ख़ामोशी से एक कुर्सी पर बैठ गया तो त्रिवेणी ने पहल करते हुए खुश्क स्वर में पूछा।

“कब आये ?”

मैं लापरवाह से स्वर में बोला– “कल रात! मगर तुम्हारे द्वारपाल ने कल रात मुझे अंदर दाखिल नहीं होने दिया।”

“इतने दिन कहाँ रहे ?” उसने उसी गंभीरता से पूछा।

“शिवचरण की मौत के बाद मेरा दिल कुछ उकता गया था। मैंने सोचा तुम्हारा काम तो हो ही गया है, क्यों न कुछ दिन घूम-फिर लूँ।”

“कहाँ-कहाँ घूमे, किस-किस जगह ठहरे... ?” उसके स्वर में व्यंग्य था।

“बस ऐसे ही इधर-उधर आवारागर्दी करता रहा।”

“तुमने अपने इस मित्र को सूचना क्यों नहीं दी। तुम्हें शिवचरण को मारने के बाद सीधा यहाँ आना चाहिए था। मैंने यही तुमसे कहा था।”

“मैंने सूचना देना आवश्यक नहीं समझा। मैं जानता था, तुम्हें सब मालूम ही होगा। वरना...”

“राज।” अचानक त्रिवेणी मेरा वाक्य काटकर बोला, “मैंने तुम्हें अपना मित्र समझकर भेजा था। मुझे अपना वादा याद है, परन्तु हो सकता है मुझे अपना यह फैसला बदलना पड़े।”

“त्रिवेणी, मुझे पहले ही संदेह था कि तुम्हारा वादा झूठा है! मैंने तो अपनी जान खतरे में डालकर तुम्हारे लिये यह सब कर डाला जिसके लिये मेरा जमीर कभी तैयार न हो सकता था और अब... इतनी सी बात का बहाना बनाकर कि मैं वह काम समाप्त करने के बाद सीधा यहाँ नहीं आया, उचित नहीं है; और मैं स्वीकार कर चुका हूँ कि मेरी गलती है।”

त्रिवेणी ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह मुझे टटोलने वाली दृष्टि से घूरे जा रहा था। उसके नेत्रों में गहरी उलझन का शिकार मालूम होता था। उसके नेत्रों में संदेह था और माथे पर शिकन। मैंने उसका ध्यान बँटाने के लिये इधर-उधर की बातें की लेकिन वह इसी अंदाज में बराबर मेरा निरीक्षण करता रहा। मेरी मर्म बातों ने उस पर कोई प्रभाव नहीं डाला था। कुछ देर इस कशमकश में फँसे रहने के बाद वह मेरे निकट आया और ठोस आवाज में बोला–

“राज, मैं यह जानना चाहता हूँ कि तुम इतने अरसे कहाँ रहे और क्या करते रहे। तुम्हें मालूम है मेरे सामने झूठ नहीं बोला जा सकता। मोहिनी मुझे सब कुछ सही-सही बता देगी। वह तुम्हारे बारे में मुझे एक-एक पल की खबर दे सकती है लेकिन मैं तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ।”

मोहिनी का नाम सुनकर मैं सँभला। मैं जानता था कि मोहिनी की उपस्थिति में बहस करने से कोई लाभ न होगा। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं त्रिवेणी को क्या उत्तर दूँ। क्या उसे सबकुछ साफ-साफ बता दूँ ? फिर उसे कैसे सन्तुष्ट करूँ ? उसी समय मुझे हरि आंनद का ख्याल आया जिसने मुझे बताया था कि वह अपनी शक्ति के द्वारा मेरे और मोहिनी के बीच पर्दा रखेगा। मैं कोई उचित जवाब देने वाला था कि त्रिवेणी ने खुश्क स्वर में गरजकर कहा– “राज तुमने अभी तक मेरी बात का उत्तर नहीं दिया।”
 
मैंने हिचकिचाकर कहा– “त्रिवेणी, जब तुम मोहिनी की पराजित शक्ति के स्वामी हो तो उसी से क्यों नहीं जान लेते। लम्बे सफर के कारण मैं बहुत थक चुका हूँ।

“क्या मैं यह समझूँ कि तुम मुझे कुछ बताना नहीं चाहते ?” त्रिवेणी ने उखड़ी आवाज में कहा। उसके तेवर ख़राब होते जा रहे थे।

मैं विचित्र उलझन में गिरफ्तार था। अगर हालात ने मुझे मजबूर न किया होता और पण्डित हरि आनंद ने मुझे वापिस पहुँचने को न कहा होता तो मैं उसकी सूरत देखना भी गँवारा न करता। मुझे उससे गहरी नफरत थी। मैं सोच रहा था कि उसे किस तरह टालूँ ? त्रिवेणी ने मुझे खामोश देखा तो एकदम भड़क उठा।

“राज ठाकुर! तुम भूल रहे हो कि इस समय तुम किस शक्ति के सामने हो। क्या मैं तुम्हें बताऊँ कि मैं कौन हूँ ?”

“त्रिवेणी तुम्हें क्या हो गया है ? तुम्हारी तबियत तो ठीक है ?”

