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१०
अगले दिन सुबह ठीक दस बजे थाने के बाहर पुलिस की जीप आ कर रुकी.
इंस्पेक्टर भटाचार्य उतरा और थाने की सीढ़ियाँ चढ़ा.
दरवाज़े के दोनों तरफ दो सिपाही अपनी अपनी राइफलें ले कर सतर्क बैठे थे... भटाचार्य को देखते ही झट से खड़े हो कर सैल्यूट किया. भटाचार्य ने हाथ उठा कर उनके सैल्यूट का उत्तर दिया.
अंदर अपने टेबल के सामने हवलदार कुछ लोगों के साथ बात कर रहा था. उसने भी भटाचार्य को देख कर खड़े हो कर सैल्यूट किया. भटाचार्य ने भी पहले जैसे ही उत्तर दिया. हवलदार के बैठने के स्थान के ठीक बगल में; दाएँ साइड भटाचार्य का कमरा है.
कमरे में घुसने से पहले भटाचार्य ठिठक गया. सिर घूमा कर देखा; आज और दिन के मुकाबले कुछ ज्यादा ही लोग आए हैं. उसने प्रश्नसूचक दृष्टि डाली श्याम पर. श्याम ने तुरंत आँखों के इशारे से ही कुछ कहा भटाचार्य को जिसे भटाचार्य एक क्षण में ही समझ गया.
बेंच और चेयरों पर बैठे लोगों की ओर एक नज़र देख कर श्याम को बोला,
“तुम पाँच मिनट बाद अंदर आना.”
“यस सर!”
अपने कमरे में जाने के बाद सबसे पहले भटाचार्य ने टेबल पर पहले से रखे ग्लास से पानी पिया, फिर अपने पॉकेट से अपने भगवान की फ़ोटो निकाल कर उन्हें प्रणाम किया और फिर अपने गुरुदेव के फ़ोटो को.
फ़िर आराम से अपनी कुर्सी पर बैठा.
सामने कुछ फाइलें रखी थीं.
उनमें से दो – तीन फाइल के पन्ने पलट कर देखा, दूसरे पॉकेट से सिगरेट का पैकेट निकाला, सिगरेट सुलगाया और ऊपर चलते पंखे की ओर देखते हुए मन ही मन कुछ बातों को क्रमवार सजाने लगा.
ठीक पाँच मिनट बाद ही दरवाज़े पर श्याम आया और विनम्र स्वर में बोला,
“आपने बुलाया था सर?”
श्याम के आवाज़ से विचारों के उधेड़बुन से बाहर आया भटाचार्य ने पहले श्याम की ओर देखा और फ़िर उसपर से नज़रें हटा कर सामने रखे आधे खाली ग्लास की ओर देखते हुए बोला,
“हाँ... सुनो.”
श्याम अंदर आया और सैल्यूट मार कर सावधान की पोजीशन में खड़ा हो गया.
“श्याम... सब आ गए हैं?”
“जी सर!”
“किसी ने भी नखरे दिखाए... ना नुकुर किया?”
“दो – तीन ने किया सर.”
“दो – तीन?! कौन कौन?”
“रंजन, उनकी पत्नी सुचित्रा और किशन चायवाला.”
“बाकी सब तैयार हो गए थे?”
“सभी कुछ न कुछ कहना चाहते थे शायद... पर पुलिस के डर के कारण शायद कुछ बोला नहीं गया इनसे, सर.”
“हम्म... और कोई नयी बात?”
“नहीं सर, फिलहाल नहीं. पर इतना ही की रंजन और दूसरे जन बोल रहे हैं कि उन्हें जल्दी छोड़ दिया ताकि तुरंत अपने काम पर जा सके.”
“हाँ.. हाँ.. ऐसा ही होगा... अब तुम जाओ और अगले दस मिनट बाद एक एक कर के सब को भेजना. जब कोई एक आए तो तुम भी यहाँ रहोगे? ओके?... और बद्री को बोलो बाहर तुम्हारे काम को तब तक वो सम्भाले.”
“यस सर.”
“और ये लो... ये लिस्ट है.. जिसका जिस नम्बर पर नाम है उसे वैसे ही अंदर भेजना.”
“यस सर.”
कह कर श्याम सैल्यूट दे कर कमरे से निकल गया.
इधर, उसके बाहर निकलते ही भटाचार्य जल्दी से आँखें बंद कर अपने उन्हीं विचारों पर फिर से ध्यान केन्द्रित कर दिया.
ठीक दस मिनट बाद श्यामाप्रसाद अंदर आया और भटाचार्य से अनुमति लेने के बाद एक एक कर सबको बुलाने लगा.
