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Horror भूत बंगला

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करण अपने दिन की दिनचर्या में लग गया. नहा धो के वो वकील से मिलने को तैयार था तभी उसका फ़ोन बज उठा.

“हेल्लो डैड ...” करण ने फ़ोन पे कहा .

“हेल्लो बेटा, तुम कल से ही इंडिया पहुंचे हो पर फिर भी मुझे एक कॉल भी नहीं किया, मुझे तुम्हारी फ़िक्र होनी लगी थी बेटा.”

“आई नो डैड एंड आई ऍम सॉरी फॉर दट …..वो कल मैं बहुत प्रोब्लेम्स में फँस गया था इसीलिए कॉल नहीं कर पाया.”

“प्रोब्लेम्स में ….?...क्या वो मनोहर तुम्हे मिला नहीं.”

“डैड वो मुझे मिला था, एंड ही इज वैरी हेल्पफुल .”

“गुड और बताओ बंगले का काम कैसा चल रहा है.”

“ठीक चल रहा है डैड …………..”

करण अपने डैड से बात कर ही रहा था की तभी उसे फिर पानी की गिरने की आवाज़ फिर सुनाई दी.

“होल्ड ओन डैड ......मैं आपको बाद में कॉल करता हूँ ...” करण ने फ़ोन काट दिया और ऊपर वाली मंजिल की तरफ देखने लगा.

“यह तो वोही पानी गिरने की आवाज़ है जो कल आ रही थी.” करण ने सोचा.

आवाज़ उसके कानो में साफ़ सुने दे रही थी जिसे सुनकर उसका दिल धोंकनी के सामान धड़कने लगा. सिहरन सी दौड़ गयी थी उसके पूरे बदन में. उसके पावँ वही ज़मीन में ज़म गए और आवाज़ सुन के हाथ पावँ फूलने लगे. उसे फिर कल वाली घटना याद आ गयी जब उसे नहाने की आवाज़े आ रही थी जबकि पूरा बाथरूम तो खाली था.

फिर भी उसने थोडा हिम्मत दिखाते हुए ऊपर वाली मंजिल में जाने का निश्चय किया. ऊपर जाते जाते पानी के गिरने की आवाज़ तेज़ हो गयी. पर इस बार उसे किसी लड़की की गाना गुन गुनाने की आवाज़ भी आ रही थी.

“लगता है मेरे साथ कोई मज़ाक कर रहा है.” करण उसी रूम का दरवाज़ा खोलते हुए अन्दर घुस गया. आवाज़ अभी भी अन्दर के बाथरूम से साफ़ सुनाई दे रही थी. उसे तो लगा की कोई लड़की की आवाज़ निकल के उसे डराने की कोशिश कर रहा है.

 
फिर भी उसने थोडा हिम्मत दिखाते हुए ऊपर वाली मंजिल में जाने का निश्चय किया. ऊपर जाते जाते पानी के गिरने की आवाज़ तेज़ हो गयी. पर इस बार उसे किसी लड़की की गाना गुन गुनाने की आवाज़ भी आ रही थी.

“लगता है मेरे साथ कोई मज़ाक कर रहा है.” करण उसी रूम का दरवाज़ा खोलते हुए अन्दर घुस गया. आवाज़ अभी भी अन्दर के बाथरूम से साफ़ सुनाई दे रही थी. उसे तो लगा की कोई लड़की की आवाज़ निकल के उसे डराने की कोशिश कर रहा है.

“यह मेरा वहम नहीं हो सकता, क्यूंकि मुझे आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही है, और जैसे लगता है कोई लड़की अन्दर नहाते वक़्त गाना गुन गुना रही है.” करण ने झट से बाथरूम का दरवाज़ा खोल के अन्दर झाँका. अन्दर से बाथरूम पूरा खाली था, न तो वहा कोई गा रहा था और न ही पानी गिरने की आवाज़ आ रही थी.

“यह जो भी हो रहा है बड़ा अजीब है.” करण ने सोचा.

पर अगले ही पल उसके नाक में साबुन की खुशबू फिर आई. अब तो उसके रोंगटे ही खड़े हो गए थे. डर की एक तेज़ लहर उसके पूरे शरीर में समां गयी.

“कौन है ? कौन है वहा ? मैं कहता हु सामने आओ …….” वो चिल्ला के बोला. पर कोई आवाज़ नहीं आई.

