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Horror मौत की चाल

, फिर बोला-

''वैसे देखा जाए तो ये एक लाख डॉलर आप लोगों के लिये

'ईजी मनी

' ही साबित होगा। बस

, तीन दिन इस मकान में बिताने हैं

, जिसे दुनिया की दस सबसे भुतहा जगहों में से एक माना जाता है

, फिर रकम आप लोगों के एकाउंट में ट्रांसफर हो जाएगी। इट्स सिम्पल एज दैट!

"

''कई बार

"-राज बोला-

''हद से ज्यादा सिम्पल दिखने वाली चीज उतनी ही ज्यादा मुश्किल साबित होती है।

"

डोंगरा ने राज की ओर देखा

, फिर उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई-

''मिस्टर पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर! आपके लिये ही मुश्किल होगा क्योंकि आपके लिये तो भूत-प्रेतों पर विश्वास करना लाजिमी है। आपका तो प्रोफेशन ही है।

"

''आप नहीं करते भूत-प्रेतों पर विश्वास

?"-राज शांत स्वर में बोला।

''बिल्कुल नहीं करता। घोस्ट्स डोंट एग्जिस्ट्स

"

''ये तो एक फिल्म का नाम है।

"-अनुराग ने चुटकी बजाई-

''मैंने देखी है।

"

''अगर घोस्ट्स एग्जिस्ट नहीं करते

"-राज बोला-

''तो आप ही बताइयेे इस मकान को दुनिया की दस सबसे भुतहा जगहों में शामिल करने की क्या वजह है

?"

''मार्केटिंग।

"

''क्या

?"

''बाजार में कोई चीज बेचनी हो

, और उसके लिए ग्राहक न हो

, तो बेस बनाना पड़ता है

, ग्राहक तैयार करने पड़ते हैं। और जब हद से ज्यादा चालाक लोग ये काम करते हैं तो इतने शातिर ढंग से करते हैं कि जिस चीज को कोई खरीदने वाला नहीं था

, उसके पीछे लोग पागल होने लगते हैं। उसका नाम ले-लेकर चिल्लाने लगते हैं। खुद ही उस चीज का ऐसा हौव्वा खड़ा करने लगते हैं कि लोग भागे-भागे उसे लेने आते हैं और न मिल पाए तो मातम मनाने लगते हैं जैसे उनका पता नहीं कितना बड़ा नुकसान हो गया हो।

"

''यहां कौन सी चीज बिक रही है और कौन सी चीज के पीछे लोगों को पागल किया जा रहा है

, स्पष्ट करने की कृपा करेंगें

?"

''भूत-प्रेत। भूत-प्रेत का जबर्दस्त मार्केट तैयार किया गया है पूरी दुनिया में। जबकि ये ऐसी चीज है

, जिससे बच्चे ही डरते हैं। भूत-प्रेत की कपोल-कल्पना पर आज पूरी दुनिया में खरबों रूपये का कारोबार होता है। फिल्मों की कतार लगी है

, किताबें लिखी जा रही हैं

, टीवी पर शोज आ रहे हैं

, थीम पार्क बन रहे हैं-जैसा कि इस मकान को भी बनाया जाने वाला है-और भी पता नहीं क्या-क्या हो रहा है

? मैं भूत-प्रेत पर बिल्कुल विश्वास नहीं करता और मेरे हिसाब से कोई भी शख्स जिसका दिमागी तवाजन हिला हुआ नहीं होगा

, ऐसी चीज पर विश्वास नहीं करता होगा

, जो होती ही नहीं है। जिसका कोई अस्तित्त्व ही नहीं है।

"

''तो आपके हिसाब से ये मकान सिर्फ इसलिए दुनिया की दस सबसे भुतहा जगहों में शामिल है क्योंकि इसकी मार्केटिंग की गई है

? ऐसा भ्रामक प्रचार-प्रसार किया गया है कि ये मकान भुतहा है

? जबकि ये है ही नहीं

?"

''ये पूरी तरह सच नहीं है।

"-डोंगरा के स्वर में हिचकिचाहट के भाव आ गये।

''फिर सच क्या है

?"

''इस घर का एक लम्बा इतिहास है।

"

''कैसा इतिहास

?"

''बुरी घटनाओं का। भयानक डरावनी घटनाएं। हालांकि मैं उन घटनाओं के बारे में ज्यादा नहीं जानता लेकिन मैंने सुन रखा है कि इस मकान में जो भी रहा

, उसके साथ कुछ न कुछ ऐसी घटनाएं हुईं

, जिसके चलते उन्हें ये जगह छोड़कर जाना पड़ा। हालांकि कुछ तो इतने खुशकिस्मत भी नहीं थे। इस मकान के कई पिछले मालिकों की यहां रहते हुए रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु हो चुकी है। इस तरह की घटनाएं ही इस घर को भूत बंगले के रूप में प्रचारित होने का एक बड़ा कारण रहीं हैं।

"

''कौन-सी घटनाएं

?"-अनुराग दिलचस्पी लेते हुए बोला-

''कुछ बताइये तो सही

?"

''मैं जरूर बताता।

"-डोंगरा खेदपूर्ण स्वर में बोला-

''लेकिन हॉरर कहानियों में मेरा कभी इंट्रेस्ट नहीं रहा। इसलिए शायद मैं आपको उस ढंग से न बता सकूं

, जिस ढंग से आपको इस घर के भूतग्रस्त होने पर पूरा विश्वास हो जाए। जैसे इस घर में पहले रहने वाले लोगों की किसी घटना-दुर्घटना में मृत्यु

, हत्या वगैरह। मेरी नजर से देखेंगें तो वो घटनाएं दशकों पहले हुई ऐसी अपराधिक घटनाएं ही थीं

, जिनका अपराधी संयोग से पकड़ा नहीं जा सका और लोगों ने उन घटनाओं का कारण भूत-प्रेत को मान लिया। और जहां तक मेरा मानना है भूत-प्रेत से सम्बन्धित कही जाने वाली लगभग सभी घटनाओं के साथ ऐसा ही होता है। कई सालों से तो ये घर खाली ही पड़ा है। इसके भूतग्रस्त होने के कारण लोगों में इसका खौफ इतना ज्यादा है कि कोई यहां रहने की सोच भी नहीं सकता। इसके अलावा ये पास के गांव से थोड़ा आउटसाइड के इलाके में भी पड़ जाता है तो ये भी एक मुख्य वजह है कि कोई यहां नहीं रहना चाहता। लेकिन मैं फिर कहना चाहूंगा कि यहां अगर कुछ दशक पहले किसी का खून हो गया था तो इसका ये मतलब नहीं कि उससे मकान ही हॉन्टेड हो गया। अब इतना लम्बा अरसा बीतने के बाद इस बात को लेकर किसी मकान से डरने की कोई वजह नहीं बनती कि वहां कोई हत्या या हत्याएं हुईं थीं। आखिर हर मकान में कभी न कभी

, कोई न कोई मौत तो हुई होती है। इसका मतलब ये तो नहीं कि हर मकान भुतहा हो जाता है।

"

''शुक्र है

"-राज बोला-

''कि आपने ये नहीं कहा कि हर मकान में कभी न कभी

, कोई न कोई हत्या तो हुई होती है।

"

डोंगरा ने नाराजगी के भाव के साथ राज की ओर देखा।

अनुराग मकान की ओर पलटा और उसकी सीध में दोनों हाथ कमर पर रखकर खड़ा हो गया। उसने उस भुतहा माने जाने वाले मकान पर भरपूर नजर डाली

, फिर एक-एक शब्द पर जोर देते हुए बोला-

''ये मकान तो बहुत ही ज्यादा बदनाम है।

"

''आप कब से यहां केयरटेकर हैं

?"-डॉली ने डोंगरा से पूछा।

''करीब साल भर से। लेकिन मैं दूसरी बार ही यहां आया हूं।

"

''अरे!

"

''ऑनलाइन केयरटेकिंग करता होगा।

"-प्रीति धीमे से बुदबुदाई

, जो कि पास खड़े होने के कारण केवल डॉली को ही सुनाई दिया।

''हां। दरअसल

, कंपनी के निर्देश पर ही मैं यहां आता था। शहर में मेरा मेन बिजनेस दूसरा है। पहली बार मैं यहां तब आया था

, जब कंपनी वालों ने शुरू-शुरू में इस मकान को खरीदा था और मुझे बतौर केयरटेकर नियुक्त किया था। मुझे कहते हुए अजीब लग रहा है लेकिन उस समय इस मकान में कदम रखते हुए मुझे काफी अजीब लगा था। मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता लेकिन कुछ तो अजीब था। उस समय मेरी जल्दी से जल्दी यहां से दूर चले जाने की तीव्र इच्छा होने लगी थी। और मुझे स्वीकार करते हुए कोई संकोच नहीं है कि मैं थोड़ा डर भी गया था। लेकिन यहां से लौटने के बाद मुझे इस बात को याद करके काफी हंसी आती थी और शर्मिंदगी भी महसूस होती थी। आखिर एक मकान से डरने की क्या वजह हो सकती है

? शायद यहां जंगल में सूनेपन के माहौल का मेरे दिमाग पर असर हो गया था। मैंने उसी समय सोच लिया था कि दोबारा यहां आऊंगा तो किसी तरह का वहम नहीं पालूंगा। लेकिन मुझे उतने अरसे में दोबारा यहां आने का मौका अब मिला है। कंपनी वालों की ओर से निर्देश था कि जब वो कहें

, तभी मुझे यहां आना है।

"

''ऐसा क्यों

?"-राज बोला।

''ये तो अब कंपनी वाले ही बता सकते हैं। शायद उन्हें यहां अनावश्यक दखल पसंद न हो। या

"-उसने मकान पर नजर मारी-

''वे यहां कुछ करते रहें हों।

"

''इतनी बड़ी प्रॉपर्टी खरीदी और उसे साल भर के लिए यूं ही छोड़ दिया

?"-प्रीति मकान की ओर देखते हुए बोली।

''वैसे केयरटेकर होने के नाते

"-जय मकान की खिड़कियों पर जमी धूल की ओर देखता हुआ बोला-

''आपका फर्ज नहीं बनता था कि इस मकान की थोड़ी झाड़-पोंछ करवा देते

, जिससे ये इंसानों के रहने लायक बन जाता

?"

