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Horror भूत बंगला

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अन्दर चुदाई जोरो से चल रही थी. नीचे से मनोहर एक हाथ से रेखा की नंगी कमर और दूसरी से उसकी एक चूची पकड़ के तेज़ रफ़्तार से धक्के मर रहा था. रेखा भी अपना पूरा जोर लगा के मनोहर के लंड पे ऊपर नीचे बैठ रही थी. पूरे कमरे में चुदाई ही चुदाई चल रही थी.

“रेखा ….म्हारी बन्नो ….म्हारा निकल रहा है.” मनोहर कहते हुए रेखा को अपने से चिपका लिया.

करण समझ गया की मनोहर झड गया है. रेखा की चूत में ढेर सारा वीर्य भर गया जो धीरे धीरे बाहर निकलने लगा. दोनों मियां बीवी चुदाई के बाद पस्त हो गए. कमरे के अन्दर ख़ामोशी छा गयी.

करण को लगा की इस से पहले उन दोनों को पता चले की वो उन्हें चुपके से देख रहा है, उसे पतली गली से निकल जाना चाहिए.

करण आखरी बार रेखा की गुदाज़ गान्ड निहार रहा था की रेखा पीछे मुड़ी और करण को देखने लगी.

करण अचानक से घबरा गया. उसकी चोरी पकड़ी गयी थी, उसे रेखा ने खिड़की के बाहर देख लिया था. करण का चेहरा शर्म से लाल हो गया, पर फिर उसके बाद जो उसने देखा इस से उसका चेहरा शर्म से नहीं खौफ्फ़ और डर से लाल हो गया.
 
तभी कमरे में एक ज़ोरदार चीख गूंजी.

“आःह्ह ………” चीख मनोहर की थी.

सामने रेखा अभी भी मनोहर की जांघो के ऊपर बैठी थी, उसकी बुर में उसका लंड अभी भी फंसा पड़ा था, जिस से वीर्य धीरे धीरे रिस रहा था. करण ने देखा की रेखा की आँखे खून जैसी लाल हो गयी थी, और उसके लम्बे बाल जो उसकी गान्ड तक आते थे वो खड़े हो गए थे.

आँखों में खून उतरा देख करण घबरा गया. फिर आई रेखा के हसने की आवाज़. करण को मानो सांप सूंघ गया, जैसे काटो तो खून नहीं . अचानक कमरे का दरवाज़ा खुल गया और जैसे एक रूहानी ताक़त ने उसे कमरे के अन्दर खींच लिया.

रेखा बिस्तर से उतरी, वो अभी भी नंगी थी. उसकी आँखे लाल थी. इसके बाद करण ने जो देखा, उसने उसके होश उड़ा दिए. सामने मनोहर की लाश पड़ी हुई थी. उसका पूरा सीना खून से लथपथ था. चेहरा बुरी तरह से नोच लिया गया था. सीने पे गहरे जख्म थे. लाश की दोनों आँखे निकाल दी गयी थी.

तेज़ हवाओं से परदे उड़ने लगे थे, खिडकिया जोरो से खटखटाने लगी थी, खिडकियों के कांच चकना चूर हो गए थे. कमरे की लाइट अपने अप्प ओन ऑफ होने लगी थी. वातावरण में एका एक अचानक ठण्ड बहुत बढ़ गयी थी. वो कमरा नहीं नरक लग रहा था, लगता था की दुनिया की सारी रूहानी ताक़त करण के सामने आ गयी थी. ऐसा नज़ारा किसी कमज़ोर दिल वाले के देखने के लिए नहीं था, बड़ा ही खौफ्फ्नाक मंज़र था वहां.

रेखा के नाखूनों पे खून देखकर करण समझ गया की रेखा ने मनोहर की छाती चीर के फाड़ दी है. करण ने जब रेखा को देखा तो उसे अपने सामने मौत दिखाई दी. रेखा उसे ही घूर रही थी.

“इस बंगले में तेरे आने की हिम्मत कैसे हुई ……….अब तू मरेगा …!!!” रेखा के मुह से एक भयंकर आवाज़ निकली जो की एक आदमी की थी.

