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Horror अगिया बेताल

“गेट के दायीं तरफ एक नीम का पेड़ है उससे पांच कदम दूर गुलाब की झाड़ी के पास सफ़ेद पत्थर है... एक हंडिया उसके नीचे है... दूसरी पश्चिम में नौकरों के क्वार्टरों के पीछे ठीक दीवार को छूती हुई।”

“ठीक-ठीक निशान बताते चलो... और झूठ निकला तो अन्जाम जानते ही हो...।”

वह बताता रहा और मैं गौर से नोट करता रहा। थोड़ी देर बाद मैं उसके कोचवान को घसीट कर वहां लाया। कोचवान को होश में लाया गया और उसे भी बेताल का करिश्मा दिखाया। वह कमजोर दिल का आदमी कांपती टांगों का सहारा भी ना ले सका और धड़ाम से अपने मालिक के पास आ गिरा।

“जमूरे.... अपने कपडे पहन।” मैंने कोचवान को कपड़े सौंपे – “आज बेताल तेरी गाड़ी में सफ़र करेगा...।”

“न...नहीं... वह हकलाया – “मेरे बाल बच्चों पर तरस खाओ...।”

“शमशेर इसे कह कि मेरे हुक्म का पालन करे... वरना तुम दोनों की खैर नहीं। मेरे पास वक़्त कम है।”

कोचवान मेरे पैरों में लंबा लेट गया। मैंने उसका गिरेबान पकड़ कर उठाया और उसे खींचता हुआ फिटिन तक ले गया। उसके बाद मैंने शमशेर के कपडे पहने बन्दूक उठाई और फिटिन में बैठ गया।

“चल जमूरे... चाल दिखा... अगर तूने कहीं भी देर की तो तेरा मालिक परलोक सिधार जाएगा... याद रख अगिया बेताल तेरे पीछे बैठा है... अपने बाल बच्चों की खैर मनाता चल।”

वह बुरी तरह काँप रहा था, वह बोल नहीं पा रहा था – बस दांत बज रहे थे। मेरे शब्द सुनते ही उसने मेरी आज्ञा का पालन किया और फिटिन (घोडा गाड़ी ) अपने पथ पर आगे बढ़ गई।

अब मैं गढ़ी की तरफ जा रहा था।

मैंने शमशेर से काफी कुछ जानकारी प्राप्त कर ली थी। फाटक पर दो चौकीदार होंगे... बंदूकधारी.... पर वे फिटिन को नहीं रोकेंगे – क्योंकि वे जानते है की फिटिन में कौन होगा।

गेट पार करने में कोई कठिनाई नहीं थी। उन दो के अलावा गढ़ी की चौकीदारी रात के समय में कोई नहीं करता था, सिर्फ एक आदमी ऊपरी बुर्ज पर पहरा देता था।

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रात अँधेरी थी।

मैं जानता था बेताल वहां मेरी मदद नहीं कर सकता, ऐसा उसने पहले ही प्रकट कर दिया था और शमशेर को अधिक देर तक कैद नहीं रखा जा सकता अन्यथा गढ़ी के लोग सचेत हो जाते और फिर ख़तरा बढ़ जाता। सुबह होने से पहले सब कुछ निपटा देना आवश्यक था, फिटिन में मैंने एक कुदाल रख ली थी, तांत्रिक के उस टोटके को निकालना साधारण इंसान के वश का रोग नहीं था। उसे कोई ऐसा व्यक्ति ही निकाल सकता था, जो तंत्र विद्या जानता हो, या कोई सिद्धि प्राप्त हो। इसलिये इस काम पर मुझे स्वयं जाना पड़ा।

आधे घंटे के भीतर-भीतर गढ़ी का फाटक आ गया। मैंने बन्दूक को मजबूती के साथ पकड़ लिया, बेताल की शक्ति यहीं तक मेरे साथ थी और अब मैं अकेला था। किसी प्रकार का भी खतरा मेरे सर पर टूट सकता था।

फाटक पर फिटिन रुक गई।

कोचवान ने फाटक का घंटा बजाया , एक छोटी-सी खिड़की खुली, जिसमें से किसी ने बाहर झांका साथ ही टॉर्च का प्रकाश कोचवान के चेहरे पर पड़ा। कुछ पल बाद ही फाटक खुल गया।

फिटिन दनदनाती हुई फाटक पार कर गई, जैसा की मेरा अनुमान था, न किसी ने रोका और न किसी ने टोका। गढ़ी का विशाल प्रांगण प्रारम्भ हो गया। पाम और यूकेलिप्टस के स्वेत दरख्तों से टकराती मदहोश हवा बह रही थी।

