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Thriller अलफाँसे

काफी देर वह खोदता रहा और आखिरकार उसकी छड़ एक नरकंकाल से जाकर टकराई। गेन्मार्ड ने देखा कि हड्यिों का एक ढांचा मिट्टी में दबा हुआ उसके समाने पड़ा हुआ था। उसका कुछ भाग उसे नजर आ रहा था।

विजय ने एकटक गेन्मार्ड को गड्ढे के अन्दर इस प्रकार घूरते देखा तो वह वहीं पेड़ के साथ टेक लगाये ही बोला-‘क्या बात है? क्या तुम्हें खजाने का रास्ता नजर आ गया है? मेरा मतलब है कि अन्दर किसी सुरंग में जाती हुई सीढ़ियां आ रही है क्या?’

‘यहां आओ।’ गेन्मार्ड उसे बुलाता हुआ बोला-‘मैंने तुम से कहा था यहां कुछ दबा हुआ है। आकर देखो कि मेरा विचार कितना ठीक था।’

‘लेकिन क्या दबा हुआ?’ विजय ने उसकी ओर बढ़ते हुए पूछा। फिर जब उसने गढ़े के अन्दर झांक कर देखा तो एकदम आश्चर्य से चौंक पड़ा- ‘हड्डी।’

‘हां, गेन्मार्ड फिर छड़ चलाता हुआ बोला-‘किस की है, यह तुम्हें अभी पता चला जाता है।’

कुछ देर बाद ही उस गढ़े में एक आदमी का लाश पड़ी हुई थी। लाश के कपड़े गल चुके थे और सारे शरीर में कीड़े रेंग रहे थे। उनमें से कई कीड़े गेन्मार्ड के शरीर पर भी चढ़ गए थे जिन्हें उसने हाथ से दूर झटक दिया। लाश के शरीर पर से कई स्थानों से मांस बिल्कुल गायब था और वहां केवल सफेद हड्डी चमक रही थी। लाश का रूप इतना बिगड़ चुका था कि पहचान पाना ही असंम्भव था।

‘यह किसकी लाश हो सकती है?’ विजय लाश को घूरता हुआ बोला।

‘मुझे क्या मालूम?’ गेन्मार्ड छड़ से लाश को पटकता हुआ बोला- ‘मुझे तो इस स्थान पर शक हुआ था और मैंने वह चीज तुम्हारे सामने निकाल कर रख दी जो कि यहां पर दबी हुई थी।

‘मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैंने यह कोठी खरीदी है अथवा भूत खाना।’ विजय अपनी गरदन को खुजाता हुआ बोला।

‘इतना तो निश्चित है कि यह हत्या का मामला है।’ गेन्मार्ड ने लाश को छड़ से पलट कर फिर सीधा करते हुए कहा।

‘यह तुम कैसे कह सकते हो?’

‘सीधी सी बात है।’ गेन्मार्ड अपने कपड़ों की चिन्ता किए बिना ही उस गड्ढे की दीवार से टेक लगाकर खड़ा होता हुआ बोला- ‘अगर यह आदमी अपनी मौत मरा होता तो या तो इसे जला दिया जाता अथवा किसी कब्रिस्तान में दफना दिया जाता। जहां तक मैं समझता हूं यह कब्रिस्तान नहीं है।’

विजय किसी गहन सोच में डूबा हुआ था। गेन्मार्ड का कथन उसे शत प्रतिशत ठीक लगा था। अवश्य ही किसी व्यक्ति ने इस आदमी की हत्या करके इसे यहां दबा दिया है। गेन्मार्ड की जासूसी ने उस पर सिक्का जमा लिया था। ऐसा आदमी अभी तक उसकी नजर से नहीं गुजरा था कि जो जमीन देखकर यह बता दे कि यहां कुछ दबा हुआ है।

फिर उसका दिल गेन्मार्ड के प्रति संदेह से भर गया। उसने संदिग्ध दृष्टि से उसकी ओर देखा। गेन्मार्ड ने उसी आंखों में छाये हुए संदेह को देखा और मन ही मन मुस्करा दिया।

‘इस प्रकार मेरी और क्या देख रहे हो?’

‘देख रहा हूं कि इस फ्राड से तुम्हारा मतलब क्या है?’

‘कैसा फ्राड?’

‘यह फ्राड ही तो है कि पहले तुमने एक आदमी की हत्या करके उसे यहां दबा दिया और अब मुझ पर अपनी जासूसी का रौब डालने के लिए तुमने इसे मेरे सामने ही खोद निकाला।’

‘यह क्या मूर्खता है?’ गेन्मार्ड बुरा सा मुंह बनाकर बोला।

‘यह मूर्खता नहीं।’

‘मूर्खता नहीं तो क्या है?’ गेन्मार्ड उसकी बात बीच में ही काटता हुआ बोला- ‘भला मैं तुम्हारे ऊपर अपना रौब किसलिए डालना चाहूंगा। क्या मैं चोर लफंगा हूं और तुम एक धनी व्यक्ति हो ताकि मैं तुम्हें अपने कब्जे में लेकर तुमसे धन एेंठ सकूं। अथवा तुम कोई बहुत बड़े सरकारी ऑफिसर हो जो मैं तुम से कोई सरकारी रहस्य प्राप्त कर सकूंगा। तुम हो क्या? तुम्हारी नौकरी क्या है?’

गेन्मार्ड कुछ इस प्रकार गर्म हुआ था कि विजय जैसे वाचाल व्यक्ति की भी एक बारगी तो बोलती बन्द हो गई। वह भौंचक्का सा खड़ा हुआ गेन्मार्ड का चेहरा देख रहा था जो कि बिल्कुल लाल हो गया था। क्रोध से या किसी और कारण से इसका अनुमान विजय नहीं लगा पाया था।

‘बड़े भाई इसमें क्रोधित होने की क्या बात है?’ विजय गेन्मार्ड को ठंडा करने की कोशिश करता हुआ बोला।

‘तुमने बात ही ऐसी की है।’ गेन्मार्ड गड्ढे से बाहर निकलता हुआ नथुने फुलाकर बोला- ‘आखिर तुमने मुझे समझा क्या है?’

‘वह तो मैंने ऐसे ही जरा मजाक में कह दिया था।’ विजय उसका कंधा थपथपाता हुआ बोला।

‘मैं मजाक पंसद करता हूं।’ गेन्मार्ड ठंडा होता हुआ बोला- ‘और मुझे हंसमुख चेहरे बहुत पसंद आते हैं। लेकिन इस प्रकार का वाहियात मजाक मुझे बिल्कुल पंसद नहीं है।’

विजय की समझ में गेन्मार्ड का यह रूप बिल्कुल भी नहीं आया था। वह गेन्मार्ड की ओर से संदिग्ध अवश्य हो उठा था लेकिन वह अभी उस पर कोई गलत हाथ नहीं डालना चाहता था।

‘तुमने उस लााश को खोद कर तो निकाल दिया है लेकिन अब इसका क्या करना है। यह तो बताओ।’ विजय बोला।

गेन्मार्ड गरदन को एक झटका देकर फिर गड्ढे में उतर गया और उस लाश का निरीक्षण करने लगा।

‘तुम तब तक इसका आंखों से पोस्ट मार्टम करो। मैं अभी आया।’- कहता हुआ विजय कोठी की ओर चल दिया। जब तक वह गेन्मार्ड की आंखों से दूर नहीं हो गया तब तक तो धीरे-धीरे चलता रहा। लेकिन उसकी आंखों से ओझल होते ही वह एक दम दौड़ता हुआ अपने फोन वाले कमरे में गया।

वहां से उसने अशरफ को फोन नम्बर डायल किये। सौभाग्य अशरफ घर पर ही मिल गया।

‘हलो इट इज अशरफ।’ दूसरी ओर से अशरफ का स्वर सुनाई दिया।

‘हलो अशरफ।’ विजय पवन के से भर्राये स्वर में बोला- ‘इट इज पवन स्पीकिंग।’

‘यस सर।’ ऐसा लगा जैसे वह सोते से चौंक गया हो।

‘विजय की कोठी पर पहुंचो।’ विजय ने पवन के भेष में संक्षिप्त शब्दों में आदेश दिया-‘वह जिस व्यक्ति को कोठी के द्वार तक छोड़ने आये उसका पीछा करो।’

‘ओके सर...।’

लेकिन विजय ने अशरफ के शब्दों की ओर ध्यान दिये बिना ही रिसीवर कैडिल में रखकर सम्बन्ध विच्छेद कर दिया और कमरे से बाहर निकल आया।

जिस समय वह गेन्मार्ड के पास पहुंचा तो गेन्मार्ड उसे लोहे की बनी हुई प्लेट दिखाता हुआ बोला-‘इसके पास तो केवल यही मिला है।’

‘यह क्या है?’ विजय उसके साथ से एक प्लेट को लेकर देखता हुआ बोला-‘लोहे की प्लेट बिल्कुल साफ थी और उसमें अभी जंग नहीं लगा था।’

प्लेट में काले रंग से हुक्म के इक्के का निशान बना हुआ था और उस निशान के बीच में एक बड़ा सा गोल घेरा था।
 
विजय उसे देखकर चौंक सा पड़ा। यह चीज उसे कुछ जानी पहचानी सी लगी। उसे ऐसा लगा जैसे उसने इसे पहले भी कहीं देखा है और फिर उसे याद आने में अधिक देर नहीं लगी कि कहां देखा है। उसे याद आया कि उसने एक ऐसी ही चीज कल उस आदमी के हाथ में देखी थी जिसने कि उसके कमरे के अन्दर आकर आत्महत्या की थी। यह दूसरी बात है कि वह लोहे की प्लेट न होकर ताश का एक पत्ता था और उसमें भी हुक्म के इक्के के निशान के बीच में एक गोल घेरा सा था।

‘क्या बात है?’ गेन्मार्ड जो कि विजय को ध्यानपूर्वक देख रहा था बोला- ‘तुम इसे देखकर इस प्रकार एकदम चौंक क्यों गये?’

‘कुछ नहीं।’ विजय बात को टालता हुआ बोला- ‘ऐसे ही मैं सोच रहा हूं कि कितने आश्चर्य की बात है कि लोहे की प्लेट पर ताश के पत्ते का चिन्ह बना हुआ है और उसके भी बीच में बड़ा सा गोल घेरा है।’

‘कोई आश्चर्य की बात नहीं है।’ गेन्मार्ड उसके चेहरे पर नजरें जमाते हुये बोला- ‘तुम अवश्य मुझसे कुछ छुपा रहे हो।’

‘नहीं तुम्हें भ्रम हुआ है।’

‘मिस्टर विजय, मैं जासूस हूं कोई लकड़हारा नहीं।’

न जाने क्या सोचकर विजय ने उसे वास्तविक बात बता दी-‘दरअसल मैं इसे देखकर इसलिए चौंका था। क्योंकि कल जिस आदमी ने मेरी कोठी के कमरे में आत्महत्या की थी उसके हाथ में एक ताश का पत्ता दबा हुआ था। वह भी हुक्म का इक्का ही था और उसके भी बीच में एक गोल सुराख हो रहा था।’

‘क्या तुम सच कह रहे हो?’

‘झूठ बोलने की मुझे बिल्कुल भी आदत नहीं है।’

‘तो तुम यह बात मुझसे छिपा क्यों रहे थे?’

‘सब कुछ तो तुम्हें बता दिया है और अब भी तुम कह रहे हो कि छिपा क्यों रहे थे?’

गेन्मार्ड फिर उस लोहे की प्लेट को ध्यान पूर्वक देखने लगा और फिर उसको अपने कपड़ों के अन्दर की ओर रखते हुए बोला-‘मुझे तो यह प्लेट ही रहस्यमय मालूम होती है। शायद ताश के पत्तों में ही इसका रहस्य मालूम हो जाये।’

‘रहस्य तो चाहे जहां मर्जी मालूम हो जाये।’ विजय बोला-‘लेकिन तुम इस प्लेट को तो मेरे हवाले कर दो।’

‘क्यों?’

‘मैं इसे पुलिस के हवाले करूंगा।’ विजय बोला-‘इस केस की पुलिस की ओर से तहकीकात हो रही है। इसलिए एक सज्जन नागरिक होने के नाते मेरा यह कर्तव्य हो जाता है कि मैं इस केस सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु पुलिस के हवाले कर दूं।’

‘ओह ठीक है।’ कहते हुए गेन्मार्ड ने बड़े आराम के साथ अपने कपड़ों के अन्दर से वह प्लेट निकाल कर विजय के हवाले कर दी और बोला-

‘अगर पुलिस के लिए बेकार साबित हो तो मुझे दे देना।’

‘अवश्य।’

‘अच्छा तो मैं चलता हूं।’ गेन्मार्ड छड़ को वहीं फेंकता हुआ बोला।

‘यह तो मैं भी जानता हूं कि तुम चलते हो।’ विजय बोला-‘लेकिन पहले तुम मेरे साथ चलोगे।’

‘कहाँ?’

