S
StoryPublisher
Guest
१८
घोर अँधेरी रात....
हाथ को हाथ न सूझे...
घोर निस्तब्धता...
साथ चलते सह यात्री का आहट तो सुनाई दे पर स्वयं वो सह-यात्री ही दिखाई न दे...
तारे भी कुछ इस तरह टिमटिमा रहे थे मानो एक हल्के से संकेत की प्रतीक्षा कर रहे हों; संकेत का ‘स’ हुआ नहीं की तुरंत कहीं छुप जाए सारे के सारे.
रात्रि के इस भयावहता को बढ़ाने में सहायता के लिए रह रह कर पेड़ों से उल्लूओं के बोल और विभिन्न कीड़ों के बजबजाते स्वर चारों ओर से सुनाई दे रहे थे.
कुछ रात्रि अपने साथ ऐसे स्याहपन ले कर आते हैं जिसे साधारण जन सोचना तक पसंद नहीं करते हैं.
ऐसी ही एक रात्रि होती है अमावस्या की.
एक ऐसी रात्रि जिसके विषय में लोग व समाज न तो बातें करना पसंद करते हैं और न ही इसके बारे में ज्यादा कुछ जानते हैं. निःसंदेह ऐसे विषयों पर स्वयं की जानकारी से कहीं अधिक वर्षों से चली आ रही सुनी सुनाई बातों पर साधारण जन को अधिक विश्वास होता है.. और यदि सुनी सुनाई बातें केवल सुनने में ही हद से अधिक भयावह हो तो फ़िर आम लोगों का क्या दृष्टिकोण हो सकता है ये तो अपने आप में ही जगजाहिर हैं.
ऐसी ही रात्रियों में कुछ विरले रात्रि ऐसी भी होती है जोकि शुरू होते ही अपने साथ कई प्रकार की विशेषताएँ ले आती हैं.
विशेषताएँ इसलिए क्योंकि ये स्वयं ही होती हैं इस रात्रि की और इस रात्रि से संबंध रखने वालों की... इस तरह की रात्रियों की प्रतीक्षा करने वालों की... उन प्रतीक्षारत लोगों की भी जो
गाँव की यदि बात की जाए तो यहाँ के लोग तो बहुत समय पहले से ही शीघ्र सो जाने के आदि थे पर अब जो पिछले कुछ समय से गाँव में जिस प्रकार की घटनाएँ हो रही हैं; उस कारण संध्या काल में ही दुकान बढ़ा कर (बंद कर) सब के सब सात से साढ़े सात बजे तक अपने अपने घरों में घुस जाते हैं.
और जिस दिन अमावस्या हो.. उसपे भी ऐसी विशेष तिथि, ग्रह – नक्षत्र वाली अमावस्या... उस दिन तो सुबह से ही लोगों के मन मस्तिष्क में एक अलग ही आतंक होना तो बहुत सामान्य सी बात है.
आज ऐसी ही एक रात्रि है.
आठ बजते बजते ही सब खा पी कर सो गए.
पूरे गाँव में सन्नाटा पसर गया.
रात्रि के इसी भयावह वाले पलों में गाँव से निकल कर उससे सटे वन की ओर पाँच जोड़ी पैर तेज़ी और सावधानी से बढ़े जा रहे थे.
तीन तो अपने ही बाबा जी और उनके दो शिष्य चांदू और हरि हैं.. और बाकी दो बाबा जी के वरिष्ठ सहयोगी हैं जो आज ही के दिन बाहर से आए थे. ये दोनों भी कई प्रकार की सिद्धियाँ रखते हैं जोकि आज की रात काफ़ी काम देने वाली है.
आज की रात एक ऐसे काम के लिए... एक ऐसी प्रक्रिया के लिए... जिसकी भयावहता का न तो कोई सिमा है और न ही कोई अनुमान.
सभी के कदम तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं.
एक निर्दिष्ट स्थान के लिए.
सभी के चेहरे दृढ़ संकल्पता का साक्ष्य लिए थे.
सबसे आगे हरि और चांदू हाथों में मशाल लिए चल रहे थे.
बीच में बाबा जी मंत्रजाप करते हुए चल रहे थे और पीछे पूरी सतर्कता के साथ मंत्रजाप करते हुए हाथ में मशाल थामे कदम बढ़ाए जा रहे थे बाबा जी के दोनों नए सहयोगी.
ये एक संकरा सा रास्ता था! दोनों तरफ नागफनी ने विकराल रूप धारण कर रखा था, लेकिन उसके खिलते हुए लाल और पीले फूलों ने उसकी कर्कशता को भी हर लिया था! बहुत सुंदर फूल थे, बड़े बड़े! अमरबेल आदि ने पेड़ों पर अपनी सत्ता कायम कर रखी थी! मकड़ियों ने भी अपने स्वर्ग को क्या खूब सजाया था अपने जालों से! ऊंचाई पर लगे बड़े बड़े जाले!
शीघ्र ही वे पाँचों एक संकरा सा पथ से होते हुए उस निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच गए. हालाँकि उस पथ को पार करने में भी बहुत कठिनाई आई. दोनों ओर से नागफनियों ने विकराल रूप धारण कर रखा था.. आवागमन के मार्ग पर झुक आए दोनों ओर से कई पेड़ों के टहनियों से बचते बचाते, जंगली बड़ी बड़ी मकड़ियों के सुंदर व विशाल जालों से स्वयं को दूर रखते हुए सब आगे बढ़ते गए.
आगे... ठीक उसी स्थान पर पहुँचे सब के सब जहाँ उन्हें पहुँचना था.
एक विशाल पेड़.. डाल, टहनियाँ उसकी दूर दूर तक फैली हुईं हैं. पत्तों के आकार भी एक सामान्य मनुष्य के हथेली से भी बड़े.
पेड़ के जात को जान पाना रात के इस अँधेरे में, भले ही हाथों में जलते मशालें हों; दुष्कर कार्य प्रतीत हो रहा था. वैसे भी अभी इस पेड़ के सामने पहुँचे ये पाँच आगंतुक इस पेड़ के जात - प्रजाति, प्रकार, इत्यादि जानने के इच्छुक तो बिल्कुल नहीं थे.
कुछ सफ़ेद फूल भी निकले थे वहाँ, जो निश्चय ही दिन के उजाले में एक अलग ही खूबसूरती दिखा रहे होते!
सभी ने बहुत अच्छे से उस वातावरण को देखते समझते हुए मन ही मन उसका एक बढ़िया अवलोकन व आंकलन किया. आसपास कुछ दूरी पर कई तरह के वृक्षों के जमावड़े थे. जैसे की, आम, पपीते, अमरुद, बेल, बेर, आंवले, बरगद इत्यादि सभी थे वहाँ. मशालों से उठती लपटों में नज़र आती बरगद और बेलों ने क्या खूब यौवन धारण किया था!
अद्भुत!
बाबा जी ने मन ही मन वहाँ के वातावरण की प्रशंसा करते हुए अपने सामने सर उठा कर तन कर खड़े उस पेड़ को देखते हुए सोचा,
‘यदि इस पेड़ के साथ वो दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना न जुड़ी होती तो कदाचित प्रायः दिन के उजाले में गाँव के बच्चे, बूढ़े और महिलाएँ अवश्य ही इस स्थान पर आ कर हर्षित – आनंदित होते.
इस घोर अन्धकार रात्रि में, मशालों से होती रौशनी में यदि ये पूरा परिदृश्य इतना सुंदर लग सकता है तो फिर सूर्यदेवता की रेश्मी किरणों की उपस्थिति में कैसा दिखता होगा.’
“गुरूदेव... अब??”
साथ आए नए सहयोगी में से एक ने दबे स्वर में पूछा.
परिदृश्य में खोए बाबा जी की तंद्रा टूटी..
आगे बढ़ कर अच्छे से एकबार फिर पूरे स्थान को देखा.
ऊँगलियों पर कुछ गणना की...
उसी निर्दिष्ट पेड़ के सामने पहुँचे.
फिर चारों दिशाओं की ओर मुँह करके कुछ क्षणों तक हाथ जोड़ कर मंत्रपाठ करते हुए प्रार्थना करते रहे.
उसके बाद चांदू की ओर देख कर एक संकेत दिया...
चांदू शीघ्रता दिखाते हुए अपने कंधे पर लटकते झोले में से एक मुड़ा हुआ कपड़ा निकाला और उस कपड़े के अंदर रखे एक आसन को निकाल कर बाबा जी की ओर बढ़ा.
बाबा जी ने हरि को भी एक संकेत किया.
हरि उनके पास पहुँचा.
बाबा जी ने शांत ढंग से पूछा,
“सुबह यहीं इसी स्थान को साफ़ किया था ना?”
हरि ने हाँ में सिर हिलाया.
बाबा जी ने उसे एकबार और उस स्थान को झाड़ देने का आदेश दिया.
हरि ने तुरंत उन मशालों की रौशनी में बाबा जी के दिखाए उस स्थान को ऊपर – ऊपर से हल्के से साफ़ किया.