मैंने एक और कोशिश की- “अगर तुम्हें मेरा यहाँ आना गँवारा न गुजर रहा हो तो मैं आज ही चला जाता हूँ।”

इस वाक्य को पूरा करने के बाद मैं जाने के बहाने कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। वह मुझे उस शक्ति की धमकी दे रहा था जिसे मैंने जान पर खेलकर उसके लिये बचाया था। अगर मैंने शिवचरण को न मारा होता तो त्रिवेणी दर-दर की ठोकरें खा रहा होता। जैसे ही मैं जाने के लिये मुड़ा त्रिवेणी उछलकर मेरी राह में आ खड़ा हुआ।

“तू मुझे मूर्ख समझता है टुन्टे। तुझे एक और मौका देता हूँ। सच-सच बता दे कि शिवचरण को मारने के बाद तू कहाँ-कहाँ गया वरना मैं तेरी दूसरी आँख भी छीन लूँगा।”

मैं कांप उठा। मुझे याद आ गया किस तरह मोहिनी ने मेरी एक आँख मुझसे छीन ली थी। वह भयानक जहरीली छिपकली मोहिनी अब भी त्रिवेणी के हुक्म की गुलाम थी।

“आखिर तुम मोहिनी से ही क्यों नहीं पूछ लेते ?” मैंने उकताए स्वर में कहा, “तुमने तो मुझसे बड़े वादे किये थे परन्तु लगता है तुम अपने वादों को तोड़ने के लिये एक बहाना खोज रहे हो।”

“हाँ कमीने! कुत्ते! इस दुनिया में कौन किसका दोस्त होता है। मैं इस मामले में मोहिनी की शक्तियाँ प्रयोग नहीं करना चाहता। इतना याद रख कि अगर तूने मुझे कुछ न बताया तो मैं तुझे फिर से दर-दर का भिखारी बना दूँगा। जो अँधा, लूला, लंगड़ा होगा।”

त्रिवेणी के बार-बार कहने पर मेरी समझ में एक बात आ रही थी। हरि आनंद ने जो कुछ कहा था उसके अनुसार मोहिनी मेरी गतिविधियाँ न जान सकती थी। शायद यह बात सच थी। अन्यथा त्रिवेणी मुझसे न पूछता और शायद इसी बात के कारण उसके दिमाग में खुटक पैदा हो गया था। लेकिन हरि आनंद ने यह भी कहा था कि त्रिवेणी के पास जाऊँ। आखिर किस लिये और मोहिनी अब तक मेरे कब्जे में क्यों नहीं आई थी। अब मुझे इसकी उम्मीद न आ रही थी। इसलिए मैं किसी तरह वहाँ से फरारी का उपाय सोच रहा था। अगर मैं सच बात उसे बता देता तो वह हरगिज मुझे जिन्दा न छोड़ता।

“ठीक है त्रिवेणी, जो दिल में आये करो। अब मैं यहाँ रुकने वाला नहीं।”

मेरा इतना कहना था कि त्रिवेणी ने एक घूँसा मेरे मुँह पर जड़ दिया और मैं लड़खड़ाकर दिवार से जा लगा। त्रिवेणी की यह हरकत मेरी बर्दाश्त से बाहर थी। मेरे दिल में आया कि मैं तुरन्त अपने इकलौते हाथ से उसका गला घोंट दूँ। परन्तु सहसा मुझे मोहिनी की शक्ति का ख्याल आया। दूसरे वह मोटा ताजा त्रिवेणी आसानी से मेरे काबू में आने वाला न था। किन्तु एक विचार जो मेरे मष्तिष्क में तुरन्त आया वह यह था कि फरार होने में ही अब मेरी भलाई है। मुझे इस बात का भी विश्वास हो चला था कि मोहिनी से त्रिवेणी मेरी कारगुजारियों के बारे में कुछ भी ज्ञात न कर सका होगा अन्यथा वह मेरे मुँह से सच उगलवाने पर इतना दबाव न डालता।

क्षणिक फैसले में ही मैंने त्रिवेणी पर एक टक्कर रसीद कर दी। वह लुढ़क कर पीछे सोफे पर जा गिरा और मैं तीर की तरह दरवाजा बाहर से बंद करके वहाँ से भाग निकला।

दरबान ने मुझे नहीं रोका बस आश्चर्य से वह मेरी तरफ देखता रहा। सड़क पर पहुँचते ही मैंने एक खाली टैक्सी रोकी और पूना के दूसरे छोर पर पहुँच कर ही दम लिया।

फिर मैंने एक होटल की शरण ली। कमरा बुक करवा कर मैं होटल के कमरे में पहुँचा। मैंने दरवाजा भीतर से बंद किया और गहरी-गहरी साँस लेने लगा। पर यह सोचकर मैं पुनः भयभीत हो उठा कि भला मोहिनी के सामने बंद दरवाजे की क्या अहमियत और त्रिवेणी मुझे क्षमा नहीं कर सकता, न ही मैं त्रिवेणी से यह छिपा सकता हूँ कि मैं इस वक्त कहाँ हूँ। वह जब चाहेगा मुझे वापिस कोठी पर बुला लेगा।
 
मैं सोचता रहा किसी भी क्षण दरवाजे पर दस्तक हो सकती है। क्या जाने पुलिस ही आ जाये और मुझे घसीट कर ले जाये। परन्तु कई घंटे बीत जाने के बाद भी जब कोई नहीं आया तो मैंने तनिक राहत की साँस ली।

