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Fantasy मोहिनी

कुल पचास खेमों का कैम्प था जिनमें एक क्वार्टर गार्ड का खेमा था, जिसके सामने दो तोपें भी रखी थीं। स्टेनगनधारी सैनिक पहरा दिया करते थे। एक बड़ा खेमा मेस का काम करता था। कैम्प के चारों ओर कटीले तारों की बाड़ थी। एक गेट था जिस पर लकड़ी का एक केबिन सा बना हुआ था। एक खेमा बंदीगृह था।

कैम्प की स्थिति से पता चलता था कि वह काफी समय से वहाँ स्थापित है। फौजियों ने बाकायदा वहाँ बागवानी की हुई थी। क्वार्टर गार्द के सामने तो फूल तक खिले हुए थे। चीन का निशान–लाल रंग का लहराता झंडा, जिसके दाईं ओर पाँच सितारे बने थे; क्वार्टर गार्द पर नजर आ रहा था। वहाँ सामने एक पार्किंग बनी थी जिसमें फौजी गाड़ियाँ खड़ी थीं। इन गाड़ियों को कैमोफ्लैज करने के लिए जमीनी रंगों से रंगा गया था। तिब्बत में सेना के कैमोफ्लैज में सफेद चकत्ते भी बनाये जाते हैं, क्योंकि वह बर्फीला क्षेत्र है। ऊपर घास-फूस के तिनके खड़े किये गये थे। ऐसा ही कुछ प्रबन्ध फौजियों की पोशाकों पर भी था। जंगी टोपों में घास-फूस के तिनके ठूँसे गये थे। चीनी सैनिक वहाँ मार्च करते नजर आते थे। सुबह शाम रोल कॉल होता था और दिन भर परेड। खेल का प्रबन्ध भी था; परन्तु खेल-कूद में वे कम ही रुचि रखते थे।

वे मुझे अच्छी दृष्टि से नहीं देखते थे, परन्तु मुझसे कुछ भयभीत रहते थे। और जब भी मैं कहीं घूमता तो पहरेदारों की नजर मुझ पर ही रहती थी। कैदी कैम्प में तीन कैदी थे जिनकी चीखें अक्सर सुनायी पड़ती थीं। उनकी चीख-पुकार से ही अंदाजा हो जाता था वे कैदी स्थानीय नहीं थे, बल्कि हिन्दुस्तानी थे। उनकी चीख इस बात की गवाह थी कि उनके प्रति चीनी सैनिकों का व्यवहार कुछ अच्छा नहीं था। मैं उनसे मिलना चाहता था, परन्तु मुझे उनसे मिलने की मनाही थी।

मेजर डॉक्टर ली संग यदा-कदा मुझसे मिलने आ जाया करता था। उसी से मुझे मालूम हुआ कि तीन कैदी भारतीय मिलिट्री इंटेलीजेंस के एजेंट हैं जो याम दरंग की खानकाह तक पहुँचने का इरादा रखते थे; परन्तु उनमें से कोई भी अपने को जासूस मानने को तैयार नहीं। वे अपने आपको व्यापारी बता रहे हैं जो तिब्बत की भेड़ों की ऊन का कारोबार करते थे। चीनी सैनिकों को संदेह है कि उनके दूसरे साथी भी हैं जो फरार होने में कामयाब हो गये थे और वे याम दरंग का खजाना हिन्दुस्तान पहुँचाने के मिशन पर आए थे। बाकी आदमियों की खोज जारी थी।

याम दरंग की खानकाह का नाम कई बार मेरे सामने आ चुका था और मुझे याद आया कि जब मोहिनी का शरीर जल रहा था तो उसने भी याम दरंग की खानकाह का उल्लेख किया था। वहाँ कोई शैतानी मकबरा भी था। मैं उस रहस्यमयी खानकाह के बारे में कुछ नहीं जानता था; और शायद चीनियों को भी वहाँ तक पहुँचने का नक्शा नहीं मिला था।

मेरी समझ में नहीं आता था कि मोहिनी की जुबान पर उस खानकाह का नाम क्यों आया था। यह बात तो मेरी समझ में आ गयी थी कि मोहिनी की इँसानी देह इसलिए नष्ट हो गयी थी क्योंकि उस आग में एक बार स्नान करने से ही अमरत्व प्राप्त होता था। दो बार स्नान करने का अर्थ उस शक्ति का खात्मा था। वहाँ मैंने बड़े भयानक जादू देखे थे। और अब उसका निशान तक वहाँ नहीं था।

मुझे याद आया कि तिब्बत के बारे में कुछ भविष्यवाणियाँ प्रचलित थीं जो बीसवीं शताब्दी के लिए की गयी थीं और वह सभी सच होती जा रही थीं। तराई की महारानी ने जो भविष्यवाणी पुस्तकों से देखकर की थी, वह भी सच ही साबित हुई थी। महारानी की मृत्यु मोहिनी के हाथों और मोहिनी का आत्मदाह और फिर मेरा चीनियों के हत्थे चढ़ना, उस रहस्यमयी धरती की तबाही, सब कुछ हुआ था।

और मुझे यूँ लगता जैसे मैं मानोसंग हूँ। चीनी लुटेरा मानोसंग, जो शैतान के मकबरे में सो रहा था। मेरे नाम राज और मानोस में कितनी समानता थी। यदि कोई चीनी या तिब्बती मेरे नाम का उच्चारण करता तो राज की बजाय मानोस ही कहता। और यूँ मेरा पूरा नाम भी राज सिंह ठाकुर है, तो मेरा नाम मानोसंग होते क्या देर लगती।

अजीब सी कैफियत थी। क्या सचमुच मुझे याम दरंग की खानकाह तक पहुँचना होगा ? और क्या यही मेरे भाग्य में बदा है ? क्या मोहिनी भी यही चाहती थी कि मैं वहाँ जाऊँ ? और वह खजाना कैसा था जिसके लिए चीन के कामरेडों की नींद हराम थी ? मैं इन्हीं विचारों में खोया रहता।

मुझे अच्छा खाना दिया गया और उन्होंने मुझे कोई कष्ट नहीं पहुँचाया; न ही मुझसे किसी प्रकार का सवाल किया गया। सप्ताह के अंत में कमांडिंग ऑफिसर कैम्प में आया। सुबह से ही हर सैनिक वर्दी चमकाता घूम रहा था। खेमों को अच्छी तरह दुरुस्त कर लिया गया था जैसे कोई ऑफिसर उनके निरीक्षण परेड पर आ रहा हो। मेरे खेमे में भी अच्छी तरह सफाई कर दी गयी थी।

दोपहर के समय कमांडिंग ऑफिसर दस सैनिकों की एक टुकड़ी के साथ आ पहुँचा। एक जीप और एक ट्रक आया था, कमांडिंग ऑफिसर के स्वागत के लिए। सैनिक बाकायदा तीन कतारों में सलामी के लिए खड़े थे।

कमांडिंग ऑफिसर न जाने किस पर गरजता-बरसता रहा, कदाचित वह ऑफिसर्स का एक रसूख होता है–जब तक वह गरजे-बरसे नहीं –पता कैसे चले वह ऑफिसर है।

अधिक देर नहीं हुई जब वह सारी गर्जना उतारकर मुझसे मिलने आया। वह एक नाटे कद का फौजी था जिसकी आँखों में बिल्लियों की सी चमक थी। कँधे चौड़े और बलिष्ठ थे, चेहरे से मक्कारी टपकती थी। उसके गाल के एक हिस्से में स्याह धब्बा था जो उसकी बदसूरती और मक्कारी को और भी साकार करता था। कदाचित वह गोली या बारूद का जख्म था। गनीमत थी कि आँख बाल-बाल बची थी।

परन्तु उसके पीछे जो व्यक्ति खेमे में घुसा उसे देखकर तो मैं उछल ही पड़ता अगर मैं सब्र से काम न लिया होता। यह बूढ़ा शख्स महारानी का राज ज्योतिषी था। महारानी के इसी आज्ञाकारी ने चीनी हमले के बीज बोये थे। उसके प्रति मेरे मन में नफरत का लावा उबल रहा था; परन्तु यह मेरे सब्र का समय था। कमांडिंग ऑफिसर ने गौर से मुझे देखा। उसके होंठों पर पतली सी मुस्कुराहट आकर विलीन हो गयी।
 
“क्यों राज ज्योतिषी ?” उसने उसी बूढ़े से पूछा। “तुम्हारी ज्योतिषी की पुस्तक क्या कहती है इस भिक्षुक के बारे में ?”

“यह भिक्षुक नहीं है।” बूढ़ा बोला। “यह वही इँसान है जिसका कि हमारी स्वर्गीय रानी ने जिक्र किया था। इसका नाम कुँवर राज ठाकुर है।”

“राज ठाकुर!” उसने मेरे नाम का उच्चारण अपने ढंग से किया–“ओह! वेरी गुड!” अब वह अंग्रेजी में मुझसे सम्बोधित हुआ “तुम ही वह व्यक्ति हो जिसके कारण उस सुन्दर धरती में तबाही आयी थी ?”

मैं तुरन्त कुछ न बोला।

“बस...बस...मुझे तुमसे अधिक कुछ नहीं पूछना।”

फिर वह राज ज्योतिषी की तरफ पलटकर बोला–“राज ज्योतिषी अब तुम जाकर आराम करो। तुम्हारा काम समाप्त हुआ और अब हमारा काम शुरू होता है।”

राज ज्योतिषी अदब से सिर झुकाकर चलता बना। कमांडिंग ऑफिसर अब मेरे सामने अकेला रह गया था। वह एक कुर्सी खींचकर बैठ गया। फिर उसने जेब से एक सिगार निकाला, उसका कोना चबाकर थूका। बराबर मुझ पर नजरें टिकाये-टिकाये उसने सिगार सुलगाया।

“यहाँ मोहिनी नामक किसी जादूगरनी का मन्दिर था मिस्टर राज ?”

“था...।” मैंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।

“और तुम उसके प्रेमी थे ?”

“था नहीं, हूँ।”

“वेरी गुड, क्या वह अब भी जीवित है ?”

“मैं तुम्हें यह थ्योरी नहीं समझा पाऊँगा ऑफिसर। बस इसे तुम इतने ही शब्दों में समझ सकते हो कि आत्मा कभी नहीं मरती, और मोहिनी भी एक आत्मा है।”

“लेकिन यह उस आत्मा की थ्योरी है जो कोई शरीर नहीं रखती। शरीर तो मरता ही है और प्रेम अदृश्य आत्माओं से नहीं शरीर से होता है।”

“अपना-अपना विचार है। मैं प्रेम को आत्मा का मिलन समझता हूँ, शरीर का नहीं। क्योंकि शरीरों का प्रेम कभी अमर नहीं होता।”

“खैर... मैंने सुना है कि वह जादूगरनी सदियों से जीवित थी ?”

“जीवित तो वह अब भी है।”

“बता सकते हो कि वह इस वक़्त कहाँ है ?”

