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Thriller तरकीब

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“अरे जुगल, वह बन्दा कहाँ है जिसे तुम गाजियवाद से लाए थे ?”–आरिफ ने पूछा।

“कौन ? मामा ? उन्हें तो कमरे में सेट किया हुआ है। उन्हें सब समझा दिया है कि जान की सलामती चाहिए तो जब तक केस चल रहा है चुपचाप आराम करो।”

“नहीं, यहाँ क्या दिक्कत है। अगर फार्म हाउस में घूमना चाहे तो घूमने दो।”

“ठीक है सर। अब आप कह रहे हो, तो सुबह शाम घुमा दिया करेंगे।”

“और सबसे बोल देना कि नाश्ता कर के ठीक दस बजे ऑफिस में आ जाए।

“जी।” ठीक दस बजे सभी लोग ऑफिस नुमा कमरे में मौजूद थे। सिर्फ देशराज और कर्नल साहब मौजूद नहीं थे। कर्नल साहब अपने दिल्ली स्थित घर चले गए थे, और देशराज की उपस्थिति आवश्यक नहीं थी। जैसा कि आप सभी लोगों को पता है कि हमारा ऑपरेशन क्लीन अब अपने आख़िरी चरण में है। सब कुछ शांतिपूर्वक निपट जाए और पर्फ़ेक्ट टाइमिंग से हो इसके लिए हमें हर चीज़ कई बार दोहरा लेनी चाहिए।”–आरिफ गंभीरता पूर्वक बोला।

सबने सहमति में सिर हिलाया।

“डॉक्टर प्रीति, इसमें आपका सबसे महत्वपूर्ण रोल है।” प्रीति ने सहमति में सिर हिलाया।

“प्रीति जी वर्तमान हालात में ये ज़रूरी है कि उसकी मौत पर कोई हल्ला गुल्ला ना हो। अब ये आपके ऊपर है। क्योंकि एक बार आगे कदम बढ़ाने के बाद, मारेंगे तो हम उसे हर हाल में। अगर आपने उसे सतर्क किया, या और कोई घपला किया तो फिर हम उसके साथ आपको भी ठोक देंगे।”

“मैं कोई गड़बड़ नहीं करूँगी।”–डॉक्टर प्रीति भयभीत स्वर में बोली।

“फिर तो आपका फ़ायदा ही फ़ायदा है। उसकी सारी जायदाद, फैक्ट्री, बैंक बैलेन्स सब आपका। आनंद लूटिएगा ज़िंदगी का। वरना मुर्गे के साथ आपका भी अंतिम संस्कार हो जाएगा।”–आरिफ चेतावनीपूर्ण लहजे में बोला।

“मुझे हर हाल में ज़िंदा रहना है।”–वह दृढ़ स्वर में बोली।

“बढ़िया। तो अब अच्छी तरह एक बार फिर दोबारा से समझ लीजिए कि क्या और कैसे करना है।”–आरिफ बोला।

डॉक्टर प्रीति ने सिर हिलाया और ध्यान उसकी तरफ़ लगा दिया। आरिफ उसे समझाता रहा और पहले भी कई बार समझ चुकी प्रीति फिर एक बार समझने लगी।

“सब समझ गईं आप ?”–अपनी बात पूरी करके आरिफ ने पूछा।

“समझ गई। अच्छी तरह समझ गई।”–डॉक्टर प्रीति बोली।

“बाकी अपनी बहन राजेश्वरी देवी से आप मिल ही चुकी हैं। रणविजय से आपकी चैट चार दिन से चल ही रही है। वह लगातार आपसे अपनी ज़िंदगी में आने की विनती कर रहा है, तो आज शाम आप पिघल जाओ और उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लो। इजी।”

प्रीति ने सहमति में सिर हिलाया।

“गुड इसके बाद जब आप भली भाँति कोठी में सेट हो जाएँ तो उसे कोई ऐसी दवाई दें, जिससे उसका गला ख़राब हो जाये और हल्का बुख़ार भी आ जाए। फिर आपको उस पर कोरोना का शक ज़ाहिर करके उसका कोरोना टेस्ट करवाना है। रिज़ल्ट नेगेटिव आए या पॉजिटिव आपके पास रिपोर्ट पॉज़िटिव की ही पहुँचेगी। फिर वह अपना इलाज कोठी के ही एक कमरे में कॉरेनटाइन होकर कराएगा और उस कमरे में केवल डॉक्टर आरिफ, कम्पाउण्डर अमित और आनंद, बतौर नर्स आहना ही जाएँगे और वह भी पी०पी०ई० किट पहन कर। पी०पी०ई० किट में कौन पहचानेगा किसी को ? और दो दिन बाद वह कोरोना से मर जाएगा। उसका मृत शरीर किट में पैक होगा। कोई उसे नहीं देख पाएगा और ऐसे ही पैक पैक उसका अंतिम संस्कार हो जाएगा। घरवालों के नाम पर कोई है नहीं। तो सब कुछ पत्नी डॉक्टर प्रीति को ही करना है, या बेटी डॉली को। और वैसे भी कोरोना के डर से कोई लाश के पास तक नहीं फटकेगा।”–आरिफ बोला। सबने सहमति में सिर हिलाया। डॉक्टर प्रीति ने भी।

“लेकिन मैं पत्नी कैसे सिद्ध होऊँगी।”–प्रीति झिझकते हुए बोली।

“वैसे तो मुर्गा ही शादी को कहेगा, तो जाकर मंदिर में कर लेना शादी और ना भी हो, तो भी हम बैठे हैं। हम बनवा कर देंगे काग़ज़। और वैसे भी डॉली इकलौती वारिस है। इसलिए जो आपसे कहा है, वह आपको ही मिलेगा। ये हमारा वादा है आपसे।”

“मुझे आप लोगों पर विश्वास है।”–प्रीति अनमने भाव से बोली।

“डॉक्टर प्रीति मैं आपसे कहती हूँ कि मैं और भाई सिर्फ अपने मम्मी-पापा का हिस्सा ही लेंगे। उस राक्षस का सारा पैसा आपका ही होगा।”–डॉली बोली।

“ठीक तो है ना मम्मी। हो जाएगा सब। मैं हूँ ना। मैं सब ठीक कर दूँगा।”–जुगल बोला।

डॉक्टर प्रीति ने उसकी तरफ़ देखकर बुरा सा मुँह बनाया।
 
शाम के चार ही बजे थे। रणविजय अपनी कोठी स्थित ऑफिस में बैठा सोच विचार में डूबा था। साला कुछ भी तो उसके हिसाब से नहीं हो रहा था। पार्टी में इन दोनों बुड्ढों ने सब प्लानिंग चौपट कर रखी है। उस कटियार से भी अभी तक कोई शुभ समाचार नहीं मिला था। उधर से हरी झंडी मिले, तो इधर वह अपनी पार्टी में बगावत का बिगुल फूँके। जल्दी ही विपक्ष द्वारा कोई बड़ा हंगामा ना हुआ, तो सरकार जो इस समय बैकफ़ुट पे दिख रही है, फ्रंटफुट पर खेलने लगेगी। इस समय कोई नया बखेड़ा ना हो जाए, इस वजह से तो इस साली काव्या का कुछ नहीं किया अब तक। कुछ कर रणविजय जल्दी ही कुछ कर।” उसने टेबल पर रखी घंटी बजाई। तत्काल अंदर से काव्या दौड़ती हुई आई।

“ड्रिंक का सामान ला।”–वह काव्या को नख से शिख तक देखते हुए बोला।

“जी।”–काव्या तुरंत अंदर को दौड़ गई। ज़रा देर में काव्या एक ट्रॉली खींचती हुई लाई और रणविजय के पास लगा कर रणविजय की तरफ़ प्रश्नवाचक निगाहों से देखने लगी।

“भाग जा।” वह तुरंत अंदर को दौड़ गई। रणविजय ने एक पैग बनाया और एक ही साँस में पी गया। एक सिगरेट सुलगाई और छोटे छोटे कश लगाने लगा। यकायक कुछ ध्यान आया। उसने झपट कर मोबाइल उठाया और फेसबुक खोलकर देखने लगा। तुरंत उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। उसने चैट पढ़ी और टाइप करने में व्यस्त हो गया। उधर से भी तुरंत जवाब आया। जवाब मिलते ही उसने ऑफलाइन होकर एक नम्बर मिला दिया।

“हेल्लो।”–उधर से मधुर नारी स्वर आया।

“हेल्लो...प्रीति ?”–उसने हौले से पूछा।

“यस डॉक्टर प्रीति बोल रही हूँ। आप क़ौन ?”