‘मेरी कोठी के कमरे में और वहां से लंच लेकर जाओगे।’

‘लंच तो मैं होटल में ही करूंगा।’

‘होटल में तुम कुछ भी नहीं करोगे।’ विजय उसका हाथ पकड़ कर खींचता हुआ बोला-‘लंच मेरे साथ ही करोगे।’

गेन्मार्ड ने अधिक इन्कार नहीं किया जिसे स्वीकारोक्ति ही समझा जा सकता था। विजय ने उस लाश पर थोड़ी सी मिट्टी डाल कर उसे फिर दबा दिया और गेन्मार्ड के साथ कोठी की ओर वापिस चल दिया।

छड़ को कन्धे पर रखकर उसका चलने का ढंग ऐसा था जैसे नेपोलियन रूस से बुरी तरह पराजित होकर आ रहा हो।

कोठी में पहुंच कर दोनों ने गुसलखाने में हाथ मुंह धोये। गेन्मार्ड ने अपने कपड़ों पर ब्रुश भी किया। इसके पश्चात विजय ने एक लड़के को सामने वाले होटल में भेजकर खाना मंगवाया और बड़े प्रेम के साथ गेन्मार्ड को भोजन कराया। वह काफी देर तक गेन्मार्ड को बातों में लगाये रहा और जब उसे विश्वास हो गया कि अब तक अशरफ बाहर आ गया होगा तो वह गेन्मार्ड को कम्पाउण्ड के गेट तक विदा करने आया।

गेन्मार्ड का पीछा करते हुए अशरफ को उसने देख लिया था। इसलिये इस ओर से निश्चिंत होकर वह फिर कोठी की ओर वापिस चल दिया। वहाँ से उसने रघुनाथ को फोन किया। रघुनाथ के आने पर वह निकली हुई लाश उसके हवाले करके उसे वापिस भेज दिया और स्वयं उस लोहे की प्लेट को लेकर उसके सम्बन्ध में सोचने लगा।

वह उस कमरे में आ गया जो कि इन सारे रहस्यों का केन्द्र था और वह आकर उस रहस्य को सुलझाने की चेष्टा करता रहा। लेकिन असफल रहा परन्तु फिर भी एक चीज देख कर वह चौंक सा पड़ा। यूं तो वह कई बार इस कमरे में आया था और उसको देखा भी था लेकिन जो विशेषता उसे आज नजर आई थी वह पहले कभी नहीं आई थी।

वह थी चारों दीवारों पर आठ तस्वीरें बनी हुई थी। विजय ने अच्छी तरह हाथ फेर कर देख लिया था कि वे तस्वीरें बाद में नहीं जड़ी हुई थी बल्कि दीवार में ही बनी हुई थी।

विजय को वह तस्वीरें ही रहस्यमय नजर आईं। क्योंकि वह काफी बड़ी अवश्य थी लेकिन बनी हुई बिल्कुल इस प्रकार थीं जैसे ताश के पत्तों में बादशाह की तस्वीर बनी होती है। ताश के पत्तों में ऊपर और नीचे दोनों ओर एक जैसी शक्ल बनी होती है और इसमें केवल ऊपर की ओर ही बादशाह की शक्ल बनी हुई थी। सारी तस्वीरें एक ही जैसी थी और प्रत्येक दीवार में दो-दो बनी हुई थी। सारे कमरे में कुछ आठ तस्वीरें थीं और आठों एक जैसी बनी हुई थीं।

विजय काफी देर तक ताश के पत्तों और उन तस्वीरों का रहस्य सुलझाने की चेष्टा करता रहा लेकिन असफल रहा। शाम तक उसके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ा। शाम को ब्लैकब्वाय का फोन आया।

‘अशरफ ने मुझे रिपोर्ट दे दी है सर!’ ब्लैकब्वाय बोला।

‘क्या रिपोर्ट है?’

‘वह जिस आदमी का पीछा करता हुआ आपकी कोठी से गया था।’ ब्लैकब्वाय ने कहना आरम्भ किया-‘उस आदमी का नाम गेन्मार्ड है और वह फ्रांसीसी है। पेरिस पुलिस में इन्स्पेक्टर के पद पर काम करता है। आजकल छुट्टियों में भारत भ्रमण पर आया हुआ है। इस समय वह होटल विस्मार्क के रूम नम्बर 126 में ठहरा हुआ है।’

‘यह सब तो मुझे भी मालूम है।’ विजय बोला-‘उसके संबंध में और क्या मालूम कर सके हो मुझे यह बताओ?’

‘अशरफ ने मुझे इससे अधिक कुछ नहीं बताया है।’ ब्लैकब्वाय ने उत्तर दिया-‘उसने फोन पर ही मुझे सूचित कर दिया था कि उस व्यक्ति की गतिविधि जरा भी संदिग्ध नजर नहीं आई है।’

‘वह कितनी देर उस पर नजर रखे रहा था?’ विजय ने पूछा।

‘बस अभी-अभी उसका फोन आया है।’

‘यही तो मैं पूछ रहा हूं कि उसने फोन कहां से किया था?’

‘होटल विस्मार्क से।’

‘तो वह अभी तक वहीं है।’ विजय कुछ सोचता हुआ बोला-‘तुम विक्रम को इस होटल में भेज दो। अगर हो सके तो वहां पर एक कमरा किराये पर लेने की भी कोशिश करो। ताकि रात को उस पर नजर रखने में आसानी हो। कमरा उसके आसपास ही होना चाहिए।’

‘ओके सर।’

‘काम की रिपोर्ट मुझे तुरंत मिलनी चाहिये।’

‘ओके सर।’

फिर रात को ब्लैकब्वाय का फोन लगभग सात साढ़े सात बजे के करीब आया। जिसमें उसमें सूचना दी है कि विक्रम को होटल विस्मार्क में 130 नम्बर का कमरा मिल गया है और वह गेन्मार्ड पर नजर रखे हुए है।

(5)

एक बड़ा सा पत्थर आकर गेन्मार्ड के सिर के पिछले भाग से टकराया और वह एक हल्की सी आह के साथ अपने सिर को दबाकर रह गया।

‘क्या हुआ?’ विजय ने पूछा जो कि उसके साथ ही चल रहा था। लेकिन गेन्मार्ड ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह अपने सिर के पिछले भाग को दबाये रहा। ऐसा लगता था जैसे कुछ देर के लिए उसका मस्तिष्क सुन्न हो गया हो। उसने कस कर अपनी आंखें बन्द कर ली और चेहरे पर पीड़ा के भाव स्पष्ट देखे जा सकते थे।

‘कुछ तो बोलो।’ विजय उसकी ओर देखता हुआ बोला-‘तुम्हें हुआ क्या है?’

‘किसी ने मेरे सर में पत्थर मारा है।’ गेन्मार्ड उसी प्रकार अपना सिर दबाये हुए बोला।

‘अच्छा।’ विजय एकदम अपनी आंखें निकाल कर और नथने फुलाकर बोला-‘किस अशिष्ट का यह साहस हुआ है कि वह मेरे अतिथि के पत्थर मार सके।’

तभी विजय की दृष्टि जमीन पर पड़े हुए एक छोटे से पत्थर पर पड़ी जिसके इर्द-गिर्द एक कागज लिपटा हुआ था जो कि कुछ ढीला सा हो गया था। विजय ने झुक कर उस कागज को उठाया और देखने लगा। कागज हाथ से लिखा हुआ था और उसमें यह लिखा हुआ था।

प्रिय मित्र,

आज रात कुछ मेहमान आपकी कोठी के उसी कमरे में आने वाले हैं। कृपया उनका स्वागत का प्रबन्ध न करें। हो सके तो आप कोठी छोड़कर चले जायें अगर नहीं तो जो कुछ वह करें उनके काम में हस्तक्षेप न करें।

अलफांसे
 
विजय उस कागज को इस प्रकार घूरता रहा जैसे इस सबका मतलब उसी समझ में न आया हो। तब तक गेन्मार्ड के सिर की पीड़ा भी काफी हद तक ठीक हो चुकी थी। विजय को कुछ पढ़ता देखकर वह बोला-‘यह कागज कैसा है?’

‘कागज तो वैसे बहुत अच्छा है।’ विजय ने कागज उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा-‘लेकिन मुझे इसमें से विद्रोह की बू आ रही है।’

गेन्मार्ड ने कुछ नहीं कहा। उसने खामोशी से उस कागज को देखा और फिर विजय की ओर नजरें उठा कर बोला-‘यह क्या हिन्दी में लिखा हुआ है?’

‘तो तुम क्या इसे फ्रांसीसी समझ रहे हो?’

‘नहीं।’ गेन्मार्ड उसकी बात पर कोई ध्यान दिए बिना ही बोला-‘मैं तो हिन्दी जानता ही नहीं हूं। तुम मुझे इसका इंग्लिश में अनुवाद करके बताओ कि इसमें क्या लिखा है?’

विजय ने उसे इंग्लिश में उसका अनुवाद करके सुनाया। गेन्मार्ड ने एक जासूस की सी गम्भीरता के साथ उसे सुना और फिर बोला-‘मैंने तो इसका नाम पहली बार ही सुना है, सुना भी नहीं पढ़ा है।’

‘लेकिन इसके लिखने के ढंग से तो ऐसा ही मालूम होता है जैसे इसके नाम में ही बहुत प्रभाव है।’

‘लेकिन इसका अर्थ क्या है?’ विजय ने बिल्कुल किसी साधारण व्यक्ति की भांति कहा- ‘हमें इस पत्र को पुलिस के हवाले कर देना चाहिए।’

‘नहीं, ऐसी मूर्खता भूलकर भी नहीं कर बैठना।’

‘क्यों?’

‘क्योंकि इस प्रकार हम इस मामले को सुलझाने से वंचित रह जायेंगे।’

‘लेकिन इन मामलों को सुलझाना हमारा काम नहीं बल्कि पुलिस का काम है।’ विजय ने कहा। वह बातों में गेन्मार्ड के दिल की तह लेना चाहता था। यद्यपि गेन्मार्ड के संबंध में उसे कुछ भी मालूम नहीं हुआ था। लेकिन फिर भी वह उसकी ओर से संदिग्ध था। क्यों? इसका उत्तर स्वयं उसके पास भी नहीं था।

गेन्मार्ड ने अपनी तरफ से किसी प्रकार समझा बुझा कर उसे पुलिस में सूचना देने से रोक ही लिया। विजय वैसे भी पुलिस में सूचना नहीं देता। उसने सोचा कि जब अपराधी स्वयं ही जाल में फंस रहा है तो क्या बुराई है।

लेकिन फिर भी वह आने वाले अज्ञात अतिथियों का स्वागत करने की तैयारी करना चाहता था। किसी न किसी प्रकार वह अपने सीक्रेट सर्विस के स्टाफ को बुलाकर अपनी कोठी के चारों ओर फैला लेना चाहता था। ताकि आने वाले फिर भाग कर न जा सकें। लेकिन गेन्मार्ड ने उसे इस बात का बिल्कुल भी अवसर नहीं दिया। उसने एक क्षण के लिए भी विजय का साथ नहीं छोड़ा। लाख प्रयत्न के बावजूद भी विजय इतना समय न निकाल सका कि ब्लैकब्वाय को ही फोन करके समस्त स्थिति से अवगत कर दे।

लेकिन वह ऐसा न कर सका। गेन्मार्ड सारा दिन उसके साथ लगा रहा और वह कोठी में घूम घूम कर विजय को समझाता रहा कि जब वे अज्ञात अतिथि आयेंगे तो वह फलाँ स्थान पर हुआ हुआ सब कुछ देखता रहे, उस समय गेन्मार्ड जो कुछ भी करे वह उसके बीच में दखल देने की चेष्टा न करे।

विजय किसी मूर्ख व्यक्ति की भाँति गेन्मार्ड की हर बात पर गरदन हिलाता रहा। उसने गेन्मार्ड को पूरा आश्वासन दिया कि वह गेन्मार्ड की इच्छानुसार ही काम करेगा। और फिर उस समय विजय की बांछे खिल कई जब शाम को रघुनाथ भी उसकी कोठी पर आ गया।

‘बड़ी लम्बी आयु है तुम्हारी।’ विजय उसे देखते हुए बोला-‘यह दूसरी बात है कि तुम इतने लम्बे नहीं हो।’

‘यह क्या बात हुई?’

‘कोई बात नहीं हुई लेकिन तुम आये बड़े मौके से।’

‘क्या तुम मेरी दावत कर रहे हो?’

