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Guest
“जो औरत की बात पर भरोसा करे, वो पागल।” मैंने ठहाका लगाया – “और तुझे औलाद का मोह नहीं रहना चाहिए जैसे तैसे अपना जीवन गुजार। यह बदनामी अपने साथ रखेगी तो तुझे कोई पानी को भी नहीं पूछेगा। खैर – अभी कुछ नहीं बिगड़ा – आज मैं बेताल से कह दूंगा – वह दवा ला देगा और तेरा पेट साफ़ हो जायेगा।”
“रोहताश! मैं ऐसा नहीं होने दूँगी।” वह चीख पड़ी – “बहुत हो चुका... त... तुझे यह औलाद स्वीकार करनी ही होगी... पहले ही मैं बहुत पाप कर चुकी हूं, यह मुझसे नहीं होगा।”
मैंने बाल पकड़ कर उसके गाल पर एक तमाचा जड़ दिया और वह रोती बिलखती गुफा में भाग गई। उसका आधा बुना स्वेटर उसी जगह रह गया। मैंने उसकी चिड़िया उड़ा दी। कुछ देर बाद ही मैंने देखा कि वह गुफा से पोटली उठाये निकल रही है, शायद कहीं जाने की तैयारी में है।
“कहाँ जा रही है तू...।” मैंने गरजकर पूछा।
“कहीं भी जाऊं... तुझे क्या लेना ?”
“इस जंगल को पार कर लेगी?”
“इस जिंदगी से बेहतर है कि रास्ते में कोई जंगली जानवर मुझे खा जाए – लेकिन मैं यहाँ नहीं रुकुंगी। अगर मुझे पहले मालुम होता कि तांत्रिक बनने के बाद तु ऐसा हो जायेगा तो मैं कभी तेरा साथ न देती – परन्तु इसमें दोष मेरा भी है – इसलिये अपने आपको भाग्य के सहारे छोड़कर जा रही हूं।”
मैं हंस पड़ा – खोखली हंसी।
“तो क्या तू इस प्रकार चली जायेगी। अब तो मैं वैसे भी खूनी हूं और तेरे अलावा कौन जानता है कि मैं कहाँ छिपा हूं। वैसे तुझ पर मेरा कोई दबाव नहीं, लेकिन तू तब तक यहीं रहेगी जब तक मेरा काम पूरा नहीं हो जाता। उसके बाद जहाँ चाहे चली जाना।”
“रोहताश – मुझ पर यह जुल्म क्यों?”
“कुछ दिन और सहना पड़ेगा।”
“लेकिन मैं एक ही शर्त पर यहाँ रह सकती हूं।”
“किस शर्त पर।”
“तु मुझे मां बनने से नहीं रोकेगा... चाहे वह किसी की भी औलाद हो... उसका भार तेरे ऊपर नहीं थोपूंगी।”
“यह बात है तो मुझे मंजूर है, तू शौक से बच्चा जन सकती है।”
वह वापिस लौट गई। मुझे पहली बार अहसास हुआ कि एक स्त्री को बच्चा जनने का कितना मोह होता है। मैं क्या जानता था की मां की ममता क्या चीज़ होती है।
“रोहताश! मैं ऐसा नहीं होने दूँगी।” वह चीख पड़ी – “बहुत हो चुका... त... तुझे यह औलाद स्वीकार करनी ही होगी... पहले ही मैं बहुत पाप कर चुकी हूं, यह मुझसे नहीं होगा।”
मैंने बाल पकड़ कर उसके गाल पर एक तमाचा जड़ दिया और वह रोती बिलखती गुफा में भाग गई। उसका आधा बुना स्वेटर उसी जगह रह गया। मैंने उसकी चिड़िया उड़ा दी। कुछ देर बाद ही मैंने देखा कि वह गुफा से पोटली उठाये निकल रही है, शायद कहीं जाने की तैयारी में है।
“कहाँ जा रही है तू...।” मैंने गरजकर पूछा।
“कहीं भी जाऊं... तुझे क्या लेना ?”
“इस जंगल को पार कर लेगी?”
“इस जिंदगी से बेहतर है कि रास्ते में कोई जंगली जानवर मुझे खा जाए – लेकिन मैं यहाँ नहीं रुकुंगी। अगर मुझे पहले मालुम होता कि तांत्रिक बनने के बाद तु ऐसा हो जायेगा तो मैं कभी तेरा साथ न देती – परन्तु इसमें दोष मेरा भी है – इसलिये अपने आपको भाग्य के सहारे छोड़कर जा रही हूं।”
मैं हंस पड़ा – खोखली हंसी।
“तो क्या तू इस प्रकार चली जायेगी। अब तो मैं वैसे भी खूनी हूं और तेरे अलावा कौन जानता है कि मैं कहाँ छिपा हूं। वैसे तुझ पर मेरा कोई दबाव नहीं, लेकिन तू तब तक यहीं रहेगी जब तक मेरा काम पूरा नहीं हो जाता। उसके बाद जहाँ चाहे चली जाना।”
“रोहताश – मुझ पर यह जुल्म क्यों?”
“कुछ दिन और सहना पड़ेगा।”
“लेकिन मैं एक ही शर्त पर यहाँ रह सकती हूं।”
“किस शर्त पर।”
“तु मुझे मां बनने से नहीं रोकेगा... चाहे वह किसी की भी औलाद हो... उसका भार तेरे ऊपर नहीं थोपूंगी।”
“यह बात है तो मुझे मंजूर है, तू शौक से बच्चा जन सकती है।”
वह वापिस लौट गई। मुझे पहली बार अहसास हुआ कि एक स्त्री को बच्चा जनने का कितना मोह होता है। मैं क्या जानता था की मां की ममता क्या चीज़ होती है।