“वह हर जगह है।”

“वेरी गुड, शायद मैं ही न देख पा रहा हूँगा। अगर तुम देख रहे हो तो उसे हमारा भी सलाम कह दो।” उसने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा और सिगार का ढेर सारा धुआँ मेरे चेहरे की तरफ छोड़ दिया।

“क्या उन पहाड़ियों में सचमुच ऐसी कोई चीज थी जिससे इँसान अमर हो सकता था ?” सिगार के धुएँ के साथ उसने अगला प्रश्न उछाला।

“दुनिया में ऐसी चीज कहीं नहीं है।”

“फिर वह औरत सदियों तक कैसे जिन्दा रही ?”

“मैं इस भेद को नहीं जान सका।”

“इसका मतलब वहाँ ऐसी कोई चीज थी जो अमरत्व के समान थी।”

“अगर उसका वह शरीर अमर था, तो तुम्हें वह सशरीर मिलनी चाहिये थी और फिर तुम्हारी सेना ने तो यह सारी जमीन खखोल डाली होगी। क्यों नहीं पा लिया उस तत्व को ?”

“हमारी कोशिशें अभी समाप्त नहीं हुईं। हम वहाँ खुदाई कराएँगे। वह जगह भी सैनिक दृष्टिकोण से काफी सुरक्षित है। अच्छी-खासी छावनी बनायी जा सकती है। हमने तुम्हारे बारे में भी तरह-तरह की बातें सुनी हैं और हम चाहते हैं कि तुम हमारे साथ सहयोग करो।”

“किस प्रकार का सहयोग ?”

“याम दरंग की खानकाह के सिलसिले में।”

“याम दरंग की खानकाह! यह तो तिब्बत के भिक्षुओं का कोई पवित्र स्थान है, जहाँ तिब्बत की देवी माता रहती है।”

“हमें भिक्षुओं और देवी माता से कुछ लेना-देना नहीं। हमें उस खजाने से मतलब है जो चीन के एक सरदार की मिल्कियत है। जिसे उन लोगों ने लाने नहीं दिया था। इन लोगों ने खानकाह पर उस चीनी सरदार को रोक लिया था, फिर उसे मार डाला। यहीं कहीं उसका मकबरा है।”

“तुम्हें शायद भ्रम हो गया है। तिब्बत की जमीन की संपत्ति चाहे वह कहीं भी हो, तिब्बत की ही होगी। चीन की किस तरह हो सकती है ?”

“जिस तरह हिन्दुस्तान का कोहिनूर ब्रिटिश गवर्नमेंट का हो सकता है उसी तरह।” उसका स्वर कठोर हो गया। “तुम हमें बहकाने की कोशिश करोगे तो नुकसान उठाओगे। तुम्हें वहाँ जाना ही है और हमें साथ लेकर जाना है।”

“लेकिन मैं वहाँ कभी नहीं गया।”

“फिर भी तुम जा सकते हो।”

“वह किस तरह ?”

“जिस तरह तुम मोहिनी की धरती पर जा पहुँचे थे। हम तुम्हारे बारे में बहुत कुछ सुन चुके हैं। हमारे जासूस अब भी तुम्हारे जीवन की रहस्यमयी गुत्थियाँ सुलझाने में लगे हैं। तुम कुछ दिन लन्दन भी रहे जहाँ तुम्हें एक बहुत बड़े जादूगर की प्रसिद्धि मिली थी। तुम आत्माओं से बातें कर सकते हो। हिन्दुस्तान में रहकर तुमने क्या कुछ नहीं किया; इसकी भी हमें जानकारी है।”

उसकी इस तमामतर जानकारियों पर मैं चकरा गया।
 
तुम्हें यह सब कुछ किसने बताया ?” मैंने चौंककर पूछा।

“हमारे जासूस सारी दुनियाँ की खबर रखते हैं। बताओ क्या पूछना चाहते हो अपने बारे में ?”

“ऑफिसर!” मैंने गहरी साँस ली। “जो कुछ तुमने मेरे बारे में सुना, वह अधिकतर सच ही होगा। परन्तु बावजूद इसके मैं याम दरंग की खानकाह का मार्ग नहीं जानता।”

“कमांडर कुंग सुंग मेरा नाम है और मेरे अंग्रेज दोस्त किंग के नाम से मुझे पुकारते हैं। पहले मैं चीनी सेना में एक जल्लाद की हैसियत रखता था। जल्दी ही तुम्हें मालूम हो जायेगा कि सेना का ऑफिसर होते हुए भी मेरे व्यक्तिगत शौक किस प्रकार के हैं। और मैं अपने कैदी को भरपूर वक्त देता हूँ कि वह खूब समझ ले।” कुंग सुंग उठ खड़ा हुआ। “कल सवेरे मुलाकात होगी।”

और वह मेरा कोई उत्तर सुने बिना बाहर निकल गया। कुंग सुंग के रूप में एक नयी मुसीबत मेरे सामने आ खड़ी हुई थी। मैं सारी रात याम दरंग की खानकाह के बारे में सोचता रहा। लेकिन कुंग सुंग की बातों से यही अनुमान लगाया जा सकता था कि वह इनकार सुनने का आदी नहीं है।अब इसके सिवा मैं कर भी क्या सकता था कि अपने आपको परिस्थितियों के हवाले कर दूँ।

जैसे-तैसे रात बीती।भोर हुई तो मेरे लिए हमेशा की तरह जलपान आ गया। युवक डॉक्टर ली से मेरी मुलाकात नहीं हो पायी थी, अन्यथा मैं कुंग के इरादों के बारे में उससे थोड़ी बहुत जानकारियाँ हासिल करने का प्रयास अवश्य करता।

मैं अब पूर्णतया स्वस्थ था और आने वाली परिस्थितियों के बारे में सोच रहा था। भविष्य अँधकारमय ही नजर आता था। कुंग सुंग को यकीन दिलाना बड़ा ही मुश्किल लग रहा था। और झूठ बोलने से भी अधिक बचत नहीं थी। चंद दिन अवश्य सुकून से कट जाते; परन्तु उसके बाद जब झूठ खुलता तो कुंग मेरे लिए दरिंदा बन सकता था।

दूसरे दिन जब सूरज आसमान पर आया ही था कि मुझे कुंग ने बुलाया। वह बाहर क्वार्टर गार्द के सामने धूप सेंक रहा था। वह वर्दी में नहीं था, बल्कि चीनी चोंगा पहने था। एक अजीब सी तुर्रेदार गरम टोपी उसके सिर पर थी। उसके पास ही एक रेडियो रखा था।उसने मुझे बैठने का संकेत किया और मैं एक खाली कुर्सी पर बैठ गया।

“तुमने अवश्य सुना होगा कि यहाँ तीन कैदी थे जिन पर जासूस होने का शक़ था और वे भी याम दरंग तक पहुँचने का इरादा रखते थे। परन्तु इतनी यातनाएँ सहने के बाद भी वे कुछ न बता सके। मालूम पड़ता है कि हमारे हाथ गलत आदमी आ गये। और फिर जब तुम हमारे हाथ आ गये हो तो उनकी जरूरत यूँ भी नहीं रहती। इसीलिए मैंने उन्हें रिहाई का हुक्म दे दिया है।” वह मुस्कुराते हुए बोला।

“फिर तो तुम्हारे दिल में इँसानियत का जज्बा जरूर है।” मैं भी मुस्कुरा दिया।

कुंग ने एक जूनियर ऑफिसर को कुछ आदेश दिए और वह सैल्यूट ठोंककर चला गया। चंद मिनट बाद ही तीनों कैदी कुंग के सामने थे। उनके चेहरों पर जगह-जगह नील पड़ी हुई थी। आँखें सूजी हुईं थीं। बाल बिखरे हुए थे। एक की चाँद पर से तो बाल नोचे गये मालूम पड़ते थे। उनकी उँगलियां जख्मी थीं। पाँवों पर जलने के निशान थे और वस्त्रों के नाम पर उनके शरीर पर चीथड़े झूल रहे थे।

इसके बावजूद भी वे दृढ़ इरादों के इँसान नजर आते थे। उनके शरीरों की बनावट में एक कठोरता और आत्मविश्वास की झलक मिलती थी। वे लड़खड़ा नहीं रहे थे, बल्कि चलने का भरपूर प्रयास कर रहे थे। उनके सिर झुके न थे, बल्कि गर्व से उठे हुए थे। भला कौन कहता कि वह ऊन के व्यापारी होंगे। ऐसे दृढ़ इरादों वाले इँसान तो सैकड़ों में अलग ही पहचाने जाते हैं। चीनियों ने उनकी बहुत बुरी गत बनायी थी। फिर भी उनसे कुछ न पूछ पाए थे। उन्हें देखकर मेरे सीने में भी एक जोश सा उमड़ने लगा। शायद यह जज्बा इसलिए उमड़ा था क्योंकि वे हिन्दुस्तानी थे। वतन तो हर इँसान को प्यारा होता है और मैं चाहे कितना भी बुजदिल इँसान क्यों न होता, ऐसी परिस्थिति में जोश लहरें मारने लगता।
 
ऐसे दृढ़ इरादों वाले इँसान तो सैकड़ों में अलग ही पहचाने जाते हैं। चीनियों ने उनकी बहुत बुरी गत बनायी थी। फिर भी उनसे कुछ न पूछ पाए थे। उन्हें देखकर मेरे सीने में भी एक जोश सा उमड़ने लगा। शायद यह जज्बा इसलिए उमड़ा था क्योंकि वे हिन्दुस्तानी थे। वतन तो हर इँसान को प्यारा होता है और मैं चाहे कितना भी बुजदिल इँसान क्यों न होता, ऐसी परिस्थिति में जोश लहरें मारने लगता।

परदेश में जब दो हमवतन मिलते हैं तो अजनबी होते हुए भी उनमें एक दिली रिश्ता जुड़ जाता है। ये लोग तो शूरवीर थे। वतन के सिपाही मालूम पड़ते थे और वे अपनी सरकार के लिए सरफरोशी की तमन्ना लेकर निकले होंगे। कदम-कदम पर खतरे से बेखौफ लोगों में से थे। ऐसे इँसान तो किसी चूहे को भी शेर बनाकर कुर्बानी के लिए उकसा सकते हैं।

वे भी मुझे आश्चर्य से देख रहे थे। कुछ क्षणों के लिए ही हम लोगों की आँखें चार हुईं। मुझे कुंग के बराबर में आसीन देखकर उन्हें या तो हैरत हुई या मुझसे नफरत। परन्तु जल्दी ही उनके चेहरे भावहीन हो गये।

“मुझे खेद है कि तुम लोगों को यूँ ही पकड़ लिया गया है।” कुंग उनसे अंग्रेजी में कह रहा था। “तुम लोग हमारे किसी मतलब के सिद्ध नहीं हुए; इसीलिए मैं सोचता हूँ कि तुम लोगों को रिहा कर दिया जाए।”

उनके चेहरों पर प्रसन्नता के क्षीण भाव उभरे। परन्तु बोला कोई नहीं।

“लेकिन कुंग के कुछ शौक भी हैं। और उसका सबसे बड़ा शौक ये है कि जब उसकी कैद में कोई फँस जाता है, तो वह किसी बुजदिल को कभी रिहा नहीं करता; चाहे वह निर्दोष ही क्यों न फँसा हो। मैंने सुना है कि जब तुम लोग पकड़े गये थे, तो चालीस मील तक तुम्हारा पीछा किया गया था। तुम दोनों ने पैदल दौड़ लगाई थी, जबकि हमारे सैनिक घोड़ों पर थे।”

