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Romance शादी का मन्त्र

फेडेड ब्लू डेनिम और सफेद शर्ट पे दोसा कबाना के गॉगल्स चढ़ाये राज भैय्या ने जब, कॉलेज के अन्दर बाईक पे एन्ट्री मारी तो बिल्कुल धूम वाला समा बान्ध दिया,

लड़कों की आंखों मे जलन थी,तो लड़कियों की आंखों में तारीफ और उत्सुकता कि आखिर इतना हैंडसम बंदा मिलने ,

किससे आया है।।

प्रेम उस कॉलेज का ना होकर भी कॉलेज के चप्पे चप्पे से वाकिफ था,वो पार्किंग में गाड़ी खड़ी करवा कर भैय्या जी को लिये कैन्टीन में आ गया।।

निरमा के मामा जी को नाना जी की बीमारी के कारण वापस जाना पड़ा,और निरमा एक बार फिर प्रिया के साथ कॉलेज आने जाने लगी थी,पर कॉलेज के अलावा कहीं भी निकलने की मनाही के कारण निरमा जिम नही जा पा रही थी।।

एक तयशुदा समय पर निरमा और प्रिया कैन्टीन आते थे,पहले कैन्टीन में भकाभक समोसे आलू गुंडे पेलने वाली प्रिया आजकल सिर्फ वर्जिन मोइतो ( नीम्बू पानी) से काम चला रही थी,आज भी दोनो अपने तय समय पर कैन्टीन को चल दी।।

इन्तजार का फल मीठा होता है,ये राज को अपने जीवन मे उस दिन पहली बार समझ आया।।पूरे तीन दिन के बाद उसे प्रिया दिखाई दी थी,दूर से पीले कुर्ते पे गुलाबी दुपट्टा ओढ़े नीचे सर किये चुपचाप आती प्रिया को देख पहले पहल तो राज को ज़ोर का गुस्सा आ गया__" कॉलेज आने का समय है,इधर उधर जा सकती हैं मैडम पर जिम आने का समय नही . अरे कुछ काम है ना आओ! पर एक फ़ोन करने में भी महारानी जी का हाथ दुख गया।"

पर प्रकट में राज ने ऐसा कुछ नही कहा,हाँ ध्यान से देखने पर उसे प्रिया बहुत थकी सी दुखी सी लगी।।

प्रिया और निरमा के वहाँ पहुंचते में प्रेम कूद कर निरमा तक पहुंच गया,दोनो आंखों ही आंखों मे मुस्कुरा उठे,उन्हें सादर अपनी सीट तक लाकर निरमा के लिये एक कुर्सी खींच प्रेम उसके बाजू वाली कुर्सी पर बैठ गया,तब जाकर कहीं प्रिया ने राज को देखा__" अरे राज तुम यहाँ कैसे??कॉलेज में कुछ काम था क्या?"

" अरे कहाँ?? भैय्या जी तो तुम्हे ही . " प्रिंस की बात को आधे मे ही काट कर राज ने अपनी बात प्रिया के सामने रख दी।।

" हाँ वो एक लड़के के एडमिशन की बात करने आये थे,तो सोचा तुम्हारा भी हाल चाल ले लें ।कैसी हो प्रिया ??"

राज के "कैसी हो प्रिया "पे जाने क्यों प्रिया की आंखें छलक आईं जो राज के सिवा कोई ना देख सका।।

जब कोई रोता होता है तब उस समय अगर कोई सांत्वना से भरा हाथ कंधे पर रखे और चुप कराने की कोशिश करे तो आंसू और भी ज्यादा ज़ोर शोर से बहने लगते हैं,वैसे ही जब कोई सबसे बड़ा शुभचिंतक हितैषी ऐसे समय पर हाल पूछे जब वाकई हाल अच्छा ना हो तो दिल का दर्द आंखों के रास्ते बहना लाजिमी है।।बस वही बन्सी के साथ हुआ।।

पर प्रिया दिल की कच्ची लड़की नही थी,उसे अपना दुख दुनिया को दिखाना सख्त नापसंद था,इसिलिए उसने निरमा से भी अपने दिल का हाल नही बताया था,पर आज राज को एकबारगी सब कुछ बताने को वो व्याकुल हो उठी,पर यहाँ ,

कैन्टीन में सबके सामने उसके लिये कुछ भी बोलना बताना बहुत कठिन था,उसने एक पूरी नज़र राज पे डाली, राज ने आंखों से ही बन्सी के मन की बात पढ़ ली,वो समझ गया कि प्रिया उसे कुछ बताना चाह रही है।।

इतनी देर में एक दूसरे में खोये प्रेम और निरमा अपनी बातों में लगे थे,निरमा अपने घर पर उसके ऊपर हो रहे अत्याचारों को बढ़ा चढ़ा कर प्रेम से बता रही थी,कि कैसे वो जब भी शाम को छत पर प्रेम की एक झलक पाने के लिये चढ़ती है तो पीछे से उसकी अम्मा ठीक उसी वक्त सूखे कपड़े निकालने छत पर पहुंच जाती है,कैसे जब निरमा रेडीयो पर__

" आते जाते हँसते गाते सोचा था मैंने मन में कई बार,वो पहली नज़र हल्का सा असर करता है क्यों इस दिल को बेकरार . " सुनते हुए प्रेम को याद कर कर के मुस्कुराती है तो उसकी अम्मा आ कर रेडियो पे भजन वाला चैनल सेट कर जाती है__

" राधे राधे रटो चले आयेंगे बिहारी।।"

कैसे जब निरमा खिलती चांदनी में खिड़की पर खड़ी होकर चांद मे अपने प्रेम का चेहरा देख देख शर्माती है तब उसकी अम्मा आ कर खट से खिड़की बन्द कर जाती है, कैसे जब लौकी और तोरी की सब्जियों को देख कर निरमा मुहँ बनाती है तो अम्मा ताना मार जाती है कि ' हाँ अब हमरे हाथ का कुछु काहे भाये,जो बना रहे चुपचाप खा लो,जब अपना घर ,

अपनी गिरस्ती होगी तो पका लेना अपने मन का।।"इसी तरह के तानों उलाहनो के बीच जीवन कैसा कठिन हुआ पड़ा है और अब प्रेम ही है जो निरमा के जीवन के बिखरे रंग समेट कर उसके जीवन के कैनवास को एक खूबसुरत तस्वीर मे बदल सकता है।।

ये प्रेमी जोड़ा अपने में लीन, दीन दुनिया से बेखबर था,राज भैय्या ने ये नोटिस कर लिया ,उन्होनें प्रिंस को पानी की बोतल, लाने भेजा और अपनी कुर्सी प्रिया की तरफ खींच ली।।

" अब बताओ क्या हुआ?? जिम क्यों नही आ रही आजकल??"

राज की गहरी आवाज़ और उससे भी गहरी ये बात सुन कर प्रिया विहल हो गई

" यहाँ नही बता पायेंगे।।"

" फिर कहाँ?? बोलो,, कहीं बाहर मिलना चाहती हो।"

प्रिया ने आंखें उठा कर राज को देखा और हाँ मे सर हिला दिया

" कहाँ?? रॉयल पैलेस आ जाओगी अकेले??

प्रिया ने फिर हाँ में सर हिला दिया।।प्रिया की चुप्प्पी ने ,

राज के मन मे हाहाकार मचा दिया,आखिर ऐसी कौन सी गुम चोट खा ली जो इतनी चुपचाप सी हो गई,कहाँ तो प्रिया को अधिक बोलने पर टोकना पड़ता था और कहाँ आज हाँ भी बोलने के लिये मुहँ नही खोल रही।।

राज का मन ऐसे कचोटने लगा कि कुछ भी कर के प्रिया के दुख को दूर करना ही है,उसे ऐसी गुमसुम नही देख सकता।।प्रिंस के पानी की बोतल लेकर आते ही राज उठ गया।

" ठीक है फिर हम चलते हैं अभी!! अपना ध्यान रखना प्रिया ।।"

" अरे जिस काम से आये थे,वो तो कर लो।।एडमिशन ऑफिस उधर है।" प्रिया ने एक तरफ को इशारा कर दिया,उसकी उंगली की दिशा में देखने के बाद मुस्कुराते हुए राज ने प्रिया को देखा_

" हम जिस काम से आये थे,वो हो गया प्रिया,कल शाम 4 बजे मिलतें हैं फिर,,आ तो जाओगी ना।।"

हाँ मे सर हिला के प्रिया चुपचाप खड़ी राज को जाते देखती रही।।

रात में राज अपने कमरे की खिड़की पे खड़ा बाहर खुले आसमान में चमकते चांद को देख सोच रहा था,हो सकता है प्रिया भी इस वक्त अपनी खिड़की पे खड़ी चांद देख रही हो,चलो अच्छा है इसी चांद के बहाने ही सही निगाहें तो मिल ,

रही हैं ।।

कहीं दूर एक गाना बज रहा था_

" सुनो किसी शायर ने ये कहा बहुत खूब ,

मना करे दुनिया लेकिन मेरे मेहबूब

आ ही जाता है जिस पे दिल आना होता है

हर खुशी से हर गम से बेगाना होता है।

प्यार दीवाना होता है मस्ताना होता है . "
 
" राज!! उठो, आज बड़ी अबेर कर दी उठने में,ऐसे तो रोज़ भोरे उठ के दौड़ लगाने चले जाते हो आज सात बज गया ,अभी तक सो रहे,तबीयत तो ठीक है ।।" ऐसा कहते हुए राज के माथे पर उसकी अम्मा ने हाथ रख कर ठेठ हिन्दुसतानी स्टाइल में बेटे का बुखार चेक किया।।

शरीर का ताप हो तो पकड़ भी आये,मन के ताप का कहाँ निपटारा .

रात बड़ी देर तक जागती आंखों के सपनों में विचरते हुए राज को सोने में देर हो गई,सुबह सुबह रोज़ का अलार्म बन्द कर वो वापस सो गया,और सोता ही रह गया,वो तो अम्मा की आवाज़ से नींद टूटी,सुबह सुबह अम्मा को अपने कमरे में देख उसके चेहरे पे एक बड़ी सी मुस्कान आ गयी,अम्मा के ,

हाथ से चाय लेकर वो चुपचाप पीने लगा।।

" का हुआ लल्ला? आज बहुते खुस लग रहे,कोई हड़बड़ी भी नही है तुम्हें जिम जाने की।।"

" जायेंगे अम्मा जायेंगे . सुबह सुबह तुम्हरे दरसन हुए, तुम चाय लिये सीधा कमरे में चली आयी ,ये सब खुशी का कारण नही हो सकता का??" हँसते हुए राज पलंग से उतर बाहर निकल गया।।

जिम में ऑफिस में अपना काम निपटाता राज मन ही मन खुश था ,आखिर प्रिया की उदासी का कारण पता चलेगा तो उसे दूर करने का कुछ उपाय भी कर पायेगा।।सुबह से जाने कितनी बार अपने हाथ में बंधी राडो पे समय देख चुका था,पर भई घड़ी चाहे रिको हो टाइटन हो या राडो दिखायेगी तो एक ही समय!!

दिल ही दिल में एक हल्का सा डर भी था कि जाने क्या बात होगी जो प्रिया जैसी दुरुस्त दिल लड़की ऐसी गुमसुम हुई पड़ी थी।।

अपने विचारों में खोया राज अपना काम निपटा रहा था कि दरवाज़े पे हल्की सी दस्तक हुई__

" हम अन्दर आ जायें राज!!"