करण जानता था की रेखा गूंगी है, पर उसके मुह से आती ऐसी आवाज़ सुन कर उसे येकीन हो गया की रेखा पे भूत प्रेतों का साया आ गया है.

अगले ही पल रेखा, करण की तरफ बढ़ी और उसे गर्दन से पकड़ के दूर उछाल दिया. उसमे हज़ार हाथियों की ताक़त आ गयी थी. करण सामने रखे शीशे से टकराया जिस से शीशा चकना चूर हो गया. कांच के छोटे छोटे टुकड़े उसकी पीठ में गड गए, उसकी पीठ पीछे से पूरी छलनी हो गयी थी जिस से बहुत खून निकल रहा था, इस से उसे असहनीय दर्द होने लगा. उसकी दाई जांघ में शीशे का एक बड़ा टुकड़ा अन्दर तक धंस गया जिस से बहुत सा खून निकलने लगा.

वो हिम्मत कर के उठने की कोशिश करने लगा पर सामने आती रेखा को देख कर उसकी हिम्मत जवाब दे गयी और वो वहीँ गिर पड़ा.

“मरेगा तू ……जैसे बाकी सब मरे थे वैसे ही मरेगा.” रेखा शैतानो वाली आवाज़ में दहाड़ रही थी.

वो आगे बड़ी और करण को उठाया और उसकी आँखों में घूर घूर के देखने लगी. साफ़ साफ़ शैतान की नज़र थी उसमे, आँखें खून जैसी लाल थी उसकी. करण के अलावा अगर कोई और कमज़ोर दिल का होता तो वही हार्ट अटैक से मर जाता.

“यह बंगला मेरा है …..और मिहिका भी मेरी है…..कोई भी इस बंगले में कदम भी रखेगा तो उसे सिर्फ मौत मिलेगी.” रेखा के बदन से प्रेत की आवाज़ आ रही थी.

करण को आज अपना काल अपने सामने दिख रहा था, उसे अब लगने लगा था की वो आज यहाँ इस भूत बंगला से उसकी लाश ही बाहर जाएगी. आखिर एक इंसान एक पारलौकिक शक्ति का सामना कर भी कैसे सकता है. रेखा के नाज़ुक शरीर में शैतानी ताक़त आ गयी थी. उसने करण की गर्दन पकड़ ली और दबाने लगी. वो पूरा जोर लगा के अपने आपको बचने की बेकार कोशिश कर रहा था. आज तो जैसे उसकी मौत तय थी.

करण का दम घुटने लगा पर रेखा ने उसकी गर्दन नहीं छोड़ी. तभी अचानक एक चमत्कार हुआ. करण ने देखा की एक सफ़ेद रौशनी उस कमरे में आई, जो एक धुंधली आकृति में बदल गयी जो किसी लड़की की थी.
 
“मुझे बचा लो ……मैंने सालो से तुम्हारा इंतज़ार किया है …मुझे छोड़ के मत जाना ….” उस आकृति की आवाज़ आई, और तभी करण, रेखा की पकड़ से आज़ाद हो गया.

वो समझ गया की वो वही लड़की थी जिसे उसने पिछली रात उसका बलात्कार होते देखा था.

करण अपने पूरे जी जान से भागने लगा. उसकी पूरी पीठ लहू लुहान थी कांच चुभ जाने से, जीस से उसको बहुत दर्द हो रहा था. कुछ कांच के टुकड़े उसकी जांघ में भी चुभ गए थे जिस से बहुत खून निकल रहा था. फिर भी वो लडखडाता हुआ उस भूत बंगले से दूर भाग गया.

वो यहाँ एक मनोहर को ही जानता था पर अब तो उसकी भी दर्दनाक मौत हो चुकी थी. यह सब इतना जल्दी हुआ की उसे मनोहर की मौत का गम महसूस करने का भी समय नहीं मिला.

बदहवास सा, पागल सा, वो बस बंगले से जितना दूर हो सके भाग जाना चाहता था. उसके समझ में कुछ नहीं आ रहा था की वो कहाँ जाए. बाहर कुल्फी जमा देने वाली ठण्ड थी. वो इस अनजान शहर में किसी को भी नहीं जानता था, और वो भी इस वक़्त आधी रात को तो वो कहीं किसी की मदद भी नहीं ले सकता था.
 
