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उसे बड़े हॉलनुमा कमरे में, जिसकी 'ताखों में बुत सजे हुए थे, तबूह एक चमड़े की गद्दी पर बैठी थी ।कमरे के तीन दरवाजे बन्द थे...एक खूला हुआ था। नन्हीं बरहा, उस कमरे में इधर-से-उधर दौड़ती फिर रही थी। कमरे के फर्श पर जगह-जगह छोटे-बड़ें सांप घूम रहे थे। बरहा, इन्हीं सांपों से खेल रही थी। एक छोटा-सा सांप उसने अपने गले में डाला हुआ था। वह पूर कमरे में दौड़ती फिर रही थी।तबूह एक तरफ खामोश बैठी उसे बड़ी दिलचस्पी से देख रही थी ।बरहा दौड़ते-दौड़त एक जगह रूकी । एक सांप बड़ी तेजी से फर्श पर दौड़ रहा था। बरहा ने उसे दुम से पकड़कर उठा दिया और फिर रस्सी की तरह घुमाकर फेंक दिया ।सांप पट् से ईटों के फर्श पर गिरा! उसे चोट लगी। उसे बरहा की यह हरकत अच्छी न लगी। वो अपना मुंह खोलकर बरहा की तरफ बढ़ा। बरहा ने अब एक दूसरा सांप अपने हाथ में पकड़ लिया था। वह उस मुंह खोले अपनी तरफ बढ़ते सांप से बेखबर थी।वह सांप उसे काट भी सकता था, लेकिन वहां तबूह मौजूद थी......और वह इसीलिये यहां मौजूद थी। इससे पहले कि वो सांप गुस्से में बरहा को कोई क्षति पहुंचाता, तबूह ने उस सांप को डांटते हुए कहा-"खबरदार....होश में नहीं हैं क्या तू....मेरे हाथों क्यों अपने दांत तुडवाना चाहता हैं। तू जानता नहीं कि बरहा, कौन हैं? नहीं जानता तो अब जान ले। यह परमान की पसन्द और उसका चुनाव है। इसे जरा-सा भी नुकसान पहुंचा तो वचह तेरी सात पीढ़ियों को तबाह करके रख देगा। अगर तेरे दात नये-नये आये हैं तो मेरी तरफ आ जा....अपने दांत मुझ पर आजमा। बरहा पर क्या गुस्सा उतारना चाहता हैं..... | वह खेल रही हैं और तू सिर्फ एक खिलौना हैं। बस, एक खिलौना ही रह...... ।'
तबूह की डांट सुनकर उस सांप की सिट्टी गुम हो गई। वह फौरन ही कुण्डली मारकर और सिर झुकाकर एक तरफ बैठ गया ।बरहा इस बात से बेखबर उन छोटे-बड़े सांपों से खेलती रही.....भागती-दौड़ती रही। फिर उन तीन दरवाजों में से एक दरवाजा खुला और नैनी भीतर आई, उसने बरहा की उंगली पकड़ी और उसे अपने साथ लेकर उसी दरवाजे से बाहर निकल गई। दरवाजा खुद-ब-खुद बन्द हो गया ।बरहा इस मायावी लोक में परवान चढ़ रही थी ।बरहा के जाने के बाद तबूह अपनी जगह से उठी। उसने अपने खुले बालों को जूड़ा-सा बनाया और अपने विशिष्ट अदा। भरे अन्दाज से चलती हुई एक ताख के सामने आ रूकी, इस ताख में एक दवकाय मर्द का बुत रखा था।यह बुत काले-भुजंग हूरा का था तबूह उसे गौर से देखने लगी....फिर उसके हीठों पर बरहस ही मुस्कुराहट आ गई। वह धीरे से बोली
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नफीसा बेगम अपने पति की मौत पर दो आंसू भी नही बहा सकी थी।वह रोने बैठती तो रोशन राय का कोई-न-कोइ जुल्म उसके सामने आ जाता और उसकी संगदिली व निर्ममता उसका दिल चीर जाती । उसने अपने ही बेटे समीर राय की बीवी और बच्ची के साथ जो सलूम किया था, वह एक माफ न किये जाने वाला अपराध था।आंखें चली जाने के बाद रोशन राय ने नफीसा को नमीरा और उसकी बच्ची के बारे में एक-एक बात सच बता दी थी, लेकिन उसे अपनी इस करतूत पर कोई शर्मिन्दगी नहीं थी कि वह यह सब हवेली की सलामती के लिए करने को मजबूर था। जुल्म की यह दास्ताना सुनकर नफीसा वेगम के दिल में अपने शौहर के प्रति नफरत और भी गहरी हो गई थी ।