डोंगरा के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

''डोंट वरी।

"-वो सांत्वना देने वाले ढंग से बोला-

''अंदर मकान को व्यवस्थित किया गया है। यहां जो एक और शख्स आने वाला है-जो कि हमारा होस्ट होगा

, मतलब कंपनी का प्रतिनिधि-वो यहां एक-दो दिन पहले ही आकर पूरी व्यवस्था कर गया है। राशन वगैरह भी किचन में मिल जायेगा। हम लोगों को यहां तीन दिन बिताने में कोई दिक्कत नहीं होगी। बाहर से बस झाड़-पोंछ इसलिए नहीं करवाई गई है क्योंकि ऐसा करने पर मकान का हॉरर लुक चला जाता।

"

''ये तो आप गलत कह रहे हैं।

"-डॉली गहरी नजरों से मकान को देखते हुए बोली-

''इस मकान को तो सोने में भी जड़वा दो

, तब भी इसका हॉरर लुक नहीं जाने वाला।

"

डोंगरा हंसा।

''वो कंपनी वाले इस मकान को हॉरर फनहाउस बनाना चाहते हैं न

?"-जय बोला।

''हां। वो लोग तो यहां हॉन्टेड थीम पार्क बनाने का काम शुरू भी करने वाले थे। लेकिन इसी बीच लॉकडाउन भी लग गया

, जिसके चलते वे काम शुरू नहीं कर पाए। लेकिन कंपनी वालों का दिमाग भी कम खुन्दकी नहीं है। आखिर इतनी अजीब कंपनी के मालिक हैं।

"

''अजीब तो है।

"-अनुराग ने स्वीकार किया।

''अजीब से याद आया।

"-कहकर डोंगरा ने अपनी कार से एक लोहे का पुराना सा दिखने वाला संदूक

निकाला।

''ये क्या है

?"-जय बोला।

''इस 'आइसोलेशन इवेंट' का एक छोटा-सा ट्रेडीशन।

"

''कैसा ट्रेडीशन

?"

''आप सब अपने मोबाइल ऑफ करके मुझे सौंप दें

, जिससे मैं उन्हें अपनी कार की डिक्की रखकर लॉक कर सकूं। अब ये डिक्की तीन दिन बाद ही खुलेगी और तभी आपको आपके मोबाइल वापस मिल सकेंगें। एक भुतहा मकान में तीन दिन बिताने की इस चुनौती को पूरा करने के दौरान आपके पास बाहरी दुनिया से सम्पर्क करने का कोई जरिया नहीं होगा।

"
 
इवेंट के टर्म्स एंड कंडीशंस में वे लोग उस शर्त को पहले ही पढ़ चुके थे। सब अपने मोबाइल निकाल कर उन्हें ऑफ करते हुए डोंगरा के हवाले करने लगे।

''ये सबसे ज्यादा तकलीफदेह है।

"-मोबाइल देते हुए जय के चेहरे पर पीड़ा के भाव थे-

''तीन दिनों मैंने अपनी स्टेट्स अपडेट नहीं की तो मेरे सोशल मीडिया के फ्रेंड तो मुझे मरा हुआ समझने लगेंगें।

"

''सोचेंगें

"-अनुराग हंसते हुए बोला-

''कि तुम्हें जरूर कोरोना हो गया होगा।

"

''और इस दौरान

"-राज अपने मोबाइल को हाथ में पकड़े हुए ही गम्भीर स्वर में बोला-

''हमें सचमुच ही बाहर किसी से सम्पर्क करने की जरूरत पड़ी तो

?"

''क्या मतलब

?"-डोंगरा बोला।

''मतलब अगर यहां हमारे साथ कोई घटना-दुर्घटना हो जाती है या ऐसी ही किसी आपात स्थिति में हमें सहायता की जरूरत हो तो हम पुलिस या एम्बुलेंस वगैरह भी नहीं बुला सकते फिर तो

?"

''देखिए

"-डोंगरा बोला-

''मेरे ख्याल से आप स्थिति को अच्छी तरह समझने के बाद ही यहां आए होंगें। पहली बात तो यहां नेटवर्क ही मुश्किल से मिलता है। दूसरी बात कॉल करते ही इतनी दूर

, बियाबान जगह में मदद तुरंत हाजिर नहीं हो जाएगी। उससे तो अच्छा होगा कि ऐसी किसी स्थिति में हम अपने शरीर को ही थोड़ा कष्ट देकर इन कारों का प्रयोग करेंगें

, जो हम मुंह देखने के लिए नहीं लाए हैं और इनमें बैठकर शहर चले जाएंगें। लेकिन उस स्थिति में आप सबको मिलने वाली प्राइज की रकम जरूर कैंसल हो जाएगी क्योंकि तीन दिन की अवधि में इस मकान को छोडऩे का मतलब है खेल खत्म! गेम ओवर! तो सबसे बेहतर तो यही होगा कि आप सब अपना-अपना ध्यान रखें और कोई घटना-दुर्घटना होने ही न दें

, जिससे ऐसी कोई नौबत ही न आने पाए। वैसे भी हमें यहां सिर्फ तीन दिन गुजारने हैं। कोई मिलिट्री ट्रेनिंग नहीं करनी है

, जो हममें से कोई घायल हो जायेगा।

"

जय ने राज को टहोका। राज ने अपना स्विच्ड ऑफ किया हुआ मोबाइल डोंगरा की ओर बढ़ा दिया।

डोंगरा ने सारे मोबाइल डिक्की में बंद कर डिक्की को लॉक कर दिया। फिर कार के बोनट के पास पहुंचकर बोला-

''अभी मुझे आप लोगों से कुछ और भी लेना है।

"-बोनट पर उसने वो संदूक रखा था

, जो उसने कार से निकाला था।

''अब क्या चाहिए इसे

?"-अनुराग धीमे से बड़बड़ाया।

''ये आपको काफी अजीब लगेगा लेकिन इस तरह के इवेंट में ये एक ट्रेडीशन की तरह ही है। इस काम की जिम्मेदारी कंपनी वालों ने मुझे ही सौंपी है।

"

''सस्पेंस मत बढ़ाओ भाई।

"-जय खाली संदूक में झांकते हुए बोला-

''जल्दी बताओ

, बात क्या है

?"

''हमें अपने पास के सभी रिलीजियस सिम्बल वाली चीजें-जैसे लॉकेट

, नैकलैस या कोई भी धार्मिक तस्वीर वगैरह इसमें रखनी होगी। इस मकान में प्रवेश करते समय हमारे पास ऐसी कोई चीज नहीं होनी चाहिए। फिर इस सन्दूक को छिपाने का काम यहां का केयरटेकर होने के नाते मेरे जिम्मे है।

"

''छिपाने का

?"-प्रीति बोली-

''इसे छिपाने की क्या जरूरत है भला

?"

''जिससे आप में से कोई इसमें से अपने लॉकेट वगैरह निकाल नहीं सके। फिक्र मत करिये। आपके मोबाइलों की तरह ही तीन दिन बाद ये भी आपको वापस मिल जाएंगें।

"-डोंगरा आश्वासन भरे स्वर में बोला।

सबने एक-दूसरे की ओर देखा।

''एक लाख डॉलर के लिये छोटी-सी कीमत!

"-फिर शुरूआत अनुराग ने अपने गले में ओम के लॉकेट को उतारते हुए की।

''अनुराग!

"-प्रीति आश्चर्य से बोली-

''मैं तो तुम्हें नास्तिक समझती थी। मैंने कभी तुम्हारे लॉकेट की ओर ध्यान ही नहीं दिया।

"

''सही समझती थीं।

"-अनुराग बोला-

''ये मेरी मां ने मुझे दिया था। इसीलिये पहनता हूं। पहली बार इसे इतने लंबे अरसे के लिये खुद से दूर कर रहा हूं।"-कहते हुए अनुराग ने लॉकेट संदूक में डाल दिया।

फिर जय ने भी अपने हाथ पर पहना स्वास्तिक वाला ब्रेसलेट उतारकर संदूक में डाल दिया।

उनका अनुसरण करते हुए बाकी सबने भी उनके पास जो-जो धार्मिक प्रतीक चिह्नों वाली चीजें थीं

, उस सन्दूक में रख दीं।

''तुम

?"-डोंगरा ने रिंकी की ओर देखा।

''मैं इन सब चीजों में विश्वास नहीं करती।

"-रिंकी भावहीन स्वर में बोली।

फिर डोंगरा ने सन्दूक को बंद किया

, उसे उठाया और मकान के बगल से चक्कर काटते हुए पीछे की ओर चला गया।

''ये तो अच्छा-खासा तमाशा है।

"-पीछे मोहिनी बड़बड़ाई।

''ऐसे तमाशे अभी और होंगें।

"-अनुराग बोला-

''तुम्हें क्या एक लाख डॉलर कमाना इतना आसान होगा

?"

कुछ देर बाद जब डोंगरा वापस लौटा तो उसके पास सन्दूक नहीं था।

"कहाँ छिपा आए?"-डॉली बोली

जवाब में कुछ कहने की जगह डोंगरा मुस्कुरा दिया।

''नाओ वी आर वल्नरेबल टू घोस्ट्स!

"-जय आंखें नचाकर बोला।

उसकी बात पर कोई नहीं हंसा।

''कम ऑन यार!

"-जय अपनी आवाज में जोश भरते हुए बोला-

''ये सब तो ड्रामा बस है। हमें तो एक तरह से दुनिया में सबसे ज्यादा आसानी से इतनी बड़ी रकम कमाने का मौका मिला है। बस तीन दिन और हम सबके एकाउंट्स में एक-एक लाख डॉलर होंगें। तुम लोग ऐसी बोझिल सूरतें बनाओगे तो कैसे चलेगा

? अभी तो हमने इस मकान के अंदर कदम भी नहीं रखा है। तुम्हारे चेहरे देखकर तो लगता है जैसे यहां सचमुच भूत प्रेत हैं और वो लॉकेट वगैरह नहीं होने से वो अब हमें कच्चा ही चबा जायेंगें।

"

''इनफ

, जय...।

"-राज बोला।

"आप लोगों को ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है"-डोंगरा आश्वासन भरे लहजे में बोला-"आप लोगों को पहले से ही पता होगा लेकिन मैं भी बता दूं कि इस इवेंट में पर्टिसिपेट करने के साथ ही 'पैरानॉर्मल होल्ड' द्वारा आपका दो-दो लाख डॉलर का बीमा कर दिया गया है। यानि अगर किन्हीं परिस्थितियों में किसी को कुछ हो जाता है-जो कि भगवान न करे हो-तो उसके परिवार वालों को दो लाख डॉलर मिलेंगें। जो कि इस इवेंट की प्राइज मनी का भी डबल है। करीब डेढ़ करोड़ रूपए।"

"ये क्या सुन लिया!"-अनुराग बड़बड़ाने के से अंदाज में बोला-"अब तो मरना होगा!"

''हमें दो लाख डॉलर की कोई जरूरत नहीं है

"-प्रीति मीठे स्वर में बोली-

''खास तौर से मरने के बाद तो बिल्कुल नहीं।

"

''हां

"-मोहिनी ने प्रीति की हां में हां मिलाई-

''हमारे लिए एक लाख डॉलर ही बहुत हैं।

"

''मेरे ख्याल से

"-अनुराग डोंगरा से बोला-

''यहां एक और शख्स आने वाला था

?"

''नहीं।

"-डोंगरा ने उस ओर आने वाले कच्चे रास्ते की ओर देखते हुए कहा-

''आने वाला नहीं था। उसे अब तक पहुंच जाना चाहिये था।

"
 
उन्हें इंतजार करते-करते शाम हो गई।

अंधेरा छाने लगा था।

''तुम्हारा ये आदमी कब आयेगा

?'-अनुराग झल्लाकर बोला। वो पिछले दो-तीन घंटों में करीब आठ-दस बार वो सवाल दोहरा चुका था।

जय ने डोंगरा की ओर देखा।

''उसे अब तक आ जाना चाहिए था।

"-डोंगरा फिक्रमंद स्वर में बोला।

''शायद हमें अंदर चल कर देखना चाहिए।

"-जय बोला।

''लेकिन दरवाजे पर तो ताला लगा है।

"-डोंगरा ने कहा।

''ताला तोड़ा भी जा सकता है।

"

''लेकिन...