चैप्टर 10: प्यारे पंछी

वो लडखडाता, गिरता पड़ता एक घर के सामने आ गया जिसे वो जानता था. उसने घंटी बजायी, पर किसी ने दरवज़ा नहीं खोला.

“निहारिका प्लीज़ दरवाज़ा खोलो……….” करण दरवाज़ा पीटते हुए बोला.

दरवाज़ा खुला और नाईट गाउन पहनी निहारिका बाहर आई. “अरे…करण मल्होत्रा .….तुम इस वक़्त आधी रात को यहाँ ?” निहारिका करण को ऐसे इस हालत में देख कर हैरान थी.

करण ने उसकी बात नहीं सुनी और उसके बगल से होता हुआ घर के अन्दर घुस के दरवाज़ा अन्दर से लोक कर लिया. घर में शान्ति फैली हुई थी, निहारिका अभी भी करण को हैरानी से देखी जा रही थी.

“आखिर हुआ क्या ….कुछ तो बोलो …” निहारिका भी अब घबरा गयी.

“उस्सस….उस्सस….बंग ले में भूत प्रेत है ...” करण हकलाते हुए बोला, बाहर जोरो की ठण्ड पड़ रही थी इसलिए वो ठण्ड से कांप रहा था.

“क्या ? …..तुम मजाक तो नहीं कर रहे हो.” निहारिका ने कहा.

“नहीं … निहारिका मैं सच कह रहा हूँ ……पहले तो मैंने भी विश्वास नहीं किया पर अब तो मुझे यकीन से भी भी ज्यादा यकीन है की वो बंगला भूतिया है ……मैं जिस आदमी के साथ तुम्हारे पास आया था न ….उसका नाम मनोहर था …… और अभी अभी उस …उस …आत्मा ने उसे मार दिया ….” करण अभी भी दहशत में था, वो बुरी तरह से हांफ रहा था. रह रह कर उसे मनोहर की लाश और रेखा का खुनी रूप याद आ रहा था.

“क्या ..???...वो आदमी मर गया.” निहारिका के भी रोंगटे खड़े हो गए.

निहारिका करण को इस हालत में देख कर काफी परेशान हो गयी. गाँव के लोग उस बंगले को भूतिया बताते थे पर वो मोडर्न लड़की थी, पढ़ी लिखी थी, इसीलिए उसे इन बातो पे विश्वास नहीं था.

“प्लीज़ रिलेक्स करण !….तुम यहाँ बैठो मैं तुम्हारे लिए ओरेंज जूस लाती हूँ …” निहारिका ने प्यार से करण के कंधो पर हाथ रख कर उसे समझाने की कोशिश की.

“कैसे रिलेक्स करू निहा ……जब से मैं उस बंगले में आया हूँ तब से मेरे साथ ऐसी ऐसी घटनाये हो रही है, जिस से अगर मेरी जगह कोई और होता तो ज़रूर पागल हो जाता.” करण ने निहारिका के हाथो को जोर से थाम लिया. उसकी कोमल हाथो की गर्मी उसे अच्छी लग रही थी.

“तुम पहले बैठो, मैं तुम्हारे लिए जूस लाती हूँ, फिर तुम मुझे शुरू से सारी बात बताओ…” कहके निहारिका ने करण को सोफा पे बैठा दिया और खुद उसके लिए जूस लाने चली गयी.

करण अभी भी सदमे में था. वो दिमागी रूप से बहुत थक गया था. जिस पीने और निहारिका के प्यारे से चेहरे को देखने के बाद उसे थोडा सुकून आया.
 
करण अभी भी सदमे में था. वो दिमागी रूप से बहुत थक गया था. जिस पीने और निहारिका के प्यारे से चेहरे को देखने के बाद उसे थोडा सुकून आया.

“ओह्ह माय गोड ….यह क्या हुआ तुम्हे …?...तुम्हारे पीठ से खून निकल रहा है..” निहारिका की नज़र अचानक ही करण के लहू लुहानपीठ पे पड़ी. करण का टीशर्ट पीछे से पूरा खून से सन्न गया था.