“मैं रणविजय।”–वह सूख आए गले से बोला। दूसरी तरफ़ खामोशी छा गई।

“हेल्लो प्रीति।”–वह फिर बोला।

“विजय बहुत समय निकल गया। अब इस सब से क्या फ़ायदा ?”–उधर से धीमी आवाज़ में कहा गया।

“कुछ समय नहीं निकला प्रीति। मेरे लिए तो सब कुछ जैसे कल की बात है।”

“विजय मैंने तुम्हारी फ्रेंड रिक्वेस्ट ऐक्सेप्ट कर ली। हम दोस्तों की तरह बात कर सकते हैं।”

“प्रीति जो तुमने तब कहा, मैंने मान लिया था। जो तुम अब कहोगी, वह भी मान लूँगा। पर प्रीति तुम सिर्फ एक बार मेरी बात मान लो। बस एक बार। मैं तुम्हारे कदमों में दुनिया जहान की ख़ुशियाँ डाल देना चाहता हूँ।”

“विजय अब हमारी वह उम्र नहीं रही। मेरा एक जवान बेटा है। वह ऐब्नॉर्मल है विजय। उसे मेरी ज़रूरत है।”

“जो तुम्हारा बेटा, वह मेरा बेटा। हम रखेंगे उसका ध्यान। बस एक बार प्रीति, बस एक बार, मेरा कहना मान लो।”

“तुम क्या चाहते हो विजय ?”

“मुझसे शादी कर लो प्रीति। बस एक बार।”

“बस एक बार कर लूँ ?”–उधर से हँसने की आवाज़ आई।

“मतलब बस एक बार मेरी बात मान लो।”

“तुमने शादी नहीं की विजय ?”

“बहुत कुछ बताना है तुम्हें। मिलोगी तो बताऊँगा।”

“बहुत प्यार करते हो मुझसे ?”

“पता है तुम्हें।”

“मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई थी विजय।”–उधर से अफ़सोस भरे लहजे में कहा गया।

“तो गलती सुधार लो अब।”–रणविजय लालसापूर्ण स्वर में बोला।

“ऐसा हो सकता है ?”–उधर से अनिश्चित सा स्वर आया।

“हाँ बोलो। आज ही पता चल जाएगा।”–रणविजय दृढ़ स्वर में बोला।

“हाँ।”

“क्या ?”–रणविजय को जैसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ।

“हाँ।”

“मैं आ रहा हूँ प्रीति।”

“आ जाओ विजय। अब बस आ जाओ।”

“अभी आता हूँ प्रीति, अभी आता हूँ।”

रणविजय ने मोबाइल ऑफ किया और बाहर को लपका।

*********************
 
फार्महाउस के पीछे की साइड घने पेड़ों की कतार थी। शहर के कोलाहल और प्रदूषण से दूर बहुत शांति और शुद्ध वातावरण था। डॉली नहाने गई तो राज वहाँ आ गया। पेड़ों से छनकर धूप आ रही थी। पास ही तरह तरह के फूलों के पौधों की कतार थी, जिन पर रंग बिरंगे फूल लगे हुए थे। उनकी सुगंध पूरे वातावरण में फैली हुई थी। राज को वह जगह ख़ासतौर पर पसंद थी। अभी वह इस सुंदर नज़ारे में खोया हुआ ही था कि उसे अपने पीछे आहट सुनाई दी। वह पलटा तो आरिफ को खड़े पाया।

“नमस्ते आरिफ भाई।”–उसने अभिवादन किया।

“नमस्ते राज । प्रकृति के नज़ारे लिए जा रहे हैं ?”–आरिफ मुस्कुराते हुए बोला।

“जी आरिफ भाई।”–राज संकोचपूर्वक बोला।

“राज मुझे तुमसे कुछ बात करनी है। आओ आगे थोड़ा दूर चलते हैं। यहाँ डॉली आ सकती है और उसके सामने होने वाली बात नहीं है ये।”–आरिफ उसे ध्यान से देखते हुए बोला।

“जी चलिए।”–राज तनिक विस्मय से बोला। उसकी समझ में नहीं आया कि आरिफ को उससे अलग से क्या बात करनी है। दोनों उस कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ चले जो खेतों की तरफ़ जा रहा था।

“देखो राज , मैं डॉली को इस ऑपरेशन में शामिल नही कर सकता। हक़ीक़त में उसके करने लायक़ कोई काम है भी नही।”

उसकी समझ में नहीं आया कि आरिफ को उससे अलग से क्या बात करनी है। दोनों उस कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ चले जो खेतों की तरफ़ जा रहा था।

“देखो राज , मैं डॉली को इस ऑपरेशन में शामिल नही कर सकता। हक़ीक़त में उसके करने लायक़ कोई काम है भी नही।”

“वह तो मैं भी नहीं चाहता आरिफ़ भाई।”–राज तुरंत बोला।

“पर वह मानेगी नहीं।”–आरिफ बोला।

“जी बिलकुल नहीं मानेगी। तूफान खड़ा कर देगी।”–राज उसकी बात से सहमत होता हुआ बोला।

“ये काम उसे बिना बताए करना होगा।”

“कैसे आरिफ भाई ?”

“उसे बेहद महत्वपूर्ण बता कर किसी महत्वहीन काम पर लगाना होगा।”–आरिफ कुछ सोचता हुआ बोला।

“बहुत शातिर काइयाँ है वह। तुरंत भाँप जाएगी।”–राज तुरंत बोला।

“देखेंगे उसका शातिरपन भी। तुम साथ देना बस।”–आरिफ हँसा।

“वह तो आप निश्चिंत रहो।”–राज बोला।

“और एक बात है।”–आरिफ धीमे से बोला। “जी कहिए।”

“मैं तुम पर कितना विश्वास कर सकता हूँ ?”–आरिफ उसकी आँखों में झाँकता हुआ बोला।

“आरिफ भाई आप मुझ पर पूरा यक़ीन कर सकते हो। बेहिचक कहिए जो कहना है।”–राज दृढ़ता से बोला।

“देश के लिए क्या कर सकते हो ?”–आरिफ की निगाहें उसके चेहरे पर ही जमी हुईं थीं। “आप बताओ आरिफ भाई। देश के लिए तो कुछ भी कर सकता हूँ।”

“इस ऑपरेशन में हमें तुम्हारी ज़रूरत है राज ।”

“मैं आपके साथ हूँ। आप बताओ करना क्या है ?”–राज का स्वर आत्मविश्वास से ओत प्रोत था।

“एक हत्या करनी है।”–आरिफ सपाट लहजे में बोला।

“ह...हत्या !”–राज चौंका।

“हाँ हत्या…क्यों क्या हुआ ?”

“किसकी ?”

“देश के, इंसानियत के दुश्मन की।”–आरिफ की निगाहें उसके चेहरे पर टिकी थीं।

राज सोच में पड़ गया।

“बोलो कर लोगे ?”