रजवाड़े की इस गढ़ी से आज भी वैसी ही शान झलकती थी। इसका ढांचा अभी बिगड़ा नहीं था, सिर्फ समय की पर्त चढ़ गई थी।

एक सायवान के नीचे फिटिन रुक गई। यहाँ पहले से ही एक ओर बड़ी शानदार फिटिन खड़ी थी और समीप ही अस्तबल था, जहाँ से किसी घोड़े के हिनहिनाने का स्वर उत्पन्न हुआ।

गढ़ी के एक हिस्से में मुर्दा सा प्रकाश जल रहा था। दूर-दूर बल्ब टिमटिमा रहे थे। वातावरण में गहरी खमोशी छाई हुई थी। कहीं कोई आवाज उत्पन्न नहीं होती थी।

कोचवान सहमा-सहमा सा बैठा था।

मैंने सारे वातावरण पर दृष्टिपात किया और कोचवान से नीचे उतरने के लिए कहा। वह लड़खड़ाते नीचे उतर पड़ा।

“चुपचाप मुझे रास्ता बताता चल।”

वह चल पड़ा जहाँ मैं कहता रहा मेरा मार्गदर्शन करता रहा। इस बीच वह सांस लेने में भी परेशानी महसूस कर रहा था, हम ख़ामोशी के साथ सबसे पहले पश्चिम भाग में पहुंचे और उस स्थान पर पहुँचने में अधिक समय नहीं लगा जहां भैरव तांत्रिक ने जादू की हंडियां गाड़ रखी थी। मैंने कुदाल चलाई। वह चुपचाप सहमा-सहमा सा खड़ा रहा, मैं इस बात की पूरी सावधानी बरत रहा था कि मेरे इस कार्य में किसी प्रकार की आवाज न हो। आखिर हंडियां नजर आ गई। मैंने हाथ से उसे बाहर निकालना चाहा, तभी एक सर्प मेरे हाथ पर लिपट गया – मैं एकदम हाथ खींचकर पीछे हटा... अगले ही क्षण मैंने बिना डरे सर्प का फन दबोच लिया और उसे खींचकर एक ओर फेंक दिया। उसके बाद हंडिया बाहर निकाल ली। उसे लेकर मैं कोचवान के साथ दक्षिण हिस्से में पहुंचा.... उसके बाद यहाँ मेरा स्वागत एक काले खौफनाक बिच्छू ने किया।

लेकिन बेताल ने मुझे इस प्रकार की संभावना से पहले ही अवगत करवा दिया था। डर नाम की कोई वस्तु तो अब मुझमें रही ही नहीं थी।

मैंने दोनों हांडियों को फिटिन में पँहुचाया उसके बाद शेष दो उखाड़ कर ले आया। इस बीच कोई ख़तरा पेश नहीं आया, उसका कारण यह भी था कि ये सब मुख्य इमारत से काफी दूर गड़ी थी और मैंने ऊपर से लेवल उसी प्रकार बराबर कर दिया था, ताकि खुदाई का पता न लगे।

अब मैं इन बाईस जिन्नों को उठाकर ले जा रहा था। वे मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ पा रहे थे – उसके तीर तरकस खाली हो गये थे। हालांकि उन्होंने मुझे भयभीत करने का पूरा प्रयास किया था।

उन दिनों मैं तंत्र विद्या भी सीख रहा था।

मैं उसी फिटिन में लौटा। कोचवान उस वक्त भी मेरे साथ था। मैं उसी स्थान पर लौटा जहां शमशेर अब तक बंधा पड़ा था। मैंने एक बार फिर कोचवान को घसीटा और शमशेर के पास छोड़ दिया।

“बेताल।”

“हाँ मेरे आका।”

“इन्हें तो सब कुछ मालूम हो गया है। इनका क़त्ल कर दिया जाये।”

“मैं यह काम अपने हाथों नहीं कर सकता।”

“कोई बात नहीं – मैं कर दूंगा। लेकिन एक बात सोचता हूं इनके मरने से गढ़ी का ठाकुर सचेत हो सकता है फिर भी अब कोई तरीका नजर नहीं आता।”

मेरी यह बातें सिर्फ संकेतों से हो रही थी।

“अब तो मुझे छोड़ दो।” शमशेर ने कहा।

“छोड़ दूंगा...पहले मेरे सवाल का जवाब दे।”

“पूछो... क्या पूछना है ?”

“मेरे बाप को क्यों मारा गया। और वह किस प्रकार मारा ?”

“इसकी जिम्मेदारी भैरव तांत्रिक पर है। उसी ने यह काम किया था... मैं नहीं जानता कि उसने कैसा जादू चलाया। पहले साधुनाथ पागल हो गया फिर तांत्रिक ने मूठ चला दी।”

“लेकिन गढ़ी के ठाकुर ने ऐसा क्यों किया ?”