‘नहीं तुम्हें संसार के महान गुप्तचर से मिला रहा हूं।’ विजय किसी नाटक के सूत्रधार की भांति बोला-‘आप मेरे मित्र मिस्टर गेन्मार्ड इंस्पेक्टर ऑफ पेरिस पुलिस, और आप हैं मेरे मित्र मिस्टर रघुनाथ सुपरिन्टेन्डेन्ट ऑफ राजनगर पुलिस। मुझे अपना परिचय देने की तो आवश्यकता ही नहीं है।’

गेन्मार्ड और रघुनाथ ने आपस में हाथ मिलाये फिर गेन्मार्ड ने रघुनाथ को बताया कि किस कारण से उसका और विजय का परिचय हुआ। उसके साथ ही उसने उसे यह भी बता दिया कि आज रात को विजय की कोठी में कुछ गुल खिलने वाला है।

रात का खाना कुछ जल्दी ही खाकर वह तीनों आठ बजे के लगभग उसी कमरे के बराबर कमरे में बैठ गये जो कि इन सारे रहस्यों की जड़ था। उस कमरे का एक दरवाजा दूसरे कमरे में भी खुलता था दरवाजा खोल दिया गया था और उसमें एक पर्दा डाल दिया गया था। कमरे की बत्ती बुझी हुई थी। वैसे उस रहस्यमय कमरे की बत्ती जली हुई थी।

‘तुम इस कागज से क्या समझे हो?’ बातचीत जारी रखने के लिए विजय से पूछा।

‘कुछ भी नहीं।’

‘तुमने आज सुबह ही कहा था न कि तुम्हें इस कागज से विद्रोह की बू आ रही है।’ गेन्मार्ड बोला-‘मैंने तुम्हारी इन बातों का मतलब निकालने का बहुत प्रयास किया लेकिन असफल रहा।’

‘असफल तो रहते ही।’ विजय अजीब सा मुंह बनाकर बोला-‘अरे भाई मेरे हमारी बातों का मतलब तो बड़े बड़े दार्शनिक भी नहीं समझ सके हैं। फिर भला तुम कैसे समझ सकते हो। वैसे तुम्हारे सामान्य ज्ञान की वृद्धि के लिये मैं तुम्हें बता दूं कि मैंने ठीक ही कहा था।’

‘तुम्हें उसमें से विद्रोह की बू कैसे नजर आई थी?’

‘दरअसल होता यह है कि अगर तुम पुराने समय की फिल्में देखो तो तुम्हें एक सी कहानी नजर आयेगी।’ विजय ने उसे समझाया-‘वह कहानी है कि एक राजा होगा जिसके एक लड़की होनी आवश्यक है। उसके साथ ही एक मंत्री होगा जो कि हर प्रकार का बदमाश होगा। वह राजा के नाम पर जुल्म ढायेगा। अधिक अत्याचार के कारण प्रजा बहुत अधिक भयभीत हो जायेगी लेकिन फिर भी प्रजा के अंदर से एक बहादुर युवक, जिसका इतना सुन्दर होना आवश्यक है कि वह राजकुमारी से विवाह योग्य हो, उठेगा वह जानता है कि इस अत्याचार में राजा का कोई हाथ नहीं है और वह मंत्री को तंग करना आरम्भ कर देगा। मंत्री को धमकी भरे पत्र भेजे जायेंगे। भेजने का तरीका यही होगा कि किसी पत्थर के गिर्द कागज लपेट कर अंदर फेंक दिया हो या किसी छुरे की नोंक में फंसा कर फेंक दिया और वह छुरा सीधा मंत्री के निकट से चलता हुआ सामने पत्थर की मजबूत दीवार में जाकर धंस जायेगा। पहली बात तो यह है कि उस छुरे को यह अधिकार नहीं होगा कि वह दीवार में धंसने की बजाय मंत्री की पीठ या छाती में ही धंस जाये। दूसरे यह कि उस छुरे को पत्थर की इस मजबूत दीवार में घुसना ही पड़ेगा। यह दूसरी बात है कि उस दीवार से गोली टकारा कर दूर छिटक जाये। लेकिन उस छुरे को तो दीवार में घुसना ही पड़ेगा।’

‘इन्हीं सब तथ्यों और वास्तविकताओं का एक ही क्षण में गहन अध्ययन और विचारपूर्ण मनन करने के उपरांत मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि इस कागज से विद्राह की बू आ रही है।’ विजय बोला।

‘मैं आपसे सहमत हूँ।’ रघुनाथ गेन्मार्ड से बोला।

‘वो किसी ने कहा है ना।’ विजय अपने आप ही बोला-‘तो बिल्कुल ठीक कहा है।’

‘किसने क्या कहा है?’

‘किसने कहा है यह नहीं मालूम लेकिन क्या कहा है यह मालूम है।’ विजय बोला-‘कहा है कि संसार में मूर्खों की संख्या अधिक है।’

‘लेकिन किसी ने यह भी तो कहा है कि बहुमत ही शक्ति है।’

विजय कुछ कहने ही जा रहा था कि उन्हें कदमों की आहट सुनाई दी और गेन्मार्ड ने विजय के मुंह पर हाथ रखकर उसे खामोश रहने का संकेत किया। विजय खामोश हो गया।

कदमों की आहट दूर से निकट होती आई और फिर उन तीनों ने एक व्यक्ति को उस तस्वीरों वाले कमरे में प्रविष्ट होते हुए देखा विजय और रघुनाथ दोनों ही उस आदमी को पहचान गये थे। यह जयसिंह था। शहर का प्रमुख उद्योगपति वह अकेला ही था और सिगरेट केस लेकर इस प्रकार टहल रहा था जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रहा हो। उसकी दृष्टि बार बार एक तस्वीर पर जाकर अटक जाती थी। यह उन आठ तस्वीरों में से ही एक थी जिस पर उसकी नजरें अटकी हुई थीं।

जयसिंह को आये अभी कुछ ही मिनट हुये थे कि तभी उन्हें फिर कदमों की आहट सुनाई दी और कुछ क्षण बाद ही एक और व्यक्ति ने कमरे में प्रवेश किया विजय और रघुनाथ के लिए यह व्यक्ति अपरिचित था। लेकिन फिर भी उस व्यक्ति का चेहरा विजय को कुछ परिचित सा लगा था। वैसे वह व्यक्ति और कोई नहीं चंदन था। शायद विजय को उसका चेहरा इसलिए परिचित लगा हो कि उसके ही भाई ने उसकी कोठी के इसी कमरे में आत्महत्या की थी और दोनों भाईयों की सूरत एक दूसरे से काफी मिलती थी।

दोनों ने एक दूसरे को भयंकर प्रतिद्वन्दियों की भांति घूरा और जयसिंह गुर्राये हुए से स्वर में बोला-‘तुम क्या चाहते हो?’

‘जो कुछ तुम चाहते हो उसके बदले में रुपया।’ चंदन ने भी शुष्क स्वर में उत्तर दिय।

‘क्या दोनों चीजें तुम्हारे पास हैं?’

‘हैं।’ चंदन जयसिंह को खूंखार नजरों से देखता हुआ-‘लेकिन अगर इस बार फिर तुमने मुझ पर हमला करने की कोशिश की तो मैं सच कहता हूं जयसिंह तुम्हें जान से मार दूंगा।’

‘तुम मुझे रौब देना चाहते हो।’

गेन्मार्ड ने संकेत से विजय और रघुनाथ को खामोश रहने के लिए कहा और फिर जेब से अपना रिवाल्वर निकाल कर परदे से बाहर निकल आया। रिवाल्वर का रुख उन दोनों की ओर ही था।

एक तीसरे व्यक्ति की उपस्थिति से वे दोनों ही चौंक पड़े और उसकी ओर देखते हुए दोनों ने एक साथ कहा-‘कौन हो तुम?’

‘तुम क्या कह रहे हो मैं नहीं समझता।’ गेन्मार्ड ने इंग्लिश में बोला-‘लेकिन फिलहाल तुम दोनों अपने हाथ ऊपर उठा लो।’

चंदन और जयसिंह दोनों ही ने अपने हाथ ऊपर उठा लिये।
 
‘अब तुम दोनों मुझे यह बताओ कि तुम आपस में किसलिए लड़ रहे हो?’ गेन्मार्ड ने उन दोनों को बारी बारी से देखते हुए कहा।

‘तुम्हें इससे मतलब?’

‘मतलब केवल इतना है कि मुझे इस प्रकार के लड़ाई झगड़े बिल्कुल पंसद नहीं हैं।’ गेन्मार्ड बोला-‘मैं चाहता हूं कि अगर तुम दोनों के बीच में किसी प्रकार का कोई झगड़ा है भी तो उसे प्रेम पूर्वक सुलझा लेना चाहिये। तुम मुझे बताओ कि झगड़ा क्या है? मैं उसे सुलझा देता हूं।’

विजय और रघुनाथ बड़े ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे। रघुनाथ विजय के कंधे पर हाथ रखकर उससे संकेत में ही पूछा-‘यह क्या नाटक हो रहा है।’

लेकिन विजय ने उसे संकेत से ही खामोश बैठने के लिए कहा पर्दे के दूसरी ओर हो रहे इस अजीब नाटक को देखने में व्यस्त हो गया।

शायद जयसिंह और चंदन दोनों ही गेन्मार्ड को पंच बनाने के लिये सहमत हो गये थे। क्योंकि उन्होंने उसके सन्मुख अपनी शिकायतें रखनी आरम्भ कर दी थीं। गेन्मार्ड किसी जज की भांति भाव मुद्रा बनाये बड़ी गम्भीरता के साथ उनकी शिकायतें सुनता रहा। जब सब कुछ सुन चुका तो वह बोला-‘बस इतनी सी बात है।’

जयसिंह और चंदन केवल गरदन हिला कर रह गये।

‘वह प्रेम पत्र क्या तुम्हारे पास है?’ गेन्मार्ड ने चंदन से पूछा।

‘हाँ।’ चंदन ने गरदन हिलाकर कहा।

‘लाओ मुझे दो।’

चंदन ने बिना कोई विरोध किए ही वह पत्रों का पैकेट गेन्मार्ड के हवाले कर दिया। अब गेन्मार्ड ने जयसिंह को सम्बोधित करते हुए कहा-‘तुम मुझे तीस हजार रुपये दो।’

‘क्यों?’ जयसिंह ने प्रश्न किया।

‘जब तुमने मुझे पंच बना लिया है तो तुम्हें क्यों और क्या कहने का अधिकार नहीं है।’

जयसिंह ने भी खामोशी के साथ अपने कोट के अंदर से सौ-सौ के नोटों की तीन गड्डियां निकालकर गेन्मार्ड के हवाले कर दी। गेन्मार्ड ने दोनों चीजें कमरे में पड़ी हुई एक मेज पर रख दी और उन पर हाथ टेक कर खड़ा हो गया। इसके पश्चात वह चंदन से बोला-‘उस आविष्कार का फार्मूला कहां है?’

‘यहीं है।’

‘वह भी निकाल लो।’

चंदन ने खामोशी से उसकी आज्ञा का पालन किया। उसने अपनी जेब से एक लोहे की प्लेट निकाली। यह उस प्लेट से काफी मिलती जुलती थी जिसे कल गेन्मार्ड और विजय ने खुदाई करके उस अज्ञात व्यक्ति से बरामद किया था।

पर्दे के पीछे बैठा हुआ विजय भी इस नाटक को देख रहा था और उसने उस प्लेट को भी पहचान लिया था। पर्दा पड़ा होने के कारण वह अच्छी प्रकार से उस प्लेट को नहीं देख सकता था। लेकिन उसके बीच में हो रहे सूराख से वह उसे पहचान सका था। लेकिन वह विश्वासपूर्वक नहीं कह सकता था कि यह वही प्लेट है। न जाने क्या सोचकर वह खामोश बैठा रहा और जो कुछ हो रहा था उसे देखता रहा।

चंदन उस प्लेट को लेकर दीवारों पर बनी हुई उन बादशाहों की तस्वीर में से एक के पास गया। बादशाह की छाती पर वह प्लेट रखकर वह कुछ देर तक उसे सैट करता रहा। फिर उसने प्लेट के बीच में बने हुए सुराख में उसने अपनी उंगली रखकर उसे जोर से दबाया। उसके दबाते ही तस्वीर का सिर किसी ढकने की भांति आगे की ओर को झुक आया। उस झुके हुए सिर के पीछे एक खाना सा बना हुआ था। चंदन ने उस खाने में हाथ डालकर न जाने क्या किया उसके बाद उसने हाथ से उस तस्वीर के झुके हुए सिर को ऊपर उठा दिया। तस्वीर फिर अपनी पूर्वावस्था में आ गई। अब कोई उस तस्वीर के ऊपर हाथ फेर कर भी यह नहीं बता सकता था कि सिर के पीछे भी कोई खाना होगा।

अपनी प्लेट को सम्हालता हुआ चंदन अगली तस्वीर की छाती पर उस प्लेट को जमाने लगा। वह बड़ी सावधानी से किसी खास स्थान पर उस प्लेट को जमा रहा था। इसके पश्चात उसने एक प्लेट के बीच में गोल घेरे के अन्दर अपनी उंगली रखकर दबाया और दूसरी तस्वीर का सिर भी आगे की और झुक गया। चंदन ने फिर उस तस्वीर के पीछे निकले हुए खाने के अन्दर हाथ डालकर न जाने क्या किया।

