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कुल पचास खेमों का कैम्प था जिनमें एक क्वार्टर गार्ड का खेमा था, जिसके सामने दो तोपें भी रखी थीं। स्टेनगनधारी सैनिक पहरा दिया करते थे। एक बड़ा खेमा मेस का काम करता था। कैम्प के चारों ओर कटीले तारों की बाड़ थी। एक गेट था जिस पर लकड़ी का एक केबिन सा बना हुआ था। एक खेमा बंदीगृह था।
कैम्प की स्थिति से पता चलता था कि वह काफी समय से वहाँ स्थापित है। फौजियों ने बाकायदा वहाँ बागवानी की हुई थी। क्वार्टर गार्द के सामने तो फूल तक खिले हुए थे। चीन का निशान–लाल रंग का लहराता झंडा, जिसके दाईं ओर पाँच सितारे बने थे; क्वार्टर गार्द पर नजर आ रहा था। वहाँ सामने एक पार्किंग बनी थी जिसमें फौजी गाड़ियाँ खड़ी थीं। इन गाड़ियों को कैमोफ्लैज करने के लिए जमीनी रंगों से रंगा गया था। तिब्बत में सेना के कैमोफ्लैज में सफेद चकत्ते भी बनाये जाते हैं, क्योंकि वह बर्फीला क्षेत्र है। ऊपर घास-फूस के तिनके खड़े किये गये थे। ऐसा ही कुछ प्रबन्ध फौजियों की पोशाकों पर भी था। जंगी टोपों में घास-फूस के तिनके ठूँसे गये थे। चीनी सैनिक वहाँ मार्च करते नजर आते थे। सुबह शाम रोल कॉल होता था और दिन भर परेड। खेल का प्रबन्ध भी था; परन्तु खेल-कूद में वे कम ही रुचि रखते थे।
वे मुझे अच्छी दृष्टि से नहीं देखते थे, परन्तु मुझसे कुछ भयभीत रहते थे। और जब भी मैं कहीं घूमता तो पहरेदारों की नजर मुझ पर ही रहती थी। कैदी कैम्प में तीन कैदी थे जिनकी चीखें अक्सर सुनायी पड़ती थीं। उनकी चीख-पुकार से ही अंदाजा हो जाता था वे कैदी स्थानीय नहीं थे, बल्कि हिन्दुस्तानी थे। उनकी चीख इस बात की गवाह थी कि उनके प्रति चीनी सैनिकों का व्यवहार कुछ अच्छा नहीं था। मैं उनसे मिलना चाहता था, परन्तु मुझे उनसे मिलने की मनाही थी।
मेजर डॉक्टर ली संग यदा-कदा मुझसे मिलने आ जाया करता था। उसी से मुझे मालूम हुआ कि तीन कैदी भारतीय मिलिट्री इंटेलीजेंस के एजेंट हैं जो याम दरंग की खानकाह तक पहुँचने का इरादा रखते थे; परन्तु उनमें से कोई भी अपने को जासूस मानने को तैयार नहीं। वे अपने आपको व्यापारी बता रहे हैं जो तिब्बत की भेड़ों की ऊन का कारोबार करते थे। चीनी सैनिकों को संदेह है कि उनके दूसरे साथी भी हैं जो फरार होने में कामयाब हो गये थे और वे याम दरंग का खजाना हिन्दुस्तान पहुँचाने के मिशन पर आए थे। बाकी आदमियों की खोज जारी थी।
याम दरंग की खानकाह का नाम कई बार मेरे सामने आ चुका था और मुझे याद आया कि जब मोहिनी का शरीर जल रहा था तो उसने भी याम दरंग की खानकाह का उल्लेख किया था। वहाँ कोई शैतानी मकबरा भी था। मैं उस रहस्यमयी खानकाह के बारे में कुछ नहीं जानता था; और शायद चीनियों को भी वहाँ तक पहुँचने का नक्शा नहीं मिला था।