“वास्तव में हम डर गये थे और फिर हमारे पास पासपोर्ट भी नहीं था।” उनमे से एक बोला। “हमने यह बात पहले भी बतायी थी।”

“ठीक, तो फिर मैं देखना चाहता हूँ कि तुम इतना तेज किस तरह दौड़ते हो ? वह सामने तारों की बाड़ है। अगर तुमने तीस सेकंड में उसे पार कर दिखाया, तो समझो तुम रिहा। इस सीमा में तीस सेकेंड तक कोई तुम पर शस्त्र नहीं उठायेगा। लेकिन इकतीसवें सेकेंड में यदि तुम अन्दर पाए गये तो गोली मार दी जाएगी। देख लो और चाहो तो फासला नाप लो। तीस सेकेंड तक पार निकलने वाले का कोई पीछा नहीं करेगा, यह मेरा वादा रहा।”

तीनों उस तरफ देखने लगे जिधर कुंग ने संकेत किया था। पचास गज से अधिक का फासला नहीं था, इससे कम ही रहा होगा। अलबत्ता तारों की बाड़ अवश्य आठ फुट ऊँची थी। तार कटीले थे। उसे पार करने में अवश्य कुछ समय लग सकता था। वे लोग जख्मी थे। बड़ी मुश्किल से धीरे-धीरे चलकर यहाँ तक आये थे। कुंग की यह शर्त बेरहमाना थी। उन लोगों ने थोड़ी देर तक सोचा; फिर नजरों ही नजरों में कुछ बातें की।

कुंग उन्हें देखता रहा। वह किसी प्रकार की जल्दबाज़ी में नहीं था।

“ठीक है...हमें यह शर्त मंजूर है।” उनमें से एक ने कहा।

“वेरी गुड! यह आवाज सुनकर मुझे बड़ी खुशी हुई।” कुंग ने कँधे उचकाते हुए कहा। “पहले यह जायेगा।” कुंग ने एक तरफ संकेत किया।

वह तैयार हो गया।

“जैसे ही मैं सीटी बजाऊँ, तुम दौड़ पड़ना। उसी तीस सेकेंड के बाद मैं अपनी बन्दूक लोड करूँगा और उसके बाद निशाना बाँधकर फायर करूँगा। और अगर मेरा निशाना चूक जाए तब भी तुम रिहा समझे जाओगे। मेरे सिवा कोई तुम पर फायर नहीं करेगा।”

उसने जूनियर ऑफिसर को राइफल लाने का आदेश दिया। राइफल और उसकी गोलियाँ मेज पर रख दी गयीं।

“यह देखो, सिर्फ तीन गोलियाँ। किसका भाग्य किस गोली पर लिखा है, मैं नहीं जानता। चलो, तुम तैयार हो जाओ, मुँह उधर घुमा लो!”

वह घूमकर तैयार हो गया। मैंने उसके चेहरे पर दृढ़ विश्वास की चमक देखी।एक मिनट बीता होगा कि कुंग ने सीटी बजा दी।

वह भाग खड़ा हुआ। ठीक इस तरह जैसे मौत से बचने के लिए इँसान में एक नयी शक्ति भर जाती है। एक बार वह गिरा भी, परन्तु फिर उठकर भागा। और कुंग घड़ी पर दृष्टि जमाए था। तारों के पास पहुँचकर वह अचानक कलाबाजी खाकर गिरा। वह किसी चीज से उलझा हुआ दिखायी पड़ रहा था। शायद वहाँ रस्सियों का कोई फंदा या जाल पड़ा था। एक बार वह फिर उठा और चीखता हुआ तारों पर चढ़ने लगा। उसकी टांग में एक रस्सी का फंदा था, जो तन गया था।

अचानक कुंग ने राइफल लोड की और एक ही बार में निशाना साधकर फायर कर दिया। वह पके हुए आम की तरह खून में लिथड़ा जमीन पर आ गिरा।

“मूर्ख! क्या अँधा था, जो रस्सियों के जाल से बचकर नहीं भागा ?”

“यह धोखा है!” अचानक उनमें से एक चीख पड़ा।

“चलो अब तुम्हारी बारी है।” कुंग गुर्राया। “तुम उस रस्सी के जाल से बचकर भागना। गेट रेडी!”

इससे पहले कि वह कुछ कहता, कुंग ने सीटी बजा दी। इस बार जब कुंग ने गोली भरकर राइफल उठाई तो तीसरे ने उस पर छलाँग लगा दी। परन्तु कुंग असावधान नहीं बैठा था। वह उछलकर एक तरफ हट गया और अगले ही सेकेंड उसने पोजीशन बदलकर फायर कर दिया। उस दरिन्दे का निशाना अचूक था। गोली दूसरे कैदी पर पड़ी, तो उस समय वह तारों पर चढ़ चुका था। इससे पहले कि तीसरा आदमी उठ पाता, उसे दो सैनिकों ने दबोच लिया।

“अब तुम्हारी बारी है।” कुंग बोला।

“कमीने, कुत्ते, देख क्या रहा है ? अब उतार दे मेरे सीने में गोली।” वह आदमी चीखा। “हम मौत से नहीं डरते। हम अपने वतन के नाम पर...”

“आखिर सच्चाई जबान पर आ ही गयी!” कुंग ने ठहाका लगाया। “ये हरामज़ादे तुम लोगों से कुछ भी न उगलवा सके, और मेरे एक करतब ने ही तुम्हारा मुँह खोल दिया।”

“लेकिन तुम मुझसे कुछ भी मालूम नहीं कर सकते।” वह कैदी पागलों की तरह चीख पड़ा। “तुम मेरी बोटियाँ-बोटियाँ भी नोंच डालोगे, तब भी मेरा मुँह नहीं खुलवा सकते।”

“कैप्टन! इसके शरीर पर कीलें ठोंकने का प्रबन्ध करो।” कुंग की आवाज गूँजी।

अब मेरे सब्र का पैमाना छलकने को आ गया। कुंग से मुझे ऐसी ही नफरत हो गयी थी जैसा कि एक जमाने में हरी आनन्द से हुई थी। हमेशा ही मैं इस तरह के लोगों से नफरत करता रहा हूँ। उसका वास्तविक रूप मेरे सामने था।

“कुंग, तुम एक कमांडिंग ऑफिसर हो। तुम्हें यह सब शोभा नहीं देता। तुमने जो कुछ भी किया, वह दरिंदगी है, हैवानियत है।” न जाने कैसे मेरे मुँह से यह शब्द फूट पड़े। फिर तो गजब हो गया।

“तो तुम्हारी जुबान भी खुलने लगी, जादूगर की औलाद। मुझे भी तुम्हारा असली रूप देखना है। देखता हूँ किस तरह मुझ पर जादू चलाते हो।” कुंग के कहने के साथ ही चार सैनिक मुझ पर टूट पड़े, जो कदाचित उसके संकेत की प्रतीक्षा कर रहे थे।

कुंग सचमुच एक जालिम आदमी था। मैंने उन चार आदमियों से खुद को छुड़ाने की जद्दोजहद की, पर कई संगीनें मुझ पर तन चुकी थीं। न जाने क्यों मैं अपने आपको पहले से बेहतर हालत में समझ रहा था। शायद इसीलिए कि जुल्म सहने से मुझे आनन्द आता था और अपने उस हमवतन का साथ देने की खुशी भी थी। हम दोनों चीनियों की गिरफ्त में थे। फिर हमें ऐसे स्थान पर ले जाया गया, जहाँ दो खम्भों के ऊपर एक तीसरा खम्भा टिका था।

मुझे दोनों खम्भों के बीच बिठा दिया गया। और दूसरे कैदी की गर्दन में रस्सी का फंदा डालकर मेरी तरफ धकेल दिया गया। रस्सी का दूसरा छोर दोनों खम्भों से जुड़े तीसरे खम्भे के ऊपर से गुजरता चला गया था, जिसे चंद सैनिक खींचने लगे। कैदी के हाथ पीछे बाँध दिए गये। तीसरा खम्भा मेरे सिर से लगभग बारह-तेरह फिट ऊपर था।

“बचा सकते हो, तो बचा लो अपने इस हमवतन को।” कुंग की सर्द आवाज गूँजी।

फिर उन्होंने मेरा इकलौता हाथ मेरे शरीर से बाँध दिया।मेरे पास ही कैदी के पाँव रस्सी के तनाव के साथ जमीन से उठने लगे। मैंने उन टाँगों को अपनी देह पर रोक लिया और फिर उसके पैरों को अपने कन्धों पर जमा लिया।

“बहुत समझदार हो स्वामीजी!” कुंग ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा। “अब उसे बचाने के लिए तुम्हें इसी तरह खड़ा होना पड़ेगा। क्योंकि ज्यों-ज्यों रस्सी तनती जाएगी, उसकी टाँगें ऊपर उठती जायेंगी।”

मुझे उस कैदी की जान बचाने में बड़ी खुशी महसूस हो रही थी। यूँ लग रहा था जैसे जिंदगी में पहला कोई नेक काम कर रहा हूँ। वह तीनों ही देशभक्त थे जो अपनी जानें हँसते-हँसते गँवा देते हैं। वह सरदार भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल की सँतानें थीं।

मैं सीधा खड़ा हो गया। मेरा सीना गर्व से फूलकर तन गया।

“वेरी गुड!” कुंग सामने ही कुर्सी डालकर बैठ गया। “इसे कहते हैं देश प्रेम। तो कुँवर साहब, देखना अब यह बाकी है कि कब तक तुम इस तरह अपने देशभक्त को सँभालकर रखते हो।”

“जब तक मेरी साँस रहेगी। जब तक मेरी रगों में लहू गर्दिश करता रहेगा...” मैं मुस्कुराया। “और कुंग, तुम भी याद रखो...इँसान मरता एक ही बार है। तुम्हारी और मेरी मौत में फर्क यह होगा कि तुम नरक की आग में जलते रहोगे और मैं स्वर्ग में जगह बनाऊँगा। मैं बहादुरों की मौत मरूँगा और तुम कुत्ते की मौत...”