“मुझे कुछ विशेष नहीं मालूम।”

“जितना जानते हो वह बताओ।”

“उनकी बातों से ऐसा पता लगता है कि पुराने जमाने में गढ़ी के लोग बड़े शक्तिशाली लुटेरे थे... इनकी अपनी पूरी फ़ौज होती थी और ये लोग नादिरशाह की तरह किसी भी राज्य के शहर पर धावा बोल देते थे और लूटपाट कर काले पहाड़ के खौफनाक जंगल में गायब हो जाते थे... फिर इन्होने गढ़ी का निर्माण किया... यहाँ चारों तरफ पहले बियाबान जंगल रहा होगा ऐसा मेरा अनुमान है। जब ये लोग काफी संपन्न हो गये तो इन्होने अपना राज्य बना लिया... तब से ये राजाओं के नाम से प्रसिद्द हुए... बाहर के राजाओं ने बार-बार इन पर हमले किये पर इन्हें परास्त ना कर सके... फिर एक बार एक मुग़ल लुटेरे ने यहाँ कत्लेआम किया और गढ़ी पर कब्जा कर लिया... किन्तु कुछ रोज बाद वह चला गया... तब गढ़ी के वंशज कहीं जंगलों में जा छिपे... वे फिर से लौट आये। ऐसा लगता है उन्होंने कहीं धन छिपाया था, जिसकी तलाश में यह दुश्मनी ठानी थी।
 
ठाकुर का एक दोस्त था लखनपाल सिंह...बड़ा चतुर और धूर्त आदमी था... अब न जाने कहाँ है। दो बार मेरे हाथों मरते-मरते बचा, मैं नहीं जानता कि वह ठाकुर की कौन सी अमूल्य वस्तु चुरा कर भागा था जो ठाकुर पागलपन की सीमा लांघ गये। उन्होंने अपने उस दोस्त के समूल परिवार के सदस्यों को खोज कर क़त्ल कर दिया पर लखनपाल नहीं आया।

बताते हैं की लखनपाल ने खासी रकम खर्च करके साधुनाथ की सेवा प्राप्त कर ली और साधुनाथ उसकी रक्षा करता रहा.... फिर साधुनाथ का आतंक हवेली तक पहुँच गया। उसे गढ़ी के कई सुराग मिल गये थे और उन दिनों ठाकुर इतना चिंतित हो गया कि सारी सारी रात उन्हें नींद नहीं आती थी।

साधुनाथ पर उनका कोई शस्त्र कारगर सिद्ध नहीं होता था। उन्ही दिनों भैरव तांत्रिक आया और ठाकुर ने उससे कोई गुप्त समझौता कर लिया। बस उसके बाद भैरव तांत्रिक काले पहाड़ की तरफ चला गया।

वहां से लौटा तो उसने साधुनाथ का पूरा प्रबंध कर दिया, कुछ दिन बाद ही साधुनाथ पागल हो गया। उसके बाद वह भैरव की मूठ से मारा गया। मेरे ख्याल से वह सारा चक्कर राजवाड़े के उस गुप्त धन का है जो कहीं गड़ा है। बहुत तांत्रिक गड़े खजाने का पता लगा लेते है... साधु नाथ भी यही कर रहा था। बस मुझे इतना ही मालूम है।”

“ठाकुर के घर में औरतें कितनी है ?”

“उनकी तीन बीवियां है... एक आठ साल का बच्चा है...शेष औरतें या तो नौकरानियां हैं या....।”

“क्या भैरव तांत्रिक पहले भी काले पहाड़ पर रहता था ?”

“मुझे इस बारे में नहीं मालूम। अब तो मुझे मुक्त कर दो।”

“हां – यह काम तो बाकी रह ही गया।”

मैंने बन्दूक उठाई और उसे गोली से उड़ा दिया। एक धमाके के साथ उसकी चीख वातावरण में डूब कर रह गई। यह दृश्य देखते ही कोचवान चीख मार कर भागा। वह कांपती टांगों से सहारे दौड़ रहा था। अचानक उसे ठोकर लगी और वह गिर पड़ा।

मैंने ठहाका लगाया और उसके उठने से पूर्व गोली दाग दी। वह जमीन पर छटपटाने लगा। एक गोली और चली साथ ही उसका काम तमाम हो गया। अब उस जगह दो लाशें पड़ी थी। मेरा प्रतिशोध शुरू हो गया था। अब मैं कातिल था... क़ानून की निगाह में मुजरिम... पर समय कभी लौट कर नहीं आता। मेरे भीतर का मनुष्य तो कभी का मिट चुका था, अब मैं सिर्फ दरिंदा था, जिसके दिल में दया नाम की कोई वस्तु नहीं होती।

मेरा प्रतिशोध ठाकुर के कारनामे से कहीं अधिक भयानक था, और मैं उस दिन की प्रतीक्षा में था जब ठाकुर मेरे सामने एडियां रगड़ रहा हो... उससे पहले मैं उसे इसके लिए लाचार कर देना चाहता था कि मेरे भय से वह भागता रहे और उसे चैन न मिले।

मैंने उसकी लाशें जंगल में छोड़ दी।

मैंने अगिया बेताल को याद किया।

“बेताल !”