तत्पश्चात बाबा ने उस स्थान पर चांदू से आसन ले कर बिछा दिया और एक कमंडल में से हथेली में जल ले कर उस आसन से तीन फीट की दूरी माप कर आसन के चारों ओर एक गोल घेरा बनाते हुए मंत्रजाप करते हुए जल डाला.
कुछ क्षण हाथ जोड़ कर प्रार्थना किया और फिर बैठ गए आसन पर.
कुछ क्षण और उन्होंने मंत्रजाप किया.
इतना कर के उन्होंने अपने शिष्यों की ओर देखा.
दोनों शिष्य जल्दी जल्दी बाबा जी के पूर्व निर्देशानुसार अपने साथ लाए झोलों में से भिन्न भिन्न प्रकार के तंत्र – मंत्र – यंत्र के सभी सामान निकाल निकाल कर रखने व सजाने लगे.
एक सीधी, आमने सामने की तेज़ टक्कर के लिए ये बहुत आवश्यक होता है कि आप अपनी पूरी तैयारी के साथ हों. इसलिए बाबा जी भी पूरी सजगता के साथ अपने शिष्यों द्वारा की जा रही तैयारी पर एक तीक्ष्ण दृष्टि जमाए हुए थे.
ये तैयारी थी एक गूढ़ अनुष्ठान के लिए... जो दैवीय भी होगा और घातक भी.
अनुष्ठान का शुभ मुहूर्त अब से कुछ देर बाद शुरू होने वाला था.
दोनों नए सहयोगियों ने बाबा जी की ही तरह जल से गोल घेरा बना कर अपने अपने लिए आसन बिछाए और उसपे बैठते ही मंत्रजाप प्रारंभ कर दिया.
दोनों शिष्यों ने भी प्राण रक्षा कवच का स्तोत्र पाठ करते हुए बाबा जी के स्थान से थोड़ा पीछे अपने लिए आसन बिछा कर उसपे बैठ गए. मशालों को पहले ही साथ लाए चार बांस के साथ बाँध कर उन्हें चार कोनों पर गड्ढे खोद कर गाड़ दिए गए थे.
दो लालटेनों को भी हल्के आंच पर जलता रख दिया था हरि ने.
कुछ ही देर में वहाँ उस स्थान पर, उस वातावरण में केवल उन पाँचों के मुख से एक लय में निकलते मंत्रोच्चारण ही गूँज रहे थे... धीमे आवाज़ में.
कुछ समय ऐसे ही बीता.
मंत्रोच्चारण के स्वर धीरे धीरे अपनी गति पकड़ते हुए अब तक थोड़ी तेज़ हो चुकी बहती हवा के कारण उस निर्जन वातावरण में गूँजते हुए दूर दूर तक फैलने लगे.
कुछ समय बीतने के पश्चात हरि और चांदू ने मंत्रोच्चारण के साथ साथ अपने साथ लाए एक विशेष कटोरे नुमा पीतल मिश्रित किसी अन्य धातु से बने उस बर्तन को वाद्ययंत्र की भांति बजाने लगे.
समय बीतने के साथ साथ मंत्रोच्चारण और वाद्ययंत्रों से निकलने वाली ध्वनियाँ तेज़ होती हवा के साथ दूर का सफ़र तय करते हुए नदी के तट तक पहुँच गए.
ध्वनियों का नदी के लहरों से टकराते ही एक भिन्न हलचल होने लगी उनमें; विशेष कर नदी के दक्षिणी दिशा में. कुछ ऐसा मानो कोई सोया हुआ अपने आसपास होती गतिविधियों के कारण धीरे धीरे नींद से जाग रहा हो.
बाबा जी, उनके शिष्यों और सहयोगियों के मंत्रपाठ में भी शनैः शनैः तीक्ष्णता बढ़ती जा रही थी. हर मंत्र का हरेक शब्द... यहाँ तक की उन शब्दों में प्रयुक्त होने वाले मात्रा तक थोड़ा थोड़ा करके एक भीषण अलौकिक व दैवीय ऊर्जा को जन्म दे रही थी.
नदी के लहरों में हलचल बढ़ने के साथ साथ बाबा जी के सामने स्थित पेड़ में भी; विशेष कर उसके पत्तियों में हलचल होने लगी. सूखी पत्तियाँ एक एक कर के नीचे गिरने लगीं.
मानो रात्रि के इस पहर में गहरी निद्रा में अब तक सोया हुआ वह पेड़ भी अंगड़ाईयाँ लेते हुए जाग रहा हो... और सूखी पत्तियाँ अंदर होते इसी करवट के परिणामस्वरूप डालियों से अलग हो कर नीचे गिर रही हैं.
बीच बीच में एक अजीब सी हल्की... दबी सी आवाज़ आ रही थी दूर कहीं से... हवाओं के साथ बहते हुए...
आवाज़ केवल बाबा जी की ही कानों से टकराई...
प्रश्न स्वयमेव ही कौंधा उनके मन में,
‘अरे... एक आवाज़ आ रही है न?! ये आवाज़.... किसकी....’
प्रश्न उनका पूरा होने से पहले ही दोबारा सुनाई दी वही आवाज़...
‘अरे... ये तो.... नहीं.. नहीं.... ये एक नहीं... वरन दो आवाजें हैं..!!’
बाबा जी ने अपना पूरा ध्यान केन्द्रित किया उस आवाज़ पर...
ऐसा करते ही अगले ही क्षण चौंक उठे;
क्योंकि आवाज़ एक नहीं.... वाकई दो आवाजें थीं... एक मर्दाना.. दूसरा जनाना..
मर्द दुःख, तड़प और पीड़ा की मार से मानो रो रहा हो... और.. जनाना; असीम आनंद की हँसी हँस रही हो... परन्तु इस जनाना की आवाज़ बहुत ही भिन्न है... अलग हट कर... बात क्या है...
‘कौन हो सकते हैं इन दो आवाजों के स्वामी?’
मन मस्तिष्क में चिंता लिए बाबा जी ने अपना कार्य जारी रखा...
और इधर,
लगभग एक साथ ही, अपने अपने घरों में, अपने अपने कमरों में गहरी नींद सोए गोपाल और सुचित्रा की आँखें एक साथ खुल गयीं.....
यदि कोई उस समय इनके पास खड़ा इन्हें देख रहा होता तो शायद इनके आँखें खुलते ही डर से मर गया होता.
क्योंकि दोनों की ही आँखों की पुतलियों के रंग एकदम से बदले हुए थे!
गोपाल की पुतलियाँ हल्की पीली – लाल मिश्रित रंग की जबकि सुचित्रा की हल्की नीली मिश्रित हरी...!
एक झटके से सुचित्रा अपने बिस्तर पर उठ बैठी...
आँखें घोर आश्चर्य से बड़ी बड़ी और गोल हो गयी थी... उसने पलट कर बगल में सोए अपने पति की ओर देखी...
रंजन बाबू घोड़े बेच कर सोने में व्यस्त थे..
सुचित्रा अपनी उन्हीं जलती आँखों से रंजन बाबू को देखती हुई उन्हें बिना छूए उनके सिर के ऊपर एक बार हाथ फिराई और फ़िर बिस्तर से उठ कर अपने कमरे से बाहर निकल गयी.....
उधर गोपाल भी अपने बिस्तर से उठ चुका था..
दरअसल गोपाल और सुचित्रा दोनों ही अपने घरों से निकल गए थे..
दोनों जैसे किसी एक जगह जल्द से जल्द पहुँचना चाह रहे थे.. दोनों के ही चेहरे और आँखों में चिंता व परेशानी साफ झलक रही थी..
पर यहाँ सबसे आश्चर्य वाली बात जो थी वो यह कि गोपाल और सुचित्रा; दोनों के ही पैर ज़मीन को नहीं छू रहे थे ! दोनों के ही शरीर धरती से कुछ इंच ऊपर हवा में थे और मानो इसी तरह हवा में ही उड़ते हुए अपने अपने गंतव्य की ओर बढ़े जा रहे थे.
कुछ क्षणों में ही जिस मार्ग से वे दोनों अपने अपने गंतव्य की ओर अग्रसर थे; वो मार्ग और उनका गंतव्य... दोनों स्पष्ट हो गए.
वे दोनों गाँव की एक संकरी जंगली पगडंडी से होते हुए उसी वन की ओर बढ़े जा रहे थे जहाँ इस समय बाबा जी अपने सहयोगियों व शिष्यों के साथ एक गुप्त अनुष्ठान में रत थे.
दरअसल अब तक बाबा जी ने एक हवन आरम्भ कर दिया था... उस हवन से उठती ज्वाला और उन पाँचों के मुख से निकलते मंत्रोच्चारण क्षण प्रतिक्षण आक्रामक से होते जा रहे थे.
विशेष कर बाबा जी तो बहुत ही दृढ़ संकल्पित लग रहे थे. उनके हरेक मंत्र पाठ से आस पास उपस्थित निर्जीव पदार्थ तक में कंपन सी हो रही थी.