“हे भगवान मेरा सर फटा जा रहा है यह सब देख कर, आखिर क्या मतलब है यह सब का…?.”

इस बार वो बाथरूम से भागा नहीं बल्कि उसका अच्छे से मोआयना करने लगा इस उम्मीद में की उसे कुछ तो पता चलेगा ही की आखिर यह सब हो क्या रहा है. क्या कोई टेप रेकॉर्डर से पानी और लड़की की आवाजें निकाल

रहा है. वो अपने आपको बहुत भ्रमित महसूस कर रहा था, जो भी उसके साथ हो रहा था, वो उसे वैज्ञानिक नज़रिए से देख रहा था, फिर भी उसे डर ज़रूर लग रहा था.

उसके माथे पर पसीना साफ़ नज़र आ रहा था. जब से वो इंडिया आया था, तब से उसकी ज़िन्दगी उथल पुथल हो गयी थी. वो जितने सवालों के जवाब जान ने की कोशिश करता उतने और सवाल उठ खड़े होते. पर उसे नहीं पता था की उसकी ज़िन्दगी में तो अभी तूफ़ान आना बाकी है क्यूंकि यह सब तो बस एक शुरुआत थी .

उसका दिमाग काम करना बंद कर दिया था. उसने आस पास के में देखने का फैसला किया. जब से वो आया था तब से अभी तक पूरे बंगले को अच्छे से नहीं देखा था. इसीलिए उसने सोचा की सारे कमरों को खोल कर अच्छे से तलाशी लेनी चाहिए.

ऐसे ही वो ऊपर वाली मंजिल पर जांच पड़ताल कर रहा था की उसे एक कमरे में ख़त पट सुनाई दी. उस आवाज़ को सुनकर उसका दिल जोरो से धड़कने लगा की आखिर क्या माजरा है यह सब.

उसने एक गहरी सांस ली और हिम्मत जुटा के दरवज़ा खोलना चाहा पर वो अन्दर से बंद लग रहा था.

“अरे यह तो अन्दर से बंद है, पर मेरे और मनोहर के अलावा तो कोई और है नहीं इस बंगले में.” करण ने सोचा और दरवाज़ा खटखटाने लगा.

“कौन है बाहर …?” अन्दर से एक मीठी सी आवाज़ आई जो की उसी लड़की की लग रही थी जो अभी अभी बाथरूम में गाना गुनगुना रही थी.

करण का हलक सूख गया. उसने बड़ी मुश्किल से अपने डर पे काबू किया और फिर से दरवाज़ा खटखटाया.

“ओह्ह…तो आप है…आपको तो पता है ना की शादी से पहले, आप हमसे नहीं मिल सकते.” अन्दर से उस लड़की की खिलखिलाने की आवाज़ आई.

“शादी ….कैसी शादी …?” करण ने मन में सोचा और इस बार जोर लगा के दरवाज़े को धक्का दिया तो वो खुल गया.

अन्दर का नज़ारा करण की अपेक्षा के विपरीत निकला. वो अन्दर घुसा तो उसे कोई लड़की नहीं दिखाई दी.

पूरे कमरे की लाइट अचानक जलने लगी और बुझने लगी. वो लाइट बार बार जल बुझ रही थी. करण के रोंगटे खड़े हो गए, यह सब देख कर. पूरा माहोल बहुत डरावना था. ज़ाहिर सी बात है जब आपको किसी की बार बार आवाज़ आती है पर वो आपको दीखता नहीं तो आपको डर तो ज़रूर लगेगा.

उसने डरते डरते इधर उधर नज़र दौडाई तो उसे पास में रखा एक वार्डरोब देखा जिसपे एक बड़ा सा आइना लगा हुआ था. नीचे बहुत सी लडकियों के सजने धजने का सामान रखा हुआ था.

“यह सब यहाँ कैसे आया ….? करण सोच में पड़ गया.

उसने वार्डरोब का ड्रावर खोला तो उसमे एक कागज़ था. करण ने उस कागज को उठाया तो देखा की उसपे कुछ लिखा हुआ है.

करण ने उस कागज़ में जो लिखा था उसे मन में पढने लगा, “अब शादी के दिन दूर नहीं है मेरे प्रीतम, अब यह जुदाई सहन नहीं होती, जल्दी से बरात लेके आजाओ, हमारे मिलन का साक्षी यह पूरा संसार होगा….मैं तुम्हारा इंतज़ार करुँगी….तुम्हारी प्रियसी .”