"-प्रीति हिचकिचाते हुए बोली-

''क्या इस तरह ताला तोडऩा ठीक रहेगा

?"

''तो कब तक यहां ऐसे बेवकूफों की तरह खड़े रहें

?"-अनुराग भन्नाए स्वर में बोला।

''हम ताला तोड़ सकते हैं।

"-डोंगरा बोला।

''क्या

?"-जय ने डोंगरा की ओर देखा।

''मेरा मतलब...मुझे निर्देश मिले थे कि अगर हमारे होस्ट को आने में देर हो जाए या कुछ और परिस्थिति निर्मित हो तो हम ताला तोड़कर भी अंदर जा सकते हैं।

"

''तो उतनी देर से मुंह में दही क्यों जमा रखा था

?"-कहकर अनुराग ने जमीन पर पड़ा

, एक बड़ा-सा पत्थर उठाया और मकान के दरवाजे की ओर बढ़ गया।

अचानक ऊपरी मंजिल की लाइट रोशन हो गई।

अनुराग अपनी जगह पर जड़ हो गया। अनुराग ही क्या बल्कि वहां उपस्थित सभी लोग जड़वत जैसे हो गए।

हल्का अंधेरा हो चुका था। ऐसे माहौल में उस भुतहा दिखने वाले मकान की ऊपरी मंजिल की खिड़कियों से निकल रही रोशनी एक अजीब-सा अहसास दिला रही थी।

अनुराग ने एक बार घूमकर बाकी लोगों की ओर देखा

, फिर अकेला ही मकान की ओर बढ़ गया।

बाकी लोग भी उसके पीछे चलते हुए दरवाजे के पास तक पहुंचे।

अनुराग मकान के सामने लगी सीढिय़ां चढ़कर छोटी सी बरामदे जैसी जगह में पहुंचा

, फिर उसने लकड़ी के पुराने लेकिन काफी मजबूत लगने वाले दरवाजे पर लगी कुण्डी से लटके ताले को हाथ से पकड़कर पत्थर वाला हाथ ऊंचा किया। जंग लगे ताले की हालत खस्ता हो रही थी। पत्थर के एक ही सधे हुए वार से ताला टूट कर नीचे जा गिरा।

फिर उसने दरवाजा खोला और अंदर प्रवेश किया।

अंदर प्रवेश करते ही उसके पैर जहां के तहां जम गए।

''क्या हुआ

?"-पीछे से जय ने कहा।

अनुराग उसके सामने से एक ओर हट गया।

तब दरवाजे के बाहर खड़े लोगों को अंदर का दृश्य नजर आया।

मकान के अंदर पहले ही कमरे में बीचों-बीच...

...एक बड़ा-सा ताबूत रखा था।

सब कमरे के अंदर आ गए।

सबकी नजरें ताबूत पर टिकी हुई थीं।

''ये ताबूत कैसा है

?"-जय बोला।

''क्या पता

?"-राज सावधान स्वर में बोला।

''और इसे यहां किसने रखा

?"-प्रीति बोली।

''अब हम क्या करें

?"-अनुराग बोला।

उसका जवाब शायद किसी के भी पास नहीं था।

सब कुछ दौर मौन साधे कमरे के वातावरण को मनहूस बना रहे बीचों-बीच पड़े उस पुराने लेकिन काफी बड़े आकार के ताबूत को देखते रहे।

तभी छत पर किसी के चलने की आहट ने सबका ध्यान खींच लिया।

सबकी नजरें छत की ओर उठ गईं।

''ऊपर कौन चल रहा है

?"-मोहिनी सस्पेंस भरे स्वर में बोली।

''वही

"-जय छत की ओर देखते हुए बोला-

''जिसने लाइट जलाईं होंगीं।

"

''हमें छत पर जाकर देखना चाहिए।

"-कह कर अनुराग आगे बढ़ा।

तभी कमरे मेें एक चीख गूंज उठी।

चीख रिंकी की थी।

सबकी नजरें रिंकी की ओर हो गईं। वो घबराई-सी पास खड़ी मोहिनी से ही लिपट गई थी।

''क्या हो गया

?"-राज

ने रिंकी से पूछा।

''इसमें...इसमें कुछ हलचल हुई थी।

"-वो भयभीत सी ताबूत की ओर इशारा करते हुए बोली।

सबकी नजरें फिर ताबूत पर जम गईं।

तभी ताबूत के भारी ढक्कन में हरकत हुई।

कोई उसे खिसका रहा था।

अंदर की ओर से!

सभी थोड़ा पीछे हट गए।

ताबूत के ढक्कन पर अंदर की ओर से निकले दो हाथ जमे हुए साफ दिख रहे थे।

फिर उन हाथों ने ताकत लगा कर ढक्कन को एक ओर धकेल दिया और फिर...।

...फिर उस ताबूत से सफेद कफन में लिपटी हुई मानवाकृति उठ खड़ी हुई।

सब दम साधे उसी की ओर देख रहे थे।

उसका कद असाधारण रूप से लम्बा था। जय और उसके साथियों में सबसे लम्बा अनुराग था

, जिसकी हाइट

6 फीट

2 इंच थी। लेकिन ताबूत से निकला वो रहस्यमयी शख्स अनुराग से भी कम से कम

46 इंच लम्बा था।

उसके चेहरे पर भी सफेद रंग का नकाब था

, जो कि उसके सफेद लबादे का ही हिस्सा लगता था। उस नकाब में केवल आंखों की जगह दो बड़े-बड़े काले छेद थे

, जिनके अंदर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।

वो अपने हाथ को अपने सिर पर ले गया और उसने अपना नकाब उतार दिया।

उसका चेहरा चाक की तरह सफेद था

, आंखें बड़ी-बड़ी और काफी चौड़ाई में खुली हुईं थीं

, जैसे कटोरियों से बाहर निकलकर गिर पड़ेंगीं। आंखों की रंगत भी सुर्ख हो रही थी।

उसकी शक्ल सूरत किसी भी अच्छे-भले आदमी का हार्टफेल करने के लिए पर्याप्त थी।

उसे देखकर वहां उपस्थित सब लोगों के मुंह पर भी ताले जड़ गए थे।

''वेलकम दोस्तों!

"-ताबूत से निकले उस शख्स की सर्द आवाज कमरे में गूंज उठी-

''उम्मीद है

, आप सबको यहां आने में ज्यादा तकलीफ नहीं हुई होगी। मैं

'कॉफिन मैन

' मौत के घर में तहेदिल से आप सबका स्वागत करता हूं।

"

कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था।

वैसे स्वागत की वहां शायद किसी को भी उम्मीद नहीं थी।

सबकी जबानें जैसे तालू से चिपक गईं थीं। कड़ाके की ठण्ड में भी उनके माथे पर पसीनें की बूंदें झिलमिला रहीं थीं।

''अब मुझे इजाजत दो

, मेरे दोस्त!

"-सफेद कफन जैसे लबादे में लिपटा वो शख्स-जिसने अपना परिचय

'कॉफिन मैन

' के रूप में दिया था-ताबूत में झांककर ऐसे बोला

, जैसे किसी से बात कर रहा हो-

''मुझे अपने अजीज मेहमानों का स्वागत करना है।

लम्बे अरसे बाद इस घर में मेहमानों के कदम पड़े हैं।"

बाकियों ने झांककर देखा कि वो उस बड़े ताबूत में किससे बात कर रहा था।

ये देख कर उनकी आंखें फैल गई कि ताबूत में एक कंकाल पड़ा था।

जहां वो लोग तीन दिन बिताने की सोच कर आए थे

, उसमें कदम रखने से भी पहले से उनके साथ एक से एक अजीब वाकये हो रहे थे।
 
उस कमरे का माहौल भी कम अजीब नहीं था। वहां कोई बल्ब या ट्यूबलाइट नहीं बल्कि पुराने अंदाज के लैम्प लगे हुए थे। कमरे में बस उन्हीं लैम्पों की रोशनी हो रही थी। एक ओर एक हिरण का सिर दीवार पर शो पीस की तरह लगा हुआ था। कमरे में जिधर नजर डालो

, अजीब चीजें ही नजर आतीं थीं

, जिससे उन्हें लग रहा था

, जैसे वे किसी टाइम मशीन से

2020 से सीधे सत्रहवीं-अठाहरवीं सदी के किसी घर में आ गये हों।

उस शख्स ने ताबूत से बाहर कदम रखा

, फिर एक ओर पड़ी कुर्सी खींच कर उस पर बैठ गया।

''प्लीज!

"-फिर उसने बाकी लोगों को भी दीवार से सटी बाकी कुर्सियों की ओर इशारा करते हुए आग्रहपूर्ण लेकिन वैसी ही सर्द आवाज में कहा-

''आप लोग भी बैठ जाइये।

"

''और ये ताबूत

?"-जय बोला-

''ये यहीं पड़ा रहेगा

? इसी तरह

?"

ताबूत साइज में सामान्य से काफी बड़ा था और कमरे के बीचों-बीच पड़ा काफी जगह घेरता लग रहा था।

'कॉफिन मैन

' मुस्कुराया।

''जब तक हम बात नहीं कर लेते

"-उसने कहा-

''तब तक ये यहां ऐसे ही रहेगा। मेरा दोस्त भी हम लोगों की बातें सुनना चाहता है।

"

''तुम्हारा दोस्त

? ये कंकाल

?"-अनुराग कड़वे स्वर में बोला।

जय ने आंखों ही आंखों में अनुराग को

'ठण्ड रखने

' का इशारा किया।

''कृपया ऐसा कुछ न कहें

, जिससे उसे बुरा लग जाए

, जो अब इस दुनिया में नहीं है।

"-उसकी आवाज और भी ज्यादा सर्द हो गई।

''आपके दोस्त से क्षमा-याचना के साथ कहना चाहूंगी

"-प्रीति व्यंगात्मक स्वर में बोली-

''बीच में इस तरह ताबूत रखकर-जिसमें एक स्केलेटन भी पड़ा है-बात करना अच्छा लगेगा क्या

?"

''मैडम

प्रीति

!

"-उसका स्वर बेहद शान्त था-

''हमारा अभी बात कर लेना जरूरी है। जैसा कि आप सब देख ही रहे हैं कि अंधेरा होने लगा है। फिर रात्रिभोज का समय हो जायेगा। मैं यहां आप लोगों के साथ ज्यादा समय नहीं रहूंगा। आप सबको यहां अकेले ही रहना है। एक-दूसरे का साथ देना है। और जो मुश्किलें आपके सामने आयेंगीं

, उनका सामना भी आपको मिलकर ही करना होगा।

"

''मुश्किलें

?"-अनुराग का स्वर तीव्र हो उठा-

''किस तरह की मुश्किलें

?"