“कर दूँगा आरिफ भाई। देश के लिए ये भी कर दूँगा। वैसे भी यही करने तो आया था डॉली के साथ। लेकिन आरिफ भाई ये समझ नहीं आया कि आप लोग ये काम मुझसे क्यों करवाना चाहते हो ? जबकि आप लोग ट्रेंड हो, ये काम बहुत आसानी से कर सकते हो।”–राज बोला।

“जिस समय ये काम होगा, उस समय हम सब सरकारी आदमी अपने ऑफिस में हाज़िर रहेंगे। हम नहीं चाहते कि किसी भी तरह ये काम सरकार से जोड़ कर देखा जाए। वैसे हमारा प्लान सॉलिड है, पर अतिरिक्त सुरक्षा ले रहे हैं बस।”

“ठीक है आरिफ भाई। जैसा आप कहोगे, हो जायेगा।”

“गुड। तो समझो कि ये ऑपरेशन तुम्हारी ट्रेनिंग भी है और इम्तिहान भी।”–आरिफ बोला।

“ट्रेनिंग ?”

“देखो राज मुझे मालूम है कि तुम आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हो और अब डॉली से शादी कर रहे हो, तो वैसे भी तुम दोनों के पास बहुत पैसे होंगे। जमा जमाया बिज़नेस होगा। तुम्हें पैसे के लिए कोई काम करने की कोई ज़रूरत नहीं है। लेकिन फिर भी मेरे पास एक प्रस्ताव है तुम्हारे लिए।”–आरिफ कुछ सोचता हुआ बोला।

“क्या ?”–राज उत्सुक भाव से बोला।

“जो बता रहा हूँ वह अपने तक ही रखना। यहाँ तक कि डॉली को भी नहीं बताना।”

“नही बताऊँगा आरिफ भाई आप बेफ़िक्र रहो।”

“सरकार के सभी विभाग सार्वजनिक नहीं होते। कुछ विभाग देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए गुप्त रूप से भी काम करते हैं। और इसमें काम करने वाले भी अज्ञात ही रहते हैं। उन्हें किसी अन्य सरकारी विभाग का कर्मचारी दिखा दिया जाता है। वह वहाँ काम भी करते हैं। लेकिन उनका असली काम कुछ ऐसे ही ऑपरेशन करना होता है जैसा कि इस वक़्त हम कर रहे हैं।”–आरिफ इतना बोल कर रुका।

राज तन्मयता से सुन रहा था। आरिफ को रुकता पाकर उसने प्रश्नसूचक निगाहों से उसकी तरफ़ देखा।

“तुम जैसे युवाओं की देश को हमेशा ज़रूरत है। इसलिए मैंने कहा कि ये ऑपरेशन तुम्हारा इम्तिहान और ट्रेनिंग दोनों हैं। अगर देश के लिए कुछ करने का जज़्बा हो तो ज्वाइन कर लेना।”

“मुझे मंज़ूर है।”–राज तुरंत बोला।

“फैसला करने से पहले ये समझ लो कि कफ़न जेब में रख कर काम करना होता है।”

“मुझे मंज़ूर है आरिफ भाई। देश के लिए शहीद होना तो किस्मत वालों को ही नसीब होता है।”–राज तत्परता से बोला।

“तो समझ लो हो गया। मैंने तुम्हारी योग्यता पहचान ली है।”–आरिफ उसके कंधे पर हाथ रखता हुआ बोला।

“आरिफ भाई क्या ये ज़रूरी है किसी सरकारी विभाग में ही नौकरी दिखाई जाए ? मैं वकालत करता हुआ भी तो ये काम कर सकता हूँ।”

“बिलकुल कर सकते हो। मतलब तो सिर्फ एक फ्रंट बना कर रखने से है, वह कोई भी हो।”–आरिफ बोला।

“तो आरिफ भाई मुझे मंज़ूर है। सच पूछो तो ये तो मेरा बचपन का सपना था। जब मैं जेम्स बॉंड की, सुपर कमांडो ध्रुव की कॉमिक्स पढ़ता था, तो खुद को उनकी जगह रख कर ही सोचता था।”

“कॉमिक्स और हक़ीक़त में बहुत फर्क होता है मेरे भाई। ग्लैमर और फेम जैसी किसी चीज की जरा सी भी गुंजाइश नहीं है हमारे विभाग में।”–आरिफ हँसा।

“कुछ भी हो, बन तो रहा ही हूँ ना।”–राज भी हँसा।

“हाँ वह तो है। ख़ैर अब सुनो आगे की सारी योजना कि क्या होना है और कैसे होना है।”–आरिफ बोला।

“जी बताइए।” जवाब में आरिफ उसे धीमे स्वर में सब कुछ बताता चला गया। राज बीच बीच में सहमति में सिर हिला देता था।

करीब आधा घंटा उनकी ये वार्ता चली। उसके बाद दोनों वापस अंदर इमारत की तरफ़ लौट चले।

*********************
 
होटल मुगल शेरेटन के अपने कमरे में डॉक्टर प्रीति और जुगल मौजूद थे। प्रीति बेड पर बैठी थी, जबकि जुगल कमरे में मौजूद सोफे पर बैठा था। प्रीति ने मोबाइल डिस्कनेक्ट हो जाने के बाद मोबाइल सामने बेड पर रख दिया।

“वह आ रहा है।”–वह जुगल की तरफ़ देखती हुई बोली।

“जी मम्मी जी।”–जुगल शराफत से बोला। प्रीति ने उसे घूर कर देखा, पर कुछ कहा नहीं। उसे पता था कि कहने का कुछ फ़ायदा भी नहीं होने वाला है। जुगल ने पैंट और फुल बाजू की शर्ट पहन रखी थी। लेकिन शर्ट के ऊपर के दो बटन टूटे हुए थे और कफ के बटन भी खुले हुए थे, जिससे शर्ट बेतरतीब सी हो रही थी। सिर के बाल भी बिखरे हुए थे और वह इस समय अखबार में बने चित्रों पर पेन से कारीगरी करने में व्यस्त था।

“मम्मी एक चॉकलेट दो ना।”–वह बग़ैर अख़बार से सर उठाए बोला।

“जब वह आ जाए, तभी कर लेना ये सब।” जवाब में जुगल इतनी तेज चिल्लाता हुआ रोया कि घबरा कर प्रीति ने जल्दी से पर्स से चॉकलेट निकल कर उसकी ओर उछाल दी। जुगल ने चॉकलेट फाड़ी और बड़े लापरवाह अंदाज़ में खाने लगा। खा कम रहा था, शर्ट और मुँह पर ज्यादा लगा रहा था। प्रीति बड़े विचित्र भाव से उसकी तरफ देख रही थी।

“मम्मी खम हो गई।”–थोड़ी देर बाद ही वह प्रीति को अपने दोनों हाथ दिखाता हुआ बोला।

“ठीक है।”

“मम्मी मैं और नहीं खाऊँगा।”–जुगल फिर बोला।

“अरे तो मत खा, मेरे से क्या कह रहा है।”

“मम्मी आप मुझसे प्यार नहीं करतीं।”–जुगल मचल कर बोला।

“चुप हो जा मेरे बाप।”–प्रीति माथे पर हाथ मारती हुई बोली। जुगल फिर अख़बार में छपे चित्रों की दाढ़ी मूँछ बनाने में व्यस्त हो गया। थोड़ी ही देर बाद रिसेप्शन से फोन आया। प्रीति ने फोन उठाकर बात की और रिसीवर वापिस क्रेडिल पर रख दिया।

“वह आ रहा है।”–उसने जुगल की तरफ़ देखते हुए कहा। जुगल ने क्षण भर को उसकी तरफ़ देखा और फिर अख़बार में चित्रकारी में व्यस्त हो गया। दरवाज़े पर नॉक होते ही उसने झपट कर दरवाज़ा खोल दिया। रणविजय उसे अपलक देखता रह गया। जाने कितनी देर वह एक दूसरे को देखते रह गए। फिर प्रीति को ही होश आया।

“आओ अंदर आओ।”–वह दरवाज़े से एक साइड होती हुई बोली। रणविजय अंदर आया और एक कुर्सी पर बैठ गया। लेकिन इस सारी प्रक्रिया में उसकी नज़र एक पल के लिए भी प्रीति से नहीं हटी थी।

“कितना टाइम हो गया ना ?”–प्रीति बोली।

“नहीं हुआ। मुझे तो कल की ही बात लगती है।”

“पूरे बत्तीस साल हो गए। तुम कितना बदल गए हो।”

“पर तुम नहीं बदलीं। बिलकुल वैसी की वैसी हो।” प्रीति हँसी।

“बिलकुल वही हँसी है।”

“छोड़ो भी, बताओ क्या लोगे ?”