“अब आया कुछ मजा।” कुंग उसी प्रकार व्यंग्यात्मक स्वर में बोला। “अब समझो मुझे खानकाह के खजाने तक पहुँचने में कामयाबी मिलने वाली है। तुम दोनों में से कोई भी बताये। जो बताएगा वह जिंदा रहेगा। कुँवर साहब, जब तक तुम इसी तरह सीधे तनकर खड़े रहोगे, तुम्हारा हमवतन जिंदा रहेगा।”

यह तमाशा चीनी सैनिकों के लिए मनोरंजन का साधन बन गया। वे चारों तरफ से हम पर फब्तियाँ कस रहे थे। एक ने तो मेरी आँखों में मिट्टी झोंक डाली।

अगर इस चीज से कोई नाखुश था तो सिर्फ वह नौजवान डॉक्टर। वह इन सबसे अलग दूर खड़ा था। परन्तु वह कर भी क्या सकता था ? रस्सी कैदी के गर्दन में तनी थी और मेरे जरा सा झुकते ही उसका किस्सा तमाम था। बाद में मैंने महसूस किया कि मैंने कुछ जल्दबाज़ी से काम लिया। शायद कुंग ने मुझे भड़काने के लिए यह नाटक खेला था। कुछ देर बाद ही सैनिक अपने कामों में लग गये और कुंग भी वहाँ से चला गया। चंद पहरेदार हमारे इर्द-गिर्द पहरा दे रहे थे।

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रात होते ही कैम्प में अलाव धधक उठे। मेरी हालत खड़े-खड़े बदतर होती जा रही थी। हालाँकि इस बीच वह कैदी कई बार मुझसे निवेदन कर चुका था कि मैं उसे फाँसी के फंदे पर झूलता छोड़कर अपनी परवाह करूँ।

मेरी वेशभूषा और सिर की जटायें तथा दाढ़ी के बढ़े हुए बालों से उसने यही अनुमान लगाया था कि मैं कोई साधू-सन्यासी हूँ। वह मुझे स्वामी जी कहकर सम्बोधित करता था। लेकिन अब उसकी जिंदगी-मौत का बोझ मेरे कँधों पर था और विपत्तियाँ मेरे सिर पर मँडरा रही थीं। बहुत दिनों बाद तो आत्मा को एक प्रसन्नता मिली थी। हालाँकि उसके प्राण बचाने के लिए मेरे पास कोई जादू नहीं था, उसे मरना तो था ही; पर उसकी मौत मुझे एक नयी राह, एक नया सवेरा दिखा रही थी।

जब रात काफी गहरी हो गयी और पहरेदार भी ऊँघने लगे, तो मैं धीमे स्वर में अपनी मातृभाषा में बोला। “देखो दोस्त, तुम्हारा जीवन बहुत थोड़े समय के लिए रह गया है। सवेरे तक मैं निढाल हो जाऊँगा।”

“स्वामी जी! आपने अकारण अपना जीवन संकट में डाल लिया है।”

“आदमी कभी-कभी इसी तरह पुण्य कमाता है, दोस्त। तुम्हारी मौत तो एक बहुत बेहतर मौत है। मुझे तो एक बार भी इस तरह मरने का अवसर नहीं मिला। मुझे कुछ प्रश्नों का जवाब चाहिए; दे सकोगे ?”

“अवश्य दूँगा स्वामी जी।” उसका स्वर भर्राया हुआ था।

“क्या तुम लोग सचमुच याम दरंग की खानकाह के मिशन पर काम कर रहे थे ?”

“हाँ, यह सच है।”

“क्या तुम्हें उसका मार्ग मालूम है ?”

“नहीं।”

“तो फिर तुम किस तरह वहाँ पहुँचते ?”

“गाप सोंग में हमें एकत्रित होना था। वहाँ से हमें खानकाह का एक गाइड आगे ले जाता। परन्तु हमारे गाप सोंग पहुँचने से पहले ही न जाने कैसे इन लोगों को पता चल गया।”

“क्या तुम तीन ही थे ?”

“नहीं....हम पाँच थे। शेष दो रास्ता भटक गये हैं। हो सकता है वे भी कहीं मारे गये हों; या कहीं फँस गये हों। हम सब सिलीगुड़ी से अलग-अलग रास्ते पर हो लिए थे। हमें गाप सोंग में आ मिलना था।”

“क्या पता वे गाप सोंग पहुँच गये हों ?”

“ऐसा होता तो वे हमारी खोज-खबर जरूर लेते। गाप सोंग यहाँ से अधिक दूर नहीं है और उन्हें पता चल ही जाता कि हम कहाँ कैद हैं।”

“उस सूरत में वह क्या करते ?”

“वे हमसे सम्पर्क स्थापित करते और फिर जैसे परिस्थितियाँ होतीं, वैसा कदम उठाया जाता। हो सकता था कि हेडक्वार्टर को इसकी सूचना पहुँचाकर आगे की योजना बनाते। गाप सोंग में हमें कुछ अरसा रुकना था; क्योंकि खानकाह का रास्ता अभी एक सप्ताह बाद खुलेगा। इससे पहले तो गाइड भी हमें नहीं ले जा सकता था।”

हम दोनों फुसफुसाते स्वर में बातें कर रहे थे। इस सिलसिले में बड़े सावधान थे कि कोई हमारी आवाज न सुनने पाए।

“गाप सोंग में वह गाइड तुमसे किस प्रकार मुलाकात करता ?”

“उसका नाम रंग लंग है। गाप सोंग में संगराब की सराय में हमारी उससे भेंट होनी थी। उसका कोड था ‘मेहुआ’ और हमारा कोड था ‘गुलाब’। इन सांकेतिक शब्दों का आदान-प्रदान होते ही हम एक-दूसरे पर विश्वास कर सकते थे। तिब्बत के दलाई लामा ने हमारी सरकार से यह गुप्त सहयोग प्राप्त करने की पेशकश की थी कि हमारी सरकार तिब्बत की पौराणिक परम्पराओं को जीवित रखने के लिए यह कदम उठाये। इस सिलसिले में दलाई लामा की हमारी सरकार से गुप्त सँधि हो चुकी है। खानकाह में तिब्बत का पौराणिक खजाना भी है और बौद्ध भिक्षुओं की बहुत सी मूल्यवान पुस्तकें, उनकी प्रतिमाएँ इत्यादि का भँडार है। लेकिन स्वामी जी....आप यह सब जानकारी क्यों प्राप्त कर रहे हैं ?”

“इसलिए कि जो काम तुम लोग मेरे कन्धों पर छोड़कर जा रहे हो, उसे सम्पूर्ण कर सकूँ। मैंने तय कर लिया है कि मैं याम दरंग की खानकाह में अवश्य जाऊँगा।”

कुछ देर के लिए हम खामोश हो गये। एक पहरेदार हमारे पास आ गया था। शायद उसे कुछ संदेह हो गया था। कुछ देर वह हमारे पास खड़ा चीनी भाषा में न जाने क्या बड़बड़ाता रहा; फिर हमारा एक चक्कर काटकर चला गया।

कुछ देर बाद कैदी बोला। “स्वामी जी! आप कौन हैं, और आपकी इन लोगों से क्या दुश्मनी है ?”

“दुश्मनी पाप और पुण्य की सदा से चली आ रही है। नेकी और बदी की क्या दुश्मनी है ? शैतान की फरिश्तों से क्या अदावत है ?”

वह चुप हो गया। उसने मुझसे फिर नहीं पूछा कि मैं कौन हूँ, क्यों तिब्बत की वादियों में भटक रहा हूँ ? कदाचित यह जानना उसके लिए आवश्यक नहीं था, क्योंकि हिमालय सदा से ही साधू-सन्यासियों का निवास स्थल रहा है। कैलास पर शंकर विराजते हैं और हिमालय ऋषि-मुनियों का तप स्थल है। उसकी मृत्यु निकट आती जा रही थी। इसका पूर्वाभास उसे भी था और मुझे भी। वह जीवन के हर रिश्ते-नाते को मेरे ही कँधों पर छोड़ रहा था। न जाने वह क्यों गुमसुम हो गया था। शायद यादें इँसान की कमजोरियाँ होती हैं। मौत के समय हर चीज याद आती है। फाँसी के फंदे पर कौन सो सकता है! मौत के अँधेरों से दर्दनाक यादों का धुआँ उठता है। उसके कुछ अपने भी होंगे। शायद पत्नी भी हो, बच्चे भी हों। एक शहीद की लाश मेरे कँधों पर थी और जिंदगी के अच्छे-बुरे दिनों का धुआँ उसके इर्द-गिर्द उठ रहा था। कहते हैं इँसान जब मरता है तो उसका सारा जीवन एक चलचित्र की तरह उसके सामने घूमता है। जिंदगी अधूरी छूट जाती है तो कुछ इरादे भी छूट जाते हैं। कुछ कर्त्तव्य भी रह जाते हैं। हर इँसान एक परिवेश में जीता है। उसका अपना एक दायरा होता है। उसके अपने कुछ सिद्धान्त होते हैं।

वह मुझसे ऐसी कोई बात नहीं करना चाहता था जिससे उसकी बुजदिली की झलक मिले। बहुत से रिश्ते इँसान को बुजदिल बनाते हैं। मैंने भी उसे नहीं कुरेदा। उसके जीवन के बारे में कुछ न पूछा। उसे फख्र होना चाहिए था कि वह ऋषि-मुनियों की धरा पर हिमालय के बर्फीले कन्धों पर अपना जीवन त्याग रहा है। उससे पहले उसके दो साथी भी शहीद हो गये थे।

मैं फिर अपनी सोच में गुम हो गया। मुझे हर हाल में याम दरंग की खानकाह जाना था। बस यह मेरी जिंदगी का अन्तिम उद्देश्य होगा। अब कोई चाहत दिल में नहीं थी। डॉली व माला तो पहले ही जा चुकी थीं। कुलवन्त भी नहीं रही थी। इन तीनों की मृत्यु मेरे कारण हुई थी। फिर कौन सा रिश्ता शेष रह गया है ? कोई भी तो नहीं!

सारा जहाँ खाली था। और मैं जिंदगी के वीरान चौराहे पर खड़ा था। एक बुरा आदमी ऐसी जगह आ पहुँचा था, जहाँ नेकी का सूरज बुराई के अँधेरों को निगल जाता है। शायद इसी को कहते हैं प्रायश्चित, जो आदमी की परीक्षा लेता है। आदमी को अपने भीतर की पहचान कराता है। और इसी तरह नेकी के सूरज में मैं अपने आपको तलाश कर रहा था, पहचान रहा था। मुझे लग रहा था कि मेरे भीतर का इँसान बहुत बड़ा है। फिर उसके सामने मोहिनी क्या चीज है! मैं आम आदमी था जैसा कि बचपन होता है। मैं एक क्लर्क था। बहुत सादा सा जीवन जी रहा था। कोई बड़ा सपना मेरी आँखों से न गुजर सकता था। एक छोटा सा घर होता, बच्चे होते, किलकारियाँ होतीं; दफ्तर से लौटता तो वह मेरी राह में पलकें बिछाए होती; हमारी छोटी-छोटी जरूरतें होतीं। उसके लिए कर्म करने में और फिर फल पाने में कितना सुख मिलता! कितनी अजीब बात है, इँसान जब दौलतमन्द होता है तो हर चीज उसके पास होती है, फिर भी उसे खुशी नहीं होती। और जब एक साधारण सा आदमी जो मेहनत मजदूरी करके पैसा जुटाता है, फिर परिवार की खुशी के लिए कोई चीज खरीदकर घर पर लाता है तो कितनी खुशियाँ उसके घर-आँगन में मुस्कुरा उठती हैं। वह नाचता घूमता है।

काश कि मैं भी वैसा ही होता! काश कि मैंने मोहिनी को रेस के मैदान से निकलते हुए वचन न दिया होता कि मैं उसकी दोस्ती का फर्ज अदा करूँगा। मोहिनी की वजह से मैंने दौलत हासिल करने का एक आसान सा रास्ता प्राप्त किया था। दौलत आदमी को किस कदर कमजोर बना देती है, यह कोई मेरे जीवन की किताब से जाने। मेरी सोच मुझे अपने वर्तमान जीवन से दूर ले जाती रहीं और हम दोनों की सोच का अंत शायद एक ही नुक्ते पर जा मिलता था।