राज ने सर उठा के देखा सामने प्रिया खड़ी थी

" अरे पूछने की क्या ज़रूरत ,,आओ आओ अन्दर ,

आओ,,बैठो ।।"

प्रिया आ कर राज के सामने बैठ गयी,दोनो ही लोग बात शुरु करने का बहाना ढूँढ रहे थे,आखिर प्रिया ने ही चुप्पी तोडी__

" राज तुमसे कुछ कहना चाह रहे थे,कल तुमने पूछा था ना,उसी बारे में . बस सोच रहे कि कैसे बोलें ।"

" कैसे मतलब? अरे जैसे बोलते हैं बतियाते हैं वैसे ही बताओ,,बात क्या है आखिर?? तुम इतनी उदास चुपचाप सी क्यों हो?"

" राज तुम्हें भास्कर सर के बारे में बताया था ना? हमारे गणित के लेक्चरर!!जिन्हें हम पसंद करते थे।"

" हाँ हाँ!! क्या हुआ उन्हें " राज का दिल ज़ोर से धड़कने लगा

" उन्हें कुछ नही हुआ,,बिल्कुल ठीक हैं वो"

" फिर?"

" कैसे बतायेँ राज!! वो भास्कर सर हैं ना,वो असल में शादीशुदा निकले!!" ये बोलते ही प्रिया का चेहरा मुरझा गया उसकी आँख से दो बूंद आंसू लुढ़क कर उसके गालों तक चले आये।।और राज के दिल में सरगम बजने लगी।।

"अपने आप को सम्भालो प्रिया!! हमे तो नाम सुन कर ही ये लड़का तुम्हारे लिये ठीक नही लगा था,अब ऐसा भी क्या बन सँवर, के कॉलेज आना कि मासूम नादान लडकियों को यही ना समझ आये कि सामने वाला शादीशुदा है,,ये तो सख्त बदतमीजी है नामुराद की।"

'" अरे तो लड़कों का समझ भी कैसे आयेगा,वो ना तो सिन्दूर लगाते ना मंगलसूत्र पहनते।"

" तो क्या हुआ,पर चेहरा लटका हुआ तो रहता है ,घर से बीवी की डांट खा के जो निकलते हैं,,खैर वो सब छोड़ो,तुम खुद पे ध्यान दो ,इतनी अच्छी हो तुम्हे सच बहुत अच्छा लड़का मिलेगा।।" प्रिया को समझाने के साथ ही राज ने सामने लगे आदमकद आईने में खुद को देखा और मुस्कुरा दिया,,उसके मन में जलतरंग बज उठी।।

"आ मैं तेरी याद में सबको भुला दूँ

दुनिया को तेरी तसवीर बना दूँ

मेरा बस चले तो दिल चीर के दिखा दूँ

दौड़ रहा है साथ लहू के प्यार तेरा नस-नस में

ना कुछ तेरे बस में जूली ना कुछ मेरे बस में

दिल क्या करे जब किसी को किसी से प्यार हो जाये।।"

उसी समय दरवाजा खोल कर दो कप चाय लिये प्रिंस भीतर आया ,,अन्दर आते ही उसे आभास हुआ की जिम में ' दिल क्या करे बज रहा है' वो चाय रख वापस मुड़ गया_

,

" भैय्या जी अभी गाना बदल देतें हैं ।"

" काहे बे,,काहे बदलोगे गाना,इत्ता सुरीला गाना बदल दोगे,ससुरे तुम भी एक नम्बर के बकलोल हो।

प्रिंस को कुछ समझ नही आया,वो अपना सर झटकता बाहर चला गया,राज प्रिया की तरफ घूम गया,वो अभी भी गुमसुम सी थी,पर राज की खुशी संभाले नही संभल रही थी,उसने अपने मन के भावों को मन तक ही सीमित रख अपनी ज़बान को भरसक उदास करते हुए प्रिया को सांत्वना देना शुरु किया।।

" अरे तो का हुआ प्रिया,शादीशुदा हैं तो इसमें कौन बड़ी बात हो गयी ।"

" अच्छा तो ये तुमको बड़ी बात नही लग रही3 Question mark" अरे बुद्धू राम ! अब जब उनकी अपनी घरवाली है तो वो हमे काहे देखेंगे,चाहे हम कितनी भी सज धज मचा लें, उन्हीं के लिये दुबली होना चाहते थे,इसिलिए जिस दिन पता चला उसी दिन से जिम आना बन्द कर दिये,पर . "

" पर क्या प्रिया??"

" पर ये कि अब हमको भी तुम्हारे जिम की थोड़ी थोड़ी आदत सी लग गयी है,,अब दो तीन दिन वर्क आउट नही करते हैं तो अच्छा नही लगता,,कल कॉलेज में तुमसे मिल कर घर लौटने के बाद हम सोचते रहे और फिर ये फैसला ,

किया कि हम तुम्हारा जिम नही छोडेंगे।।"

" वाह बहुत ही अच्छा सोची,पर ये बताओ कि जिम नही छोड़ोगी या भैय्या जी का जिम नही छोड़ोगी?

प्रिंस के सवाल पर प्रिया ने घूर के प्रिंस को देखा और __" ना तुम्हारे भैय्या जी को छोडूंगी ना उनका जिम ।।अब तो जब तक राज लॉ पास कर के लॉयर ना बन जाये मैं ये जिम नही छोडून्गी।।

" ये हुई ना बात" प्रिंस की तालियों से ऑफिस गूँज गया।।।

राज भैय्या के मन की खुशी पूरे उत्साह से उनके चेहरे को अबीरी कर गई ।।

" तो प्रिया फिर शाम का क्या प्लान है??"

" शाम का प्लान?? वही है 4 से 5 तुम्हें पढायेंगे,और क्या??"

" अरे नही!! हम तो होटल में मिलने के बारे में पूछ रहे थे।"

" अब यहीं तो सब कुछ बता दिये,अब क्या ज़रूरत होटल में मिल के पैसे उड़ाने की,अब तुम्हारे एग्ज़ाम को भी समय कम बचा है,,पढ़ाई पे पूरा पूरा ध्यान देना है,समझे!! ये घुमाई फिराई थोड़ा बन्द करो अब।।जब देखो तब फटफटी में उड़ते फिरते हो।।"

,

राज नीचे सर किये हाँ में सर हिलाता मुस्कुराता रहा,दोनो ने अपनी अपनी चाय उठाई और मुस्कुराते हुए पीने लगे।।

बाहर जिम में नया ट्रैक बज रहा था__

" शुद्ध देसी देसी देसी रोमांस हाय रे

हाय रे क्रेज़ी क्रेज़ी क्रेज़ी रोमांस

" ना मोहब्बत ना दोस्ती के लिये,वक्त रुकता नही किसी के लिये।।"

जिसने भी कहा है या लिखा है,अटल सत्य है!! सब कुछ अपनी गति से चलता रहता है ,समय किसी के लिये नही रुकता,।।

समय अपनी गति से चलता गया,प्रिया को जिम जाते पूरे छै महीने बीत गये,अब वो पहली वाली गोल मटोल तबला सरीखी प्रिया नही रही बल्कि वाकई दुबली सजीली प्रिया बन गई,बिल्कुल अपने नाम को चरितार्थ करते हुए।।

राज भी अपनी परीक्षाओं से फारिग हो गया,इस बार उसने पेपर भी ठीक से लिखे।।पहले तो राज के साथ ऐसा होता था कि जब वो पढ़ने बैठता था तो हर विषय एक दूसरे से होड़ लेता हुआ बकवास और बोरिंग लगता था,राज

हमेशा सोचा करता था,जब दिल को बहलाने वाले इतने साधन जीवन मे मौजूद हैं ( डम्बल,साईकल, ट्रेडमिल इत्यादी) तो कौन इन्सान होगा जो अपना जीवन किताबों में व्यर्थ करेगा,।

वो जब कभी इतिहास पढ़ने बैठता तो आधा तो वो समय चक्र में उलझ के रह जाता ।।उसे BC (before christ)और AD (anna domini) का झमेला बड़ा कठिन लगता,उसके ऊपर से अलग अलग आक्रमणकारी और अलग अलग सभ्यताएं ।

वो हमेशा सोचा करता कि जब हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता की खुदाई मे सिक्के मिले तो तुगलक ने कौन से सिक्के बदले।।

ये तो सिर्फ एक विषय था,इसी तरह के कई विषय थे जो पूरी तरह वक्त की बर्बादी थे,नागरिक शास्त्र,भूगोल इत्यादी,,पर धीरे धीरे इन जटिल विषयों की गुत्थि को प्रिया ने बड़ी सरलता से सुलझा कर रख दिया,बिल्कुल जैसे किसी उलझे हुए ऊन के गोले को कुशल हाथों से एक गृहिणी सुलझा कर अलग अलग बंडल तैयार कर लेती है,वैसे ही।।

पहले राज पेपर बनाने बैठता था तो उसके साथ ये होता था कि एक सवाल नही आ रहा,आगे बढो, अरे दूजा भी नही आ रहा,फिर आगे बढ़ो, तीसरा भी तो नही आ रहा,क्या करना है आगे ही बढ़ना है,,पर चौथा भी नही आ रहा,अब क्लास से ही निकल लो।।।

पर अबकी बार प्रिया ने पक्की तैयारी की थी,उसे पता था उसका छात्र अड़ियल है,और इसे अभ्यास के चाबुक से ही सही किया जा सकता है,इसीसे उसने हर विषय के कई कई ,

पेपर तैयार कर राज से समय अवधि के भीतर पूर्ण करवाये थे,इसीसे इस बार जब राज परीक्षा मे बैठा तो उसे खुद भी मालूम नही था कि उसके साथ इतना चमत्कार होगा।।
 
प्रथम प्रश्नपत्र का प्रथम सवाल उसने गणपति को शीश नवा के जब देखा तो उसके आश्चर्य की सीमा ना रही__ अरे ये सवाल तो बनता है,,अगला देखा,अरे ये भी आता है,तीसरा?? हाँ ये भी तो याद है,चौथा सवाल देखा,अरे इसका जवाब तो बहुत अच्छे से आता है,!! ज्ञान और आत्मविश्वास का संगम जहां हो जाता है वहाँ फिर कोई विपत्ति आड़े नही आती।

तीन घन्टे के प्रश्नपत्र में जहां राज पहले दो ही घन्टे में बाहर निकल जाता था,आज पूरे तीन घन्टे उसे ऊपर नज़र उठाने की भी फुर्सत नही मिली।।

सिर अपनी उत्तर पुस्तिका मे गडाये हुए वो बस सारे उत्तर एक के बाद एक लिखता गया,पैंतालीस मिनट बीते होंगे कि उसे अतिरिक्त उत्तर पुस्तिका की आवश्यकता पड़ गई ।।

अब इतने सालों में शिक्षकों से भी भला परिचय हो चुका था इसीसे जब राज ने अतिरिक्त उत्तर पुस्तिका की मांग की तो शिक्षक महोदय को हार्ट अटैक आते आते बचा,वो एक हाथ से अपना हृदय थामे दूसरे हाथ से कॉपी लिये राज की बैंच तक चले आये

"का हुई गवा राज?? ऐसा का लिख डारे बाबू की सप्लीमेंट्री की जरूरत पड़ गयी।देखो सभी कहते जरूर हैं कि कापी कोई पढ़ता नही किसी फिलिम की कहानी लिख डारो,पर होता नही ऐसा बबुआ,,कोनो पिच्चर विच्चर का ,

कहानी थोड़े ही लिख मारे हो।।"