मेरी समझ में नहीं आता था कि मोहिनी की जुबान पर उस खानकाह का नाम क्यों आया था। यह बात तो मेरी समझ में आ गयी थी कि मोहिनी की इँसानी देह इसलिए नष्ट हो गयी थी क्योंकि उस आग में एक बार स्नान करने से ही अमरत्व प्राप्त होता था। दो बार स्नान करने का अर्थ उस शक्ति का खात्मा था। वहाँ मैंने बड़े भयानक जादू देखे थे। और अब उसका निशान तक वहाँ नहीं था।
मुझे याद आया कि तिब्बत के बारे में कुछ भविष्यवाणियाँ प्रचलित थीं जो बीसवीं शताब्दी के लिए की गयी थीं और वह सभी सच होती जा रही थीं। तराई की महारानी ने जो भविष्यवाणी पुस्तकों से देखकर की थी, वह भी सच ही साबित हुई थी। महारानी की मृत्यु मोहिनी के हाथों और मोहिनी का आत्मदाह और फिर मेरा चीनियों के हत्थे चढ़ना, उस रहस्यमयी धरती की तबाही, सब कुछ हुआ था।
और मुझे यूँ लगता जैसे मैं मानोसंग हूँ। चीनी लुटेरा मानोसंग, जो शैतान के मकबरे में सो रहा था। मेरे नाम राज और मानोस में कितनी समानता थी। यदि कोई चीनी या तिब्बती मेरे नाम का उच्चारण करता तो राज की बजाय मानोस ही कहता। और यूँ मेरा पूरा नाम भी राज सिंह ठाकुर है, तो मेरा नाम मानोसंग होते क्या देर लगती।
अजीब सी कैफियत थी। क्या सचमुच मुझे याम दरंग की खानकाह तक पहुँचना होगा ? और क्या यही मेरे भाग्य में बदा है ? क्या मोहिनी भी यही चाहती थी कि मैं वहाँ जाऊँ ? और वह खजाना कैसा था जिसके लिए चीन के कामरेडों की नींद हराम थी ? मैं इन्हीं विचारों में खोया रहता।
मुझे अच्छा खाना दिया गया और उन्होंने मुझे कोई कष्ट नहीं पहुँचाया; न ही मुझसे किसी प्रकार का सवाल किया गया। सप्ताह के अंत में कमांडिंग ऑफिसर कैम्प में आया। सुबह से ही हर सैनिक वर्दी चमकाता घूम रहा था। खेमों को अच्छी तरह दुरुस्त कर लिया गया था जैसे कोई ऑफिसर उनके निरीक्षण परेड पर आ रहा हो। मेरे खेमे में भी अच्छी तरह सफाई कर दी गयी थी।
दोपहर के समय कमांडिंग ऑफिसर दस सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ आ पहुँचा। एक जीप और एक ट्रक आया था, कमांडिंग ऑफिसर के स्वागत के लिए। सैनिक बाकायदा तीन कतारों में सलामी के लिए खड़े थे।
कमांडिंग ऑफिसर न जाने किस पर गरजता-बरसता रहा, कदाचित वह ऑफिसर्स का एक रसूख होता है–जब तक वह गरजे-बरसे नहीं –पता कैसे चले वह ऑफिसर है।
अधिक देर नहीं हुई जब वह सारी गर्जना उतारकर मुझसे मिलने आया। वह एक नाटे कद का फौजी था जिसकी आँखों में बिल्लियों की सी चमक थी। कँधे चौड़े और बलिष्ठ थे, चेहरे से मक्कारी टपकती थी। उसके गाल के एक हिस्से में स्याह धब्बा था जो उसकी बदसूरती और मक्कारी को और भी साकार करता था। कदाचित वह गोली या बारूद का जख्म था। गनीमत थी कि आँख बाल-बाल बची थी।
परन्तु उसके पीछे जो व्यक्ति खेमे में घुसा उसे देखकर तो मैं उछल ही पड़ता अगर मैं सब्र से काम न लिया होता। यह बूढ़ा शख्स महारानी का राज ज्योतिषी था। महारानी के इसी आज्ञाकारी ने चीनी हमले के बीज बोये थे। उसके प्रति मेरे मन में नफरत का लावा उबल रहा था; परन्तु यह मेरे सब्र का समय था। कमांडिंग ऑफिसर ने गौर से मुझे देखा। उसके होंठों पर पतली सी मुस्कुराहट आकर विलीन हो गयी।