अग्नि की लपटें तक बाबा जी के मुख से निकलने वाले हरेक मन्त्र व उनके लय, छंद, ताल पर थिरकन कर रही थीं.
ये क्रम अभी अनवरत चल ही रहा था कि तभी एक साथ गोपाल और सुचित्रा हवा में उसी तरह रहते हुए वहाँ पहुँच गए.
पहले तो दोनों ने एक दूसरे को आश्चर्य से देखा.. आँखों ही आँखों में बात हुई और फिर गुस्से से काँपते हुए दोनों ने उन पाँच साधकों की ओर देखा.
दोनों के बदली नेत्रों और बदले रूप को देख कर हरि और चांदू भयभीत तो अवश्य हुए पर बाबा जी पर उनका अगाध विश्वास था... इसलिए निर्भय हो कर अपने मन्त्र जाप में रमे रहे और वाद्य यंत्र बजाते रहे.
गोपाल और सुचित्रा को वहाँ आया देख कर बाबा जी को भी कुछ क्षणों के लिए अचरज अवश्य हुआ पर तब तक उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ इतनी अधिक प्रबल रूप से सक्रिय हो चुकी थीं कि उन्हें समझते देर न लगी की ये दोनों वास्तव में शांतनु और बरखा हैं.... गोपाल और सुचित्रा के शरीर में... गोपाल और सुचित्रा; जो इसी ग्राम के ग्रामवासी हैं.
सब ने गौर किया की अत्यंत क्रोध में होने के बाद भी दोनों के शरीर से एक अद्भुत आभा प्रकाशित हो रही थी. गोपाल जहाँ अत्यंत सुकुमार लग रहा था वहीँ सुचित्रा हद से अधिक चित्ताकर्षक एवं रूपवती लग रही थी.
दोनों ही इतने अच्छे लग रहे थे की यदि ये कोई और समय होता और देखने वाले साधारण जन होते तो अब तक गोपाल और सुचित्रा को देव-देवी या यक्ष-यक्षिणी मान कर उनकी पूजा – आराधना और जयजयकार शुरू कर दिए होते.
पाँचों एकाग्रचित्त हो कर अनुष्ठान में पूरा मन लगाते हुए गोपाल और सुचित्रा पर दृष्टि जमाए हुए थे.
जब उन पाँचों में से कोई कुछ न बोला तब सुचित्रा क्रोध से काँपती – हाँफती कुछ कदम आगे बढ़ी और खनकते; पर खतरनाक आवाज़ में बोली,
“ये क्या कर रहे हो तुम लोग..? कौन हो तुम? क्या चाहते हो?”
कोई कुछ नहीं बोला.
सुचित्रा ने दोबारा वही प्रश्न किया.
कोई कुछ न बोला.
पर बाबा जी ने एक बार उन दोनों की ओर देखा और आँखों से एक प्रकार का संकेत किया जिसके बाद गोपाल व सुचित्रा और प्रश्न न कर के चुपचाप वहीँ खड़े रहे.
अग्नि में थोड़ी धान को स्वाहा करते हुए बाबा जी ने उन दोनों को देखा और कहा,
“मैं कुछ बोलूँ इसके पहले ये बताओ की हमारे पहनावे से तुम्हें क्या लगता है... हम कौन हैं?”
“साधु – संन्यासी लग रहे हैं.” गोपाल ने उत्तर दिया.
“हाँ. वही हैं हम.”
“ऐसे इस अनुष्ठान का कारण?”
“ओह.. तो तुम्हें पता है की हम यहाँ अनुष्ठान कर रहे हैं..??”
“हाँ.. और ये जो हवन किया जा रहा है; ये भी कोई साधारण हवन नहीं है. अन्य हवनों से बहुत भिन्न है.” गोपाल ने उत्तर दिया.
“हम्म.. वाह! तुम तो बहुत जानते हो?” बाबा जी ने व्यंग्य किया.
गोपाल और सुचित्रा पर इस व्यंग्य का कोई असर नहीं हुआ.
सुचित्रा का क्रोध तो अभी भी शांत नहीं हुआ था. उसकी आँखें तो ऐसी लग रही थीं मानो बाबा जी को कच्चा ही चबा जाने को व्याकुल हो रही हो.
“हाँ. जानता हूँ. ये हवन हमें यहाँ बुलाने के लिए किया जा रहा है.”
“सिर्फ़ बुलाने के लिए?”
“अ...और भी कारण हो सकते हैं. उतना मुझे पता नहीं.” सुचित्रा ने चुपके से गोपाल का एक हाथ दबा दिया. गोपाल ने भी बात नहीं बढ़ाने का सोच कर जरा सा जवाब दिया.
“ठीक है. पर ये तो बताओ की ये हवन किसे बुलाने के लिए किया जा रहा है?”
“हमें बुलाने के लिए!”
“हमें..? किसे??”
“हमें.”
“तुम दोनों कौन हो?”
“आप नहीं जानते?”
“नहीं जानता. तुम ही बताओ.”
“हमें मतलब मुझे अर्थात् गोपाल को और इन्हें; सुचित्रा को.”
“पर हमने तो किसी ओर को यहाँ बुलाने के लिए ये हवन किया था..”
“ठीक से नहीं किया होगा तुमने.” विष घुला हुआ सा स्वर में बोली सुचित्रा अब... इतनी देर बाद. उसके हाव भाव और अब उसके स्वर से ये स्पष्ट हो गया कि इस तरह यहाँ बुलाए जाने को ले कर वो तनिक भी खुश नहीं थी.
“मेरे द्वारा किया हुआ कोई भी अनुष्ठान, यज्ञ, हवन इत्यादि कभी विफल नहीं होता..... (थोड़ा रुक कर).. बरखा!”
ये नाम सुनते ही गोपाल और सुचित्रा चिहुंक उठे. कदाचित इस तरह इस नाम का लिए जाने के बारे में उन दोनों ने कल्पना नहीं की थी.
“क्या हुआ? तुम दोनों के होश क्यों उड़ गए?”
“नहीं.. ऐसा तो कुछ नहीं हुआ.” गोपाल ने बात संभालने का प्रयास किया.
बाबा जी हँस पड़े.
बोले,
“अब हमें इतना भी मूर्ख मत समझो... शांतनु... कहने - दिखने के लिए तो तुम दोनों गोपाल और सुचित्रा हो परन्तु वास्तव में..... तुम दोनों शांतनु और बरखा हो जो इन दोनों बेचारे ग्रामवासी के शरीर को अपना घर बनाए हुए हो.”
इस रहस्योद्घाटन के बाद सुचित्रा अर्थात् बरखा का गुस्सा पलक झपकते ही फुर्र हो गया. गोपाल.. अर्थात् शांतनु भी एकदम से चुप हो गया.
“क्या हुआ...? अब कुछ नहीं कहना?” बाबा जी मुस्कराते हुए बोले.
“ आप क्या चाहते हैं?” कुछ सोच कर शांतनु ने पूछा.
“तुम दोनों के बारे में जानना चाहता हूँ.”
“आप नहीं जानते?”
“नहीं जानता.”
“लगता तो नहीं है.”
“हम्म..”
“ये ढोंग कर रहा है. इसका कोई और ही मतलब है. ये पाखंडी है.... .”सुचित्रा ने दांत भींचते हुए कहा.
उसकी बात सुन बाबा जी हँसते हुए बोले,
“सुनो बालिके... तुम्हारी दुःखद मृत्यु को हुए वर्षों बीत गए... किन्तु बुद्धि कदाचित किशोरावस्था पार कर अभी अभी नवयुवती होते एक किशोरी की भांति ही है. यदि मैं पाखंडी होता तो रात के इस समय अपने सहयोगियों के साथ इस प्रकार के अनुष्ठान करने का साहस नहीं करता... यदि मैं पाखंडी होता तो तुम दोनों शक्तिशाली आत्माओं को यहाँ बुला लाने योग्य शक्ति न रखता. संदेह करना तुम्हारा अधिकार हो सकता है परन्तु विवेक का प्रयोग उससे भी कहीं अधिक वांछनीय है.”
बरखा के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था. गुस्से में मुँह फेर ली.
गोपाल ने स्थिति को अपने हाथ में लेने का प्रयास किया,
“हमारी कहानी सुन कर आप क्या करेंगे?”
“तुम दोनों के विषय में कुछ तो जानता अवश्य हूँ किन्तु दूसरों के मुख से सुनी हुई बातों पर विश्वास नहीं करना चाहता. जिनकी ये कहानी है... मैं उन्हीं से सुनना चाहता हूँ. एक वाक्य में कहूँ तो मैं सत्य जानना चाहता हूँ.... और जान कर क्या करूँगा.. ये तो सब कुछ जान लेने के बाद ही कह पाऊंगा.”
गोपाल और सुचित्रा... यानि शांतनु और बरखा ने एक दूसरे को देखा... गोपाल ने सुचित्रा का हाथ पकड़ा और उसकी आँखों में कुछ क्षण देखता रहा. उन कुछ क्षणों में ऐसा लगा मानो समय जहाँ का तहाँ ठहर गया हो.