सबसे पहले सुरेंद्रनाथ को बुलाया गया.
भटाचार्य ने उसे टेबल के विपरीत अपने सामने वाले चेयर पर बैठने को कहा.
उसके बैठते ही भटाचार्य ने अपने दाएँ हाथ की ऊँगलियों से कुछ इशारा किया श्याम को जिसे सिर्फ़ श्याम ही समझ सकता था. सुरेंद्रनाथ का ध्यान तो इस तरफ गया ही नहीं. उस बेचारे का तो डर से ही हालत ख़राब हुए जा रहा था कि न जाने क्या क्या पूछा जायेगा और अगर किन्ही प्रश्नों का उत्तर अगर वो न दे सका तो कहीं उस जेल में न डाल दे.
पुलिस और उनसे जुड़े कुछ अफवाहों को सुरेंद्रनाथ ने इतना सुन रखा था बचपन से की आज जैसे उसकी आँखों के सामने वे सभी अफवाहें किसी चलचित्र की भांति एक एक कर के चलने लगी हो.
भटाचार्य ने उसे पहले पानी पीने को कहा.
सुरेंद्रनाथ ने उसके लिए सामने रखे ग्लास को उठाया और गटागट पूरा ग्लास खाली कर दिया.
उसकी हालत देख कर भटाचार्य और श्याम दोनों एक दूसरे की ओर देख कर मुस्कराए.
“ठीक हो सुरेंद्रनाथ?”
“जी, साहब.”
“कुछ सवाल करूँगा... सही जवाब दोगे?”
“पूरी कोशिश करूँगा माई बाप.”
सुरेंद्रनाथ हाथ जोड़कर मिमियाते हुए बोला.
भटाचार्य हल्का सा मुस्कराया. सीधा बैठा. श्याम को इशारा कर के सुरेंद्रनाथ से एक हाथ दूर खड़े रहने को कहा.
और फ़िर शुरू हुआ प्रश्नकाल.
किसी प्रश्न का सुरेंद्रनाथ बड़ी सहजता के साथ उत्तर दे गया तो किसी प्रश्न में बुरी तरह गड़बड़ा गया.
एक एक कर उससे कुल बारह प्रश्न किए गए. सभी प्रश्नों के उत्तर देते सुरेंद्रनाथ के हरेक गतिविधि को बहुत सूक्ष्मता से देख रहा था भटाचार्य.
इधर, बाहर बैठी सुचित्रा को धीरे धीरे बेचैनी होने लगी थी.
उसे ऐसा लगने लगा मानो उसके अंदर... उसके सीने में किसी ने दहकता आग का गोला रख दिया हो.
वो सामने श्याम के स्थान पर बैठे बद्री को पानी के लिए बोली. बद्री ने दूसरे सिपाही को पानी के लिए बोला. दूसरा सिपाही एक नया भर्ती हुआ बाईस वर्षीय लड़का था जो निर्देश मिलते ही जल्दी से एक ग्लास पानी ला कर सुचित्रा को दिया. सुचित्रा ने जरा सा नज़र उसकी ओर करके कृतज्ञता पूर्ण स्वर में धन्यवाद कहा और पानी पीने लगी.
वो लड़का वापस जाने से पहले दो मिनट वहीं खड़ा रहा.
दरअसल उसे सुचित्रा की सुंदरता भा गई थी. अत्यधिक टेंशन के कारण पीठ पर से साड़ी को हटाने के फलस्वरूप सुचित्रा के डीप बैक स्क्वायर कट ब्लाउज से पर्याप्त अंश में बाहर दिखती उसकी स्वच्छ, निर्मल, बेदाग़ पीठ और उसपे भी टाइट ब्लाउज के कारण मांसल गदराई पीठ पर बनती हल्की सी क्लीवेज ने तो बस उसे पल भर में ही सुचित्रा का दीवाना बना लिया.
काजल लगी आँखें, होंठों पर लाल लिपस्टिक ऐसा मानो अभी अभी ताज़े रक्त में भीगी हुई हो, एक सुंदर पतली चेन जो आंचल के नीचे वक्षस्थल में कहीं समाई हो, दोनों में लाल चूड़ियों के साथ एक एक सफ़ेद शाखा चूड़ी. आंचल सीने पर अच्छे से लिए होने के बावजूद भी उस लड़के को सुचित्रा के वक्षों के आकार का अनुमान करने में कोई असुविधा नहीं हुई.
इतना कुछ देखने के बाद वो लड़का अपने धड़कनों पर नियंत्रण नहीं रख पाया.
