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Horror भूत बंगला

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“क …करण ….पल ..प्लीज ….बचाओ …मु …मुझे ….” निहारिका का दम घुटता जा रहा था, उसके नाक से खून की धार निकलने लगी थी.

इधर सर फट जाने से और बहुत सा खून बह जाने से करण को चक्कर आने लगा. वो अपनी पूरी कोशिश कर रहा था की अपने होश पर काबू रख सके, क्यूंकि उसे मालूम था की निहारिका अब ज्यादा देर जिंदा नहीं रह सकती, अगर वो बेहोश हो गया तो निहारिका की मौत पक्की थी.

निहारिका की मौत की कल्पना करते हुए उसका वो प्यार जग गया जो उस निहारिका के प्रति महसूस होता था. उसने अपनी पूरी इच्छाशक्ति बटोरते हुए किसी तरह ज़मीन पे घिसट-घिसट के निहारिका की तरफ बढ़ने लगा. निहारिका ने दर्द मे करण के लिए हाथ आगे बढाया, लेकिन हवाओ का जोर इतना बढ़ गया मानो वो करण को ज़मीन से उखाड़ के दूर फ़ेंक देना चाहती हो.

विपरीत दिशा मे चलती हवाए करण को आगे नहीं बढ़ने दे रही थी. लेकिन उसको पता था की निहारिका की साँसे ज्यादा देर तक नहीं चल सकती. बजरंग बलि हनुमान का नाम लेके उसने आपनी सारी शरीरिक शक्ति और इच्छाशक्ति बटोर कर आगे बढ़ने लगा.

“य़ाआआ ……..” करण चिल्लाता हुआ तेज़ आंधी मे भी घिसटता हुआ आगे बढ़ रहा था. अपने प्यार को बचाने की उसमे प्रबल इच्छाशक्ति और ताक़त का एक नया संचार हो गया था.

अब कोई आंधी भी नहीं रोक सकती थी उसे ….प्यार की ताक़त, शैतानी ताक़त से हमेशा बढ़कर होती है. इसी प्यार की ताक़त और भगवान के आशीर्वाद से वो निहारिका तक पहुँच गया.

निहारिका की गर्दन पे एक अदृश्य ताक़त दबाव डाल रही थी . बजरंग बलि हनुमान का नाम लेते हुए करण ने अपनी सारी ताक़त झोंक दी, और निहारिका की गर्दन पे से उस परलौकिक शक्ति का हाथ हटाने लगा.

उसमे सारे जहाँ की प्यार की शक्ति समां गयी थी, अपने दृढनिश्चय से उसने वो हाथ हटा दिया और निहारिका को उस प्रेत के चंगुल से छुड़ा लिया.

निहारिका की गर्दन छुटते ही कमरे का माहोल वापस से नोर्मल हो गया.

हवाएं चलनी बंद हो गयी. लाइट भी नोर्मल हो गयी. खिडकियों का खटखटाना भी बंद हो गया. जैसे किसी भयानक तूफ़ान के बाद शान्ति आती है वैसा ही कुछ माहोल था उस कमरे का.

करण की बाहों मे निहारिका बेजान पड़ी थी.

“निहा ….तुम्हे कुछ नहीं हो सकता ….प्लीज आँखे खोलो.” करण निहारिका को अपनी बाहों मे पकडे रोने लगा.

“प्लीज तुम मुझे छोड़ के नहीं जा सकती निहारिका ……” करण की आँखों से आंसू की झड़ी लग गयी.

उसे बिलकुल ख्याल नहीं रहा की उसका सर फट गया है जिस से खून बहकर उसके पूरे चेहरे को लाल रंग से रंग दिया है.

उसने निहारिका का बदन कमर से उठा के नीचे हॉल मे आया.

“प्लीज निहारिका लौट आओ ……….हे भगवान कही मुझे देर तो नहीं हो गयी निहारिका को बचाने मे …” उसकी आँखे आंसू से भरी हुई थी.

“निहारिका प्लीज उठो ….देखो मैं तुम्हे छोड़ के लन्दन नहीं जाऊंगा, पर तुम भी मुझे छोड़ के कहीं मत जाना …” करण बिलख-बिलख के रोने लगा.

उसने निहारिका का सीना जोर से दबाया. एक बार मे कुछ नहीं हुआ तो उसने कई बार दबाया इस उम्मीद मे की निहारिका की साँसे वापस चलने लगेंगी. आज तक उसने भगवान से निहारिका की जान से ज्यादा कुछ नहीं माँगा था.

वो कहते है ना की भगवान के घर देर है …अंधेर नहीं. करण की कोशिश रंग लायी और सीना दबाने से निहारिका की साँसे वापस चलनी लगी.

खांसते हुए उसे होश आया. पहली चीज़ जो उसने देखि की उसे प्यार करने वाला एक लड़का उसे अपने बाहों में थामे है, जो अभी उसे मौत के मुह से बचा के लाया है.

“क ….करण ….” निहारिका बस इतना ही कह सकी की करण ने उसके कांपते होठों पे अपने होंठ रख दिए.

बड़ा अजीब मिलन था ये, पिछले कुछ पलों में हम जीवन के सारे रंग देख सकते है. कैसे निहारिका ने करण की इतनी मदद की. वो बहुत रोई थी यह सुनकर की करण उसको छोड़ कर हमेशा के लिए चला जायेगा. फिर निहारिका ने पहली बार दहशत महसूस की, खौफ्फ़ और डर क्या होता है उसे आज पता चल गया. दोनों ने इन कुछ दिनों में मौत को बड़े करीब से देखा था. पर उसे आज यह भी पता चल गया था की प्यार की शक्ति का मुकाबला दुनिया की कोई भी शक्ति नहीं कर सकती थी.
 