शिक्षक महोदय ने अपनी बात पूरी करते करते राज की कॉपी पर सरसरी नज़र भी मार ली,और अबकी बार उन्हें दूसरा हार्ट अटैक आते आते बचा।

" ई कैसा चमत्कार भवा,,राज ही हो ना,,उंगली ना दुखी इत्ता सारा लिख मारे हो,अरे अभी तक पास होने के लाले थे तुम्हारे,अबकी लाने तो तुम गुरू टॉप कर जाओगे ,लग रहा।।

" गुरुजी इस बार पूरी तैयारी कर के आये हैं ,अब चाहे जो हो जाये हमको पास होना ही है।"

और इस प्रकार हर एक विषय के पेपर में अपने गुरूजनों को हल्का फुल्का अटैक देते हुए भैय्या जी ने सारे प्रश्नपत्र बड़ी सुगमता से हल कर लिये।।

अन्तिम पेपर दे कर राहत और सुकून की सांस लेते हुए जिम की राह पकड़ लिये।।

जिम पहुंच कर जैसे ही बड़े कांच के लगे स्लाइडिंग डोर को खोल कर भैय्या जी ने भीतर प्रवेश किया,उनके ऊपर पुष्पवर्षा होने लगी।।।पूरा जिम बड़े बड़े गुब्बारों से सजा पड़ा था,दरवाजे के एक किनारे बहुत सुन्दर रंगोली सजी थी,उस गोल रंगोली में एक तरफ डम्बल बने थे और एक तरफ क्रॉसट्रेनर ।।

प्रिंस और प्रेम दौडे चले आये,भैय्या जी ने दोनों को ऐसे ,

गले लगा लिया जैसे अलाउद्दीन खिलजी से चित्तौडगढ़ का किला जीत लाये हो।।बिल्कुल किसी शहंशाह का सा स्वागत हुआ,जिम में आने वाली हर नाज़नीन उस दिन कुछ अलग ही सजी धजी सी मौजूद थी,सभी ने परीक्षाफल आने के पहले ही भैय्या जी की भावी सफलता को आंक लिया था और उसी का जश्न मनाने की तैयारी थी।

ऑफिस के अन्दर से एक बड़ा सा गोल रसमलाई फ्लेवर का केक लिये प्रिया आई,,राज ने मुस्कुरा कर केक काटा और सबसे पहला टुकड़ा प्रिया की ओर बढ़ा दिया ,केक थामते हुए प्रिया का हाथ ज़रा लड़खड़ा गया और उसने दूसरे हाथ से राज की कलाई थाम ली__

" अरे!! प्रिया तुम्हारा हाथ तो तप रहा है,तुम्हें तो तेज़ बुखार है,ऐसे मे यहाँ क्यों आई,घर में आराम करना चाहिये था ना।।"

" कुछ नही बस हरारत है,अभी घर जाकर दवा ले लेंगे तो ठीक हो जायेंगे,तुम हमारी चिंता ना करो,तुम्हारे पेपर अच्छे बन गये उसी खुशी में पार्टी है,समझे . "

प्रिया अपनी बात पूरी किये बिना ही चकरा के नीचे गिर गई,अचानक उसके शरीर में अकड़न सी होने लगी,शरीर पीछे की ओर झटके के साथ मुड़ने लगा,ऐसे जैसे कोई धनुष .

राज को समझते देर ना लगी,एक दिन पहले ही एलो वेरा जूस का टिन खोलते समय प्रिया के हाथ में लगी चोट ही मांसपेशियों की जकड़न और दर्द का कारण, बनी थी, बचपन ,

से उसने धनुषटँकार नामक बीमारी का उल्लेख सुन रखा था,कि कैसे जंग लगी धातु से खरोंच लगने पर टीटनस हो जाता है अगर समय रहते टीका ना लगवाया जाये तो।।

प्रिया के चेहरे और गरदन की पेशियों पे कसावट बढ़ने लगी,सभी किसी ना किसी दिशा में दौड़ पड़े, ऐसा अक्सर होता है,जब भी कभी कही कोई आपातकालीन स्थिति बनती है तो अमूमन भगदड़ मच जाती है,और इन भागते चीखते लोगों में से पचास प्रतिशत लोगों को तो पता भी नही होता कि वो क्यों भाग रहे हैं,और उन्हें कहाँ जाना है,वैसा ही कुछ जिम में हुआ,जिन्होनें प्रिया को गिरते देखा वो तो उसकी सहायता को भागे लेकिन जिन्होने नही देखा वे भी उतनी ही तत्परता से भागते हुए ,काम करने वालों के रास्ते में व्यवधान उत्पन्न करने लगे।। तभी सहसा राज भैय्या ने सबको प्रिया से दूर किया,और उसे अपने दोनों हाथों से उठा कर जिम से बाहर की ओर चल दिये, किसी ने पीछे से आवाज़ भी दी_

" अरे कमजोरी से सर घूम गया होगा,इत्ती सी बात के लिये कहाँ लिये भाग रहे हो राज??"

" कमजोरी तो नही लगती,हमे तो लगता है कोई भूत परेत का चक्कर तो नही ना है।"

किसी की बात पे कान दिये बिना राज प्रिया को लिये बाहर निकल गया।।

राज प्रिया को लिये जब तक अस्पताल पहुंचा तब तक में प्रिया का दर्द और एँठन और बढ़ चुका था,ज्वर की बेहोशी ,

टूटी नही थी,,बिल्कुल अवधूत रुद्र जिस प्रकार सती की अचल देह लिये क्रोध में कांपते पृथ्वी को नापते चले,कुछ वैसे ही अवतार में राज प्रिया की देह समेटे अस्पताल पहुँचा।।

प्रिया को तुरंत इमरजेन्सी में भर्ती कर लिया गया,सीनियर जूनियर डॉक्टरों की टीम अपने काम में जुट गई।।

लगातार दो दिन तक डॉक्टरों के किये अथक प्रयास से आखिर तीसरे दिन प्रिया ने आंखें खोल दी।।इन दो दिनों में प्रिया के हैरान परेशान परिवार का संबल बना राज जैसे खाना पीना भी भूल गया था,हर दवा हर इन्जेक्शन के लिये दौड़ लगाता राज अपने नाम की पद गरिमा को जैसे भूला बैठा था।

इसी बीच बेटा घर क्यों नही आ रहा ये जानने माता जी ने प्रिंस से चर्चा की तो उन्हें प्रिया की बीमारी और राज की अवस्था का पता चला,बेटे से मिलने अस्पताल पहुंची अवस्थिन को वहाँ बेटे का एक अनोखा ही रूप देखने मिला,,घर पे पानी का एक गिलास स्वयं ना लेने वाला उनका लाड़ला यहाँ तो हर काम खुद करने की जिद पे अड़ा था,डॉक्टरों से चर्चा करने से लेकर हर छोटे बड़े काम की जिम्मेदारी राज की ही थी।।

जिसे किसी वस्तु की ज़रूरत होती फट राज की पुकार मचती,प्रिया की अम्मा तो ऐसे घुली मिली सी राज से सिर भिड़ाये चर्चा करती की एक बारगी लगा राज इनकी नही उनकी ही संतान है।।

अपने कोखजाये को उन परायों के लिये इतना घिसते ,

देख माँ के सीने में सांप लोट गये,कैसे भी हो इस लड़की और इसके परिवार से अपने राजकुमार को उन्हें बचाना ही होगा,जाने क्या घुट्टी पिला दी है इन लोगों ने_

" काहे राज घर दुवार भुला गये हो का,दू दिन से उधर फिरे ही नही,तुम्हरे बाऊजी परेसान हो रहे थे,तब आज प्रिंस से पूछताछ कर तुम्हें ढूंढते आये हैं हम।"

" काहे अम्मा बड़के भैया नही बताये का?? हम तो जिस दिन प्रिया को यहाँ ले के आये,तुरंते भैय्या को फोन लगा के बता दिये रहे कि प्रिया को टिटेनस हुआ है, हमको अस्पताल में ही रुकना पड़ेगा।।"
 
बात सत्य थी,युवराज ने अम्मा को कुछ नही बताया था,बल्कि उल्टा अपने किसी कर्मचारी के हाथ राज के पास कुछ पैसे भिजवा दिये थे।।

अब तो माताजी का पारा और उबल पड़ा,दोनो लड़के मनमर्जी कर रहे,अपनी अम्मा से बताने की जरुरत ही नही समझी।।पर समझदारी उनमें कूट कूट कर भरी थी,उन्हें भली प्रकार ज्ञात था कहाँ क्या बोलना,किस शब्द से कब घात की जा सकती है और कब चाशनी में लपेट के परोसना है__

" अच्छा है बाबू,अम्मा की कोनो चिंता ही नही, कम से कम एक बार हमें भी बोल देते, किसी बात के लिये मना तो करते नही हैं,उल्टा हम घर से खाना पीना भिजा देते,जाने यहाँ का मिला होगा खाने को।"

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राज के प्राण अपनी माँ में बसते थे,इन दो दिनों में बासुँरी की तीमारदारी में राज जैसे खुद को ही भूल गया था,माँ को कुछ बताना कहाँ याद रहता,पर माँ की कही भावुक पंक्तियों ने मन में क्लेश और अफसोस जगा दिया,उससे वाकई बड़ी चूक हो गई थी,वो वहीं माँ के पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गया, अपना सिर माँ की गोद में टिका कर आंखें बन्द कर ली__

" बस माँ का बतायें??,सब कुछ इत्ता अचानक हुआ कि कुछ समझ ही ना आया,बस बचपन की तुम्हारी बताई बात ही याद रही,उसी के लाने बन्सी को उठाये दौडे चले आये,लगा कि नही लाये तो जान ना बचेगी बेचारी की।"

माँ अपने बेटे के बालों में हाथ फिराती सुनती रही, मन में बवंडर उठ रहा था,प्रिया प्रिया कब बन गई? बित्ते भर की छोकरी ने उसके लल्ला का दिमाग फिरा दिया,पर ऊपर से कुछ ना बोली__

" राज ! हियाँ बैठे हो,चलो ना उधर डाकटर साहब बुला रहे,बोल रहे कल प्रिया की छुट्टी कर देंगे।। नमस्ते बहन जी!! हम प्रिया की अम्मा !! अगर आपका राज ना होता तो हमारी प्रिया भी ना होती,बेचारी के प्राणों पे संकट पड़ गया था,भला हो राज बाबू का समय रहते अस्पताल ले आये,सारी भाग दौड़ कर के भर्ती करा दिया तब हमें खबर की।"

राज तो प्रिया की अम्मा की आवाज़ सुनते ही झट उठ कर प्रिया के कमरे की ओर लपक लिया,और राज की अम्मा के ,

कलेजे पे सांप लोट गये।।पहले से जली भुनी बैठी थी कि ताबूत पे आखिरी कील ठोंकने प्रिया की अम्मा स्वयं उपस्थित हो गई।।।अरे साफ साफ तो दिख रहा कि लड़का हाथ से निकला जा रहा अब ई तिवारीन काहे जले पे नमक छिड़क रही।।

प्रिया की अम्मा शर्मिला के मन में शुरु से शर्मा परिवार के लिये एक विशेष सम्मान की भावना थी,मौके बेमौके राज की भलमनसाहत वो देख भी चुकी थी, शर्मा परिवार का नाम भी बहुत था,इसीसे वो खुद से आगे बढ़ कर राज की अम्मा से खुले दिल से राज की स्तुति कर गई, पर ऐसा करने से पहले ये नही सोच पाई की उनकी इस प्रशंसा के अर्ध्य को सामने वाली कैसे लेगी।। साफ मन और स्वछ हृदय से की गई प्रशंसा को राज की माँ ने किसी और ही ऐनक से देखा और चोट खा बैठी।।