उसका दिल धाड़ धाड़ से ज़ोरों से धड़कने लगा. सूख गए होंठों पर बार बार जीभ फिरा कर उन्हें भिगाने की कोशिश करने लगा. इतना तो फिर भी ठीक था.. असल मुश्किल तो तब हुई जब उसे अपने चड्डी के अंदर बेलगाम हलचल होने का आभास हुआ.
बिन हड्डी वाला मांसल अंग अपने दूसरे रूप में आ चुका था जिस कारण पैंट के अंदर से बनी तम्बू के कारण उस लड़के को अपने आप से लज्जा होने लगी. वह तुरंत वहाँ से चला गया.
पानी पीने के बाद बेचैनी तो पूरी तरह से गई नहीं सुचित्रा की पर थोड़ा आराम ज़रूर मिला उसे. कुर्सी के बैकरेस्ट से पीठ टिका कर आराम से बैठ गई और अंदर ही अंदर खुद को पुलिस इंटेरोगेशन के लिए दोबारा तैयार करने लगी.
इधर बिपिन काका की पत्नी रेणुका सुचित्रा को खा जाने वाली निगाहों से देख रही थी.
दरअसल जब से वो थाने में आई है और सुचित्रा को अपने सामने देखी है तब से ही उसे उसी खा जाने वाली नज़रों से देखे जा रही थी. आँखों में गज़ब का गुस्सा झलक रहा था. बिपिन काका, रंजन बाबू, कालू और यहाँ तक की सुचित्रा ने भी रेणुका के इस बर्ताव को देखा. पर सिवाए बिपिन काका और रंजन बाबू के सुचित्रा को रत्ती भर का आश्चर्य नहीं हुआ.
सच कहा जाए तो कहीं न कहीं दोनों स्त्रियों में बहुत पहले से कुछ ख़ास नहीं बनती थी. सुचित्रा रेणुका को पसंद ही नहीं करती थी और रेणुका को भी सुचित्रा के रूप लावण्य से सदैव ईर्ष्या रही.
सुचित्रा अपने आप में अलग थी ज़रूर और इसी कारण विवाहिता होते हुए भी गाँव के कई पुरुषों के रातों की, उनके सपनों की रानी भी थी; पर कहीं न कहीं रेणुका सुचित्रा को टक्कर देती जान पड़ती थी और कभी कभी यही बात सुचित्रा को भी तनिक असुरक्षा का बोध करा देती थी.
थोड़ी ही देर बाद सुरेंद्रनाथ कमरे से निकला और चुपचाप एक खाली कुर्सी पर जा के बैठ गया.
फ़िर एक एक कर के सबको बुलाया गया.
सबसे औसतन करीब पन्द्रह मिनट तक सवाल जवाब होते रहे.
सिवाय सुचित्रा और रेणुका के.
इन दोनों को दो दो बार सवाल जवाब के लिए बुलाया गया और आधे - आधे घंटे तक प्रश्न सत्र चलता रहा.
इन दोनों को बार बार बुलाए जाने से इन दोनों के पति, रंजन बाबू और बिपिन काका भी काफ़ी परेशान रहे पर क्या करते... पुलिस के काम में रुकावट डालने का जोखिम भला कौन ले?
जब सब बाहर अपने जगह पर बैठे थे तब भटाचार्य और श्याम अलग से १५ मिनट तक आपस में बातें करते रहे.
फ़िर एकाएक अपने कमरे से निकले.
भटाचार्य ने सबको एकबार अच्छे से देखा और कहा,
“आप लोगों ने काफ़ी अच्छा सहयोग किया. इसके लिए बहुत धन्यवाद. आज के लिए इतना ही. आगे अगर ज़रूरत पड़ी तो फ़िर से आप लोगों थाने बुलाया जाएगा.”
गोपाल और बसु ने गला खँखार कर धीरे से कहा,
“साहब, फ़िर से आना पड़ेगा? साहब... हम लोगों का काम....”
उनका वाक्य ख़त्म होने से पहले ही भटाचार्य गुस्सा करता हुआ बोला,
“तुम्हें क्या लगता है... आज यहाँ पार्टी करने के लिए बुलाया था क्या? हँसी मसखरी होती है यहाँ? इन सवाल जवाबों में हमारा भी समय जाता है... कई काम हमारे धरे के धरे रह जाते हैं. जो कहा जा रहा है.. सुनो और करो.”
इतना कह कर भटाचार्य गुस्से से अंदर चला गया.
श्यामाप्रसाद ने सबको इशारे से जाने को कहा... भटाचार्य के गुस्से को देख कर किसी को किसी से कुछ कहने पूछने का हिम्मत नहीं हुआ. सब चुपचाप अपने अपने जगह से उठे और बाहर जाने लगे.