“हाजिर हूँ आका।”

“उन बाईस राक्षसों का क्या किया जाए ?”

“मेरे ख्याल से आप उन्हें कैद कर सकते हैं। अगर वे आजाद हो गये तो आगे चलकर हमारे रास्ते में रुकावट डाल सकते हैं।”

“तो उन्हें कहाँ कैद किया जाये ?”

“जब तक वे हमारी सीमा में जाकर कैद नहीं किए जाते, मैं उनके घेरे में नहीं जा सकता। लेकिन जब वे बेताल की सीमा में पहुँच जायेंगे तो वे दोषी मान लिए जायेंगे और हमारे सिद्धांत के अनुसार उन्हें कैद कर लिया जायेगा... इसलिए उन्हें मंगोल घाटी के जंगल में ले चलिए – जहां आप रह रहें है। आप उस गाड़ी के घोड़े पर सवारी करें...मेरी सवारी उनका बोझ नहीं ढो सकती। लेकिन याद रखें,सीमा में दाखिल होते समय वे बहुत उधम मचाएंगे इसलिए उन्हें कब्जे में रखने के लिए आपको लालच में रखना होगा... आपके पास अगर आदमी या बकरे की कलेजी रहे तो वे लालच में फंसे रहेंगे और कम उधम मचायेंगे।”

“कलेजी “

“हाँ यही उपाय है, अब मैं चलता हूँ... मैं उनके समीप अधिक देर नहीं रह सकता। अगर उन्होंने मुझे देख लिया तो मुझे घेरने का प्रयास करेंगे।”

बेताल चला गया।

अब मैं सुनसान जंगल में अकेला रह गया।
 
अब मैं सुनसान जंगल में अकेला रह गया।

मेरे सामने दो मुर्दा इंसान पड़े थे, इसलिए कलेजी की समस्या हल हो गई। इसके लिए मैंने शमशेर को चुना और एक वहशी की तरह खंजर तान कर उसके पास पहुँच गया। मेरे जीवन की यह सबसे भयानक रात थी। मैं खंजर से काट कर शमशेर का कलेजा निकलने लगा। अभी उसका खून सूखा नहीं था। शीघ्र ही मेरे हाथ में मांस का एक लोथड़ा आ गया। शमशेर का कलेजा देख कर मेरे मन में एक अजीब सी लिप्सा जाग उठी लेकिन मैंने अपने आप पर संयम रखा।

उसे एक सुर्ख कपडे में लपेट कर रख लिया।

हंडियाओं को एक साथ बाँधा... घोडा गाड़ी अलग की और घोड़े पर सवार होकर अपने रास्ते पर निकल गया। मेरा सफ़र चौबीस घंटे से कम भी नहीं था...यह अलग बात थी की बेताल की सवारी आध घंटे में ही फासला तय कर लेती थी।

मंगोल घाटी का जंगल बेतालों की नगरी थी। यहाँ वे स्वतंत्र रूप से रहते थे – हालांकि मैं अभी तक उनके ठिकाने नहीं जान पाया था, पर उनके रहने के लिए घर या महलों की आवश्यकता तो होती नहीं। उनके घर तो बरगद या पीपल के वृक्ष होते थे। वे अन्य वृक्षों का प्रयोग भी कर लेते थे।

मंगोल घाटी में पीपल और बरगद के वृक्षों की तादाद बहुत अधिक थी, उस घाटी में यही सबसे विचित्र बात थी। वहां जगह-जगह छोटी बड़ी गुफाएं भी थी। जिनमें यदा कदा मैंने शोलों का नाच देखा था। इस प्रकार के शोले चांदनी रात में अधिक नजर आते थे और पूरी घाटी घाटी में नाचते फिरते थे। बेताल ने बताया की वहां बहुत से तांत्रिक सिद्धी प्राप्त करने के लिए आते रहते है, मगर ऐसा करने वालों को भारी जोखिम उठाना पड़ता है। कभी-कभी उन्हें अपने प्राणों का विसर्जन भी कर देना पड़ता है।