फिर बाबा जी की ओर मुड़ गया.
और एक बदले से आवाज़ में बोला,
“ठीक है... मैं सुनाता हूँ.”
“ठीक है. तुम ही शुरू करो.”
एक गहरी साँस ले कर शांतनु अपने बारे में कहना शुरू किया,
“जब से होश संभाला है माँ बाप की कोई खबर नहीं. बाप का भी कोई सगा नहीं था इसलिए नानी ने ही मुझे अपने साथ रखा. बचपन से ही पढ़ाई में मेरा मन नहीं लगता था.. स्कूल जाता अवश्य था पर पढ़ने नहीं; वहाँ आने वाले दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिए. स्कूल से आने के बाद भी दिन भर खेलता, धमा चौकड़ी करता था. हाँ, इस बात का बचपन से ही बड़ा ध्यान रखता था कि मेरे कारण मेरी नानी को कोई दिक्कत न हो कभी भी. नहाना भी अच्छा नहीं लगता था.. क्योंकि नहा लेने के बाद दोबारा खेल कूद कर गंदा होना अच्छा नहीं लगता था और बिना खेले कहीं भी एक पल के लिए शांति से बिल्कुल नहीं बैठता था. दिन इसी तरह मस्ती में बीतते जा रहे थे. समय बीतने के साथ साथ अब मैं बड़ा भी होने लगा था.
यही कोई दस - बारह साल का रहा होऊँगा कि एक बार गाँव में कुछ साधु – संन्यासी लोग आए. गाँव में आए ऐसे अपरिचितों की ओर ध्यान आकर्षित होना अस्वाभाविक नहीं था. प्रायः खेल से कुछ समय निकाल कर उन लोगों को देखने जाता था. कभी गाँव के ही ऐसे लोगों के साथ जो उन साधु – संन्यासी लोगों के लिए खाने पीने का सामान ले कर जाते तो कभी कभी मैं कहीं पेड़ पर चढ़ कर या झाड़ियों के पीछे से छुप कर उन साधु – संन्यासियों को देखता रहता था. रोज़ रोज़ उनको देखने रहने से मैं उनके खान पान, रहन सहन, दैनिक क्रियाकलाप को देख कर प्रभावित एवं उनकी ओर आकर्षित होता गया.
मैं उनके साथ मिलने लगा, बैठ कर बातें करने लगा.
धीरे धीरे मैं अधिक से अधिक समय उन लोगों के साथ बिताने लगा.
खेल छूटता गया...
पर अब मुझे कोई परवाह नहीं रहा अपने दोस्तों का, उनके साथ खेलने वाले खेलों का.
मैं तो बस सुबह शाम उन साधु – संन्यासियों के साथ ही बीताता रहता.
और एक दिन जब साधुओं को गाँव छोड़ कर कहीं ओर जाने का समय आया तो मैंने भी उन्हें अपने साथ ले चलने की हठ किया. वे नहीं माने. कहा की अभी मेरा समय नहीं हुआ है. मैं बहुत निराश हो गया. चूँकि इतने दिनों में मेरे प्रति उनका भी एक लगाव हो गया था इसलिए जाने से पहले उन लोगों ने मुझे ढेर सारा आशीर्वाद और फल इत्यादि दिए, और एक स्वस्थ और अच्छे जीवन की मंगलकामना की...
उन साधु – संन्यासियों के चले जाने के कई दिनों बाद तक भी मैं बहुत अधिक निराशा में रहा. सुबह शाम, उठते बैठते बस यही मनाता की बस एक बार फिर से वही साधु – संन्यासी लोग कुछ दिनों के लिए आ जाए.
मेरी ये इच्छा पूरी भी हुई... हुबहू तो नहीं... पर.....
कुछ समय और बीतने के बाद गाँव में एक और संन्यासी आया...
अकेला...
किन्तु ये वाला संन्यासी पहले वालों से भिन्न था...
इसके वस्त्र काले थे, माथे पर एक बड़ा सा काला तिलक, नशे में डूबे बड़े बड़े लाल नेत्र...
हमेशा अपने में ही मगन रहता था. गाँव वाले इनसे बातचीत करने का प्रयास करते पर ये संन्यासी अधिकांश समय चुप ही रहता.. सबसे बात नहीं करता था...
मेरा भोला मन उसकी ओर आकर्षित होने लगा और कुछेक भेंट के बाद मैं उसकी भी सेवा करने लगा. पीने के लिए घड़े में पानी भर देना, साधना के सभी सामानों को अच्छे उठा कर उनके नियत स्थान पर रखना, भोजन तैयार रखना, उनके सोते समय उनके पैरों को दबा देना, इत्यादि.
मेरे इस निष्काम सेवा से वो साधक बहुत ही प्रसन्न हुआ...
और एक दिन मुझसे ढेर सारी बातें की.. मैं कहाँ रहता, क्या करता हूँ, घर में कौन कौन हैं... सब कुछ जान लेने के बाद वो और भी कई तरह की बातें करने लगा जैसे की ये जीवन नश्वर है, सब कुछ क्षण भंगुर है, सारा संसार कितना रहस्यमयी एवं मायावी है, इत्यादि.
उस दिन के बाद से मैं और भी अधिक ज्ञान पाने की लालसा में उनकी और भी अधिक सेवा करने लगा.
बदले में वो साधक भी मुझे कुछ न कुछ सिखाया करता था.
वो जो कुछ भी जैसे जैसे सिखाता जाता; मैं बिल्कुल वैसे वैसे करता जाता था.
इसी तरह दिन बीतते गए.
मैं अब उस साधक का सहयोगी बन चुका था. उसके अधिकांश तंत्र विधियों को मैं स्वयं अपनी आँखों से सफल होता हुआ देख चुका था. समय लगा मुझे कुछ सीखने में पर समय बीतने के साथ साथ बहुत कुछ सच में सीख गया था.
इधर, अपनी गाँव की ही एक लड़की से प्यार हो गया था.
बरखा नाम था उसका. (कहते हुए उसने सुचित्रा / बरखा की ओर देखा.)
(थोड़ा रुक कर बोलना शुरू किया)
बरखा से प्रेम करना तो सरल था.. पर बरखा से प्रेम पाना नहीं.
क्योंकि वो थी एक धनी संपन्न घर की बेटी और मैं.... मेरा तो यदि सुबह का खाना हो जाए तो दोपहर का पता नहीं होता और यदि दोपहर का हो जाए तो रात में क्या होगा उसका पता नहीं होता था.
बरखा को जब से देखा था तब से इतना अधिक खोया खोया सा रहने लगा था कि अपने दैनिक कार्यों को पूरे निष्ठा से पूर्ण कर पाना दिन ब दिन कठिन होता जा रहा था.
रात दिन अपने और बरखा के साथ के सपने देखता रहता था.
अपने सेवा में त्रुटि पाता देख उस साधक को भी अटपटा सा लगा.
सो एक दिन उन्होंने मुझसे मेरे भटकाव का कारण पूछ लिया. मैं अपने मन के भावों को छुपाता अवश्य था परन्तु यदि पकड़ा जाऊं तो सत्य बताने से पीछे नहीं हटता था.
सो मैंने सब कुछ सच सच उस साधक को; जो अब मेरे गुरु थे.. उनको बता दिया... बरखा मुझे मिल नहीं सकती और बरखा के बिना मैं जी नहीं पाता.. इसलिए मैं गुरु जी से हठ करने लगा की कोई उपाय कर के मेरे लिए बरखा के मन में प्रेम लाया जाए. पहले तो गुरु जी ने स्पष्ट शब्दों में मना कर दिया. कह दिया कि ये उचित नहीं है. ऐसे ही किसी के मन में प्रेम नहीं लाया जा सकता है. और यदि लाया भी गया तो ये बहुत बड़ा धोखा होगा.
किन्तु मैं कहाँ मानने वाला था.
मैंने भी प्रण कर लिया की यदि गुरु जी कोई उपाय नहीं कर देंगे तो मैं अपने प्राण दे दूँगा... आत्महत्या कर लूँगा.
गुरु जी से रहा नहीं गया... मेरी बात मान गए. एक रात शुभ घड़ी देख कर उन्होंने सम्मोहिनी विद्या का प्रयोग किया. कहा, जब तक मैं चाहूँगा ये विद्या तब तक बरखा पर अपना प्रभाव जमाए रखेगी. ये कह कर उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया.
अगले दिन सुबह से ही मुझे चमत्कार दिखा. बाजार में खरीददारी करते समय बरखा से टकरा गया.
मैंने देखा की वो मुझे मुस्कराते हुए देख रही थी. मैं समझ गया... अब बरखा भी मुझे चाहने लगी है.
और फिर हमारा रोज़ का मिलना शुरू हुआ. घंटों समय साथ बिताया करते थे हम. उससे मिलने के लिए मैं अपने गुरु से अनुमति भी ले लिया करता था.
घोर अँधेरी रात....
