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Romance स्वप्न सुंदरी (नई जिंदगी की ओर)

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स्वप्न सुंदरी (नई जिंदगी की ओर)

इस बार दीवाली पर 2 साल बाद घर जा रहा हूँ, मम्मी अब शादी के लिए जोर देने लगी हैं, रोज़ फोन कर के " देख बेटा इन से कुंडली मैच हो रही है ये जॉब में भी है; बिल्कुल तेरे हिसाब से. " उफ़्फ़ उनके लिए हर दूसरी लड़की मेरे हिसाब की ही लगती है। कितनी बार समझ चुका हूँ कि कुंडली मैच नहीं सोच मैच होनी चाहिए। मुझे मेरे लेवल के हिसाब की लड़की चाहिए, पर मम्मी का शादी पुराण में पता नही अभी कितने अध्याय बाकी है।

पापा मेरे मस्तमौला. " शादी सोच समझ कर करना बेटा, कई बार जो दिखता है वो होता नहीं" शादी परख के करना न की अपना स्टैण्डर्ड मैच करा के" बात कहीं न कहीं सही भी है।

प्यार हो ही नहीं पाया किसी से , परखते परखते. कोई परफेक्ट लगा ही नहीं. कौस्तुभ ,मेरा यार, बोलता है " स्साले तू बड़ा परफेक्ट है जैसे; कमी सब मे होती है इतनी प्यारी लड़की का आफर ठुकरा दिया। मैं पर्सनली जनता था उसे, लड़की खुद से अप्रोच नहीं करती लेकिन उस बेचारी ने ये तक कर डाला. और तूने क्या कहा . हे डोंट माइंड बट आई वांट परफेक्ट पर्सन. आई डोंट लाइक योर जॉब एंड ड्रैसिंग सेंस!!" मैं क्या करता नही पसंद था कह दिया . कैसी बहनजी बन के घूमती थी वो।

हाँ लेकिन बाद में लगा कि बहुत रूड हो गया था मैं उस के साथ माफी भी मांग ली थी। लेकिन उस ने कोई जवाब नहीं दिया सिर्फ़ एक बात कही " मेरा जवाब तुम्हे वक़्त देगा"। मेरे पास कहने को कुछ नहीं था इस के बाद।

फ्लाइट अहमदाबाद लैंड होने की घोषणा हो चुकी, बस एक घंटे में मैं अपने घर। मैं गुजराती नहीं हूँ लेकिन पल बढ़ा यही, मेरे दादा पंजाब से यहां व्यापार के सिलसिले में आये और यही के हो गए। मेरा खून पंजाबी है तो रहन सहन भी थोड़ा दिखावे वाला है. सच कहूं तो मेरा थोड़ा ज्यादा है। दिखने में काफी अच्छा हूँ, 6फिट 2 इंच का कद है और हाँ जिम भी करता हूँ, 27 साल की उम्र में ही सैलरी पैकेज बहुत अच्छा है। कुल मिला के मेरे हिसाब से मैं परफेक्ट हूँ।

घर पहुँचते ही मम्मी का टेप रिकॉर्डर शुरू हो गया, " हाय मेरा बेटा कितना कमज़ोर हो गया, बंगलोर में सिर्फ़ डोसा इडली खाने को मिलता है; मैं तुझे खूब मक्खन वाले परांठे खिला के तगड़ा कर दूंगी।

" मम्मी मैं फिट हूँ.. और हाँ साउथ इंडिया में इडली डोसे के अलावा भी बहुत कुछ है खाने को"

"मम्मी की बात सुनोगे तो रात हो जाएगी, तुम जा के फ्रेश हो जाओ, आज आराम करो कल से 5 दिन धमाल होगा हमारी सोसाइटी में. जानते हो न!"

"ओ के पापा"

हमारी सोसाइटी में सभी त्योहार बहुत धूम धाम से मनाए जाते हैं.. यहां लगभग सभी तरह के लोग हैं लेकिन ज्यादातर गुजराती ही हैं। यहां फ्लैट्स नहीं बल्कि सबके अपने घर है, गेट, पार्क, सिक्योरिटी सब कुछ फ्लैट्स सोसाइटी की तरह ही है लेकिन फ्लैट नहीं। बस यही एक कमी खलती है बैंगलोर में मुझे।

दिन भर सो के रात को थोड़ा बाहर घूमने गया, बाहर मतलब मेन गेट के बाहर अपने फेफड़ों में थोड़ा धूआँ भरने। कश लगाता हुआ जब टहल रहा था तो एक लडक़ी पे नज़र टिक गई, बहुत देर उसे देखता रहा। मैडम कुत्ते के पिल्ले को डांट लगा कर सड़क के किनारे कर रही थी। " दिमाग खराब है तेरा, किसी गाड़ी के नीचे आ गया तो; चल यहां आ यहां खेल, अरे ये बिस्कुट तो खा ले, थक गया होगा।"

हद्द है !! पिल्ले को क्या समझ आ रहा है उसका अपदेश, हुह.. लड़कियां दिमाग की पैदल हरकतें क्यों करती है। ओह गॉड!! । पता नहीं मेरा क्या होगा शादी के बाद।

ध्यान फ़िर भटका, वो ही समाज सेविका हाथ झाड़ते हुए सोसाइटी के गेट की तरफ ही जा रही थी अपनी ही धुन में,मेरे बगल से निकली और मुझे देखा भी नहीं. मुझे आज तक किसी ने इग्नोर तो नहीं किया। खैर!! थोड़ी लाइट में चेहरा दिखा उसका. मैं भी देखूँ कौन सी हूर की परी है।

गोरा चेहरा, साधारण नैन नक्श वाली लड़की, कमर से थोरे ऊपर तक बालों की लंबाई जिन्हें ऐसे टाइट बंधा गया था कि कोई तूफान भी आ जाये तो बाल बांका न हो, शायद थोड़ा तेल भी चपोड़ा हुआ था। भौहों को देख के लगता था कि अपने जीवन काल मे ब्यूटी पार्लर के दर्शन ही नहीं किये। देखने मे 23, 24 की लग रही थी, इतनी उम्र में अपनी ऐसी दुर्दशा कौन रखता है? आज कल तो स्कूल जाने वाली भी महीने में दो बार क्लीन अप करा ही लेती हैं और एक ये है, ऐसा लग रहा था जैसे जी के भगवान पे एहसान कर रही हो, भगवान खुद ही आ के ही चेहरा ठीक करेंगे तो ठीक वर्ना इन तुच्छ मनुष्यों के लिए ईश्वर के दिये बालों का बलिदान वो क्यों दे भला।

और ये क्या?? जब वैक्स नहीं करा सकती तो कैप्री क्यों पहनी है. माना कि ज्यादा बाल नहीं हैं पैरों पर, लेकिन लड़कियों को तो एक भी बाल जंगल ही दिखता है।

उफ़्फ़ इतनी ध्यान से शायद मैं पहली बार किसी लड़की को देख रहा हूँ; मन करता है कि अभी इसका काया कल्प कर के कहूँ के नादान बालिके ईश्वर के दिये इस शरीर का ध्यान रखो।

खैर. मुँह की बदबू हटाने के लिये च्विंग गम चबाता हुआ मैं घर आ गया। खा पी के गप्पे मार के सो गया। सुबह नींद खुली तो दिमाग खराब हो चुका था, मुझे बुरा सपना आया था, बुरा नही बहुत बुरा; हे भगवान ऐसे सपने दुश्मन को भी न दिखाए। मैंने खुद को उसकि, वो ही जो रात में दिखी, आइब्रो बनाते हुए देखा। छी?