प्रिया को स्वस्थ हुए दिन बीत गये,वापस जीवन अपने ढर्रे पर चलने लगा।।कॉलेज के इम्तिहान भी निपट गये,अब प्रिया का अधिकतर समय घर पर ही गुजरने लगा।।

ऐसे में बुआ जी वापस अपने पुश्तैनी काम में जी जान से जुट गई,,घर बैठी जवान लड़की उनकी नज़र में सबसे बड़ी बोझ थी,जैसे भी इस छोकरी को भी पार लगाना था और अपने भाई भावज के लिये गंगा स्नान का मार्ग प्रशस्त करना था।।

पहले प्रिया मोटी थी अब पतली हो चुकी थी,लेकिन उसकी इस अवनति से बुआ जी पर कोई विशेष प्रभाव नही पड़ा,वो अभी भी चुन चुन के ऐसे ही रिश्ते सहेज के भाभी के सामने परोसती की शर्मिला को उबकाई आ जाती पर रिश्ते के सम्मान को निभाने वो ननंंद के सामने चुप रह जाती।

प्रिया अब पहले की तरह अपनी तीखी ज़बान के प्रहार से बुआ को लहू-लुहान नही करती, बल्कि जैसे ही उसका विवाह प्रसंग छिड़ता वो उठ कर अपने कमरे में किसी किताब को खोल उसमें दुबक जाती।।एक शाम ऐसे ही प्रिया जब बुआ जी के वार्तालाप से ऊब कर ऊपर चली गई तो उसके कुछ देर बाद शर्मिला भी ननंद को चाय का कप पकड़ा कर प्रिया की चाय लिये उसके कमरे में चली आई

" का हुआ प्रिया ,देख रहे हैं आजकल ब्याह का बात सुन के बड़ी अनमनी हो जाती हो,,कुछ मन मे चल रहा का??"

" अरे नही अम्मा,हमारे मन में का चलेगा।।पहले सोचा करते थे बैंक की परीक्षा देंगे नौकरी करेंगे पर अब सोच रहे जैसा बुआ और तुम सब ठीक समझो वही कर लेंगे।"

" अरे काहे वही कर लोगी तुम्हरी बुआ तो सादी कराने पीछे पड़ी हैं,तो कर लोगी किसी से भी सादी।।"

प्रिया ने चुपके से हाँ में सिर हिला दिया,अपनी बड़बोली प्रिया को ऐसे चुपचाप देख शर्मिला का कलेजा मुहँ को आने ,

लगा__

" अगर मन में कोई और है तो बता दो प्रिया ,हम तो माँ हैं तुम्हारी,,कभी तुम्हरे साथ कुछ गलत ना होने देंगे।।

तुम कहो तो राज के घर सन्देसा भिजाये का।"

" काहे का सन्देश माँ?? जैसा सोच रही हो वैसा कुछ नही है।।राज और हम सिर्फ दोस्त हैं ।"

अभी माँ बेटी अपनी बातों में लगी थी कि निरमा ने कमरे में प्रवेश किया__" प्रनाम चाची।"

" खुस रहो बिटिया!! आओ बैठो,तुम लोग बातें करो हम चाय भेजते हैं तुम्हारे लिये।"

निरमा हंसते हुए आकर प्रिया के पास बैठ गई ।

" क्या बात है छुपी रुस्तम!! क्या बोल रही थी चाची?? राज भैय्या के घर रिश्ता भेजा जा रहा है हमारी राजकुमारी का,वाह वाह क्या बात है।"

" पगला गयी हो क्या निरमा,कुछ भी बोलती हो?"

" अरे तो बुराई क्या है राज भैय्या में?? तुम जबर्दस्ती का ये सीरियसनेस का चोला जो ओढे बैठी हो ना,उतार फेन्को।।बहुत हुआ समझी ,वो भास्कर सर का शोक मनाना बन्द करो अब।।"

,

" तुमसे किसने कहा हम शोक मना रहे।"

" तुम्हारी शकल बता रही,अभी नीचे तुम्हारी बुआ जी मिली थी,मुझे एक से बढ़कर एक वाहियात लड़कों के फोटो दिखाने लगी__ बोलती हैं ये देखो कैसे हीरा मोती छाँट के लायी हूँ अपनी प्रिया के लिये।मेरा मन किया बोल दूँ कद्दू !! इत्ते पसंद आ रहे तो किसी एक को चुन के आप ही फेरे फिरा लो,,पर संस्कार रोक देते हैं हमें,कुछ जादा बोलने से।"

निरमा की बात सुन प्रिया हँस दी__" देखो निरमा शादी तो करनी ही है,पापा चाह रहे उनके रिटायर होने के पहले पहले हमारा ब्याह भी हो जाये,हमारे लिये चिंता करते रहते हैं बेचारे! इसिलिये हमने भी अम्मा को शादी के लिये हाँ कह, दिया है।।अगर हमारी किस्मत में पढ़ना और नौकरी करना बदा होगा तो शादी के बाद भी पढ़ लेंगे और कर लेंगे नौकरी।"

" प्रिया तुम तो एकदम ही बदल गयी हो!!,अच्छा सुनो बड़े दिनों के बाद हमें घर से निकलने का मौका मिला है,चलो ना जिम चलते हैं प्रेम हमारा रस्ता देख रहा वहाँ ।।"

प्रिया ने मुहँ धोया कपड़े बदले और फेयर ऐण्ड लवली लगा कर तैयार हो गयी
 
" क्या बात है प्रिया ,,पहले तो ये सब क्रीम वीम तुम्हे ढ़कोसला लगता था,अब क्या राज भैय्या के चक्कर ,

मे,हैं??"

" जी नही हमारी अम्मा के चक्कर में ये पोत रहें हैं आजकल!! हमारी गोरी नारी अम्मा को अपनी कलूटी बिटिया पे बड़ा तरस आता है,इसिलिये ये खरीद लायी,अब वो लायी है प्यार से इसीलिये लगा लेते हैं,अब चलो,वर्ना तुम्हारी अम्मा तुम्हें ढूँढते यहाँ चली आयेंगी।"

जिम में शाम के पांच बजे की रौनक पसरी हुई थी,राज अपने ऑफिस में बैठा था कि निरमा के साथ प्रिया ने प्रवेश किया।।प्रिया और राज में पहले से ही तगड़ी दोस्ती थी पर अब कुछ हल्का फुल्का दुराव छिपाव भी ना रहा था।।

अपनी तबीयत फिर परीक्षाओं के कारण कुछ समय के लिये जिम से अवकाश लेने वाली प्रिया अब तक जिम मे वापसी नही कर पायी थी।।

" हाँ तो जिम कबसे शुरु करने का विचार है प्रिया। दुबली हो गयी तो छोड़ दिया जिम ??"

" अरे नही राज,तुम्हें बताया तो था परीक्षाओं में लगे थे,अभी एक हफ्ता तो हुआ है सब निपटे,बस अब कल से शुरु कर देंगे,हम ज़रा एक राउंड घूम कर आते हैं,जिम का चक्कर लगा लें,तुम बैठो निरमा।"

निरमा प्रेम और राज को वहीं छोड़ प्रिया बाहर निकल ,

गयी।।

" राज भैय्या आपसे एक बात कहें ,हमें लगता है अब प्रिया ज्यादा दिन तक जिम नही आयेगी,उसके घर में तो उसके लिये खूब जोर शोर से रिश्ता देख रहें हैं ।"

" अच्छा,,तो?? प्रिया भी तैयार है क्या शादी के लिये,वो तो पढ़ना लिखना नौकरी करना चाहती थी।"

" चाहती थी! पर अब शादी के लिये तैयार है,ये देखिये ये फोटो, प्रिया की बुआ जी की नज़र बचा के हम ले उड़े ,कैसा उजड़ा चमन लड़का है!! तानपूरा भी नही लग रहा और हमारी प्रिया से शादी करेगा।।"

फोटो देख कर राज का चेहरा लटक गया__" इससे तो अच्छे हम हैं ।"

" कुछ कहा राज भैय्या आपने।" निरमा के सवाल पर हड़बड़ा कर राज ने फोटो निरमा को वापस कर दिया

" नही! कुछ नही।"

" वैसे प्रिया की अम्मा तो उससे आपके बारे में भी पूछ रही थी,कि आप प्रिया को कैसे लगते हैं ।।"

" क्या बात कर रही हो निरमा?? "

,

" हाँ हम सच कह रहें हैं,पर हमारी प्रिया है एक नम्बर की गंवार , कुछ नही बोली मुहँ में कुल्फ़ी जमाई बैठी रही।।हम भी सोचे भुगतो फिर,,जब इत्ते अच्छे रिश्ते को सुन के भी चुप बैठी रहेगी तो मिलेगा ऐसा ही कोई साम्बा और कालिया,हम क्या करें।"

राज नीचे सिर किये कुछ सोचते हुए मुस्कुराता रहा

" भैय्या जी! अब बस मुस्कुराने से कुछ नही होना जाना है।।आपको ही पहल करना पड़ेगा वर्ना बाद में पछताने के कुछ हाथ ना लगेगा।"

" निरमा तुम तो पीछे ही पड़ गयी हो,अरे अगर भैय्या जी के मन मे कुछ होगा ही नही तो वो बेचारे का करें।।तुम तो जबरिया उतर आयी हो यार।।चुप भी करो अपना प्रिया पुराण,भैय्या जी बस दोस्त समझते हैं,और कुछ नही समझीं।क्यों भैय्या जी ठीक कहे ना??"

" अच्छा ऐसा है तो काहे उस दिन जैसे ही बन्सी चक्कर खा के गिरी तो सीधा उसे लिये अस्पताल भागे,काहे इत्ता उसकी बात सुनते हैं,काहे उसकी हर बात मानते हैं ।"

" क्योंकि भैया जी किसी का एहसान भूलते नही इसलिये,वो पढ़ाई है ना भैय्या जी को इसलिये उसकी मदद करते हैं,और कोई बात नही है,प्यार व्यार बहुत दूर की बात है,भैय्या जी तो उस मुटल्लो से बात कर लेते हैं ढंग से,वही बड़ी बात है।।

,

" अरे झगड़ा बन्द करो तुम दोनो यार!! हम देख लेंगे क्या करना हमें ।।वैसे प्रेम हमें लगता है निरमा सही कह रही . यार एक बात बोलें हमे लगता है हमे प्रिया की आदत सी पड़ गयी है,वो जिम नही आती तो जिम मे मन नही लगता,हमारे हर काम में उसकी राय लेना हमें अच्छा लगता है,और ये भी लगता है कि वो कभी गलत राय नही देगी,,हम भी सोच रहे कि एक बार प्रिया से बात कर ही लेते हैं ।"

राज अपनी बात पूरी कर भी नही पाया था कि बन्सी अन्दर आ गयी।।
 
राज अपनी बात पूरी कर भी नही पाया था कि बन्सी अन्दर आ गयी।।

" किस बारे में हमसे बात करने की सोच रहे राज?"

" कुछ नही प्रिया बाद में बताएंगे,, आओ लो कॉफ़ी पी लो,,आज तुम सब के लिये इंडियन कॉफ़ी हाऊस से कॉफ़ी मँगवाई है।।"

" क्या बात है राज !! आज बड़े खुश लग रहे जो कॉफ़ी पिला रहे हम सब को।"

चारों मुस्कुराते हुए कॉफ़ी का मज़ा लेने लगे बाहर जिम में गाने की पंक्तियाँ सुनाई दे रही थी।।

" तुम सिखा रहे हो,तुम सिखा रहे हो,जिस्म को हमारे रूहदारियां . काफिराना सा है ,इश्क़ है या क्या है।।"

" तुम सिखा रहे हो,तुम सिखा रहे हो

जिस्म को हमारे रूहदारियां .