नफीसा बेगम ने राज की ये बाते बेटे के कान में डाल दी थीं। यह सब सुनकर समीर राय के दिल में आग लग गई थी। यही दिल चाहा था कि अभी जाकर इस दरिन्दे शख्स के टुकड़े कर दे, लेकिन वह उसका बाप था......समीर राय ऐसा नहीं कर सकता था। वह अपने बाप जैसा नहीं बनना चाहता था। वैसे भी खुदाई इंसाफ शुरू हो चुका था। कुदरत ने हिसाब-किताब शुरू कर दिया था। उसकी दुनिया अंधेरी कर दी गई थी। अब समीर राय को गुनाह करने की क्या जरूरत थी। कुदरत खुद ही रोशन राय की दरिन्दगियों का इन्तकाल लेने पर उतर आई थी।अपनी खोजबीन पूरी करने के बाद एक दिन समीर राय ने इस विषय पर अपनी मां से बात की-"अपनी खोजबीन पूरी करने के बाद एक दिन समीर राय ने इस विषय पर अपनी मां से बात की-"अम्मी जान्! मैं इस हवेली को जरायमपेशा लोगों से पाक करना चाहता हूं......"
"हवेली में जरायमपेशा लोग? मैं समझी नहीं....।" नफीसा बेगम ने सवाल किया।
हां, हवेली में पन्द्रह-बीस ऐसे मुलाजिम हैं जो किसी-न-किसी तरह अब्बू के जुमों में शरीक रहे है।
"बेटा....तुम जैसा चाहों करो-बस इतना याद रखना.....किसी पर जुल्म न हों। अपने अब्बू का हश्र तुमने देखा ही हैं...... ।" खुदा के खौफ से डरी नफीसा बेगम ने हिदायत दी।
"अम्मी..मैं इन लोगों को इसीलिये यहां से निकाल देना चाहता हूं कि अब किसी पर जुल्म ने हो। ये लोग यहां रहेंगे तो मजलूमों और मासूमों को तकलीफ पहुंचाने और मेरी खुशामद के अलावा कुछ न करेंगे.......।" समीर राय ने कहा।"तुम ठीक कहते हो। मेरी तरफ से पूरी इजाजत हैं....जो चाहे करो.......।" नफीसा बेगम ने उसे छूट दे दी ।मां से इजाजत मिलने के बाद अगर समीर राय चाहता तो अन संदिग्ध नौकर-चाकरों को खड़ें-खड़े कान पकड़कर बाहर कर देता, लेकिन उसने जालिमों पर भी जुल्म करना मुनासिब न समझा। उसने उन मुलाजिमों को इतना कुद दे दिया कि वे साल भर तक आराम से घर में बैठकर खा सकें ।हवेली से रूख्सत करते हुई उसने इन मुलाजिमों से बस इतना कहा-"आइन्दा मैं इस इलाके में तुम्हारी शक्ल ने देखू। अगर ऐसा हुआ तो फिर मुझसे बुरा कोई न होगा..... ।"रौली और होली, जो सबसे आगे खड़े थे उन्होंने कुछ कहना चाहा तो समीर राय ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया-"बस, अब मैं कुछ सुनना नहीं चाहता। तुम लोग जाओ..... ।''
तबूह की डांट सुनकर उस सांप की सिट्टी गुम हो गई। वह फौरन ही कुण्डली मारकर और सिर झुकाकर एक तरफ बैठ गया ।बरहा इस बात से बेखबर उन छोटे-बड़े सांपों से खेलती रही.....भागती-दौड़ती रही। फिर उन तीन दरवाजों में से एक दरवाजा खुला और नैनी भीतर आई, उसने बरहा की उंगली पकड़ी और उसे अपने साथ लेकर उसी दरवाजे से बाहर निकल गई। दरवाजा खुद-ब-खुद बन्द हो गया ।बरहा इस मायावी लोक में परवान चढ़ रही थी ।बरहा के जाने के बाद तबूह अपनी जगह से उठी। उसने अपने खुले बालों को जूड़ा-सा बनाया और अपने विशिष्ट अदा। भरे अन्दाज से चलती हुई एक ताख के सामने आ रूकी, इस ताख में एक दवकाय मर्द का बुत रखा था।यह बुत काले-भुजंग हूरा का था तबूह उसे गौर से देखने लगी....फिर उसके हीठों पर बरहस ही मुस्कुराहट आ गई। वह धीरे से बोली