''उसी तरह की मुश्किलें

, जैसी इस जगह पर आपको अपेक्षित हो सकती हैं।

"-उसकी मुस्कान गहरी हो गई।

''पहले तो ये बताओ

, तुम यहां हमारे होस्ट हो न

? ये सब ड्रामा है न

?"

उसकी मुस्कान और भी गहरी हो गई।

''मैं वहीं हूं

"-वो बोला-

''जो आप समझ रहे हैं।

"

अनुराग ने जय की ओर देखा। जय ने आंखों ही आंखों में उसे शांत रहने का इशारा किया।

''देखो

"-जय के संकेत को नजरअंदाज करते हुए अनुराग चेतावनी भरे स्वर

'कॉफिन मैन

' से बोला-

''ये अब कुछ ज्यादा ही हो रहा है...।

"

''अनुराग!

"-जय ने अनुराग को शांत रहने का इशारा किया

, फिर वो खुद

'कॉफिन मैन

' से बोला-

''तुम्हारे पास हम लोगों के लिए कोई मैसेज है क्या

?"

''मैसेज नहीं

"-उस पुराने मकान के भुतहा वातावरण में

'कॉफिन मैन

' की सर्द आवाज गूंज रही थी-

''कुछ निर्देश हैं

, जिनका पालन करना आप लोगों के ही हित में रहेगा।

"

''कैसे निर्देश

?"

''ऐसा लग रहा है

"-डोंगरा राज के कान की ओर मुंह करके धीरे से बोला-

''जैसे किसी हॉरर मूवी के सैट पर आ गया हूं।

"

राज ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। उसका चेहरा गम्भीर था। वो एकटक

'कॉफिन मैन

' की ओर ही देख रहा था।

''सबसे पहली बात

, आप लोगों को यहां से दूर नहीं जाना है।

"

''मतलब

?"

''मतलब आप सबको इस मकान के आसपास ही रहना है। आसपास जंगल के जो पेड़ दिख रहे हैं

, वो समझ लीजिये प्रकृति ने आपके लिये सीमारेखा खींची है। आपको किसी भी हालत में उस सीमारेखा को पार नहीं करना है।

"

''क्या मतलब सीमारेखा को पार नहीं करना है

?"-अनुराग का पारा चढ़ता ही जा रहा था-

''क्या होगा सीमारेखा पार कर लेेंगें तो

?"

''कौन करेगा

?"-उसने प्रश्रसूचक भाव से अनुराग की ओर देखा।

''क्या

?"-अचानक इस तरह प्रश्र किए जाने पर अनुराग अचकचा गया।

''कौन करेगा सीमारेखा पार

?"-उसका स्वर बेहद ठण्डा था।

''मैं।

"-अनुराग चुनौतीपूर्ण स्वर में बोला।

वो कुछ देर तक अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से अनुराग को देखते रहा

, फिर उसके होंठों पर एक विचित्र लेकिन भयावह मुस्कान आ गई।

''जो भी सीमारेखा पार करेगा

"-फिर वो बोला-

''वो अपने साथ-साथ सात और लोगों की जान भी खतरे में डालेगा।

"

''ओके।

"-अनुराग को नाराज होते देख कर जय जल्दी से बोला-

''हममें से कोई सीमारेखा पार नहीं करने वाला...मेरा मतलब...जंगल में नहीं जाने वाला। और कुछ

?"

''घर के पिछले हिस्से में एक स्टोर रूम है। चाहे कुछ भी हो जाये

, आप लोगों को उस स्टोर रूम में भी नहीं जाना है।

"

''ये भी डन।

"

''और कहां-कहां नहीं जाना है

?"-अनुराग कड़वे स्वर में बोला।

''बस। इतना ही।

"-उसने अपनी आंखें अनुराग के चेहरे पर गड़ा दीं। अनुराग को ऐसा लगा जैसे उसकी आंखें उसके शरीर को भेदते हुए अंदर उतर जाना चाहती हों।

अचानक छत पर कुछ आहट सुनकर सबकी नजरें ऊपर की ओर उठ गईं।

''ऊपर कौन है

?"-राज बोला।

''कोई नहीं।

"-कॉफिन मैन बोला-

''यहां सिर्फ हम लोग हैं।

"

''ऊपर छत पर किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

"-जय बोला।

''बिल्ली या कोई जानवर होगा।

"

''ये बिल्ली वगैरह की तो आवाज नहीं लगती।

"-मोहिनी बोली।

''फिर कोई पिशाच होगा।

"-अचानक

'कॉफिन मैन

' की आवाज बेहद सर्द हो गई। उसकी आवाज में ऐसा कुछ था कि कमरे में उपस्थित हर शख्स खामोश हो गया। उसकी आंखों में एक हिंसक चमक दिखाई दी

, जो कि तुरंत ही लुप्त हो गई।

उनके बीच एक अजीब सी खामोशी छा गई

 
''आइये!

"-फिर सन्नाटे को भंग करती हुई

'कॉफिन मैन

' की आवाज गूंजी-

''इस ताबूत को इसकी जगह पर पहुंचाने में मेरी सहायता करिये। फिर मैं आप लोगों से विदा लेता हूं।

"

कहकर वो आगे बढ़कर दरवाजे के पास पहुंचा और उसने ताबूत को सामने से पकड़कर उठा लिया।

जय ने अनुराग को टहोका और थोड़ी दूर खड़े राज को इशारा किया

, फिर तीनों आगे बढ़े और जय और अनुराग ने ताबूत के पिछले हिस्से को पकड़ा और राज ने सामने की ओर से

'कॉफिन मैन

' के साथ ताबूत को कंधे पर उठा लिया।

जिस तरह से

'कॉफिन मैन

' ने सहजता से ताबूत को आगे से उठा लिया था

, उससे उन्हें यही लग रहा था कि ताबूत ज्यादा भारी नहीं होगा लेकिन उसे उठाने पर वे हैरान रह गये। ताबूत इतना वजनी लग रहा था

, जैसे उसमें पत्थर भरे हुए हों। उन तीनों को मिलकर भी ताबूत को उठाने में दिक्कत हो रही थी जबकि

'कॉफिन मैन

' ने उस ताबूत को किसी फूल की तरह उठा रखा था।

वे चारों ताबूत को उसी तरह अपने कंधों पर लेकर बाहर निकले। दरवाजा बड़ा होने से उन्हें ताबूत सहित बाहर निकलने में विशेष दिक्कत नहीं हुई।

जिस तरह वे चारों कंधे पर ताबूत रख कर ले जा रहे थे

, उससे लग रहा था जैसे वो सचमुच में कोई शवयात्रा हो।

'किटिर्र...किटिर्र...।

'

आगे

'कॉफिन मैन

' के साथ ताबूत को कंधे पर रखकर चल रहे

राज

को अचानक ताबूत के अंदर से आती हल्की आवाज सुनाई पड़ी।

वो आवाज ऐसी थी

, जैसे कोई नाखून से ताबूत के अंदर की ओर घिस रहा हो।

''ये...ये आवाज कैसी है

?"-उसने

'कॉफिन मैन

' से कहा।

''कैसी आवाज

?"-वो मुस्कुराया।

''इस ताबूत के अंदर से कुछ आवाज आ रही है।

"

''आपके कान बजे होंगें। ताबूत के अंदर से आवाज कैसे आ सकती है

? ये इस बियाबान जंगल के माहौल का असर है। वहम होते रहते हैं।

"

लेकिन राज को पक्का यकीन था कि वो वहम नहीं था। लेकिन वो ये भी समझ गया था कि उसकी शंका का समाधान कम से कम

'कॉफिन मैन

' के माध्यम से तो बिल्कुल नहीं होने वाला था।

बाहर अब तक पूरा अंधेरा हो चुका था। अंधेरे में जंगल का वो सुनसान हिस्सा और भी ज्यादा रहस्यमयी और डरावना लग रहा था। उतने भारी ताबूत को कंधों पर संभाले

'कॉफिन मैन

' के तेज कदमों के साथ कदम मिलाकर चलने में उन तीनों को ही बेहद परेशानी हो रही थी। ताबूत इतना भारी था कि कुछ ही देर में उन्हें अपने कंधे टूटते हुए से महसूस होने लगे थे और उनके मन में ताबूत को जमीन पर पटक देने की तीव्र इच्छा हो रही थी।

वो लोग ताबूत लेकर घर के सामने के हिस्से में थोड़ी दूरी पर जंगल से सटकर बने लकड़ी के केबिन तक पहुंचे।

'कॉफिन मैन

' ने एक हाथ से केबिन का दरवाजा खोला। केबिन के अंदर से पीली रोशनी बाहर आ रही थी। दरवाजा खुलने पर उन्होंने देखा कि अंदर एक लालटेन जल रही थी। हालांकि वो लालटेन वहां कौन

, कब जलाकर चला गया था

, ये उनमें से किसी की भी समझ में नहीं आया।

उन चारों ने अंदर प्रवेश किया और ताबूत को जमीन पर रख दिया। केबिन इतना ही बड़ा था कि वे चारों ताबूत लेकर उसमें आ गए थे लेकिन उनके आने के बाद अब वो पूरा भरा-भरा लग रहा था। केबिन में कुछ पुराने कबाड़ जैसे सामान के अलावा कुछ भी नहीं था।

जंगली इलाका होने के कारण वहां ठण्ड सामान्य से अधिक थी लेकिन उस वजनी ताबूत को वहां लाने की मेहनत करने के बाद

राज

, जय और अनुराग तीनों ही पसीने से नहा गए थे और उनकी सांसें भी तेज चल रही थीं जबकि

'कॉफिन मैन

' के चाक जैसे सफेद चेहरे पर पसीने के एक बूंद तक नहीं थी और न ही उसके हाव-भाव से ऐसा लग रहा था

, जैसे उसने तिनका भी हिलाया हो।

वे तीनों अविश्वसनीय भाव से उसे देखते रहे।

'कॉफिन मैन

' ने उनके चेहरों पर नजर डाली। उसके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान नाच रही थी। फिर वो ताबूत की ओर देखकर बोला-

''यहां आराम करो

, मेरे दोस्त। मेहमानों को जरा भी तंग मत करना।

"-कह कर उसने रहस्यपूर्ण मुस्कान के साथ उन तीनों की ओर देखते हुए कहा-

''जब तक वे तुम्हें तंग न करें।

"

फिर वे चारों उस केबिन से बाहर निकल आए।

राज

ने आसपास नजरें दौड़ाईं। केबिन के खुले दरवाजे से आ रही लालटेन की पीली रोशनी और थोड़ी दूर पर उस मकान के दरवाजे से आ रही रोशनी के अलावा वहां रोशनी का कोई और साधन नहीं था। सब कुछ अंधेरे में डूबा बेहद रहस्यपूर्ण और डरावना-सा लग रहा था।

रोशनी के दोनों में से एक साधन को

'कॉफिन मैन

' ने बंद कर दिया। उसने केबिन के दरवाजे को बंद कर दिया और उनके साथ चलते हुए वापस कमरे में पहुंचा।

''मेरी आप सबसे गुजारिश है

"-कमरे में पहुंचने के बाद वो उन सभी से बोला-

''कि उस केबिन में भी अनावश्यक रूप से न जाएं। उसमें मेरा दोस्त आराम कर रहा है। अगर आपने उसके आराम में खलल डालने की कोशिश की तो हो सकता है उसे ये पसंद न आये।

"

''हममें

से कोई भी उस केबिन में नहीं जायेगा।

"-जय ऐसे बोला

, जैसे उसे सांत्वना दे रहा हो-

''और कुछ

?"