आज धनतेरस है तो शॉपिंग भी होगी और सोसाइटी में प्रोग्राम भी, जाना ही पड़ेगा।
 
रात को घर की पूजा के बाद सब सोसाइटी में जमा हुए और मिल कर आरती की, मैं आदत के मुताबिक अच्छे से तैयार हो के गया था।

आरती के समय एक जोड़ी आंखों को खुद को घूरता महसूस किया, देखा तो बला की सुंदर लड़की मुझे देख रही थी, बड़ी बड़ी आंखों में काजल और लाइनर लगा के पूरी हिरनी लग रही थी, नज़रें मिली तो उसने झुका ली, ये अदा मुझे पसंद आ गयी। एक बार सब तरफ देखा तो पता चला कि कई जोड़ी आंखें मुझे निहार रही थीं, अब मेरे चेहरे में मुस्कान आ गयी, थोड़ा पूजा में भी ध्यान दो लड़कियों, मैं शादी सिर्फ एक से ही कर सकता हूँ. सोचते सोचते अपने दाई तरफ़ पीछे रात वाली दिख गयी और उसे देखते ही सपना याद आ गया। मैं अंदर तक कांप गया और अपनी गर्दन झटक के वर्तमान में वापस कदम रखा तब पता चला कि सिर्फ़ वो ही थी जिनकी आंखें आरती में लीन थीं जब कि बाकी बालाओं की मुझ पे।

हद्द है!! ऐसे कैसे कोई मुझे इग्नोर कर सकता है, वो भी इस के जैसा बालों का जंगल।

मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि मैं कब से उसे घूर रहा था, जाहिर सी बात है मेरी इस हरकत पे बाकी आंखें भी बड़ी हो कर मुझे घूरने लगी जैसे मैने कोई पाप कर दिया। अंत में उसने भी कृपा की और मेरी तरफ़ देखा, शायद बाकियों की तरह उसे भी मेरी हरकत के बारे में पता चल गया था।

लेकिन उसकी नज़रों में खुशी या शरम नहीं थी बल्कि वो ऐसे देख के हैरान थी कि उसे कोई क्यों देख रहा है, वो तो इस लायक है नहीं।

खैर!! मैने वहां से खिसक के आदर्श बेटा बन के मम्मी के पास जाने में भलाई समझी लेकिन मेरी मत मारी गयी थी जो वहां गया।

" देखिये ये ही है मेरा बेटा!! बताइयेगा लड़की इन के लिए"

हे भगवान!! कहाँ फंस गया मैं, बचा लो।

" अरे इतना सुंदर है, हमारी सोसाइटी में ही 3 लड़कियों की कुंडली भिजवाती हूँ।"

जब मैं पक गया तो पापा के पास भाग चला वहीं जा के सुकून आया। आखिर में पंडाल पर भी ध्यान चला गया जहां पूजा की व्यवस्था थी, गज़ब का सजाया हुआ था। मैंने पापा से पूछ ही लिया कि किसने डिज़ाइन किया लेकिन पापा से पहले ही राय अंकल बोल पड़े "ये सब तो मीनल करवाती है, बहुत गुणी बच्ची है"

मीनल!! हम्म मैं समझ गया मीनल कौन है .. इतनी सुंदर आंखें. माँ बाप ने इसी लिए इतना प्यार नाम रखा होगा। लगता है मेरी तलाश पूरी होने वाली है, देखूं और क्या खूबी है मिस मीनल में, ये सोच के मैंने एक कोना पकड़ लिया और नज़रें बचा के उसे ताड़ने लगा. कमर से थोड़ा नीचे लहंगा और पूरी पीठ दिखाती चोली , झीना दुपट्टा। कसम से पूरी कयामत लग रही थी, खुले बालों को क्लिप लगा के एक तरफ के कंधों से आगे किया हुआ था, जिस कारण न चाहते हुए भी उसकी सुंदर पीठ वे नज़र चली जा रही थी।

इतने में गरबा शुरू हुआ, मैं आदतन कोने में बैठा रहा , मुझे डांस करना का कोई क्रेज नहीं ; हाँ देखता हूँ बहुत खूश हो के।

मीनल अपने दोस्तों के साथ गज़ब ताल मिला कर नाच रही थी और बीच बीच मे मुझे देख लेती।

लेकिन मैं उस पे फिदा नहीं हो गया था, मेरे लिए परफेक्शन मतलब परफेक्शन; कोई कोम्प्रोमाईज़ नहीं कर सकता। सब पता कर के ही प्यार या शादी का देखूँगा।

सपने में खोया ही था कि फिर किसी से नज़रें टकराई, ओहो!! ये क्यों नही कर रही गरबा.. इतनी शांत क्यों बैठी है, अपने हाथों को ऐसे कुरेद रही है जैसे यहाँ से भाग जाना चाहती हो। इतना अच्छा तो है सब, फिर क्यों मन नहीं लग रहा उस का।

"मीनल;ओ मीनल" किसी ने चीख के आवाज़ लगाई और मेरी नज़रें फिर मीनल पे टिक गई।

लेकिन मीनल तो डांस करती रही , उस तरफ देखा भी नही. ये क्या?

नहीं ,, अब जो मैंने देखा उस के बाद मेरा मन वैरागी हो जाने को हो गया। मीनल;!!
 
मीनल!! बेटा इधर आ.. एक बूढ़ी सी औरत बोली औऱ वो कल वाली लड़की उठ के उस तरफ चली गयी।

मेरा दिमाग खराब हो गया, जिसे मीनल समझ के परफेक्शन खोज रहा था वो कोई और निकली। मेरा मन अब किसी गरबे में नही लगा और मैं वापस गेट के बाहर टहलने चला गया। सिगरेट पी ही रहा था तब तक मीनल मोहतरमा बिस्कुट का पैकेट लिए बाहर आती दिखी, मन हुआ सिगरेट फेंक दूं, लेकिन इसमें उस मासूम सिगरेट का क्या दोष, इतनी बड़ी बेवकूफी तो मैंने ही की ना.. खैर देखु आज क्या बात करती है कुत्तों से ये सोच के थोड़ा पास जा के टहलने लगा।

" ओए ये क्या किया है?? सारा गद्दा फाड़ दिया अब सोएगा किस पे!!. समझ नहीं आता तुझे, मार खायेगा..इतनी जल्दी नया कहाँ से लाऊंगी। ब्लाह ब्लाह ब्लाह;" अजीब है ये अंदर इंसानों से बात करने में कोई इंटरेस्ट नहीं और कुत्तों पे प्यार लुटा रही है। ये सब सोच कर मेरा मुह टेढ़ा हो गया और उसी टेढ़े मुह से एक लंबा कश भरा. जब धूआँ छोड़ने लगा तो मीनल जी ने खा जाने वाली नज़रों से मुझे घूरा और हाथ झाड़ते हुए वापस जाने लगी, मेरे बगल से कुछ तो बड़बड़ा के निकली वो. मुझे सुनाई नही दिया लेकिन समझ आ गया कि मुझे ही गालियां दी जा रही हैं।

समझती क्या है ये खुद को, हिम्मत कैसे हुई इसकी " ओह, हेलो!! क्या बोली तुम!!. मुझसे ही कहा न कुछ , मैंने आखिरी कश ले कर गुस्से में सिगरेट का आखिरी हिस्सा ज़मीन पे फेंकते हुए कहा।

वो मुझे घूरते हुए मुड़ी, और मुँह बना के वापस अंदर जाने लगी. इसकी इतनी हिम्मत, मुझे जवाब तक नहीं दिया।

" एई. कांट यु लिसेन.." मैंने उस का हाथ पकड़ के खींचा। मेरी इस हरकत से वो डर गई और काँपने लगी; लेकिन मुझे क्या फर्क पड़ना था इस से .." तुमने अभी क्या बोला, 2 बार पूछ चुका हूँ सुनाई नही देता" मैंने उसे डांटा। उसकी घिग्गी बंध गयी इतने में ही. " डफर. कांप क्यों रही हो". इतना बोलना था मेरा कि उसने गंगा जमुना बहानी शुरू कर दी।

" तुम लड़कियां भी न. जहां लगा फंस गए रोना शुरू,और कोई काम नहीं" मेरा बड़बड़ाना जारी था, इतना कि मुझे गुस्से में ये भी ध्यान नही रहा कि उसका जवाब सुनने के लिए मुझे अपनी जुबान को लगाम लगा कर रोकना होगा।

" छोड़िये मेरा हाथ!! " अब की वो चिल्लाई। " तमीज़ नहीं लड़कियों से कैसे बर्ताव करते हैं।" उसकी आंखें आंसू के साथ अंगारे भी उगल रही थी एक पल को उस के गुस्से से मैं डर गया लेकिन मैं मर्द हूँ, ऐसे कैसे हार मान लेता।

" पहले जो पूछा उस का जवाब दो, मैंने भी पूरी अकड़ दिखाई " क्या बोल के गयी तुम मुझे"।