अब मुझे हरि आनंद की बातें सिरे से झूठी लग रही थी कि मैं मोहिनी को प्राप्त कर लूँगा जो कुछ हरि आनंद ने कहा था मैंने वह सब उसी प्रकार किया। परन्तु मैं अब भी असहाय था और त्रिवेणी के सामने एक कीड़े से अधिक महत्व नहीं रखता था।

समय जैसे-जैसे व्यतीत होता गया, मेरी उलझन बढ़ती रही। मेरे अंदर इतना साहस नहीं था कि मैं खाने के लिये कमरे से बाहर निकल सकता।

मुझे इस बात पर आश्चर्य था कि त्रिवेणी की तरफ से बदले की कोई कार्यवाही क्यों नहीं की गयी। क्या त्रिवेणी ने मुझे केवल दूर रखने की खातिर डराया धमकाया था ? क्या वह मुझसे अपना सम्बन्ध समाप्त कर देना चाहता था ?

दिन भर मैं स्वयं से उलझा रहा। आप विश्वास करें मेरे अंदर इतनी शक्ति न थी कि मैं उठकर बत्ती जला सकता इसी कश्मकश में न जाने कब मेरी आँख लग गयी। सपनों में भी मैं इन्हीं उलझनों में घिरा रहा। जब मेरी आँख खुली तो कमरे में घुप्प अँधेरा था। मैं हड़बड़ाकर उठ बैठा और जल्दी से कमरे की रोशनी जला दी।

अभी मैं जागने के कारण पर गौर कर ही रहा था कि अचानक मेरे दिल की धड़कने तेज हो गयी। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मेरा सिर भारी हो रहा है। मैंने कल्पना के झरोखे में अपने सिर पर नजर डाली तो भय और दहशत से मेरी चीख निकल गयी।

छिपकली की महारानी मोहिनी मेरे सिर पर मौजूद थी। उस क्षण जैसे मुझे साँप सूँघ गया। मौत की कल्पना से मेरा जिस्म पसीने से सराबोर हो गया। देर तक मेरी यही हालत रही। इस बीच में मोहिनी ने मुझसे कोई बात नहीं की। वह मुस्कुराती रही। मुझे उसकी मुस्कराहट जहरीली लगी और मैं भय से काँप उठा। फिर भी मैंने किसी न किसी तरह अपनी चेतना पर काबू रखा और दोबारा मुस्कुराती हुई मोहिनी पर दृष्टि डाली जो मेरे सिर पर आलथी-पालथी मारे बैठी मुझे तीखी दृष्टि से निहार रही थी।

“इ... मोहिनी तुम!” मैंने डरते-डरते कहा।

“हाँ मैं...!” मोहिनी ने शराफत से कहा, “क्या मैं तुम्हें तलाश नहीं कर सकती थी ?”

“मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में था।” मैं रुँधी हुई आवाज में बोला और मोहिनी को घूरने लगा।

“इतने आश्चर्य से क्यों घूर रहे हो ? क्या मुझे पहले नहीं देखा ?”

“तुम्हारे बहुत से रूप देखे हैं, परन्तु आज तुम मुझे सबसे अधिक खतरनाक नजर आ रही हो...” मैंने साहस के साथ कहा।

“क्यों ? क्या मैं बुरी नजर आ रही हूँ।” मोहिनी ने इठलाकर कहा।

“नहीं, तुम सदाबहार हो! तुम इतनी ही हसीन हो जितनी पहले थी।” मैंने खुशामदी स्वर में कहा।

“झूठ कहते हो ?” मोहिनी ने उनकते स्वर में कहा, “खुशामद करते हो।”

“नहीं, नहीं! ऐसी कोई बात नहीं। वैसे तुम्हारी खुशामद से मुझे क्या प्राप्त होगा ?” मैंने उदास स्वर में कहा।

मोहिनी का स्वर पहले से बदला हुआ था। मुझे उसकी यह व्यंग्य भरी बातें जहरीले बाणों से कम नहीं महसूस हो रही थी।

मैंने तंग आकर कहा– “काम की बात करो। मैं अपनी किस्मत का फैसला सुनना चाहता हूँ। अब अधिक बर्दाश्त की शक्ति नहीं रही। जो करना है करो।”

“क्या करूँ, तुम ही बताओ कि मैं तुम्हारी किस्मत का क्या फैसला करूँ ?” मोहिनी ने उसी शोखी से कहा।

“जो तुम्हें त्रिवेणी ने बताया हो। तुम्हारे आका ने।” मैं अब हर फैसला सुनने को तैयार था।

“त्रिवेणी ने तो बहुत कुछ कहा है।” मोहिनी गंभीरता से बोली।

“तो जो कुछ कहा है उसे करो।”

“जी नहीं चाहता।”

“तुम्हारे चाहने से क्या होता है। तुम तो त्रिवेणी की गुलाम हो।”

“हाँ, यह तो है पर मुझे तुमसे भी तो प्यार है!” मोहिनी ने इठलाकर कहा।

“अब अधिक जख्म न लगाओ। जो अब तक हो चुका है वही बहुत है।”

“तुम्हें वह दिन याद है ?”

“कौन सा दिन ?”

“यही जब मैं तुम्हारे सिर पर थी तुम मुझसे रूठ जाते थे और मैं तुम्हें मनाती थी।”

“वह सब सपना था मोहिनी।” मैंने एक सर्द आह भरकर कहा, “इंसान का अतीत कभी नहीं लौटता। उसे भूल जाओ।”

मोहिनी मुस्कुरायी, “हाँ, अतीत हमेशा सपना होता है! हाँ, उसे भूल जाना चाहिए! बस वर्तमान पर दृष्टि रखनी चाहिए... या भविष्य को देखना चाहिए... लेकिन जिसका कोई भविष्य ही न हो वह गरीब क्या करे ?