''और मेरी आप लोगों को सलाह है कि रात सोने के लिए होती है। उसे सोकर ही गुजारें। रात में अनावश्यक रूप से जगे नहीं। अगर जग भी गये तो बाहर क्या हो रहा है

, ये जानने की कोशिश बिल्कुल न करें।

"

''क्यों

?"-राज बोला।

''क्योंकि रात के समय यहां घर से बाहर निकलना बेहद खतरनाक है। रात के समय बाहर से चाहे कैसी भी आवाज क्यों न आये

, बाहर चाहे कुछ भी क्यों न हो रहा हो लेकिन आप सब बाहर न निकलें।

'कॉफिन मैन

' जानता है कि दुनिया में अनेक शापित जगह हैं लेकिन उन सभी शापित जगहों में इस जगह का एक विशेष स्थान है। इसीलिए इसे

'मौत का घर

' भी कहा जाता है। यहां ऐसी बहुत सी चीजें होती हैं

, जिन्हें आंखें नहीं देखना चाहतीं

, कान नहीं सुनना चाहते। इसलिए रात आप सोते हुए ही गुजारें। घर से बाहर किसी हालत में न निकलें। दरवाजे बंद ही रखें।

"

''मुझे भी आपसे एक बात पूछनी थी श्रीमान!

"-अनुराग बोला।

'कॉफिन मैन' ने उसकी ओर देखा।

''इस बकवास की कोई लिमिट है

"-अनुराग हाथ मलते हुए बोला-

''या ये यूं ही चलती रहेगी

?"

''अनुराग...।

"-जय ने अनुराग को टोका। अनुराग ने नाराजगी के भाव से जय की ओर देखा।

अनुराग की बात सुनकर 'कॉफिन मैन' के सुर्ख खून जैसे लाल अधरों पर नाच रही रहस्यमयी मुस्कान और भी गहरी हो गई।
 
''आप तो बहुत ही जल्दबाज निकले

, मिस्टर अनुराग।

"-उसकी सर्द आवाज वहां गूंज उठी-

''आपको अभी से ये सब खत्म होने की जल्दी होने लगी। जल्द ही वो वक्त आएगा

, जब आप सभी ऐसा ही चाहेंगें।

"

उसकी आवाज में कुछ ऐसा था कि कमरे में उपस्थित हर शख्स के मुंह पर ताला सा लग गया।

''अब मैं इन शुभकामनाओं के साथ आप सबसे विदा लेता हूं कि आप सब यहां पहले आने वाले लोगों जितने बदनसीब न हों।

"

कहकर वो हवा के झोंके की तरह कमरे से बाहर निकल गया।

'कॉफिन मैन

' के कमरे से बाहर निकलने के कुछ सेकेंड तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा

, फिर अनुराग बिजली की तेजी से लपकते हुए उसके पीछे कमरे से बाहर निकला।

''ए कॉफिन मैन...।

"-अनुराग ने जोर से आवाज लगाई लेकिन बाहर आकर वो खामोश हो गया।

बाहर कोई नहीं था।

सिवाय अंधेरे के!

उसके पीछे-पीछे बाकी लोग भी बाहर निकल आये।

''कहां गया वो

?"-प्रीति हैरत और भयमिश्रित स्वर में बोली।

''ये तो सचमुच बहुत डरावना था।

"-मोहिनी ने झुरझुरी ली।

बाहर अंधकार में ज्यादा देर खड़े रहना उन सभी के लिए असहनीय होने लगा तो वो वापस उस कमरे में लौट आये।

''बढिय़ा।

"-फिर अनुराग भी

'कॉफिन मैन

' की तरह ही ऊंची गूंजती सी आवाज बनाकर बोला-

''बहुत बढिय़ा।

"

''क्या हुआ

?"-जय ने चौंक कर उसकी ओर देखा।

''पहले मुझे लग रहा था यहां रहने के एक लाख डॉलर बहुत ज्यादा हैं। लेकिन अब यहां की हालत और ये सब ड्रामा देखकर लग रहा है कि यहां तीन दिन बिताने के तो दस लाख डॉलर भी कम हैं।

"

''कम ऑन

, यार!

"-जय बोला-

''मैंने तुम लोगों को बताया था न कि वो लोग हमें डराने की कोशिश करेंगें...।

"

''जिसमें वो कामयाब भी हुए।

"-मोहिनी बोली।

''देखो!

"-जय समझाने के से अंदाज में बोला-

''यहां हम सब एक-दूसरे के साथ हैं। एक दूसरे का ख्याल रख सकते हैं। हमें किसी से डरने की कोई जरूरत नहीं है।

"

''मुझे तो ये मामला कुछ ज्यादा ही गड़बड़ लग रहा है।

"-राज

गम्भीर स्वर में बोला।

''पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर बोले!

"-अनुराग बड़बड़ाया।

''अगर ये

'कॉफिन मैन

' ही हमारा होस्ट था

"-अनुराग की बात को नजरअंदाज करते हुए राज बोला-

''तो वो यहां से चला क्यों गया

?"

''मुझे क्या पता क्यों चला गया

?"-जय ने हैरानी से राज की ओर देखते हुए कंधे उचकाए-

''हो सकता है कल फिर आ जाए।

"

''चूल्हे में जाए वो!

"-प्रीति बोली-

''क्या हमें सचमुच तीन दिन इसी तरह रहना होगा

? ऐसे ही

? इस...इस लैम्प की रोशनी में

?"

''नहीं।

"-कहकर डोंगरा आगे बढ़ा और उसने दरवाजे के साइड में लगे एक स्विचबोर्ड का बटन दबाया तो कमरा दूधिया रोशनी से नहा उठा।

''थैंक गॉड!

"-प्रीति ने राहत की सांस ली।

बाकी के चेहरों पर भी थोड़े सुकून के भाव आए।

''जब यहां लाइट की व्यवस्था है

"-मोहिनी बोली-

''तो ये लैम्प का नाटक क्या था

?"

''हॉरर इफैक्ट देने के लिये भई।

"-जय बोला।

''क्या मतलब

?"

''अरे

, मैंने तुम लोगों को बताया था न

, ये लोग हमें तीन दिन यहां चैन से नहीं रहने देंगें। ये तो सिर्फ शुरूआत है। अभी तो जाने और कितनी टांग खींची जाएगी हमारी।

"

''मेरी टांग किसी ने खींची तो उसकी टांगें तोड़ देनी हैं मैंने।

"-अनुराग गुस्से से बोला।

''बस

, बस।

"-मोहिनी मुंह बिगाड़कर बोली-

''देख ली तुम्हारी सारी बहादुरी। उस कॉफिन मैन के सामने तो कुछ नहीं कर पाए। खुद तुम्हारे भी हाथ-पांव फूल गए थे उसे ताबूत से बाहर निकलते देख कर।

"

''इस तरह रहना तो सचमुच डरावना है।

"-प्रीति अपनी दोनों बांहों को एक-दूसरे से लपेटकर झुरझुरी लेते हुए बोली।

''क्या बाहर के लिए भी लाइट है

?"-अनुराग ने डोंगरा से पूछा। डोंगरा ने सहमति में सिर हिलाते हुए स्विचबोर्ड पर लगा एक दूसरा बटन दबाया। बाहर भी एक शक्तिशाली बल्ब रोशन हो उठा

, जिससे बाहर उजाला तो हो गया लेकिन बाहर का हिस्सा काफी बड़ा और खुले में होने के कारण चारों ओर जंगल में अब भी अंधेरा था।

''ये सब बहुत ज्यादा अजीब लग रहा है।

"-मोहिनी बोली।

''डोंट वरी।

"-डोंगरा सांत्वना देने के से अंदाज में बोला-

''ऐसा सोचो कि ये सब एक खेल है। एक ड्रामा। आप लोगों को इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है। क्योंकि आप लोगों को पहले से पता है कि यहां जो कुछ हो रहा है या जो कुछ होगा

, वो स्टेज किया हुआ है। नकली है। असली नहीं है क्योंकि असली हो ही नहीं सकता। क्योंकि भूत-प्रेत जैसी कोई चीज होती ही नहीं।

"

''आपको पूरा यकीन है इस बात पर

?"-डॉली बोली।

''बिल्कुल।

"-कहने के साथ ही डोंगरा के होंठों पर मुस्कान आ गई-

''सॉरी अगर ऐसा कहकर मैंने आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाई हो तो। आखिर आप और मिस्टर वरूण पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हैं। वैसे

"-फिर वो दिलचस्पी भरे स्वर में बोला-

''मुझे आपसे एक बात पूछनी थी। क्या आपने सचमुच किसी भूत को देखा है

?"

डॉली ने इनकार में सिर हिलाया।

''फिर

? फिर आप लोग पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर कैसे बने

? मतलब इस प्रोफेशन में आने की प्रेरणा आपको कहां से मिली

?"

''वो किस्सा फिर कभी।

"-डॉली बोली-

''आज पहले ही बहुत ड्रामा हो गया है।

"

''तब आप लोग चलकर पूरे घर को देख लीजिये।

"

''आपके होस्ट साहब तो गायब हो गए।

"-अनुराग डोंगरा से बोला।

''उनके इस तरह गायब हो जाने से मैं भी हैरान हूं।

"-डोंगरा के चेहरे से भी हैरानी झलक रही थी-

''हो सकता है वे कल दर्शन दें। तब तक के लिये आप लोग मुझे ही अपना होस्ट समझिये। इन तीन दिनों के लिये कंपनी वालों की क्या स्ट्रेटेजी है

, इसके बारे में मुझे भी ज्यादा जानकारी नहीं है। मुझे सिर्फ इतना ही पता है कि यहां किसी तरह की जरूरत पडऩे पर मुझे आप लोगों की मदद करनी है और विटनेस की भूमिका भी निभानी है कि आपने तीन दिन यहां बिताए।

"

''और आपकी ये मैडम रिंकी

"-अनुराग ने रिंकी की ओर इशारा किया-

''इन्हें क्या करना है

?"

''ये बतौर असिस्टेंट मेरे साथ हैं। मेरी ही तरह आपकी मदद के लिए।

"

''कितने मददगार लोग हैं!