करण यह सब सोच ही रहा था की अचानक उसने उस कमरे को गौर से देखा जिसमे वो खड़ा था.

“लगता है मैं इस कमरे में बचपन में कभी आ चुक्का हूँ ...” करण ने सोचा \.

उसकी आँखे जो पहले से ही डरी हुई थी, अचानक उसमे एक पल के लिए और खौफ्फ़ उतर आया.

 
करण यह सब सोच ही रहा था की अचानक उसने उस कमरे को गौर से देखा जिसमे वो खड़ा था.

“लगता है मैं इस कमरे में बचपन में कभी आ चुक्का हूँ ...” करण ने सोचा \.

उसकी आँखे जो पहले से ही डरी हुई थी, अचानक उसमे एक पल के लिए और खौफ्फ़ उतर आया.

“अरे…अरे….यह नहीं हो सकता……”

“य…ये…तो वोही कमरा…..वोही दिवार……वोही खिडकिया…..वोही दरवाज़ा…..और यह तो वोही कागज़ है….. जो बचपन से मेरे सपने में धुंधला धुंधला अत है.”

बचपन से ही उसे अपने आते हुए सपने से बहुत डर लगता था, इसीलिए अब तो वो सच में बहुत डर गया था.

वो तेज़ी से कमरे से बाहर निकला और उस कमरे पे बाहर से कुण्डी लगा के नीचे ड्राविंग हॉल में आ गया. जब से वो यहाँ आया था तब से उसके साथ ऐसी अप्रत्याशित घटनाये हो रही थी.

“पर इस बंगले का सम्बन्ध मेरे सपने से कैसा हो सकता है, मैं तो यहाँ पहली बार आया हूँ तो मैं इसे सपने में बचपन से कैसे देख सकता हूँ, और यह कागज़ कैसा है, इसका मतलब क्या है….” वो बदहवास सा सोफा पे बैठ गया. वो सोच में पड़ गया.

“यानी मैं इसी बंगले को अपने सपने में देखता आया हूँ. हे ईश्वर अब तो मुझे सच मुच में डर लग रहा है.”

उसने अपने सपने का ज़िक्र बहुत बार अपने पापा से किया था पर उसके पापा इसे कोई आम डरावना सपना कह के टाल देते थे. करण भी उनकी बात मान कर इसे अगली सुबह भुला देता था.

पर आज जो उसने देखा था वो उसे कैसे भुला सकता था, यह कोई आम सपना नहीं था, यह तो वास्तविक्ता थी, जो उसने सपने में देखा था आज उसने अपनी आँखों से वही नज़ारा इस बंगले में देखा था. उसका सपना इस बंगले से जुड़ा हुआ था. उसने अपने सपने में उस कागज़ के टुकड़े को भी देखा था पर उसे आज जा के पाता चला की आखिर उसमे लिखे क्या है, पर उसका मतलब वो ना समझ सका.

“यह बंगले का राज़ तो गहराता जा रह है, हो ना हो मेरे डरावने सपनो का राज़ भी इसके साथ जुड़ा हुआ है, और इसी बंगले में मुझे अपने खोये हुए सवालो के जवाब मिलेंगे जो मैं बचपन से ढूँढना चाहता हूँ.”

करण सोचता हुआ उठा और बंगले से बाहर निकाल गया. उसे वकील साहब से भी मिलना था. मनोहर को उसने कुछ नहीं बताया और उसके साथ वो वकील साहिब के घर की तरफ रवाना हो गया.

 
चैप्टर 7: निहारिका

करण की कार वकील साहिब के घर के बाहर रुकी. दोनों कार से उतरे, करण ने देखा वकील साहिब का घर काफी आलिशान था. घर को देखते देखते वो घर के अन्दर पहुँच गए. करण ने दरवाज़े पर नॉक किया.

“यस , हाउ कैन आई हेल्प यू ?” एक बहुत ही मीठी सी आवाज़ आई.

करण और मनोहर दोनों ने ही नज़र उठा के देखा की एक खूबसूरत नव युवती यही कोई 22 23 साल की उनके सामने खड़ी थी.

“जी मैं वकील साहब से मिलने आया हूँ.” करण ने जवाब दिया.

“पर वो तो कुछ दिन के लिए सिंगापुर किसी काम से गए है.” लड़की ने जवाब दिया.