“अँधेरी दीवारों से लड़कर सिवाय अपना सिर फोड़ने के वह कर भी क्या सकता है। उसके लिये उसे रोशनी की किरण बन जाना चाहिये। अँधेरा खुद-ब-खुद भाग जायेगा।”

“कहाँ से आ गया तुम्हें इतना गम। यह शायराना बातें कब से आ गयी तुम्हें ?”

“परिस्थितियाँ इंसान को कुछ भी बना सकती हैं। मगर तुम आज इस तरह लगावट की बातें क्यों कर रही हो। क्यों मेरे सीने पर अंगारे रख रही हो ?” मैंने मोहिनी के अंदाज में बहुत बड़ा परिवर्तन महसूस किया तो पूछा।
 
“हाँ परिस्थिति। परिस्थिति की बात है।” मोहिनी ने शून्य में देखते हुए कहा, “क्या तुम्हें मेरा इस तरह से बोलना अच्छा नहीं लग रहा है ?”

“मुझे मालूम है कि इन प्यार भरी बातों के बाद तुम मुझसे किस तरह पेश आओगी। इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम अपना काम करो मुझे आज्ञा दो कि मुझे क्या करना है।”

“और अगर मैं यह कहूँ कि तुम मुझे आज्ञा दो तो... ?”

“मेरे अंदर मजाक सहने की शक्ति भी नहीं।” मैंने डूबते स्वर में कहा।

“अच्छा इतने दुखी हो।”

उत्तर में मैं खामोश रहा। मुझे मोहिनी की इन विभिन्न बातों से घुटन सी हो रही थी। मोहिनी देर रात तक यूँ ही दिलचस्प अंदाज में बातें करती रही। उसके तेवर बड़े विचित्र थे। वह मुस्कुरा-मुस्कुरा कर इठला-इठलाकर बड़े अपनत्व भरे अंदाज में बातें करती और कभी उसके चेहरे पर नफरत और घृणा के भाव जाग्रत हो उठते। उसकी खूबसूरत आँखें अचानक शोले बन जाती।

“जानते हो राज, मैं इस समय तुम्हारे पास क्यों आई हूँ ?” कुछ देर बाद वह बोली।

“हाँ!” मेरा दिल डूबने लगा, “तुम्हें त्रिवेणीदास ने भेजा है।” मैंने बच्चों की तरह कहा।

“खासे समझदार होते जा रहे हो।” मोहिनी ने बड़ी गंभीरता से कहा फिर उठकर खड़े होते हुए बोली, “तुम जानते हो त्रिवेणी दास महाराज ने तुम्हारे हक में क्या फैसला किया है ?”

“मोहिनी।” मेरा दिल भर आया। मैंने उसको मिन्नत करते हुए कहा, “मैं मौत से नहीं डरता। मुझे मालूम है कि तुम त्रिवेणी के संकेत पर बड़े-बड़े पहाड़ों को भी रुई के गोलों की तरह उड़ा सकती हो लेकिन... ।” मैं कहते-कहते रुक गया। तो मोहिनी बोली।

“मरने से पहले डॉली से एक बार मिलना चाहते हो।

“क्या डॉली याद है अब तक तुम्हें ?”

मोहिनी ने मेरे मुँह की बात छीन ली थी। मैंने कहा– “मैं तुम्हें नहीं भूला। तुम तो दिलों का हाल पढ़ना जानती हो। तुमने मेरे दिल को पढ़ लिया होगा।”

“रहने दो राज बस करो। मेरे ऊपर संदेह न करो।”

“अच्छा छोड़ो इन बातों को। आओ मेरे साथ चलो।”

“कहाँ ?” मैंने भयभीत स्वर में कहा।

“त्रिवेणीदास ने मुझे तुम्हें बुलाने के लिये भेजा है। चलने के लिये तैयार हो जाओ, वह हमारी राह देख रहा होगा।” मोहिनी ने अचानक सर्द स्वर में कहा।

“हमारे बीच कभी मित्रता के रिश्ते भी रह चुके हैं। तुम्हें मेरी प्रेमिका का पद प्राप्त है। मैं तुम्हें उसी रिश्ते का वास्ता देकर कहता हूँ कि मुझे एक बार डॉली से आखिरी बार...”

“समय नष्ट न करो राज।” मोहिनी ने किसी अल्हड़ सुंदरी की तरह कहा, “सुनो, मैं हमेशा अपने मालिक से वफादार रहने पर विवश हूँ। अपने आका की सेवा करना मेरा कर्तव्य है। अब तुम चलने के लिये तैयार हो जाओ।

“चलो।” मैंने बेबसी से कहा, “जो तुम्हारी इच्छा।”

रास्ते भर मैं मोहिनी के चेहरे पर उभरने वाले नाना प्रकार के भाव देखता रहा। निसंदेह उसके व्यवहार में असाधारण परिवर्तन था। मुझे त्रिवेणी से किसी अच्छे व्यवहार की आशा नहीं थी और मैंने स्वयं को इस बात पर अमादा कर लिया था कि अब मैं फाँसी के फंदे की तरफ जा रहा हूँ। फाँसी के लिये जाते व्यक्ति की जो हालत होती है वही मेरी थी।