वो नीचे देखने लगी, फिर धीरे से बोली " बदतमीज़"।

"व्हाट. तुम मुझे बदतमीज़ कह रही हो, हाऊ डेयर यु"

" तब कहा था मैंने, मुझे सिगरेट पीने वालों से चिढ़ होती है समझे" इस बार उसे हिम्मत आ चुकी थी और उसने मेरी आँखों में आंखें डाल के जवाब दिया।

मैं उसे कुछ पल देखता रह गया, अब मुझे वो मासूम लगने लगी और उस पे तरस भी आने लगा तो उसका हाथ छोड़ कर मैं बोला " तो तुम मत पियो ना, दूसरों से तुम्हे क्या मतलब"

" मुझे आपसे कोई मतलब नहीं लेकिन अपने आप से औऱ वातावरण से है"

उसका टेढ़ा हुआ मुह देख के मुझे हंसी छूट गयी।

"आप हंस रहे हैं, जानते भी हैं कुछ पैसिव स्मोकिंग के बारे में? खुद के सिवा किसी और के बारे में सोचेंगे तब समझ आएगा"

हे भगवान!! एक सिगरेट ने इतना खराब इंसान बना दिया मुझे. माफ करो मेरी माँ अब, मैने उस के आगे हाथ जोड़ के कहा।

वो कुछ बोली नहीं देखती रही और पलट के चली गयी, हद्द होती है अपदेश झड़ने की भी।

खैर मैंने, दूसरी लड़की जिसे मीनल समझा, उस के बारे में पता करने की सोची और चला आया।जल्दी में चलने के कारण किसी से टकरा गया , देखा तो वो ही थी, वाओ ब्यूटीफुल!!, लेकिन ये क्या. उसकी हरकतें क्या थी ये.

मेरा मतलब ऐसे भी नही टकराये थे कि वो गिरने लगती लेकिन उसने गिरते हुए मेरी बाज़ुओं के सहारा ले लिया और मेरी आँखों मे देखने लगी। उफ़्फ़ क्या था ये, सास बहु ज्यादा देखती है क्या टी वी पे। मैंने उसे सीधा खड़ा किया तो उसी ने बोल दिया" आइ एम सॉरी, आपको लगी तो नहीं।

नहीं मैं ठीक हूं बोल के मैं घर आ गया, और वो पीछे उदास सी खड़ी रही। कुछ अच्छा तो दिखा नहीं, एक कमी ज़रूर दिख गयी इसमें।

वैसे भी ब्यूटी विथ ब्रेन सिर्फ कहावत ही है, लेकिन दिमाग तो है इसके पास चालाकी करने के लिए।

ओह गॉड!! दिमाग का दही होने लगा तो न्यूज़ चला लिया।

" बड़ी विडंबना है, देखिये कैसे समाज में समुदाय विशेष के खिलाफ षड्यंत्र;"

चेंनल, चेंज

" पाकिस्तान डरा हुआ है,जी हां अब उसका खात्मा. "

चेंनल चेंज

" इंडिया वांट्स टू नो; बोलिये नेताजी आप देशद्रोह. "

चेंज

" देखिये कैसे इस मासूम के साथ दरिंदगी की गई, वीडियो देखिये।।।"

कमीनो दरिंदगी तो तुम कर रहे वो वीडियो चला चला के, टी आर पी के लिए कुछ भी?

इसी लिए वो मृगनयनी सास बहू देखती होगी, अब समझ आया। मैंने टी वी बंद की और खिड़की से बाहर देखने लगा, खाना शुरू हो चुका था तो वापस गया।

इस बार किस्मत मज़ाक पे मज़ाक कर रही है मेरे साथ उफ़्फ़। खाते हुए नज़र दौड़ाई तो मीनल एक दीवार पे प्लेट रख के दो चम्मच से चावल खाते दिखी,एक चम्मच में चावल लेती और दूसरे से गिरने से बचाती, ये भी पूरी कार्टून है।

मैंने सोचा वही चलू अपनी प्लेट ले के. कम से कम, वो कोई हरकत तो नहीं करेगी, कुत्ते बिल्लियां, वातावरण.. बस यही उसकी जिंदगी है।

मैं भी बगल में जा के खड़ा हो के खाने लगा, उसे देख के प्लेट भी दीवार पे रख दी, उसने आवाज़ सुन के मेरी तरफ देखा तो थोड़ा घबरा गई, थोड़ा नहीं ज्यादा, और उसके हाथ से लग के प्लेट गिर गयी . बेचारी!! सब्जी,दाल सबने अच्छे से उसकी चरण वंदना की. और उसकी आंखें बह चली। कितना रोती है ये उफ़्फ़।

मैंने अपने पानी के गिलास से उस के पैर धोए. अरे मेरा मतलब सिर्फ ऊपर से पानी गिराया ताकी वो चल फिर पाए। वैसे भी बिना वैक्स किये पैर टच करने का शौक बिल्कुल नहीं मुझे।

उसका लटका हुआ मुँह देख के तरस आ गया। तो टिश्यू पेपर्स दिए पैर पोछने के लिए और उसे दीवार पे बैठने को कहा , साथ में हिदायत भी दी कि मेरी प्लेट नहीं गिरनी चाहिए।

वो मुँह नीचे कर के चुप चाप बैठ गयी; मैं जा कर उस के लिए फिर खाना लाया और साथ मे दो चम्मच, चम्मच लेते समय मेरे चेहरे पे एक मुस्कान तैर गयी।

उसे खाना दे कर मैने पूछ ही लिया कि खुद खा लेगी या फिर गिराएगी, नहीं तो मैं खिला दूंगा। वैसे भी मैं खिला देता तो उसकी किस्मत चमक जाती, मैं सोच कर फिर मुस्कुराया और इस ने देख लिया और शायद उसे के लगा कि मैं उस पे हंस रहा हूँ तो और मुँह लटका लिया।

" खा लो आराम से. तुम पर नहीं हंस रहा मैं इतनी तमीज़ है"

फिर शांति से दोनो खाते रहे, लेकिन मैं सोचता रहा और पूछ ही लिया।

" एक बात बताओ"

"हम्म"

" सब इतना तैयार हो कि आये हैं और तुमने इतनी सिंपल कुर्ती पहनी है,तुम्हे नहीं लगता कि तैयार हो कि रहना चाहिए"

उसने खाना खाते खाते चम्मच अपने मुँह के पास ही रोक लिया और उजड़े चमन जैसी भौहों को ऊपर कर के मुझे देखा, मुझे फिर हंसी आ गयी और इस हंसी पे उसका मुँह खुल गया जैसे इतनी बेशर्मी की उम्मीद उसे मुझसे न हो।

"मुझे टाइम नही मिला "इतना कह के वो चुपचाप खाने लगी.

"ऐसा कौन सा काम कर रही थी? हालांकि मुझे पता था पंडाल डेकोरेशन इसी ने किया फ़िर भी और जानना था कि कितने काम किये जो ऐसे ही घूम रही है।

उसने फिर भौहें ऊपर की लेकिन मैंने अपनी हंसी दबा ली और मैं भी अपनी भौहों को ऊपर कर के उसे देखने लगा जैसे उसके बोलने का इंतेज़ार कर रहा हूँ।

" कुछ नहीं" कह के वो चली गयी और भीड़ में गुम हो गयी।

मत बताओ मुझे क्या हुह!!, मैं भी खा पी के घर आ गया।
 
कल सुबह जल्दी उठ के जॉगिंग करूँगा दो दिन से एक्सरसाइज नहीं कि और इतना हैवी खाना. सब कंट्रोल करना पड़ेगा। एक बार फिर उस मृगनयनी का खयाल आया, सब कुछ तो सही था लेकिन वो फिल्मी हरकत से मेरा मूड खराब हो गया। हीरो हेरोइन का एक दूसरे पे गिर जाना, कलाई में दुपट्टा फंस जाना. उफ़्फ़ ये सब ड्रामे रियल लाइफ में सूट नहीं होते ओरिजिनल रहो यार तुम जो कोई भी हो।