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नफीसा बेगम अपने पति की मौत पर दो आंसू भी नही बहा सकी थी।वह रोने बैठती तो रोशन राय का कोई-न-कोइ जुल्म उसके सामने आ जाता और उसकी संगदिली व निर्ममता उसका दिल चीर जाती । उसने अपने ही बेटे समीर राय की बीवी और बच्ची के साथ जो सलूम किया था, वह एक माफ न किये जाने वाला अपराध था।आंखें चली जाने के बाद रोशन राय ने नफीसा को नमीरा और उसकी बच्ची के बारे में एक-एक बात सच बता दी थी, लेकिन उसे अपनी इस करतूत पर कोई शर्मिन्दगी नहीं थी कि वह यह सब हवेली की सलामती के लिए करने को मजबूर था। जुल्म की यह दास्ताना सुनकर नफीसा वेगम के दिल में अपने शौहर के प्रति नफरत और भी गहरी हो गई थी ।नफीसा बेगम ने राज की ये बाते बेटे के कान में डाल दी थीं। यह सब सुनकर समीर राय के दिल में आग लग गई थी। यही दिल चाहा था कि अभी जाकर इस दरिन्दे शख्स के टुकड़े कर दे, लेकिन वह उसका बाप था......समीर राय ऐसा नहीं कर सकता था। वह अपने बाप जैसा नहीं बनना चाहता था। वैसे भी खुदाई इंसाफ शुरू हो चुका था। कुदरत ने हिसाब-किताब शुरू कर दिया था। उसकी दुनिया अंधेरी कर दी गई थी। अब समीर राय को गुनाह करने की क्या जरूरत थी। कुदरत खुद ही रोशन राय की दरिन्दगियों का इन्तकाल लेने पर उतर आई थी।अपनी खोजबीन पूरी करने के बाद एक दिन समीर राय ने इस विषय पर अपनी मां से बात की-"अपनी खोजबीन पूरी करने के बाद एक दिन समीर राय ने इस विषय पर अपनी मां से बात की-"अम्मी जान्! मैं इस हवेली को जरायमपेशा लोगों से पाक करना चाहता हूं......"
"हवेली में जरायमपेशा लोग? मैं समझी नहीं....।" नफीसा बेगम ने सवाल किया।
हां, हवेली में पन्द्रह-बीस ऐसे मुलाजिम हैं जो किसी-न-किसी तरह अब्बू के जुमों में शरीक रहे है।
"बेटा....तुम जैसा चाहों करो-बस इतना याद रखना.....किसी पर जुल्म न हों। अपने अब्बू का हश्र तुमने देखा ही हैं...... ।" खुदा के खौफ से डरी नफीसा बेगम ने हिदायत दी।
"अम्मी..मैं इन लोगों को इसीलिये यहां से निकाल देना चाहता हूं कि अब किसी पर जुल्म ने हो। ये लोग यहां रहेंगे तो मजलूमों और मासूमों को तकलीफ पहुंचाने और मेरी खुशामद के अलावा कुछ न करेंगे.......।" समीर राय ने कहा।"तुम ठीक कहते हो। मेरी तरफ से पूरी इजाजत हैं....जो चाहे करो.......।" नफीसा बेगम ने उसे छूट दे दी ।मां से इजाजत मिलने के बाद अगर समीर राय चाहता तो अन संदिग्ध नौकर-चाकरों को खड़ें-खड़े कान पकड़कर बाहर कर देता, लेकिन उसने जालिमों पर भी जुल्म करना मुनासिब न समझा। उसने उन मुलाजिमों को इतना कुद दे दिया कि वे साल भर तक आराम से घर में बैठकर खा सकें ।हवेली से रूख्सत करते हुई उसने इन मुलाजिमों से बस इतना कहा-"आइन्दा मैं इस इलाके में तुम्हारी शक्ल ने देखू। अगर ऐसा हुआ तो फिर मुझसे बुरा कोई न होगा..... ।"रौली और होली, जो सबसे आगे खड़े थे उन्होंने कुछ कहना चाहा तो समीर राय ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया-"बस, अब मैं कुछ सुनना नहीं चाहता। तुम लोग जाओ..... ।''