बैतालिक जीवन के अनेकों रहस्य मेरे सामने खुलते जा रहे थे। इसकी भी अपनी दुनिया होती है, जहाँ हर कार्य मनुष्यों की तरह होता ही। किसी मनुष्य के संपर्क में आने के बाद इनकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।

बेताल प्रेतों से सर्वथा भिन्न होते है। प्रेत का वास हर जगह हो सकता है... ये अभिशप्त आत्मायें आमतौर से भटकती रहती है, और ये मनुष्य योनि प्राप्त कर चुकी होती है जबकि बेताल के साथ यह आवश्यक नहीं कि वह मनुष्य योनि प्राप्त कर चुका हो। बेताल किसी मनुष्य का साथ पाकर ही अपनी सरहद से बाहर निकल कर हानि पहुंचा सकता है अन्यथा सरहद त्यागने के बाद उसका कोई अस्तित्व नहीं होता... बेतालों में शादी की रस्में भी होती है, जबकि प्रेतों में ऐसा कुछ नहीं होता। बेताल इसी दुनिया में वीरान ठिकाने तलाश करके वहां रहते है, और जहाँ रहते है, उस सीमा पर इनका पूरा अधिकार रहता है।

मैं मंगोल घाटी के लिए कूच कर चुका था जहाँ बेताल शहजादे के कारण मैं सुरक्षित था।

जब चौबीस घंटे की लागातार यात्रा के बाद मैं उस घाटी में प्रविष्ट होने लगा तो अचानक घोड़े ने साथ छोड़ दिया... वह बुरी तरह अड़ गया और पीछे हटने लगा – अंत में वह एक लम्बी डकार मार कर वहीं धराशाई हो गया।

मैंने देखा – उसकी जीभ बाहर खिंच आई है। ऐसा लगता था जैसे वह कुछ ही सेकंड में मरने वाला है। मैंने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया और वह बड़ा थैला उठा लिया जिसमें उन् बाईस राक्षसों को बंद किया गया था, पर वह थैला मुझसे उठाया न जा सका। वह इतना भारी हो गया था कि उसे हिला पाना भी दुश्वार था।

मेरे माथे से पसीने छूट गये थे। मैं समझ गया था कि वे सीमा में दाखिल नहीं होना चाहते। कुछ देर तक मैं वहीं खडा रहा।

चांदनी रात में जंगल का दृश्य भयावह हो रहा था। हवा सांय-सांय करती बह रही थी।

एकाएक मुझे कुछ ध्यान आया और मैंने उन राक्षसों को दावतनामा देना उचित समझा।

मैंने न सिर्फ थैले का मुँह खोला बल्कि हंडिया भी आजाद कर दी। अचानक मुझे लगा जैसे मुझसे कोई पहाड़ सा टकराया हो... मैं हवा में उछलता हुआ काफी दूर गया। यह उनका प्रतिरोध नहीं तो क्या था, हालांकि मेरे श रीर सुन्न पड़ गया था पर मैंने उस पिटारी को गले से नहीं उतारा जिसमें मनुष्य की कलेजी और जादू-टोने का दूसरा सामान रखा था।

“कलेजी छोड़कर भाग जा..कलेजी छोड़कर भाग जा...।” मक्खियों की तरह भिनभिनाती आवाज मेरे कान में पड़ी।

मैं फ़ौरन संभला। मुसीबत मेरे सर पर थी। इस वक़्त बेताल मेरी सहायता नहीं कर सकता था, यदि मैं पिटारी छोड़ देता तो ना जाने वे कलेजी पाकर मेरा भी सफाया कर देते। अब वे समझ गये थे कि मैं उन्हें कैद करने जा रहा हूं। कलेजी खाने से उनकी शक्ति और भी बढ़ सकती थी। अब एक ही चारा था किसी तरह दौड़कर बेतालों की सरहद में पहुँच जाऊं।
 
उनकी सरहद आधा मील दूर उस जगह से शुरू होती थी, जहाँ विशालकाय बूढा बरगद का दरख़्त था, उसकी जानकारी मुझे थी।

मैं जी जान लगाकर उसी तरफ भाग खड़ा हुआ, अब मुझे कुछ भयानक किस्म की परछाईयां पीछा करते नजर आ रही थी। ये परछाईयां मुझे भयभीत करके घेरने का प्रयास कर रही थी... पहले इनकी रफ़्तार काफी थी और कुछ मुझसे आगे जा पहुंचे थे, ऐसा होने पर मैं तुरंत रास्ता बदल लेता था। बाद में इनकी रफ़्तार धीमी पड़ गई और एक समय ऐसा भी आया जब ये सारे के सारे रुक गये।