मॉर्निंग 5 बजे मैं घर से रेडी हो कि निकल चुका था, ब्लैक और ब्लू ट्रैक सूट नीचे नाइकी के जूते, कलाइयों में एपल वाच, कानों में ब्लूटूथ हेडफोन कुल मिला के चलता फिरता ब्रांड शोरूम था मैं, सच कहूँ तो बहुत जंचता भी है ये सब मुझपे , लड़के भी जलन भरी नज़रों से देख ले रहे थे मुझे। मैं अपनी धुन में गाने सुनते हुए दौड़ रहा था।

लेकिन मेरी किस्मत कुछ न कुछ अजूबा दिखाने के लिए तैयार बैठी थी, और वो अजूबा मिस मीनल निकली। उसे देख के मेरी आँखें बाहर आ गयी, सुबह सुबह नहा धो के हाथ मे थाली ले के ये किधर जा रही है, और सब से बड़ा चमत्कार बाल खुले हैं; वैसे भी गीले बाल कौन बांधता है बेवकूफ!! मेरे अंदर से आवाज़ आयी।

थाली में क्या ले जा रही है, ये इतनी अजीब क्यों है. मैं पता नहीं आज कल रॉ का एजेंट बनता जा रहा हूँ , मेरे क़दम उस तरंफ़ बढ़ चले।

गेट के बाहर देखा तो मैडम गौ सेवा में लगी हैं और वो छोटा कुत्ता उस के पैरों पर यहां वहां कूद रहा है। आज चुप चाप कैसे खिला रही है ये. इतना सोच ही पाया था कि वो शुरू हो गयी।

"अच्छी है न रोटी!! ओहो. इसे भी खिला दूं देखो कैसे कूद रहा है. " ये सब सुन के मेरी जॉगिंग बंद हो गयी और मेरे दिमाग ने दौड़ना शुरू कर दिया। ये दिमाग की ठीक तो है ना!!

अपने बाल झटक के जब वो पलटी तो आज थोड़ी ठीक लगी , खुले बाल जच रहे थे उस पर, मैं मुस्कुरा उठा. वो अपनी धुन में आसमान की तरफ देखते हुए चली आयी।

" तुम दिन भर बस ये ही सब करती हो? " मैने पूछ ही लिया।

उसने शायद मुझे देखा नहीं था इसलिए मेरे बोलते ही जैसे उसे एक झटका लगा और हाथ की थाली छूट के गिर गयी।

मैंने उसे चिढ़ाते हुए कहा.." कोई सुंदर लड़का देखा नहीं क्या?"

उसने आदतन भौहें ऊपर की और मैं हंसने लगा, बेचारी बुरी तरह झेंप गयी और थाली उठा के भाग गई।

" पागल!!" मैं बोला और जॉगिंग करने लगा।
 
उस के जाने के बाद जितनी देर जॉगिंग की उतनी देर मुस्कुराता रहा उस झल्ली सी मीनल को सोच के।

वापस जाने ही लगा था कि मेरी मृगनयनी दो और सुंदर बालाओं के साथ आती दिखी, मैं भी रुक गया लेकिन ऐसा दिखाया जैसे उन्हें देखा नहीं।

"हाई. " तीनो साथ ही बोली. जैसे किसी फंक्शन में गाना गा रही हों।

"हे हाई. मैंने भी दिखाया कि जैसे उनके आने का पता नहीं चला"

"आप यहां किस के घर आये हैं" कैसा बेवकूफी भरा सवाल था।

"जी अपने घर" मे मुस्कुराया और तीनों अजीब सी हंसी हंसने लगी।

" हे हे हे; वेरी फनी, मल्होत्रा अंकल के बेटे हैं ना आप" मृगनयनी बोली।

जब पता ही था तो इतना नाटक क्यों किया। खैर मैं बोला " जी हां 2 साल पहले आया था दीवाली पे, लगभग 3 साल बाद घर आ रहा हूँ"

" हाँ बताया मेरी फ्रेंड्स ने"

"मेरी ही बातें चलती हैं क्या आप लोगो के बीच. वैसे आपको कभी देखा नहीं पहले" मैंने पूरी बेशर्मी से कहा तो तीनों शरमाई।

ये समझ नहीं आया कि जब बात इस मृगनयनी को ही करनी थी तो 2 बॉडी गार्ड्स ले के क्यों घूम रही है। मेरा क्या;इसकी मर्ज़ी जैसे घूमे।

" आई एम नव्या" कह के उसने हाथ आगे बढ़ाया।

ओहो तो मृगनयनी का नाम नव्या है, नाइस नेम

"हाई, ई एम निशांत;"

तभी दूसरी सहेली चहक के बोली " वाओ दोनो एन एन; नव्या निशांत"

मन तो किया कि ,लेकिन लड़की है और कितने दिमाग की उम्मीद करता।

जितना मज़ा आज मीनल को तंग कर के आया उतने का पूरा बदला इन लोगो ने मुझे छेड़ के निकाल लिया।

" वैसे करती क्या हैं आप"? मैंने अपने फ्यूचर को ध्यान में रख के प्रश्न दागा।

" मैंने बी फार्मा किया हुआ है, अभी यहीं एक दवा की फैक्ट्री में काम कर रही हूँ।"

मेरे एक सवाल पे बड़ी ही शातिर तरीके से उसने अपनी डिटेल दी, मैं दांत दिखा कर मुस्कुराया तो तीनों मुँह खोल के देखने लगे।

" व्हाट!!" मैंने पूछा,

"आपकी मुस्कान बहुत प्यारी है" एक बेशर्मी से बोली।

दूसरी बोली "साथ मे जब लेफ्ट गाल पे डिम्पल पड़ता है ना तो चार चांद लग जाते हैं।

हे भगवान!! लड़कियां मरती हैं मुझ पे पता था लेकिन ये लोग तो अलग किस्म के चिपकू लग रहे हैं। नव्या की सेटिंग करने आये हैं या अपनी,

उधर नव्या मैडम अलग ही शरमा रही थी, किस बात पे ये समझ ही नहीं आया. तारीफ तो मेरी हुई थी ना!!

" आप क्या करते हैं" मिस नव्या ने शर्माते हुए पूछा।

आप जैसे लोगो को हर रोज़ झेलता हूँ बस यही काम है मेरा, मैने मन में जवाब दिया।

" बंगलोर में सॉफ्टवेयर कंपनी में हूँ "

"वाओ बंगलोर, मैं भी वहीं जाना चाहती हूं" वो आंखों में चमक के साथ मुझे बड़े प्यार से देख के बोली।

माय गॉड, इनडायरेक्टली शादी के लिए बोल गए ये तो.

"नहीं चलेगी ,नहीं चलेगी ये मृगनयनी नहीं चलेगी. " मेरा दिमाग धरने पर बैठ गया, मैने याद दिलाया नव्या नाम है इसका, लेकिन सच है ये नहीं चलेगी।

पीछा छुड़ाने के लिए मैंने घर का रास्ता चुना और नहाने धोने की बात कह के घर आ गया।

घर मे घुसते ही मम्मी शुरू हो गयी " हाय पुत्तर अब और कितना पतला होगा, ला तेरी नज़र उतार दूं , जब से आया है सारी लड़कियां घूरे ही जा रही हैं मेरे राजा बेटा को!!"