“किस विचार में उलझे हो राज ?” मोहिनी की आवाज अचानक मेरे कानों से टकराई तो मेरे विचारों के तार छिन्न-भिन्न हो गए। मैंने मोहिनी पर दृष्टि डाली जो मेरे सिर पर खड़ी-खड़ी प्यार भरी नजरों से मुझे निहार रही थी।

इस वक्त मुझे मोहिनी का वह अंदाज बड़ा जालिमाना लगा। जैसे वह मुझे तड़पा-तड़पा कर मारना चाहती हो।

मैंने सख्ती से होंठ भींच लिये और मोहिनी की तरफ से निगाहें फेर लीं।

“ऐ राज साहब! इतनी नफरत ? कुछ तो मेरी पुरानी मेहरबानियों का ख्याल किया होता। सच है मर्द बड़े बेवफा होते हैं।”

“मोहिनी, ईश्वर के लिये मेरे जख्मों पर नमक मत छिड़को! मैं बड़ा मजबूर और बेबस हूँ।”

“जब तक जिन्दा हो, हँसते बोलते रहो। मौत से क्या डरना। त्रिवेणी को देखो। उसके सीने में तुमसे बदला लेने का ज्वालामुखी धधक रहा है लेकिन जानते हो, वह इस समय क्या कर रहा है ? बम्बई की एक हसीनतरीन युवती उसके बेडरूम में मौजूद है। वह इस समय बम्बई की सबसे खूबसूरत लड़की के साथ ऐश कर रहा है... ऐश। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह तुम रंगरलियाँ मनाया करते थे। क्यों याद हैं न तुम्हें वे बातें ?”

मोहिनी की व्यंग्य भरी बातों के सामने सिवाय ख़ामोशी के मेरे पास कोई चारा नहीं था।

वह उस समय विचित्र हरकतें कर रही थी। तमाम रास्ते वह मुझे इसी तरह सताती रही और जो कुछ वह कहती जा रही थी मैं चुपचाप सुनता जा रहा था।

मोहिनी ने गलत नहीं कहा था। त्रिवेणी अपने शयनागार में उपस्थित था और एक खूबसूरत लड़की के साथ ऐश कर रहा था। मेरी नजरों से इतनी खूबसूरत लड़की शायद ही कभी गुजरी हो। झीने पारदर्शी लिबास में उसका कुंदन की तरह दमकता यौवन साफ झलक रहा था।

शराब के नशे में उसकी आँखों को कुछ अधिक ही नशीला बना दिया था। त्रिवेणी की गर्दन में बाहें डाले और शर्मीली दृष्टि झुकाये उसने मुझे आश्चर्य से देखा। कदाचित त्रिवेणी ने उसे मेरे सिलसिले में कुछ बता दिया था।

“क्यों राज ? कैसी है यह लड़की ? शर्मीली, नाजुक गुलाब और सुर्ख है न यह हसीन लड़की... ?” मोहिनी ने मेरे कानों में सरगोशी की लेकिन मुझे यह सब सोचने की फुरसत कहाँ थी। मेरे ऊपर तो भय छाया था। त्रिवेणी के सामने सिर झुकाये खड़ा था।

“आ गए।” उसने हाथ में गिलास की बाकी बची शराब उड़ेलते हुए मुझे संबोधित किया। टुन्टे, क्या तू नहीं जानता था कि मैं तुझे समन्दर की तह में भी ढूँढ निकालने की शक्ति रखता हूँ ?”

“मैंने ख़ामोशी को उचित समझा।”

“कुछ बोलो कुँवर राज ठाकुर। चुप क्यों हो ?” त्रिवेणी मेरा उपहास उड़ाते हुए बोला लेकिन मैं उसी प्रकार खामोश खड़ा रहा।

“डार्लिंग, क्या यही वह मूर्ख है जिसने तुमसे टकराने की कोशिश की थी ?” त्रिवेणी के बराबर में बैठी लड़की ने पहली बार कहा। उसकी आवाज भी उसके सुंदर जिस्म की तरह नर्म नाजुक थी।

“हाँ सविता! यही वह सूरमा है जो अपनी औकात भूल गया है। त्रिवेणी ने मुझे खतरनाक नजरों से घूरते हुए और उसे अपने निकट खींचते हुए कहा, “बताओ तुम इसके लिये क्या सजा उपयुक्त समझती हो ? मेरे प्रतिद्वंदि की क्या सजा हो सकती है सविता ?”

“देखो, यह मुझे अपनी इकलौती आँख से किस कदर घूर रहा है! क्यों न इसकी दूसरी आँख भी निकाल लो।”

“तुम सुंदर होने के साथ-साथ बुद्धिमान भी हो। उसके बाद तुम्हीं उसे मौत की सजा सुनाओगी। लेकिन पहले मैं तुम्हें अपनी शक्ति दिखाता हूँ। देखो किस तरह यह दूसरी आँख से महरूम होता है।”

मैं काँप गया।

उसी समय मोहिनी ने सरगोशी की। उसने मुझे हुक्म दिया है कि तुम्हारी दूसरी आँख की रोशनी छीन लूँ। मैंने मोहिनी की बात का भी कोई उत्तर नहीं दिया।

मोहिनी रेंगती हुई मेरे माथे पर आ गयी और नाक के ऊपर से किसी जहरीली छिपकली की तरह सरसराती हुई मेरे लबों पर घूम गयी फिर वह फुदककर मेरे कंधे पर आ खड़ी हुई।

छः इंच की वह खूबसूरत मोहिनी मेरे कंधो पर खड़ी थी। उसके लबों पर अब भी मुस्कान थिरक रही थी।

“राज।” उसने सरगोशी की, “अपनी दोनों आँखे बंद कर लो और जब तक मैं न कहूँ आँख न खोलना। चलो, आँखें बंद करो!”