यही क्रिया उसने बाकी की तस्वीरों के साथ भी की। जब अन्तिम तस्वीर के अन्दर भी उसने हाथ डाल दिया और उसके ऐसा करते ही एक दीवार के नीचे एक कोने में एक छोटा सा खाना निकल आया। चंदन ने उस खाने में हाथ डालकर एक छोटा सा चमड़े का बैग निकाला। बैग निकालकर उसने तस्वीर के पीछे खाने में हाथ डाल दिया। दीवार के कोने में निकला हुआ वह खाना बंद हो गया। फिर उसने उस तस्वीर की गरदन को ऊपर उठा कर बंद कर दिया।

गेन्मार्ड और जयसिंह के साथ साथ विजय और रघुनाथ भी यह दृश्य देखकर आश्चर्य चकित रह गये थे। विजय की खोपड़ी तो हवा में चक्कर काट रही थी लेकिन फिर भी वह इस उलझे हुए नाटक का अन्तिम दृश्य देखने के लिए खामोश बैठा हुआ था।

‘क्या यही है वह?’ गेन्मार्ड ने उससे उस चमड़े के बैग की ओर संकेत करते हुए पूछा।

‘हाँ।’

‘इसे मुझे दो।’

चंदन ने वह बैग भी उसकी ओर बढ़ा दिया। पर्दे के पीछे बैठा हुआ विजय सोच रहा था कि ऐसा इस जासूस में क्या प्रभाव है जो इस प्रकार दो व्यक्ति उसके लिए अनजान होते हुए भी इसके हाथ में इतने कीमती रहस्य और रुपये दिये चले जा रहे हैं।’

‘अच्छा मिस्टर जयसिंह।’ गेन्मार्ड जयसिंह से बोला-‘तुम इस आविष्कार के बदले मुझे सत्तर हजार रुपये दो।’

‘लेकिन...’, जयसिंह ने कुछ कहना चाहा परंतु गेन्मार्ड उसे जल्दी से बीच में ही टोकता हुआ बोला- ‘पंच की बात में बोलना उचित नहीं है। जल्दी करो।’

जयसिंह अपने कोट के अंदर के खाने से कुछ गड्डियाँ निकालकर कुछ कोट की बाहर जेब से निकाल कर उसे सौ-सौ की सात गड्डियाँ निकाल कर दीं। गेन्मार्ड ने नोटों की गड्डी लेकर उन्हें हाथ से फरफराया। जैसे देख रहा हो कि सब नोट ही हैं कहीं बीच में कागज तो नहीं भरे हैं।

उन नोटों को फरफराने में ही गेन्मार्ड ने ऐसी सफाई दिखाई कि समस्त गड्डियाँ उसकी जेब में पहुंच गई। जयसिंह और चंदन अभी उसकी इस सफाई पर आश्चर्य चकित ही थे कि उसने जयसिंह की ओर प्रेम पत्रों का पैकेट बढ़ाते हुए कहा-‘यह लो मिस्टर जयसिंह अपनी प्रिय पत्नी के प्रेम पत्र।’
 
जयसिंह ने खामोशी से वह प्रेम पत्र ले लिये। लेकिन वह कुछ संदिग्ध सा हो गया था। वह संदिग्ध दृष्टि से गेन्मार्ड को घूर रहा था। कुछ ऐसी ही हालत चंदन की भी थी।

‘अच्छा मित्रें विदा।’ गेन्मार्ड रिवाल्वर अपनी जेब में रखता हुआ बोला-‘मिस्टर जयसिंह मैं आपकी एक लाख रुú के में रूप में दी गई आर्थिक सहायता का दिल से धन्यवाद करता हूं। मिस्टर चंदन तुम तुम व्यर्थ में ही अपनी टांग अड़ा रहे थे इसलिए मैं तुम्हारे साथ यही दया बरत रहा हूं कि तुम्हारी टाँग में सबूत छोड़ रहा हूं।’ फिर गेन्मार्ड पर्दे की ओर मुंह करके बोला-‘पर्दे के पीछे छिपे हुए मिस्टर मैं तुमसे भी विदा लेता हूं। वैसे तुम दोनों की जानकारी के लिए मैं इतना बता दूं कि मेरा नाम गेन्मार्ड नहीं बल्कि अलफांसे है और मेरा वास्तविक काम भी तुमने देख लिया है।’

‘लेकिन बेटा लूमड़।’ कहते हुए विजय पर्दे के पीछे से निकल कर बाहर आ गया-‘तुमने अभी मेरा काम तो देखा नहीं है।’

‘तुम्हारी सहायता के लिए मैं तुम्हारा धन्यवाद दे चुका हूं।’ अलफांसे हिंदी में बोला।

‘लेकिन बेटा लूमड़ यह जो माल तुम ले जा रहे हो इसे कौन देगा?’ विजय बोला-‘क्या तुम्हारा बाप?’

‘तुम्हें इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये।’ कहता हुआ अलफांसे बाहर की ओर भाग लिया।

‘कमीना धोखेबाज।’ जयसिंह मारे क्रोध और उत्तेजना के साथ बोला। लेकिन चंदन खामोश रहा।

अलफांसे आगे भाग जा रहा था और उसके पीछे विजय भी भाग रहा था। उसे पुकारता हुआ-‘अबे ओ बेटा लूमड़...ओ बे ओ लूमड़।’ लेकिन अलफांसे भागता ही चला गया।

कम्पाउंड के बाहर ही फुटपाथ के साथ एक कार खड़ी हुई थी। अलफांसे भागता हुआ उसके अंदर बैठ गया। उसके अंदर बैठते ही विजय फुर्ती के साथ गैरेज की ओर गया गैरेज से कार निकालने में उसने काफी फुर्ती दिखाई लेकिन फिर भी वह कार उसकी आंखों से ओझल हो ही गई।

एक अनुमान के अनुसार अपनी को उसने सड़क पर दौड़ा दिया। कुछ देर बाद ही उसे एक कार नजर आई। वह विश्वास के साथ नहीं कह सकता था कि यह वही कार है लेकिन फिर भी यह कार उसे संदिग्ध सी लगी वह ड्राईवर का मुख देखने के लिए उसके निकट से गुजरने की चेष्टा करने लगा। परन्तु अगली कार के ड्राईवर ने उसे आगे नहीं निकलने दिया।

अगली कार यूं ही बाहर की सड़कों पर चक्कर लगाने के बाद शहर के बाहर की ओर चल दी। उसके यूं ही चक्कर काटने से विजय को विश्वास हो गया कि यह वही कार है जिसमें कि अलफांसे बैठकर भागा था।

इस समय कारें आगे पीछे शहर की बाहरी सड़क पर दौड़ रही थीं। वह शहर से कुछ अधिक दूरी पर नहीं आये थे कि विजय को पिछली सीट पर से एक आवाज सुनाई दी।

‘बस दोस्त।’ पिछली सीट से आवाज आई-‘मुझे यहीं पर उतरना है।’

विजय की खोपड़ी चकरा कर रह गई। कार की पिछली सीट पर कोई हो भी सकता है। इसके सम्बन्ध में उसने सोचा भी नहीं था। कार की अंदर की बत्ती जलाकर उसने पीछे की ओर मुड़कर देखा तो चौंक पड़ा।

पीछे और कोई नहीं बल्कि अलफांसे बैठा हुआ मुस्करा रहा था।

‘तुम,’ विजय ने आश्चर्यमय दृष्टि से उसकी ओर देखते हुए कार रोक दी।

‘हाँ, मैं।’ अलफांसे शांत स्वर में बोला-‘दरअसल मुझे तुम्हारे संसर्ग से अधिक आनन्द मिलता है। इसलिए मैंने सोचा कि विदा होते समय भी तुम्हारे साथ अगर मेरा संसर्ग रहे तो क्या बुराई है।’

‘कोई बुराई नहीं है प्यारे लूमड़।’ विजय कार से नीचे उतरता हुआ बोला-‘लेकिन तुम मुझे यह तो बताओ कि तुम इस कार में कैसे पैदा हो गये।’

‘बड़ी आसान सी बात है।’ अलफांसे भी नीचे उतरता हुआ बोला-‘मुझे पहले ही मालूम था कि बाद में क्या होना है। मुझे मालूम था कि तुम मेरा पीछा करोगे इसलिए मैंने पहले ही एक आदमी को वहां खड़ा कर दिया था। जैसे ही मैं भागकर आया तो तुम भी मेरे पीछे भागे चले आये। मेरा संकेत मिलते ही उसने भागना आरम्भ कर दिया। मैं अपने स्थान पर ही रुक कर रह गया। उस आदमी को भागता देखकर तुम यही समझे कि मैं भाग रहा हूं। उसे कार में बैठता देखकर तुम भी कार लेने के लिए गैरेज की ओर दौड़े। कार को गैरेज में से निकालकर जिस समय तुम गैरेज का दरवाजा बन्द कर रहे थे। बस उसी समय मैं कार में बैठ गया था। वैसे तुम बहुत मूर्ख हो?’

‘तुमने क्या नई बात की है।’ विजय बोला-‘यह तो सारा जमाना जानता है।’

‘जब तुम एक अपराधी का पीछा कर रहे हो उस समय तुम्हें गैरेज के दरवाजे को बन्द या खुले होने की चिन्ता नहीं करनी चाहिये बल्कि अपराधी का पीछा करना चाहिये था।’

‘अबे बेटा लूमड़।’ विजय गरदन हिलाकर बोला-‘सब चलती की बातें हैं। दरवाजे बन्द रहें या खुले। लेकिन तुम तो मेरे हाथ में आ गये हो।’

‘लेकिन तुम मेरा करोगे क्या?’

‘भिंडी के अचार में चटनी लगाकर नमक के साथ तुम्हें ममी बना दूंगा।’

‘अधिक बोलने से बुद्धिमान व्यक्ति भी मूर्ख बन जाता है।’

‘कुछ भी होने दो।’ विजय लापरवाही से हाथ को झटका देकर बोला, ‘लेकिन अब तुम मुझे यह बताओ कि तुम मेरे साथ यूं ही चलना पसन्द करोगे या मैं तुम्हारी मरम्मत करके तुम्हारे हाथ पैर बाँधकर ले चलूं।’

‘कोई और मौका होता तो शायद मैं चलता।’ अलफांसे बोला-‘लेकिन इस समय मैं एक बहुत आवश्यक काम से जा रहा हूं।’

‘अच्छा।’ विजय ने एक उदास सांस के साथ कहा-‘यह बात है, तो जाओ लूमड़ भाई। जाओ, मैं तुम्हें रोकूंगा नहीं।’

कहने के साथ ही विजय ने उस पर छलाँग लगा दी। लेकिन अलफांसे बड़ी सफाई से एक ओर को हटता हुआ बोला-‘बुरी बात है। शरीफ आदमियों को इस प्रकार के काम शोभा नहीं देते।’

विजय झोंक में जाकर खाली जमीन पर गिरा लेकिन फिर वह तुरंत ही फुर्ती के साथ उठ खड़ा हुआ। उठते ही उसने अलफांसे पर छलांग नहीं लगाई। बल्कि वह खड़ा हुआ उसे इस प्रकार घूरता रहा जैसे उसकी शक्ति मापने का प्रयत्न कर रहा हो।

वह अपने जीवन में बड़े बड़े अपराधियों से टकराया था। यहां तक कि उसने विश्व के भयानकतम अपराधी सिंगही को भी थका दिया था। लेकिन यहाँ मामला दूसरा ही था। उसके सामने बिल्कुल एक उभरता हुआ अपराधी। उसे उभरता हुआ उपराधी कहना ही अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि इससे पहले विजय ने कभी अलफांसे का नाम नहीं सुना था, छकाये चला जा रहा था।

‘तुम जाओ।’ विजय बड़ी सज्जनता से बोला।

‘पीछे से हमला तो नहीं करोगे?’

‘अच्छा।’ अलफांसे ने विदा होने के लिए उससे हाथ मिलाया। विजय को सुनहरी मौका मिला। उसने उसके हाथ को इतनी जोर का झटका दिया कि अलफांसे मुंह के बल जमीन की ओर गिरता चला गया। उसके गिरते ही विजय ने उसे दबोचने के लिए उस पर छलाँग लगा दी।

लेकिन अलफांसे इस बार भी डाज दे गया। विजय के उस तक पहुँचने से पहले ही अलफांसे ने अपनी जगह से छलांग लगाई और सड़क के नीचे ढलान पर अन्धकार में जाकर न जाने कहां गुम हो गया।

फिर विजय उसे वहां अंधकार में काफी देर तक टटोलता रहा लेकिन अलफांसे का कहीं पता नहीं चला। यह उसके लिए एक प्रकार की चुनौती सी थी कि एक साधारण सा ठग उसके हाथ में आकर इतने निकट से बच निकले।

विजय के पास इस चुनौती को स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं था।
 
(6)

रघुनाथ, जयसिंह और चंदन को सम्हाले बैठा था। उसकी समझ में ही नहीं आया कि वह उनके साथ क्या करे। विजय पहुंचा तो उसने उससे भी यही प्रश्न किया-‘अब इनका क्या किया जाये?’