“समझलो मैं बस किसी तरह से भगा हूँ उस भूतिया बंगले से …” करण ने कहा.

“तुम्हारे थिघ्स से भी खून निकल रह है …” निहारिका करण के घाव देख के परेशान हो गयी.

“कोई बात नहीं मामूली सा ज़ख्म है, ठीक हो जायेगा अपने आप.”

“तुम पागल हो गए हो क्या ? ऐसे घाव को अगर खुला छोड़ दिया तो संक्रमण हो सकता है समझे ….मैं किसी डॉक्टर को बुलाती हूँ .”

“नहीं निहारिका ….प्लीज़ रहने दो, इतनी आधी रात को डॉक्टर कैसे आएगा.”

“अरे ऐसे कैसे चलेगा …..अच्छा चलो ठीक है डॉक्टर को नहीं बुलवाना मत बुलवाओ, कम से कम मुझे तो ड्रेससिंग करने दो अपने घाव की.” निहारिका ने बड़े प्यार से कहा. उसके बोलने में करण के प्रति लगाव था, जो सिर्फ आम दोस्त में नहीं हो सकता था. यह रिश्ता दोस्ती से कही आगे जाने वाला था. धीरे धीरे उनमे प्यार के बीज पनपने लगे थे.

करण की ख़ामोशी को उसकी हामी समझ कर निहारिका उठ के फर्स्ट-एड-बॉक्स लाने चली गयी.

“चलो मेरे बेडरूम में, वहां आग जल रही है, यहाँ पे बहुत ठण्ड है ….वहीँ पर तुम्हारे घाव की ड्रेससिंग हो जाएगी.” निहारिका ने कहा.

“बेडरूम में …? वो भी अकेले, आधी रात को जाना अच्छा नहीं होगा, अगर किसी ने देख लिया तो क्या सोचेगा.” करण को थोड़ी शर्म भी आ रही थी.

“तुम सही में पागल हो …यहाँ मैं अकेली हूँ ….और तुम्हे फ़िक्र करने की ज़रुरत नहीं है की लोग क्या सोचेंगे …समझे.” निहारिका ने फिर वोही प्यार से अदा के साथ कहा और करण का हाथ पकड़ के उसे अपने कंधे पे सहारा दे के अपने बेडरूम में ले गयी.

“थैंक्स निहा ….अगर तुम ना होती तो मैं इस वक़्त कहाँ जाता ?” करण निहारिका का सहारा लेकर उसके बेड पे बैठ गया.
 
“अब प्लीज़ थैंक्स मत कहो …..अगर मैं तुम्हारी ‘पत्नी’ होती तब भी क्या तुम मुझे थैंक्स कहते ...” निहारिका ने जाने अनजाने में बहुत बड़ी बात कह दी. उसके मन में जो था वो ना चाहकर भी बाहर आ गया.

निहारिका की बात सुनकर करण ने उसकी तरफ देखा और देखता ही रह गया. सारे जहाँ की मासूमियत उस हूर की परी के चेहरे में समायी थी. किसी आदमी के जीवन में अगर उसको एक प्यारी सी औरत का साथ मिल जाये तो उसकी सारी मुश्किलें आसान हो जाती है.

वो हर सुख-दुःख में आपका साथ देती है, लडती है, झगडती है, फिर भी अपने जीवन साथी को बहुत प्यार करती है, और ज़रुरत पड़ने पे अपनी जान दे भी सकती है और ले भी सकती है.

“ऐसे क्या देख रहे हो मुझ में …. ?” निहारिका ने करण को अपने तरफ देखते हुए पाया.

करण हल्का सा झेंप गया, उसके गोरे चेहरे पे हलकी लाली सी आ गई. निहारिका को भी पता चल गया था की करण उसको पसंद करने लगा है. कुछ देर दोनों में कोई बात नहीं हुई. करण एक अच्छे व्यक्तित्व का लड़का था, आम तौर पर उसे लडकियों से बातें करने में कोई हीच-किचाहट नहीं होती थी, पर निहारिका के सामने उसकी बोलती बंद हो जाती थी.