मोहिनी की सरगोशी में कुछ ऐसा सम्मोहन था कि मुझे अपनी इकलौती आँख मूँदनी पड़ी। दूसरी तो पहले से ही मूँदी थी। मोहिनी ने उसकी रोशनी पहले ही छीन ली थी और अब मेरी दूसरी आँख का नंबर था।

परन्तु शीघ्र ही मुझे अपनी अंधी आँख में जलन सी महसूस हुई। तेज जलन और मैं चीख उठा। उसी समय त्रिवेणी का कहकहा मेरे कानों से टकराया।

“सविता डार्लिंग, उठाओ अपना पिस्तौल और मार दो इस अंधे-लूले को गोली!” त्रिवेणी कहकहे के बीच बोला।

“म... मैं...”

“हाँ तुम! मार दो इस हरामजादे को।” त्रिवेणी क्रोध में बोला।

“तुम्हारे कारण तो मैं खुद को भी शूट कर सकती हूँ।” मैंने दोनों आँखे मूँद ली थी।
 
मोहिनी फुसफुसाई- “अपनी पलकें धीरे-धीरे खोलो राज।”

मैंने मोहिनी का कहा माना तो आश्चर्य का ठिकाना न रहा। मैं ख़ुशी से चीखना चाह रहा था पर ऐसा अवसर न था क्योकि सामने वह सुंदरी पिस्तौल ताने खड़ी थी और मैं अब दोनों आँखों से उसे देख रहा था। मेरे निकट आकर उसने भवें चढ़ाकर पूछा– “कोई आखिरी इच्छा है तुम्हारी ?”

इससे पूर्व कि मैं उत्तर देता मोहिनी मेरे कान के पास आ गयी।

“राज, हिम्मत करो। देखो कितनी सुंदर लड़की सामने है। इसके हाथों मरना ही कितना अच्छा है ? मेरी मानो तो सविता के हाथों मरने से पहले इसका शरीर माँग लो। उसके बाद इसके हाथों मरने से तुम्हें अधिक आनंद प्राप्त होगा।” मोहिनी अब मेरे लिये उलझन बनती जा रही थी।

मुझे चुप देखकर सविता बोली– “बोलती क्यों बंद हो गयी ? अरे मैं क्या पूछ रही हूँ कमीने। बता तेरी आखिरी इच्छा क्या है ?”

मैंने सविता की पिस्तौल पर पकड़ मजबूत देखी तो मेरा रहा-सहा साहस भी जवाब दे गया। अब उसकी उँगली की हरकत होना ही बाकि था जो मेरे जीवन की रोशनी छीन लेती। मेरा दिल तेज-तेज धड़कने लगा। आँखें धुँधलाने लगी। मैंने कसमसाकर पहलू बदला तो मोहिनी ने तेजी से कहा–

“अरे, तुम तो बहुत भयभीत हो गए! तुम्हारा झगड़ा त्रिवेणी से है। तुम इस नाजुक लड़की से क्यों डर रहे हो ? यह तुम्हारा क्या बिगाड़ सकती है ? क्या अभी-अभी मैंने तुम्हारी आँख की रोशनी नहीं लौटायी ?”

मोहिनी का आखिरी वाक्य सुनकर मैं चौंके बिना न रह सका। जिस अंदाज में उसने यह वाक्य कहा था। उससे यही मालूम होता था कि वह सविता के मुकाबले में मेरी सहायता करेगी। मैंने कल्पना के झरोखे से उसका चेहरा देखा तो मेरा दिल उछलने लगा। मैंने मोहिनी के चेहरे पर वही भाव देखे जो कभी मेरे लिये उसके चेहरे पर होते थे जब वह मेरे सिर पर रहती थी। फिर भी मुझे विश्वास नहीं हुआ। त्रिवेणी की उपस्थिति में मोहिनी का मेरे प्रति हमदर्द होना आश्चर्यजनक था। कहीं ऐसा तो नहीं मोहिनी भी त्रिवेणी और सविता की तरह मेरी बेबसी का मजाक उड़ा रही हो और थोड़ी देर के लिये उसने मेरी आँख की रोशनी लौटा दी ताकि मैं अपनी मौत का नजारा दोनों आँखों से देख सकूँ।

मैं यही सोच रहा था कि मोहिनी की आवाज बराबर मेरे कानों में गूँजी।

“यह मजाक नहीं राज । तुम जरा भी मत घबराओ। जब तक मैं तुम्हारे सिर पर मौजूद हूँ सविता तुम्हारा बाल भी बाँका नहीं कर सकती। आगे बढ़ो और इस खुबसूरत लड़की से दो बातें जरूर कर लो।”

“क्या तुम जो कुछ कह रही हो यह सच है ?” मैंने दिल ही दिल में मोहिनी से पूछा।

“हाँ, मेरे ऊपर विश्वास रखो! मोहिनी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया।

“मैंने त्रिवेणी को बता दिया है कि मैं तुम्हें मौत का तमाशा दोनों आँखों से दिखाना चाहती हूँ और वह खुश है।”

मोहिनी के वाक्य ने जैसे मेरे शरीर में बिजली का करेंट प्रवाहित कर दिया। एक क्षण को मुझे लगा जैसे मेरे अंदर बेपनाह शक्ति आ गयी हो। कुछ देर पहले मैं जिस उलझन में था वह दूर हो गयी। अब सविता के चेहरे पर दृष्टि दौड़ाते हुए दबे स्वर में कहा–

“क्या तुम मेरी अंतिम इच्छा पूरी करने का वचन देती हो ?”