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जागती आँखों से मैं एक शहीद को फाँसी पर झूलते न देख सका। परन्तु होश आने के बाद जब मैंने अपने आपको कैदी खेमे में पाया तो स्पष्ट हो गया कि वह अब जिंदा नहीं है। मैंने लगभग छत्तीस घंटे तक उसे अपने कन्धों पर जीवित रखा था। उसके बाद तो मैं खुद ही बेहोश होकर गिर पड़ा था।

कैदी खेमे की जमीन नंगी थी। वहाँ न बिस्तर था, न ओढ़ना। खेमा एक सिरे से दूसरे सिरे तक खाली था। कैद की तन्हाईयाँ बहुत बुरी होती हैं। शायद जेलखानों में भी तन्हाईयाँ इसलिए बनायी जाती हैं। वह एक प्रकार की यातना ही होती है कि कैदी को बैरक से हटाकर तन्हाई में डाल दिया जाए।

यूँ मैं खुद अपनी जिंदगी में तन्हा हो गया था। मेरा सारा जीवन ही कैदखाने की तन्हाई बनकर रह गया था। किसी चीज की चाहत नहीं रही थी। और जब आदमी की इच्छाएँ मर जाती हैं तो वह एक जिंदा मुर्दा भर रह जाता है। मैं भी अपनी लाश घसीट रहा था।

कमांडिंग ऑफिसर कुंग सुंग ने मुझे यातनाएँ देनी शुरू कीं। उन यातनाओं का वर्णन तो इतना लम्बा है कि पूरी एक किताब लिखी जा सकती है; अतः उसका वर्णन ही व्यर्थ है। मैं अपने ऊपर तोड़े गये जुल्मों को कहाँ तक सुनाता रहूँगा ? सारी जिंदगी सुनाता रहूँ तो भी समाप्त होने को न आएँगी। कमांडिंग ऑफिसर एक दरिंदा था और उसकी यातनाएँ भी दरिंदगी से भरपूर थीं। हालाँकि मुझे याम दरंग की खानकाह के बारे में अब तक बहुत सी जानकारियाँ प्राप्त हो चुकी थी, परन्तु मुझसे कुछ उगलवाना आसान बात नहीं थी। उन चीनियों को क्या मालूम कि कुँवर राज ठाकुर क्या बला है! उसकी सारी जिंदगी ही यातना घर है। अगर मोहिनी मेरे पास होती तो इन चीनियों को बन्दर बनाकर पीकिंग पहुँचा चुका होता जहाँ पर एक ही सबक पढ़ रहे होते–मत सुनो बुरा; मत कहो बुरा। लेकिन अब मोहिनी को लेकर मैं जेहाद नहीं करना चाहता था। मोहिनी आफत की परकाला थी, हँगामों की बेटी थी। यह उसके पसन्दीदा खेल थे। इस वक्त यदि मोहिनी मेरे पास होती भी तो भी मैं उससे हरगिज कोई सहायता न लेता। मेरे ऊपर छाया उसका जादू अब टूट चुका था।

बंदीखेमे में मुझे पाँचवाँ रोज था। कुंग ने आशा न छोड़ी थी। वह मुझे किसी यातना गृह में पहुँचाने की तैयारी कर रहा था। कभी भी मुझे वहाँ से पलायन करना पड़ सकता था। पाँचवी रात का कोई पहर बीता जा रहा था, जब मैं बेसुध सा बंदीखेमे के नंगे फर्श पर औंधा पड़ा था। अचानक मैंने एक शोर सा सुना। सैनिक कैंप में अमूमन युद्ध या आक्रमण के समय में भी शोर नहीं सुनायी देता, फिर यह शोर किस तरह का है ? मैंने कराहकर करवट बदली और उठ बैठा। रात के अँधेरे में कैम्प से बाहर आग के शोले नाचते दिखायी दिए। और यह अलावों की आग हरगिज नहीं थी। इस आग में पेट्रोल की बू साफ महसूस हो रही थी। कदाचित कैम्प में आग लग गयी थी। मेरे खेमे पर चार पहरेदार चौबीसों घंटे पहरा देते थे। उनके हाथों में स्टेनगन होती थीं। मैंने खेमे में पतला सा सुराख पहले से बना रखा था जिससे कभी-कभी मैं बाहर झाँक लेता था। हरचंद की वहाँ से फरारी नामुमकिन थी। खेमे के इर्द-गिर्द ही एक नुकीले तारों का जाल कसा था। यदि कोई उसे काटकर निकल भी जाता तो फिर बाहर गश्त लेते पहरेदारों से किस तरह बचता ? और मचानों पर तैनात सैनिकों से भी बचने की कोई सूरत नहीं थी। इस पर बाहर तारों की बाड़ थी।

हर पंद्रह-बीस मिनट बाद कोई न कोई पहरेदार भीतर झाँक कर देख लेता। उस समय भी किसी ने भीतर झाँका।

“यह शोर कैसा है ?” मैंने उससे अंग्रेजी में पूछा।

“आग लग गयी थी आठ खेमों में एक साथ।” उसने टूटी-फूटी अंग्रेजी में जवाब दिया। “तुम चुपचाप पड़े रहो।”

मैंने सोचा सारे सैनिक आग बुझाने में लग चुके होंगे। शोर की वजह यही हो सकती थी। उन सबका ध्यान उसी तरफ होगा। ऐसे में क्या यह सम्भव नहीं कि फरारी का रास्ता अख्तियार कर लिया जाए ?

पहरेदार के बाहर होते ही मैंने उस सुराख से आँख सटा दी। मैं बाहर का दृश्य देखना चाहता था। बड़ी हाय-तौबा मची थी। कैम्प के एक सिरे में कई खेमे शोलों से घिरे थे और पचासियों सैनिक आग बुझाने में जूझ रहे थे। अचानक मैंने एक साये को खेमे के पास मँडराते देखा। यह कौन हो सकता है, जो बंदीखेमे के पास मँडरा रहा है ? रात अँधेरी थी, परन्तु शोलों की चमक ने वहाँ खासा उजाला कर दिया था। कुछ क्षण बाद ही वह साया मेरी दृष्टि से ओझल हो गया।

फिर मैंने किसी की दबी-दबी चीख सुनी। शोर के कारण वह चीख नक्कारखाने में तूती की तरह दबकर रह गयी। मेरी छठी इंद्रिय कुछ संकेत कर रही थी। खेमे के बाहर कोई ड्रामा स्टेज हो रहा है। चंद क्षण बाद ही एक साइड का पर्दा चरचराया। एक खँजर की नोक उसे चीरती दिखायी दी। मैं चौंक पड़ा। पलक झपकते ही उस स्थान से एक साये ने भीतर झाँका। भीतर एक लैंप जल रहा था जो रात भर जला करता था।उसी क्षण पहरेदार ने फिर अंदर झाँका। साया वहाँ से गायब हो गया।

पहरेदार ने आश्चर्य से खेमे में इधर-उधर देखा और फिर संतोषप्रद अन्दाज में गर्दन हिलाकर बाहर निकल गया। मेरा दिल तेज-तेज धड़कने लगा। अचानक शिगाफ फिर चौड़ा हो गया और साया फिर प्रकट हुआ। उसने हाथ अन्दर सरकाया और एक गठरी भीतर आकर पड़ी। मैंने इधर-उधर देखा। साये का संकेत समझते ही गठरी उठाई और उसे खोलकर देखा। वह एक जंगी पिट्ठू था जिसमें एक गरम चीनी सैनिक ड्रेस और खाने-पीने की सामग्री भरी थी। एक रिवाल्वर भी पड़ा था और गोलियों का एक डिब्बा। बूट, जंगी कैप सब साजो-समान रखा था। इशारों में ही समझने की बात थी। मैंने तुरन्त चीथड़ों को उतार फेंका। फिर चीथड़े पिट्ठू में डाले और चीनी वर्दी पहन ली। एकदम फिट तो नहीं थी, परन्तु कामचलाऊ थी।

चीनियों ने यातना के दौरान मेरे बाल नोंच डाले थे। मेरी जटाएँ काट-छाँट दी थी। दाढ़ी का एक-एक बाल उखाड़ दिया था। मैंने सिर के बचे-खुचे बालों को चीनी जंगी कैप में समेटा और फिर अधिक इन्तजार किए बिना उस शिगाफ को और चौड़ा करके बाहर निकल आया। तारों को पहले ही काट दिया गया था।

मैं खेमे से बाहर तो निकल आया, परन्तु समझ में नहीं आया कि जाना किस तरफ है।

“अपने कपड़े मुझे दो।” साये ने फुसफुसाते हुए भर्राए स्वर में कहा।

मैंने उसे कपड़े थमा दिए।

“उधर...।” उसने संकेत किया। “सीधे चले जाओ। वहाँ बाहर निकलने के लिए तारों का जाल काट दिया गया है।”

उसकी आवाज वैसी ही धीमी भर्राई हुई थी। कदाचित वह आवाज बदलने की कोशिश कर रहा था। कुछ दूर पर मैंने चीनी फौजी को औंधे पड़े देखा। वह पहरेदारों में से कोई था। वे लोग घंटे-आधे घंटे में खेमे का राउंड लगाया करते थे। चाहे उसने आवाज बदलने की कितनी भी कोशिश की होती, मैं उसे पहचान लेता कि वह डॉक्टर ली है। उसने अपना चेहरा एक ऊनी नकाब में छिपा रखा था। परन्तु वह अपनी बाईं तरफ झुककर चलने वाली आदत का क्या करता! मैंने भी उसे यही जाहिर किया कि उसे नहीं जानता। शायद उसने यह सावधानी इसलिए बरती थी कि कहीं उसे कोई देख न ले। या अगर मैं फरारी के समय पकड़ा गया तो किसी की शिनाख्त न कर सकूँ। हालाँकि उसे मेरे बारे में ऐसा संदेह नहीं करना चाहिए था कि मैं अपने हमदर्द को फँसवा दूँ।
 
शुरू से ही डॉक्टर ली मुझसे प्रभावित रहा था और कुंग की जालिमाना हरकतों ने ही उसे इस बगावत के लिए उकसाया होगा। खेमों की आग उसी का कारनामा हो सकती थी ताकि सैनिकों का ध्यान बँटा रहे। अब वह तेजी से उस चीनी सैनिक को खेमे के भीतर घसीटने में लगा था। मैं उसकी योजना समझ रहा था। वह कुछ देर का भ्रम बनाये रखना चाहता था। मेरे वस्त्र उस चीनी को पहनाकर खेमे में औंधा लिटा आता तो शायद पहरेदार धोखा खा जाता। लेकिन जब मैं अँधकार में बढ़ता हुआ तारों की बाड़ तक पहुँचा तो उस खेमे में भी शिद्दत से शोले भड़क उठे।