‘फिलहाल तुम इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते और इन्हें छोड़ दो।’ विजय जल्दी से बोला। उसने बड़ी मुश्किल से रघुनाथ को वहाँ से टाला। उनके तीनों के वहाँ से जाते ही उसने जल्दी से ब्लैकब्वाय को फोन किया-‘समस्त स्टाफ को फौरन सारे शहर में फैला दो। उनसे कहो कि वे शहर का चप्पा चप्पा छान मारे और अलफांसे नामक बदमाश को तलाश करें।’

‘लेकिन सर।’ ब्लैकब्वाय जरा हिचकिचाते हुए बोला-‘उसका हुलिया क्या है?’

विजय ने जल्दी जल्दी उसका हुलिया बताया और फिर बोला-‘अगर न समझ सके हो तो मेरी कोठी पर आकर हुलिया देख जाओ। तथा समस्त सदस्यों को भी यहीं बुला लो।’

विजय कुछ इतनी जल्दी में बोला था कि ब्लैकब्वाय के लिए उसका मतलब समझना भी मुश्किल हो गया था लेकिन फिर भी वह विजय के सामने बोलने में असमर्थ था इसलिए केवल गरदन हिलाकर यही कह सका-‘ओके सर।’

फोन रखते ही विजय ने अलमारी से एक पैसिंल और कागज निकाला और अपनी एक और प्रतिभा से काम लेना आरम्भ किया। लगभग आधा घन्टे में ही उसने गेन्मार्ड उर्फ अलफांसे की शक्ल का फ्रंट पोज बना दिया था।

कुछ देर बाद ही ब्लैकब्वाय आया और उसने कहा-‘इसकी शक्ल को अच्छी तरह दिमाग में रख लो और रेलवे प्लेट फार्म पर नजर रखो।’

इसी प्रकार विजय ने आशा और नाहर को भी वह तस्वीर दिखाई और शहर में भेज दिया। अशरफ और विक्रम को तस्वीर दिखाने की आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि उन्होंने पहले ही उसकी शक्ल देखी हुई थी।

सीक्रेट सर्विस का समस्त स्टाफ चीफ समेत हरकत में आ चुका था। लेकिन बाद में विजय ने एक फेर कर दिया। रेलवे प्लेट फार्म पर वह स्वयं पहुंच गया और ब्लैकब्वाय को वापिस गुप्त भवन भेज दिया ताकि वह वहां पर आने वाली रिपोर्ट की सूचना विजय को पहुंचाता रहे।

बन्दरगाह की निगरानी अशरफ कर रहा था। उसने रात बन्दरगाह पर ही गुजारी लेकिन कोई भी संदिग्ध व्यक्ति उसे नजर नहीं आया। सुबह ही ब्लैकब्वाय ने पवन के रूप में उसको वहां से वापिस आने का आदेश दिया ताकि वह कुछ घन्टे सो ले। उसके स्थान पर नाहर को बंदरगाह की ड्यूटी सौंपी गई थी।

सोने की पश्चात अशरफ फिर अपने स्थान पर पहुंच गया। उसे कोई भी संदिग्ध व्यक्ति नजर नहीं आया। वह वहाँ खड़ा हुआ बोर हो रहा था। कभी-कभी इधर उधर भी घूम लेता था कि तभी एक आदमी उसके निकट आकर रुका।

यह विजय था।

‘चीफ ने कहा है।’ विजय ने उसके हाथ में एक लिफाफा और सूटकेस देखकर कहा कि तुम अभी जो जहाज पानी के द्वारा अमरीका जा रहा है उसमें सवार होकर चले जाओ। बॉस को सन्देह है कि अलफांसे इसी जहाज पर सफर कर रहा है। किस रूप में यह अभी तक नहीं मालूम हो सका है। लेकिन तुम्हें जहाज के सब आदमियों पर नजर रखनी होगी।’

‘आखिर यह अलफांसे है क्या बला?’ अशरफ ने उससे वह चीजें लेते हुए कहा।

‘यह तो मुझे नहीं मालूम है। लेकिन मैंने सुना है कि कोई ठग है।’

‘एक ठग के लिए इतनी दौड़ धूप?’

‘तो क्या ठग के लिए दौड़ छाँव कर दी जायें?’ विजय बोला-‘जल्दी करो, जहाज जाने वाला है।’

अशरफ वहाँ से चल दिया। उसके समस्त कागजात और रुपये उसी पैकेट में थे। उसका टिकट प्रथम श्रेणी का था। उसके जहाज पर पहुंचने के लगभग एक घन्टे बाद ही जहाज चल दिया था।

आज पांचवां दिन था। अशरफ अलफांसे के सम्बन्ध में काफी छानबीन कर रहा था लेकिन फिर भी कुछ नहीं मालूम कर सका था। यद्यपि वह जहाज के हर आदमी की निगरानी कर रहा था।

छठे दिन उसे लासल्की फोन पर पवन की ओर से सूचना मिली-‘विश्वस्त सूत्रें से पता चला है कि प्रसिद्ध ठग अलफांसे इसी जहाज से सफर कर रहा है और उसका नाम...नजर रखो।’

जहाँ अलफांसे का नकली नाम आया था वहीं फोन में कुछ गड़बड़ी सी हो गई थी और अशरफ नाम को पूरी तरह से नहीं सुन सका था। उसके पास ही ऑपरेटर भी खड़ा हुआ था जोकि एक निहायत ही मूर्ख और डफर आदमी था।

जैसे ही उसने ठग का नाम सुना वह इस बुरी तरह से चिल्लाया जैसे कोई ठग नहीं बल्कि नरभक्षी जानवर जहाज में आ गया हो। कुछ देर में ही सारे जहाज में यह सूचना फैल गई कि जहाज पर कोई खरतनाक ठग भी है जिन व्यक्तियों के पास कीमती सामान था वह इस सूचना से वास्तव में भयभीत हो गये थे और इस सूचना के साथ ही उस मूर्ख और उल्लू ऑपरेटर ने यह खबर भी फैला दी कि अशरफ एक जासूस है।

शाम को जब वह डेक पर घूम रहा था तो एक आदमी उसके पास आया। वह बड़ी घबराई हुई हालत में था।

‘मैंने सुना है कि आप एक जासूस हैं।’ उस व्यक्ति ने अपनी ऐनक उतार कर कपड़े से उसके शीशे पोंछते हुए कहा।

‘आपने गलत सुना है।’ अशरफ लापरवाही से बोला।

‘तो क्या यह भी गलत है कि जहाज में कोई ठग भी सफर कर रहा है।’

अशरफ ने कुछ उत्तर नहीं दिया बल्कि रेलिंग पर अपनी कुहनियां टेके हुए उसे घूरने लगा-‘आप चाहते क्या हैं?’

‘मैं आपको पाँच सौ रुपये दूंगा।’ वह व्यक्ति बोला।

‘किस खुशी में?’

‘मेरे पास पचास हजार रुपये की कीमत के हीरे हैं।’ वह व्यक्ति दबे स्वर में बोला-‘न जाने क्यों मैं उस ठग की उपस्थिति से भयभीत हो गया हूं। अगर आप अमेरिका तक उन हीरों की रक्षा करें तो आपको पांच सौ रुपये दूंगा।’

‘मैं कोई जासूस नहीं हूं।’

‘लेकिन सब लोग तो आपको जासूस बता रहे हैं।’ वह व्यक्ति उलझन भरे स्वर में बोला।

‘सब लोगों को गलतफहमी हो गई है।’ अशरफ ने लापरवाही से कहा और रेलिंग पर झुक गया।

‘ओह।’ याचनापूर्ण दृज्टि से वह व्यक्ति उसकी ओर देखता हुआ वहां से चल दिया।

अशरफ शाम तक यों ही घूमता रहा। लेकिन उसकी नजर जहाज में उपस्थिति योरोपियन को बड़ी बारीकी से देख रही थीं। क्योंकि अलफांसे एक योरोपियन था। उसकी चमड़ी गोरी थी। उन आदमियों में एक का नाम राजर्स था और अशरफ की दृष्टि उसी पर लगी हुई थी। राजर्स ही उसको कुछ संदिग्ध नजर आया था।

‘हैलो।’ रात को खाने के लिए हॉल जाते हुए उसकी राजर्स से भेंट हुई। राजर्स ने ही उसे पुकारा

‘हैलो।’ अशरफ ने हल्के से मुस्करा कर कहा।

‘यह क्या अफवाह जहाज पर फैली हुई है?’ राजर्स ने मुस्कराकर उससे कहा-‘अलफांसे जहाज पर है।’

‘यह सब इन जहाज के कर्मचारियों की कृपा है?’

‘वह कैसे?’

‘ऑपरेटर ने ही इस अफवाह को उड़ाया है और वही जाने कि इसमें कहां तक सच्चाई है।’

‘क्या आपको बाहर से कोई सन्देश प्राप्त नहीं हुआ?’

‘प्रश्न ही नहीं उठता।’ अशरफ मेज पर बैठते हुए बोला-‘मैं क्या कोई जासूस हूं जो मुझे इस प्रकार की सूचनायें मिलेंगी।’

‘बकता था... मूर्ख कहीं का...,’ अशरफ बुरा सा मुंह बनाकर बोला-‘आप ही सोचिए मिस्टर राजर्स मैं एक व्यापारी हूँ और पीतल के सामान का सौदा करने के लिए अमेरिका जा रहा हूं। मुझे जासूसी से क्या लगाव हो सकता है।’

‘कुछ नहीं।’ राजर्स गरदन हिलाकर बोला-‘अगर कोई ठग जहाज पर है भी तो वह जहाज पर कर क्या सकता है। अगर उसने जरा भी कोई चीज चुराई तो इतने बड़े जहाज पर तलाशी के समय उसका बचना जरा असम्भव सा है।’

‘आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं।’

खाना खाने के बाद दोनों जने एक साथ थियेटर देखने के लिए गये। रात के साढ़े ग्यारह बजे थियेटर समाप्त हुआ और वह दोनों हाथ मिलाकर अपने-अपने कमरे की ओर चल दिये।

अशरफ ने अपने कमरे में पहुचंकर कपड़े बदले और लेट गया। लेकिन अभी उसे कठिनाई से लेटे एक डेढ़ घन्टा हुआ होगा कि एक जबर्दस्त चीख सुनाई दी। चीख बहुत ही दिलद्रावक थी।

अशरफ एकदम चौंक कर उठ बैठा। वह तुरन्त कमरे से बाहर निकल आया और स्लीपिंग सूट पहने हुए ही कमरे से बाहर निकल आया। उस चीख को सुनकर वह अकेला ही नहीं बल्कि कई और व्यक्ति भी उठ आये थे।

‘क्या हुआ?’ वह लोग आपस में एक-दूसरे से पूछने लगे-‘यह चीख कैसी थी।’

‘पता नहीं लेकिन थी बहुत भयानक।’

‘परन्तु यह आई किस ओर से है।’

‘मेरे विचार में इधर से आई है।’

और सब लोग उधर ही चल दिये। अशरफ भी उनमें सम्मिलित था कुछ देर बाद ही दस पन्द्रह आदमियों की यह सेना एक कमरे के सामने जाकर रुक गई। कमरे के किवाड़ चौपट पड़े हुए थे और एक आदमी कमरे के फर्श पर औंधा पड़ा हुआ था। एक छुरा उसकी बांह में फंसा हुआ था। देखने पर ऐसा लग रहा था जैसे वह मर चुका हो।
 
एक आदमी दौड़कर कैप्टेन को बुला लाया भीड़ को चीरता हुआ कैप्टेन अन्दर कमरे में प्रविष्ट हो गया। दो चार आदमी उसके साथ ही थे जो कि अन्दर प्रविष्ट हो गये थे। उनमें अशरफ भी सम्मिलित था।

कैप्टेन ने उस व्यक्ति को हिलाया और उसकी गरदन लुढ़क कर रह गई। अशरफ ने उसे पहचान लिया। यह वही व्यक्ति था जिसने कि आज शाम को ही अपने कुछ हीरों की हिफाजत के लिए उसकी सहायता मांगी थी।

छुरा उसकी बांह के आर पार हो गया था। व्ह व्यक्ति लम्बी-लम्बी सांसें ले रहा था। जिसका मतलब था कि वह जीवित है परन्तु उसका शरीर इस प्रकार निर्जीव सा था मानो वह मर गया हो।

‘मिस्टर राजेश्वर... मिस्टर राजेश्वर।’ कैप्टेन उसकी गरदन को अपनी गोद में लेकर हिलाते हुए बोला-‘पानी लाओ... आप लोग मेहरबानी करके पीछे हट जायें और खुली हवा आने दें। मेहरबानी करके पीछे हट जाइए।’

सब लोग एक गोल घेरे की सी शक्ल में पीछे हट गये।

कैप्टेन राजेश्वर के सिर को अपनी गोद में लिए ही बैठा रहा। कभी कभी वह हाथ से उसके मुख पर इस प्रकार हवा करता था मानो मक्खियाँ हटा रहा हो। उसने राजेश्वर की बाँह में धंसे हुये छुरे को बाहर निकाल कर रख दिया और उसके घाव पर तुरन्त ही अपने रेशमी रूमाल की पट्टी बांध दी।

जहाज का एक कर्मचारी पानी ले आया। कैप्टेन ने पानी के कुछ छींटे उसके मुंह पर मारे।

कराहते हुये राजेश्वर ने अपनी आंखे खोल दीं। चेहरे पर भय के भाव लिए हुए वह गरदन को इधर उधर घुमाकर अपनी पलकें इस प्रकार झपकाता रहा जैसे उसे सब कुछ धुंधला सा नजर आ रहा हो और वह यह पहचानने की चेष्टा कर रहा हो कि वह कहां है? किन लोगों के बीच में है?