करण ने मनोहर को बाहर जाके इंतज़ार करने को कहा, जिसे मानकर वो बाहर चला गया. करण ने एक नज़र उस लड़की पे डाली, वो बहुत ही खूबसूरत थी. स्लिम फिगर, ठीक ठाक हाईट और उसका चेहरा किसी मॉडल के जैसा था. बिलकुल सांचे में ढाला हुआ जिसमे, जैसे खुदा ने फुर्सत में खुद तराशा हो.

“जी मेरा नाम करण मल्होत्रा है, मेरे डैड आपके पापा के बहुत अच्छे दोस्त है, इसीलिए मैं कुछ लैंडपेपर के काम को लेकर यहाँ आया था.”

“ओह्ह ….यू मस्ट बी यशवंत अंकल ’स सन…राईट ?” उस लड़की ने पुछा.

“राईट !….” करण ने जवाब दिया.

“ओह्ह …माय नेम इज निहारिका और मैं वकील साहब की बेटी हूँ.”

“हेल्लो मिस निहारिका, क्या आप बता सकती है की आपके डैड कब तक आ जायेंगे ?”

“उन्हें तो कुछ दिन और लग सकते है. अगर आपको कोई काम है तो बताइए मैं भी अपने डैड के जैसी वकील हूँ, शायद मैं कुछ मदद कर सकूँ.” निहारिका ने प्यारी सी मुस्कान दे के कहा.

“इसकी आवाज़ कुछ जानी पहचानी लग रही है …” करण ने मन ही मन सोचा.

“येः…बस कुछ लैंड पेपर्स बनवाने है हमारे बंगले के जो हम बेचने की सोच रहे है.” करण ने कहा.

“ह्म्म्म …मैं पेपर्स बना सकती हूँ.” निहारिका अपने केबिन में जाती हुई बोली, करण भी उसके पीछे पीछे केबिन में चला गया.

“मेरे डैड ने तुम्हारे डैड को एडवाईज किया था की वो बंगला नहीं खरीदे, पर तुम्हारे डैड नहीं माने, वैसे तुम तो लन्दन में रहते थे ना?.” निहारिका ने कहा.

“हाँ मैं लन्दन में रहता हूँ पर अभी बंगले के काम से इंडिया आया था.”

“पर तुम कहा रुके हुए हो ?”

“मैं अपने बंगले में ही रहता हूँ.”

“क्या …?? तुम उस भूत बंगले में कैसे रह सकते हो.” निहारिका ने हैरानी से पुछा.

 
भूत बंगले का नाम सुन कर करण चुप रहा, वो खुद कोंफुसे था की क्या कहे, इसीलिए उसने हल्के से मुस्करा दिया. भले ही निहारिका खूबसूरत थी पर हमारा करण भी कम हैण्डसम नहीं था. निहारिका पहली ही मुलाकात में ही करण के प्रति आकर्षितहो गयी.

“तुम मेरे बंगले के बारे में क्या जानती हो ?” करण ने निहारिका से पुछा इस उम्मीद में की उसे कुछ पाता चल सके बंगले के बारे में |

“उम्म्म…..ज्यादा तो नहीं, बस इतना पाता है की लोग कहते है वहां भूत प्रेत रहते है.” निहारिका ने जवाब दिया.

“क्या तुम्हे विश्वास है इन बातो पर ?” करण ने फिर पुछा.

“नहीं .....पर इन गाँव के लोगो को कौन समझाए की यह सब फालतू की बातें सिर्फ अंधविश्वास है, उनका भ्रम है.” निहारिका ने कहा. उसने देखा की करण अपने ही ख्यालों में खोया हुआ है. करण निहारिका को पहली नज़र में ही पसंद आने लगा था.

“वो ….कितना क्यूट लड़का है.” निहारिका धीरे से कहे बिना नहीं रह पाई.

“जी आपने कुछ कहा ?” करण निहारिका की पूरी बात नहीं सुन पाया.

“ओह्ह नो नो……मैं सोच रही थी की तुम जब से आये हो तब से कुछ खोये खोये हुए हो, क्या कुछ परेशानी है ?” निहारिका ने बड़े प्यार से पुछा.

“अरे नहीं ….कोई प्रॉब्लम नहीं है.” करण बात को टालना चाहता था.

“आई होप सो……खैर क्या हम दोस्त बन सकते है ?” निहारिका ने आखिर अपनी दिल की बात कह ही दी.