तभी अंदर से भटाचार्य ने आवाज़ दिया,
“श्याम... इधर सुनना.”
“यस सर.”
श्याम तुरंत अंदर आया.
“श्याम... सब गए या नहीं?”
“जी सर, जा ही रहे हैं.”
“ह्म्म्म.. सबके बातों को नोट किया?”
“जी सर... सबने जो भी कहा... उसमें जो कुछ भी महत्वपूर्ण लगा; मैंने वो सब नोट कर लिया.”
“गुड. वैरी गुड. अब एक और बात बताओ...”
“जी सर...”
“सबसे सवाल जवाब होते समय तुम यहीं थे... पूरे समय... तुमने हर किसी के जवाबों को सुना... नोट किया.... सबकी बातों को सुनने के बाद तुम्हें प्रथमदृष्ट्या क्या लगता है... कौन अपराधी हो सकता है... किसपे संदेह सबसे अधिक हुआ है?”
“सर, मुझे तो लगता है कि..........”
श्याम ने जैसे ही बोलना शुरू किया बाहर से चीख पुकार की आवाज़ आने लगी.
बहुत ज़ोरों से आवाजें आ रही थीं... आदमी और औरत... दोनों के.
भटाचार्य और श्याम पहले तो कुछ समझ नहीं पाए. पहले पाँच सेकंड तक एक दूसरे को देखते रहे... फ़िर एक साथ लगभग दौड़ते हुए कमरे से बाहर निकले. दोनों ने देखा की थाने के सिपाही सब भी थाने के बाहर खड़े हैं और किन्हीं को छुड़ाने का असफल प्रयास कर रहे हैं.
भटाचार्य और श्याम दोनों जल्दी से थाने के मेन दरवाज़े तक आए.
बाहर आ कर जो देखा उससे दोनों ही स्तब्ध रह गए.
बाहर रेणुका और सुचित्रा दोनों एक दूसरे से भीड़ी हुई थीं. दोनों ही एक दूसरे को थप्पड़ों से मार रही थी और जितना ज़ोर से हो सके उतना मारने का प्रयास कर रही थी. खास कर रेणुका... उसके गुस्से का कोई पार नहीं दिख रहा था.
वो तो ऐसे कर रही थी जैसे की अभी के अभी सुचित्रा के कई टुकड़े कर के उसे कच्चा ही चबा जाएगी. सुचित्रा भी पलट कर उसके थप्पड़ों का जवाब दे रही थी पर मारने से कहीं ज्यादा वो खुद को बचाने का प्रयास कर रही थी.
रेणुका रह रह के बार बार एक ही बात दोहरा रही थी,
“तू...तूने ही खाया है जतिंद्र... तूने ही छीना है हमसे... मेरे जतिंद्र को... उस बेचारे ... भोले लड़के को तूने ही निगला है. बता... बोल न.. क्यों की ऐसा... कमीनी...”
दोनों के पति और वहाँ उपस्थित बाकी सभी लोग दोनों को छुड़ाने का प्रयास कर रहे थे लेकिन थोड़ा छूटने के तुरंत बाद रेणुका फिर से सुचित्रा पर टूट पड़ती. धीरे धीरे वहाँ बहुत भीड़ जमा हो गई.
थाने के सामने इस तरह का एक तमाशा होता देख कर भटाचार्य बुरी तरह गुस्से में भर गया और बहुत ज़ोर से चीखते हुए गरज उठा,
“बस करो... क्या लगा रखा है यहाँ? कोई बाज़ार है?? या गाँव का अखाड़ा है??? जो करना है अपने गाँव में... अपने घर में करो... जाओ... अब अगर एक शब्द भी तुम लोगों में से किसी के भी मुँह से सुना तो अभी के अभी बिना किसी कंप्लेंट के तुम सबको पूरे एक महीने के लिए अंदर डाल दूँगा... समझे..! जाओ यहाँ से!!”
भटाचार्य के इस धमकी ने तुरंत वहाँ जमा हुए लोगों पर अपना असर दिखाया और सब हड़बड़ा कर वहाँ से भाग खड़े हुए. रेणुका और सुचित्रा ने भी अब तक एक दूसरे को छोड़ दिया था और आगे बढ़ गई थी.
रेणुका अब भी गुस्से से बीच बीच में सुचित्रा को देख रही थी पर कुछ कह नहीं पा रही थी क्योंकि वो तो खुद अब भटाचार्य के गुस्से से डर गई थी.
और भला एक गुस्सैल पुलिस वाला को कौन उकसाए?
यही सोच कर उसने फ़िलहाल अपने गुस्से को काबू करने का पूरजोर कोशिश कर रही थी.