बड़ा अजीब मिलन था ये, पिछले कुछ पलों में हम जीवन के सारे रंग देख सकते है. कैसे निहारिका ने करण की इतनी मदद की. वो बहुत रोई थी यह सुनकर की करण उसको छोड़ कर हमेशा के लिए चला जायेगा. फिर निहारिका ने पहली बार दहशत महसूस की, खौफ्फ़ और डर क्या होता है उसे आज पता चल गया. दोनों ने इन कुछ दिनों में मौत को बड़े करीब से देखा था. पर उसे आज यह भी पता चल गया था की प्यार की शक्ति का मुकाबला दुनिया की कोई भी शक्ति नहीं कर सकती थी.

पल दो पल गुजरते गए, लेकिन करण निहारिका के लबों को अकेला ही नहीं चूम रहा था. धीरे-धीरे जब निहारिका को होश आया तो उसने पाया की उसके होंठ और करण के होंठो का संगम हो गया है. उसने अपनी बाहों से करण को आलिंगन में ले लिया और अपने लबों को उसके हवाले कर दिया.

“आई …लव …यू …निहारिका ….” करण ने दो पल के लिए निहारिका के होठों को आज़ाद किया, फिर उसकी आँखों की गहराई में झाँक के कहा, “मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ निहारिका ….” और फिर करण के होठ वापस निहारिका के होठों से जा मिले.

निहारिका जिस से प्यार करती थी, उसके मुह से उसके लिए प्यार के यह तीन मीठे बोल सुन के उसे लगा की उसने मोक्ष प्राप्त कर लिया है, जैसे उसकी आत्मा परमात्मा में विलय हो गयी है. उसके दिल में जो सुख और अपने प्यार को पाने का जो संतोष था वो सिर्फ वो ही जानती थी.

थोड़ी देर ऐसे ही होठो के मिलन के बाद दोनों अलग हुए. करण और निहारिका दोनों एक दुसरे की आँखों में खोये हुए थे.

“आई ….लव …..यू ….टू ….करण …” निहारिका ने भी अपने प्यार का इज़हार कर दिया. इसके बाद दोनों एक बार फिर गले मिल गए.

बचपन में ही करण की माँ गुजर गयी थी. बिन माँ के वो और उसकी बड़ी बहिन एक दुसरे में ही सहारा ढूंढते थे. पापा अपने काम में इतने व्यस्त थे की उन दोनों पे ध्यान ही नहीं दे पाते थे. फिर अपनी बड़ी बहिन के एक्सिडेंट के बाद तो करण जैसे अकेला हो गया था.

इधर-उधर प्यार की तलाश में भटकने के बाद आज जाके उसे अपनी मंजिल निहारिका के रूप में मिली थी. निहारिका को भी कोई भी और लड़का नहीं भाया था करण के सिवाय ….उनकी जोड़ी जैसे भगवान ने ऊपर स्वर्ग में लिखी थी.

“तुम्हारे सर से खून निकल रहा है …..” निहारिका ने करण के सर पे हाथ फेरा तो उसका हाथ खून से सन गया.
 
“तुम सही सलामत हो तो अगर मैं मर भी जाऊ तो मुझे कोई ग़म नहीं है ……” करण ने प्यार से निहारिका के सुन्दर से चेहरे से उसकी जुल्फे हटाते हुए बोला.

“ऐसी ज़िन्दगी मुझे भी नहीं चाहिए जिसमे तुम ना हो …….” निहारिका ने कहते हुए करण के होठ फिर से चूम लिए.

यह चुम्बन सेक्स का नहीं था, यह चुम्बन तो एक नए प्यार के कसौटी को दर्शाता था जो अभी-अभी कायम हुई थी. इस चुम्बन में एक दुसरे के लिए वासना नहीं बल्कि आदर और सम्मान था.

“मुझे लगा की मैं तुम्हे खो दूंगा ……..” करण की आँखे फिर नम हो गयी और उसमे से आंसू का एक बूँद छलक आया.

निहारिका ने बड़े प्यार से करण के गालो से वो आंसू उठाया और बोली, “मुझे पता चल गया है की जब तक तुम मेरी ज़िन्दगी में हो तब तक मुझे कुछ नहीं हो सकता …..और यह जो आंसू तुमने मेरे लिए बहाए है, इसे मैं पूरी ज़िन्दगी भर मोतियों की तरह अपने दिल में सजा के रखूंगी ...”

“वैसे थैंक्स तुमने मेरे लिए जो इतना सब किया…..” निहारिका बोल उठी.

“अरे थैंक्स कैसा …..अगर मैं तुम्हारा हसबैंड होता तब भी क्या तुम मुझे थैंक्स कहती .” करण ने वही दोहराया जो निहारिका अक्सर कहती थी. दोनों इस बात पर खिल-खिला उठे.

“करण अब तुम्हे डॉक्टर के पास चलना चाहिए, तुम्हारे सर से अभी भी खून बह रहा है ….”

“अब जब तुमने आर्डर दे ही दिया है तो मैं मना कैसे कर सकता हूँ …….”

निहारिका को अब अच्छे से होश आ गया था. वो पूरी तरह खतरे से बाहर थी. दोनों कार में बैठ कर एक डॉक्टर के पास चले गए जिसने करण के सर में टाँके कर और पट्टिया बाँध करके उसे डिसचार्ज कर दिया.

लौटते वक़्त कार में निहारिका और करण थे. दोनों में से किसी की भी अब वापस उस भूत बंगले में जाने की हिम्मत नहीं थी. पहले कुछ दिन तो सिर्फ छोटी-मोटी घटनाये होती थी, पर अब ऐसा लग रहा था की जो भी प्रेत उसमे वास करता है, वो बहुत गुस्से में आ गया था, क्युकी अब वो जानलेवा वार करने लगा था. उसने मनोहर और रेखा को तो मार ही दिया था, करण और निहारिका को भी लगभग मार चुक्का था.