कैम्प की स्थिति से पता चलता था कि वह काफी समय से वहाँ स्थापित है। फौजियों ने बाकायदा वहाँ बागवानी की हुई थी। क्वार्टर गार्द के सामने तो फूल तक खिले हुए थे। चीन का निशान–लाल रंग का लहराता झंडा, जिसके दाईं ओर पाँच सितारे बने थे; क्वार्टर गार्द पर नजर आ रहा था। वहाँ सामने एक पार्किंग बनी थी जिसमें फौजी गाड़ियाँ खड़ी थीं। इन गाड़ियों को कैमोफ्लैज करने के लिए जमीनी रंगों से रंगा गया था। तिब्बत में सेना के कैमोफ्लैज में सफेद चकत्ते भी बनाये जाते हैं, क्योंकि वह बर्फीला क्षेत्र है। ऊपर घास-फूस के तिनके खड़े किये गये थे। ऐसा ही कुछ प्रबन्ध फौजियों की पोशाकों पर भी था। जंगी टोपों में घास-फूस के तिनके ठूँसे गये थे। चीनी सैनिक वहाँ मार्च करते नजर आते थे। सुबह शाम रोल कॉल होता था और दिन भर परेड। खेल का प्रबन्ध भी था; परन्तु खेल-कूद में वे कम ही रुचि रखते थे।
वे मुझे अच्छी दृष्टि से नहीं देखते थे, परन्तु मुझसे कुछ भयभीत रहते थे। और जब भी मैं कहीं घूमता तो पहरेदारों की नजर मुझ पर ही रहती थी। कैदी कैम्प में तीन कैदी थे जिनकी चीखें अक्सर सुनायी पड़ती थीं। उनकी चीख-पुकार से ही अंदाजा हो जाता था वे कैदी स्थानीय नहीं थे, बल्कि हिन्दुस्तानी थे। उनकी चीख इस बात की गवाह थी कि उनके प्रति चीनी सैनिकों का व्यवहार कुछ अच्छा नहीं था। मैं उनसे मिलना चाहता था, परन्तु मुझे उनसे मिलने की मनाही थी।
मेजर डॉक्टर ली संग यदा-कदा मुझसे मिलने आ जाया करता था। उसी से मुझे मालूम हुआ कि तीन कैदी भारतीय मिलिट्री इंटेलीजेंस के एजेंट हैं जो याम दरंग की खानकाह तक पहुँचने का इरादा रखते थे; परन्तु उनमें से कोई भी अपने को जासूस मानने को तैयार नहीं। वे अपने आपको व्यापारी बता रहे हैं जो तिब्बत की भेड़ों की ऊन का कारोबार करते थे। चीनी सैनिकों को संदेह है कि उनके दूसरे साथी भी हैं जो फरार होने में कामयाब हो गये थे और वे याम दरंग का खजाना हिन्दुस्तान पहुँचाने के मिशन पर आए थे। बाकी आदमियों की खोज जारी थी।
याम दरंग की खानकाह का नाम कई बार मेरे सामने आ चुका था और मुझे याद आया कि जब मोहिनी का शरीर जल रहा था तो उसने भी याम दरंग की खानकाह का उल्लेख किया था। वहाँ कोई शैतानी मकबरा भी था। मैं उस रहस्यमयी खानकाह के बारे में कुछ नहीं जानता था; और शायद चीनियों को भी वहाँ तक पहुँचने का नक्शा नहीं मिला था।
मेरी समझ में नहीं आता था कि मोहिनी की जुबान पर उस खानकाह का नाम क्यों आया था। यह बात तो मेरी समझ में आ गयी थी कि मोहिनी की इँसानी देह इसलिए नष्ट हो गयी थी क्योंकि उस आग में एक बार स्नान करने से ही अमरत्व प्राप्त होता था। दो बार स्नान करने का अर्थ उस शक्ति का खात्मा था। वहाँ मैंने बड़े भयानक जादू देखे थे। और अब उसका निशान तक वहाँ नहीं था।