दोनों को आँखों देखा प्यार हो गया था. करण की ज़िन्दगी में बहुत सी लडकिय आई और गयी पर आज निहारिका ने ही उसके दिल की घंटी बजायी थी. निहारिका के कॉलेज में भी कई लड़के उसके पीछे घुमते थे, पर वो किसी को घास नहीं डालती थी. शायद उसकी किस्मत में करण से ही मिलना लिखा था.

निहारिका उठी और कमरे में लगे फायर-प्लेस जहाँ आग जलाई जाती है उसे जला दिया. बाहर ठण्ड बहुत पड़ रही थी, और इस ठण्ड में करण की हालत बहुत ख़राब थी, उसे गर्मी की सख्त ज़रुरत थी.

“चलो अपना टीशर्ट उतारो ….ड्रेससिंग करना है.” निहारिका ने कहा.

“नहीं ….तुम ऐसे ही ड्रेससिंग कर दो …”

“अरे तुम तो लडकियों की तरह शर्मा रहे हो …..अगर टीशर्ट नहीं उतारोगे तो मैं ड्रेससिंग नहीं कर पाऊँगी.” निहारिका ने बिना करण के जवाब का इंतज़ार के जबरदस्ती उसका टीशर्ट उतर दिया.

कमरे में ज्यादा रौशनी नहीं थी, बस आग जलने से थोड़ी रौशनी आ रही थी, जिसमे करण की गोरी छाती चमक रही थी. निहारिका भी अपने मन में उसके रूप की प्रशंसा किये बगैर ना रह सकी. उसका मन करण की छाती से लिपट जाने का कर रहा था.

पीठ के घाव की ड्रेससिंग में थोडा वक़्त लग गया. जिस प्रेम भाव से निहारिका करण की ड्रेससिंग कर रही थी वैसे शायद कोई पत्नी ही अपने पति के लिए कर सकती थी.

“चलो अब अपनी जींस उतारो, तुम्हारी जांघो की भी ड्रेससिंग करनी है.”
 
“अरे मैं पेंट नहीं उतार सकता …प्लीज़ समझा करो.” करण को शर्म तो आ ही रही थी.

निहारिका ने भी इसपे ज्यादा जोर नहीं दिया और उसके पेंट को जांघ तक चढ़ा कर उसके घावो की मरहम पट्टी कर दी. दवाई देने के बाद उसने करण को अपने बिस्तर पर लिटा दिया. अब करण को बेहतर महसूस हो रहा था.

“निहारिका ….तुम सच में बहुत स्वीट हो ….”

“अच्छा अच्छा ठीक है ज्यादा तारीफ करने की ज़रुरत नहीं है, तुम आराम करो, सुबह होने में बस तीन चार घंटे है.”

“पर तुम सोने कहाँ जाओगी...”

“तुम मेरी फ़िक्र मत करो, मैं बगल वाले रूम में सो जाउंगी …और अब तुम रिलेक्स करो…गुड नाईट.” निहारिका ने प्यार से करण के माथे पे किस किया और उसे रजाई ओढा के कमरे से बाहर चली गयी.

रजाई ओढ़ते ही करण को उसमे से निहारिका के जिस्म की खुशबू आई, और वो उसमे मदहोश हो गया. उसे कब नींद आ गयी उसे पता ही नहीं चला.
 
चैप्टर 11: बंगले पर दुबारा आना

सुबह के करीब दस बज रहे थे. करण की ज़िन्दगी में जो आंधी तूफ़ान आया हुआ था उस से वो बहुत थक गया था. निहारिका उसको जगाने के लिए अपने कमरे में आई.

“उठो …..देखो धुप निकल आई है, और बाहर आके चाय पिलो, तुम्हे अच्छा लगेगा ...” निहारिका ने फिर बड़े प्यार से करण के माथे को चूमा और उसे अपने पापा का एक शर्ट देके बाहर चली गयी.

करण तो उस युवती के सम्मोहन में मोहित हो गया था. जिस अदा से निहारिका करण से बात करती थी, उसका इतना ख़याल रख रही थी, उस से उसका दिल घायल हो गया था. वो उठ गया और बाहर गार्डन में आ गया. अच्छी खासी धुप खिली थी, और ठण्ड भी थोड़ी कम थी.