हाथ को हाथ न सूझे...
घोर निस्तब्धता...
साथ चलते सह यात्री का आहट तो सुनाई दे पर स्वयं वो सह-यात्री ही दिखाई न दे...
तारे भी कुछ इस तरह टिमटिमा रहे थे मानो एक हल्के से संकेत की प्रतीक्षा कर रहे हों; संकेत का ‘स’ हुआ नहीं की तुरंत कहीं छुप जाए सारे के सारे.
रात्रि के इस भयावहता को बढ़ाने में सहायता के लिए रह रह कर पेड़ों से उल्लूओं के बोल और विभिन्न कीड़ों के बजबजाते स्वर चारों ओर से सुनाई दे रहे थे.
कुछ रात्रि अपने साथ ऐसे स्याहपन ले कर आते हैं जिसे साधारण जन सोचना तक पसंद नहीं करते हैं.
ऐसी ही एक रात्रि होती है अमावस्या की.
एक ऐसी रात्रि जिसके विषय में लोग व समाज न तो बातें करना पसंद करते हैं और न ही इसके बारे में ज्यादा कुछ जानते हैं. निःसंदेह ऐसे विषयों पर स्वयं की जानकारी से कहीं अधिक वर्षों से चली आ रही सुनी सुनाई बातों पर साधारण जन को अधिक विश्वास होता है.. और यदि सुनी सुनाई बातें केवल सुनने में ही हद से अधिक भयावह हो तो फ़िर आम लोगों का क्या दृष्टिकोण हो सकता है ये तो अपने आप में ही जगजाहिर हैं.
ऐसी ही रात्रियों में कुछ विरले रात्रि ऐसी भी होती है जोकि शुरू होते ही अपने साथ कई प्रकार की विशेषताएँ ले आती हैं.
विशेषताएँ इसलिए क्योंकि ये स्वयं ही होती हैं इस रात्रि की और इस रात्रि से संबंध रखने वालों की... इस तरह की रात्रियों की प्रतीक्षा करने वालों की... उन प्रतीक्षारत लोगों की भी जो
गाँव की यदि बात की जाए तो यहाँ के लोग तो बहुत समय पहले से ही शीघ्र सो जाने के आदि थे पर अब जो पिछले कुछ समय से गाँव में जिस प्रकार की घटनाएँ हो रही हैं; उस कारण संध्या काल में ही दुकान बढ़ा कर (बंद कर) सब के सब सात से साढ़े सात बजे तक अपने अपने घरों में घुस जाते हैं.
और जिस दिन अमावस्या हो.. उसपे भी ऐसी विशेष तिथि, ग्रह – नक्षत्र वाली अमावस्या... उस दिन तो सुबह से ही लोगों के मन मस्तिष्क में एक अलग ही आतंक होना तो बहुत सामान्य सी बात है.
आज ऐसी ही एक रात्रि है.
आठ बजते बजते ही सब खा पी कर सो गए.
पूरे गाँव में सन्नाटा पसर गया.
रात्रि के इसी भयावह वाले पलों में गाँव से निकल कर उससे सटे वन की ओर पाँच जोड़ी पैर तेज़ी और सावधानी से बढ़े जा रहे थे.
तीन तो अपने ही बाबा जी और उनके दो शिष्य चांदू और हरि हैं.. और बाकी दो बाबा जी के वरिष्ठ सहयोगी हैं जो आज ही के दिन बाहर से आए थे. ये दोनों भी कई प्रकार की सिद्धियाँ रखते हैं जोकि आज की रात काफ़ी काम देने वाली है.
आज की रात एक ऐसे काम के लिए... एक ऐसी प्रक्रिया के लिए... जिसकी भयावहता का न तो कोई सिमा है और न ही कोई अनुमान.
सभी के कदम तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं.
एक निर्दिष्ट स्थान के लिए.
सभी के चेहरे दृढ़ संकल्पता का साक्ष्य लिए थे.
सबसे आगे हरि और चांदू हाथों में मशाल लिए चल रहे थे.
बीच में बाबा जी मंत्रजाप करते हुए चल रहे थे और पीछे पूरी सतर्कता के साथ मंत्रजाप करते हुए हाथ में मशाल थामे कदम बढ़ाए जा रहे थे बाबा जी के दोनों नए सहयोगी.
ये एक संकरा सा रास्ता था! दोनों तरफ नागफनी ने विकराल रूप धारण कर रखा था, लेकिन उसके खिलते हुए लाल और पीले फूलों ने उसकी कर्कशता को भी हर लिया था! बहुत सुंदर फूल थे, बड़े बड़े! अमरबेल आदि ने पेड़ों पर अपनी सत्ता कायम कर रखी थी! मकड़ियों ने भी अपने स्वर्ग को क्या खूब सजाया था अपने जालों से! ऊंचाई पर लगे बड़े बड़े जाले!
शीघ्र ही वे पाँचों एक संकरा सा पथ से होते हुए उस निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच गए. हालाँकि उस पथ को पार करने में भी बहुत कठिनाई आई. दोनों ओर से नागफनियों ने विकराल रूप धारण कर रखा था.. आवागमन के मार्ग पर झुक आए दोनों ओर से कई पेड़ों के टहनियों से बचते बचाते, जंगली बड़ी बड़ी मकड़ियों के सुंदर व विशाल जालों से स्वयं को दूर रखते हुए सब आगे बढ़ते गए.
आगे... ठीक उसी स्थान पर पहुँचे सब के सब जहाँ उन्हें पहुँचना था.
एक विशाल पेड़.. डाल, टहनियाँ उसकी दूर दूर तक फैली हुईं हैं. पत्तों के आकार भी एक सामान्य मनुष्य के हथेली से भी बड़े.
पेड़ के जात को जान पाना रात के इस अँधेरे में, भले ही हाथों में जलते मशालें हों; दुष्कर कार्य प्रतीत हो रहा था. वैसे भी अभी इस पेड़ के सामने पहुँचे ये पाँच आगंतुक इस पेड़ के जात - प्रजाति, प्रकार, इत्यादि जानने के इच्छुक तो बिल्कुल नहीं थे.
कुछ सफ़ेद फूल भी निकले थे वहाँ, जो निश्चय ही दिन के उजाले में एक अलग ही खूबसूरती दिखा रहे होते!
सभी ने बहुत अच्छे से उस वातावरण को देखते समझते हुए मन ही मन उसका एक बढ़िया अवलोकन व आंकलन किया. आसपास कुछ दूरी पर कई तरह के वृक्षों के जमावड़े थे. जैसे की, आम, पपीते, अमरुद, बेल, बेर, आंवले, बरगद इत्यादि सभी थे वहाँ. मशालों से उठती लपटों में नज़र आती बरगद और बेलों ने क्या खूब यौवन धारण किया था!
अद्भुत!
बाबा जी ने मन ही मन वहाँ के वातावरण की प्रशंसा करते हुए अपने सामने सर उठा कर तन कर खड़े उस पेड़ को देखते हुए सोचा,
‘यदि इस पेड़ के साथ वो दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना न जुड़ी होती तो कदाचित प्रायः दिन के उजाले में गाँव के बच्चे, बूढ़े और महिलाएँ अवश्य ही इस स्थान पर आ कर हर्षित – आनंदित होते.
इस घोर अन्धकार रात्रि में, मशालों से होती रौशनी में यदि ये पूरा परिदृश्य इतना सुंदर लग सकता है तो फिर सूर्यदेवता की रेश्मी किरणों की उपस्थिति में कैसा दिखता होगा.’
“गुरूदेव... अब??”
साथ आए नए सहयोगी में से एक ने दबे स्वर में पूछा.
परिदृश्य में खोए बाबा जी की तंद्रा टूटी..
आगे बढ़ कर अच्छे से एकबार फिर पूरे स्थान को देखा.
ऊँगलियों पर कुछ गणना की...
उसी निर्दिष्ट पेड़ के सामने पहुँचे.
फिर चारों दिशाओं की ओर मुँह करके कुछ क्षणों तक हाथ जोड़ कर मंत्रपाठ करते हुए प्रार्थना करते रहे.
उसके बाद चांदू की ओर देख कर एक संकेत दिया...
चांदू शीघ्रता दिखाते हुए अपने कंधे पर लटकते झोले में से एक मुड़ा हुआ कपड़ा निकाला और उस कपड़े के अंदर रखे एक आसन को निकाल कर बाबा जी की ओर बढ़ा.
बाबा जी ने हरि को भी एक संकेत किया.
हरि उनके पास पहुँचा.
बाबा जी ने शांत ढंग से पूछा,
“सुबह यहीं इसी स्थान को साफ़ किया था ना?”
हरि ने हाँ में सिर हिलाया.
बाबा जी ने उसे एकबार और उस स्थान को झाड़ देने का आदेश दिया.
हरि ने तुरंत उन मशालों की रौशनी में बाबा जी के दिखाए उस स्थान को ऊपर – ऊपर से हल्के से साफ़ किया.