कैम्प में हाहाकार मचा हुआ था और मैं खामोशी से मन ही मन ली का शुक्रिया अदा करके कैम्प से बाहर का रास्ता नाप रहा था। तारों की बाड़ में पहले से ही एक जगह रास्ता बना हुआ था। किसी का भी ध्यान मुझ पर नहीं गया। जाता भी तो मैं उसे ठिकाने लगाने के लिए इकलौते हाथ में रिवाल्वर थामे तैयार था। लेकिन बाहर निकलने के बाद मुझे यह मालूम ही न था कि मुझे किस मार्ग पर चलना है। बहरहाल उस वक्त तो यही चिंता थी कि सुबह होने से पहले कैम्प से जितनी दूर निकला जा सके उतना ही बेहतर है। मैं पीड़ा को सहन करता हुआ भी निरन्तर बढ़ता जा रहा था। ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों पर बढ़ता रहा।

अगले दिन भी मैं चलता रहा। मैंने ऐसे रास्ते चुने थे जहाँ से किसी चीनी चौकी से न गुजरना पड़े। एक गुफा में कुछ घंटे विश्राम भी किया जहाँ मैंने अपने बचे-खुचे बाल भी मूंड दिए। उस खंजर से जो पिट्ठू में पड़ा था। एक सप्ताह तक मैं उन पहाड़ियों में भटकता रहा। सड़क का रास्ता मैंने इसलिए नहीं अपनाया था कि कहीं फिर चीनियों के हत्थे न चढ़ जाऊँ। इस बीच मैंने एक गाँव में शरण भी ली थी। उन लोगों ने मुझे चीनी सैनिक ही समझा था। मुझे डर था कि कहीं वे मुझे चीनी समझकर बुरा व्यवहार न करें। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। अलबत्ता उन्होंने मेरा बड़ा सत्कार किया। वहाँ मुझे मालूम हुआ कि वे लोग चीनियों से बहुत खुश थे। वे बहुत गरीब लोग थे, जबकि चीनी उन्हें अच्छे-अच्छे उपहार दिया करते थे और उनके रोजगार की व्यवस्था भी कर रहे थे।

गाप सोंग वहाँ से पंद्रह मील दूर था और पंद्रह मील का यह फासला मैंने चंद घंटों में तय कर लिया। गाप सोंग एक छोटा सा शहर था। वहाँ ऊन की मंडी भी थी। हिन्दुस्तान और चीन, भूटान इत्यादि के व्यापारी वहाँ आया-जाया करते थे। परन्तु जबसे चीनी शासन हुआ था अधिकांश व्यापार चीन के हाथों में पहुँच गया था। गाप सोंग में एक चीनी छावनी भी बन रही थी। सड़कों और बाजारों में अक्सर चीनी सैनिक नजर आ जाया करते थे।

रात के अँधेरे में मैं इस शहर में दाखिल हुआ था। उस समय मेरे सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि मेरे पास स्थानीय करेंसी का एक निक्का पैसा भी नहीं था। इसलिए मैंने इधर-उधर भटकने की बजाय सीधे उस सराय का रास्ता नापा जिसका हवाला उस शहीद ने दिया था। गाप सोंग की वह सराय काफी मशहूर थी। ठहरने की उत्तम व्यवस्था थी। सराय के मालिक का नाम संगराब था। रात के दस बजने वाले थे और शहर में सन्नाटा छा चुका था, लेकिन सराय का मालिक जाग रहा था। उसने मुझे चीनी सैनिक समझकर एक हिकारत भरी दृष्टि मुझ पर डाली। इससे मैंने सहज अनुमान लगा लिया कि वह चीन विरोधी खेमे का आदमी है। लम्बा-चौड़ा शरीर था। वह किसी देव की तरह नजर आता था।

“मुझे रंग लंग से मिलना है।” मैंने उससे तिब्बती भाषा में बात की।

उसने चौंककर मेरी सूरत गौर से देखी फिर लापरवाही से बोला–“यहाँ कोई रंग लंग नहीं रहता।”

“शायद एक-दो रोज में आ जायेगा।” मैंने भी लापरवाही जाहिर की। “तब तक मैं सराय में ठहर जाता हूँ। क्या हर्ज है ? रंग लंग मेरा पुराना दोस्त है। मैं छुट्टियाँ काटकर आ रहा हूँ। सोचा ड्यूटी ज्वाइन करने से पहले रंग लंग को मिलता चलूँ।”

“लेकिन मैं किसी रंग लंग को नहीं जानता।” वह मेरे प्रति संदिग्ध नजर आता था और उसका चेहरा इस बात की चुगली खा रहा था कि रंग लंग को जानते हुए भी वह अनभिज्ञता प्रकट कर रहा है।

“कोई बात नहीं। तुम नहीं जानते तो अब की बार मैं तुम्हारा उससे परिचय करा दूँगा। बड़ा अच्छा आदमी है। पूरे तिब्बत में इतना जानकार गाइड दूसरा कोई नहीं। मेरे लिए ठहरने का प्रबन्ध तो कर ही सकते हो न ?”

“क्यों नहीं, यह सराय है, हम मुसाफिरों को ठहराने का ही कारोबार करते हैं।”

मुझे शंका थी कि कहीं वह पैसे न माँगने लगे, परन्तु मैंने उसकी युक्ति भी सोच रखी थी। चीनियों पर भरोसा न करने की उनकी हिम्मत ही नहीं हो सकती थी। गनीमत हुई कि उसने मुझसे पैसे नहीं माँगे। मेरा नाम पता रजिस्टर में दर्ज किया, जो कतई फर्जी था। मुझे उसने एक कमरा दे दिया और मैं सराय में ठहर गया। अब मेरा सबसे पहला काम था कि रंग लंग का पता निकालूँ। सम्भव था रंग लंग भी सराय में फर्जी नाम से ठहरा हो। संगराब उसे जानता तो जरूर था। यह अलग बात थी कि रंग लंग अभी तक वहाँ आया ही न हो। अगर रंग लंग उस वक्त वहाँ ठहरा हुआ था तो संगराब उसे अवश्य ही बताता कि एक चीनी उसे पूछ रहा है। बहुत सम्भव है कि रंग लंग खुद ही मुझसे सम्पर्क स्थापित कर लेता; या ये भी हो सकता था कि वह मेरे प्रति सावधान हो जाता। अब मेरे लिए यह आवश्यक था कि संगराब को अपने विश्वास में लूँ। मैंने यह काम अगले रोज पर छोड़ दिया। मुझे यकीन था कि संगराब को आसानी से विश्वास में ले लूँगा। अभी वह मुझे चीनी समझ रहा था, जब वह मुझे हिन्दुस्तानी समझेगा तो स्वयं सीधा होकर मेरी मदद करेगा।

एक खतरा यह भी था कि कहीं चीनी सैनिक मुझे तलाश न कर रहे हों। परन्तु अभी तक ऐसे आसार नजर नहीं आये थे। यह बात अवश्य हैरत की थी। मान लिया डॉक्टर ली ने एक चीनी सैनिक को मेरी जगह छोड़कर उसे जला दिया था और उसकी लाश को इस कदर बिगाड़ दिया था कि शिनाख्त ही न हो सके, तो भी इसका प्रबन्ध वह क्या करता कि यदि उसका पोस्टमॉर्टम होता तो भेद खुल जाता। उसका एक हाथ हरचंद टूटा न रहा होगा और उसकी मौत आग में झुलसने से भी न हुई होती; बल्कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट इसे क़त्ल की वारदात बताती। वहाँ एक सैनिक भी कम मिलता। कुंग इन बातों से आसानी से नतीजा निकाल लेता कि वहाँ क्या घटा होगा।

परन्तु इतनी बात तो अवश्य थी कि सारे काम में थोड़ा बहुत विलम्ब हो जाता। यह भी हो सकता था कि उसे भी अन्य लाशों की तरह दफना देते। बहरहाल अभी भी मैं सुरक्षित था। मेरा दोस्त ली भी इन बातों को समझ सकता था। डॉक्टर तो वही था। वही पोस्टमॉर्टम भी करता और वही मृत्यु का कारण बता सकता था। ली ने सोच समझकर सारी प्लानिंग बनायी होगी। अन्यथा अब तक वे लोग चारों तरफ मुझे तलाश कर रहे होते।

अगले दिन मैं गाप सोंग घूमने निकल गया और मैंने एक तिब्बती को रिवाल्वर बेचकर कुछ पैसा प्राप्त कर लिया। अब मैं गाप सोंग में कुछ दिन तो ऐश से बिता ही सकता था। मैंने कुछ जरूरत की चीजें भी खरीद लीं। अपने लिए दूसरे कपड़े भी खरीदे। चीनी वर्दी मुझे किसी भी समय उतारनी पड़ सकती थी।

उसी शाम जब छुटपुट अँधेरा छा रहा था और मैं गाप सोंग के एक बाजार से निकल रहा था तो मुझे यूँ लगा जैसे मेरा पीछा हो रहा है। जल्दी ही मैंने उन्हें देख भी लिया। दो स्थानीय आदमी मेरी निगरानी कर रहे थे। मैंने जानबूझकर आबादी की बजाय सन्नाटे का रास्ता पकड़ा। मैं जानना चाहता कि क्यों वह मेरा पीछा कर रहे हैं और किसके इशारे पर यह काम हो रहा है ? क्या संगराब के आदमी हैं ? परन्तु संगराब की इतनी हिम्मत नहीं हो सकती थी।

संगराब को मैंने रात के खाने पर निमन्त्रण दिया था। जैसे ही मैं सुनसान रास्ते पर पहुँचा, पीछा करने वाले तेजी से लपकते हुए मेरे पास आ गये और आव देखा न ताव मुझ पर हमलावर हो गये। उनका इरादा मुझे हरगिज जान से मार देने का नहीं था। वह बस मुझे बेबस कर देना चाहते थे। वह दो ही थे। मैं चाहता तो आसानी से अपना पिंड छुड़ा सकता था। दो आदमियों से मुकाबला करना मेरे लिए मुश्किल काम नहीं था। वह भी ऐसे आदमी जो शस्त्रों का प्रयोग न करके हाथ-पैरों से काम ले रहे हों।

लेकिन मैंने जानबूझकर बेहोशी का नाटक किया। उनमें से एक ने फुर्ती से मुझे लाद लिया और फिर वे एक दिशा में बढ़ते चले गये। पास ही एक दरख्त के अँधेरे साये में वे रुक गये। एक आदमी मेरे पास ही रुक गया और दूसरा भाग निकला। करीब पंद्रह मिनट बाद सड़क पर एक घोड़ा-गाड़ी रुकी। पहले वाला फिर मुझे लाद कर सड़क पर लाया। मुझे घोड़ा-गाड़ी में डाला और खुद भी उचककर उसमें बैठ गया। घोड़ा-गाड़ी में कोचवान के अलावा उसका दूसरा साथी भी मौजूद था। वे शहर से बाहर मुझे ले गये। वहाँ वीराने में एक कॉटेज बनी थी। मुझे कॉटेज में पहुँचा दिया गया। मुझे एक कुर्सी से बाँधने के बाद मुझ पर पानी का छिड़काव किया गया।

मैंने कराह कर आँखें खोल दीं और होश में आ गया। सामने एक ऐसा व्यक्ति खड़ा था जिसने अपने चेहरे को ढाँप रखा था। सिर पर ऊनी टोपी थी जो बन्दर टोपी की तरह उसके चेहरे को छिपाए थी। आँखें, नाक, मुँह और ललाट का थोड़ा सा हिस्सा नजर आता था।

“कौन हो तुम लोग और मुझे क्यों कैद किया तुमने ?” मैंने पूछा।

“यही सवाल पूछने के लिए पकड़ा है तुम्हें।” वह व्यक्ति बोला। “यह कि तुम कौन हो और रंग लंग से तुम्हारा क्या सम्बंध है ?”