करण, निहारिका के बगल में एक खाली कुर्सी पर बैठ गया. निहारिका ने एक सफ़ेद रंग की चूड़ीदार सलवार कमीज़ और लाल रंग का राजस्थानी दुपट्टा पहन रखा था. बिना मेकअप के भी वो बहुत खूबसूरत लग रही थी.

करण उसको देखता रह गया लेकिन उसको रात में हुए उस लड़की का बलात्कार याद आ गया. वोही चेहरा वोही शक्ल, वो लड़की हूँ-ब-हूँ निहारिका से मिलती थी, जैसे उसकी कोई जुड़वां बहन हो. उस लड़की के साथ घटे उस घटना ने करण को मायूस कर दिया.

“अब कैसा फील हो रहा है ….?” निहारिका ने पुछा, और चाय पीने लगी.

“कल रात से बेहतर है, पर थोडा दर्द अभी भी बाकि है.” करण ने भी चाय का कप उठा लिया.

“अच्छा कल हुआ क्या था, जो तुम आधी रात को यहाँ आने पर मजबूर हो गए …?”

“अगर उस बंगले से नहीं भागता तो पक्का जिंदा नहीं बचता …”

“क्या …!!! यह क्या कह रहे हो …???” निहारिका भौचक्की रह गयी.

“हाँ कल रात मुझपे जानलेवा हमला हुआ था.”

“नो वे….ऐसा नहीं हो सकता, तुम्हे कौन नुकसान पहुँचाना चाहेगा, तुम तो यहाँ नए हो ना.”

“मुझे ही क्या, अब तो मुझे यकीन हो गया है की, कोई भी अगर उस बंगले में रहेगा तो उसे सिर्फ मौत मिलेगी.”

“माय गोड …मुझे यकीन नहीं हो रहा की तुम्हारे जैसे पढ़े लिखे, और लन्दन में रहने वाले लड़के को भी इन अन्धविश्वासो पर यकीन होगा.”

“मुझे सच में पहले यकीन नहीं था, पर जो मेरे साथ इन चंद दिनों से हो रहा है, वो सिर्फ मैं ही जानता हूँ...”
 
“करण लगता है की तुम्हारा कल कोई एक्सिडेंट हो गया होगा, जो तुम्हें याद नहीं है और उसी के सदमे में तुम ऐसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो.” निहारिका को करण की बातो पर यकीन नहीं हो रहा था.

“तो तुम्हें क्या लगता है की मैं पागल हूँ …..और मेरे साथ कोई एक्सिडेंट वगैरह नहीं हुआ ……खैर छोडो जब तुम्हे मेरी बातो पर यकीन ही नहीं है, तो मैं आगे बात नहीं करना चाहता.” करण को गुस्सा आ रहा था, जिस मुसीबतों से वो गुजरा था उसके बाद कोई आप पे भरोसा ना करे तो गुस्सा तो आयेगा ही.

“अरे प्लीज़ नाराज़ मत हो …..आई ऍम सॉरी.” निहारिका ने मासूम सी शक्ल बनायीं और हल्के से अपने कान पकड़ लिया माफ़ी मांगने के लिए. उसका प्यारा सा क्यूट सा चेहरा देख कर करण सब गुस्सा भूल गया.

“अच्छा कल तुम मुझसे फ़ोन पर कह रहे थे की तुम्हें मुझसे कोई ज़रूरी बात करनी है …?” निहारिका को फ़ोन की बात याद गयी.

“छोडो यार जब तुम्हें मुझपे यकीन ही नहीं है ….तो बता के क्या फायदा.”

“ओह्ह कमऑन करण, तुमपे मुझे खुद से भी ज्यादा यकीन है …अब जल्दी से बताओ तुम्हें क्या कहना था ...”

“निहारिका, मैं जो भी कहने जा रहा हूँ उसे बड़े ध्यान से सुनना, और मेरी बातों का बुरा मत मानना.” करण गंभीर हो गया और अपनी कुर्सी निहारिका के और पास करके ठीक उसके बगल में बैठ गया.