तत्पश्चात बाबा ने उस स्थान पर चांदू से आसन ले कर बिछा दिया और एक कमंडल में से हथेली में जल ले कर उस आसन से तीन फीट की दूरी माप कर आसन के चारों ओर एक गोल घेरा बनाते हुए मंत्रजाप करते हुए जल डाला.
कुछ क्षण हाथ जोड़ कर प्रार्थना किया और फिर बैठ गए आसन पर.
कुछ क्षण और उन्होंने मंत्रजाप किया.
इतना कर के उन्होंने अपने शिष्यों की ओर देखा.
दोनों शिष्य जल्दी जल्दी बाबा जी के पूर्व निर्देशानुसार अपने साथ लाए झोलों में से भिन्न भिन्न प्रकार के तंत्र – मंत्र – यंत्र के सभी सामान निकाल निकाल कर रखने व सजाने लगे.
एक सीधी, आमने सामने की तेज़ टक्कर के लिए ये बहुत आवश्यक होता है कि आप अपनी पूरी तैयारी के साथ हों. इसलिए बाबा जी भी पूरी सजगता के साथ अपने शिष्यों द्वारा की जा रही तैयारी पर एक तीक्ष्ण दृष्टि जमाए हुए थे.
ये तैयारी थी एक गूढ़ अनुष्ठान के लिए... जो दैवीय भी होगा और घातक भी.
अनुष्ठान का शुभ मुहूर्त अब से कुछ देर बाद शुरू होने वाला था.
दोनों नए सहयोगियों ने बाबा जी की ही तरह जल से गोल घेरा बना कर अपने अपने लिए आसन बिछाए और उसपे बैठते ही मंत्रजाप प्रारंभ कर दिया.
दोनों शिष्यों ने भी प्राण रक्षा कवच का स्तोत्र पाठ करते हुए बाबा जी के स्थान से थोड़ा पीछे अपने लिए आसन बिछा कर उसपे बैठ गए. मशालों को पहले ही साथ लाए चार बांस के साथ बाँध कर उन्हें चार कोनों पर गड्ढे खोद कर गाड़ दिए गए थे.
दो लालटेनों को भी हल्के आंच पर जलता रख दिया था हरि ने.
कुछ ही देर में वहाँ उस स्थान पर, उस वातावरण में केवल उन पाँचों के मुख से एक लय में निकलते मंत्रोच्चारण ही गूँज रहे थे... धीमे आवाज़ में.
कुछ समय ऐसे ही बीता.
मंत्रोच्चारण के स्वर धीरे धीरे अपनी गति पकड़ते हुए अब तक थोड़ी तेज़ हो चुकी बहती हवा के कारण उस निर्जन वातावरण में गूँजते हुए दूर दूर तक फैलने लगे.
कुछ समय बीतने के पश्चात हरि और चांदू ने मंत्रोच्चारण के साथ साथ अपने साथ लाए एक विशेष कटोरे नुमा पीतल मिश्रित किसी अन्य धातु से बने उस बर्तन को वाद्ययंत्र की भांति बजाने लगे.
समय बीतने के साथ साथ मंत्रोच्चारण और वाद्ययंत्रों से निकलने वाली ध्वनियाँ तेज़ होती हवा के साथ दूर का सफ़र तय करते हुए नदी के तट तक पहुँच गए.
ध्वनियों का नदी के लहरों से टकराते ही एक भिन्न हलचल होने लगी उनमें; विशेष कर नदी के दक्षिणी दिशा में. कुछ ऐसा मानो कोई सोया हुआ अपने आसपास होती गतिविधियों के कारण धीरे धीरे नींद से जाग रहा हो.
बाबा जी, उनके शिष्यों और सहयोगियों के मंत्रपाठ में भी शनैः शनैः तीक्ष्णता बढ़ती जा रही थी. हर मंत्र का हरेक शब्द... यहाँ तक की उन शब्दों में प्रयुक्त होने वाले मात्रा तक थोड़ा थोड़ा करके एक भीषण अलौकिक व दैवीय ऊर्जा को जन्म दे रही थी.
नदी के लहरों में हलचल बढ़ने के साथ साथ बाबा जी के सामने स्थित पेड़ में भी; विशेष कर उसके पत्तियों में हलचल होने लगी. सूखी पत्तियाँ एक एक कर के नीचे गिरने लगीं.
मानो रात्रि के इस पहर में गहरी निद्रा में अब तक सोया हुआ वह पेड़ भी अंगड़ाईयाँ लेते हुए जाग रहा हो... और सूखी पत्तियाँ अंदर होते इसी करवट के परिणामस्वरूप डालियों से अलग हो कर नीचे गिर रही हैं.
बीच बीच में एक अजीब सी हल्की... दबी सी आवाज़ आ रही थी दूर कहीं से... हवाओं के साथ बहते हुए...
आवाज़ केवल बाबा जी की ही कानों से टकराई...
प्रश्न स्वयमेव ही कौंधा उनके मन में,
‘अरे... एक आवाज़ आ रही है न?! ये आवाज़.... किसकी....’
प्रश्न उनका पूरा होने से पहले ही दोबारा सुनाई दी वही आवाज़...
‘अरे... ये तो.... नहीं.. नहीं.... ये एक नहीं... वरन दो आवाजें हैं..!!’
बाबा जी ने अपना पूरा ध्यान केन्द्रित किया उस आवाज़ पर...
ऐसा करते ही अगले ही क्षण चौंक उठे;
क्योंकि आवाज़ एक नहीं.... वाकई दो आवाजें थीं... एक मर्दाना.. दूसरा जनाना..
मर्द दुःख, तड़प और पीड़ा की मार से मानो रो रहा हो... और.. जनाना; असीम आनंद की हँसी हँस रही हो... परन्तु इस जनाना की आवाज़ बहुत ही भिन्न है... अलग हट कर... बात क्या है...
‘कौन हो सकते हैं इन दो आवाजों के स्वामी?’
मन मस्तिष्क में चिंता लिए बाबा जी ने अपना कार्य जारी रखा...
और इधर,
लगभग एक साथ ही, अपने अपने घरों में, अपने अपने कमरों में गहरी नींद सोए गोपाल और सुचित्रा की आँखें एक साथ खुल गयीं.....
यदि कोई उस समय इनके पास खड़ा इन्हें देख रहा होता तो शायद इनके आँखें खुलते ही डर से मर गया होता.
क्योंकि दोनों की ही आँखों की पुतलियों के रंग एकदम से बदले हुए थे!
गोपाल की पुतलियाँ हल्की पीली – लाल मिश्रित रंग की जबकि सुचित्रा की हल्की नीली मिश्रित हरी...!
एक झटके से सुचित्रा अपने बिस्तर पर उठ बैठी...
आँखें घोर आश्चर्य से बड़ी बड़ी और गोल हो गयी थी... उसने पलट कर बगल में सोए अपने पति की ओर देखी...
रंजन बाबू घोड़े बेच कर सोने में व्यस्त थे..
सुचित्रा अपनी उन्हीं जलती आँखों से रंजन बाबू को देखती हुई उन्हें बिना छूए उनके सिर के ऊपर एक बार हाथ फिराई और फ़िर बिस्तर से उठ कर अपने कमरे से बाहर निकल गयी.....
उधर गोपाल भी अपने बिस्तर से उठ चुका था..
दरअसल गोपाल और सुचित्रा दोनों ही अपने घरों से निकल गए थे..
दोनों जैसे किसी एक जगह जल्द से जल्द पहुँचना चाह रहे थे.. दोनों के ही चेहरे और आँखों में चिंता व परेशानी साफ झलक रही थी..
पर यहाँ सबसे आश्चर्य वाली बात जो थी वो यह कि गोपाल और सुचित्रा; दोनों के ही पैर ज़मीन को नहीं छू रहे थे ! दोनों के ही शरीर धरती से कुछ इंच ऊपर हवा में थे और मानो इसी तरह हवा में ही उड़ते हुए अपने अपने गंतव्य की ओर बढ़े जा रहे थे.
कुछ क्षणों में ही जिस मार्ग से वे दोनों अपने अपने गंतव्य की ओर अग्रसर थे; वो मार्ग और उनका गंतव्य... दोनों स्पष्ट हो गए.
वे दोनों गाँव की एक संकरी जंगली पगडंडी से होते हुए उसी वन की ओर बढ़े जा रहे थे जहाँ इस समय बाबा जी अपने सहयोगियों व शिष्यों के साथ एक गुप्त अनुष्ठान में रत थे.
दरअसल अब तक बाबा जी ने एक हवन आरम्भ कर दिया था... उस हवन से उठती ज्वाला और उन पाँचों के मुख से निकलते मंत्रोच्चारण क्षण प्रतिक्षण आक्रामक से होते जा रहे थे.
विशेष कर बाबा जी तो बहुत ही दृढ़ संकल्पित लग रहे थे. उनके हरेक मंत्र पाठ से आस पास उपस्थित निर्जीव पदार्थ तक में कंपन सी हो रही थी.