बरगद के वृक्ष से एक फर्लांग दूर वे सहमकर खड़े हो गये और वहीं से नाना प्रकार की अवाजें निकालने लगे।मैं जानता था ऐसी शक्तियां सिर्फ भय से इंसान को मारती है। मेरी निडरता ने ही मेरे प्राणों की रक्षा की थी।

चांदनी बहुत बेजान सी हो गई थी।

मैं हाँफता हुआ बरगद के वृक्ष के नीचे रुक गया। अब मैं बेतालों की छत्रछाया में था। वे मुझे तरह-तरह के लालच दे कर बुला रहे था।

अब मेरा काम शुरू हुआ।

मैंने खंजर की नोक से एक गोल दायरा खींचा और कलेजी उसके बीच रख दी, फिर उसके बाईस टुकड़े कर दिए, मैंने उनका हिस्सा बाँट दिया था। अब जरूरत इस बात की थी की कौन अपना हिस्सा लेने पहले आता है।

अब मैं उन्हें बुलाने लगा। वे तमाशगीर की तरह दूर खड़े थे। अचानक उनमे से एक आगे बढ़ा , तुरंत दो ने पकड़कर पीछे खींच लिया। फिर उनमे झगडा सा होने लगा, अचानक एक छूटकर भागा... और दौड़ता हुआ मेरी तरफ आया।

फिर तो एक के बाद एक सभी दौड़ पड़े।

वे उस घेरे के पास आये।

जैसे ही वे बरगद के नीचे आये, मैंने अचरज से भरा दृश्य देखा। सहसा युद्ध के नगाड़े बजने लगे और बरगद पर लटके बेताल सीमा रक्षक उन बाईसों पर टूट पड़े। आकाश पर झुरमुरों के ऊपर असंख्य शोले तैरते नज र आए जो इसी तरफ लटक रहे थे। जान पड़ता जैसे बेताल फ़ौज आ गई है।

वहां बाकायदा युद्ध शुरू हो गया और मैं अपने मार्ग पर चल पड़ा। बड़ी भयानक आकृतियां उस स्थान पर उभरती जा रही थी... तलवार भालों की चमक नजर आ रही थी। बाईसों जिन्न जमकर संघर्ष कर रहे थे।
 
मैं अपनी गुफा में जा पहुंचा।

चन्द्रावती उस वक़्त सो रही थी। मेरी आहट पाते ही जाग गई।

मैंने रौशनी जलाई।

उसने अंगड़ाई ली और मैंने देखा इस बीच उसका चेहरा काफी मुर्झा गया है। चेहरे पर पीली पर्त चढ़ी थी, आँखें धसती जा रही थींऔर गालों की हड्डियाँ उभरती जा रही थी। आज मैंने पहली बार महसूस किया कि वह जवान नहीं रही... उसकी सुन्दरता मिट चुकी है और कुल मिलाकर वह दायाँ सी हो गई है।

“इतने रोज कहाँ रहे तांत्रिक ?” उसने पूछा।

“तू जानती है, मैं क्या करता फिर रहा हूं।”

“जानती हूँ... पर इतने दिन मुझे अकेले छोड़कर रखना तुझे अच्छा लगता है ?”

“क्यों क्या तू मेरे बिना मर जायेगी। सो जा चुपचाप...मैं बहुत थका हुआ हूं...पर ज़रा मेरी टांगे तो दबा दे।”

मेरा मोह तो सारी दुनिया से ख़त्म हो चुका था, चन्द्रावती से क्यों रखता। मैं तो अब जंगली पशु था।

“कभी-कभी मुझसे प्यार से भी बात कर लिया करो तांत्रिक।”

मैं चुप रहा।

“मैं तुम्हारे बिना किस तरह दिन काटती हूं तुम क्या जानो।”

“पागलपन की बातें मत कर – चल ज़रा टांगे दबा।”

वह एकदम बिखर पड़ी – “मैं तुम्हारी नौकरानी नहीं हूं जो...।”

“हरामजादी ! बक-बक मत कर... मेरे पास रहना है तो तुझे वही करना होगा जो मैं कहूंगा वरना मार-मार कर तेरी खाल उतार दूँगा।”

मैं आराम से लेट गया और टांगे पसार दी।

उसकी आँखों में आंसू छलक आये और चुपचाप मेरे पांव दबाने लगी, न जाने कौन सी बात थी जो वह कहना चाहकर नहीं कह पा रही थी। जब वह मेरे साथ थी तो उसे यह सब भोगना ही था, क्योंकि मुझे गंदे रास्ते पर ले जाने वाले पाप की भागीदार थी, ऐसी बातें उसे सोचनी चाहिए मुझे नहीं।