‘वह गया...?’ राजेश्वर ने अपने सूखे होठों पर जीभ फेरते हुए बड़ी ही मरी हुई आवाज में पूछा।

‘कौन था... मिस्टर राजेश्वर आप बताइये कि वह कौन था?’

‘ओह कैप्टेन तुम... नहीं... नहीं... मैं नहीं जानता कि वह कौन था?’

राजेश्वर दुखी स्वर में बोला-‘उसने मुझ पर छुरे से वार किया।’

‘चिंता की कोई बात नहीं है।’ कैप्टेन उसे सांत्वना देता हुआ बोला, ‘छुरा केवल बांह में ही लगा है। कोई घातक घाव नहीं हुआ है। लेकिन वह कौन था...उसने उस पर छुरे से वार क्यों किया था।’

‘मैं सो रहा था कैप्टेन...मैं सो रहा था अपने कमरे में...,’ राजेश्वर उठकर बैठता हुआ बोला। उसकी हालत अब पहले से काफी सम्हली हुई थी-‘मैं किसी खटके को सुनकर तुरन्त उठ बैठा! तो क्या देखता हूं कि एक आदमी मेरे कमरे की तलाशी ले रहा है। मैने उससे पूछा कि वह कौन है? उसने कोई उत्तर नहीं दिया बल्कि खामोशी से मेरे ट्रंक की तलाशी लेता रहा। मैं उठकर जैसे ही उसकी ओर बढ़ा कि तभी उसने छुरे से मेरे ऊपर आक्रमण कर दिया। मैंने अन्धकार में ही उसका छुरा ऊपर से देख लिया था और अपने आपको बचाने के लिए तुरन्त पलट पड़ा। लेकिन फिर भी न बच सका और उसका छुरा मेरी बांह में घुसता चला गया। उसके पश्चात मुझे नहीं मालूम कि क्या हुआ। अब मैं आप लोगों को देख रहा हूं।’

कैप्टेन उसकी यह कहानी सुनकर चकरा गया लेकिन बाकी सुनने वाले लोगों पर इसका बड़ा भयंकर प्रभाव पड़ा। विशेषकर उन लोगों पर जिनके पास कि कुछ कीमती सामान था। कहने की आवश्यकता नहीं कि लोगों ने अपने मस्तिष्क में ही इसका सम्बन्ध उस ठग अलफांसे से जोड़ लिया था जिस के जहाज पर होने की खबर आज दिन में ही दावानल की भांति फैल चुकी थी।

कुछ लोग ठग नाम से ही भयभीत हो रहे थे। लेकिन उसका कारनामा देखकर तो वह घबरा ही उठे।

राजेश्वर की दृष्टि अपने निकट बैठे हुए कैप्टेन के पीछे खड़े हुए अशरफ पर पड़ी और वह उसको सम्बोधित करते हुए बोला-‘यह सब आपके कारण हुआ है।’

‘मेरे कारण?’ अशरफ चौंका-‘कहीं तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है।’

‘नहीं मैं बिलकुल ठीक कह रहा हूं।’ राजेश्वर दुखी स्वर में बोला-‘अगर तुम मेरी सहायता करते तो यह घटना कभी न घटती।’

‘लेकिन मिस्टर राजेश्वर।’ कैप्टेन ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा-‘आप पहले अपना सामान तो चैक कर लीजिये कि कोई चीज चोरी गई या नहीं।’

‘चोरी न जाने का प्रश्न ही नहीं उठता।’ राजेश्वर थके से स्वर में उठता हुआ बोला-‘वह यहाँ चोरी करने ही आया था। कोई इसका विरोध नहीं कर सका है फिर भला वह उन हीरों को यहां क्या छोड़ने वाला था जिन्हें कि वह चुराने ही आया था।’

‘फिर भी देख लीजिए। शायद वह आपकी चीख के कारण न चुरा पाया हो।’ कैप्टेन बोला।

‘व्यर्थ में वह स्थान खाली देख कर मेरे दिल को दुख ही होगा।’ कहता हुआ राजेश्वर उठा और उस ट्रंक की ओर बढ़ गया जिसका सामान पहले ही काफी बाहर बिखरा हुआ था। राजेश्वर ने उसे टटोला और फिर धम्म से उसके निकट ही बैठ गया और सिर पर हाथ रख कर इस प्रकार गमगीन हो गया जैसे बाप मर गया हो।

‘क्या हुआ?’

‘होना क्या था? वही हुआ जिसकी होने की आशा थी। वह सुअर का बच्चा सारे हीरे अपने साथ ले गया है।’ अपनी आंखों में आने वाले आंसुओं को किसी प्रकार रोकने की चेष्टा करता हुआ राजेश्वर बोला।

कैप्टेन के सामने एक विकट समस्या थी। इतने बड़े जहाज पर वह राजेश्वर के हीरों की चोरी का पता कैसे लगाता। जहाज पर कई सभ्रांत व्यक्ति थे। वह उनकी तलाशी नहीं ले सकता था।

लेकिन फिर भी अगले रोग सुबह उसने जहाज के हाल में एक विशाल सभा का आयोजन किया। समस्त व्यक्तियों के वहाँ आ जाने पर उसने कहा-

‘उपस्थित सज्जनों एवं देवियों। एक बहुत ही दुखद घटना इस जहाज पर घट गई है। वह है मिस्टर राजेश्वर के लगभग पचास हजार रुपये के हीरों की चोरी हो जाने की घटना।’

कुछ क्षण के लिए कैप्टेन रुका। उसने एक नजर उपस्थित जन सभा पर डाली और फिर बोला- ‘यह वास्तव में एक बहुत ही क्लेशदायक घटना है। हम सब इस जहाज पर एक विशाल परिवार के रूप में रह रहे हैं। कुछ दिनों के लिए ही सही लेकिन हम सब इस परिवार के सदस्य हैं। इसलिए हम में से प्रत्येक का कर्तव्य हो जाता है कि वह अपने पारिवारिकजन को किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचाये। मैं कोई कुशल वक्ता नहीं हूं बिल्कुल आप जैसा इसलिए मैं सीधी एवं स्पष्ट बात कह देता हूं कि चोर जो कोई भी है हम में से ही है। हो सकता है कि मेरी बातें किसी व्याख्यानाचार्य की भांति आपको प्राभावित न कर पा रही हो। लेकिन आप मेरी बातों के मर्म को समझने की चेष्टा करें।
 
नादानी इन्सान से ही हुआ करती है लेकिन इन्सान ही अपनी नादानी का प्रायश्चित भी करते हैं। जिस किसी ने भी, विशेष रूप से प्रसिद्ध ठग अलफांसे को सम्बोधित कर रहा हूं, क्योंकि वह भी इसी जहाज से सफर कर रहा है और मेरा समस्त शक उस पर ही है, मिस्टर राजेश्वर के हीरे चुराये है। मैं उससे हाथ जोड़कर विनती करता हूं कि वह उन्हें आज रात को उसी प्रकार वापिस कर दे, जिस प्रकार चुराये हैं। इसके साथ ही मैं उसे यह विश्वास भी दिलाता हूं कि यह केस पुलिस के हवाले नहीं करूंगा। मैं आशा करता हूं कि हीरे वापिस पहुंच जायेंगे।’

इतना कहकर कैप्टेन ने अपना व्याख्यान समाप्त कर दिया।

अशरफ को कैप्टेन का व्याख्यान इतना घटिया और लचर लगा था कि उसे सुनते सुनते वह बुरी तरह से बोर हो गया था। उसे शक था कि अलफांसे जैसा ठग और चोर उसकी बातों से प्रभावित होकर हीरे वापिस कर देगा।

‘आपका क्या ख्याल है कैप्टेन साहब की स्पीच के सम्बन्ध मैं?’

राजर्स जो कि वहीं खड़ा हुआ सुन रहा था अशरफ के निकट आता हुआ बोला।

‘कोई विशेष अच्छा ख्याल तो नहीं है।’ अशरफ मुस्करा कर बोला। लेकिन उसका मस्तिष्क राजर्स के सम्बन्ध में ही सोच रहा था। आखिर यह व्यक्ति यह जानने के बाद कि वह जासूस है उससे इतनी दिलच्पी क्यों लेने लगा है। अशरफ ने भी उससे उखड़ने की चेष्टा न की। लेकिन फिर भी वह उससे शंकित हो उठा था।

दिन भर दोनों लगभग शान्त रहे। लोगों में अलफांसे चर्चा का विषय बना हुआ था। लेकिन फिर भी जहाज पर हो रहे कार्यक्रम में कोई विशेष प्रकार का अन्तर नहीं आया था।

रात भर अशरफ जहाज में इधर उधर घूमता रहा। वह विशेषकर राजेश्वर के कमरे में आस पास था लेकिन एक चौकीदार की भांति चक्कर सब जगह लगा रहा था। उसे अलफांसे द्वारा हीरे वापिस किये जाने की आशा तो बिल्कुल भी नहीं थी लेकिन यह देखने के लिए कि आज की रात अलफांसे क्या कर रहा है वह वहां चक्कर लगा रहा था। क्योंकि उसे विश्वास था कि अलफांसे रात में कोई न कोई कारगुजारी अवश्य करेगा।

लेकिन कोई विशेष घटना नहीं हुई। सुबह की सफेदी चारों ओर फैलती देखकर अशरफ अपने कमरे की आरे सोने के लिए चल दिया। अब उसका यही प्रोग्राम हो गया था। वह दिन में लगभग सोता रहता था और रात को जाग कर अलफांसे की किसी भी कारगुजारी की प्रतीक्षा करता था।

एक महीने से ऊपर गुजर गया लेकिन अशरफ के कार्यकलाप में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। न जाने क्या चीज थी जो उसके दिल में यह विश्वास जमाये हुए थी कि अलफांसे शान्त न बैठेगा और वह कोई न कोई गुल अवश्य खिलायेगा।

इन दिनों में इसकी और राजर्स की मित्रता काफी गहरी हो गई थी। लोग राजेश्वर के हीरों की चोरी की घटना को भूल से चुके थे। लेकिन राजेश्वर पर उन पचास हजार के लागत की हीरों की चोरी का ऐसा प्रभाव पड़ा था कि उसने अपने कमरे से निकलना ही छोड़ दिया था। वह जब कभी अशरफ से मिलता था तो शिकवे भरे स्वर में केवल यही कहता था। बस तुम्हारे कारण मेरे हीरे चोरी हो गये हैं। अगर तुम उनकी हिफाजत करने को तैयार हो जाते तो शायद चोरी न जाते।

‘आप कुछ गलती पर हैं मिस्टर राजेश्वर।’ अशरफ उसे जवाब देता था, ‘आप स्वयं सोचिये कि जब मालिक ही अपनी चीज की हिफाजत न कर सका तो किराये के नौकर किस प्रकार उसे बचा सकते थे। साथ ही अभी तक आपकी यह गलतफहमी दूर नहीं हुई है कि मैं एक जासूस नहीं बल्कि साधारण यात्री हूं और अमेरिका घूमने जा रहा हूं।’

राजेश्वर के पास उसकी इस बात का कोई उत्तर नहीं था।

सदा की भांति आज भी अशरफ रात को पहरेदारी कर रहा था। जो काम उसने दिया गया था वह एक उबा देने वाला काम था। उसे करने के लिए काफी धैर्य की आवश्यकता थी। उसके इस कार्य से पता चलता था कि समय आने पर उसमें धैर्य की कमी नहीं होती।

रात अन्धेरी थी और सागर की लहरों पर जहाज धीरे-धीरे डोलता हुआ आगे बढ़ रहा था। रात आधी से अधिक उतर चुकी थी लेकिन अशरफ डेक पर टहल रहा था। अभी अभी वह कमरों के आस पास से ही चक्कर लगा कर वापिस आया था कि वह यकायक चौंक पड़ा।

वह जल्दी से सीढ़ियां उतर कर कमरे की ओर दौड़ा। अन्धेरे में उसने किसी छाया को दौड़ते हुए देखा। वह तेजी से उसकी ओर लपका। यकायक उसने देखा कि वह छाया किसी चीज से टकराकर लुढ़क गई है। अशरफ ने एक ही छलाँग लगाई कि वह सीधा उसके ऊपर ही जाकर गिरा।

एक दर्द भरी चीख उसके शिकार के मुंह से निकल गई। अशरफ दबोचे हुए बोला- ‘बहुत दिनों के बाद हाथ आये हो बेटा। खामोशी से अपने आप को मेरे हवाले कर दो अन्यथा...,’

बाकी के शब्द अशरफ ने जानबूझकर नहीं कहे।

‘कौन हो तुम...,’ उसके नीचे दबा हुआ व्यक्ति बोला-‘मुझे जल्दी छोड़ो। वह निकल कर भाग जायेगा।’

‘कौन भाग जायेगा?’