अग्नि की लपटें तक बाबा जी के मुख से निकलने वाले हरेक मन्त्र व उनके लय, छंद, ताल पर थिरकन कर रही थीं.
ये क्रम अभी अनवरत चल ही रहा था कि तभी एक साथ गोपाल और सुचित्रा हवा में उसी तरह रहते हुए वहाँ पहुँच गए.
पहले तो दोनों ने एक दूसरे को आश्चर्य से देखा.. आँखों ही आँखों में बात हुई और फिर गुस्से से काँपते हुए दोनों ने उन पाँच साधकों की ओर देखा.
दोनों के बदली नेत्रों और बदले रूप को देख कर हरि और चांदू भयभीत तो अवश्य हुए पर बाबा जी पर उनका अगाध विश्वास था... इसलिए निर्भय हो कर अपने मन्त्र जाप में रमे रहे और वाद्य यंत्र बजाते रहे.
गोपाल और सुचित्रा को वहाँ आया देख कर बाबा जी को भी कुछ क्षणों के लिए अचरज अवश्य हुआ पर तब तक उनकी ज्ञानेन्द्रियाँ इतनी अधिक प्रबल रूप से सक्रिय हो चुकी थीं कि उन्हें समझते देर न लगी की ये दोनों वास्तव में शांतनु और बरखा हैं.... गोपाल और सुचित्रा के शरीर में... गोपाल और सुचित्रा; जो इसी ग्राम के ग्रामवासी हैं.
सब ने गौर किया की अत्यंत क्रोध में होने के बाद भी दोनों के शरीर से एक अद्भुत आभा प्रकाशित हो रही थी. गोपाल जहाँ अत्यंत सुकुमार लग रहा था वहीँ सुचित्रा हद से अधिक चित्ताकर्षक एवं रूपवती लग रही थी.
दोनों ही इतने अच्छे लग रहे थे की यदि ये कोई और समय होता और देखने वाले साधारण जन होते तो अब तक गोपाल और सुचित्रा को देव-देवी या यक्ष-यक्षिणी मान कर उनकी पूजा – आराधना और जयजयकार शुरू कर दिए होते.
पाँचों एकाग्रचित्त हो कर अनुष्ठान में पूरा मन लगाते हुए गोपाल और सुचित्रा पर दृष्टि जमाए हुए थे.
जब उन पाँचों में से कोई कुछ न बोला तब सुचित्रा क्रोध से काँपती – हाँफती कुछ कदम आगे बढ़ी और खनकते; पर खतरनाक आवाज़ में बोली,
“ये क्या कर रहे हो तुम लोग..? कौन हो तुम? क्या चाहते हो?”
कोई कुछ नहीं बोला.
सुचित्रा ने दोबारा वही प्रश्न किया.
कोई कुछ न बोला.
पर बाबा जी ने एक बार उन दोनों की ओर देखा और आँखों से एक प्रकार का संकेत किया जिसके बाद गोपाल व सुचित्रा और प्रश्न न कर के चुपचाप वहीँ खड़े रहे.
अग्नि में थोड़ी धान को स्वाहा करते हुए बाबा जी ने उन दोनों को देखा और कहा,
“मैं कुछ बोलूँ इसके पहले ये बताओ की हमारे पहनावे से तुम्हें क्या लगता है... हम कौन हैं?”
“साधु – संन्यासी लग रहे हैं.” गोपाल ने उत्तर दिया.
“हाँ. वही हैं हम.”
“ऐसे इस अनुष्ठान का कारण?”
“ओह.. तो तुम्हें पता है की हम यहाँ अनुष्ठान कर रहे हैं..??”
“हाँ.. और ये जो हवन किया जा रहा है; ये भी कोई साधारण हवन नहीं है. अन्य हवनों से बहुत भिन्न है.” गोपाल ने उत्तर दिया.
“हम्म.. वाह! तुम तो बहुत जानते हो?” बाबा जी ने व्यंग्य किया.
गोपाल और सुचित्रा पर इस व्यंग्य का कोई असर नहीं हुआ.
सुचित्रा का क्रोध तो अभी भी शांत नहीं हुआ था. उसकी आँखें तो ऐसी लग रही थीं मानो बाबा जी को कच्चा ही चबा जाने को व्याकुल हो रही हो.
“हाँ. जानता हूँ. ये हवन हमें यहाँ बुलाने के लिए किया जा रहा है.”
“सिर्फ़ बुलाने के लिए?”
“अ...और भी कारण हो सकते हैं. उतना मुझे पता नहीं.” सुचित्रा ने चुपके से गोपाल का एक हाथ दबा दिया. गोपाल ने भी बात नहीं बढ़ाने का सोच कर जरा सा जवाब दिया.
“ठीक है. पर ये तो बताओ की ये हवन किसे बुलाने के लिए किया जा रहा है?”
“हमें बुलाने के लिए!”
“हमें..? किसे??”
“हमें.”
“तुम दोनों कौन हो?”
“आप नहीं जानते?”
“नहीं जानता. तुम ही बताओ.”
“हमें मतलब मुझे अर्थात् गोपाल को और इन्हें; सुचित्रा को.”
“पर हमने तो किसी ओर को यहाँ बुलाने के लिए ये हवन किया था..”
“ठीक से नहीं किया होगा तुमने.” विष घुला हुआ सा स्वर में बोली सुचित्रा अब... इतनी देर बाद. उसके हाव भाव और अब उसके स्वर से ये स्पष्ट हो गया कि इस तरह यहाँ बुलाए जाने को ले कर वो तनिक भी खुश नहीं थी.
“मेरे द्वारा किया हुआ कोई भी अनुष्ठान, यज्ञ, हवन इत्यादि कभी विफल नहीं होता..... (थोड़ा रुक कर).. बरखा!”
ये नाम सुनते ही गोपाल और सुचित्रा चिहुंक उठे. कदाचित इस तरह इस नाम का लिए जाने के बारे में उन दोनों ने कल्पना नहीं की थी.
“क्या हुआ? तुम दोनों के होश क्यों उड़ गए?”
“नहीं.. ऐसा तो कुछ नहीं हुआ.” गोपाल ने बात संभालने का प्रयास किया.
बाबा जी हँस पड़े.
बोले,
“अब हमें इतना भी मूर्ख मत समझो... शांतनु... कहने - दिखने के लिए तो तुम दोनों गोपाल और सुचित्रा हो परन्तु वास्तव में..... तुम दोनों शांतनु और बरखा हो जो इन दोनों बेचारे ग्रामवासी के शरीर को अपना घर बनाए हुए हो.”
इस रहस्योद्घाटन के बाद सुचित्रा अर्थात् बरखा का गुस्सा पलक झपकते ही फुर्र हो गया. गोपाल.. अर्थात् शांतनु भी एकदम से चुप हो गया.
“क्या हुआ...? अब कुछ नहीं कहना?” बाबा जी मुस्कराते हुए बोले.
“ आप क्या चाहते हैं?” कुछ सोच कर शांतनु ने पूछा.
“तुम दोनों के बारे में जानना चाहता हूँ.”
“आप नहीं जानते?”
“नहीं जानता.”
“लगता तो नहीं है.”
“हम्म..”
“ये ढोंग कर रहा है. इसका कोई और ही मतलब है. ये पाखंडी है.... .”सुचित्रा ने दांत भींचते हुए कहा.
उसकी बात सुन बाबा जी हँसते हुए बोले,
“सुनो बालिके... तुम्हारी दुःखद मृत्यु को हुए वर्षों बीत गए... किन्तु बुद्धि कदाचित किशोरावस्था पार कर अभी अभी नवयुवती होते एक किशोरी की भांति ही है. यदि मैं पाखंडी होता तो रात के इस समय अपने सहयोगियों के साथ इस प्रकार के अनुष्ठान करने का साहस नहीं करता... यदि मैं पाखंडी होता तो तुम दोनों शक्तिशाली आत्माओं को यहाँ बुला लाने योग्य शक्ति न रखता. संदेह करना तुम्हारा अधिकार हो सकता है परन्तु विवेक का प्रयोग उससे भी कहीं अधिक वांछनीय है.”
बरखा के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था. गुस्से में मुँह फेर ली.
गोपाल ने स्थिति को अपने हाथ में लेने का प्रयास किया,
“हमारी कहानी सुन कर आप क्या करेंगे?”
“तुम दोनों के विषय में कुछ तो जानता अवश्य हूँ किन्तु दूसरों के मुख से सुनी हुई बातों पर विश्वास नहीं करना चाहता. जिनकी ये कहानी है... मैं उन्हीं से सुनना चाहता हूँ. एक वाक्य में कहूँ तो मैं सत्य जानना चाहता हूँ.... और जान कर क्या करूँगा.. ये तो सब कुछ जान लेने के बाद ही कह पाऊंगा.”
गोपाल और सुचित्रा... यानि शांतनु और बरखा ने एक दूसरे को देखा... गोपाल ने सुचित्रा का हाथ पकड़ा और उसकी आँखों में कुछ क्षण देखता रहा. उन कुछ क्षणों में ऐसा लगा मानो समय जहाँ का तहाँ ठहर गया हो.