"मम्मी!!" मैंने कहा और अपनी भौहें ऊपर की हैरानी से ;लेकिन ऐसा करते ही मीनल का चेहरा याद आ गया तो मैं हंस पड़ा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं सच मे ऐसे भौहें ऊपर करता हूँ या उसकी नकल कर रहा था।।

" हंस मत;सब पता है मुझे; तू बता नव्या कैसी लगती है, उसके साथ जो घूमती हैं माया और सिद्धि वो भी अच्छी हैं, तुझे पसंद आई हो कोई तो कुंडली मंगवा लेती हूँ"

" निशांत तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं, इस शादी से मना करो हम तुम्हारे साथ हैं" इस बार दिल दिमाग दोनो बगावत पे उत्तर आये।

" नो;नो; मम्मी प्लीज, अब ये टॉपिक अभी मत छेड़ो, मुझे उन तीनों में से किसी की भी कुंडली नही मिलनी।"

" लेकिन पुत्तर. "

" नो मम्मा; मैं जा रहा हूँ नहाने आप ब्रेकफास्ट बना दो" मैं जल्दी से ऊपर अपने रूम में भागा; हैडफ़ोन, घड़ी उतार के रखते समय खिड़की के परदे खुले देखे तो सोचा लगा लू। आस पास के किसी ने नहा कर ऐसे ही देख लिया तो ठीक नही लगेगा।

जैसे ही पर्दे लगाने को हुआ मीनल दिख गयी, अपने घर मे बाहर की तरफ जाले साफ कर रही थी। मुँह पे पट्टी बांधी हुई थी बस आंखे ही दिख रही थी उसकी। मैं वहीं खड़ा हो गया. किसी से करवा लेती ये सब, ऐसे परेशान हो कर सब खुद से क्यों कर, रही है, ये कुर्सी पे क्यों चढ़ रही है? मेरा दिमाग चिल्लाया, गिर गयी तो!! इस लडक़ी का दिमाग खराब है सच मे।

वैसे मेरी ज़ुबान तो काली नहीं ,लेकिन उस समय लगता है सरस्वती जी बैठी थीं जिह्वा पर, मेरे सोचते ही कुर्सी से लड़खड़ा के गिरने लगी वो, मैं अपनी खिड़की से ही हाथ फैला के उसे बचाने का अथक प्रयास करने लगा. अब मेरे हाथ कानून के तो हैं नही जो लंबे हो कर वहां तक पहुँच जाते। अपनी इस मूर्खता पर हैरानी हुई मुझे. खैर वो गिरी नहीं, अपना संतुलन बना लिया और सावधानी से नीचे उतर के घर के अंदर चली गयी, मैंने भी राहत की सांस ली और बाथरूम में प्रस्थान किया।
 
बाथरूम में नहाते हुए गाना गाने की आदत है मुझे और पूरी तन्मयता से उसी काम मे लगा हुआ था, मेरी आवाज गायक जैसी नहीं तो बुरी भी नहीं अपने इंजीनियरिंग के ग्रुप में और ऑफिक के प्रोजेक्ट टीम में मेरी ही सब से अच्छी आवाज़ है। जिस कारण लड़कियां और मंडराती रहती हैं लेकिन मजाल है किसी को भाव मिला हो। मुझे परफेक्शन का बहुत बुरा भूत सवार था।

मैं गाना गाये जा रहा था; पंजाबी हूँ तो पंजाबी ही गया रहा था।

पानी दा रंग वेख के अँखियाँ चो हन्जू रुळ दे

माहिया न आया मेरा, माहिया न आया माहिया न आया मेरा, माहिया न आया रान्झाणा न आया

अक्खां दा, नूर वेख के अँखियाँ चो हन्जू रुळ दे

कमली हो गयी तेरे बिना, आजा रान्झण मेरे बारिश बरखा सब कुछ बह गयी, आया नी जिन्द मेरेअक्खां दा. कोठे उत्ते बह के अँखियाँ मिलौंदे ऩा जाणा हमें तू कभी छोड़

तेरे उत्ते मरदा, प्यार तैनु करदा ,

मैं पूरे जोश में गा रहा था.

माहिया न आया मेरा, माहिया न आया माहिया न आया मेरा.

अभी नहाने का प्रोग्राम चल ही रहा था कि दरवाजे पर हल्की दस्तक सी महसूस हुई, थोड़ा रुक के ध्यान लगाया तो पता चला हल्की दस्तक नहीं कोई दरवाज़ा ही तोड़ डालने पे आमादा है।

"मम्मी. मम्मी? क्या कर रहीं है ये आप.. क्या हुआ.. हद्द है नहाऊं भी न अब चैन से"।।।

बाहर से आवाज़ आयी " वो. मम्मी नहीं मैं हूँ"

अब ये " मैं" कौन है, आवाज़ तो सुनी हुई लगी मुझे; खैर उस "मैं" को ये पता नहीं था क्या कि मेरे पास दिव्य दृष्टि नहीं जो बाहर का दिख जाएगा, हद्द है। मैनर लेस पीपल?

"क्या काम है? 5 मिनट रुको जो कोई भी हो, कमरे के बाहर"

कमरे के बाहर जाने को कहना मजबूरी थी, क्यों कि मर्द होने के कारण मैं बाथरूम में तौलिये के सिवा कुछ और ले जाना अपनी तौहीन समझता हूँ।

लड़कियां ही होती हैं जो 50 तरह के सामान हर वक़्त साथ रखती हैं। इतना सोचा ही था कि मीनल याद आ गयी, वो तो हर टाइम हाथ झड़ते हुए चलती है और मेकअप का उसे ABCD भी नहीं पता।

खुद को तौलिये में लपेट कर अपने बालों को हाथ से सेट करता हुआ मैं बाथरूम से बाहर निकलने लगा। कपड़े पहन के बाहर देखना भी था कि कौन "मैं" आयी है।

अब की धीरे धीरे गुनगुना रहा था और अपने सुडौल शरीर मे बॉडी लोशन लगाना शुरू किया।

" समंदर में नहा के, और भी. नमकीन हो गयी हो हो हो. "

"ही ही ही. " मुझे हंसने की आवाज़ आयी और कसम से अपनी इज़्ज़त साफ साफ लुटती नज़र आई। मैं फटाफट आवाज़ की तरफ पलटा तो नव्या सामने सिर झुका कर मुझे स्कैन करते दिखी। उसने अपने होठों को दांतों से दबाया था जिस के बाद भी उसकी मुस्कुराहट छिपाए नहीं छिप रही थी।

मेरा सारा खून उबालें मार मार कर सर तक पहुँच गया, लेकिन फिलहाल खुद को ढकना सब से ज़रूरी था, मैंने सामने रखी टी शर्ट से अपना पेट ढका और दहाड़ा।

"कहा था न कमरे से बाहर वेट करो!! एक बार मे समझ नहीं आता!!" वो डर गई और उस की हंसी पूरी तरह गायब हो गयी तब जा के मेरे कलेजे को ठंढक मिली। इस से तो कभी किसी भी जन्म में शादी नही करूँगा मैंने उसे घूरते हुए सोचा।

फिर आवाज़ नार्मल कर के बोला " ऐसे किसी के रूम में नहीं आते, आगे से ध्यान रखना"

" वो आंटी ने आपको बुलाने के लिए कहा था तो आयी ऊपर, आपका कमरा इंटरेस्टिंग लगा तो देखने लगी. इतनी मासूमियत से बोली वो कि मेरा गुस्सा शांत हो गया। कुछ भी हो इस हाल में भी गजब की सुंदर लग रही थी। उसे खुद को इस तरह देखा जाने का अंदाज़ा हो गया और वो सिर झुका के मुस्कुरायी।

मैंने उसे बाहर जा कर वेट करने को कहा और रूम बंद कर के तैयार हुआ। दरवाज़ा खोला तो वो सामने ही खड़ी मिली।

"तुम यहीं खड़ी हो!! मैं हैरान था. "नीचे जा के वेट कर लेती, ऐसा कौन सा ज़रूरी काम आ गया"

" वो आपने कहा था न बाहर वेट करने के किये तो. "

यार ये लड़की जात सारी ही इतनी बुद्धिमान होती हैं या मेरी ही किस्मत में लिखी हैं; कभी कभी सोचता हूँ कि सब कुछ त्याग कर सन्यासी बन, जाऊं।।।।

" चलो अब नीचे" मैने मुह बनाया तो उसे बुरा लगा लेकिन मैंने कौन सा फर्क पड़ना था अभी तो मम्मी को भी सुनाना था।

"मम्मी. मम्मी!!. "

"क्या हुआ इतना क्यों चिल्ला रहा है तू"

"आपको पता था कि नहा रहा हूँ तो थोरा रुक नहीं सकती थीं;मतलब हद्द है मम्मी. आपको कुछ समझ नहीं आता ?"