“तुम सच कहते थे करण उस बंगले में सही में भूत है …..आई ऍम सॉरी मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी …अगर मान ली होती तो हम दोनों की ऐसी हालत नहीं होती.” निहारिका बोली.

“अब छोडो उन बातो को, अब हमारा उस बंगले से कोई वास्ता नहीं है …..हम वहां अब कभी नहीं जायेंगे …..”
 
चैप्टर 12: निहारिका का सपना

कार चलती जा रही थी. बीच में रुक कर दोनों ने बाज़ार से कुछ ज़रूरी सामान लिया और वापस निहारिका के घर की तरफ रवाना हो गए.

आज जो तूफ़ान करण और निहारिका की ज़िन्दगी में आया था उसने उन दोनों को झंझोड़ के रख दिया था, हाँ यह सच बात भी है की इसी तूफ़ान की वजह से दोनों करीब आ गए थे, जिस प्यार के बीज उनके दिलों में कहीं दबे पड़े थे वो अब हरे भरे वृक्ष में बदल रहे थे.

रात हो चली थी करण ने अब निहारिका के घर में ही रुकने का फैसला कर लिया था. निहारिका के पापा संतोष चौहान, करण के पापा यशवंत मल्होत्रा के सबसे अच्छे दोस्त थे. हालाँकि निहारिका कभी लन्दन नहीं गयी थी पर उसके पापा जाते रहते थे. वहां उन्होंने करण को देखा था और उसकी बिज़नस करने की योग्यता से बहुत प्रभावित हुए थे.

करण के पापा यशवंत मल्होत्रा भी इंडिया आते रहते थे तो कभी कभार निहारिका से भी मुलाकात हो जाती थी. वो भी निहारिका की खूबसूरती और तेज़ दिमाग से बहुत प्रभावित थे.

दोनों दोस्त संतोष और यशवंत ने बहुत पहले ही सोच लिया था की करण और निहारिका की शादी एक साथ करवा देंगे. उन्हें क्या पता था की यह दोनों अपने आप ही प्रेम-पाश में बंध जायेंगे. करण और निहारिका को भी पता था उनकी शादी से उनके माता पिता बहुत खुश होंगे, इसीलिए वो अपने माता-पिता की तरफ से तो बेफिक्र थे.

“पापा का सिंगापुर का टूर एक दो हफ्ते तक और बढ़ गया है.” निहारिका ने टेबल पर डिनर लगाते हुए कहा.

“यह तो अच्छी बात है, अब मुझे तुम्हारे साथ कुछ और पल गुजारने को मिलेंगे …..और वो भी अकेले में …लोल.” करण हंस के चुटकी लेते हुए कहा और निहारिका को खींच के अपनी गोद में बैठा लिया.

रात का वक़्त था इसीलिए निहारिका ने जांघो तक का एक सेक्सी पर्पल कलर की नाईटी पहनी हुई थी जो उसके दूध से गोरे रंग और स्लिम ट्रिम फिगर पे कहर ढा रही थी.

“Are kya kar rahe ho……dekho mai ghar me akeli hu….mere se masti karoge na to mai chill doongi…lol” niharika ne bhi hanste hue kaha.

“मैं बहुत किस्मत वाला हूँ निहा …जो तुम मेरी लाइफ में आई …… तुम सच में बहुत खुबसूरत हो.” करण ने धीरे से अपने दोनों हाथ निहारिका की कमर में डाल दिया.

“वाह …. वाह….मैं सब समझती हूँ जनाब ….इधर आपका मुह मेरी तारीफ़ कर रहा है और उधर आपका हाथ मेरी कमर पर घूम रहा है …….मिस्टर करण मल्होत्रा ….मुझे आपकी नियत ठीक नहीं लगती ….” निहारिका खिलखिलाते हुए करण की बाहों में झूम गयी.

“अब क्या है ना की अगर किसी की गर्लफ्रेंड इतनी हॉट एंड सेक्सी हो …तो उसकी नियत तो फिसल जाएगी ही ना …” करण ने निहारिका को कमर से पकड़ के झटके से अपनी ओर खीच लिया, और उसके गुलाब जैसे होठों का रस पीने लगा.

पता नहीं निहारिका के होठ ही इतने सेक्सी थे की करण उसके आगे बढ़ ही नहीं पा रहा था. जब से दोनों ने एक दुसरे के प्यार का इकरार किया है

तब से वो कम से कम पच्चास बार तो निहारिका के होठो को ही चूम चुक्का था.

“बस बस ….तुम लगता है मेरे होठो से ही अपना पेट भरोगे क्या …..सुबह से ना जाने कितनी बार इन्हें चूम चुके हो ….मैं कहीं भागी तो जा नहीं रही हूँ …..अब तो मुझे तुम्हारे साथ ही रहना है कुछ दिनों तक …..अब चलो खाना खालो ….” कहते हुए निहारिका झट से करण की गोद से उठ गयी, क्युकी वो जानती थी की करण उसे ऐसे नहीं जाने देता.

दोनों ने बड़े प्रेम से एक ही थाली में एक दुसरे को खाना खिलाया. हंसी मजाक चलता रहा. उन्हें देख कर ऐसा बिलकुल नहीं कहा जा सकता था की सुबह ही वो दोनों लगभग मौत के मुह में पहुच गए थे.
 
“निहारिका …..मैं तुम्हारे लिए एक गिफ्ट लाया हूँ ….” करण ने कहा. दोनों डिनर करने के बाद लिविंग रूम में साथ बैठ कर टीवी देख रहे थे.

“मेरे लिए और गिफ्ट ………??”

“पहले वादा करो की इसके बदले जो मैं मांगूंगा वो तुम्हे हर हाल में देना पड़ेगा ….” करण निहारिका के कोमल हाथो को अपने हाथो में लेते हुए बोला.