काफिराना सा है,इश्क़ है या क्या है।।"

गाने के बोलों के साथ ही राज के मन में भी प्रिया बजने लगी।।

कॉफ़ी खतम कर प्रिया और निरमा उठ खड़े हुए घर वापसी के लिये।।

राज और प्रेम दोनों को छोड़ने बाहर तक आये_

" प्रिया आज तुम्हें मेसेज करेंगे,फोन अपने पास ही रखना,तुम इधर उधर रख कर भूल जाती हो।"

राज की बात का जवाब प्रिया की मुस्कान ने दिया,उसने

हँस के सिर हिला के हामी भर दी,और हाथ हिला के बाय करती हुई चल दी।

घर पहुंचते ही प्रिया ने फोन को चार्ज पे लगा दिया।।नीचे माँ के साथ रसोई का काम निपटाते भी उसका पूरा ध्यान फोन पर ही था,उसने दो तीन बार अपनी अम्मा से पूछा भी__" अम्मा हमारा फोन बजा क्या"

" नही लाड़ो हमें तो ना सुनाई दिया।"

आखिर सब्र की इन्तिहा हो गयी,बाकी दिनों में रात के खाने के बाद भी घंटों अपनी माँ के साथ इधर उधर की बतकही करने वाली प्रिया आज खाना निपटते ही तुरंत ऊपर अपने कमरे में चली गयी।।

रात के नौ बज चुके थे,पर राज का कोई मेसेज अब तक नही आया था__" हद दर्जे का भुलक्कड़ है, खुद ही बोला मेसेज करूंगा और गायब है।"

प्रिया ने राज का लास्ट ऑनलाइन चेक किया वो भी शाम का 5 बजे दिखा रहा था,मतलब उसके बाद से राज ने फोन छुआ तक नही।दिल बहलाने के लिये प्रिया ने एक किताब खोल ली,और बिना रूचि के भी उसे पढ़ने के लिये प्रयास करने लगी।पर घूम फिर कर दिमाग फ़ोन की तरफ ही जा रहा था।।

उसने एक बार फिर फोन उठाया ,साधारण टेक्स्ट मेसेज चेक किया,वॉट्सएप्प चेक किया,कहीं कुछ नही था,समय देखा नौ बजकर दस मिनट हुए थे।।

,

ऐसा कैसे हो सकता है ,क्या सिर्फ दस मिनट पहले ही फ़ोन देखा था,पर ऐसा लग रहा जैसे एक घंटा बीत गया हो,उफ्फ आज घड़ी ही पिछड़ गयी है या मैं ही कुछ ज्यादा उतावली हो रही। ऐसा सोच के प्रिया को खुद पर थोड़ी शर्म सी आयी और उसने यही सोचा कि इस द्वंद से बचने का उपाय है कि चादर को तान कर आराम से सो लिया जाये,जब मेसेज आयेगा देखा जायेगा।।

प्रिया खिड़की की ओर करवट किये लेट गयी,पर आंखों में नींद कहाँ __ जिन आंखों में सपने बसते हैं उनमें फिर नींद नही रुकती।।

खुली आंखों से पूर्णमासी का चांद देखते हुए मन ही मन कोई गाना गुनगुनाती बन्सी बड़ी देर तक चंदा को निहारती रही,फिर उसे महसूस हुआ कि अब बहुत रात बीत चुकी है,अब कोई मेसेज नही आने वाला,अब उसे सच में सो जाना चाहिये,पर सोने से पहले पानी पीने को उठी प्रिया ने सोचा मेसेज तो नही पर हाँ समय कितना हो रहा ये जानना आवश्यक है,उसने मोबाईल पे दिखा रहे समय पे नज़र डाली__ साढ़े नौ

अरे ऐसे कैसे चमत्कार हो रहा,इतनी देर तक लेटी पड़ी रही और अब समय देख रही तो बस साढ़े नौ!!

क्या उसे लेटे हुए सिर्फ बीस मिनट ही बीता है,उसे लगा मोबाईल की घड़ी सही वक्त नही दिखा रही,उसने दीवार घड़ी पर नज़र डाली,संयोग से वही समय उस घड़ी ने भी दिखाया।।अब क्या किया जाये,,प्रिया को खुद पर खीझ भी हो रही थी और गुस्सा भी आ रहा था,ऐसा इतना बेताब होने ,

की क्या ज़रूरत है,ऐसा लगा जैसे खुद से ही कोई युद्ध लड़ रही हो,बन्सी ने उठ कर रेडियो पे एफ एम ट्यून किया और खिड़की पर बैठ गयी__

"नमकीन सी बात है हर नई सी बात में

तेरी खुशबू चल रही है जो मेरे साथ में

हल्का-हल्का रंग बीते कल का

गहरा-गहरा कल हो जाएगा (हो जाएगा)

आधा इश्क़, आधा है, आधा हो जाएगा

कदमों से मीलों का वादा हो जाएगा।।

गाने को सुनते हुए प्रिया के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी,वहीं लेटे लेटे वो जाने कब सो गयी।।

अगले दिन सुबह उठते ही सबसे पहले उसे याद आया रात राज का मेसेज आने वाला था,पर रात जब तक वह जाग रही थी कोई मेसेज नही आया था,उसने लपक के फ़ोन उठाया फ़ोन बन्द पड़ा था . मेसेज देखने की हड़बड़ी में फोन चार्जिन्ग पे लगाना ही भूल गयी।।सुबह सुबह खुद पर ही गुस्सा आने लगा__

पता नही क्या मेसेज करने वाला था,राज को भी आजकल क्या हो गया है,क्या ज़रूरत थी ऐसे सस्पेंस क्रियेट करने की,अरे ना बोलता कि रात मेसेज करूंगा,सीधे मेसेज ही कर देता।।

" प्रिया ! अरी का बड़बड़ा रही हो सुबह सुबह!! आज तुम ,

नही उठी तो हम ही तुम्हारे लाने चाय बना लाये।।लो पी लो और तैयार हो जाओ,जिम नही जाना का??"

" हाँ जायेंगे ना अम्मा!! "

" दस बजे तक तो आ जाओगी ना,तुम्हें नाश्ता करा के फिर हमें गुड्डन के घर जाना है,दस दिन बाद उसका तिलक चढ़ना है,तो आज उसकी अम्मा बुलाई है,सारी तैयारी जोड़ने।।"

" हाँ दस तक तो आ जायेंगे, तुम चले जाना अम्मा ,हम नाश्ता कर लेंगे, इतनी चिंता ना किया करो।"

" अरे काहे ना करे!! अब कुछ दिन में तुम भी बियाह कर चली जाओगी,फिर कहाँ तुम्हारी देखभाल कर पायेंगे,फिर ससुराल वाली हो जाओगी, उनकी मर्ज़ी से आना उनकी मर्ज़ी से जाना, फिर हमारे हाथ में का रहेगा।। अभी अपनी मन मर्ज़ी से तुम्हे खिला पिला तो सकते हैं ।"

" तुम तो ऐसे इमोशनल हो रही हो अम्मा जैसे कल ही हमारा ब्याह हुआ जा रहा??"

" सब सकुन साइत सही रहा तो एक महीना में तुम्हरा ब्याह भी हुये जायेगा,तुम्हरे पापा के दोस्त हैं ना वर्मा अंकल उन्होनें एक बहुत अच्छा लड़का बताया है,लड़का रेल्वे में नौकरी करता है,दू जन भाई हैं बस.. ये छोटा है,माँ बाप बड़के के साथ गांव में रहते हैं ,और ये लड़का यहीं इसी सहर मे रहता है,हमरे लिये भी अच्छा रहेगा तुम यहीं के यहीं बिदा होगी ,

तो।।"
 
प्रिया सिर झुकाये बैठी चाय पीती रही,अभी इस मौके पे कुछ भी बोलने का उसका जी ना किया,बस बिना किसी कारण के मन खट्टा हो गया।।,उसे चुपचाप देख उसकी अम्मा नीचे गयी और एक फोटो लिये वापस आयी और उसके सामने रख दी .

" कैसा है?"

प्रिया का इस बारे में बात करने का बिल्कुल मन नही था पर बात टालने के लिये उसने " ठीक है" बोलकर पीछा छुड़ाना चाहा और वहाँ से उठ गयी।।उसके बाथरूम में घुसते ही शर्मिला के चेहरे पे हल्की सी मुस्कान दौड़ गयी और फोटो उठाये वो नीचे चली गयी।

24 Asterisk

इधर प्रिया से जाने कैसे राज बोल तो गया कि मेसेज करेंगे पर रात में अपने कमरे में बैठे जाने कितनी बार हुआ कि राज ने मोबाइल उठाया और कुछ लिखा फिर डिलीट किया,फिर लिखा और मिटाया,,यही सिलसिला चल रहा था कि उसकी अम्मा ऊपर चली आयी।।

" अरे राज तुम हियाँ बैठे हो,चलो नीचे तुम्हरी भौजी के बाऊजी आये हैं,रेखा के गमना पे विचार करने ।"

,

" रेखा के बिदाई से हमारा का लेना देना अम्मा?? हम का करेंगे बड़े बुजुर्गों के बीच??"

" तुमको कोनो सलाह मसवीरा के लिये नही बुला रहे,तुम जाओ भाग के पाड़े जी (पण्डित जी) को बुला लाओ।"

बिल्कुल ही बिना मन के राज उठा और नीचे उतर गया।

पाड़े जी को सादर लेकर आया,उन्हें सम्मान पूर्वक घर की बैठक में बैठा कर लम्बे लम्बे डग अपने कमरे की तरफ बढा ही रहा था कि पीछे से बाऊजी ने आवाज़ लगायी __

" अरे राज सुनो!! ज़रा चौक से सब के लिये कुल्हड़ वाली रबड़ी ले आओ,समधि जी को बड़ी पसंद है।"

दिमाग के अन्दर एक ज़ोर का ज्वालामुखी फूटा ज़रूर पर गुस्से का लावा किसी को दिखा नही, चुपचाप अपने मन को समेट राज वहाँ से जाने लगा तो भाभी के बाऊजी ने उसे आवाज़ लगायी __

" राजकुमार!! बेटा रुपये तो हमसे ले जाओ,भई खुशी राजी का मौका है,मुहँ तो मीठा हम ही करायेंगे ना।।"

" कैसन बात कर रहे समधि जी, रेखा का हमार बिटिया नही है,जाओ जाओ राज ,तुम ले आओ।"

हम रुपये देंगे,हम रुपये देंगे कर के दोनो समधि उलझे ज़रूर रहे पर पूरे पन्द्रह मिनट भिड़ने के बाद भी किसी की ,

अंटि से अधन्ना भी नही निकला, उन्हें बहस में उलझा छोड़ राज अपनी बाईक उठा कर निकल लिया,और कुल्हड़ वाली रबड़ी के साथ साथ चौरसिया के यहाँ से बनारसी पान बीड़े का बंडल भी बंधवा लाया,क्योंकि कहीं ना कहीं वो समझ गया था कि इस गोष्ठी का समापन पान के साथ ही होगा।।

सब कुछ सही हाथों में यानी अपनी अम्मा के हाथों में सौंप के जब राज ऊपर अपने कमरे में पहुंचा तो देखा बड़े भैय्या उसके कमरे में अपने ब्याज के रुपैये के देयक लोगों की लिस्ट थामे राज का ही इन्तजार कर रहे थे,उसे देखते ही उसके सामने हिसाब का बही खाता शुरु कर दिया,किसने कितना चुका दिया,किसने कुछ और समय की गुजारिश की ,सब कुछ बड़े भैय्या को समझा बुझा के संतुष्ट करने में लगभग डेढ़ घन्टे और बीत गये।।

" चलो फिर ठीक है,थोड़ा अपने लड़कों को भेज वसूली करा लेना टाईम पे,,हम अब जाते हैं रात बहुत हो गया है,तुम भी सो जाओ,हम देखे ज़रा ससुर जी का क्या व्यवस्था करना है।"

राज ने हाँ में सिर हिला दिया,भैय्या के जाते ही समय देखा साढ़े ग्यारह हो चुके थे,फिर भी बड़ी आस से राज ने मेसेज करने फ़ोन निकाला कि नीचे से बड़के भैय्या की आवाज़ आयी।।

" राज गाड़ी निकालो ज़रा!! पापा जी अभी ही घर निकलने कह रहे,रुकने मना कर रहे,,चलो उन्हें छोड़ आते हैं ।।"

,

" आया भैय्या।"

लक्ष्मण ने भी कभी राम को किसी काम के लिये मना किया है भला!!