मुझे याद आया कि तिब्बत के बारे में कुछ भविष्यवाणियाँ प्रचलित थीं जो बीसवीं शताब्दी के लिए की गयी थीं और वह सभी सच होती जा रही थीं। तराई की महारानी ने जो भविष्यवाणी पुस्तकों से देखकर की थी, वह भी सच ही साबित हुई थी। महारानी की मृत्यु मोहिनी के हाथों और मोहिनी का आत्मदाह और फिर मेरा चीनियों के हत्थे चढ़ना, उस रहस्यमयी धरती की तबाही, सब कुछ हुआ था।
और मुझे यूँ लगता जैसे मैं मानोसंग हूँ। चीनी लुटेरा मानोसंग, जो शैतान के मकबरे में सो रहा था। मेरे नाम राज और मानोस में कितनी समानता थी। यदि कोई चीनी या तिब्बती मेरे नाम का उच्चारण करता तो राज की बजाय मानोस ही कहता। और यूँ मेरा पूरा नाम भी राज सिंह ठाकुर है, तो मेरा नाम मानोसंग होते क्या देर लगती।
अजीब सी कैफियत थी। क्या सचमुच मुझे याम दरंग की खानकाह तक पहुँचना होगा ? और क्या यही मेरे भाग्य में बदा है ? क्या मोहिनी भी यही चाहती थी कि मैं वहाँ जाऊँ ? और वह खजाना कैसा था जिसके लिए चीन के कामरेडों की नींद हराम थी ? मैं इन्हीं विचारों में खोया रहता।
मुझे अच्छा खाना दिया गया और उन्होंने मुझे कोई कष्ट नहीं पहुँचाया; न ही मुझसे किसी प्रकार का सवाल किया गया। सप्ताह के अंत में कमांडिंग ऑफिसर कैम्प में आया। सुबह से ही हर सैनिक वर्दी चमकाता घूम रहा था। खेमों को अच्छी तरह दुरुस्त कर लिया गया था जैसे कोई ऑफिसर उनके निरीक्षण परेड पर आ रहा हो। मेरे खेमे में भी अच्छी तरह सफाई कर दी गयी थी।
दोपहर के समय कमांडिंग ऑफिसर दस सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ आ पहुँचा। एक जीप और एक ट्रक आया था, कमांडिंग ऑफिसर के स्वागत के लिए। सैनिक बाकायदा तीन कतारों में सलामी के लिए खड़े थे।
कमांडिंग ऑफिसर न जाने किस पर गरजता-बरसता रहा, कदाचित वह ऑफिसर्स का एक रसूख होता है–जब तक वह गरजे-बरसे नहीं –पता कैसे चले वह ऑफिसर है।
अधिक देर नहीं हुई जब वह सारी गर्जना उतारकर मुझसे मिलने आया। वह एक नाटे कद का फौजी था जिसकी आँखों में बिल्लियों की सी चमक थी। कँधे चौड़े और बलिष्ठ थे, चेहरे से मक्कारी टपकती थी। उसके गाल के एक हिस्से में स्याह धब्बा था जो उसकी बदसूरती और मक्कारी को और भी साकार करता था। कदाचित वह गोली या बारूद का जख्म था। गनीमत थी कि आँख बाल-बाल बची थी।
परन्तु उसके पीछे जो व्यक्ति खेमे में घुसा उसे देखकर तो मैं उछल ही पड़ता अगर मैं सब्र से काम न लिया होता। यह बूढ़ा शख्स महारानी का राज ज्योतिषी था। महारानी के इसी आज्ञाकारी ने चीनी हमले के बीज बोये थे। उसके प्रति मेरे मन में नफरत का लावा उबल रहा था; परन्तु यह मेरे सब्र का समय था। कमांडिंग ऑफिसर ने गौर से मुझे देखा। उसके होंठों पर पतली सी मुस्कुराहट आकर विलीन हो गयी।