“राजपूत हु ……वचन देती हु …..” निहारिका बोली .

करण ने अपने जेब से एक छोटा सा डिब्बा निकाला. वो डिब्बा बड़ी शिद्दत से लाल कलर के सिल्क में वरेप किया हुआ था. निहारिका को समझ नहीं आया की वो क्या है.

“क्या है इसमें ….? निहारिका ने पुछा.

“खोल के देखो …”

निहारिका ने बड़े ध्यान से डिब्बे की व्रेपिंग को खोला. उसमे एक ब्लू रंग का डिब्बा था. करण का इशारा पाके उसने डिब्बा खोला, तो उसके चेहरे पे चमक आ गयी, उसका चेहरा खिल उठा.

डिब्बे के अन्दर एक डायमंड रिंग थी. उस डायमंड की रिंग की चमक ऐसी थी की पूछो मत. करण निहारिका को देख के मुस्कुराये जा रहा था.

“पर ये डायमंड की रिंग किस ख़ुशी में दी है तुमने …..” निहारिका खुश तो थी पर उसे पता नहीं चला की आखिर करण वो रिंग लाया क्यों है.

करण उठ के निहारिका के सामने ज़मीन पे बैठ गया. उसने वो डिब्बा रिंग समेत निहारिका से वापस ले लिया और देखने लगा.

“अरे ज़मीन पर क्यों बैठे हो ठण्ड लग जाएगी ….” निहारिका ने कहा.

“श्ह्ह्ह …..” करण ने निहारिका को चुप करा दिया.

फिर करण ने आगे झुक कर निहारिका का दायाँ हाथ अपने हाथो में लेके हौले से चूम लिया. फिर वो डिब्बा खोलते हुए निहारिका की तरफ बढ़ा दिया.

“मिस. निहारिका चौहान….विल यू मैरी में…...”

सुनते ही निहारिका ख़ुशी से झूम उठी. उसने आगे बढ़ के करण को अपने बाहों में भर लिया. उसके लिए यह आज सबसे बड़ा दिन था.

उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. वो आज इतनी खुश थी की बता नहीं सकती थी. जिस से प्यार करते है …

अगर उनके साथ पूरे सातो जन्मो का बंधन बंध जाये तो इस से ज्यादा एक प्रेमी प्रेमिका के लिए कुछ नहीं हो सकता.

“यस…आई विल मैरी यू मिस्टर करण मल्होत्रा.” कहके निहारिका ने करण के चेहरे पे चुम्बनों की बरसात कर दी.
 
करन और निहारिका का प्यार परवान चढ रहा था वही वे दोनो बंगले मे हुई घटना से दहशत मे थे| करन अपने सपने मे आने वाले कमरे और उस कमरे की समानता से परेशान था साथ ही ये भी सोच रही था कि उस अंनजान लडकी की आत्मा ने एसा क्यो कहा कि "मै इतने सालो से तुमहारा इंतजार कर रही हूँ मुझे छोडकर मत जाओ"| वे दोनो बंगले मे होने वाली सब घटनाओ का रहस्य जानना चाहते थे मगर वहाँ किसी को बंगले के बारे मे ज़्यादा जानकारी नही थी|

सबको सिर्फ इतना ही पता था कि वो एक भूतिया बगला है और रात को वहाँ से किसी औरत के चीखने की आवाज आती है| इसी तरह एक सप्ताह बीत जाता है और निहारिका के पिता जी घर वापस आ जाते है| करन और निहारिका उन्हे एयरपोट लेने जाते है| जब निहारिका के पिता "मनमोहन श्रीवास्तव" करन से मिलते है तो वे हैरान हो जाते है और कुछ सोचने लगते है|करन उन्हे हैलो बोलता है तो वे निहारिका से करन के बारे मे पूछते है निहारिका बताती है कि ये आपके खास मित्र यशवंत मल्होत्रा के बेटे करन मल्होत्रा है और ये अभी हमारे घर पर रूके है| वो निहारिका की बात सुनकर कुछ परेशान से कार की ओर बढते है और कार की पिछली सीट पर बैठ जाते है निहारिका ड्राविग सीट पर और करन उसके साथ वाली सीट पर बैठ जाता है| कार निहारिका के बंगले की ओर तेजी से बढने लगती है| रास्ते भर निहारिका और करन आपस मे बातचीत करते रहे कोइ बात पूछने पर उसका जवाब हाँ हूँ मे देकर चुप हो जाते थे शायद कुछ सोचकर बहुत परेशान थे| इसी तरह सोचते हुए कब घर पहुँच जाते है पता ही नही लगता कार बंगले मे जाकर रूकती है और निहारिका अपने पिता जी को हिलाते हुए कहती है पापा घर आ गया| मनमोहन जी जैसे नींद से जागते हुए कहते है मुझे पता है बेटा घर आ गया| वे कार से उतरकर अंदर चले जाते है निहारिका और करन उनके पीछे-पीछे अंदर हाल मे आ जाते है| मनमोहन जी फ्रेश होने चले जाते हैऔर निहारिका नाश्ता बनाने किचन मे चली जाती है करन हॉल में अकेला बैठा अपने बंगले के बारे मे सोचने लगता है|