राज को पता था कि भाभी का घर लगभग 45 किलोमीटर दूर था,आना जाना मिला कर डेढ़ दो घंटा तो लग ही जाना था,फिर भी बड़े भैय्या की आज्ञा शिरोधार्य कर दोनों भाई समधि जी को छोड़ने निकल गये।।

वापस आने के बाद थकान से कब नींद लग गयी ध्यान ही नही रहा,सुबह नींद नही खुली और राज जिम नही जा पाया।।

23 Asterisk

"पहले मैं समझा कुछ और वजह इन बातों की

लेकिन अब जाना कहाँ नींद गयी मेरी रातों की

जागती रहती हूँ मैं भी, चांद निकलता नही

दिल तेरे बिन कहीं लगता नही,वक्त गुज़रता नही। क्या यही प्यार है . हाँ यही प्यार है।।"

जिम में ट्रेड मिल पे चलते चलते प्रिया को 20 मिनट हो गये,वो बार बार पलट कर दीवार घड़ी पे नज़र डाल लेती,समय गुज़रता जा रहा था,जिम की भीड़ बढ़ती ही जा ,

रही थी,सब आ रहे थे बस एक वो ही नही था।।

एक बार प्रिया ऑफिस में भी झांक आयी,पर राज वहाँ भी नही था,,कल शाम के बाद से कोई बात नही हुई थी,जाने कैसी बेचैनी थी जो रह रह कर गुस्से में बदलती जा रही थी।।

" क्या यही प्यार है" गीत को सुबह से जाने कितनी दफा प्रिंस से रिवाइंड करवा करवा के सुना जा रहा था,पर भीड़ बढ़ने के साथ ही प्रिया ने गाने को वापस बजाने से मना कर दिया।।

सिर्फ बीस मिनट में ही प्रिया बेइंतिहा बोर होने लगी, और ट्रेड मिल से उतर कर ऑफिस रजिस्टर में अपने नाम के आगे साईन कर वहाँ से जाने लगी।।

" का हुआ प्रिया ?? आज और कुछ नही करोगी का?? जल्दी निकल ले रही हो।।"

" हाँ प्रिंस!! तबीयत खराब लग रही,इसलिये आज मन नही कर रहा,घर जाकर आराम करेंगे।"

प्रिया दरवाजे तक पहुंची ही थी कि दरवाजा खोल राज सामने खड़ा था।।

' ये बचपन का प्यार अगर खो जायेगा

दिल कितना खाली खाली हो जायेगा

तेरे ख़यालों से इसे आबाद करेंगे

,

तुझे याद करेंगे जब हम जवां होंगे जाने कहाँ होंगे'

गीत के बोल सुनने के साथ दोनो कुछ देर एक दूसरे को देखते रह गये।।

" कल मेसेज काहे नही किये।"

" काहे तुम रस्ता देख रही थी क्या??"

" हम !! तुम्हारे मेसेज का रास्ता देखेंगे,और कोई काम नही है क्या??"

" तो पूछी काहे?"

" ऐसे ही पूछ लिये भई ,कोई पाप हो गया क्या"

" नही नही,कोई पाप नही हुआ,तुम इत्ती जल्दी कहाँ चल दी,चाय तो पी लो।।"

" भैय्या जी प्रिया का तबीयत खराब था,इसीसे घर जा रही बेचारी आराम करने।।आईये आपके लिये चाय तैय्यार है।"

राज ने तबीयत की बात सुन प्रिया को देखा और आंखों ही आंखों में हाल पूछा,प्रिया ने भी सिर हिला के सब ठीक है कहा और राज के पीछे पीछे ऑफिस में प्रवेश कर गयी।।

दोनो साथ साथ चाय पीते रहे . फिर राज ने ही बात छेड़ी ,

__

"प्रिया तुमको पता है ,जैसा तुम हमे सोचती हो ना हम वैसे सीधे सादे लड़के नही हैं ।।बहुत दुर्गुन हैं हममें ।।"

प्रिया राज की बात सुन खिलखिला कर हँस पड़ी

" जैसे?? कोई एक आध दुर्गुण बताओ,हम भी तो जाने।।"

राज सिर नीचे किये थोड़ी देर अपना हाथ अपने बालों पे फिराता रहा फिर बड़ी हिम्मत जोड़ के बोलना शुरु किया__

" लोगों को डरा धमका के वसूली करते हैं,बड़के भैय्या के ब्याज के पैसों की।।और इस सब में कई बार गाली गलौच सब करना पड़ता है,जवान बुज़ुर्ग किसी को नही छोड़ते,हमारे लिये ब्याज की लिस्ट का एक एक आदमी हमारा दुसमन हो जाता है,।।

पढ़ाई लिखाई का हमारा हाल तो तुमको पता ही है,और इसके अलावा एक और बात है . "

" बोलो राज!! हम सुन रहे हैं ।"

" हम जब स्कूल में थे ना तब एक लड़की हमे बहुत भा गयी थी,बहुते जादा,उस टाईम तो लगने लगा था उसके बिना जिंदा नही रह पायेंगे पर वो स्कूल बदल कर चली गयी,और हम यहीं रह गये . शायद हम अपनी स्कूल की जिंदगी छोड़ना ही नही चाहते थे इसिलिए फेल होते रहे और स्कूल में ,

ही पड़े रहे,स्कूल में हर जगह उसकी यादें थी।। ,हमे तो अभी कुछ समय पहले तक यही लगता था कि हम अब भी उसिसे प्यार करते हैं,पर कुछ दिन पहले हमें समझ आ गया की वो बचपना था हमारा,,वो तो अपनी जिंदगी में बहुत आगे बढ़ चुकी है,और हमें भी बढ़ जाना चाहिये,तुम जानती हो हम तुम्हें ये सब क्यों बता रहे??"

प्रिया ने बिना कुछ कहे ना में सिर हिला दिया

" क्योंकि हम चाहते हैं तुम्हारे हमारे बीच कोई बात छिपी ना रहे,तुम्हे सब मालूम होना चाहिये।।
 
प्रिया तुम्हारी आदत सी पड़ गयी है हमें,तुम दो दिन भी जिम नही आती तो जिम ऐसा सुनसान लगने लगता है,जैसे कोई है ही नही यहाँ ।।हमें पता है तुम्हारे घर वाले तुम्हारे लिये रिश्ता देख रहे,हमारे घर वाले भी!! हमने सोचा किसी अंजान से शादी करोगी उससे अच्छा है हमसे ही कर लो,हम तुम्हारी पढ़ाई लिखाई किसी चीज़ को नही रोकेंगे।।पर हम चाह रहे थे पहले हम अपनी अम्मा से तुम्हरे बारे में बात कर लें ।।

अगर अम्मा हाँ बोल दी तो ठीक है वर्ना जैसे पहले दोस्त थे वैसे दोस्त ही बने रहेंगे,,क्या बुराई है इसमें ।।"

प्रिया अचरज से राज का मुहँ देखती रह गयी,ये कैसा प्रपोसल था,अगर अम्मा हाँ बोली तो हाँ वर्ना फिर से दोस्त . एक बार एक दूसरे को अपने दिल की बताने के बाद क्या वापस पहले जैसी दोस्ती सम्भव है??

,

प्रिया बिना कुछ कहे ही उठ गयी और ऑफिस से बाहर निकल गयी,राज उसके पीछे भागता चला आया__

" क्या हुआ प्रिया?? कोई बात बुरी लगी क्या??हम कुछ गलत बोल गये क्या??"

" नही राज!! तुम्हारी भावनाओं की कद्र करते हैं,तुम बात कर लो अम्मा जी से,क्या बोलती हैं बताना!! हम आज रात तुम्हारे मेसेज का इन्तजार करेंगे।।आज भूलना मत मेसेज ज़रूर करना ।"

" अरे हम तो कल भी नही भूले थे,वो तो घर वाले एक के बाद एक काम पकड़ाते चले गये कि समय ही नही मिला,पर सुनो आज हम अम्मा से बात कर ही लेंगे।।"

दोनों बात कर ही रहे थे कि भैय्या जी का मोबाइल थामे प्रिंस दौडता चला आया__

" भैय्या जी रेखा दीदी का फोन आ रहा है।"

" हेलो!! हाँ रेखा,हाँ साथ ही है,हाँ बोल देंगे,अच्छा लो तुम्ही बोल दो।"

राज ने फोन प्रिया को पकड़ा दिया,लगभग पांच मिनट की बातचीत के बाद प्रिया ने फोन वापस कर दिया__

" कल रेखा की बिदाई है,उसीके लिये बुला रही है।"

,

" तो चलो ना हम सब भी तो जायेंगे कल,तुम भी हमारे ही साथ चलो।"

" और अम्मा जी??" प्रिया के सवाल पर राज मुस्कुरा दिया__

" अम्मा तो जायेंगी ही,भई अब तुम्हें रहना तो उन्हीं के साथ है।"

" ओहो हीरो जी इतना उड़िये मत!! अभी उन्होनें हाँ नही की है,,अगर उनकी ना हुई तो हम पहले जैसे सिर्फ दोस्त ही रह जायेंगे,इसलिये थोड़ा जज्बात पे काबू रखिये।।"

मुस्कुराती हुई प्रिया घर चली गयी,राज जिम की ओर पलटा तो प्रिंस खड़े खड़े मुस्कुरा रहा था और प्रेम हाथ बांधे खड़े राज को घूर रहा था।।

दोनो से नज़र बचाते हुए राज अन्दर ऑफिस में चला गया,,कुछ ज़रूरी काम निपटाने के बाद प्रिया को " घर पहुंच गयी या नही?" का मेसेज किया और जैसे ही उधर से जवाब आया,एक नया सवाल भेज दिया . दोपहर हुई फिर शाम ढली और रात हो गयी पर राज और प्रिया के सन्देशों का अथक आदान प्रदान चलता रहा।।

जब एक बार किसी रिश्ते को प्यार की राह में कुछ आगे बढ़ा दिया जाये तब वो वापस दोस्ती के चौक पर पुन: वापसी ,

नही कर पाता,,इस बात से अंजान दोनो नये नवेले प्रेमी शाम भर और फिर रात भर अपनी ही बातों में खोये रहे।।

बचपन की बातें,घर परिवार की बातें,दोस्तों की बातें,अम्मा ,बड़के भैय्या,रूपा भाभी,वीणा जिज्जी, बुआ जी,पापा का ऑफिस, पिंकी की पढ़ाई, रतन का किस्सा ,निरमा और प्रेम की बातें . उफ्फ कितनी सारी बातें थी दोनो के बीच।।रात में एक मौका ऐसा भी आया जब दोनों को ही फ़ोन को चार्जींग में लगाये लगाये ही बात करना पड़ा .