"-प्रीति धीमे से बुदबुदाई।

फिर डोंगरा के साथ उन्होंने पूरे घर का भ्रमण किया। सबसे बाहर वाले कमरे के पीछे एक और कमरा था और उन दोनों कमरों के बीच एक गलियारा था

, जिसकी दिशा उन कमरों के दरवाजों की ओर न होकर एक तरफ बने किचन की ओर थी। गलियारे का दूसरा सिरा ऊपर की ओर जाती सीढिय़ों पर खत्म होता था

, जिसके बगल में ही मीटिंग रूम और अंदर वाले कमरे के दरवाजे थे। उन्होंने किचन में जाकर देखा तो वहां इतना पैक्ड फूड और पानी था

, जो तीन दिनों के लिए तो क्या पांच दिनों के लिए पर्याप्त था।

यानि उन्हें खाने-पीने को लेकर तो किसी तरह की समस्या नहीं होने वाली थी।
 
पहले कमरे को-जिसमें उनकी

'कॉफिन मैन

' से मुलाकात हुई थी-डोंगरा ने

'मीटिंग रूम

' का नाम दिया। उसका कहना था कि वहां तीन दिनों तक रूकने के दौरान उनकी महफिल उसी कमरे में जमा करेगी। उस कमरे में एक आतिशदान भी था और उसमें जलाने के लिए लकड़ी की भी पर्याप्त व्यवस्था थी। वैसे भी वहां ठण्ड भी ज्यादा थी

, जिसके चलते आतिशदान सभी को पसंद आया।

'मीटिंग रूम

' के बाद सीढ़ी और किचन के बीच वाले गलियारे के बाद वाला कमरा उससे थोड़ा छोटा था और खाली-खाली सा ही था। एक बड़ी सी पुरानी मेज के अलावा वहां ज्यादा सामान नहीं था। उस कमरे से जुड़े दो-तीन कमरे और भी थे लेकिन वहां भी थोड़े-बहुत पुराने फर्नीचर के अलावा कुछ नहीं था। उस कमरे के अंत में एक दरवाजा था

, जो एक गलियारे में खुलता था। उस गलियारे में रोशनी की कोई व्यवस्था नहीं थी और वो काफी लम्बा भी था

, जिससे अगले कमरे की रोशनी भी उसमें पूरी नहीं आती थी। गलियारे के अंत में एक दरवाजा था

, जो मकान के पिछले हिस्से में खुलता था लेकिन उस पर अंदर की ओर से ताला जड़ा हुआ था।

''हमें बाहर आने-जाने के लिए सामने के दरवाजे का ही उपयोग करना होगा।

"-डोंगरा ने कहा।

''इस गलियारे में लाइट नहीं लग सकती थी

?"-जय बोला।

''लग सकती थी लेकिन ये सब इंतजाम मैंने नहीं किए हैं। ये हमारे होस्ट साहब ने ही एक-दो दिन पहले यहां आकर किए थे। अब उन्होंने ही गलियारे में लाइट नहीं लगाई तो क्या किया जा सकता है

? यहां कोई व्यवस्था भी नहीं दिख रही है

, जिससे यहां लाइट लगाई जा सके। वैसे भी यहां लाइट की कोई खास जरूरत नहीं है। हमें इस गलियारे में आने की कोई जरूरत ही नहीं है। ये दरवाजा तो वैसे भी लॉक्ड है।

"

फिर वे लोग सीढिय़ां चढ़कर ऊपर पहुंचे।

सीढिय़ां ऊपर एक चौड़े गलियारे में खत्म होती थीं

, जिसके अंत में एक दरवाजा था

, जिस पर नीचे घर के पिछले दरवाजे की तरह ही ताला लगा हुआ था। गलियारे में दोनों ओर दो-दो कमरे थे लेकिन उनमें एक अजीब बात थी। आम तौर पर ऐसे कमरों के दरवाजे आमने-सामने होते हैं लेकिन उन कमरों के दरवाजे आमने-सामने न होकर एक-दूसरे से थोड़ी दूरी पर बने हुए थे

, जिससे दरवाजों के सामने सामने वाले कमरे का दरवाजा न होकर दीवार थी।

उन्होंने कमरों में जाकर भी देखा। हर कमरे में दो-दो पलंग थे। बिस्तर अच्छे से लगा हुआ था और चादर

, कम्बल वगैरह की भी पूरी व्यवस्था थी। हर पलंग के पास एक बड़ी खिड़की भी थी

, जिसमें कोई ग्रिल नहीं लगी थी। बस लकड़ी के पल्ले थे। उन्हें खोलकर देखने पर बाहर रात के घनघोर अंधेरे में डूबा जंगल दिखाई दे रहा था

, जो अपने-आप में बेहद रहस्यमयी और डरावना प्रतीत हो रहा था।

''और ये कमरा

?"-कमरों को अंदर से देखकर जब वे लोग वापस बाहर गलियारे में लौटे तो अनुराग गलियारे के अंत वाले कमरे-जिसमें ताला लगा था-की ओर इशारा करते हुए बोला-

''इसमें भी नहीं जाना है

?"

"अब ताला लगा है तो नहीं ही जाना है।

"-डोंगरा बोला।

''क्या मतलब ताला लगा है

? तुम्हारे पास इसकी भी चाभी नहीं है

?"

''मेरे पास इसकी चाभी क्यों होगी

?"-डोंगरा हैरानी से बोला।

''क्यों

? तुम केयरटेकर हो या घसखुदे

?"

''मिस्टर अनुराग!

"-डोंगरा सख्त स्वर में बोला-

''माइण्ड योर लैंग्वेज।

"

''अनुराग की ओर से मैं माफी मांगता हूं

, डोंगरा साहब।

"-जय जल्दी से बोला-

''लेकिन हम सभी ये जानना चाहते हैं कि आप बिना चाभियों के ही इस मकान के केयरटेकर कैसे बने हुए हैं

?"

डोंगरा ने जय के चेहरे पर नजर मारी

, जैसे उसके स्वर में छिपे हुए व्यंग्य को समझ गया हो। फिर बोला-

''मैं नाम के लिए ही यहां का केयरटेकर हूं। इस मकान की देखरेख मुख्य रूप से कंपनी ही करती है। मुझे बस मकान की उतनी देख-रेख करने के लिए कहा गया था

, जितनी की जरूरत है। और जितना कि कहा जाए। बिना निर्देश के मुझे यहां कुछ भी करने की बल्कि यहां आने तक की सख्त मनाही है। पिछले एक साल में मुझे एक बार भी यहां आकर कुछ करने के लिए नहीं कहा गया। इन बंद दरवाजों की चाभी मेरे ख्याल से कंपनी वालों के पास ही होनी चाहिए।

"

''ये दरवाजा बंद। पिछला दरवाजा बंद। स्टोर रूम में नहीं जाना है। इस घर का आधे से ज्यादा हिस्सा तो रिस्ट्रिक्टेड एरिया बना रखा है।

"-अनुराग बोला।

जवाब में डोंगरा ने कुछ नहीं कहा।

घर काफी बड़ा था। रात होने के कारण उन लोगों ने घर के मुख्य-मुख्य कमरों में जाकर देख लिया। फिर ऊपर गलियारे वाले कमरों में ही सोने का निर्णय लिया गया। उन लोगों ने डिसाइड किया कि एक कमरे में राज और जय

, बगल वाले में प्रीति और डॉली

, उसके सामने वाले में डोंगरा और अनुराग और उसके बगल वाले कमरे में रिंकी और मोहिनी रहेंगें।

''हमें अपनी सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा।

"-राज गम्भीर स्वर में बोला।

''सुरक्षा

?"-अनुराग बोला-

''बड़ी जल्दी याद आ गई सुरक्षा की

?"

राज ने अनुराग की ओर देखा

, फिर बोला-

''देखो

, अब हम यहां इतनी दूर आ ही गए हैं तो जो चीजें जरूरी हैं

, उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते।

"

''तुम कहना क्या चाहते हो

?"-जय बोला।

''हम शहर से काफी दूर हैं। हमारे पास शहर से कॉन्टैक्ट करने का कोई साधन नहीं है। और यहां भी उस

'कॉफिन मैन

' जैसी शख्सियत ने जिस तरह हमारा स्वागत किया

, वो कुछ ज्यादा राहत देने वाला नहीं है। इससे तो अच्छा था वो आता ही नहीं।

"

''सही कहा।

"-मोहिनी सिर हिलाते हुए बोली-

''मुझे तो पूरा विश्वास है कि आज रात मुझे डरावने सपने आएंगें और उनमें वो

'कॉफिन मैन

' ही दिखेगा। मेरे दिमाग में वही घूम रहा है।

"

''बेहतर यही होगा कि रात को हम निगरानी का इंतजाम करके रखें।

"

''निगरानी

?"

''हां। हममें से दो-दो लोग दो शिफ्ट में जागकर पहरा देंगें। बाकी लोग कमरे में सोएंगें जरूर लेकिन एकदम बेखबर होकर नहीं। सबको ऐसे सोना है कि जरूरत पडऩे पर एक आहट होने पर तुरंत जाग सकें।

"

''सोने पर भी किसी का बस चलता है क्या

?"-प्रीति हैरानी से बोली-

''मैं तो घोडिय़ां बेचकर सोती हूं।

"

''घोडिय़ां

?"-मोहिनी चौंककर बोली।

''आदमी लोग घोड़े बेचकर सोते हैं। मैं घोडिय़ां बेचकर सोती हूं।

"

मोहिनी ने हंसते हुए हाथ से प्रीति के कंधे पर हल्के से धक्का दिया।

''तीन दिन के लिए अपनी घोडिय़ां मत बेचना।

"-राज बोला-

''यहां से लौटने के बाद सारी घोडिय़ां इकट्ठे बेच देना। लेकिन यहां हमें सावधान रहने की जरूरत है।

"

''भाई सही कह रहा है।

"-इस बार अनुराग ने भी राज के फैसले को सहमति प्रदान की।

''कमरों के दरवाजे खुले रहेंंगें

, जिससे किसी भी तरह की मदद की जरूरत पडऩे पर हम तुरंत एक-दूसरे के पास जा सकें।

"

''तुम्हारे बात करने के ढंग से तो लग रहा है

"-मोहिनी सस्पेंस भरे स्वर में बोली-

''जैसे रात में हम पर कोई हमला करने वाला है।

"

''अगर वो भी हो जाए तो कोई हैरानी की बात नहीं होगी।

"-राज सपाट स्वर में बोला।

''चिल मारो यार!