“मैं एक सैनिक हूँ। रंग लंग मेरा एक दोस्त है...पुराना दोस्त।”

“यह झूठ है। रंग लंग किसी चीनी सैनिक का दोस्त नहीं हो सकता।”

“तुम क्या जानो ? यह बात तो रंग लंग खुद जान सकता है।”

“बकवास मत करो। रंग लंग तुम्हारे सामने खड़ा है।” वह गुर्राया।

अब हकीकत सामने थी। मेरा भी यही अनुमान था कि या तो वे लोग संगराब के आदमी होंगे या रंग लंग के।

“तो तुम रंग लंग हो! और मैं गुलाब हूँ।”

वह एकदम चौंक पड़ा।

“मेहुआ...” उसके मुँह से निकला।

“हाँ...गुलाब।”

“कमाल है! तुम चीनी सैनिक किस तरह ?”

“मैं चीनी सैनिक नहीं हूँ। यह वर्दी तो मैंने एक चीनी सैनिक को मारकर हासिल की थी। मैं शुद्ध हिन्दुस्तानी हूँ। क्या तुम्हें मेरी शक्ल चीनियों की सी लगती है ?”

“मैंने तुम्हें पहली बार यहाँ देखा है। संगराब गधा है, उसे इतना भी मालूम नहीं कि कोई चीनी रंग लंग का दोस्त नहीं।” रंग लंग ने ठहाका लगाया। “यह भी खूब रही। गनीमत समझो कि मैंने क़त्ल का फैसला नहीं किया था वरना संगराब का बस चलता तो तुम्हें चलता कर देता।”

“अब मुझे खोलोगे या यूँ ही बाँधे रखोगे ?”

“ओह! मुझे खेद है।” उसने मेरे बंधन खोल दिए फिर बोला। “लेकिन तुम्हारे बाकी चार साथी अब तक क्यों नहीं आये ?”

“सारी बातें इत्मीनान से होंगी। क्या यह कॉटेज ऐसी बातें करने के लिए सुरक्षित है ?”

“बेशक, कोई पक्षी भी यहाँ मेरी आज्ञा के बिना पर नहीं मार सकता।”

“तब ठीक है। हम आराम से बातें करेंगे और खाना-पीना भी साथ-साथ होगा।”

रंग लंग ने अपने आदमियों को कुछ आदेश दिए और फिर हम दूसरे कमरे में आ गये।

❑❑❑
 
मैंने रंग लंग को यह नहीं बताया कि मेरा वास्तविक परिचय क्या है। हाँ उससे यह अवश्य बता दिया कि पाँच आदमियों में से तीन मारे जा चुके हैं। रंग लंग पहले ही मुझे बता चुका था कि पाँचों में पहला आदमी मैं था। अतः अपनी असलियत छिपाना मेरे लिए कोई मुश्किल काम नहीं था।

रंग लंग एक सप्ताह से गाप सोंग में था और हमारा इन्तजार कर रहा था। मैंने यह भी बताया कि चीनियों को इस मिशन के बारे में कुछ संदेह हो गया है और तीन आदमी उनकी यातना सहते-सहते मरे हैं। मैं किसी तरह फरार होने में कामयाब हो गया। आखिरी आदमी भी कहीं भटक गया है।

रंग लंग चिंतित नजर आने लगा। वह एक चौबीस-पचीस साल का जवान लड़का था। इस उम्र में भी इतना अनुभवी था, यह हैरत की बात थी।

“रंग लंग, अब विलम्ब करने से कोई लाभ न होगा। हमें तुरन्त चल देना चाहिए। तुम इसकी फिक्र मत करो। मैं अकेला ही काफी हूँ। इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि मैं चीनियों की कैद से भागकर यहाँ तक पहुँचा हूँ। हाँ, हमें ऐसे रास्तों से चलना होगा कि मार्ग में चीनी न दिखायी दें। इसकी व्यवस्था तुम करोगे।”

“ठीक है! हम कल ही यहाँ से रवाना हो जायेंगे। अगर उन्हें जरा भी भनक लग गयी तो वे गाप सोंग का एक-एक घर छान डालेंगे। रास्ते की फिक्र करनी होगी। लेकिन मैं बहुत से रास्ते जानता हूँ।”

“हमारे साथ कितने आदमी होंगे ?”

“हम सिर्फ दो ही होंगे।”

“यहाँ तुम्हारे कितने साथी हैं ?”

“यहाँ मेरा एक ही साथी है–संगराब, और ये सब उसके आदमी हैं।”

“और हमारी यात्रा कितने दिन की होगी ?”

“अधिक से अधिक एक सप्ताह। लेकिन खानकाह के कपाट खुलने से पहले वहाँ पहुँच जाना चाहिए। हम याम दरंग में ही ठहरेंगे जो एक छोटी सी भिक्षुओं की बस्ती है। वहाँ से हम खानकाह में प्रविष्ट होंगे।”

“क्या खानकाह में हर कोई नहीं जा सकता ?”

“नहीं, देवी माता के दर्शन करने वाले खानकाह के मैदान तक जा सकते हैं। उससे आगे कोई नहीं जा सकता। लेकिन आपके लिए रुकावट नहीं होगी क्योंकि उन्हें पहले से ही आपकी प्रतीक्षा होगी। वे पाँच आदमियों की प्रतीक्षा कर रहे होंगे और उन पाँचों की पहचान मैं उन्हें कराता।”

हमारी वार्ता लगभग समाप्त हो चुकी थी। रंग लंग ने सफर की तैयारियाँ शुरू कर दीं। मैं कॉटेज में ही ठहरा रहा।

❑❑❑

गाप सोंग से मैंने विदा ली और रंग लंग के साथ याम दरंग की यात्रा पर निकल गया। पहाड़ों और घने जंगलों का रास्ता...हम छिपते-छिपाते आगे बढ़ रहे थे। हम एक ऊँची पहाड़ी पर पहुँच गये। नीचे एक दरिया बह रहा था।

“नदी को पार करने के लिए दो रास्ते हैं।” रंग लंग ने कहा।“यहाँ से कुछ दूर एक झूला पुल है। लेकिन हम उस तरफ जायेंगे तो चीनियों के हाथ पड़ने का खतरा है। क्योंकि वहाँ पुल पर चीनियों की चौकी होगी। दूसरी तरफ रस्सों का एक पुल है। सिर्फ दो रस्से हैं। एक रस्सा नीचे और दूसरा ऊपर। नीचे वाले रस्से पर पाँव जमाकर ऊपर वाले रस्से का सहारा लेकर धीरे-धीरे आगे की तरफ सरकना होगा। पानी का बहाव बहुत तेज है। उसमें तैरना या पाँव ठहराना मुश्किल होता है। और मुश्किल यह है कि नीचे वाला रस्सा पूरी तरह पानी में डूबा रहता है और नदी की तेज लहरें किसी के पाँव उसमें जमने नहीं देतीं। फिर हमारे पास दूसरा सामान भी है। क्या आप सामान साथ लेकर पुल पार कर सकेंगे ?”

मैंने उसे पहले ही बता दिया था कि मेरा एक हाथ बेकार हो चुका है। इसलिए वह इस दो रस्सों के पुल के बारे में मेरे प्रति चिंतित था। मुझे भी यह निश्चित भरोसा नहीं था कि मैं उसे पार कर सकूँगा। पर चारा भी क्या था ?

मैंने हामी भर दी।फिर हमने ढलान का रास्ता तय करके नदी का तट छू लिया और आगे बढ़ने लगे। करीब एक घंटे बाद वह दो रस्सों वाला पुल नजर आ गया। हमारे पास सामान के नाम पर दो किट बैग थे जो हमारी पीठों पर कसे रहते थे। रंग लंग के पास अधिक बोझ था। इन दो किटों में सफर की जरूरतों का हर सामान था।

मैंने उस पुल को देखा। नदी का पाट खासा चौड़ा और बिफरा हुआ था।तट पर रुककर रंग लंग ने मुझसे कहा–“पहले मैं जाऊँगा। आप मुझे गौर से देखते रहें।”

उसने किट बैग को पीठ पर अच्छी तरह कस लिया और फिर जूते उतारकर बैग में ठूँस लिए। निचले रस्से पर पाँव जमाये और ऊपर का रस्सा हाथों में थामकर वह धीरे-धीरे आगे सरकने लगा। कुछ ही देर बाद उसके पाँव पानी में डूब गये। और जब वह इधर से उधर झूलता हुआ दरिया के बीच में पहुँचा तो क्षण भर के लिए उसे उफनती मौजों की उड़ान ने अपने आगोश में ओझल कर दिया।

लेकिन दूसरे क्षण वह प्रकट हुआ और तेजी से आगे बढ़ता नजर आया। किनारे पर पहुँचकर उसने मुझे आवाज दी। मैंने एक गहरी साँस ली और रंग लंग की तरह रस्से पर पाँव जमाकर लहराता हुआ आगे की तरफ सरकने लगा। मेरे लिए परेशानी यह थी कि ऊपर का रस्सा एक ही हाथ से थामकर हाथ को आगे सरकाना पड़ रहा था। रस्सा कुछ तो पानी में भीगा था, कुछ उसकी खुरदुराहट ने मेरी हथेली छील डाली। मेरी हथेली से खून रिसने लगा, फिर भी मैं आगे सरकता रहा। थोड़ा सा फासला तय करने के बाद मेरी टाँगें पानी में डूब गयीं।

पानी सर्द था। मेरा पूरा शरीर काँप-काँप जाता था। पाँव ठीक से जमते न थे। लहरों का उफान कभी-कभी अपना ताकतवर हमला टांगों पर कर देता। मेरे लिए अपना बैलेंस बनाये रखना बड़ा मुश्किल हो रहा था। लहरें पूरी शिद्दत के साथ मुझ पर हमला कर रही थीं। मैंने ऊपर वाले रस्से पर अपनी पकड़ और भी मजबूत कर ली और रुककर अपनी साँस दुरुस्त करने लगा।

जबकि मैं बीच में पहुँचा तो पानी मेरे सीने तक पहुँच गया और अपनी आँखें खुली रखना मुश्किल हो गया। एक बार मर्जी में आया कि वापस हो लूँ, परन्तु वापसी तो और भी मुश्किल थी। रस्से से पाँव हटाये नहीं कि फिर रस्से पर पाँव जमाना मुश्किल हो जाता। परन्तु वापस लौटने की नौबत नहीं आयी। मैं धीरे-धीरे लहरों के झोल से निकल गया और फिर दूसरे किनारे पहुँच गया।