अगले दिन सुबह ठीक दस बजे थाने के बाहर पुलिस की जीप आ कर रुकी.
इंस्पेक्टर भटाचार्य उतरा और थाने की सीढ़ियाँ चढ़ा.
दरवाज़े के दोनों तरफ दो सिपाही अपनी अपनी राइफलें ले कर सतर्क बैठे थे... भटाचार्य को देखते ही झट से खड़े हो कर सैल्यूट किया. भटाचार्य ने हाथ उठा कर उनके सैल्यूट का उत्तर दिया.
अंदर अपने टेबल के सामने हवलदार कुछ लोगों के साथ बात कर रहा था. उसने भी भटाचार्य को देख कर खड़े हो कर सैल्यूट किया. भटाचार्य ने भी पहले जैसे ही उत्तर दिया. हवलदार के बैठने के स्थान के ठीक बगल में; दाएँ साइड भटाचार्य का कमरा है.
कमरे में घुसने से पहले भटाचार्य ठिठक गया. सिर घूमा कर देखा; आज और दिन के मुकाबले कुछ ज्यादा ही लोग आए हैं. उसने प्रश्नसूचक दृष्टि डाली श्याम पर. श्याम ने तुरंत आँखों के इशारे से ही कुछ कहा भटाचार्य को जिसे भटाचार्य एक क्षण में ही समझ गया.
बेंच और चेयरों पर बैठे लोगों की ओर एक नज़र देख कर श्याम को बोला,
“तुम पाँच मिनट बाद अंदर आना.”
“यस सर!”
अपने कमरे में जाने के बाद सबसे पहले भटाचार्य ने टेबल पर पहले से रखे ग्लास से पानी पिया, फिर अपने पॉकेट से अपने भगवान की फ़ोटो निकाल कर उन्हें प्रणाम किया और फिर अपने गुरुदेव के फ़ोटो को.
फ़िर आराम से अपनी कुर्सी पर बैठा.
सामने कुछ फाइलें रखी थीं.
उनमें से दो – तीन फाइल के पन्ने पलट कर देखा, दूसरे पॉकेट से सिगरेट का पैकेट निकाला, सिगरेट सुलगाया और ऊपर चलते पंखे की ओर देखते हुए मन ही मन कुछ बातों को क्रमवार सजाने लगा.
ठीक पाँच मिनट बाद ही दरवाज़े पर श्याम आया और विनम्र स्वर में बोला,
“आपने बुलाया था सर?”
श्याम के आवाज़ से विचारों के उधेड़बुन से बाहर आया भटाचार्य ने पहले श्याम की ओर देखा और फ़िर उसपर से नज़रें हटा कर सामने रखे आधे खाली ग्लास की ओर देखते हुए बोला,
“हाँ... सुनो.”
श्याम अंदर आया और सैल्यूट मार कर सावधान की पोजीशन में खड़ा हो गया.
“श्याम... सब आ गए हैं?”
“जी सर!”
“किसी ने भी नखरे दिखाए... ना नुकुर किया?”
“दो – तीन ने किया सर.”
“दो – तीन?! कौन कौन?”
“रंजन, उनकी पत्नी सुचित्रा और किशन चायवाला.”
“बाकी सब तैयार हो गए थे?”
“सभी कुछ न कुछ कहना चाहते थे शायद... पर पुलिस के डर के कारण शायद कुछ बोला नहीं गया इनसे, सर.”
“हम्म... और कोई नयी बात?”
“नहीं सर, फिलहाल नहीं. पर इतना ही की रंजन और दूसरे जन बोल रहे हैं कि उन्हें जल्दी छोड़ दिया ताकि तुरंत अपने काम पर जा सके.”
“हाँ.. हाँ.. ऐसा ही होगा... अब तुम जाओ और अगले दस मिनट बाद एक एक कर के सब को भेजना. जब कोई एक आए तो तुम भी यहाँ रहोगे? ओके?... और बद्री को बोलो बाहर तुम्हारे काम को तब तक वो सम्भाले.”
“यस सर.”
“और ये लो... ये लिस्ट है.. जिसका जिस नम्बर पर नाम है उसे वैसे ही अंदर भेजना.”
“यस सर.”
कह कर श्याम सैल्यूट दे कर कमरे से निकल गया.
इधर, उसके बाहर निकलते ही भटाचार्य जल्दी से आँखें बंद कर अपने उन्हीं विचारों पर फिर से ध्यान केन्द्रित कर दिया.
ठीक दस मिनट बाद श्यामाप्रसाद अंदर आया और भटाचार्य से अनुमति लेने के बाद एक एक कर सबको बुलाने लगा.