"-जय बोला-

''हमारा बाहर से कोई कॉन्टैक्ट नहीं है लेकिन हम

'पैरानॉर्मल होल्ड

' की जानकारी में यहां आए हैं। इस चैलेंज में भाग लेने के लिए हमारा अलग से दो-दो लाख डॉलर का बीमा है

, जो हममें से किसी को भी कुछ होने की स्थिति में कंपनी देगी। तो हमारी जान की फिक्र हमसे ज्यादा कंपनी को होनी चाहिए। हॉरर एंटरटेनमेंट के माध्यम से पैसा कमाना उनका काम है तो थोड़ा-बहुत इफैक्ट तो वो देंगें ही-जैसे वो 'कॉफिन मैन'-और ये बात हम पहले से जानते थे लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कोई हमें मार देना चाहता है। मेरे ख्याल से यहां का सूनेपन का माहौल तुम्हारे दिमाग पर कुछ ज्यादा ही हावी हो गया है।

"

''तुम चाहे जो भी कहो

"-राज बोला-

''लेकिन मुझे अब सारी चीजें उतनी सीधी नहीं लग रहीं

, जितनी होनी चाहिए।

"

''राज

सही कह रहा है।

"-अनुराग बोला।

''और तुम्हारी ये बात भी गलत है

"-जय बोला-

''कि हमारे पास बाहर कॉन्टैक्ट करने का कोई साधन नहीं है। मिस्टर डोंगरा के पास मोबाइल है क्योंकि वे इस चैलेंज के प्रतिभागी नहीं हैं। कंपनी के प्रतिनिधि के रूप में हमारे साथ हैं। हमारी मदद के लिए। जरूरत पडऩे पर ये हमारे लिए बाहर कॉन्टैक्ट कर सकते हैं।

"

''लेकिन उसी हालत में

"-डोंगरा बोला-

''जब एकदम ज्यादा जरूरी है। एकदम किसी की जान पर बनी होने जैसी इमरजेंसी हो। वरना तीन दिनों तक मुझे भी मोबाइल को हाथ नहीं लगाना है। मैंने अभी ही मोबाइल ऑफ करके रखा हुआ है। अगर कुछ विशेष गड़बड़ नहंी होती है-जो कि नहीं ही होनी चाहिए-तो इन तीन दिनों में मैं मोबाइल को हाथ भी नहीं लगाऊंगा।

"

''देखा

?"-जय डोंगरा की ओर हाथ करके राज से बोला-

''हमारे पास मोबाइल भी है। हम बस शहर से दूर जंगल के एक सूने मकान में हैं

, जो हॉन्टेड प्लेस के रूप में कुख्यात है। बस इसीलिए तुम इतना डर रहो हो। और मुझसे पूछो तो तुम कुछ ज्यादा ही जल्दी डर गए। उस 'कॉफिन मैन' के ड्रामे से तुम इतनी ज्यादा दहशत में आ जाओगे

, ये मैंने नहीं सोचा था।

"

''भूल जाओ

'कॉफिन मैन

' को।

"-राज सख्त स्वर में बोला-

''मुझे ये बताओ

, मैं जो कह रहा हूं

, उसे मानने में कोई दिक्कत है क्या

? क्या ऐसी जगह में तुम सचमुच बेफिक्र होकर चादर तान कर सो जाना चाहोगे

, जब बाहर कोई निगरानी करने वाला भी न हो

?"

जय खामोश हो गया।

''भाई

, मैं तो राज से पूरी तरह सहमत हूं।

"-अनुराग दोनों हाथ सामने की ओर करते हुए बोला-

''मुझे तो इसमें सेंस ही सेंस नजर आ रहा है। वैसे भी उन कंपनी वालों को हमें डराने का जो भी प्लान है तो हम इतने सावधान रहेंगें

, तभी उन डराने वालों को मुंह तोड़

, सिर तोड़ जवाब दे सकेंगें। बेखबर होकर सो जाएंगें

, तब तो वो साले हमारा तमाशा बना कर रख देेंगें।

"

''मिस्टर राज जो कह रहे हैं

"-डोंगरा भी बोला-

''उसे मानने में भी कोई बुराई नहीं है।

"

''ओके।

"-जय ने हार मानने वाले अंदाज में अपने हाथ आगे कर दिए।
 
मीटिंग रूम में ही खाना खाने के बाद सभी लोग ऊपर अपने कमरों में पहुंच गए।

ऊपर जाने से पहले उन्होंने नीचे के दरवाजे-खिड़कियां अंदर से बंद करके उन्हें अच्छी तरह चैक कर लिया था। सीढिय़ों पर भी दरवाजा था

, जिसे उन्होंने बंद कर लिया था।

अब सीढिय़ों के रास्ते नीचे से किसी के ऊपर आने का सवाल ही पैदा नहीं होता था।

गलियारे में डॉली मोहिनी से टकरा गई।

''मजा आ रहा है न

?"-मोहिनी के स्वर में एक्साइटमेंट था।

''हां।

"-डॉली बोली-

''तुमसे एक बात पूछनी थी।

"

''क्या

?"

''तुम रिंकी को देखकर इतनी चौंक क्यों गई थी

?"

डॉली का सवाल सुनकर मोहिनी के चेहरे पर हल्की उदासी की झलक दिखाई देने लगी।

''क्या हुआ

?"-डॉली चौंक गई-

''अगर तुम नहीं बताना चाहती हो तो जाने दो। ऐसा कोई जरूरी नहीं है...।

"

''मेरी एक छोटी बहन थी

"-मोहिनी उसकी बात बीच में ही काटते हुए बोली-

''मैं बहुत प्यार करती थी उससे। लेकिन एक एक्सीडेंट में वो नहीं रही।

"

''ओह!

"-मोहिनी का स्वर इतना उदास हो गया था कि डॉली को धक्का-सा लगा-

''आई एम सॉरी!

"

''रिचा था उसका नाम। रिंकी बिल्कुल रिचा जैसी दिखती है।

"

''अरे!

"

''हां। मैं भी उसे देखकर हैरान रह गई थी।

"

''तुम दोनों यहां गलियारे में खड़ी रहकर ही बातें करती रहोंगीं क्या

?"-अनुराग कमरे से एक पुरानी कुर्सी लेकर बाहर निकलते हुए बोला-

''अगर गप्पें ही मारनी हैं तो अपने पार्टनर एक्सचेंज कर लो। रात भर गप्पें मारना। हम लोगों का भी यहां बाहर बैठे-बैठे टाइम पास होते रहेगा।

"

डॉली ने मोहिनी को

'गुड नाइट

' कहा और अपने कमरे में चली गई।

वहां प्रीति पहले ही बिस्तर पर लेटी थी और सोने की तैयारी कर रही थी।

दोनों के पलंग के सिरहाने बनी खिड़कियां बंद थीं लेकिन बाहर चल रही तेज हवाओं से खिड़की के पल्ले भड़भड़ा रहे थे। साथ ही बाहर से पेड़ों के हिलने से होने वाली सरसराहट की तेजी आवाज भी सुनाई दे रही थी।

''निगरानी ड्यूटी पर कौन-कौन है

?"-प्रीति बोली।

''अनुराग और जय।

"-डॉली अपने बिस्तर पर लेटते हुए बोली।

''राज ने अच्छा प्लान बनाया।

"-प्रीति डॉली की ओर करवट करके लेटते हुए बोली-

''वरना यहां इस तरह के माहौल में नींद भी मुश्किल से आती।

"

''हां।

"-डॉली मुस्कुराई-

''राज के फैसले ज्यादातर सही ही होते हैं।

"

''तुम तो उसकी फैन बन गई हों।

"-प्रीति शरारत भरे स्वर में बोली-

''पता है

, कॉलेज में वो मेरे पीछे लट्टू हुआ करता था। मुझे हमेशा डर लगता था कि कभी उसने मुझसे अपने दिल की बात कह दी तो मैं उसे इनकार कैसे कर पाऊंगी। कर भी पाऊंगी या नहीं

? लेकिन उसने कभी एक शब्द भी नहीं कहा।

"

''पता है।

"-डॉली बोली-

''वो तुम्हारे बारे में जब भी बात करता है

, उसी से पता चल जाता है कि वो तुम्हें कितना चाहता था।

"

''था

? मतलब अब नहीं चाहता

? ओह हां। अब भला क्यों चाहेगा

? अब तो उसे तुम मिल गई हो।

"

''ऐसा नहीं है। मैं और राज बस दोस्त हैं।

"

''सच में

?"-प्रीति का स्वर और भी शरारती हो उठा।

''सच

, लेकिन

"-डॉली थोड़ा ठहरकर बोली-

''आगे की नहीं कह सकती।

"

उसकी उस बात पर प्रीति जोर से हंस पड़ी।

फिर वैसे ही हल्की-फुल्की बातें करते हुए दोनों को कब नींद ने अपने आगोश में ले लिया

, उन्हें पता भी नहीं चला।

पहला दिन

''जाग गईं

?ÓÓ

डॉली की नींद खुली। सामने राज बैठा था।

''तुम!

"-डॉली बिस्तर पर उठ बैठी-

''किस टाइम सोये रात में

?"

''टाइम से सो गया था। तुम बताओ

, अच्छे से सोईं या नहीं

?"

वो खोई-खोई सी खिड़की से अंदर आ रही सुबह की गुलाबी धूप को देखती रही।

''क्या हुआ

?"-राज बोला।

''यहां बहुत सन्नाटा है।

"-वो धूप की ओर देखते हुए बोली।

''जंगल है न। दिल्ली थोड़े ही है

, जहां गाडिय़ों का शोर सुनाई देगा।

"

''सही कहा

"-वो बोली

, फिर कुछ देर रूककर उसने कहा-

''वैसे सच पूछो तो दिन भर के डरावने अनुभव के बावजूद मेरी रात बहुत बढिय़ा बीती।

"

''गुड!

"

''सब कुछ एकदम शान्त लग रहा था। शहर से दूर आकर सचमुच अच्छा लगता है। मैं पहले भी शहर की भीड़-भाड़ से दूर रह चुकी हूं लेकिन इस जगह की बात कुछ अलग है। यहां तो ऐसा लगता है...जैसे हम किसी और ही दुनिया में आ गए हों।

"

''बस...बस...।

"-राज उठते हुए बोला-

''अब ज्यादा कल्पनाशील होने की जरूरत नहीं है। फ्रैश होकर तैयार हो जाओ। आज किचन की ड्यूटी प्रीति और मोहिनी की है। वो दोनों ब्रेकफास्ट बनाने में जुटी हैं। कल पूरा दिन तुम्हें और रिंकी को किचन सम्भालना होगा।

"

''ओके।

"-डॉली बिस्तर से उठते हुए बोली।

उन्होंने घर के बाहर कुर्सियां डाल लीं थीं

, जहां सबने एक साथ बैठकर खामोशी के साथ ब्रेकफास्ट किया।

''वाह!

"-अनुराग बोला-

''मजा आ गया। इसे कहते हैं पिकनिक!

"

''तुम यहां पिकनिक मनाने आये हो

?"-जय बोला।

''क्यों

? मनाने आया हूं तो इसमें तुम्हारे बाप का क्या जाता है

?"

''अबे

, बाप तक मत जा।

"-जय ने धमकाया।

''क्यों तुम लोग सुबह-सुबह राशन-पानी लेकर एक-दूसरे पर चढ़े जा रहे हो

?"-प्रीति ने जय को टहोका।

''कुछ सोचा है

, अब हम लोगों को करना क्या है

?"-डोंगरा बोला।

सबकी नजरें उसकी ओर घूम गईं।

''क्या क्या करना है

?"-अनुराग बोला।

''मतलब

, हम सारा दिन यहीं ऐसे बैठे तो नहीं रह सकते न

?"

''नहीं।

"-अनुराग ने दांये-बांये सिर हिलाया-

''हम पार्टी करेंगें। आइये

, आप हमें यहां आकर डांस दिखाइये।

"

डोंगरा के चेहरे पर नाराजगी के भाव उभरे।

''अभी सुबह-सुबह क्या करना है

?"-मोहिनी जल्दी से बोली-

''घूमेंगें यहीं आसपास। दूर जाने से तो उस

'कॉफिन मैन

' ने मना किया है।

"

''ऐसी तैसी उस साले

'कॉफिन मैन

' की।

"-अनुराग ने बुरा-सा मुंह बनाया।

''नहीं

, अनुराग!