कुछ देर आराम करने के बाद हम पुनः आगे की ओर रवाना हो गये। वादी अधिक बड़ी नहीं थी। एक घंटे में हम दूसरी तरफ पहुँच गये। मैं थका हुआ था। परन्तु रंग लंग के कथनानुसार अभी हम आराम नहीं कर सकते थे क्योंकि यह क्षेत्र चीनियों की गश्ती टोलियों से अधिक दूर नहीं था। किसी भी वक्त कोई गश्ती दल उस तरफ से गुजर सकता था और हम दृष्टि में आ सकते थे।

हम रात आठ बजे तक सफर करते रहे। फिर हमने एक झरने के किनारे पड़ाव डाल दिया। रंग लंग खाना पकाने में भी माहिर था और बड़ा स्वादिष्ट खाना बनाता था।उसने अलाव धधका दिया। फिर खाना बनाने लगा। मैं अलाव की आँच से जिस्म में गर्मी पहुँचाता रहा।

दूर-दूर तक वीराना था और हमारे सिवा वहाँ कोई नहीं था। परिंदे भी अपने रैन बसेरों में सो गये थे। पहाड़ों में आठ बजे ही काफी रात हो जाती है।

“कल हम नेचीटांगला पार करेंगे। फिर जिलांग सो की ओर हमारा सफर होगा।”
 
“नेचीटांगला तो बहुत बड़ा पठार है!” मैंने कहा।

“हाँ, और यही पठार याम दरंग के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बनकर खड़ा होता है। बस इस पठार में पहुँचने के बाद तो चीनियों का कोई खतरा ही नहीं। इस पठार को पार करने में ही हमें छः दिन लग सकते हैं, क्योंकि हम जरा दूसरे रास्ते से जायेंगे।”

खाना खाने के बाद हम कुछ देर बातें करते रहे और सो गये। रंग लंग ने विश्राम की जगह के चारों तरफ लकड़ियों के अलाव दहका दिए थे जिसकी वज़ह से कोई जानवर हम पर हमला न कर सकता था।

नींद बड़ी खुलकर आयी। सुबह पाँच बजे हमने नाश्ता किया और एक बार फिर टेढ़े-मेढ़े पेचदार रास्तों पर सफर शुरू कर दिया। उस समय हम समुद्र की सतह से लगभग दस हज़ार फिट की ऊँचाई पर थे। दो दिन के सफर के बाद रास्ता और भी दुश्वार हो गया। रास्ते में एक गाँव से हमें सामान ढोने के लिए एक खच्चर जुटाना पड़ा क्योंकि आगे का रास्ता बहुत ही मुश्किल था और सामान ढोने के कारण बड़ी जल्दी थकावट सवार हो जाती थी। हमने एक खेमा भी गाँव से खरीद लिया था। यह प्रबन्ध खुद रंग लंग ने किया था। वह मुझे एक जगह छोड़कर गाँव की तरफ गया था और कुछ ही देर बाद खच्चर सहित लौटा था।

नेचीटांगला का पठारी रास्ता बहुत ही कष्टदायक साबित होता जा रहा था। खच्चर के पाँव भी जगह-जगह रपट जाते थे। हम लगातार पठारों की बुलंदियों पर चढ़ते जा रहे थे। यहाँ तक कि नेचीटांगला के बर्फपोश चोटियों तक जा पहुँचे।

हम तकरीबन पंद्रह हज़ार फिट की बुलन्दी पर थे। नेचीटांगला की चोटियों पर एक तो ऑक्सीजन की कमी थी; दूसरा रास्ता बड़ा खतरनाक और पथरीली चट्टानों से भरा पड़ा था। गहरी-गहरी खाईयाँ थीं कि देखते ही आँखें चकराने लगती थीं। बदन का एक-एक जोड़ दर्द कर रहा था और खच्चर जगह-जगह अड़ियल टट्टू बन जाता। सर्दी इतनी तेज़ थी कि पूरा का पूरा बदन सुन्न हो जाता था। कभी बादल सिर पर मँडराने लगते और फुहार छोड़कर चले जाते।

एक रोज दोपहर को मैं निढाल होकर जमीन पर गिर पड़ा।

“क्या बात है राज साहब ?” रंग लंग दौड़ता हुआ मेरे पास आया।

“मेरे दिल के पास दर्द हो रहा है।” मैंने कहा। “और यहाँ तो आदमजात का दूर-दूर तक कहीं पता नहीं।”

“घबराइए नहीं, इसकी वजह यह है कि हम काफी ऊँचाई पर आ गये हैं।” रंग लंग ने मुझे सहारा देकर खड़ा करते हुए कहा। “चिंता की कोई बात नहीं। आगे कुछ फासले पर एक दर्रा है। वहाँ से नीचे उतरकर हम दो हजार फिट नीचे चले जायेंगे।”

“न जाने तेनजिंग ने एवेरेस्ट कैसे चढ़ी होगी!” मैंने कहा।

“वह कोई फरिश्ता न था। हमारे जैसा ही आदमी था।”

हिम्मत मारकर मैं फिर चल पड़ा।
 
अब बर्फबारी भी शुरू हो चुकी थी और मेरी हालत पहले से भी अधिक बिगड़ती जा रही थी। मुझे उस नौजवान लड़के पर हैरत होती जो अब तक तनिक भी नहीं घबराया था। या वह इन जगहों का आदी था और पहले भी यहाँ आता रहा था। लेकिन मेरे लिए यह रास्ता बड़ा कष्टदायक साबित हो रहा था।

यहाँ भला कौन आता ? चीनी सैनिक याम दरंग पहुँचने में सफल न हुए होंगे। एक-एक से खौफनाक दर्रे और खाईयाँ थीं। हर कदम पर मौत मुँह बाए खड़ी थी। मेरा सिर चकरा रहा था और मुझे यूँ महसूस हो रहा था कि किसी भी क्षण मैं किसी खाई में जा पड़ूँगा और फिर मेरी हड्डियों का भी पता न चलेगा।

हम बर्फबारी में तीन घंटे तेज निरन्तर चलते रहे लेकिन जिस दर्रे का रंग लंग ने जिक्र किया था वह कहीं भी नजर नहीं आया। अब रंग लंग भी चिंतित नजर आ रहा था। क्या दर्रा बर्फबारी के कारण बन्द हो गया था ? जब बर्फ से पहाड़ ढँक जाते हैं तो स्थानों की पहचान बड़ी मुश्किल हो जाती है। आगे रास्ता समाप्त हो गया था और सपाट पहाड़ सिर उठाए खड़े हुए थे। अतः हमें वापस मुड़ना पड़ा। रंग लंग कुछ रास्ता भटका हुआ मालूम पड़ता था, परन्तु वह बड़ा जीवट वाला और साहसी युवक मालूम होता था। आखिरकार पहाड़ में एक उचित जगह तलाश करके हमने खेमा गाड़ दिया।

मेरी तो भूख उड़ चुकी थी। अतः रंग लंग को अकेले खाना खाना पड़ा। फिर हम ऐसे सोये कि हमें दुनियाँ जहान की खबर न रही। अगले दो रोज रास्ता तलाश करने में बीत गये। मालूम ही नहीं पड़ता था कि हम कहाँ भटक गये हैं। जिस रास्ते पर जाते, वही आगे चलकर बन्द मिलता। मेरी हालत और भी खस्ता होती जा रही थी। दिल में दर्द उठता था, सिर चकराता था और कभी-कभार खाँसी का जबरदस्त दौरा पड़ता था। लगता था दिल, गुर्दे और फेफड़े खाली होते जा रहे हैं। कितनी वीरानियाँ थीं और कहीं कोई अंत न था। यह कैसा प्रायश्चित था! मैं गुमनाम जगह में मर रहा था। मेरी यह हालत देखकर रंग लंग ने आगे की यात्रा रोक दी और मेरी तीमारदारी में लग गया। मुझे अपने पर तरस भी आता था और हँसी भी। चला था इतना बड़ा बीड़ा उठाने और हालत यह थी कि रंग लंग बेचारे को मेरी ही तीमारदारी करनी पड़ रही थी। कभी-कभी मैं हिस्टीरिया के रोगी की तरह अंट-शंट बका करता और रंग लंग कहा करता कि उस वक्त मैं बड़े ज्ञान की बातें करता हूँ जैसे कोई पहुँचा हुआ साधू करता है।

रंग लंग हँसमुख युवक था। उसकी बातों से मन बहला करता था। उसकी अपनी जिंदगी में कोई नहीं था। ल्हासा में उसका पूरा परिवार चीनियों के हाथों हलाक हो गया था और अब उसकी दुनियाँ भी अकेली थी। वह एक भिक्षुक के साथ इधर से उधर भटकता रहा था और फिर याम दरंग जा पहुँचा जहाँ उसने दो साल बिताये थे।

दो-तीन रोज में मेरी तबियत में कुछ सुधार हुआ। रंग लंग ने कुछ काढ़े बना-बनाकर मुझे पिलाये थे। वह जड़ी-बूटियों के बारे में भी थोड़ी-बहुत जानकारी रखता था। उसकी तीमारदारी ने मुझे किसी हद तक भला-चंगा कर दिया था। एक बार फिर हम अपने सफर पर रवाना हो गये। रंग लंग केवल अपने अनुमान के अनुसार चल रहा था। उसके पास कोई नक्शा नहीं था। शायद याम दरंग तक जाने का नक्शा किसी के पास ही न रहा होगा। जो लोग वहाँ जा सकते थे, वे सिर्फ दिमागी नक्शे की बिना पर जा सकते थे। इस भटकाव का नतीजा यह निकला कि अगले दस रोज तक इसी तरफ पहाड़ों में चकराते रहने के बाद हम आखिर उसी गाँव में घूम-फिर कर जा पहुँचे जहाँ से हमने खच्चर और दूसरा सामान हासिल किया था। जहाँ से हमने नेचीटांगला के लिए सफर शुरू किया था। इस बार रंग लंग ने पूर्वी रास्ते का चुनाव किया। पहले वह किसी खतरे की वजह से उधर का रास्ता नहीं अख्तियार करना चाहता था। वहाँ जंगली जानवरों से लेकर लुटेरों तक का खतरा रहता था। चीनी सैनिकों की एकाध चौकी भी मिल सकती थी। परन्तु अब यह खतरा उठाना जरूरी था।

चार रोज तक हम इस नए रास्ते पर चलते रहे। यह रास्ता पहले वाले से भी बीहड़ था, परन्तु खतरे जैसी कोई बात हमारे साथ पेश नहीं आयी। इस रास्ते पर चलते हुए हम उन्नीस-बीस हजार फीट बर्फीली पहाड़ियों तक जा पहुँचे। और फिर हमने दूर वह पठार भी देखा जहाँ पहले हम भटक गये थे। इस बुलन्द चोटी पर पहुँचने के बाद कुछ काम रंग लंग को यूँ मिला कि वह दूर-दराज़ की पहाड़ियों तक दृष्टि दौड़ा सकता था। अब निरन्तर सफर करते रहने के कारण पहाड़ी रास्ते मेरे लिए इतने कष्टप्रद साबित नहीं हो रहे थे। मेरी तबियत सम्भल चुकी थी। बुलन्द चोटी पर आफताब की चमक के साथ रंग लंग का मायूस चेहरा भी चमक उठा। कदाचित उसे रास्ता मिल गया था।
 
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