फिर बाबा जी की ओर मुड़ गया.
और एक बदले से आवाज़ में बोला,
“ठीक है... मैं सुनाता हूँ.”
“ठीक है. तुम ही शुरू करो.”
एक गहरी साँस ले कर शांतनु अपने बारे में कहना शुरू किया,
“जब से होश संभाला है माँ बाप की कोई खबर नहीं. बाप का भी कोई सगा नहीं था इसलिए नानी ने ही मुझे अपने साथ रखा. बचपन से ही पढ़ाई में मेरा मन नहीं लगता था.. स्कूल जाता अवश्य था पर पढ़ने नहीं; वहाँ आने वाले दूसरे बच्चों के साथ खेलने के लिए. स्कूल से आने के बाद भी दिन भर खेलता, धमा चौकड़ी करता था. हाँ, इस बात का बचपन से ही बड़ा ध्यान रखता था कि मेरे कारण मेरी नानी को कोई दिक्कत न हो कभी भी. नहाना भी अच्छा नहीं लगता था.. क्योंकि नहा लेने के बाद दोबारा खेल कूद कर गंदा होना अच्छा नहीं लगता था और बिना खेले कहीं भी एक पल के लिए शांति से बिल्कुल नहीं बैठता था. दिन इसी तरह मस्ती में बीतते जा रहे थे. समय बीतने के साथ साथ अब मैं बड़ा भी होने लगा था.
यही कोई दस - बारह साल का रहा होऊँगा कि एक बार गाँव में कुछ साधु – संन्यासी लोग आए. गाँव में आए ऐसे अपरिचितों की ओर ध्यान आकर्षित होना अस्वाभाविक नहीं था. प्रायः खेल से कुछ समय निकाल कर उन लोगों को देखने जाता था. कभी गाँव के ही ऐसे लोगों के साथ जो उन साधु – संन्यासी लोगों के लिए खाने पीने का सामान ले कर जाते तो कभी कभी मैं कहीं पेड़ पर चढ़ कर या झाड़ियों के पीछे से छुप कर उन साधु – संन्यासियों को देखता रहता था. रोज़ रोज़ उनको देखने रहने से मैं उनके खान पान, रहन सहन, दैनिक क्रियाकलाप को देख कर प्रभावित एवं उनकी ओर आकर्षित होता गया.
मैं उनके साथ मिलने लगा, बैठ कर बातें करने लगा.
धीरे धीरे मैं अधिक से अधिक समय उन लोगों के साथ बिताने लगा.
खेल छूटता गया...
पर अब मुझे कोई परवाह नहीं रहा अपने दोस्तों का, उनके साथ खेलने वाले खेलों का.
मैं तो बस सुबह शाम उन साधु – संन्यासियों के साथ ही बीताता रहता.
और एक दिन जब साधुओं को गाँव छोड़ कर कहीं ओर जाने का समय आया तो मैंने भी उन्हें अपने साथ ले चलने की हठ किया. वे नहीं माने. कहा की अभी मेरा समय नहीं हुआ है. मैं बहुत निराश हो गया. चूँकि इतने दिनों में मेरे प्रति उनका भी एक लगाव हो गया था इसलिए जाने से पहले उन लोगों ने मुझे ढेर सारा आशीर्वाद और फल इत्यादि दिए, और एक स्वस्थ और अच्छे जीवन की मंगलकामना की...
उन साधु – संन्यासियों के चले जाने के कई दिनों बाद तक भी मैं बहुत अधिक निराशा में रहा. सुबह शाम, उठते बैठते बस यही मनाता की बस एक बार फिर से वही साधु – संन्यासी लोग कुछ दिनों के लिए आ जाए.
मेरी ये इच्छा पूरी भी हुई... हुबहू तो नहीं... पर.....
कुछ समय और बीतने के बाद गाँव में एक और संन्यासी आया...
अकेला...
किन्तु ये वाला संन्यासी पहले वालों से भिन्न था...
इसके वस्त्र काले थे, माथे पर एक बड़ा सा काला तिलक, नशे में डूबे बड़े बड़े लाल नेत्र...
हमेशा अपने में ही मगन रहता था. गाँव वाले इनसे बातचीत करने का प्रयास करते पर ये संन्यासी अधिकांश समय चुप ही रहता.. सबसे बात नहीं करता था...
मेरा भोला मन उसकी ओर आकर्षित होने लगा और कुछेक भेंट के बाद मैं उसकी भी सेवा करने लगा. पीने के लिए घड़े में पानी भर देना, साधना के सभी सामानों को अच्छे उठा कर उनके नियत स्थान पर रखना, भोजन तैयार रखना, उनके सोते समय उनके पैरों को दबा देना, इत्यादि.
मेरे इस निष्काम सेवा से वो साधक बहुत ही प्रसन्न हुआ...
और एक दिन मुझसे ढेर सारी बातें की.. मैं कहाँ रहता, क्या करता हूँ, घर में कौन कौन हैं... सब कुछ जान लेने के बाद वो और भी कई तरह की बातें करने लगा जैसे की ये जीवन नश्वर है, सब कुछ क्षण भंगुर है, सारा संसार कितना रहस्यमयी एवं मायावी है, इत्यादि.
उस दिन के बाद से मैं और भी अधिक ज्ञान पाने की लालसा में उनकी और भी अधिक सेवा करने लगा.
बदले में वो साधक भी मुझे कुछ न कुछ सिखाया करता था.
वो जो कुछ भी जैसे जैसे सिखाता जाता; मैं बिल्कुल वैसे वैसे करता जाता था.
इसी तरह दिन बीतते गए.
मैं अब उस साधक का सहयोगी बन चुका था. उसके अधिकांश तंत्र विधियों को मैं स्वयं अपनी आँखों से सफल होता हुआ देख चुका था. समय लगा मुझे कुछ सीखने में पर समय बीतने के साथ साथ बहुत कुछ सच में सीख गया था.
इधर, अपनी गाँव की ही एक लड़की से प्यार हो गया था.
बरखा नाम था उसका. (कहते हुए उसने सुचित्रा / बरखा की ओर देखा.)
(थोड़ा रुक कर बोलना शुरू किया)
बरखा से प्रेम करना तो सरल था.. पर बरखा से प्रेम पाना नहीं.
क्योंकि वो थी एक धनी संपन्न घर की बेटी और मैं.... मेरा तो यदि सुबह का खाना हो जाए तो दोपहर का पता नहीं होता और यदि दोपहर का हो जाए तो रात में क्या होगा उसका पता नहीं होता था.
बरखा को जब से देखा था तब से इतना अधिक खोया खोया सा रहने लगा था कि अपने दैनिक कार्यों को पूरे निष्ठा से पूर्ण कर पाना दिन ब दिन कठिन होता जा रहा था.
रात दिन अपने और बरखा के साथ के सपने देखता रहता था.
अपने सेवा में त्रुटि पाता देख उस साधक को भी अटपटा सा लगा.
सो एक दिन उन्होंने मुझसे मेरे भटकाव का कारण पूछ लिया. मैं अपने मन के भावों को छुपाता अवश्य था परन्तु यदि पकड़ा जाऊं तो सत्य बताने से पीछे नहीं हटता था.
सो मैंने सब कुछ सच सच उस साधक को; जो अब मेरे गुरु थे.. उनको बता दिया... बरखा मुझे मिल नहीं सकती और बरखा के बिना मैं जी नहीं पाता.. इसलिए मैं गुरु जी से हठ करने लगा की कोई उपाय कर के मेरे लिए बरखा के मन में प्रेम लाया जाए. पहले तो गुरु जी ने स्पष्ट शब्दों में मना कर दिया. कह दिया कि ये उचित नहीं है. ऐसे ही किसी के मन में प्रेम नहीं लाया जा सकता है. और यदि लाया भी गया तो ये बहुत बड़ा धोखा होगा.
किन्तु मैं कहाँ मानने वाला था.
मैंने भी प्रण कर लिया की यदि गुरु जी कोई उपाय नहीं कर देंगे तो मैं अपने प्राण दे दूँगा... आत्महत्या कर लूँगा.
गुरु जी से रहा नहीं गया... मेरी बात मान गए. एक रात शुभ घड़ी देख कर उन्होंने सम्मोहिनी विद्या का प्रयोग किया. कहा, जब तक मैं चाहूँगा ये विद्या तब तक बरखा पर अपना प्रभाव जमाए रखेगी. ये कह कर उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया.
अगले दिन सुबह से ही मुझे चमत्कार दिखा. बाजार में खरीददारी करते समय बरखा से टकरा गया.
मैंने देखा की वो मुझे मुस्कराते हुए देख रही थी. मैं समझ गया... अब बरखा भी मुझे चाहने लगी है.
और फिर हमारा रोज़ का मिलना शुरू हुआ. घंटों समय साथ बिताया करते थे हम. उससे मिलने के लिए मैं अपने गुरु से अनुमति भी ले लिया करता था.