तभी मनमोहन जी फ्रेश होकर हाल मे आ जाते है और निहारिका चाय लेकर आती है निहारिका अपने पापा और करन को चाय देकर खुद भी एक कप चाय उठा लेती है| करन और निहारिका चाय पीना शुरू करते है अचानक चाय का कप गिरने से दोनो का ध्यान उस तरफ जाता है| निहारिका कहती है पापा कप कैसे गिर गया और मै देख रही हूँ आप जब से आए है कही खोए खोए से है आप बताओ क्या हुआ है| वे कहते है कुछ नही बेटा सब ठीक है और हॉ कप के टुकडे उठाकर फर्श साफ कर दो| निहारिका ऐसा ही करती है और वापस आकर कहती है पापा सच सच बताओ क्या हुआ है कही आप करन को लेकर परेशान तो नही है| वो कहते है मै परेशान तो मै करन की वजह से ही हूँ मगर उसके यहाँ रहने की वजह से नही क्योकि मैने और मेरे दोस्त ने पहले से तुम्हारा रिश्ता पक्का कर दिया था बस तुम दोनो की मंजूरी लेनी बाकी थी| मेरी चिंता का कारण दूसरा है|फिर वो बोले कि वो चिंता तुम्हारे बगले से जुडी हुइ लगती है| बेटा करन तुम्हारी शक्लो सूरत उस बगल के असली मालिक(जिसने वह बगला बनवाया था) के होने वाले दमाद कुँवर रणविजय से हूबहु मिलती जिसकी अचानक मौत हो गई थी और उसकी मौत का कारण पता नही चला| उनकी एक फोटो भी मेरे पास जो मेरे दादा जी ने मुझे थी| निहारिका मेरे कमरे से वो पुराना संदूक ले आओ| निहारिका वो संदूक लाती है मनमोहन जी उसमे से एक पुरानी सी ब्लैक एंड वाइट फोटो निकालते है जिसे देखकर उन दोनो के पैरो के नीचे की जमीन खिसक जाती है उस पर कुँवर रणविजय लिखा था|करन कहता है ये कैसे हो सकता है इसका चेहरा तो बिलकुल मेरे जैसा है| तभी करन उत्सुकता से पूछता है कि आप उस बगले के इतिहास के बारे मे कुछ जानते है|मनमोहन जी कहते है सब कुछ तो नही मगर बहुत कुछ जानता हूँ जो बहुत कम लोगो को पता है और ये बात मुझे मेरे दादाजी ने बताई थी|

लगभग 100 साल पहले अग्रेजो के समय मे यहाँ दो राजपूताना बंगले थे जिसमे एक तुम्हारा बंगला जो राजपूत दिग्विजय सिंह ने बनवाया था और परिवार सहित इसी बंगले मे रहते थे जिसमे उनकी पत्नी दो बेटे और एक बेटी थे| दोनो बेटो की शादी हो चुकी थी किंतु छोटी बेटी माधवी का विवाह नही हुआ था| वही दूसरा बंगला वही से कुछ दूरी पर ठाकुर भानू प्रताप ने बनवाया था| जिनके एक बेटा और एक बेटी थी| बेटी का विवाह हो गया था किंतु बेटा (रणविजय सिंह)कुँआरा था| दिग्विजय और भानूप्रताप बहुत अच्छे मित्र थे|उनके बच्चो का एक-दूसरे के घर बचपन से ही आना-जाना लगा रहता था उनका बचपन उन दो बंगलो मे ही बीता था और जब जवान हुए तो रणविजय और माधवी एक-दूसरे से प्यार करने लगे| वही दिग्विजय और भानूप्रताप अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी मे बदलना चाहते थे इसलिए उन्होने माधवी और रणविजय का रिश्ता पक्का कर दिया माधवी और रणविजय इस रिश्ते से बहुत खुश थे| उनके सब रिश्तेदार आना शुरू हो गए| शादी की रस्मे होने लगी दोनो बंगलो मे खुशी का माहौल था| दोनो बंगले दुल्हन की तरह सजे थे| मगर शादी से दो दिन पहले रणविजय का जीजा कालीचरण एक रस्म के अनुसार कुछ फल जेवर और लाल साडी लेकर दिग्विजय के घर जाता है उस समय घर पर केवल माधवी थी उसके बाद क्या हुआ किसी को कुछ पता नही किंतु जब सब लोग घर लौटे तो माधवी के कमरे मे कालीचरण की बिना कपडो की लाश पडी थी जिस पर तलवार से अनगिनत वार किए गए थे और माधवी के शरीर पर तार-तार किए कपडे के साथ ही पूरे शरीर पर चोटो के निशान बने थे| माधवी ने अपने पेट मे उनकी शाही तलवार अपने हाथो से घुसेड रखी थी जिस कारण उसकी मौत हुइ थी| इन सब के साथ उसके बेड की सफेद चादर खून से सनी थी| देखकर ऐसा लगता था कि कालीचरण ने माधवी का बलात्कार किया हो और इस घटना के बाद एक-एक करके दोनो परिवार के लोग मरने लगे| उसके बाद उनका कोई वंशज नही बचा सब मर गए| भानूप्रताप का बंगला द्वितीय विशव युद्ध मे ध्वस्त हो गया| अब वहाँ केवल उस खण्डर बंगले के कुछ अंश रह गए है| दिग्विजय के बंगले पर ब्रिटिश सरकार ने अपना कब्जा कर लिया| आजादी से पहले ये बंगला नीलाम कर दिया गया मगर भूतो के डर से यहा कोइ रह नही पाया इस तरह ये बंगला तुम्हारे पिता ने सस्ते दाम मे खरीद लिया| उस समय मैने उसे बहुत समझाया था मगर वो नही माना और उसने ये बंगला ले लिया| उसी समय से यशवंत के कारोबार मे कमी आने लगी और अब जो हालात है वो तुम देख ही रहे हो| इन सब बातो मे शाम हो गई और निहारिका खाना बनाने चली गई| मनमोहन जी कहते है बाकी बात बाद मे करेगे
 