चन्द्रावती मेरे पैर दबाने लगी उसके नरम नरम हाथो के स्पर्श की वजह से मेरी कामाग्नि कामुक अंगड़ाइयाँ लेने लगी . मैने चन्द्रावती को अपने पहलू मे खींच लिया

***
 
मैंने चन्द्रावती की चिकनी कमर पर एक और किस किया और फिर मैंने चन्द्रावती की पूरी कमर पर किस करना शुरू कर दिया, और साथ-साथ में अपनी जीभ भी फेरता रहा।

चन्द्रावती को इतनी मस्ती छाने लगी थी की उससे जबर्दाश्त नहीं हुआ, तो बो पेट के बल बेड पर लेट गई। चन्द्रावती के गोल-गोल नितंब लाल पेटिकोट में इतनें सेक्सी लग रहें थे की मैंनें चन्द्रावती के पेटिकोट को खींचकर उसके आधे नितंबों तक कर दिया। अब चन्द्रावती के गोल-गोल गोरे नितंब मेरी आँखों के सामने थे, और मैं खुद को रोक नहीं पाया और मैंने चन्द्रावती के दोनों नितंबों पर हल्के-हल्के काटने शुरू कर दिए।

मेरे काटने से चन्द्रावती को बड़ी गुदगुदी हो रही थी, और वो अपने नितंबों को उछाल देती थी। मैंने चन्द्रावती के पेटिकोट को उतार दिया, और अपना लंगोट भी उतार दिया। फिर मैं चन्द्रावती के नितंबों की दरार में अपने लण्ड को सटाकर चन्द्रावती के ऊपर लेट गया। अब में चन्द्रावती की कमर और उसकी गर्दन पर चूम रहा था और नीचें मेरे लण्ड को चन्द्रावती के गदराए हए नितंबों से जो मजा मिल रहा था उसका तो कोई जबाब ही नहीं था।

मैंने फिर से चन्द्रावती की चूचियों को अपने हाथों में ले लिया और चन्द्रावती की दोनों चूचियों को अपने हाथ से दबाने लगा। कछ ही देर में मेरे लण्ड को चन्द्रावती के नितंबों ने इतना कडा बना दिया था की अब तो सिर्फ वो चन्द्रावती की चूत में जाने के लिए बेकरार हो उठा था। मैंने फिर चन्द्रावती का सीधा करके लिटा दिया और चन्द्रावती की दोनों जांघों का फैलाकर उसकी जांघों के बीच में बैठ गया।

फिर मैंने अपनी जीभ को चन्द्रावती की नाभि के चारों तरफ गोल-गोल करके घुमाया, और फिर धीरे-धीरे अपनी जीभ को चन्द्रावती की चूत के पास ले आया।

जैसे ही मेरी जीभ चन्द्रावती की चूत के पास गई, चन्द्रावती ने अपनी दोनों जांघों को आपस में मिलाने की कोशिश की। पर मैंने अपने हाथों से चन्द्रावती की दोनों

जांघों को फिर से फैला दिया और अपनी जीभ को चन्द्रावती की रसभरी चूत की फांकों पर रख दिया, और चन्द्रावती की चूत में घुसा दिया।

अब मैं चन्द्रावती की चूत से बहते हुए रस को अपनी जीभ से चाटने लगा। मेरी जीभ ने चन्द्रावती की चूत में इतनी हलचल मचा दी थी। अब तो चन्द्रावती का इतना बुरा हाल हो रहा था की वो बार-बार अपने नितंबों को उछालकर सिसकियां भरे जा रही थी।

चन्द्रावती ने मेरे लण्ड को अपने हाथ में कसकर पकड़ लिया और बोली- "आह्ह्ह्ह्ह. अब और नहीं बस करिए ना...

मेने चन्द्रावती की चूत से अपने मुँह को हटा लिया और अपना लण्ड चन्द्रावती के मुँह के पास कर दिया। जैसे ही मेरा लण्ड चन्द्रावती के मुँह के पास गया, चन्द्रावती ने मेरे लण्ड को अपने होंठों में भूखी बिल्ली की तरह दबा लिया और अपने मुँह में भरकर चूसने लगी। चन्द्रावती ने मेरे लण्ड को चूस-चूसकर पूरा गीला कर दिया था।

फिर मैंने अपना लण्ड चन्द्रावती के मुँह से बाहर खींच लिया और चन्द्रावती की जांघों के बीच में फिर से अपने लण्ड का सुपाड़ा चन्द्रावती की चूत पर सटा दिया। फिर हल्का सा जोर लगाते ही चन्द्रावती की चूत में मेरा लण्ड घुसता चला गया। जब मेरा पूरा लण्ड चन्द्रावती की चूत में चला गया तो मैंने अपने लण्ड को आधा बाहर निकालकर जोर से एक धक्का मारा तो मेरा लण्ड चन्द्रावती की चूत की पूरी गहराई तक चला गया।