सबसे पहले सुरेंद्रनाथ को बुलाया गया.
भटाचार्य ने उसे टेबल के विपरीत अपने सामने वाले चेयर पर बैठने को कहा.
उसके बैठते ही भटाचार्य ने अपने दाएँ हाथ की ऊँगलियों से कुछ इशारा किया श्याम को जिसे सिर्फ़ श्याम ही समझ सकता था. सुरेंद्रनाथ का ध्यान तो इस तरफ गया ही नहीं. उस बेचारे का तो डर से ही हालत ख़राब हुए जा रहा था कि न जाने क्या क्या पूछा जायेगा और अगर किन्ही प्रश्नों का उत्तर अगर वो न दे सका तो कहीं उस जेल में न डाल दे.
पुलिस और उनसे जुड़े कुछ अफवाहों को सुरेंद्रनाथ ने इतना सुन रखा था बचपन से की आज जैसे उसकी आँखों के सामने वे सभी अफवाहें किसी चलचित्र की भांति एक एक कर के चलने लगी हो.
भटाचार्य ने उसे पहले पानी पीने को कहा.
सुरेंद्रनाथ ने उसके लिए सामने रखे ग्लास को उठाया और गटागट पूरा ग्लास खाली कर दिया.
उसकी हालत देख कर भटाचार्य और श्याम दोनों एक दूसरे की ओर देख कर मुस्कराए.
“ठीक हो सुरेंद्रनाथ?”
“जी, साहब.”
“कुछ सवाल करूँगा... सही जवाब दोगे?”
“पूरी कोशिश करूँगा माई बाप.”
सुरेंद्रनाथ हाथ जोड़कर मिमियाते हुए बोला.
भटाचार्य हल्का सा मुस्कराया. सीधा बैठा. श्याम को इशारा कर के सुरेंद्रनाथ से एक हाथ दूर खड़े रहने को कहा.
और फ़िर शुरू हुआ प्रश्नकाल.
किसी प्रश्न का सुरेंद्रनाथ बड़ी सहजता के साथ उत्तर दे गया तो किसी प्रश्न में बुरी तरह गड़बड़ा गया.
एक एक कर उससे कुल बारह प्रश्न किए गए. सभी प्रश्नों के उत्तर देते सुरेंद्रनाथ के हरेक गतिविधि को बहुत सूक्ष्मता से देख रहा था भटाचार्य.
इधर, बाहर बैठी सुचित्रा को धीरे धीरे बेचैनी होने लगी थी.
उसे ऐसा लगने लगा मानो उसके अंदर... उसके सीने में किसी ने दहकता आग का गोला रख दिया हो.
वो सामने श्याम के स्थान पर बैठे बद्री को पानी के लिए बोली. बद्री ने दूसरे सिपाही को पानी के लिए बोला. दूसरा सिपाही एक नया भर्ती हुआ बाईस वर्षीय लड़का था जो निर्देश मिलते ही जल्दी से एक ग्लास पानी ला कर सुचित्रा को दिया. सुचित्रा ने जरा सा नज़र उसकी ओर करके कृतज्ञता पूर्ण स्वर में धन्यवाद कहा और पानी पीने लगी.
वो लड़का वापस जाने से पहले दो मिनट वहीं खड़ा रहा.
दरअसल उसे सुचित्रा की सुंदरता भा गई थी. अत्यधिक टेंशन के कारण पीठ पर से साड़ी को हटाने के फलस्वरूप सुचित्रा के डीप बैक स्क्वायर कट ब्लाउज से पर्याप्त अंश में बाहर दिखती उसकी स्वच्छ, निर्मल, बेदाग़ पीठ और उसपे भी टाइट ब्लाउज के कारण मांसल गदराई पीठ पर बनती हल्की सी क्लीवेज ने तो बस उसे पल भर में ही सुचित्रा का दीवाना बना लिया.
काजल लगी आँखें, होंठों पर लाल लिपस्टिक ऐसा मानो अभी अभी ताज़े रक्त में भीगी हुई हो, एक सुंदर पतली चेन जो आंचल के नीचे वक्षस्थल में कहीं समाई हो, दोनों में लाल चूड़ियों के साथ एक एक सफ़ेद शाखा चूड़ी. आंचल सीने पर अच्छे से लिए होने के बावजूद भी उस लड़के को सुचित्रा के वक्षों के आकार का अनुमान करने में कोई असुविधा नहीं हुई.
इतना कुछ देखने के बाद वो लड़का अपने धड़कनों पर नियंत्रण नहीं रख पाया.