"-मोहिनी नाराजगी भरे स्वर में बोली-

''हमें तीन दिन ही यहां रूकना है। एक-दो छोटे-मोटे नियमों का पालन करने से कुछ घिस नहीं जायेगा।

"

''नियमों का पालन करता है मेरा जूता!

"-अनुराग कॉफी की चुस्की लेते हुए धीमे से बड़बड़ाया।

''क्या कहा

?"

''कुछ नहीं। मैंने कहा नियमों का पालन करना ही होगा। खबरदार कोई जंगल की ओर गया तो!

"

मोहिनी अनिश्चित भाव से उसकी ओर देखती रही।

कुछ देर तक वो लोग यूं ही इधर-उधर की बातें करते रहे।

''मैं अभी आया।

"-फिर अनुराग वहां से उठकर चला गया।

अनुराग घर के अंदर जाने की जगह घर के बगल से होते हुए पीछे की ओर चला गया। वो सब लोग वहां बातों में व्यस्त थेे। राज ने ही अनुराग का घर के पीछे की ओर जाना नोटिस किया।
 
अनुराग को गए हुए थोड़ी देर हो गई तो राज कुर्सी से उठते हुए बोला-

''मैं अभी आया।

"

''किधर

?"-जय बोला-

''वो अनुराग ही नहीं आया अभी तक।

"

''उसी को देखने जा रहा हूं।

"

''ओके।

"

राज घर के पिछले हिस्से में पहुंचा। पिछले हिस्से में भी सामने की तरह ही जंगल से घिरी हुई काफी बड़ी खुली जगह थी। वहां एक ही कार खड़ी थी

, जो कि अनुराग की थी। लेकिन अनुराग वहां कहीं नजर नहीं आ रहा था।

अनुराग की तलाश में राज ने चारों ओर नजरें दौड़ाईं। फिर उसकी नजरें मकान के पिछले हिस्से पर स्थिर हो गईं।

वहां वो दरवाजा नजर आ रहा था

, जिसके उस पार अंदर की ओर जाने के लिए गलियारा था। जिसमें उस ओर से ताला लगा था।

दरवाजे से नीचे उतरने के लिए सीढिय़ां थीं। दरवाजे के बगल में थोड़ी ही दूरी पर एक कमरा ऐसा बना था

, जो मकान से बाहर की ओर उभरा हुआ प्रतीत हो रहा था। उस कमरे का बड़ा-सा लकड़ी का दरवाजा बंद था

, जिस पर ताला झूल रहा था। ताले और दरवाजे पर जमी धूल की परत बता रही थी कि वो लम्बे समय से नहीं खुला था।

शायद वही वो स्टोर रूम था

, जिसमें जाने के लिए उस रहस्यमयी कॉफिन मैन ने उन्हें मना किया था।

क्या था उस स्टोर रूम के अंदर

?

उस स्टोर रूम को देख कर रात की सारी बातें राज को याद आ गईं। उस ताबूत से उस रहस्यमयी

'कॉफिन मैन

' का निकलना

, फिर उतने ही रहस्यमयी ढंग से गायब हो जाना।

तभी पीछे से किसी ने राज के कंधे पर हाथ रखा।

राज चौंक कर पीछे घूमा। वो ख्यालों में इतना खो गया था कि भूल ही गया था कि वो वहां अनुराग को देखने आया था।

उसके पीछे अनुराग खड़ा था। उसका चेहरा गम्भीर था।

''अनुराग!

"-राज बोला-

''तुम कहां थे

? तुम्हें देर हो गई तो मैं तुम्हें देखना आया था...।

"

''मैं यहां कार में सामान चैक करने आया था। कार में रखी पेट्रोल की कैन गायब है। और यहां

"-उसने पीछे पेड़ों की कतार की ओर नजर डाली-

''मुझे कुछ मिला है।

"

''क्या मिला है

?"

''तुम लोग भी देखना चाहोगे

?"

''क्यों नहीं

?"

''चलो

, बाकी सबको भी बुला लो। फिर सब एक साथ ही चलते हैं।

"

वे मकान के सामने वाले हिस्से में पहुंचे।

''मेरी कार में पेट्रोल की कैन रखी थी

"-अनुराग बोला-

''सच सच बताओ

, उसे किस ने निकाला

?"

''मैंने!

"-मोहिनी बोली-

''और कौन निकालेगा

? मैंने उसे अंदर रख दिया है।

"

''क्यों

? कार में कौन खाए जा रहा था उसे

?"

''पता नहीं। मुझे लगा वो

'कॉफिन मैन

' या कोई शरारत में उसे ही उठाकर न फेंक दे। कार में पेट्रोल कम है न।

"

''अनुराग ने पीछे कुछ देखा है

"-राज बोला-

''जिसे देखना हो

, हमारे साथ चलो।

"

सभी उठकर उनके साथ हो लिए।

वो लोग मकान के पिछले हिस्से में पहुंचे। अनुराग जंगल की ओर बढ़ गया।

''एक मिनट।

"-मोहिनी बोली-

''तुम जंगल में क्यों जा रहे हो

? हमें मना किया गया है...।

"

''अब तो जा ही चुका हूं।

"-अनुराग बिना रूके आगे बढ़ते हुए बोला-

''और मुझे जो मिला है

, वो काफी दिलचस्प है। तुम सब लोग भी देखना चाहोगे। इसलिए फिजूल बातें करके परेशान मत करो।

"

सब लोग अनुराग के पीछे-पीछे जंगल में प्रवेश कर गए। पेड़ काफी घने थे

, जिससे उनके उस पार नजर नहीं आ रहा था। थोड़ी दूर चलने के बाद सबके कदम थम गए।

उनके सामने एक कब्रिस्तान था।
 
वो काफी पुराना और काफी बड़ा कब्रिस्तान था। उसके चारों ओर चार फीट ऊंची चहारदीवारी जैसी भी बनी हुई थी। वो जिस हिस्से से निकलकर आए थे

, उनके सामने दीवार ही थी। अनुराग और उसके पीछे बाकी सब लोग चलते हुए दूसरी ओर पहुंचे

, जहां एक पुराना लोहे का गेट भी नजर आ रहा था। गेट भी बेहद पुराना और जंग खाया हुआ था।

''कब्रिस्तान

?"-डॉली बोली-

''इतनी वीरान जगह पर

?"

''एग्जैक्टली यही बात मेरे दिमाग में आई थी

"-अनुराग बोला-

''जब थोड़ी देर पहले मैं यहां आया था।

"

''तुम यहां क्यों आए थे

?"-मोहिनी गुस्से भरे स्वर में बोली।

''इनफ मोहिनी!

"-अनुराग बोला-

''बहुत हो गया। मुझे इस ओर से कुछ आहट जैसी सुनाई दी थी तो मैं जानने के लिए इधर आ गया था। मुझे लगा कोई जानवर वगैरह होगा। कल रात छत पर हमने आहट सुनी थी

, उसके लिए भी तो

'कॉफिन मैन

' ने यही कहा था न कि वो कोई जानवर हो सकता है...।

"

''उसने तो ये भी कहा था

"-जय बोला-

''कि पिशाच भी हो सकता है।

"

''बकवास।

"-कहते हुए अनुराग आगे बढ़ा और उसने कब्रिस्तान का गेट खोल दिया।

''हे।

"-जय लपककर आगे आया-

''अंदर जाना जरूरी है क्या

?"

अनुराग ने उपेक्षा के भाव से जय की ओर देखा और कब्रिस्तान में प्रवेश कर गया।

उसके पीछे सबने एक-दूसरे की ओर देखा

, फिर वे लोग भी कब्रिस्तान में प्रवेश कर गए।

कब्रिस्तान सचमुच काफी पुराना था। लेकिन काफी बड़ा भी था। ज्यादातर कब्रें टूटी-फूटी

, जर्जर हालत में थीं। कुछ तो इतनी ज्यादा टूट-फूट चुकीं थीं कि गौर से देखने पर ही उनके होने का पता चलता था।

अचानक उन्हें एक बच्चे की खिलखिलाहट सुनाई दी।

वहां उपस्थित हर शख्स को जैसे सांप सूंघ गया।

सबकी नजरें कब्रिस्तान के एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़ गईं।

लेकिन उनके अलावा वहां कोई नहीं दिख रहा था।

''वो आवाज कैसी थी

?"-मोहिनी सस्पेंस भरे स्वर में बोली।

''इन कब्रों को देखो

"-राज बोला-

''पता लगाओ

, क्या इनमें किसी बच्चे की कब्र भी है।

"

वे सभी वहां बनी कब्रों पर नजरें दौड़ाने लगे।

बच्चे की कब्र ढूंढने में उन्हें ज्यादा देर नहीं लगी। कब्रिस्तान के आखिरी कोने में छोटी कब्र नजर आ रही थी। उसके पास पहुंचकर उन्होंने उस कब्र पर लगे टूम्बस्टोन पर खुदी इबारत को पढ़ा।

अवर बिलव्ड सन (हमारा प्यारा बेटा)

डेविड कीन

18821890

उस टूम्बस्टोन की इबारत को पढ़कर सबको मानो सांप सूंघ गया।

''ये कब्रिस्तान इतना पुराना है

?"-जय हैरानी से बोला।

''इस पर लगा टूम्बस्टोन तो यही कह रहा है।

"-राज गम्भीर स्वर में बोला।

''तुमने हमें बच्चे की कब्र खोजने के लिए क्यों कहा

?"-अनुराग राज से गोली मारने के-से अंदाज में बोला।

''अभी थोड़ी देर पहले हमने एक बच्चे के हंसने की आवाज सुनी थी। और अब हमारे सामने एक बच्चे की सौ साल से भी ज्यादा पुरानी कब्र है। तुम्हें मुझसे कुछ और पूछना है

?"

अनुराग ने होंठ भींच लिए।

बाकी सब भी खामोश खड़े रहे।

''यहां आसपास और कब्रों को चैक करो

"-राज बोला-

''और देखो कीन सरनेम वाली और कौन-कौन सी कब्रें हैं।

"-कहने के बाद राज वहां रूका नहीं। वो खुद एक-एक कब्र के पास जाकर उनके टूम्बस्टोन चैक करने लगा।

बाकी लोग भी हरकत में आ गए।

''कीन वन!

"-एक कब्र को चैक करते हुए मोहिनी जोर से बोली।

''कीन टू!

"-थोड़ी ही देर में दूसरी कब्र को देख रहे जय ने जोर से कहा।

''कीन थ्री!

"-कुछ ही देर में अनुराग की आवाज सुनाई दी।

''कीन फोर!

"-एक कब्र पर झुकी हुई डॉली चिल्लाई।

वहां उन्हें

'कीन

' सरनेम वाली उतनी ही कब्रें मिलीं।

यानि उस बच्चे डेविड कीन को मिलाकर वहां उस सरनेम की पांच कब्रें थीं।

कब्रों की गणना करने के बाद सब फिर इकट्ठे हुए।

''लगता है

"-अनुराग बोला-

''पूरी कीन फैमिली यहीं पर रेस्ट कर रही है।

"

''ये कब्र कुछ खास लग रही है।

"-जय 'कीन फैमिली' की कब्रों के रूप में चिह्नांकित की गई कब्रों में से एक कब्र की ओर इशारा करते हुए बोला।
 
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