‘वही चोर?’

‘और तुम कौन हाे?’

‘मैं... मैं... राजर्स हूं... मिस्टर अशरफ क्या आपने मुझे पहचाना नहीं?’

‘पहचान चुका हूं और बहुत अच्छी तरह पहचान चुका हूं कि तुम राजर्स ही हो लेकिन उसके साथ ही तुम चोर यानि अलफांसे भी हो।’ अशरफ उसके ऊपर से उठता हुआ बोला।

राजर्स की चीख सुनकर आस पास के कुछ कमरों के दरवाजे खुल गये थे। कई कमरों की बत्तियाँ जल उठी थीं और दरवाजे खुल जाने के कारण प्रकाश सीधा उस पर आकर पड़ा था।

‘क्या बात है... यह क्या हो रहा है। कुछ लोगों ने उन्हें एक दूसरे से अलग करते हुए कहा।

‘ओह कुछ नहीं। अशरफ के बोलने से पहले ही राजर्स बोल उठा- ‘मैं और मिस्टर अशरफ डेक पर घूमने के लिए जा रहे थे कि तभी मैंने मिसेज बाटली-वाला के कमरे से किसी आदमी को निकलते देखा। हम दोनों को देखते ही वह आदमी वहाँ से भाग खड़ा हुआ। हम उसके पीछे दौड़े कि झोंक में आकर मैं लुढ़क गया था। मेरे पीछे मिस्टर अशरफ दौड़ रहे थे। वह भी सीधे मेरे ऊपर आकर गिरा। गिरने के कारण मेरे मुंह से चीख निकल गई। क्यों मिस्टर अशरफ ऐसे ही हुआ था न?’

अन्तिम शब्द उसने अशरफ को सम्बोधित करते हुए कहे और अशरफ ने भी गरदन हिलाकर कहा- ‘यह मिस्टर राजर्स आप बिल्कुल सही कह रहे हैं।’

‘लेकिन वह था कौन जिसे आपने मिसेज बाटली-वाला के कमरे में से निकलते देखा था।’ एक ने पूछा।

‘पता नहीं।’ राजर्स ने उत्तर दिया-‘एक तो अन्धेरा ही था दूसरे उसने अपने चेहरे पर नकाब सी डाल रखी थी।’

‘लेकिन मिसेज बाटली-वाला है कहाँ?’

‘मुझे नहीं मालूम शायद अपने कमरे में ही हो।’

‘मेरे ख्याल से मिस्टर राजर्स अब हमें मिसेज बाटली-वाला की खबर लेने चाहिए।’ अशरफ ने राजर्स को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘कहीं वह ठग अलफांसे चोर के साथ साथ खूनी भी न बन गया हो।’

‘आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं।’ राजर्स बोला। और इससे पहले ही कि वहाँ खड़े हुए लोग उनसे कुछ और प्रश्न करते राजर्स और अशरफ मिसेज बाटली-वाला के कमरे की ओर बढ़ चुके थे।
 
मिसेज बाटली-वाला के कमरे में जाकर उन्होंने देखा कि दरवाजा खुला हुआ है और अन्दर अन्धकार छाया हुआ है।

‘मिसेज बाटली-वाला?’ अशरफ ने खुले हुए दरवाजे को थपथपाकर पुकारा अन्दर से कोई उत्तर नहीं मिला।

अशरफ ने फिर दोबारा थपथपाया। उसके साथ ही अन्दर बत्ती जल गई और मिसेज बाटली-वाला अपने अर्धनग्न शरीर को एक चादर से ढक कर उठती हुई आश्चर्य से उसकी ओर देखती रही।

‘क्या बात है?’ वह इतने सारे आदमियों को अपने कमरे के दरवाजे के सामने देखकर कुछ बौखला सी गई थी।

‘क्या आप बिल्कुल ठीक हैं?’ अशरफ उसकी ओर देखता हुआ बोला।

‘हाँ,’ मिसेज बाटली-वाला चकित स्वर में बोली-‘क्यों क्या बात है?’

‘हमने एक आदमी को आपके कमरे में से निकलते देखा है।’ राजर्स बोला-‘मेरा ख्याल है कि वह जरूर वही ठग और चोर अलफांसे होगा। आप अपना सामान देखिये। कोई चीज चोरी तो नहीं गई है?’

‘नहीं तो।’ मिसेज बाटली-वाला ने अपने सामान को देखते हुए कहा सामान में से कुछ भी अपने स्थान से हिला हुआ उसे नजर नहीं आया था।’

‘ऐसा कभी नहीं हो सकता।’ राजर्स अपने शब्दों पर पूरा जोर देता हुआ बोला- ‘आप अपने कीमती सामान को चैक कीजिए।’

मिसेज बाटली-वाला ने अपने तकिये को पलट दिया फिर एक गहरी चीख उसके गले से निकल गई। वह कार्ड को हाथ में पकड़े हुए विस्फारित नेत्रें से देखती रह गई।

‘क्या हो गया?’ कहते हुए राजर्स और अशरफ कमरे में प्रविष्ट हो गए। मिसेज बाटल्ी-वाला के हाथ में पकड़े हुए कार्ड को उन्होंने भी देखा वह एक सफेद कार्ड था जिस पर पैंसिल से इंग्लिश में अलफांसे लिखा हुआ था।

‘देखा मैं कह रहा था न।’ राजर्स अशरफ को सम्बोधित करते हुए बोला-‘कि वह अलफांसे ही है। यह मैडल आपकी क्या चीज चोरी चली गई है?’

‘म... म्म... म... मेरी... अंगूठी... हीरे... की...।’ मिसेज बाटली-वाला उखड़े हुए स्वर में बोली। उसका चेहरा पीला पड़ गया था और सारा शरीर पत्ते की भाँति कांप रहा था। ऐसा मालूम दे रहा था जैसे उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा रहा हो। उसे कुछ भी नजर न आ रहा हो। सहारे के लिए उसने अपना हाथ बढ़ाया लेकिन धम्म से पलंग पर गिर पड़ी।

वह बेहोश हो चुकी थी।

कई लोग उसकी सहायता के लिए आगे बढ़े। उनमें अशरफ और राजर्स नहीं थे। अशरफ ने राजर्स के कंधे पर हाथ रखा और उसे अपने साथ आने का संकेत किया।

अशरफ उसे अपने साथ डेक पर ले गया। डेक पर पहुँचते ही वह राजर्स की ओर मुड़ा और बोला-‘तो मिस्टर राजर्स उर्फ अलफांसे उर्फ गेन्मार्ड अब तुम्हारा खेला समाप्त हो गया है।’

‘यह आप क्या कह रहे हैं?’ राजर्स एकदम चौंक कर बोला- ‘मेरा नाम राजर्स उर्फ इत्यादि कुछ नहीं।’

‘तुम झूठ बोलते हो।’ अशरफ कटु स्वर में बोला- ‘मिसेज बाटली-वाला की हीरे की अंगूठी और मिस्टर राजेश्वर के हीरे हवाले कर दो। ताकि में उन्हें वापिस कर दूं।’

‘यह आप क्या बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं?’

‘मैं ठीक कह रहा हूं।’ अशरफ गम्भीर स्वर में बोला- ‘जब तुम उन व्यक्तियों को झूठी गप्प सुना रहे थे तो मैं खामोश रहा था। क्योंकि इतने सारे आदमियों के सामने मैं तुम्हारा तमाशा नहीं बनाना चाहता था।’

‘वह तो मैंने इसलिये कहा था ताकि वह हम पर किसी प्रकार का शक न कर सकें।’

‘चलो मान लिया?’ अशरफ बोला-‘लेकिन मुसीबत तो यह है कि तुमने मुझे भी एक गप्प ही सुनाई थी।’

‘वह गप्प नहीं थी।’ राजर्स बोल-‘मैं बिल्कुल सच कह रहा हूं, क्या तुम्हें अब भी विश्वास नहीं आया है जब कि मिसेज बाटली-वाला की हीरे की अंगूठी चोरी चली गई है।’

‘इससे कौन गधा इन्कार करता है। इसमें कोई शक नहीं कि मिसेज बाटली-वाला की हीरे की अंगूठी चोरी चली गई है। लेकिन चोर कौन है?’

‘यह मैं नहीं जान सका हूं।’

‘परन्तु मैं जान चुका हूं।’ अशरफ अपने एक एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला- ‘चोर तुम हो... तुम।’

‘तुम मेरा अपमान कर रहे हो मिस्टर अशरफ?’

‘यह तो तुम्हें उस समय मालूम हो जायेगा जब जहाज बंदरगाह से टकरायेगा उस समय तुम किसी प्रकार न बच सकोगे।’

‘जब मैंने कुछ करा ही नहीं है फिर मुझे किस बात का खरा हो सकता है।’

‘तो तुम रात के समय वहाँ क्या कर रहे थे?’

‘जो तुम कर रहे थे।’

‘मैं तो चोरी कर रहा था।’

अशरफ की इस बात ने राजर्स को निरूत्तर करके रख दिया था।

राजर्स कुछ देर तक अशरफ को अंधकार में ही घूरता हुआ उसके चेहरे के भावों को पढ़ने की चेष्टा करने लगा।

‘तुम मुझ पर व्यर्थ का संदेह कर रहे हो।’ राजर्स अपने स्वर में लापरवाही लाता हुआ बोला- ‘सीधी सी बात यह है कि मैं अपने कमरे में सो रहा था। अचानक मेरी तबियत कुछ खराब सी हुई और मैं खुली हवा के लिए डेक की ओर चल दिया। मैं डेक की सीढ़ियों पर चढ़ने के लिए पैर बढ़ाने ही जा रहा था कि मुझे अपने पीछे एक प्रकार की आहट सी सुनाई दी। मैंने एकदम पलट कर देखा और एक व्यक्ति मिसेज बाटली-वाला के कमरे से निकलता हुआ देखा। उसके बाहर निकलने का तरीका बिल्कुल चोरों जैसा था। मैं उसके पीछे भाग ही रहा था कि तुम आ गये उसके बाद जो कुछ भी हुआ वह तुम्हें मालूम है।’

‘अच्छी कहानी है।‘ अशरफ उसकी बात पर विश्वास किए बिना ही बोला-‘लेकिन क्या मैं पूछ सकता हूं कि यह तुम्हारी तबियत आज ही कैसे खराब हुई है?’

‘यह तो बाइ चाँस है।’

‘लोग इतने मूर्ख नहीं हुआ करते जितने तुम समझ रहो हो।’ अशरफ कटु स्वर में बोला- ‘तुम जा सकते हो।’

राजर्स कुछ देर उसकी ओर देखता रहा फिर बोला- ‘मुझे कोई नहीं पकड़ सकता मिस्टर अशरफ।’

इतना कहकर राजर्स वापिस चला गया। और अशरफ डेक पर ही खड़ा रहा।

इस घटना से लगभग सारा जहाज ही जाग उठा था और अलफांसे के सम्बन्ध में ही चर्चा हो रही थी। मिसेज बाटली-वाला की अगूंठी खो जाने साथ साथ राजेश्वर के हीरों की चोरी का जिक्र भी हो रहा था। इस अवसर पर राजेश्वर भी उपस्थित था।

‘यह तो कोई बहुत ही दिलेर और पेशेवर चोर है।’ राजेश्वर कह रहा था- ‘उसने तो मेरी जिन्दगी भर की कमाई छीन ली है। मेरे पास जो कुछ भी था वही हीरे थे। उसने मुझे रास्ते का भिखारी बना कर रख दिया।’

सब राजेश्वर के साथ सहानुभूति प्रकट कर रहे थे। इसके अतिरिक्त वे लोग और कर भी क्या सकते थे।

मिसेज बाटली-वाला बेहोश पड़ी हुई थी। डाक्टर उसे होश में लाने की पूर्ण चेष्टा कर रहा था। मिसेस बाटली-वाला कुछ देर के लिये होश में आती थी। लेकिन ज्योंही उसे अपनी हीरे की अंगूठी के खोने का ख्याल आता था त्योंही वह फिर बेहोश हो जाती थी।
 
सुबह होने तक जहाज में यही हलचल रही। उस घटना के बाद से कोई नहीं सो सका था। अभी मिसेज बाटली-वाला की हीरे की अंगूठी के गुम होने की ही चर्चा हो रही थी कि वहां एक और घटना घटित हो गई।

राजर्स अपने कमरे में रस्सियों से जकड़ा हुआ पड़ा था। उसके मुंह में कपड़ा ठुंसा हुआ था ताकि वह चीख चिल्ला कर अपनी सहायता के लिए किसी को न बुला सके।

अब लोगों की अधिक से अधिक संख्या राजर्स के कमरे के निकट आकर लग गई थी। बिल्कुल इस प्रकार जैसे मक्खियों के किसी झुण्ड को गुड़ का नया ढेर मिल गया हो। राजर्स के बन्धन खोले गये बन्धन खुलते ही वह लम्बी सांस लेता हुआ फर्श पर लम्बा लेट गया उसके शरीर पर जहां तहां रस्सियों के निशान हो गये थे। उसकी हालत काफी पतली नजर आ रही थी। वह फर्श पर आँखें बंद किए चित पड़ा हुआ था और लम्बी-लम्बी सांसें ले रहा था।

जहाज का कैप्टेन इन घटनाओं से बुरी तरह घबरा गया था। उसे अपनी सम्मान की आंच आती नजर आई। वह अपने सिर के बाल नोंचता हुआ कह रहा था। ‘हाय अब मैं क्या करूं? मुझे यह केस पुलिस के हवाले करना ही पड़ेगा।’

लेकिन कैप्टेन की विवशता पर किसी ने भी सहानुभूति प्रकट नहीं की।

दोपहर के लगभग राजर्स अपने कमरे में अकेला रह गया था। अशरफ उसके पास ही था। राजर्स ने प्रश्न पूर्ण दृष्टि उसकी ओर डाली।

‘मैं भी चला जाता हूं।’ अशरफ एक कुर्सी पर बैठता हुआ बोला- ‘लेकिन कुछ प्रश्न करके।’

‘कैसे प्रश्न?’