“बोल क्या चाहता है ?” सविता ने शहजादियों की तरह कहा तो मैंने भी मुँह खोल दिया।

“अगर तुम अपनी बात की पक्की हो तो मेरी यह अंतिम इच्छा पूरी कर दो। मैं चाहता हूँ तुम मेरी उपस्थिति में त्रिवेणी के मुँह पर थूक दो और फिर मेरी बाँहों में एक रात आबाद करो।”

“टुन्टे, हरामी!” त्रिवेणी शोले की तरह मेरी तरफ लपका, “मैं तुझे बताऊँगा कमीने, मैं तेरे मुँह पर पेशाब करवाता हूँ।”

सविता को भी मेरे अचानक बदलते हुए व्यव्हार पर आश्चर्य हुआ था। फिर जब त्रिवेणी दास किसी जख्मी दरिंदे की तरह झपटता हुआ आगे बढ़ा तो सविता सहमकर पीछे हट गयी। एक क्षण के लिये मैं भी भयभीत हो गया किन्तु उसी समय मोहिनी ने मुझे अपनी तरफ आकर्षित किया।

“राज, इस ड्रामे को जरा और खूबसूरत बनाओ। तुम्हें नहीं मालूम तुमने हरि आनंद के बताये हुए मार्ग पर चलकर कैसी शक्ति प्राप्त कर ली है। सुनो त्रिवेणी के सिर से उतरते ही मैं तुम्हारी हो चुकी हूँ। सिर्फ इस बात की देरी थी कि कब त्रिवेणी मुझे स्वयं से जुदा करता है और जब तक वह ऐसा न करता मैं तुम्हारी न हो सकती थी।

“उसने स्वयं मुझे तुम्हारे सिर पर भेजा। वह नहीं जानता था कि मोहिनी फिर कभी लौटकर उसके पास नहीं आएगी। अब मैं तुम्हारी प्रत्येक इच्छा पूरी करने पर मजबूर हूँ। यह मजाक नहीं, विश्वास करो राज। मैं अब तुम्हारी हूँ। तुम्हारे सिर पर तुम्हारी मोहिनी वापिस आ गयी है। सिर्फ तुम्हारी हूँ और सिर्फ तुम्हारे लिये।”

मोहिनी की बातों ने मुझे नयी जिंदगी का पैगाम दिया और मेरा दिल ख़ुशी से बल्लियाँ उछालने लगा। मेरी तमन्नाओं के हजारों दीप एक साथ रोशन हो गए। मैंने एक बार मोहिनी को बड़ी लगावट से देखा। मुझे उस समय वह बहुत भोली-भाली, मासूम और दिलकश नजर आई। वह मुझे उस समय तमाम ख्वाबों की एक परी पैकर नजर आ रही थी। मेरा दिल चाहा कि उसे सिर से उतारकर दिल में रख लूँ। अभी मैं मोहिनी की मदभरी आँखों में झाँक रहा था कि त्रिवेणी का कर्कश स्वर कमरे में गूँजा। वह सविता को संबोधित कर रहा था।

“सविता डार्लिंग, लाओ यह पिस्तौल मुझे दो! इस हरामजादे को मैं ही तड़पा-तड़पा कर मारूँगा। तुम देखो अभी कैसा तमाशा होता है। मुझे यकीन है तुम्हें इस खेल में पूरा आनंद प्राप्त होगा।”
 
सविता अब बुरी तरह सहम चुकी थी। उसने पिस्तौल त्रिवेणी को थमा दिया। परन्तु अब मैं पहले की तरह भयभीत नहीं था। अब मैं इस ड्रामे का आनंद लेना चाहता था। त्रिवेणी, जो मोहिनी के मेरे पास आ जाने से अनभिज्ञ था, मैंने उस मोटे सूअर को भारी भरकम स्वर में संबोधित किया– “त्रिवेणीदास! तुमने मुझे मित्र कहा था, किन्तु खेद है कि तुम अपना वचन भूल गए। क्या तुम्हारे धर्म ने यही सिखाया है कि दोस्त बनाकर उसकी पीठ में छुरा घोंप दो ?

“धर्म के बच्चे ?” त्रिवेणी गुर्राया, “मैं अभी तुझे कीड़े की तरह मसल देता हूँ।”

“तुम कुछ अधिक बढ़ रहे हो त्रिवेणी दास।” मैंने बहुत नरमी से कहा, “मैं तुम्हें सुझाव देता हूँ कि मुझसे माफ़ी माँग लो। मैं तुम्हें क्षमा भी कर सकता हूँ।”

“तू और मुझे क्षमा करेगा।” त्रिवेणी आश्चर्य से कंठ फाड़कर कहकहा लगाता हुआ झूमने लगा। कदाचित उसे मेरे मानसिक संतुलन पर संदेह हो गया था। फिर अचानक उस पर पागलपन सवार हो गया। उसने पिस्तौल का रुख मेरी तरफ किया और फिर लबलबी दबा दी।

उसी समय मोहिनी ने मुझे सुझाव देने शुरू कर दिए कि मैं किस तरफ मुड़ जाऊँ ?