ये सब सुनकर करन को कुछ बाते समझ मे आने लगी और कुछ समझने की कोशिश करने लगा| इस बीच निहारिका खाना लगा देती है और तीनो लोग खाना खाकर हॉल मे बैठ जाते है| करन मनमोहन जी को अाप बीती सुनाना शुरू करता है उस बंगले मे जो उसने महसूस किया जो देखा और जो उसके और निहारिका के साथ घटित हुआ सब बाते बताने लगा| ये सब बाते सुनकर मनमोहन को भी कुछ नयी बाते पता चला और उन्होने कहा ये सब तो होना था मेरे बच्चे मगर आज मुझे पता चल गया कि बंगले मे किसका भूत है और क्यो भटक रहा है|करन कहता है कि मै भानूप्रताप के बंगले का खण्डर देखना चाहता हूँ| मनमोहन जी कहते है कि कल सुबह चलेगे अब सो जाओ बहुत रात हो गई है और सब सोने चले जाते है| रात मे करन को वही सब दिखाई देता है जो करन को मनमोहन ने बताया था और अचानक उसकी आँख खुल जाती है| सुबह हो चुकी थी निहारिका उसे उठाने आई थी| वो उठता है और फ्रेश होकर बाहर लॉन में मनमोहन के पास आकर बैठ जाता है और बातचीत करने लगते है|नाश्ता करके तीनो भानूप्रताप के बंगले की ओर निकल पडते है|

करन निहारिका और मनमोहन उस खण्डर बंगले मे पहुचते है| वो तीनो बंगले के अंदर जाने लगते है करन जैसै-जैसे अंदर जाता है उसे बहुत कुछ याद आने लगता है|उसे एेसा लगता है कि वो इस बंगले के हर कोने को अच्छी तरह जानता है और एकाएक उसके दिमाग मे बहुत सारी बाते घूमने लगती है| इसके बाद वह चिल्लाता हुआ बेहोश होकर गिर जाता है| जब उसकी आँखे खुलती है तो वो निहारिका के बंगले पे बैड पर लेटा था करन मनमोहन जी को बुलाता है| करन कहता है कि मुझे पिछले जन्म की सारी बाते याद आ गई है मै ही भानू प्रताप का छोटा बेटा हूँ मेरा ही नाम रणविजय सिंह था मै माधवी से बहुत प्यार करता था मगर कालीचरण ने सब र्बबाद कर दिया| उस दिन जब माधवी की इज्जत तार-तार कर दी गई उसके दोनो परिवारो मे बहुत झगडा हुआ और दोनो परिवार के सम्बंध बहुत खराब हो गए| उन लोगो ने आपस मे मिलना जुलना भी छोड दिया|

मेरी मौत कालीचरण के कारण हुइ थी मृत्यु के बाद जब मै परमात्मा के पास पहुँचा तो उन्होने कहा कि तुम दोबरा पृथ्वी पर जाओ और अपने अधूरे कामो को पूरा करो और माधवी को कालीचरण से आजाद करवाओ| तो मैने पूछा प्रभु मै मानव शरीर मे उस आत्मा ता कुछ नही बिगाड पाऊँगा तब प्रभु ने हँसते हुए कहा वत्स तुम यहाँ से प्रस्थान करो मै सब इंतजाम कर दूँगा और जब तुम्हे ये सब बाते याद आएगी तो इसका समाधान करने वाले भी तुम्हारे पास ही होगे| मनमोहन ने कहा मै तुम्हे देखते ही समझ गया था कि तुम वही हो और प्रकृति ने ये चमत्कार किसी रहस्य को सुलझाने के लिए ही किया है|

अब सभी ये सोच रहे थे कि उस भूत का तो हम कुछ नही बिगाड सकते फिर हम माधवी की आत्मा कैसे आजाद करवाया जाए| सब लोग यही सोच रहे थे तभी मनमोहन याद आया कि किसी से उन्होने प्रसून नाम के महायोगी के बारे मे सुना था| उस किसी ने किसी और से सुना था इस प्रकार फोन पर फोन लगाए जाते रहे और अंत में उन्हे प्रसून का लेडलाइन नम्बर मिल गया| जब वह नम्बर पर डायल किया गया तो दूसरी तरफ से एक लडकी की आवाज आई (जोकि प्रसून की सेक्ररेटरी इजाबेल थी)मनमोहन ने अपना परिचय दियाऔर प्रसून के बारे मे पूछा तो वो बडी शालीनता से बोली की अभी सर यहाँ नही है वे राजस्थान मे किसी काम से गए है| तो मनमोहन ने कहा कि मै भी राजस्थान से ही बोल रहा हूँ ये सुनकर वो बोली आप अपना पता लिखवा दे मै सर से बात करती हूँ मनमोहन ने अपने घर का पता लिखवा दिया| इसके बाद इजाबेल ने वो पता और फोन नम्बर प्रसून को ई-मेलकर दिया|इसके बाद उसने प्रसून को फोन किया कि राजस्थान के बहुत बडे वकील का फोन आया था उन्हे आप से जरूरी काम है मैने उनका और पता आपको ई-मेल कर दिया है समय मिले तो आप देख लेना| प्रसून ने सोचा कि इतने बडे वकील का फोन आया है तो अवश्य ही गम्भीर बात होगी ये सोचकर प्रसून ने अपना ई-मेल चेक किया और उन्हे मनमोहन का नम्बर व पता मिल गया| प्रसून ने नम्बर डायल किय फोन मनमोहन ने उठाया और प्रसून ने अपना नाम बताया तो महमोहन ने करन के बंगले और वहाँ घटी घटना के बारे मे बताया| सारी बाते सुनकर प्रसून ने कहा अभी तो मै यहाँ किसी ओर को देख रहा हूँ मगर जल्द ही मै वहा आउगा एक जरूरी बात की उस बंगले मे कोइ मत जाना और फोन कट जाता है|
 