पर वो रात गुजरते गुजरते दोनो को एक नयी सुबह दे गयी।।

दोनो में कितना कम सम सा था,और कितनी अधिक थी विषमताएं!! पर फिर भी एक वस्तु थी जो दोनों के पास लगभग बराबर थी!! एक दूसरे के लिये अपार प्रेम और असीम सम्मान!!उस एक कच्चे धागे ने ऐसी मजबूती से दोनों को बान्ध लिया कि अब हर स्वतंत्रता पे ये बंधन भारी पड़ गया।।
 
" अब तक सोये पड़े हो लल्ला!! उठो राजू !! देखो समधि जी के घर जाना है आज रेखा का बिदाई है ना,उठो उठो बेटा आठ बज गया है,लो चाय पियो और जल्दी से तैयार हो जाओ।"

भोर में चार बजे तो प्रेमी जोड़ा थक कर सोया था,आठ ,

बजे अम्मा की आवाज़ सुनते ही राज उठ बैठा।।आज सुबह भी अलग ही रंग में रंगी थी, मुस्कुरा के अम्मा के गले में बाहें डाले झुलते हुए राज कुछ गुनगुनाने लगा।।

" बस बस ,लड़ियाओ नही,जाओ बिटवा नहा धो लो।"

" अम्मा तुमसे एक बात पूछनी थी।"

" हां पूछ लेना बाद में,हम जा रहे अभी तैयारी देखने।।" राज की बात पूरी सुने बिना ही माता जी काम निपटाने भागती चली गयी।।

नौ बजे तीन तीन गाड़ियों पे सवार शर्मा परिवार समधियाने की ओर निकल पड़ा, राज ने पहले ही रूपा को रेखा द्वारा प्रिया को बुलाये जाने के बारे में बता दिया था,और रूपा को प्रिया को अपने साथ बैठाने के लिये मना भी लिया था,अपनी गाड़ी में प्रिया के लिये एक सीट रिसर्व रखे राज ड्राईविंग सीट पर बैठा खुश था कि अम्मा जी बड़ी सी मिठाई की टोकरी संभाले राज की गाड़ी के निकट चली आयी ।।

" खोलो दरवाजा,,ए राज ,सुन नही रहे का।'

" अम्मा तुम इसमें बैठोगी क्या?? तुम उसमें भैय्या के साथ बैठ जाओ,बाऊजी भी उसिमे हैं।"

" हाँ पता है तुम्हरे बाऊजी उसमें बैठे हैं तभी तो तुम्हारी गाड़ी ,

में आ गये,खाली तो है एक सीट ।"

" अरे अम्मा जी वो प्रिया है ना लल्ला जी की सहेली वो भी जायेंगी हमारे साथ!! उन्ही के लिये लल्ला जी .

" अरे प्रिया के लिये कब बोले हम भाभी,आप भी कुछ भी बोलती हैं,आओ बैठो अम्मा!! प्रिया पीछे भाभी के साथ बैठ जायेगी।।"

तभी युवराज राज की गाड़ी के पास चला आया__

" कोई परेशानी छोटे?? क्या प्रिया को भी लेना है क्या?? तो ऐसा करो ये रधिया और श्यामा को हम अपनी गाड़ी में ले लेते हैं,चलो तुम दोनो वो फल फुल की टोकरी में उठा के हमारी इनोवा में आ जाओ।"

एक बार फिर बड़के भैय्या अपने लाड़ले छोटे भाई के लिये संकटमोचन बन अवतरित हुए और उसकी उलझन को निपटा चलते बने।।

प्रिया के घर के आगे अपनी गाड़ी रोके राज ने प्रिया को फ़ोन लगाया ही था कि शर्मिला दरवाजा खोले बाहर चली आयी,सबको सादर अभिवादन कर उसने बड़े प्रेम से राज की अम्मा को प्यारा सा उलाहना दिया__

" बाहरे से चल देंगी जिज्जी,भीतर नही आयेंगी, सुदामा की कुटिया में भी जरा चरण फिरा दीजिये।।"

शर्मिला के स्वभाव में ही मिसरी घुली थी,इससे अंजान ,

सुशीला को यही लगा कि ये अस्वाभाविक माधुर्य सिर्फ और सिर्फ उसके सजीले बेटे को फांसने के लिये ही है,इसिलिए उसने अपने चेहरे को यथासम्भव कठोर दिखाते हुए कड़े शब्दों मे अपनी व्यस्तता की दुहाई दे डाली__

" ऐसे जगह जगह रुकते रहे तो बडी अबेर हो जायेगी,आप जल्दी से लड़की को भेजिए,फिर हम निकले।"

" चाय पी लेती जिज्जी , बस 5 मिनट ही लगेगा।"

शर्मिला की विनम्रता सुशीला के तन बदन को सुलगा रही थी

" नही ! अभी तो हो ही नही सकता।" इतने में प्रिया आसमानी रंग के लहन्गे में सजी संवरी चली आयी, उसे देखते ही राज के चेहरे पे लजीली मुस्कान चली आयी,होंठों की नाचती कोर अम्मा से कैसे छिपी रह सकती थी,आते ही प्रिया ने सुशीला को प्रणाम किया __

" हाँ! बस बस!! खुस रहो,,पीछे बैठ जाओ।।

एक दूसरे में खोये ताज़े ताज़े प्रेमियों को ये रुखाई नज़र नही आयी पर पीछे कोई और भी थी जिसे ये सारा सब कुछ समझ आने लगा था और जो भविष्य में घर में छिड़ने वाले महायुद्ध की प्रस्तावना को मन ही मन तैयार कर आनंदित हो रही थी।।

" हियाँ आ जाओ प्रिया !! हमारे पास।" रूपा की चाशनी पे सास की जलती हुई नज़र भी कडवाहट ना ला पाई

,

प्रिया ने आंखों ही आंखों में राज से इजाज़त ली, राज ने पलकें झपका कर इजाज़त दी और प्रिया पीछे चली गयी . कुछ देर पहले का पुत्र की बगल वाली सीट पर विराजमान होने का मातृ विजय गर्व चकनाचूर हो गया।।

इत्ता सुन्दर गोरा चिट्टा सजीला सा लड़का .

कुछ सोच समझ कर ही सुशीला ने अपने दोनों लाड़लों का नाम रखा था,दोनो ही तो दिखने सुनने में राज राजकुमार ही लगते थे . जैसे उंचे पूरे वैसा ही गठीला कसरती बदन,उसपे बिल्कुल पिघले हुए सोने सा लपटें मारता रंग . राज को इस सांवली सी बित्ते भर की लड़की में क्या भा गया ऐसा,ठीक है बामण घर की छोकरी है,पर है तो सरजूपारीन, राज के बाबूजी कभी ना मानेंगे,कहाँ हम कानपुरिया बीस बीसवां कान्यकुब्ज बामण और कहाँ ये लड़कोरि।।

किसी भी कीमत पर अपने लल्ला को इस बिदेसिनी से बचाना ही पड़ेगा।।

सुशीला अपनी सोच में मगन थी,,राज ने गाड़ी में गाने बजा दिये .

" जब से तुम्हारे नाम की मिसरी होंठ लगायी है

मीठा सा गम है और मीठी सी तन्हाई है .

रोज़ रोज़ आंखो तले एक ही सपना चले . "

गाड़ी अपनी गति से गन्तव्य की ओर बढ़ती चली गयी।।।

,

" नैना नु पता है, नैना दी खता है

सानु किस गल दी फिर मिल दी सज़ा है

नींद उड़ जावे, चैन छड जावे

इश्क़ दी फ़क़ीरी जद लग जावे

ऐ मन करदा है ठगी ठोरिया

ऐ मन करदा हैं सीना ज़ोरियां

ऐने सिख लियाँ दिल दियां चोरियां

ऐ मन दियां ने कमज़ोरियाँ "

एक के बाद एक गाने बजते रहे,गानों की ताल पे ताल मिलाता राज गाड़ी चलाता रहा,प्रिया पीछे से राज को देख देख मुस्कुराती रही,पर राज के ठीक बाजू में बैठी सुशीला का फिर किसी काम में मन नही लगा।।

ऐसा नही था कि सुशीला को "लव मैरिज" से शिकायत थी ,अपनी बेटी जैसी पिंकी के लिये भी कुछ हल्की फुल्की ना नुकुर के बाद उसने खुद ने हामी भर दी थी . पर बेटों के नाम पर जाने क्यों उसका हृदय एक अजीब सी ममता से छलक उठता था,इस भाव में प्रेम था तो आधिपत्य भी

था,स्नेह था तो एकाधिकार भी था।।

वैसे भी शादी के बाद लड़का उतना माँ का कहाँ रह जाता है,और अगर शादी खुद की मर्ज़ी से की हो तब तो पूछो मत !! माँ तो ऐसी शादियों में अमूमन ललिता पवार का किरदार निभाने लगतीं हैं।

वैसे सुशीला को पारंपरिक बहुओं को सताने वाली सास बनने का शौक भी नही था,इसीसे वो रूपा के लिये बिल्कुल माँ जैसी सास ना होकर भी एक अच्छी सास तो थी ही, पर राज के केस में बात अलग थी,यहाँ राज किसी लड़की को पसंद करने लगा था,हालांकि अभी तक प्रिया के लिये ऐसी कोई इच्छा उसने अपनी माँ के सामने जाहिर नही की थी पर पूरे नौ महीने अपने पेट में रख के अपने ही रक्त मांस से सींच कर उसे पैदा करने वाली जननी क्या अपने बालक के हृदय की अधीरता से इस हद तक अंजान रह सकती थी।।

छठी इंद्रि के एंटीना द्वारा बार बार भेजी जा रही सूचनाओं को व्यर्थ भी नही माना जा सकता था ।।

बिदाई के नियत मुहूर्त से कुछ पहले ही शर्मा परिवार मय प्रिया शास्त्री जी के घर पहुंच गया, आवश्यक आवभगत के बाद दोनो समधिने यहाँ वहाँ की तैयारियों में जुट गयी,रूपा प्रिया को साथ लिये रेखा को सजाने में लग गयी,,सभी किसी ना किसी कार्य में व्यस्त थे।।

घर के बीचो बीच बने बड़े से दालान में लोगों की आवाजाही लगी हुई थी,रूपा का कमरा ऊपर था जहाँ प्रिया थी . काफी देर से प्रिया को राज का कोई हाल समाचार ,

नही मिला था,प्रिया के भेजे सन्देश भी राज ने व्यस्तता के कारण नही देखे थे, ऐसे में अपनी अधीरता से स्वयं परेशान प्रिया ने रूपा से पानी पीने के बहाने नीचे जाने की आज्ञा ली और कमरे से निकल चली,लोगो से बचते बचाते नीचे को जाती गोलाकार सीढ़ियाँ उतर ही रही थी कि किसी काम से ऊपर को जाते राज से टकरा गयी__

" कहाँ गायब हो सुबह से?? नज़र ही नही आ रहे,, और इतना काहे में बिज़ी हो गये की मेसेज तक देखने का समय नही मिला।"

" क्या मेसेज करी रही।"

" खुद ही देख लो,बताना होता तो लिखने में आँख काहे फोड़ते।"

" ये भी बात सही है,,यार इत्ता भन्नायी काहे हो,देख तो रही हो शादी ब्याह का घर है,अब भैय्या तो ठहरे जमाई ,उनको कोई काम नही बता रहा,हम ही सबसे छोटे हैं,हमी पेराते हैं हर जगह।।"

" हम काम करने मना कर रहे क्या?? पर एक तो हम किसी को जानते नही,तुम एकदम ही छोड़ कर चल दिये तो गुस्सा तो आयेगा ना,का करें बोलो।"

" हम तो सोचे थे आराम से तुम और हम कहीं बैठ के बातें करेंगे पर यहाँ तो इत्ता काम फैला रखा है इन लोगों ने,ऐसा ,

करो जरा,उसके बाद जनमासा भी देखे आओ एक बार,सब ब्यब्स्था ठीक ठाक है की नही??"