“कुछ नहीं। बस तुम चलकर अपना घर सँभाल लो।”

“मेरा कौन सा घर है यहाँ ?”–वह रणविजय की आँखों में देखते हुए बोली।

“अभी ना सही, पर यहाँ से सीधे आर्य समाज मंदिर चल रहे हैं। वहाँ से फ्री होते ही घर तुम्हारा हो जाएगा।”

“तुम मज़ाक़ कर रहे हो ?”

“नहीं प्रीति, आज और अभी होगी हमारी शादी। मुझे अपनी किस्मत का कोई भरोसा नहीं।”

“पर एकदम से आज अचानक कैसे हो जाएगी ?”

“हो जाएगी। क्योंकि ये रणविजय की शादी है। तुम चलो तो सही।”

“चलो। बस मैं दो मिनट में तैयार होती हूँ।”

“ये है हमारा बेटा ?”–रणविजय जुगल को देखता हुआ बोला।

“हाँ यही है। जुगल नमस्ते करो अंकल को।” जुगल ने नज़र उठाकर रणविजय को देखा, फिर वापस अपने काम में लग गया।

“बहुत बदमाश हो गया है। जुगल चलो तुम्हारा मुँह साफ कर दूँ। सारे हाथ और मुँह पर चॉकलेट लगा रखी है। फिर अंकल के साथ घूमने चलना है ना।” जुगल घूमने के नाम पर तुरंत उठ खड़ा हुआ। प्रीति उसे लेकर बाथरूम में चली गई। रणविजय बैठा बैठा कमरे का निरीक्षण करने लगा। फिर उसने सामने पड़ा अख़बार उठा लिया और उसमें की गई जुगल की चित्रकारी देखने लगा। यकायक वह काफी गंभीर नज़र आने लगा। उसने अख़बार वापस रखा और गंभीरता से कुछ सोचने लगा। फिर उसने जेब से मोबाइल निकाला और किसी को फोन लगाया। कॉल मिलते ही वह धीरे स्वर में किसी को कुछ निर्देश देने लगा। *********************
 
“बहुत बदमाश हो गया है। जुगल चलो तुम्हारा मुँह साफ कर दूँ। सारे हाथ और मुँह पर चॉकलेट लगा रखी है। फिर अंकल के साथ घूमने चलना है ना।” जुगल घूमने के नाम पर तुरंत उठ खड़ा हुआ। प्रीति उसे लेकर बाथरूम में चली गई। रणविजय बैठा बैठा कमरे का निरीक्षण करने लगा। फिर उसने सामने पड़ा अख़बार उठा लिया और उसमें की गई जुगल की चित्रकारी देखने लगा। यकायक वह काफी गंभीर नज़र आने लगा। उसने अख़बार वापस रखा और गंभीरता से कुछ सोचने लगा। फिर उसने जेब से मोबाइल निकाला और किसी को फोन लगाया। कॉल मिलते ही वह धीरे स्वर में किसी को कुछ निर्देश देने लगा। *********************

“पहला चरण तो पूरा हो गया। वह दोनों कोठी के अंदर तो स्थापित हो गए।”–आरिफ अमित को देखते हुए बोला। “हाँ सर हो तो गए। पर पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि ये सब बहुत आसानी से हो गया।”

“प्रीति की वजह से आसानी से एंट्री मिल गई है।” अमित ने सहमति में सिर तो हिला दिया, लेकिन उसके चेहरे से चिंता के भाव नहीं गए। इस समय रात के दस बजे थे। वह लोग डिनर कर चुके थे और ड्रॉइंग रूम में बैठे कॉफी पी रहे थे। टी०वी० चल रहा था। लेकिन आज रणविजय के बारे में कोई खास न्यूज़ नहीं थी। ये भी अपने आप में बड़ी राहत की ख़बर थी, वरना दिल्ली हेड ऑफिस से वापसी का फरमान आना कोई अचरज की बात नहीं होती।

“सर हमें एक प्लान बी भी बनाना चाहिए। अगर किसी वजह से हमारा प्लान ए फेल होता है, तो भी हमारा ऑपरेशन फेल ना हो।”–अमित काफी देर सोचने के बाद बोला।

“लेकिन अमित दूसरा प्लान क्या हो सकता है ? उसे केवल इसी तरीक़े से ही दबोचा जा सकता है। अन्य किसी भी तरीक़े से उसे पकड़ना या मारना तो हमारे सबके लिए आफ़त खड़ी कर देगा।”–आरिफ चिंतापूर्ण लहजे में बोला।

“नहीं सर, तरीका नहीं बदलना है। सिर्फ जैसे डॉक्टर प्रीति और जुगल आगे बढ़े हैं, ऐसे ही एक और टीम किसी अन्य रास्ते से उस तरफ बढ़े। अगर पहली टीम कामयाब हो गई, तो बढ़िया है, लेकिन अगर किसी वजह से पहली टीम कोई कदम नहीं बढ़ा पाती है, तो दूसरी टीम उसकी मदद के लिए वहाँ रह सके।”

“बात तो तुम्हारी सही है। पर अब किस बहाने से कोठी में एंट्री होगी?”

“आहना शर्मावत को बुला लीजिए सर। अगर भगवान ने चाहा तो कल सुबह मैं और किशोर दोनों कोठी में होंगे।”–अमित मुस्कुराता हुआ बोला।

“कैसे ?”

“आहना को बुला लीजिए। अभी चलते हैं संजय तिवारी के घर। वह कराएगा एंट्री।”

“समझ गया। ये सही रहेगा। किशोर फोन करो आहना को।”–आरिफ अपनी कलाई घड़ी में टाइम देखता हुआ बोला।

“यस सर।”–किशोर सावधान स्वर में बोला।

“भाई मैं भी जा सकती हूँ कोठी में सर को लेकर। आख़िर वह घर है तो मेरा ही।”–डॉली बोली।

“नहीं डॉली तुम अभी नहीं। पहले अंदर के हालचाल पता चल जाएँ, तब जाना तुम।”–आरिफ तुरंत इनकार करता हुआ बोला।

“लेकिन भाई...”