इस धक्के से चन्द्रावती की मस्ती पूरे उफान पर आ गई, और चन्द्रावती ने अपने नितंबों को पूरी तरह से ऊपर उठाकर मेरे लंड को धन्यवाद बोला, और फिर तो मैंने अपने लण्ड को चन्द्रावती की चूत में अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। मेरे हर धक्के पर बस चन्द्रावती की सुख भरी सिसकियां निकलती थी।

चन्द्रावती के चेहरे पर जो स्माइल थी वो साफ जाहिर कर रही थी की चन्द्रावती को पूरा सुख मिल रहा है। और फिर लण्ड और चूत की लड़ाई में चूत ने फिर से बाजी मार ली और मेरे लण्ड को रोना आ गया। मैंने अपने लण्ड को चन्द्रावती की चूत की गहराईयों में लेजाकर चिपका दिया। चन्द्रावती और मैं एक दूसरे के होंठों से होठों को चिपकाए पड़े रहे।

कुछ देर तक ऐसे ही चन्द्रावती के ऊपर रहने के बाद में चन्द्रावती के ऊपर से हट गया और फिर में चन्द्रावती के साथ में ही लेट गया।

कुछ देर बाद मैं निंद्रा देवी की गोद में समा गया।

***
 
काफी दिन चढ़े मेरी आँख खुली। मैं उठ कर खुली हवा में टहलने निकल पड़ा। मनहूस दोपहरी छाने लगी थी। खाने के लिए मुझे किसी मुर्दा गोश्त की तलाश थी। मैं जानता था जंगल में यदा-कदा कोई न कोई जानवर मरता ही रहता है। इस प्रकार की कोई कठिनाई यहाँ नहीं थी। कुछ देर बाद मुझे एक बूढा बन्दर मरा हुआ मिल गया, उसे एक जंगली बिलाऊ खींच रहा था। मैंने बिलाऊ को खदेड़ दिया और खुद उस बन्दर को उठा लाया।

चन्द्रावती अपना खाना अलग पकाती थी, उस वक़्त वह एक वृक्ष की छाया में बैठी एक स्वेटर बना रही थी। मैं अपना मांस पकाने के लिए गुफा में चला गया।

एक घंटा बाद मैं बाहर निकला। वह अब भी चुप-चाप अपना काम कर रही थी।

“क्यों – कोई काम नहीं है क्या... कुछ लकडियाँ वगैरह चुन लाया कर...।”

“सूखी लकड़ियां बहुत पड़ी है।” वह निगाह उठाये बिना बोली।

“यह स्वेटर किसके लिये बुन रही है।”

“तुम्हें क्या लेना... तुम मेरा ध्यान ही कब रखते हो।”

मुझे याद आया मैंने रात उसे फटकारा था।

“इस ठाकुर के बच्चे से फुर्सत मिले तो तेरा ध्यान करूं... तू सूख क्यों रही है।”

उसने अपनी निगाह उठाई और स्वेटर बुनना बंद कर दिया।

“इस जगह रहकर मुझे डर लगता है। क्या तुम मुझे कहीं और नहीं ले चलोगे... तुम्हें तो मेरी हालत का जरा भी पता नहीं, तुम क्या जानो कि मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूं।”

“क्या...?”

“हाँ दूसरा महीना ख़त्म होने को है... दो-चार रोज में बस तीसरा चढ़ जाएगा।”

“ये क्या बक रही है तू ?”

“क्या तुम्हें ख़ुशी नहीं हुई ?”

“ख़ुशी... किस बात की ख़ुशी। तू मेरी बीवी तो है नहीं, जो मुझे ख़ुशी होगी। मुझे नहीं चाहिए ऐसी औलाद, फिर यह कोई जरूरी तो नहीं कि वह मेरी हो।”

“रोहताश।”

“क्यों... क्या तू बड़ी पतिव्रता है, देख मैं कोई दवा का इंतज़ाम करता हूँ, इसे गिराना होगा। क्या पता वह ठाकुर या किसी और का पाप हो। फिर दुनियां जानती है कि तू मुझसे नहीं मेरे बाप से ब्याही थी, तू विधवा है, तेरी औलाद तेरा सर्वनाश कर देगी।”

“हे भगवान्...।” वह सहमी आवाज में बोली –”तुझे मुझसे इतनी नफरत हो गई है, मुझ पर यकीन नहीं।”
 
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