“मुझे ख़ुशी होगी आप जैसी खूबसूरत लड़की से दोस्ती कर के.” करण ने मुस्कुरा के कहा, एक पल के लिए वो भी निहारिका की खूबसूरती में खो गया, वो भूल गया की अभी उसके साथ बंगले में क्या हुआ था, वो तो बस सामने खड़ी निहारिका को निहारे जा रहा था. करण को लग रहा था की इस लड्खी को देखने से उसके सारे टेंशन दूर हो गए.

थोड़ी देर तक शान्ति रही, दोनों चुप थे, दोनों को कुछ समझ में नहीं आ रह था की अब बात को आगे कैसे बढाया जाए.

“वैसे प्यार से मेरे दोस्त और मोम डैड मुझे ‘निहा’ कहते है.” निहारिका ने शुरुआत की और अदा से इठलाते हुए कहा.

“ ‘निहा’….गुड नेम…..” करण ने कहा.

फिर शान्ति हो गयी. दोनों को कोई विषय ही नहीं मिल रहा था अपनी बात आगे बढाने का, पर इस बार फिर निहारिका ने पहल की.

“मैंने तुम्हारे बंगले के पेपर्स तैयार कर दिए है, पर कम से कम एक हफ्ता तो लग जायेगा कोर्ट के हस्ताक्षर के लिए.” निहारिका ने पेपर्स पे करण के हस्ताक्षर ले लिए और उसको फाईनल पेपर्स एक हफ्ते बाद देने को बोला.

बंगले का नाम सुनकर करण को वो सब वापस याद आ गया जो फिलहाल उसके साथ हुआ था. जो भी अत्प्रत्याषित घटनाएं उसके साथ हो रही थी वो बड़ी ही रहस्यमयी थी.

हालाँकि करण को भी निहारिका अच्छी लगी पर फिलहाल वो बहुत डिस्टरब था इसीलिए उसका इस पे ध्यान ही नहीं गया की निहारिका उसको प्यार से देखे जा रही है.

“अब मुझे चलना चाहिए निहा……”

“क्यों …? अभी तो तुम आये हो, अभी अभी तो हम नए दोस्त बने है, कुछ देर रुक जाओ.” निहारिका ने बड़ी मासूमियत से कहा.

“नहीं निहारिका वैसे भी शाम ढल चुकी है, मेरा अब चलना ही ठीक होगा.” कहकर करण उठ गया.

“मैं तुम्हे रोकूंगी नहीं, पर मेरा मोबाइल नंबर ले लो कही कुछ काम पड़ जाए.” कहते हुए निहारिका ने अपना नंबर करण को दे दिया जिसे लेके करण उसको गुड बाय कहकर बाहर आ गया. बाहर मोहर कार के पास उसका इंतज़ार कर रहा था.

वहा से काम होने के बाद दोनों बंगले पे लौट आये

रास्ते भर करण बंगले में हुए घटनाओं के बारे में सोच रहा था. अब तो उसे बंगले के अन्दर जाने में डर लगने लगा था. पर उसके दिल में आज निहारिका के साथ पहली मुलाकात के सुहावने पल भी थे. पहली बार उसे लग रहा था की अगर वो किसी से प्यार कर सकता है तो वो सिर्फ निहारिका ही है.

पर फिर भी रह रह कर उसे बंगले में हुए घटनाये याद आ रही थी.

“मैंने कभी भूत प्रेतों पे विश्वास नहीं किया, पर जो कल से मेरे साथ हो रहा है, वो सब क्या है, कही गाँव के लोग जो कहते है वो सच तो नहीं.” करण सोचने लगा.

 
चैप्टर 8: एक रात बंगले पर अकेला

आज रात करण बंगले में अकेला था. मनोहर अपनी पत्नी को लाने अपने गाँव गया हुआ था.

“कमबख्त मनोहर को भी आज ही जाना था.” करण ने खीजते हुए कहा.

आज वो अपने कमरे में नहीं सोना चाहता था, एक अनजाना डर था उसके मन में, इसीलिए आज रात वो बाहर हॉल में ही सो गया.

आधी रात का समय था. चारो तरफ सन्नाटा था. ठण्ड भी पड़ने लगी थी. बंगले में बस बाहर पोर्टिको में लाइट जल रही थी, और बाकी पूरे बंगले में अँधेरा था. रात इतनी घनी थी की जैसे मानो शैतान ने अपना काला साया हर जगह फैलाया हुआ था.

जहाँ करण सोया था वह चांदनी रौशनी हलकी हलकी आ रही है. ठण्ड के वजह से करण रजाई पूरा तान के सोया था.