“सर सही कह रहे हैं डॉली । कल मैं और किशोर अंदर पहुँच जाएँ, फिर तुम आना।”–अमित उसकी बात काटते हुए बोला।

“तुम्हें और राज को टीम सी के रूप में भेजेंगे परसों।”–आरिफ बोला।

“ठीक है भाई।”–डॉली अनमने से स्वर में बोली।

*********************

संजय तिवारी गहरी नींद में था जब उसके मोबाइल की घंटी ने उसे उठाया। उसने आँख मिचमिचाते हुए मोबाइल की स्क्रीन पर निगाह मारी तो उसकी ना केवल आँख पूरी खुल गई, बल्कि नींद भी ग़ायब हो गई। “हेल्लो।”–वह बराबर में सोती पत्नी पर निगाह मारता हुआ धीमे स्वर में बोला।

“हो गई हेल्लो, ज़रा घर से बाहर को आ।”–उधर से आहना की कड़क आवाज़ आई।

“आया।”–वह धीरे से बेड से उतरता हुआ बोला। संजय तिवारी ने मोबाइल में टाइम देखा। बारह बजे थे। वह धीरे से दरवाज़ा खोल कर बाहर आया और इधर उधर देखने लगा। घर से ज़रा सा आगे एक टाटा सफारी खड़ी थी। उसने अनिश्चित भाव से उधर देखा, तो सफारी की खिड़की से एक हाथ बाहर आया और उसे पास आने का संकेत किया। वह बोझिल कदमों से सफ़ारी की तरफ़ चल दिया। उसके पास आते ही सफारी के पीछे का दरवाज़ा खुला।

“अंदर आ जाओ तिवारी जी।”–गाड़ी के अंदर से आहना शर्मावत की आवाज़ उसके कानों में पड़ी। वह झिझकता हुआ सा गाड़ी में बैठ गया। आधा घंटे बाद वह गाड़ी से उतरा, तो उसके हाथ में एक छोटा सा बैग और माथे पर पसीना था। सफारी उसे उतार कर तेज़ी से आगे चली गई। संजय तिवारी भी मरे कदमों से वापस घर की तरफ़ चल पड़ा।

*********************

सफारी अब वज़ीरपुरा इलाक़े में खड़ी थी।

“क्या हुआ ? एम्बुलेंस को तो अब तक आ जाना चाहिए था।”–आरिफ मोबाइल में टाइम देखता हुआ बोला।

“आ ही रही होगी सर। उन्हें भी तो तैयारी करनी होगी।”–आहना बोली।

“टाइम निकला जा रहा है। मामला खाली एक आदमी को ले जाने का नहीं है। ये दोनों गली सील होनी हैं, जिससे ना कोई अंदर से बाहर जाए और ना बाहर से अंदर आए।”

“वह तो कोरोना पेशंट मिलने पर होगी ही।”–जुगल बोला। तभी एक एम्बुलेंस उनकी गाड़ी के पीछे आकर रुकी और उसमें से एक पी०पी०ई० किट पहने आदमी उतरा और सफारी के पास आया।

“हेल्लो सर, मैं डॉक्टर दीक्षांत आहूजा हूँ।”

“हेल्लो डॉक्टर, आपको पता है ना कि आपको क्या करना है ?

” “जी सर, हमारा एक वार्ड बॉय यहीं रहता है। मैंने उसे फोन कर दिया था। वह कोऑपरेट करेगा।”

“बस तो उसे कोरोना पॉज़िटिव बता कर ले जाइए और डी०एम० साहब को भी सूचित कर दीजिए। ये जो दो गलियाँ है, ये भी सील हो जानी चाहिए। आप बस डी०एम० साहब को अभी सूचित कर दीजिए। फोन करवा दिया है, उन्हें पता है कि क्या करना है।”–आरिफ बोला।

“जी मैं ले जाता हूँ उसे।”–डॉक्टर बोला।

“डॉक्टर साहब थोड़ा साइरन बजा कर जाना, जिससे मोहल्ले में पता चल जाए कि क्या हुआ है। और दूसरी सबसे अहम बात इस बात को अपने तक ही रखिएगा। क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, इन सब के चक्कर में मत पड़िएगा।”

“सर डॉक्टर वेदांत आहूजा मेरे सगे बड़े भाई थे।”–डॉक्टर धीरे से बोला।

“सॉरी डॉक्टर, हमें उनका बेहद अफ़सोस है।”

“कोई बात नहीं सर, चलता हूँ।”–कहकर डॉक्टर वापस एम्बुलेंस की तरफ़ बढ़ गया। सफारी भी स्टार्ट होकर आगे को बढ़ गई।

“सर हमने सीधे सीधे अपने दोनों शिकारों को ही क्यों नहीं उठा लिया? मेरा मतलब अब पूरी दो गली सील करनी होंगी, तब केवल हरिहर और दिनेश को ही उठाना पड़ता।”–किशोर बोला।

“कुछ नहीं, केवल अतिरिक्त सावधानी है। अब हमें कुछ नहीं करना है। ये दोनों खुद ही फोन करके बताएँगे कि अब ये अगले बारह चौदह दिन काम पर नहीं आ पायेंगे। क्योंकि गली सील हो गई है। ये आज के टाइम में बिलकुल सामान्य बात है। हमारे मुर्गे को कोई शक भी नहीं होगा। क्योंकि उसके बंदे तो आज़ाद हैं। सुरक्षित हैं और फोन पर भी उपलब्ध हैं, बस आ ही नहीं सकते। अब बारह पंद्रह दिन के लिए खाना बनाने के लिए किसी को तो रखना ही पड़ेगा और संजय तिवारी व्यवस्था कर ही देगा दो बंदों की…ईज़ी।”–अमित बोला।

“सर आपको आता है खाना बनाना ?”–आहना अमित से बोली।

“शादीशुदा हूँ भाई, क्यों नहीं आएगा ?” आरिफ सहित सब हँसे।

*********************
 
रणविजय अपने बेडरूम में बैठा व्हिस्की पी रहा था। प्रीति वाशरूम में गई हुई थी और जुगल उसके सामने वहीं बैठा था। रणविजय होटल से आते समय वास्तव में आर्यसमाज मंदिर ही गया था और पहले प्रीति से बाक़ायदा शादी की थी। ये रणविजय का जहूरा था कि आधा घंटे में पूरी शादी हो गई थी। शाम तक टी०वी० में न्यूज़ भी आ गई थी। कोठी के बाहर लोकल न्यूज़ रिपोर्टरों की अच्छी खासी भीड़ जमा हो गई थी, पर सबको कल सुबह प्रेस कांफ्रेंस करने की बात कह कर लौटा दिया गया था। अलबत्ता उनकी ख़बर की पुष्टि ज़रूर कर दी गई थी।

“पापा।” रणविजय ने जुगल की तरफ़ देखा। “पापा आप क्या पी रहे हो ?”–जुगल उसके व्हिस्की के गिलास की तरफ़ इशारा करता हुआ बोला।

“बेटे, कल दूँगा तेरे सारे सवालों के जवाब, चिंता ना कर।”–रणविजय उसे घूरता हुआ बोला।

“नहीं मुझे अभी बताओ।”–जुगल मचला।

“दारू है, पिएगा ?”

“नहीं मम्मी मारेगी।”

“तो मम्मी को चरस की पुड़िया रख के पकड़ लेना।”–रणविजय लापरवाही से बोला। जुगल बुरी तरह चौंका। पर चौंकने का एक भी भाव उसने चेहरे पर परिलक्षित नहीं होने दिया।

“मम्मी को कोई नहीं पकड़ सकता। मम्मी बहुत बहादुर है।”

“देखेंगे आज तेरी मम्मी की बहादुरी भी।”–रणविजय नया पैग बनाता हुआ बोला।

“मम्मी मारेगी आपको।”

“ले चॉकलेट खा।”–रणविजय ने शर्ट की जेब से चॉकलेट निकालकर उसकी तरफ़ उछाल दी।

“हम नहीं। ये तो खुली हुई है।”–जुगल उसका फटा रैपर देख कर भुनभुनाया।

“अरे तो क्या हुआ ? तू क्या साले सी०बी०आई० में है जो शक कर रहा है ?”–रणविजय उसे अपलक देखता हुआ बोला।

“हम नई, हमें तो नई चाहिए।”–जुगल मचला।

“अबे पगलैट, जो है ले ले, फिर सुबह तेरी क्लास भी तो लगेगी। साले मेरी सुहागरात ना होती, तो अभी लगती।”