" हाँ हाँ, मुझे क्या समझ आएगा, तू बड़ा पढ़ा लिखा है मैं कहाँ . पुराने ज़माने की औरत तेरे लेवल की कहाँ हूँ मैं; जा शादी कर ले और अपनी बीवी को समझाना फ़िर; तब पता चलेगा माँ का त्याग क्या होता है. 9 महीने कितनी तकलीफ झेली8 Full stop"

मम्मी का टेप रिकॉर्डर जो एक बार शुरू हो जाता है ना तो वो तब तक खत्म नहीं होता जब तक कि वो मेरी, पापा की ,दादी की और पूरे खानदान की कमियां न गिना दे. इस जन्म की याद न आये तो अगला जन्म भी याद कर लेती हैं. " मैंने कौन से पाप किये थे जो इस घर मे आयी"।।उफ़्फ़;

आज मेरे पूरे खानदान के कई जन्मों का कच्चा चिट्ठा उस नव्या के हाथ लगने वाला था।

मैंने पापा को इशारा किया जो कि न्यूज़ पेपर के पीछे छुप कर मेरे मज़े ले रहे थे।

" अरे नीता बेबी सुनो!!( पापा अकेले में मम्मी को ऐसे ही बुलाते हैं, लेकिन आज सब के सामने ही चालू हो गए. )

" मम्मी इतना सुनते ही शरम से लाल हो गयी " आप भी न बच्चों के सामने कुछ भी बोलते हैं"

"ज़रा चाय नाश्ता दो न नीता बेबी. देखो नव्या आयी है, कितनी प्यारी बच्ची है. "

प्यारी और वो. आपको क्या पता पापा कैसे घूर रही थी वो मुझे;

मम्मी किचन में चली गयी और पापा ने मुझे आंख मार के जीत का एहसास कराया। मैंने नव्या पे गौर किया. वो डरी घबरायी सी बारी बारी हम सब के चेहरे देख रही थी जैसे कि किसी ने उसे किसी चिड़िया घर मे शेर के पिजरे में धकेल दिया हो।
 
मुझे अब की सच मे उस वे तरस आ गया तो उसे प्यार से बैठने को बोला और उस के आने का कारण पूछा तो वो फ़िर शरमाने लगी। "आप सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं ना"

"हांजी. बोलो क्या काम था"

"मेरे भाई को प्रोग्रामिंग लैंग्वेज सीखनी है, बस बेसिक जिस से एग्जाम में पास हो जाये।"

" 3-4 दिन में कितना सीख जाएगा?.. चलो देखता हूँ. भेज देना भाई को"

" डोंट माइंड बट आप आ जायेगा ना प्लीज" मैंने फिर पापा बको देखा।

" कोई नहीं बेटा, ये पढ़ा देगा. डोंट वरी" मैंने पापा को खा जाने वाली नज़रों से देखा।

" कौन सा घर है तुम्हारा?" मैंने पूछा।

" ये सामने रोड है ना इस में राइट साइड में तीसरा घर"

" अच्छा मीनल के घर से एक घर छोड़ के तुम्हारा घर है. ओह्ह" मैंने थोड़ा तेज़ आवाज़ में कहा. इतना कहना था ही कि दोनों मुझे घूर के देखने लगे जैसे कोई पाप कर दिया हो, हद्द तो तब हो गयी जब मम्मी भी किचन के दरवाज़े से बेलन के साथ झांकने लगी।

" क्या हुआ, ऐसे क्यों देखने लगे सब मुझे. ?"

" तू मीनल को जानता है? और तुझे उस का घर भी मालूम है??" पापा हंस रहे थे जैसे कह रहे हो बेटा!! चोरी पकड़ी गई तेरी।

लेकिन चोरी कौन सी की मैंने, मतलब कुछ भी. वो ही मिली मुझे क्या. हुह!!

"मम्मी आप प्लीज नाश्ता लाइये" मैने उन्हें आर्डर दिया।

" तुम भी बैठो नाश्ता करो नव्या. फिर चलते हैं तुम्हारे घर"

लेकिन वो घर के माहौल को भांप कर बोली के वो नाश्ता कर चुकी और चली गयी।

"वैसे बेटा. मीनल बहुत प्यारी बच्ची है" पापा बोले।

" वो तो है . " मेरे मन ने मुझे जवाब दिया। "क्या कह रहा है ये पागल हो गया है क्या" मैं बोल पड़ा।

" निशांत. तुम इस तरह कैसे बात कर रहे हो अपने पापा से "

मम्मी टेबल पे पराठे रख के चिल्ला कर बोली।

मुझे होश आया कि क्या कांड किया अभी, अब क्या कर सकता था. " सॉरी मम्मी, सॉरी पापा . मैं कुछ सोचने लगा था तो उसी धुन में बोला. पापा से ऐसे बात करने की सोच भी नही सकता।

"मैं जानता हूँ बेटा, तुम चलो नाश्ता करो. माखन वाले परांठे" पापा ने पता नहीं क्यों बड़ी शातिर सी मुस्कान दी।

मम्मी के किचन में वापस जाने के बाद पापा धीरे से बोले.

" तुझे भी अच्छी लगती है वो; मैं जानता हूँ"

"पापा. आप भी ना, ये मेरे टाइप की है ही नहीं.. देखा कैसे बेशर्मो की तरह मेरे रूम में आ गयी थी. मैनरलेस"

" उसे मम्मी ने भेजा था बेटा जान बूझ के", पापा मुस्कुरा के बोले. फिर बोले

" वैसे मैं इस की नहीं मीनल की बात कर रहा था"। इतना सुनते ही मुझे 440 वोल्ट का झटका लगा और खाना गले में सरक गया। खांस खांस के हालात, खराब हो गयी।

पानी पी कर सम्हल कर मैं बोला। " पापा. आप मेरे पापा हैं. ! दोस्तों जैसा बिहेव क्यों कर रहे हैं; और मुझे वो पसंद नहीं, मेरी चॉइस जानते हैं ना आप" मैं तुनक कर बोला।

पापा अब गंभीर थे " बेटा जिंदगी में जो हम सोचते हैं सब वैसा नहीं होता.. दुनिया मे कोई भी इंसान पर्फेक्ट नहीं; जब शादी होती है ना, तब दो जन मिल कर एक दूसरे की जिंदगी को परफेक्ट बनाते हैं। यही सच है और इसे कोई नहीं बदल सकता"

पापा की दार्शनिक बातें मुझे पसंद आयी, लेकिन मीनल; नो वे।

"आपकी बातें सही हैं पापा लेकिन मीनल के लिए ऐसा कुछ नहीं" मैं गंभीर हो कर बोला।

पापा मुस्कुराये और खाने को कह कर चले गए।
 
मैं नाश्ता कर के नव्या के घर गया, उस का भाई डरा सहमा सा मुझे देख रहा था उसे देखते ही मीनल का चेहरा याद आ गया और फिर पापा की बात, मैंने अपना सिर झटका और उसे पढ़ाने लगा।

नव्या बीच बीच में चाय पानी के बहाने आ के मुझे निहार लेती और मैं बस मुस्कुरा देता।

घर वापस आ के मैं थोड़ी देर सोने चला गया। डेढ़ बजे के आस पास किसी के चिल्लाने की आवाज़ पर नींद खुली, खिड़की से देखा तो सामने एक बूढ़ी आंटी मीनल पे चिल्ला रही थीं " अब तक तेरा काम नही निपटा, शाम की तैयारी करनी है तुझे कुछ समझ नहीं आता। जल्दी बाहर आ देख ये टैन्ट के उस तरफ रंगोली बनाने का सामान किसी ने फैला दिया है।"

मीनल अंदर से अपने बालों को समेट कर जुड़ा बनाते हुए बाहर की तरफ भागी, मुझे पता नहीं क्यों उस पे तरस आ रहा था, कितनी थकी हुई लग रही थी बेचारी!!