उसका दिल धाड़ धाड़ से ज़ोरों से धड़कने लगा. सूख गए होंठों पर बार बार जीभ फिरा कर उन्हें भिगाने की कोशिश करने लगा. इतना तो फिर भी ठीक था.. असल मुश्किल तो तब हुई जब उसे अपने चड्डी के अंदर बेलगाम हलचल होने का आभास हुआ.
बिन हड्डी वाला मांसल अंग अपने दूसरे रूप में आ चुका था जिस कारण पैंट के अंदर से बनी तम्बू के कारण उस लड़के को अपने आप से लज्जा होने लगी. वह तुरंत वहाँ से चला गया.
पानी पीने के बाद बेचैनी तो पूरी तरह से गई नहीं सुचित्रा की पर थोड़ा आराम ज़रूर मिला उसे. कुर्सी के बैकरेस्ट से पीठ टिका कर आराम से बैठ गई और अंदर ही अंदर खुद को पुलिस इंटेरोगेशन के लिए दोबारा तैयार करने लगी.
इधर बिपिन काका की पत्नी रेणुका सुचित्रा को खा जाने वाली निगाहों से देख रही थी.
दरअसल जब से वो थाने में आई है और सुचित्रा को अपने सामने देखी है तब से ही उसे उसी खा जाने वाली नज़रों से देखे जा रही थी. आँखों में गज़ब का गुस्सा झलक रहा था. बिपिन काका, रंजन बाबू, कालू और यहाँ तक की सुचित्रा ने भी रेणुका के इस बर्ताव को देखा. पर सिवाए बिपिन काका और रंजन बाबू के सुचित्रा को रत्ती भर का आश्चर्य नहीं हुआ.
सच कहा जाए तो कहीं न कहीं दोनों स्त्रियों में बहुत पहले से कुछ ख़ास नहीं बनती थी. सुचित्रा रेणुका को पसंद ही नहीं करती थी और रेणुका को भी सुचित्रा के रूप लावण्य से सदैव ईर्ष्या रही.
सुचित्रा अपने आप में अलग थी ज़रूर और इसी कारण विवाहिता होते हुए भी गाँव के कई पुरुषों के रातों की, उनके सपनों की रानी भी थी; पर कहीं न कहीं रेणुका सुचित्रा को टक्कर देती जान पड़ती थी और कभी कभी यही बात सुचित्रा को भी तनिक असुरक्षा का बोध करा देती थी.
थोड़ी ही देर बाद सुरेंद्रनाथ कमरे से निकला और चुपचाप एक खाली कुर्सी पर जा के बैठ गया.
फ़िर एक एक कर के सबको बुलाया गया.
सबसे औसतन करीब पन्द्रह मिनट तक सवाल जवाब होते रहे.
सिवाय सुचित्रा और रेणुका के.
इन दोनों को दो दो बार सवाल जवाब के लिए बुलाया गया और आधे - आधे घंटे तक प्रश्न सत्र चलता रहा.
इन दोनों को बार बार बुलाए जाने से इन दोनों के पति, रंजन बाबू और बिपिन काका भी काफ़ी परेशान रहे पर क्या करते... पुलिस के काम में रुकावट डालने का जोखिम भला कौन ले?
जब सब बाहर अपने जगह पर बैठे थे तब भटाचार्य और श्याम अलग से १५ मिनट तक आपस में बातें करते रहे.
फ़िर एकाएक अपने कमरे से निकले.
भटाचार्य ने सबको एकबार अच्छे से देखा और कहा,
“आप लोगों ने काफ़ी अच्छा सहयोग किया. इसके लिए बहुत धन्यवाद. आज के लिए इतना ही. आगे अगर ज़रूरत पड़ी तो फ़िर से आप लोगों थाने बुलाया जाएगा.”
गोपाल और बसु ने गला खँखार कर धीरे से कहा,
“साहब, फ़िर से आना पड़ेगा? साहब... हम लोगों का काम....”
उनका वाक्य ख़त्म होने से पहले ही भटाचार्य गुस्सा करता हुआ बोला,
“तुम्हें क्या लगता है... आज यहाँ पार्टी करने के लिए बुलाया था क्या? हँसी मसखरी होती है यहाँ? इन सवाल जवाबों में हमारा भी समय जाता है... कई काम हमारे धरे के धरे रह जाते हैं. जो कहा जा रहा है.. सुनो और करो.”
इतना कह कर भटाचार्य गुस्से से अंदर चला गया.
श्यामाप्रसाद ने सबको इशारे से जाने को कहा... भटाचार्य के गुस्से को देख कर किसी को किसी से कुछ कहने पूछने का हिम्मत नहीं हुआ. सब चुपचाप अपने अपने जगह से उठे और बाहर जाने लगे.