“सुहागरात क्या होती है ?”–जुगल आँखें फाड़ कर बोला।

“चॉकलेट खा पहले फिर बताऊँगा।” जुगल जल्दी जल्दी चॉकलेट खा गया, फिर बोला–“खा ली...अब बताओ।”

“दस मिनट रुक जा, फिर बताता हूँ।”–रणविजय मुस्कुराता हुआ बोला।

“हम नई, आप गंदे पापा हो। झूठ बोलते हो।”

“बेटे तेरी सारी मेहनत फेल है। वह जो तू होटल में अख़बार पर कलाकारी कर के आया है ना, उसने तेरी सारी पोल खोल दी है।”–रणविजय हँसा।

जुगल के मस्तिष्क में ख़तरे की घंटी बजी। पर उसने भाव परिवर्तित नहीं होने दिए चेहरे के। “बेटे दाढ़ी मूँछ बनाई तो तूने, खुद को पागल दिखाने के लिए थी, पर अगर ऐसा था, तो इतनी दक्षता के साथ नहीं बनानी थी। वैसे तूने अनाड़ीपन दिखाने की ही कोशिश की थी, पर अनाड़ीपन भी बड़ी दक्षता से किया। और बस यहीं मात खा गया।” जुगल का दिमाग़ घूमने लगा था। उसे रणविजय की आवाज कहीं दूर से आती लग रही थी। वह जितना आँख खोलने की कोशिश कर रहा था उतनी ही बंद हुई जा रही थी। दो मिनट के अंदर ही वह अपनी चेतना खो बैठा और वहीं सोफे पर ढेर हो गया। “साले ठुल्लों, क्यों भूल जाते हो कि सामने रणविजय है।”–वह बुदबुदाया। फिर उसने घंटी बजाई। तुरंत दो नौकर दौड़ते हुए आए। रणविजय ने जुगल की तरफ़ इशारा किया। उन्होंने तुरंत जुगल को उठाया और बाहर चले गए। रणविजय फिर अपने पैग में व्यस्त हो गया। उसका दिमाग बड़ी तेजी से चल रहा था। उसे पता था कि बिना ठोस सबूत के ये लोग उसे गिरफ्तार नहीं कर सकते थे। मौजूदा राजनीतिक माहौल में सरकार को जवाब देना भारी पड़ जाएगा। यानी फ़िलहाल ये लोग सबूत की तलाश में हैं और इसी चक्कर में उसके आस पास सूँघते फिर रहे हैं। सूँघते रहें। क्या हर्ज है ? क्योंकि अब मिलने वाला तो कुछ है नहीं। तब उसके होंठो पर उसकी चिर परिचित मुस्कान आई।

वाशरूम का दरवाज़ा खुला और ख़ुशबू बिखेरती प्रीति बाहर निकली। रणविजय ने उसे देखा, तो देखता ही रह गया। हलके गुलाबी रंग की नाइटी पहने प्रीति बिलकुल खिले गुलाब की तरह लग रही थी। गीले बालों से कंधे के आसपास से नाइटी भी गीली हो गई थी। प्रीति उसके सामने आकर बैठ गई।

“कब तक पियोगे ? चलो डिनर कर लें।”–प्रीति अपने बालों पर तौलिया लपेटती हुई बोली।

“प्रीति तुम खुश तो हो ना ?”

“हाँ, बहुत खुश हूँ। क्यों लग नहीं रही ?”

“लग तो रही हो, पर खुद से कहोगी, तो अच्छा लगेगा।”

“आई लव यू, बस खुश।”

“मेरे खुश होने के लिए तो तुम्हारा सामने होना ही काफी है।”

“हूँ तो सामने।”–प्रीति हँसी।

“कैसे...कैसे कर लेते हो तुम लोग इतना स्वाभाविक अभिनय ? आदमी को पहले से पता ना हो, तो कभी जान ही नहीं सकता।”–रणविजय उसे अपलक देखता हुआ बोला।

“मतलब ?”

“कुछ बताना चाहती हो मुझसे ?”

“क्या ?”–प्रीति सशंक स्वर में बोली। “कुछ भी। जो तुम्हें लगे कि मुझे पता होना चाहिए।”

“क्या कह रहे हो ? मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा।”

“छोड़ो सुबह बात करेंगे। अभी आज हमारी सुहागरात है।”

“सुबह करनी थी, तो अभी शुरू ही क्यों की ?”

“तुम्हें पता है न कि मैं अपनी माँ से बहुत प्यार करता था। और था क्या अब भी करता हूँ। मैंने अपने जीवन में प्यार ही दो से किया है। या तो माँ से या तुमसे।”–रणविजय उसे प्यार से निहारता हुआ बोला। प्रीति के रोंगटे खड़े हो गए। उसने बड़ी कठिनाई से अपने चेहरे पर भय के भाव आने से रोके और मुस्कुराते हुए उसकी तरफ़ देखा।

“अच्छा ये बताओ तुमने मुझे बत्तीस साल पहले ठुकराया क्यों था ?”–रणविजय का मिज़ाज अचानक बदल और उसने मुस्कुराते हुए पूछा।

“क्या हुआ ? क्यों हुआ ? कैसे हुआ ? ये सब छोड़ो। ये देखो कि मैं तुम्हारे सामने बैठी हूँ। तुम मेरे सामने बैठे हो और कोई भी बीच में नहीं है।”

“है ना बीच में।”

“कौन ?”–प्रीति उलझन भरे स्वर में बोली।

“मेरा डर...कि कहीं तुम मुझे फिर छोड़कर न चली जाओ।”

“कभी नहीं विजय, कभी नहीं।”

“प्रीति कुछ तो है तुम्हारे अंदर। पता नहीं क्यों ? पर तुम्हारी बात पर यकीन करने को दिल करता है।”

“इसे ही तो प्यार कहते हैं।”–प्रीति उसकी तरफ़ तिरछी निगाहों से देखती हुई बोली।

“प्रीति तुम्हारा पासपोर्ट यहीं है तुम्हारे पास या इंदौर में घर पर है ?”

“यहीं है मेरे पास क्यों ?”–प्रीति के माथे पर बल पड़ गए।

“इंडिया का है या यू०एस०ए० का ?”

“यू०एस०ए० का है। वह मेरे एक्स हसबैंड के पास यू०एस०ए० की सिटीजनशिप थी, तो मेरा भी वहीं का बन गया। पर क्यों पूछ रहे हो ?”

“क्योंकि अब मुझे भी सिटीजनशिप मिल जाएगी ना वहाँ की। तो वहीं बनाएँगे अपना आशियाना।”

“मैं तो यहाँ इंडिया में ही रहने की सोच रही थी।”

“यहाँ हमें रहने कौन देगा चैन से।”–रणविजय अवसाद भरे स्वर में बोला।

“क्यों ? यहाँ कौन हमारा क्या कर लेगा ?”–प्रीति माथे पर बल डाल कर बोली।

“तुम्हें नहीं मालूम ?”–रणविजय नकली आश्चर्य प्रकट करता हुआ बोला।

“मुझे कैसे मालूम होगा ?”–प्रीति की धड़कन बढ़ गई। जवाब में रणविजय हँसा।

“तुम क्या कह रहे हो, सच में मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा।”

“छोड़ो, सुबह बात करेंगे इस बारे में।”
 
“तो अब क्या करेंगे ?”–प्रीति दोनों हाथ उठा कर अंगड़ाई सी लेती हुई बोली। रणविजय का कलेजा मुँह में आ गया। उसने अपलक उसकी तरफ़ देखा। “अकेले अकेले ही पिए जा रहे हो। एक बार झूठ ही सही मुझसे भी नहीं पूछा।”–प्रीति ने मीठा सा उलाहना दिया।

“क्या पियोगी ?”