“क ….अ ….….र ……..अ ……..न”

करण के कानो में हलकी आवाज़ गूँज उठी. करण के कान खड़े हो गए, वो अपनी कच्ची नींद से जाग गया.

क ….अ ….….र ……..अ ……..न” वो आवाज़ फिर आई पर इस बार वो किसी लड़की की आवाज़ थी.

“माय फूट…..बहुत हो गया चूहे बिल्ली का खेल, मैं तो आज देख के ही रहूँगा की आखिर यह सबका माजरा क्या है.” वो उठा और पास में पड़ा एक बांस की लाठी उठा के ऊपर वाले कमरे की तरफ चल दिया.

“आज तो देख के ही रहूँगा की कौन है यह सब के पीछे, कही कोई मुझसे मजाक तो नहीं कर रहा.” वो हिम्मत जुटा के उस कमरे तक पहुच गया. उसने दिन में उस कमरे में कुण्डी लगायी थी, इसलिए उसने उस कुण्डी को खोल के दरवाज़ा खोलना चाहा पर दरवाज़ा नहीं खुला.

“ये वोही कमरा है जिसमे से मुझे उस लड़की के गाना गाने की आवाज़ आ रही थी और वो रहस्यमयी कागज़ मिला था. यही कमरा मेरे सपनो में आता था …फुक्क सारी गड़बड़ी इसी कमरे से होती है क्या.”

“अरे यह कमरा तो अन्दर से आज फिर बंद है, जैसे किसी ने अन्दर से कुण्डी लगायी हो.” वो ताक़त लगाके दरवाज़ा खोलने की कोशिश कर रहा था.

तभी उसे अन्दर से किसी के बोलने की हल्की आवाज़े आने लगी. करण ने अन्दर झाँकने की कोशिश की पर कुछ दिखाई नहीं दिया.

 
“अन्दर ज़रूर कुछ गड़बड़ है, अन्दर से एक आदमी और एक लड़की की आवाज़ आ रही है, मुझे देखना ही होगा की आखिर चल क्या रहा है यहाँ.”

करण ने खिड़की के अन्दर हाथ सरकाने की कोशिश की. फिर उसने अन्दर से पर्दा हटा दिया. उसके बाद उसने जो देखा वो सबसे ज्यादा हैरत करने वाला था. अन्दर पूरे कमरे में सफ़ेद धुन्दला या धुंध फैली हुई थी. लग रहा था की पूरे कमरे में किसी ने आसमान के बादल भर दिए हो, कुछ भी ठीक से नहीं दिखाई दे रहा था.

अन्दर एक आदमी शेरवानी में खड़ा था, उसके हाथो में एक बड़ी सी थाली थी जिसमे खूब सारी मिठाई और फल थे. करण ने देखा की उस आदमी के सामने एक लड़की लाल लहंगे में खड़ी थी.

वह लड़की सजी धजी ढेर सारे हीरे, जवाहरात, और सोने की माला पहने हुए थी. करण को उन दोनों का चेहरा ठीक से दिखाई नहीं दे रहा था क्यूंकि अन्दर सिर्फ हल्की चांदनी रौशनी ही थी. उसे लगा की चोर होंगे या कोई अनजान लोग अन्दर घुस आये थे.

“ए !….तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो, यह मेरा बंगला है समझे, चुप चाप बाहर निकाल आओ वर्ना मैं अभी पुलीस को बुलाता हूँ.”

करण खिड़की खटखटाते हुए चिल्लाया.

पर अन्दर कोई उसकी बात ही नहीं सुन रहा था. करण को पहले बहुत गुस्सा आया, वो फिर चिल्लाया पर अन्दर से दोनों का कोई जवाब ही नहीं आया जैसे करण की बातें उन तक पहुँच ही नहीं रही हो.

अन्दर से उस लड़की ने उस आदमी से कहा, “आईये जीजा जी, कैसे आना हुआ आपका यहाँ.”

“मैं तुम्हारे लिए शगुन लाया हूँ, ये फल और मिठाई स्वीकार करो.” उस आदमी ने फलो से भरी थाली उस लड़की के आगे रख दी.

करण अपनी आँखे मलने लगा, उसे विशवास ही नहीं हो रहा था जो वो देख रहा था. वो आदमी और लड़की ऐसे बात कर रहे थे जैसे उन्हें पता ही न हो की करण बाहर से उन्हें देख रहा है.

 

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