तभी अंदर से भटाचार्य ने आवाज़ दिया,
“श्याम... इधर सुनना.”
“यस सर.”
श्याम तुरंत अंदर आया.
“श्याम... सब गए या नहीं?”
“जी सर, जा ही रहे हैं.”
“ह्म्म्म.. सबके बातों को नोट किया?”
“जी सर... सबने जो भी कहा... उसमें जो कुछ भी महत्वपूर्ण लगा; मैंने वो सब नोट कर लिया.”
“गुड. वैरी गुड. अब एक और बात बताओ...”
“जी सर...”
“सबसे सवाल जवाब होते समय तुम यहीं थे... पूरे समय... तुमने हर किसी के जवाबों को सुना... नोट किया.... सबकी बातों को सुनने के बाद तुम्हें प्रथमदृष्ट्या क्या लगता है... कौन अपराधी हो सकता है... किसपे संदेह सबसे अधिक हुआ है?”
“सर, मुझे तो लगता है कि..........”
श्याम ने जैसे ही बोलना शुरू किया बाहर से चीख पुकार की आवाज़ आने लगी.
बहुत ज़ोरों से आवाजें आ रही थीं... आदमी और औरत... दोनों के.
भटाचार्य और श्याम पहले तो कुछ समझ नहीं पाए. पहले पाँच सेकंड तक एक दूसरे को देखते रहे... फ़िर एक साथ लगभग दौड़ते हुए कमरे से बाहर निकले. दोनों ने देखा की थाने के सिपाही सब भी थाने के बाहर खड़े हैं और किन्हीं को छुड़ाने का असफल प्रयास कर रहे हैं.
भटाचार्य और श्याम दोनों जल्दी से थाने के मेन दरवाज़े तक आए.
बाहर आ कर जो देखा उससे दोनों ही स्तब्ध रह गए.
बाहर रेणुका और सुचित्रा दोनों एक दूसरे से भीड़ी हुई थीं. दोनों ही एक दूसरे को थप्पड़ों से मार रही थी और जितना ज़ोर से हो सके उतना मारने का प्रयास कर रही थी. खास कर रेणुका... उसके गुस्से का कोई पार नहीं दिख रहा था.
वो तो ऐसे कर रही थी जैसे की अभी के अभी सुचित्रा के कई टुकड़े कर के उसे कच्चा ही चबा जाएगी. सुचित्रा भी पलट कर उसके थप्पड़ों का जवाब दे रही थी पर मारने से कहीं ज्यादा वो खुद को बचाने का प्रयास कर रही थी.
रेणुका रह रह के बार बार एक ही बात दोहरा रही थी,
“तू...तूने ही खाया है जतिंद्र... तूने ही छीना है हमसे... मेरे जतिंद्र को... उस बेचारे ... भोले लड़के को तूने ही निगला है. बता... बोल न.. क्यों की ऐसा... कमीनी...”
दोनों के पति और वहाँ उपस्थित बाकी सभी लोग दोनों को छुड़ाने का प्रयास कर रहे थे लेकिन थोड़ा छूटने के तुरंत बाद रेणुका फिर से सुचित्रा पर टूट पड़ती. धीरे धीरे वहाँ बहुत भीड़ जमा हो गई.
थाने के सामने इस तरह का एक तमाशा होता देख कर भटाचार्य बुरी तरह गुस्से में भर गया और बहुत ज़ोर से चीखते हुए गरज उठा,
“बस करो... क्या लगा रखा है यहाँ? कोई बाज़ार है?? या गाँव का अखाड़ा है??? जो करना है अपने गाँव में... अपने घर में करो... जाओ... अब अगर एक शब्द भी तुम लोगों में से किसी के भी मुँह से सुना तो अभी के अभी बिना किसी कंप्लेंट के तुम सबको पूरे एक महीने के लिए अंदर डाल दूँगा... समझे..! जाओ यहाँ से!!”
भटाचार्य के इस धमकी ने तुरंत वहाँ जमा हुए लोगों पर अपना असर दिखाया और सब हड़बड़ा कर वहाँ से भाग खड़े हुए. रेणुका और सुचित्रा ने भी अब तक एक दूसरे को छोड़ दिया था और आगे बढ़ गई थी.
रेणुका अब भी गुस्से से बीच बीच में सुचित्रा को देख रही थी पर कुछ कह नहीं पा रही थी क्योंकि वो तो खुद अब भटाचार्य के गुस्से से डर गई थी.
और भला एक गुस्सैल पुलिस वाला को कौन उकसाए?
यही सोच कर उसने फ़िलहाल अपने गुस्से को काबू करने का पूरजोर कोशिश कर रही थी.