“फ़िलहाल तो व्हिस्की ही पी लूँगी।”–प्रीति फिलहाल पर अतिरिक्त ज़ोर देती हुई शरारती स्वर में बोली।

“और बाद में ?” जवाब में प्रीति खिलखिलाई। ऐसी खिलखिलाई कि रणविजय की सारी सतर्कता, सारी चतुराई हवा हो गई।

“ये ‘बाद’ पहले नहीं हो सकती ?”–रणविजय फुसफुसाया।

“पहले तो पहली ही होगी डार्लिंग हसबेंड, तभी तो बाद हंगामाखेज होगी।”–प्रीति भी फुसफुसाई। रणविजय ने झुरझुरी सी ली और हाथ का गिलास एक साँस में खाली कर दिया। उसने काँपते हाथों से अपना और प्रीति का जाम बनाया। प्रीति अपनी जगह से उठी और रणविजय के पास आकर बैठ गई। रणविजय ने उसकी तरफ़ गिलास बढ़ाया जो उसने बड़ी अदा से थामा और मुँह खोल कर धीरे धीरे गिलास मुँह की तरफ़ बढ़ाया। गिलास होंठों से टकराया तो थोड़ी देर उसे होंठो से रगड़ती रही फिर एक छोटा सा घूँट भरा। रणविजय जो अपलक उसे ही देख रहा था, मानो साँस लेना भूल गया।

“क्या हुआ पतिदेव कहाँ खो गए ?” रणविजय हड़बड़ाया और अपना गिलास उठाकर एक साँस में खाली कर दिया। प्रीति हँसी और एक और घूँट भरा।

“प्रीति !”–रणविजय धीमे स्वर में बोला। प्रीति ने उसकी तरफ़ देखा।

“बत्तीस साल हो गए ये सपना देखते देखते। आज मुझे मार ही देना।”

“डिनर मँगवा कर रूम में लगवा लो और रूम लॉक कर लो। तुम्हें तिल तिल करके मारूँगी। तड़पा तड़पा कर मारूँगी।”–प्रीति ने अर्धनिमीलित नेत्रों से उसकी तरफ़ देखा। रणविजय ने तुरंत घंटी बजा दी। अगले आधा घंटे में डिनर भी लग गया और दो दो पैग भी लग गए। डिनर लगते ही रणविजय ने उठ कर दरवाज़ा लॉक कर दिया और प्रीति के पास आकर बैठ गया।

“एक पैग और बनाओ।”–प्रीति लरजती आवाज़ में बोली। रणविजय ने खामोशी से दो पैग तैयार कर दिए। एक प्रीति को थमाया और एक खुद थाम कर बैठ गया। प्रीति ने एक साँस में गिलास खाली किया और लापरवाही से कमरे में एक तरफ़ उछाल दिया। गिलास कालीन होने की वजह से टूटा नहीं।

तैयार ?”–प्रीति उठती हुई बोली। रणविजय ने भी गिलास खाली करके एक तरफ़ उछाला और उठ खड़ा हुआ। प्रीति रणविजय की बाहों में समा गई।

“बत्तीस साल, प्रीति पूरे बत्तीस साल बाद।”–रणविजय ने उसे कस कर जकड़ लिया।

“आज में जियो विजय बाबू और आज की हक़ीक़त ये है कि हम एक दूसरे की बाहों में हैं।” रणविजय ने उसे कस कर बाँहों में भींचा और उसे लिए लिए ही बेड पर लुढ़क गया।

रणविजय के हाथ प्रीति के बदन पर घुमने लग गये। वह भी रणविजय के सारे शरीर को सहला रही थी। आज कुछ जोरदार ही होना है ऐसा वो दोनों ही समझ रहे थे। कुछ ही देर में वो दोनों के कपड़ें शरीर से अलग हो गये और वो दोनों नगें एक दूसरे के साथ लेटे थे। रणविजय के हाथ प्रीति के पुष्ट उरोजों को मसल रहे थे, रणविजय के होंठ तन कर खड़ें निप्पलों पर टुट पड़ें। रणविजय अपनी जीभ से निप्पल के चारों तरफ चाटता रहा। इस से प्रीति के सारे शरीर में उत्तेजना की तरगें उठनी शुरु हो गयी। वह इस का मजा ले रही थी।

उरोजों के बाद रणविजय का ध्यान उस की कमर से नीचे गया और और रणविजय उल्टा हो कर उस की जाँघों के जोड़ पर आ गया। रणविजय ने प्रीति की चिकनी फुली हुई योनि को जीभ से चाटा और उस के बाद योनि के दोनों फलकों को खोल कर उस में अपनी जीभ डाल दी। रणविजय की इस हरकत से प्रीति ने रणविजय का सिर दोनों हाथों से पकड़ कर योनि से सटा लिया। रणविजय अपनी जीभ से उस की योनि का स्वाद चखता रहा।

प्रीति उत्तेजनावश अपनी टाँगें बेड पर पटकने लग गयी। काफी देर तक उस की योनि का रस पीने के बाद रणविजय ने उस की मांसल जाँघो तो चुम कर नीचे पंजों की तरफ चल दिया। दोनों पंजों की सारी उँगलियों को चुस कर फिर से ऊपर की ओर चल दिया। नाभी को चुम कर रणविजय उरोजों को चाटता हुआ गरदन पर आ गया और रणविजय के होंठ उस की लम्बी गरदन पर छा गये। प्रीति के मुँह से आहहहहहहह उहहहहहहह निकलने लग गयी। काम की अग्नि उस के शरीर में भड़क चुकी थी।

रणविजय ने उसे पलटा और उस की पीठ पर चुंबन लेना शुरु कर दिया रणविजय के होंठ उस के नितम्बों पर पहुँच कर उन की गहराईयों में उतर गये। प्रीति का शरीर अकड़ने लगा। अभी तक रणविजय ही अपने मन की कर रहा था। वह पलट गयी और उस ने झुक कर रणविजय के तन कर खडे़ं लिंग को सहलाना शुरु किया और फिर उस की सुपारी पर चुंबन ले कर उसे धीरे से अपने मुँह में उतार लिया। 6 इंच लंबा लिंग उस के मुँह में समा गया। अब काँपने की बारी रणविजय की थी। वह धीरे धीरे अपने मुँह को लिंग के ऊपर नीचे कर रही थी। रणविजय को लग रहा था कि स्खलित ना हो जाऊँ।

प्रीति यही चाहती थी, कुछ देर बाद ही रणविजय प्रीति के मुँह में स्खलित हो गया। रणविजय का गर्म वीर्य उस के मुँह में भर गया। वीर्य इतना था कि उस के होंठों के किनारे से बाहर टपक रहा था लेकिन वह सारा वीर्य निगल गयी। उस ने इस के बाद अपने होंठ रणविजय के होंठों से सटा दिये और रणविजय के कान में बोली "अपने वीर्य का स्वाद लो।" रणविजय के कसैले वीर्य का स्वाद रणविजय के मुँह में भर गया। वो दोनों एक दूसरे के होंठों को बुरी तरह चुमने लग गये। काफी देर तक ऐसा ही चला। फिर दोनों के होंठ अलग हो गये। रणविजय का सारा शरीर निचुड़ सा गया था।

प्रीति उठी और रणविजय के चेहरे पर बैठ गयी उस की योनि द्रव टपकाती योनि रणविजय के मुँह के ऊपर थी। वह चाहती थी कि रणविजय उस की योनि को चाटे यही रणविजय ने किया और रणविजय फिर से उस की योनि चाटने लगा। कुछ देर बाद रणविजय की जीभ उस की योनि में घुस गयी। उस की योनि का कसैला स्वाद रणविजय की जीभ को भा रहा था और रणविजय की जीभ योनि की गहराई में जा कर उसे चाट रही थी।