ये बात सुनकर सभी खुश होते है इस बीच मनमोहन कोर्ट का काम सम्भालने लगते है| तीन दिन बाद दोपहर के समय एक नौजवान मनमोहन के घर आता हैऔर बेल बजाता है| निहारिका दरवाजा खोलती है और पूछती है आप कौन है तो प्रसून निहारिका को अपना परिचय देता है| निहारिका उसे अंदर ले आती है और करन को प्रसून के बारे मे बताती है| निहारिका किचन मे जाकर फ्रिज से कोलड्रिंक निकालने लगती है और फोन करके अपने पापा को बताती है कि प्रसून आ गया है आप भी घर आ जाओ| इस बीच प्रसून करन से बाते करने लगता मगर उसका विशेष ध्यान करन का दिमाग रीड करने मे था| प्रसून करन का पूरा दिमाग खगाल और करन के पिछले जन्म से अबतक की पूरी कहानी प्रसून रीड कर लेता है| तब तक निहारिका प्लेट मे तीन काँच के गिलास मे कोलड्रिंक लाती है और प्रसून और करन को देती है एक गिलास खुद लेकर करन के पास बैठ जाती है

तीनो कोलड्रिंक पीने लगते है इसी बीच प्रसून निहारिका का दिमाग पढने लगता है मगर उसमे उसे अपने मतलब का कुछ नही मिलता सब कोलड्रिंक खत्म करते है| तब तक मनमोहन भी आ जाते है और प्रसून से मिलते है| वे कहते है कि आप पहले फ्रैश हो लो फिर बात करते है|प्रसून फ्रैश होने चले जाते है| थोडी देर मे प्रसून आते है और कहते है कि बंगले पर कब चले तो मनमोहन कहते है कि पहले आप उस बंगले के बारे मे पूरी जानकारी तो ले लीजिए तो प्रसून कहते है कि जितना आप ने बताया बहुत है बाकी बंगले पर चलकर देख लेगे| निहारिका कहती है कि खाना तैयार है चलो सब खाना खा ले सभी खाना खा लेते है और टीवी देखने लगते है| इसी तरह शाम होने लगती है प्रसून कहते है कि मौसम ठंण्डा हो गया है चलो अब बंगले पर चलते है|

सभी बंगले की ओर कार से चलते है और थोडी देर मे वहाँ पहुँच जाते है| वे बंगले के अंदर जाते है आज वहाँ कोइ चौकीदार नही था क्योकि जब से मनोहर और उसकी बीबी मरे थे वहाँ कोइ नही आता था| वे बंगले के हॉल मे आते है प्रसून को कइ आत्माएँ दिखाई देती है मगर वो दोनो आत्माए नही दिखाइ देती जिसकी उन्हे तलाश थी| प्रसून उपर के उस कमरे मे जाते है जहाँ करन ने उन्हे देखा था| उस कमरे मे प्रसून को वो दोनो आत्माए दिखाई देती है जहाँ माधवी की आत्मा डरी हुइ थी वही कालीचरन की आत्मा बहुत गुस्से मे थी वह आत्मा प्रसून से कहती है कि तुम मेरा कुछ नही बिगाड सकते क्योकि अब मै अकेला नही हूँ मेरे साथ सैकडो गुलाम आत्माए है जो मेरे कहने पर कुछ भी कर सकते है और तुम अकेले इंसान मेरा क्या बिगाड लोगे आज मै तुझे भी अपना गुलाम बना लूगा| ये सुनकर प्रसून जी कहते है कि आज अपनी ये इच्छा भी पूरी कर लो| कालीचरन उन चारो को मारने के लिए आगे बढता है मगर प्रसून द्वारा बने योग शक्ति के कवच को पार नही कर पाता और पीछे जाकर गिर जाता है|

अब तक प्रसून समझ गए थे कि वे अकेले कालीचरन से उन सभी आत्माओ की मुक्त नही करा सकते और उसका सामान भी नही कर सकते क्योकि आजतक कोइ उनके कवच को छूँ भी नही सका था और ये तो कवच से टकरा चुका था बेशक वो उन्हे कोइ नुकसान नही पहुँचा सका मगर प्रसून उसकी शक्तियो को भाप चुके थे इसलिए वे बंगले से बाहर आ जाते है ये सब बाकी लोग देख सकते थे इस कारण वे डर गए थे वे कहते है कि अब क्या होगा| प्रसून कहते है कुछ खास नही कल इन सब का अंत होगा और प्रसून सिगरेट निकालकर एक लम्बा कश लेते है तभी वे अपना फोन निकालकर कॉल करते है दूसरी तरफ से आवाज आती है हैलो बेटा आज हमारी याद कैसे आ गइ| प्रसून कहते है गुरू जी एक केश के सिलसिले मे आपकी आवश्यकता है मै अकेला कुछ नही कर पा रहा| राजीव जी कहते है इसके लिए तो नीलेश को ही बुला लेते| प्रसून ये काम नीलेश से नही हो पाएगा वरना मै आपको परेशान नही करता| राजीव जी कहते है कि अगर ऐसा है तो मै कल ही आता हूँ मुझे अपना पता बताओ| प्रसून पता बताकर फोन काटते है|
 
प्रसून सिगरेट जलाकर कश लेने लगते है और घर की ओर चल पडते है| घर पहुँचकर सब खाना खा सोने चले जाते है मगर प्रसून सोफे पर बैठे कालीचरन की आत्मा के बारे मे सोचते हुए कब सो जाते है पता ही नही चलता|

जब आँख खुलती है तो सुबह हो चुकी थी तभी उनका फोन बजता है बेटा मै दोपहर 12:00 बजे तक राजस्थान एयरपोर्ट पहुँच जाऊगा| तुम मुझे लेने आ जाना फिर वे उठे घडी की ओर देखा 7:10 हो गए थे| तबतक घर के बाकी लोग भी आ गए प्रसून सुबह के दैनिक कार्यो से निर्वृत होने चले गए वे लोटकर हॉल मे सब लोगो के साथ बैठ गए और नाश्ता करने लगे| नाश्ते के बाद वे लोग सोफे पे बैठ जाते है|