मैं भाग के नीचे गया तब तक मम्मी ने टोक दिया

" उठ गया पुत्तर चल खाना लगा देती हूँ "।

"मम्मी आप 10 मिनेट रुको, मैं आता हूँ"।

" अब जहां भी जाना है खा कर जाना, घर पे पैर ही नही टिकते इस लड़के के.." मम्मी बोली।

" जाने दो नीता, वो कुछ ज़रूरी काम से जा रहा है; हैं ना निशांत"

मुझे पापा की बातों का मतलब समझ नहीं आ रहा था, हां ये ज़रूर लगा कि वो चाहते थे मैं बाहर जाऊ।

" थैंक यू पापा; आता हूँ मम्मी" कह के मैं फुर्ती से घर से निकल के पांडाल की तरफ चला गया ।

सब तरफ देखने पर भी मुझे वो दिखी नहीं, इसी तरफ़ तो आयी थी लेकिन वो। मैं टैन्ट के पीछे की ओर गया जहां काफी सामान रखा था पर वो नहीं दिखी।

कहाँ चली गयी मैं बुदबुदाया और वापस जाने के लिए मुड़ गया।

"कुछ खोज रहे हो!!" आवाज़ आयी जस्ट मेरे पीछे से. ये उसी की आवाज़ थी , मेरे चेहरे पे मुस्कान आ गयी। पीछे पलटा तो सामान के बीच से रंगोली के रंगों के कुछ पैकेट हाथ मे लिए वो बाहर निकल रही थी।

" तुम वहां कचरे के बीच क्या कर रही हो" मैने उसे डांटा " चोट लग जायेगी तो!!" इतना कहना ही था कि बेचारी का पैर पड़ी रस्सी पे उलझ गया और वो गिर गयी।

बेचारी!! गिरी तो गिरी साथ मे रंगोली के पैकेट से पीला रंग भी उड़ कर उस के चेहरे और बालों के साथ साथ हाथों पर भी बिखर गया।

मुझे समझ नहीं आया कि पहके हँसूँ या पहले उसे उठाऊ।

लेकिन इंसानियत पहले आ गयी तो मैंने मुस्कुराते हुए उठा कर उसे बैठाया।

आज मेरी जुबान सच मे काली हो गयी थी लगता है।

इतनी देर में वो चार बार छींक चुकी थी, और आंखें खोल नहीं पा रही थी। वो घबराहट में अपने गंदे हाथों से बाल और चेहरे के रंग को झाड़ कर साफ करने लगी।

" रुक जाओ मीनल. ऐसे नहीं होगा. मैं करता हूँ" मैंने महानता दिखाई।

उसने एक आँख थोड़ी सी खोल कर मुझे देखा और मैं हंस पड़ा तो वो चिढ़ गयी और फिर अपना चेहरा साफ करने लगी।

मैंने अपने हाथ से उनके दोंनो हाथों को नीचे कर के टाइट पकड़ लिया, वो छुड़ाने की कोशिश करने लगी लेकिन मेरे जिम करने वाले हाथों के आगे उसकी कहाँ चलती। मैं अपने रुमाल से उसका चेहरा पोछने लगा तो वो शांत हो कर बैठ गयी।

मैने अच्छे से उसकी आंखें साफ की , उसका जुड़ा खोला और बालों से भी जितना हो सका रंग निकाला। मैंने महसूस किया कि वो बुरी तरह से कांप रही थी।

"मीनल अपनी आंखें खोलो, और डरो मत . मैं तुम्हारा मर्डर नहीं करूंगा" मैंने बत्तीसी दिखाते हुए कहा। उसने आंखें खोली लेकिन शायद रंग अंदर चला गया था तो फिर बंद कर ली और उनकी आंखों से आंसू लुढ़क गए।

" तुम चुप चाप यहां बैठो मैं पानी लाता हूँ, और हाँ कहीं छुप मत जाना समझी!!" मैंने उसका हाथ छोड़ा और नल से पानी ला कर उसका चेहरा साफ कराया।

" अब ठीक हो मीनल तुम!!" मैंने पूछा तो उसने मुझे नज़रें उठा कर देखा. और मैं देखता ही रह गया, आज पता चला कि इसका नाम मीनल क्यों हैं।

उसकी आंखें बहुत बड़ी नहीं थी लेकिन बिल्कुक मछली जैसे शेप की थी उस पर घनी पलकें, कांच की तरह चमकती पुतलियां। मैं बहुत ध्यान से उसकी आँखों की डिटेल ले रहा था, वो बुरी तरह झेंप गयी और नीचे देखने लगी।

"तुम और इतनी चुप!! क्या हो गया आज समाज सेविका को" मैंने माहौल हल्का करने के लिए बत्तीसी दिखाई तो उसका ध्यान मेरे डिम्पल पे गया और वो ध्यान से उसे देखने लगी।

"अच्छा है ना!!" मैने उसे छेड़ा. पता नहीं क्यों उसे छेड़ने में मज़ा आने लगा था।

"क्या??" बड़ी देर बाद उसका मुंह खुला।

"यही जो तुम निहार रही हो, मेरा डिंपल" मैंने अपने डिंपल वाला हिस्सा उस के चेहरे के थोड़ा पास ले जा कर उसे दिखाते हुए पूछा।

लो!! वो फिर काँपने लगी।

"मैं कोई भूत हूँ?? नहीं ना. दिखने में भी अच्छा हूँ. " फिर भी मुझे देख कर कांप क्यों रही हो? ;हम्म बताओ तो!"

इस बार वो भी मुस्कुरा उठी. जब से उसे देखा है तब से पहली बार।

" गुड जॉब!! ऐसे ही हंसते रहना चाहिए. चलो अब बताओ क्या काम कर रही थी यहाँ. मैं हेल्प करता हूँ."

" नहीं मैं कर लुंगी. "

"सुनो मुझे न ये फ़ालतू के ड्रामे नहीं पसंद. मैं कर लुंगी, नो थैंक्स, मेरा काम है एंड आल" मैं चिढ़ के बोला तो वो अपनी भौहों को ऊपर कर के हैरानी से मुझे देखने लगी। इस बात पर मुझे हंसी आनी ही थी, तो उस का मुंह बन गया।

" चलो अब अच्छे बच्चे की तरह काम बताओ. "

हम दोनों मिल कर सब समान समेटने लगे और कुर्सी रखने लगे।
 
आगे की तरफ आ कर हमने रंगोली बनाने के लिए जगह साफ की , टैन्ट ठीक किया। मैं निकम्मा पहली बार काम कर रहा था वो भी सफाई का, बात तो जंगल की आग की तरह फैलनी ही थी।

" नीशू के पापा. आपके बेटे की तबियत तो ठीक है, वो काम कर रहा है वो भी सफाई का? हे भगवान इस की तबियत तो ठीक है ना" मम्मी मुझे खिड़की से देख कर चिल्लाई जैसे उन्हें कोई सदमा लग गया हो।

पापा भी भाग के खिड़की पे आये और मेरी हालत देख कर हंसे।

"सुनिए जी"

" बोलिये नीता बेबी"

"ये क्या हो रहा है. निशू मीनल के साथ काम करा रहा है, जब कि ऐसी लड़कियों को अपने पास फटकने भी नहीं देता"।

" मैं ख़ुश हूँ नीता!! और तुम?""

"मैं भी"

दोंनो खिड़की से मीनल और निशांत को देखते रहे।

कहानी आप को कैसी लगी अपने कमैंट्स से ज़रूर बताएं।

अगले भाग के लिए इंतेज़ार, करें
 
अब आगे

मुझे काम करने का कोई अनुभव नही था, जिस कारण मैं खुद से कुछ खास नहीं कर पा रहा था। मीनल भी इस चीज़ को समझ गयी और मुझे क्या कैसे करना है बताने लगी; अजीब सी शांति थी हमारे बीच जो मैं मिटाना चाहता था तो मैंने उस से पूछा " एक बात बताओ मीनल"

उस ने बिना मुझे देखे बोला "पूछिये"

" तुम्हारे ये गिरने गिराने का प्रोग्राम रोज़ चलता है या मेरे आने पे स्पेशल परफॉरमेंस चल रही है"।

उसने मुझे एक झलक देखा फिर अपने काम मे लग गयी, मैं सब काम छोड़ कर उसे देखता रहा ताकि मजबूरी में ही सही वो जवाब दे।

" आपको मेरा नाम कैसे पता??"उसने उल्टा मुझे से ही सवाल कर दिया। सच कहूँ तो मैं उसे उसके नाम के पीछे की कहानी नही बताना चाहता था। इस लिए बोला-

" नाम में क्या रखा है,बस पता चला गया जैसे तुम्हे मेरा पता होगा; इट्स नॉट आ बिग थिंग"

"मुझे आपका नाम नहीं पता" उसने मुझे देख कर सपाट शब्दों में कहा।

" ओह!! तो मेरा नाम जानना है" मैंने हंसते हुए कहा। उसने फिर एक नज़र मेरे डिम्पल पर डाली और नज़रें झुक ली, इस बार मुझे उस की ये सादगी छू गयी।

"मीनल मेरा नाम जानना चाहोगी" मैंने बहुत प्यार से उस से पूछा।

उस ने मुस्कुरा के मेरी तरफ देखा. " निशांत"।

" तुम्हे तो मेरा नाम पता है" मैंने हैरान हो के बोला.