‘यही कि यह सब मूर्खता करने से तुम्हारा क्या आशय है?’

‘मैं आपका मतलब समझा नहीं?’ राजर्स आश्चर्यमय स्वर में बोला।

‘तुम आमतौर से मेरे मतलब नहीं समझा करते।’ अशरफ उसे घूरते हुए बोला- ‘रात तुमने मिसेज बाटली-वाला की हीरे की अंगूठी चुराई और तुम अपने आपको इस प्रकार बांध कर बैठ गये हो। जिससे लोग यही समझे कि रात तुमने अलफांसे पर हमला किया था। इसलिए उसने अपना बदला लेने के लिए तुम्हे बांध कर डाल दिया है।’

‘बिल्कुल ऐसा ही हुआ है।’ राजर्स बोला-‘मैं अपने कमरे में सो रहा था कि अचानक मैंने अपने ऊपर भार का अनुभव किया। आँखें खोली तो अपने आपको रस्सियों से बंधा हुआ पाया। एक आदमी मेरे शरीर को रस्सियों से कस रहा था। मैं उसकी शक्ल तो नहीं देख पाया हूँ। लेकिन फिर भी विश्वासपूर्वक कह सकता हूं कि वह अलफांसे ही था।’

‘यह तुम कैसे कह सकते हो?’

‘और किसी को मुझसे शत्रुता तो हो ही नहीं सकती।’

‘वैसे लोगों को सुनाने के लिए यह एक अच्छी कहानी है।’ अशरफ बोला-‘लेकिन स्पष्ट बात यह है कि मुझे तुम्हारी बात पर कोई विश्वास नहीं आया है। और तुम्हारी इस हरकत से तो मुझे पूरा संन्देह हो गया है कि तुम्ही अलफांसे हो।’

‘क्या कोई आदमी अपने आपको इतने कस कर बंधनों में बाँध सकता है?’ राजर्स ने प्रश्न किया।

‘नहीं बाँध सकता है लेकिन अपने किसी साथी से बंधवा तो सकता है।’ अशरफ बोला-‘हो सकता है कि तुम्हारे साथ तुम्हारे कुछ साथी भी सफर कर रहे हों?’

‘अच्छा मैं अलफांसे हूं।’ राजर्स चिढ़कर बोला-‘कर लो मेरा क्या करते हो?’

‘जब जहाज तट से टकरायेगा तब तुम्हें मालूम हो जायेगा कि क्या कर सकता हूं।’ कहता हुआ अशरफ उठ खड़ा हुआ और कमरे से बाहर निकल आया।

अशरफ का पूरा सन्देह राजर्स पर था। वह इस समय किसी अनुभवी जासूस का सा अभिनय कर रहा था। इस प्रकार वह राजर्स को भयभीत कर देना चाहता था और चाहता था कि वह भयभीत होकर और अधिक मूर्खतायें करे। ताकि वह उसके विरुद्ध और अधिक प्रमाण एकत्रित कर सके।

उसी दिन अशरफ ने पवन तक सूचना पहुंचा दी अलफांसे इसी जहाज में सफर कर रहा है और वह उसकी गिरफ्रतारी का प्रबन्ध कर ले लेकिन इसके बावजूद भी अशरफ की समझ में नहीं आ रहा था कि पवन जैसा महान व्यक्ति एक मामूली से ठग और चोर के चक्कर में कैसे पड़ गया है। आखिर शहर में इतनी चोरी और ठगी के केस होते रहते हैं। लेकिन पवन उनसे किसी प्रकार की दिलचस्पी नहीं लेता। फिर वह इस ठग के मामले में क्यों इतनी दिलचस्पी ले रहा है। क्या केवल इसलिए कि यह केस विजय से ही आरम्भ हुआ था जो कि सीक्रेट सर्विस का ही एक सदस्य था।

एक दूसरा विचार भी अशरफ के मस्तिष्क में उभरा था कि हो सकता है यह ठग और चोर अलफांसे कोई साधारण व्यक्ति न होकर बड़ा ही खतरनाक अपराधी हो।

खैर होगा कुछ। कह कर अशरफ ने इसके सम्बन्ध में सोचना ही छोड़ दिया।

बाकी के दिनों में भी कोई विशेष घटना नहीं घटी और जहाज सही सलामत न्यूयार्क के तट से जा टकराया। इन सारे दिनों में अशरफ राजर्स पर नजर रखे रहता था। यद्यपि उसने इस बीच में कोई भी संदिग्ध बात नहीं की थी लेकिन फिर भी उसका सन्देह ज्यों का त्यों बना रहा।

जहाज के तट पर पहुंचते ही तट पर उतरने के लिये तख्ते लगा दिए गए और उसके साथ ही बहुत से अमरीकी पुलिस वाले धड़धड़ाते हुए जहाज पर चढ़ गये। शायद कैप्टन ने जहाज पर होने वाली चोरियों की सूचना पहले ही दे दी थी।

पुलिस वालों ने जहाज पर चढ़ते ही समस्त यात्रियों को अपने घेरे में ले लिया था। कोई भी यात्री नीचे नहीं उतरने पाया था।

अशरफ ने दूर से ही तट पर खड़े हुए विजय और जैकी को देख लिया था। सबसे पहले वही अपने सामान की तलाशी देकर नीचे उतरा। तट पर पहुंच कर उसने जैकी का अभिवादन किया और फिर विजय से बोला -‘वह चोर इसी जहाज पर सफर कर रहा है।’

‘अबे कोई नई बात सुनाओ मियाँ। विजय बोला-‘यह बात तो मैंने उसी दिन तुम्हें बता दी थी जब कि तुम्हें जहाज पर चढ़ाया था।’

‘उसका नाम राजर्स है और उसने जहाज पर ही एक आदमी के पचास हजार की कीमत के हीरे और एक स्त्री की अंगूठी भी चुराई है।’

‘ओफ्रफोह बड़ा बदमाश आदमी है। देखा प्यारे।’ विजय जैकी के कन्धे पर हाथ रख कर बोला-‘साला अपनी मां की अंगूठी चुराने से भी बाज नहीं आया... हद हो गई है कलयुग की।’

‘क्या मतलब?’ अशरफ चौंक कर बोला-‘क्या वह उसकी मां थी?’

‘हां आजकल मैं बड़े आदमियों के वचनों का पालन कर रहा हूं। उसी हिसाब से मैंने तुम्हें यह बताया भी है।’ विजय बोला-‘वह उन्होंने कहा है ना कि प्रत्येक विवाहित स्त्री माँ और कुंआरी कन्या बहन होती है।’

जैकी मुस्करा उठा लेकिन अशरफ झल्ला कर बोला-‘यह क्या बकवास लगा रखी है?’

‘बड़े आदमियों के सिद्धान्त बकवास नहीं हुआ करते प्यारे।’

‘खैर छोड़ो इसे।’ अशरफ जहाज की ओर देखते हुए बोला-‘वह देखो वह उतर कर आ रहा है।’

विजय के साथ-साथ जैकी ने भी नजरें उठाकर उसकी ओर देखा। यह राजर्स ही था जो कि अपना सामान कुलियों पर उठवाये चला आ रहा था। इसको इस प्रकार आते देख कर अशरफ को आश्चर्य हुआ उसके मुख से केवल इतना ही निकला - ‘कमाल है।’

‘क्यों क्या यह तुम्हें आदमी की बजाय स्त्री नजर आ रहा है?’ विजय ने उससे पूछा।

‘नहीं।’ अशरफ बोला-‘मैं सोच रहा हैं कि यह कितना तेज चोर है कि तलाशी में पुलिस को भी उसके पास से कुछ नहीं मिला है।’

‘लेकिन क्या अलफांसे यही है?’

‘मैं दावे के साथ कह सकता हूं।’

विजय कुछ नहीं बोला और उसने अपनी दृष्टि राजर्स पर टिका दी जो कि इसकी ओर ही बढ़ा चला आ रहा था। अशरफ की दृष्टि भी उस पर जमी हुई थी। राजर्स उनकी ओर ही बढ़ता रहा। अशरफ और जैकी सम्हल गये। उन्हें लगा जैसे कुछ होने वाला है।

लेकिन कुछ नहीं हुआ। राजर्स अशरफ को क्रोधित नजरों से घूरता हुआ चला गया। विजय ने कुछ नहीं किया। उसने आराम से उसे जाने दिया।

‘अबे वह जा रहा है।’ अशरफ विजय के कान में इस प्रकार फुसफुसाया जैसे उसे चौंकाना चाह रहा हो।

‘तो मैं क्या करूं?’ विजय अजीब सी विवशतापूर्ण आवाज में बोला- ‘जब तक इस साले के दोनों पैर सलामत है तब तक तो यह जायेगा ही मैं तो क्या मेरा बाप भी इसे नहीं रोक सकता।’

‘यह अलफांसे है।’

‘तो मैं क्या करूं?’

अशरफ किचकिचा कर रह गया। जैकी के सामने वह विजय को कुछ नहीं कहना चाहता था। जब राजर्स काफी दूर निकल गया तो विजय अशरफ से बोला- ‘अबे जहाज पर क्या घास छीलते रहे थे?’

‘क्यों?’ अशरफ बोला फिर भी उसकी नजर बाटली-वाला पर पड़ी जो कि जहाज से नीचे उतर रही थी। उसकी ओर एक चालीस वर्ष की आयु का व्यक्ति तेजी से बढ़ रहा था। शायद उसका पति था।

मिसेज बाटली-वाला का चेहरा काफी उतरा हुआ था। जिससे अनुमान लगाया जा सकता था कि उसे अपनी हीरे की अंगूठी के गुम हो जाने का काफी दुःख है।

‘यह मिसेज बाटली-वाला है।’ अशरफ ने विजय को बताया।

‘और वह जो इसको साथ छछुन्दर सा लगा हुआ है वह क्या मिस्टर टोकनी वाला है?’

‘इसे मैं नहीं जानता।’ अशरफ बोला-‘यह जहाज पर नहीं था। शायद यहीं से इसे मिला है।’

विजय ने अजीब सा मुंह बना कर जैकी की ओर देखा जोकि खामोश खड़ा हुआ था।

‘और यह जो अब आ रहा है यह राजेश्वर है।’ अशरफ ने एक गाईड की भांति उसे बताया- ‘सबसे पहले इसी के लगभग पचास हजार रुपये की कीमत के हीरे चोरी हुए थे।’

विजय ने देखा एक थका हुआ सा व्यक्ति लुटे पुटे शरणार्थियों की भांति बगल में कैमरा लटकाये और हाथ में एक सूटकेस उठाये चला आ रहा है।

‘इसके बाप ने भी कभी पचास हजार रुपये की कीमत के हीरे देखे हैं।’ विजय बुदबुदाया-‘साला झूठा कहीं का।’

‘यह क्या कह रहे हो? क्या तुम्हें इसकी सूरत से नजर नहीं आ रहा है कि वह बड़ा दुःखी है?’

राजेश्वर नीचे उतर आया था। उजड़ा हुआ बिल्कुल एकाकी सा वह गरदन झुकाये आगे बढ़ रहा था। विजय उसकी ओर बढ़ा और उसके निकट पहुंच कर बोला- ‘यह गरदन तो ऊंची कर लो प्यारे।’

राजेश्वर ने चौंक कर उसकी ओर देखा।

‘शाबास बेटा लूमड़।’

कहने के साथ ही वह विजय ने उसके जबाड़े पर ऐसा घूंसा मारा कि राजेश्वर उछल कर कई फुट दूर जा गिरा। बन्दरगाह पर खलबली मच गई। उसके नीचे गिरते ही जैकी को उसकी ओर झपटते देखकर अशरफ भी बिना कुछ सोचे समझे ही झपट पड़ा। दोनों विजय के साथ ही लगे हुए थे।
 
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