" अम्मा बिदाई ही तो है,उसमें जनमासा की का ज़रूरत।"

"काहे अब तुम हमें बताओगे कि का नियम करना है और का नही।।कुंवर कलेवा करने के पहले दूल्हा का हाथ मुहँ नौआ कहाँ धुलायेगा,ईहे घर मे?? बिदाई के पहले दोनो का कोहबर पुजाई कहाँ होगा?? बोलो? औ सबसे बड़ा बात कि यहाँ से रेखा को जनमासा तक बिदा करके बापस ले आयेंगे औ एक बार फिर बिदाई कर देंगे तो गमना भी संगे संग निपट जायेगा। नही तो इतना महंगाई के जमाना में बिदाईये मा दुई तीन लाख रुपिया बकील बाबू का निपटा जायेगा, समझे।।हमसे बाते बनाएँगे ,जाओ हो लाला जल्दी करो,और ए सुनो तुम ,का नाम है तुम्हारा??"

सुशीला ने बिल्कुल ऐसा अभिनय किया जैसे उसे सच में प्रिया का नाम याद नही आ रहा हो,प्रिया ने सिर झुका कर धीरे से अपना नाम बता दिया__" प्रिया "

" हाँ हाँ प्रिया!! जाओ देखो दुलहीन तैयार भई की नही।उसे नीचे लाना ,तब तक वहीं बैठो।।"

बहुत प्यार से हां मे सिर हिला के प्रिया ऊपर को वापस मुड गयी पर जाते जाते उसने आंखों के इशारों से राज को अम्मा जी से बात करने को बोल ही दिया,जिसे राज ने सर झुकाकर मान लिया,इस सारे प्रसंग को देख कर सुशीला के ,

तन बदन में आग लग गयी।।

उसे अपने लाड़कुंवर और इस छोकरी के बीच चल रही "आंखो की गुस्ताखियाँ " माफ करने का बिल्कुल भी जी नही किया।।
 
बिदाई के पहले होने वाली छोटी मोटी रस्में चलती रहीं,सब रस्मों रिवाजों का आनंद ले रहे थे पर प्रेमी युगल अपने में ही मगन था,भले ही राज पुरूषों की तरफ और प्रिया औरतों के तरफ बैठी थी पर रह रह कर दोनो की आंखें आपस में टकरा ही जाती थी, और इस टकराहट में निपट जाते थे दुनिया भर के उलाहने,ताने,मान मनौव्वल,रूठना मनाना।।और इन सब बातों की साक्षी बनती जा रही थी सुशीला।।

बरातियों के स्वागत सत्कार भोजन पानी के बाद बिदाई कार्यक्रम प्रारंभ हुआ__

"कैसे भूल पाऊँगी मैं बाबा ,सुनी जो तुमसे कहानियाँ छोड़ चली आँगन मैं मैय्या ,बचपन की निशानियाँ

सुन मेरी प्यारी बहना, सजाये रहना ये बाबुल की गली, सजन घर मैं चली . "

बरातियों के साथ आयी धुमाल पार्टी ने ऐसा मर्मस्पर्शी गीत पृष्ठभूमि में बजा दिया कि वहाँ खड़े कई उम्रदराज पुरूष भी अपनी अपनी दुहिताओं की बिदाई याद कर सिसक पड़े .

रेखा को शादी ब्याह की हर रस्म से बहुत प्यार था, पर उसकी शादी जिन हिसाबो में हुई उसे अपनी कल्पनाओं को ,

साकार करने का कोई अवसर नही मिल पाया था,इसीसे आज उसने अपने एक मात्र सुख स्वप्न को पूर्ण करने शहर की सबसे बड़ी और महंगी चर्चित ब्युटिशियन "नीता जी "को अच्छी मोटी धनराशि दे कर बुक कर लिया था।।

रेखा के पीछे पीछे रूपा भी ब्यूटी सलून की गंगा नहा आयी__" बस हमारा ज़रा सा जूड़ा सेट कर देना, ये कौन सी लिपस्टिक है थोड़ा सा हमें भी लगा देंगी नीता दीदी,ज़रा सा आपका वाला फेस पाउडर भी मार दो ना चेहरे पे।"

इस तरह की टुच्ची हरकतों से परेशान होकर डिग्निफाईड,वेल मैनर्ड सुपर स्मार्ट ब्युटिशियन नीता जी ने अपनी असिस्टेंट को रूपा का टच'प, करने का इशारा किया और खुद रेखा को सजाने में लग गयी।

अपने कुशल चितेरे हाथों का कौशल दिखाती

ब्युटिशियन ने रेखा के साधारण रूप को ऐसे असाधारण रंगो से सजा दिया कि रूपा भी चकित हो देखती रह गयी . अब ग्यारह हज़ार खरच कर कराये इत्ते सुन्दर मेक'प को क्या बिदाई के आँसूओं में बहाया जा सकता था।।

भले ही सारी मोहल्ले की औरतें ज़ार ज़ार रो रही थीँ पर दोनो बहनों के आंसू नदारद थे,,,जग दिखायी को दो एक आंसू रूपा ने बहा भी लिये,बहन को गले से लगाये बचपन की यादों को दुहराती रूपा ने धीमे से रेखा के कान में मन्त्र फूंक दिया__" दो आंसू बहा दो,बिदाई मे नही रोने से अपसकुन होता है।"

" मेक'प सारा बह जायेगा जिज्जी।" रेखा की बात पर ,

बन्सी ने चुपके से उसके कान के पास मुहँ ले जाकर कहा__

" वाटर प्रूफ मेक'प है 'मैक' का,आपकी ब्युटिशियन बोल रही थी,विदेशी कंपनी है,जा के नहा भी लेंगी ना तब भी चेहरा ऐसे का ऐसा ही दिखेगा।। बेझिझक रो लिजिये।"

रेखा ने इशारे से बन्सी से पूछा " पक्का??"

प्रिया ने आंखों से ही रेखा को आश्वस्त किया,और रेखा अपनी जिज्जी के गले से लगी रो पड़ी ।।

लल्लन के पट से बंधी अपनी चुनरी की गांठ सहेजती रेखा अपने दोनों हाथों से लावे उलीचती आगे बढ़ कर कार में जा बैठी,उसके पीछे सभी को सादर नमन करता लल्लन भी अपनी नवेली पत्नि के बाजू में जा बैठा,,उनकी कार अपने पहिये से नारियल को दबाती धीरे धीरे आगे बढ़ धूल उड़ाती चली गयी।।।

बिदाई के बाद सभी मेहमान खाना पीना निपटाने में लग गये, रूपा के साथ बैठी प्रिया भी बिना मन आड़े टेढे कौर जैसे तैसे निगल रही थी।।

जिसने भी ये कहा है कि प्यार होने के बाद भूख प्यास मर जाती है ,नींदे उड़ जाती है . शत प्रतिशत सत्य कहा है,,उस बन्दे को वाकई ये सुखद अनुभूति ( पहले और सच्चे प्रेम की) कई कई बार हुई होगी।।

अब इस आनंद उदधि में राज और प्रिया डुबकी लगा रहे ,

थे ,जहां उनकी भूख प्यास सुख चैन सब खो चुका था,और कुछ बचा था तो बस एक सुकून __ एक दूसरे की आंखों में खोने का।।

राज अपनी प्लेट सजाये प्रिया की तरफ बढ़ ही रहा था कि सुशीला ने आकर बीच में ही उसे रोक लिया__" लाला जा बेटा अपने बाऊजी को थाली दे आ!! वो कहाँ यहाँ बुफे उफे में घुसेंगे,और सुन पानी का गिलास भी रख आना,खाने के बीच उन्हें पानी लगता है,और सुनो मिर्ची का भजिया ना ले जाना , खाने को खा तो लेंगे फिर रात भर पेट मा जलन बोल के परेसान करेंगे,मीठा उठा अच्छे से ले जाना,वही तो चाव से खाते हैं मिठखौवा बामण ।।"

अम्मा की बात सुन राज वापस मुड़ के अपने बाऊजी की तरफ चला गया,उन्हें थाली पकड़ा के निकल ही रहा था कि शास्त्री जी ने उसका हाथ थाम वही बैठा लिया__

" आज एक और जिम्मेदारी से मुक्त हो गये हम! अब हमारे सलगे लड़िका बच्चा अपने अपने ठौर को लग गये,, शर्मा जी आप जैसा समधि पाकर सच हमने गंगा नहा ली ,, युवराज बाबू जैसा दामाद, आपका जैसा परिवार किस्मत से मिलता है भई !! अब देखो !! राज ने कितना भाग दौड़ किया है,हमको तो लगता है जैसे राज हमारे ही कोनो जनम का लड़का है।।

अब एक पते की बात बताते हैं,हमारे एक साढू हैं, बलिया के रहवासी है,खूब खेती खार है,पुराने गोंटिया है जमीन जायदाद की कोनो कमी नही ,,इत्ता रुपया जोड़े रक्खे ,

हैं कि सात पुश्ते आराम से बैठ के खा सकतीं हैं . एक इकलौती लड़की है बस !! मालती!! अपने राजकुमार के लिये एकदम फिट रहेगी।।खूब माल दबा के रक्खा है मिसिर( मिश्रा) जी ने,मोटे आसामी है . इक्कीस लाख तो तिलके चढ़ा देंगे,पांच - सात में बरीक्षा निपटाएंगे।।

गिरस्ती का पूरा समान,कार और पांच एकड़ का खेती भी देने बोल रहे।।हमरी बड़की के ब्याह में उन्होनें राज को देखा रहा,अब जब वो देखे कि हमरी रेखा भी निपट गयी तब अपने मन की बात रक्खी हमारे सामने।।

समधि जी इससे बढ़िया रिस्ता नही मिलेगा।"

" पापाजी लड़की पढ़ी कहाँ तक है।"

" दामाद बाबू अब ईहे मत पूछो,लड़की गोरी नारी सुन्दर है,अब बचपन से राजकुमारी बना के पाले, स्कूल में एक दिन कुछ जबाब गलत दे दी रही तो गणित की बहन जी ने वहीं दो लप्पड़ धर दिये अब लड़की डर गयी और घर आके ऐसा कोहराम मचाई कि फिर कोनो उसको स्कूल नही भेज पाया।"

"दसवीं तो पास होगी??"

" चौथी के बाद पाठसाला का दरसनो नही पायी लड़की पर काम काज में एकदम चतुर!! हमरी रूपा का दूजा रूप समझो ।।।

" तब तो गये काम से " युवराज की चिकोटि पे बिना ध्यान ,

दिये उसके ससुर भावी पुत्रवधु के गुणों का व्याख्यान करते रहे।।
 
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