“अरे मैं क्यों बुरा मानूंगी, जो भी है जल्दी से बताओ.” निहारिका बेसब्र हो गयी थी, उसे तो बस जानना था की आखिर ऐसी क्या चीज़ थी जिस से उस दिन करण इतना परेशान हो गया था.

“तो फिर ठीक है तो सुनो …..परसों रात मैं बंगले में अकेला था, मनोहर अपनी बीवी को लाने अपने गाँव गया हुआ था. मैं बाहर हॉल में अभी सोया ही था की मेरे कानो में आवाज़ पड़ी.” करण ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा.

“कैसी आवाज़ ….?” निहारिका ने पुछा.

“एक लड़की की …..ऐसा लग रहा था वो मेरा नाम लेके मुझे अपने तरफ बुला रही है.”

“कौन थी वो …?” निहारिका ने फिर सवाल किया.

“मुझे नहीं पता ….” करण ने जवाब दिया.

“खैर मैं उठ गया और उस आवाज़ का पीछा करने लगा और अपने बंगले के ऊपर वाली मंजिल के एक कमरे के बाहर पहुच गया.” उसने बात जारी रखते हुए कहा.
 
“कौन थी वो …?” निहारिका ने फिर सवाल किया.

“मुझे नहीं पता ….” करण ने जवाब दिया.

“खैर मैं उठ गया और उस आवाज़ का पीछा करने लगा और अपने बंगले के ऊपर वाली मंजिल के एक कमरे के बाहर पहुच गया.” उसने बात जारी रखते हुए कहा.

“वहां पहुच के मैंने दरवाज़ा खोलना चाहा, पर दरवाज़ा अपने आप अन्दर से बंद था, मैं अन्दर नहीं जा पा रहा था.”

करण बोलते जा रहा था और निहारिका का मुंह हैरत से खुलता जा रहा था, “अन्दर पूरे कमरे में धुंध फैली हुई थी, कुछ भी सही से नहीं दिखाई दे रहा था, फिर भी मैंने कोशिश कर के अन्दर देखा तो मुझे वहां एक लड़की दिखाई दी, उसने लाल लहंगा पहना हुआ था और एक आदमी भी था वहां.”

निहारिका चुप-चाप सब सुन रही थी.

“पहले तो मुझे लगा की कोई चोर उचक्के घुस आये है बंगले में, मैंने उन्हें पुलीस की धमकी भी दी, पर मानो मेरी आवाज़ अन्दर ही नहीं जा रही थी.”

करण बोलके थोड़ी देर रुका….

“फिर देखते ही देखते वो आदमी उस लड़की पर झपट पड़ा ….और ….और …उसका बलात्कार करने लगा.” करण रुआंसा हो गया. उसकी आँखे हलकी नाम हो गयी, और उसका गला बैठ गया.

“ओह माय गोड ….यह तुम क्या कह रहे हो ….?” निहारिका को अपने कानो पर यकीन नहीं हो रहा था.

“वो बलात्कार बहुत ही दर्दनाक था ….मैंने बहुत कोशिश करी की मैं उस लड़की को बचा सकूँ, पर दरवाज़ा खुलने का नाम ही नहीं ले रहा था.” करण ने अपनी आँखों से आंसू पूंछते हुए कहा.

“यानी उस लड़की का रेप हो गया …….और तुम बस देखते ही रहे ..”

“तुम पूरी बात सुनो तो पहले …….जब उस लड़की का बलात्कार हो गया, फिर उसने पास रखी तलवार उठाई और अपना बलात्कार करने वाले आदमी के सीने में घोंप दी.”

“इसके बाद उस लड़की ने अपने कुवारे जिस्म की अपवित्रता की दुहाई देते हुए वो तलवार अपने पेट में भी घोंप ली और वहीँ दम तोड़ दिया.”

निहारिका का मुंह खुला का खुला रह गया.

“उसके बाद दरवाज़े का लोक अपने आप खुल गया और जैसे ही मैं अन्दर गया तो मुझे वो कमरा पूरा खाली दिखाई दिया ….वो लड़की और वो आदमी की लाशें गायब हो गयी थी ….सब कुछ वैसे ही नोर्मल हो गया था, जैसे वहां कुछ हुआ ही ना हो.”
 

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