उसने हल्की मुस्कुराहट के साथ अपनी भौहे ऊपर की और आंखों से मेरे घर की तरफ इशारा किया।

मैने देखा तो मम्मी के साथ बिल्कुल लिपी पुती सीमा मौसी खड़ी हो कर मुझे आवाज़ दे रही हैं।

"निशांत पुत्तर इतनी धूप में क्यों काम कर रहा है, हाय जिज्जी आपको बिल्कुल चिंता नहीं इसकी"।

कमाल है!! मुझे पहले क्यों नहीं सुनाई दी उनकी आवाज़; मैं बहरा हो रहा था क्या. मैं अपना सिर खुजाते हुए सोचने लगा।

" जाइये वर्ना आप धूप में झुलस जाएंगे " आज मीनल मेरे मज़े ले रही थी, अच्छी बात है सीख रही है लड़की।

" पहले तुम जाओ, काम हो चुका है यहां का अब" मै मौसी को हाथ से 2 मिनट में आने का इशारा करते हुए मीनल से बोला।

"लेकिन. "

"लेकिन वेकिंन कुछ नहीं, जल्दी जाओ" मै कड़क आवाज़ में बोला तो वो चुपचाप जाने लगी।

" मीनल? " मेरे आवाज़ देने पर वो पलटी;" आज अच्छे से तैयार हो कि आना" इतना कह के मैं घर चला गया।

लेकिन मुझे आभास था कि वो कुछ सेकंड रुक कर मुझे देखती रही थी, शायद मेरी बात पसंद न आयी हो।

सच कहूँ तो घर पे सीमा मौसी को देख के एक बार मुझे डर लग गया। ठीक है मेकअप करना बुरा नहीं, लेकिन ये क्या तरीका हुआ कि दीवाली की पुताई अपने चेहरे पर भी कर ले वो भी बिना मैचिंग के रंगों के6 Full stop उनके झाईं वाले गालों पर फाउंडेशन चीखें मार मार कर अपने होने का एहसास करा रहा था।

मज़रेदार बात तो ये है कि मौसी का अच्छा खासा पार्लर चलता है, क्या दुर्दशा करती होंगी ये अपने ग्राहकों की; सोच के मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

" अरे तू दरवाज़े पे खड़ा खड़ा क्या सोच रहा है ,मौसी को पैरी पौना कर।" मम्मी ने कहा।

" मैं;वो..मैं मौसी को देख रहा था, बहुत अच्छी लग रही हैं"।। इतना कह देना था मेरा के मम्मी ने मुझे आंखें दिखाई। और मौसी बोली " अब मज़ाक न कर पुत्तर. मुझे पता है सब, पार्लर चलाती हूँ मैं. "

पता है तो भूतनी बन कर क्यों डरा रही हैं, मेरे अंदर से आवाज़ आयी।

"नहीं मौसी ऐसा कुछ नही" मैने बत्तीसी दिखाई।

"अरे आज कल ट्रेनिंग दे रही हूँ न लड़कियों को, तो आज मेरे चेहरे पर ही किया सबने मेकअप. मुझे टाइम नही मिला फ़िर तो ऐसे ही आ गयी, अब आराम से चेहरा साफ कर लूँगी।

जैसे ही मैंने "टाइम नहीं मिला सुना" मीनल याद आ गयी और मैं मुस्कुरा उठा।

"बड़ा मुस्कुरा रहा है ,क्या बात है. बंगलोर में बहु खोज ली क्या" मौसी का उड़ता हुआ व्यंग आया।

मैं उनके पैर छू कर गाल खींचते हुए बोला " आप के जैसी कोई मिली ही नहीं मौसी. फिर कौन सी बहु" और वो हंसने लगी।

फिर हम सबने साथ खाना खाया, और खूब गप्पे मारी. मौसी को मैं अपने कमरे में लाया और उनका गिफ्ट दिया।

बातों बातों में मैंने मौसी से पूछा " मौसी बिना मेकअप भी कोई लड़की सुंदर दिख सकती है. "

"क्यों नहीं पुत्तर; लैह!! ये भी कोई कहने की बात है"

" अच्छा कैसे?"

" अपना थोड़ा ध्यान रख के"

"और जो न रख पाए वो. ?"

"उस के लिए मैं हूँ न. बिना मेकअप के भी सुंदर बना दूं;"

" ऐसे कैसे मौसी..ऐसा थोरे हो सकता है; "

"क्यों नहीं हो सकता;तू बता कोई कल तक काया कल्प न कर दूं तो कहना. "

"छोड़ो मौसी अब कहाँ से कोई लाऊ. " मैं मुँह बना के बोला, मैं चाहता था कि मौसी खुद से कोई नाम सुझाएँ;"यहाँ पे मैं किसको जनता ही हूँ और सब तो हमेशा मेकअप में ही रहती हैं. " मैंने अपने माथे पे हाथ रख के गहरी सोच में होने का पूरा नाटक किया।

" अरे तू उसी को बुला ले ना; क्या नाम था उसका. जो अभी बाहर, थी. "

" वो!!. याद नहीं मौसी शायद म से नाम था कोई. "

" मीनल? याद आया, जा बोल उसे फ़िर देख;"

"मौसी मैं ऐसे कैसे;क्या बोल रही हैं आप. उस के माँ बाप क्या कहेंगे!!" मैं शर्माते हुए बोला।

" उस बेचारी के माँ बाप नहीं पुत्तर" मौसी ने धीमी आवाज़ में उदास शब्दों में कहा।

"क्या!!" पता नहीं क्यों ये बात सुन कर मुझे सीने में चुभन सी महसूस हुई।

" चल छोड़ पुत्तर. मैं ही उसे बोलती हूँ, वो मानेगी नहीं. लेकिन इस बार मैं उसे तैयार कर के रहूंगी। बहुत प्यारी बच्ची है 6 Full stop"

" सो तो है. " मेरे मुँह से सहसा ये निकल पड़ा और मैं खुद पे ही आश्चर्य करने लगा।

"लेकिन भगवान ने ठीक नहीं किया उस के साथ. तेरे पापा का बस चले तो उसे गोद ले लें. मैंने कई बार जीजू की आंखों में उस के लिए आंसू देखे हैं"

मौसी की आवाज़ में अजीब सी मायूसी थी फ़िर एकदम से गुस्से में आ कर बोली " उस की दादी है ना; वो कमीनी!! वो उसे जीने नहीं देती"

अब मुझे समझ आया कि वो बूढ़ी औरत कौन थी, ज्यादा गली गलौज वाला मैं हूँ नहीं लेकिन जितनी भी आती थी वो सब दे डाली मैंने।

" आपको लगता है वो आपकी बात मानेगी मौसी. "

" नहीं पुत्तर बहुत खुद्दार है वो. ये सारे डेकोरेशन का काम मार्किट से लगभग आधी कीमत पर करती है. वो फ्री में करवाएगी नहीं और इस के लिए अपनी मेहनत की कमाई खर्च नहीं करेगी"

मुझे पता नहीं था लेकिन मेरी आँखें गीली हो चली थीं, मौसी ने देख लिया, " न पुत्तर ऐसे दिल छोटा नहीं करते. हम कुछ करेंगे न। वो मेरा माथा चूम के बोलीं।

कितना भाग्यशाली हूँ मैं जो ऐसे अभिभावक मिले जो इतने अच्छे से मुझे समझते हैं, मेरा साथ देते हैँ. और एक तरफ वो मीनल। कितना अंतर था हम दोनों की ज़िन्दगियों में;

" मौसी, एक काम करते हैं. आज शाम को एनाउंस करते हैं कि आपको अपने लिए मॉडल चाहिए, लड़कियों की ट्रेनिंग के लिए; जो चनयनित होगी उसे रुपये भी मिलेंगे इनकम के लिए ;शायद वो मान जाए"

" वो नहीं मानेगी; लेकिन वो आएगी" मौसी शांत हो कर बोली।

" मतलब??"

" मतलब ; उसकी वो नीच दादी भेजेगी उसे रुपयों के लालच में" इस बार मौसी मुस्कुरायी और मैं उनके गले लग गया।
 
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