पहला वार खाली गया। मैं वही खड़े-खड़े पहलू बचा गया। मैं त्रिवेणी की बौखलाहट पर मुस्कुराया तो उस पर जुनून सवार हो गया। उसने पिस्तौल की शेष गोलियाँ भी मेरे ऊपर खाली कर दी। मोहिनी हर बार मुझे निशाने से बचा देती थी। त्रिवेणी का हर निशाना खत्म हो गया। वह मेरा बाल भी बांका न कर सका। फिर मैंने त्रिवेणी को अचानक यूँ चौकतें हुए देखा जैसे उसे कोई बात याद आ गयी हो। उसने मेरे सिर की तरफ देखा फिर कहा– “मोहिनी, मेरी आज्ञा है कि तू इस हरामजादे टुन्टे को बेबस करके मेरे चरणों में डाल दे! आज मैं तेरे लिये इस मुस्टंडे के खून की व्यवस्था करूँगा।”

“खूब!” मैंने आँखें नाचकर कहा। मुझे त्रिवेणी के चेहरे पर आतंक के चिन्ह देखकर हँसी आ गयी। मैं उससे कुछ कहना चाहता था कि मोहिनी बोल पड़ी–

“राज, तुम यहाँ से ख़ामोशी के साथ चले जाओ! सविता को देखकर मेरा बुरा हाल हो रहा है।” मोहिनी ने अपने गुलाबी होंठों पर जुबान फेरते हुए कहा, “सविता के जिस्म को देखो, कैसे अनार की तरह लाल हो रहा है।”

मैं समझ गया कि मोहिनी का उद्देश्य क्या है ? वह सविता पर रीझ गयी थी और उसका खून पीने की इच्छा करती थी। मुझे भला क्या इंकार हो सकता था। किन्तु जाने से पहले मैं त्रिवेणी को कोई सबक देना चाहता था। मुझे अपने जुल्मों का हिसाब चुकाना था। जो त्रिवेणी ने मुझ पर तोड़े थे।

इससे पहले कि मैं मोहिनी पर अपनी इच्छा प्रकट करता। त्रिवेणी ने एक बार फिर मोहिनी को संबोधित किया और फिर एकदम से चौंककर दो कदम पीछे हट गया।

इस पर मेरा जोरदार ठहाका गूँज उठा।

“राज! अब तुम जाओ... मुझे प्यास लग रही है ?” मोहिनी एकदम बेचैनी से मेरे सिर पर टहलती हुई बोली, “लेकिन जाने से पहले मैं इस त्रिवेणी को कुछ सबक पढ़ाना चाहता हूँ।

“तो फिर देर मत करो जल्दी करो।”

मोहिनी का कहना था कि मैंने त्रिवेणीदास पर छलांग लगा दी और फिर उसे लेकर दिवार से जा टकराया। त्रिवेणी के मुँह से एक चीख सी निकल गयी।

उसी समय सविता भी मुझ पर झपट पड़ी। उसके चक्कर में मुझे त्रिवेणी को छोड़कर पहले सविता को ही सबक पढ़ाना पड़ा। मैंने एक हाथ से उसके बाल पकड़े और पैर को जोरदार ठोकर से उसे जमीन पर गिरा दिया। फिर मैंने उसके कपड़ों को केले के छिलके की तरह उतारकर एक तरफ फेंक दिया।

उसका खूबसूरत अनार जैसा दहकता जिस्म, वक्ष के गुम्बद मेरे सामने लहरा रहे थे। मेरा मन उसकी खूबसूरती देखकर डोल पड़ा। तभी उसने अपने दाँत मेरी पिडली पर गड़ा दिए तो उसकी खूबसूरती बदसूरती में बदल गयी। एक क्षण की देर किये बिना मैंने दूसरे पैर की ठोकर उसके मुँह पर दे मारी। उसके मुँह से गरम-गरम ताजा खून बह निकला।

“मेरे राजा ? और खून न बहाओ। मेरे लिये भी कुछ छोड़ दो।” मोहिनी किसी शराबी की तरह झूमती हुई बोली। उसकी जुबान लपलपा रही थी।

उसी समय त्रिवेणी ने मुझे पीठ से लपेट लिया और मैं लड़खड़ाता हुआ फर्श पर गिरा। मैं सम्भल भी न पाया था कि त्रिवेणी ने ताबड़तोड़ घूँसों की बौछार शुरू कर दी। मैंने देखा मोहिनी छिपकली का रूप धरकर तेजी के साथ मेरे सिर से उतर गयी।

अगले ही पल त्रिवेणी ने मुझे छोड़ दिया। वह चीखें मारने लगा। अपने सिर के बाल नोचने लगा। कहने की बात नहीं कि मोहिनी उसके सिर पर थी। एक भयानक जहरीली छिपकली ने अपने पंजे उस पर गाड़ दिए थे। मैं उठ खड़ा हुआ।
 
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