प्रसून कहते है कि कालीचरन अपने जीवनकाल मे बहुत बडा तांत्रिक था जिसने मरने के बाद कई आत्माओ को अपना गुलाम बना लिया और अब वो बहुत ताकतवर हो गया है इसलिए अब मै उससे अकेला नही लड सकता इस कारण मैने अपने गुरू को बुलाया लिया है वे दोपहर तक आ जाएगे| इसी तरह बात करते हुए 11:00 बज गए| प्रसून और मनमोहन एयरपोर्ट सही समय पर पहुँच जाते है| तभी राजीव जी बाहर आते है प्रसून आगे बढकर उनके पैर छूता है और वे सब घर की ओर चलते है| राजीव जी कहते है बेटा ऐसा कौन सा केश आ गया जिसने तुझे परेशान कर दिया और मुझे आना पडा| प्रसून कहते है गुरू जी आपको बताने की क्या जरूरत है आप तो मेरा मस्तिषक रीड कर सकते है| राजीव जी मस्तिषक रीड करते है और कहते है बेटा तुने मुझे बुलाकर बिलकुल सही किया है यह काम हम दोनो को मिलकर ही करना होगा| मनमोहन मस्तिषक रीड करने की बात सुनकर हैरान थे| वे कहते है कि क्या आप दोनो दिमाग रीड कर सकते हो| हाँ कर सकते है| तबतक वे घर पहुँच जाते है और गाडी से उतरकर घर मे जाते है| राजीव जी फ्रेश होने चले जाते है जब वापस आते है तो सब हॉल मे बैठे थे वो भी वही बैठ जाते है| थोडा नाश्ता करने के बाद राजीव जी कहते है मनमोहन जी केश की सारी जानकारी मुझे मिल गई है अब बंगले पर कब चलना है| वे कहते है अभी चले| राजीव जी कहते है ठीक है चलने की तैयारी करो| प्रसून को सिगरेट पीने की तेज तलब लगी थी वे कहते है गुरू जी मै अभी आया वो सिगरेट पीने बाहर चला जाता है क्योकि वो अपने

गुरू के सामने नही पीता था ये बात अलग हैकि उन्हे सब पता है| थोडी देर मे प्रसून आता है और सब बंगले की ओर चल देते है|थोडी देर मे सब बंगले मे थे वे सब उस कमरे मे जाते है

जहाँ कालीचरन और माधवी की आत्मा थी| आज सभी आत्माओ के साथ कालीचरन की आत्मा भी डरी हुई थी| वहाँ पहुँच प्रसून और राजीव ने अपनी योग शक्ति से कालीचरन की आत्मा को बुलाया मगर वो नही आया परन्तु जब उसे दण्ड देने की चेतावनी दी तो वो आ गया|जब वो आया तो उसके साथ और सैकडो आत्माए थी| राजीव जी ने कहा प्रसून पहले इन आतमाओ को कालीचरन से अलग करना होगा मै इसे देखता हूँ| दोनो ने मिलकर ऐसा ही किया और सभी आत्माओ को आजाद करवा दिया| अब कालीचरन की आत्मा सिर्फ एक तांत्रिक की आत्मा बन गई उसने हमला करने की कोशिश की किन्तु उसकी सब शक्ति समाप्त हो चुकी थी अब वो केवल अपनी तंत्र शक्ति को बढाने का प्रयास कर सकता था इससे पहले ही राजीव जी ने उसकी तंत्र शक्ति को समाप्त कर दिया अब वो केवल आम आत्मा थी जिसके पास कोई शक्ति नही थी| अब कालीचरन ने घुटने टेक दिए अब वो निर्बल हो चुका था| राजीव जी पूछा तुमने ये सब क्यो किया तो वो कुछ नही बोला किंतु जब योग शक्ति का प्रभाव डाला गया तो वो बोला महाराज सर्वप्रथम माधवी के रूपसौन्दर्य को देखकर मैलउस पर मोहित हो गया जब उस दिन मैने माधवी को बंगले मे अकेले पाया तो काम के वशीभूत होकर उसका बल्तकार कर बैठा|उसी समय माधवी ने मेरे प्राण ले लिए और अपने भी प्राण त्याग दिए| एक साथ मृत्यु होने के कारण मैने माधवी की आतमा पर कब्जाकर उसे अपना गुलाम बना लिया और उसकी आत्मा का बल्तकार करता रहा|इसी के साथ मै अपना शरीर दोबारा पाने के लिए मुझे 1000 आतमाओ की आवश्यकता थी मैने 999 आत्माए मिल गई थी सिर्फ एक की कमी थी मगर सबको आजाद करक तुमने मेरी वर्षो की मेहनत बर्बाद कर दी|कालीचरन के इस कु-कृत्य को सुनकर राजीव ने उसे प्रेत योनि मे सब प्रेतो का गुलाम बनाकर छोड दिया उसके पास कोई तंत्र- मंत्र की शक्ति न होने से वो किसी को कोइ नुकसान नही पहुँचा सकता था और अपने कु-कृत्यो के कारण उसे सदैव सब प्रेतो का गुलाम बनकर ही रहना एवं प्रेतो के अत्याचार सहने थे| वही एक कोने मे माधवी की आत्मा डरी व सहमी सी खडी थी| राजीव जी ने उससे पूछा अब तुम क्यो डर रही हो| माधवी ने कहा मै डर नही रही ब्लकि इस बात का दुख है कि मै रणविजय की न हो सकी और इतने सालो से दुख भोग रही हूँ मगर अगले जन्म मे तुम मेरे होना| राजीव जी ने उसे आजाद किया और माधवी को मुक्ति मिल गई|इसी के साथ वो बंगला प्रेत मुक्त हो गया और प्रसून एवं राजीव जी अपने आश्रम की ओर प्रस्थान करते है| इसी के यशवंत का कारोबार अच्छा चलने लगता है

...............समाप्त
 

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