कुछ देर बाद प्रीति के कुल्हें हिलने लगे और वह अपनी योनि को रणविजय के मुँह पर दबाने लग गयी। कुछ देर बाद ही उस का शरीर बुरी तरह काँपा और वह आर्गाज्म को पा गयी। उस की योनि से निकला द्रव रणविजय के मुँह में भर गया। रणविजय भी उसे निगल गया। रणविजय के हाथ उस के स्तनों को मसलने लगे। वह कुछ देर बाद रणविजय के ऊपर लेट गयी। रणविजय ने उस के होंठों को चुम लिया। उस की योनि के द्रव का स्वाद उस ने भी चख लिया।

रणविजय ने उसे आलिंगन में भर लिया। वो दोनों काफी देर तक ऐसे ही पड़ें रहे। जब सांसे सही हुई तो वो दोनों एक दूसरे की बगल में लेट गये। रणविजय उस के ऊपर आ गया और उस की टाँगे अपने कंघों पर रखी और रणविजय का लिंग उस की योनि में समा गया। रणविजय जोर जोर से उस की कसी योनि में लिंग को अंदर बाहर करने लग गया। काफी देर तक वो इसी आसन मे संभोग करते रहे। फिर रणविजय ने उस की टाँगें नीचे कर दी और रणविजय के कुल्हें उस की योनि पर प्रहार करने लग गये। चरमराहट, आहें और सिसकियां कमरे में भरने लगी। वो करवटें बदलने लगे और बदनों के आपस में रगड़ने से पैदा हुई ध्वनियां चारों तरफ छा रही थी।

वो दोनों ही पाशविक उर्जा के साथ संभोगरत थे। आज वो दोनों में उर्जा भरपुर थी और वह संबंधों में दिख रही थी। मैने करवट बदली और प्रीति रणविजय के ऊपर आ गयी। उस के कुल्हें हिल हिल कर रणविजय की जाँघों पर जोर डालने लग गयी। संभोग लंबा चल रहा था इस कारण दोनों ही पसीने से नहा गये थे लेकिन चरमोत्कर्ष नहीं आ रहा था।

उत्तेजनावश दोनों ही बेड पर करवटें बदलने लगे। बेड भी कराहने लग गया। सिसकियां आहे और कराहे तेज होती जा रही थी। रणविजय का मुँह सुख रहा था। फिर जोरदार स्खलन हुआ और रणविजय का सारा शरीर सनसना गया। लिंग से वीर्य का विस्फोट सा हुआ, उसी समय प्रीति भी चरम पर पहुँची और उस की योनि का द्रव रणविजय के लिंग को भिगोने लग गया।

कुछ देर तक वो दोनों अपने चरम का आनंद उठाते रहे फिर अलग हो कर अगल बगल लेट गये।
 
सुबह सात बजे का समय था जब संजय तिवारी कोठी पहुँचा। रणविजय के बेडरूम का दरवाज़ा अभी नहीं खुला था। वह ऑफिस में पहुँचा तो कोठी का इंचार्ज त्रिलोकी उसे वहीं बैठा मिला। त्रिलोकी ही कोठी के स्टाफ और बाकी ज़रूरत के सारे कामों का इंचार्ज था। “नमस्कार तिवारी जी।”–संजय तिवारी के वहाँ पहुँचते ही वह उठ खड़ा हुआ।

“अरे बैठो बैठो त्रिलोकी भैया।”–संजय तिवारी अपनी सीट पर बैठता हुआ बोला। तिवारी ने जेब से चाबी निकाली और अपनी टेबल की ड्रॉअर खोलकर अपना हैंडबैग उसमें रखा और डायरी निकाल कर ड्रॉअर को ताला लगा दिया।

“और त्रिलोकी भैया मिठाई कहाँ है हमारी ? टी०वी० पर न्यूज़ आ रही है कि साहब ने शादी कर ली कल।”

“जी तिवारी जी बात तो सच है। दावत तो आज होनी ही थी, पर एक दिक़्क़त हो गई। सुबह ही फोन आया है हरिहर का कि उनके मोहल्ले में कोई कोरोना का केस मिला है, तो प्रशासन ने उसका मोहल्ला ही सील कर दिया है। अब ना तो वह आ पाएगा और ना ही दिनेश। क्योंकि दिनेश भी उसी के मोहल्ले में रहता है।”

“अरे ये तो ख़तरे वाली बात हो गई। जो केस मिला है उससे इनका मिलना जुलना था क्या ?”–तिवारी कनखियों से त्रिलोकी को देखता हुआ बोला।

“नहीं दोनों मना कर रहे हैं कि उससे उनका कोई मिलना जुलना नहीं था। वैसी कोई खास चिंता की तो बात नहीं है, लेकिन चौदह पंद्रह दिन वे लोग आ नहीं पायेंगे। अब नाश्ता और खाना तो सब वही बनाते थे। बस यही समस्या हो हो गई है। रात का डिनर बना कर दोनों ग्यारह बजे गए थे। अगर पता होता तो रात यहीं रोक लेते।

“उनका मिलना जुलना उस कोरोना पॉज़िटिव से नहीं था, केवल इसी बात से ख़तरा कम नहीं हो जाता त्रिलोकी जी।”–तिवारी चेतावनीपूर्ण लहजे में बोला।

“मतलब ?”

“मतलब ये कि कोई कॉमन मिलने वाला भी हो सकता है, जो उस बंदे से मिलकर इनसे मिला हो।”

“फिर क्या करना चाहिए ?”–त्रिलोकी इस बात पर विचार करता हुआ बोला।

“प्रशासन उस बंदे के मेलजोल वालों का लिंक निकाल कर कोरोना टेस्ट करवायेगा। अगर हरिहर या दिनेश उस लिस्ट में आ गए और उन में से कोई पॉज़िटिव आया, तो हम सब को भी यहाँ अंदर ही होम क्वारंटाइन किया जाएगा। इसलिए तुरंत खाने पीने की और बाकी ज़रूरत की सब चीजें मँगवा कर रखो। चौदह दिन तक किसी भी चीज़ की कमी नहीं होनी चाहिए।”

“ठीक है। मैं मँगवा लूँगा।”

“अभी तुरंत मँगवा लो। कोई गारंटी नहीं है कि कब कोठी सील हो जाए। अभी दस मिनट में भी हो सकती है, और हो सकता है कि शाम तक भी ना हो। या शायद हो ही ना, पर हमें तैयार रहना चाहिए।”

“पर बावर्ची का इंतजाम भी तो करना है। वह इतनी जल्दी कैसे होगा?”

“अरे वह मैं देखता हूँ। आप सामान मँगवाओ।”

“नहीं, उसे ऐसे ही नहीं रख सकते। सुरक्षा का सवाल है। बिना स्क्रीनिंग के कैसे रखे जा सकते हैं ? कल शाम ही आफताब सर का फोन भी आया था। उनका सख़्त आदेश है कि कोई नया आदमी अंदर नहीं आएगा।”

“मेरे सगे भतीजे हैं। हैदराबाद में थे। लॉकडाउन की वजह से वापस आ गए थे। अब अगले महीने से होटल वग़ैरह खुल रहे हैं, तो वापस चले जाएँगे। तुम्हारे पास या आफताब भाई के पास कोई और इंतज़ाम हो तो देख लो।”

“आपके अपने सगे भतीजे हैं, तो फिर तो इससे बढ़िया कोई बात ही नहीं है। आप बुला लो उन्हें तुरंत।”

“तुम सामान वग़ैरह मँगवाओ और हाँ एम०पी० साहब की सिगरेट का ध्यान रखना और स्कॉच वग़ैरह सब देख लो।” त्रिलोकी सहमति में सिर हिलाता हुआ उठकर अंदर को चला गया। संजय तिवारी ने मोबाइल जेब से निकाला और कॉल करने में व्यस्त हो गया।

*********************
 

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