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Thriller तरकीब

“अब ?”–कार की स्टेयरिंग को थपथपाता हुआ राज बोला।

तभी राज वापस आया।

“अच्छा वृन्दा जी अब इजाज़त दीजिए। फिर मुलाकात होगी आपसे।”–राज डॉली को चलने का इशारा करता हुआ बोला।

वृन्दा ने एक गहरी नजर राज पर डाली और उठ कर हाथ जोड़ दिए।

“अपना ध्यान रखिएगा वृन्दा जी। खतरा अभी टला नहीं है।”

“जी मैं ध्यान रखूँगी।”–वृन्दा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई। राज और डॉली रवाना हो गए।

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“अब ?”–कार की स्टेयरिंग को थपथपाता हुआ राज बोला।

“कहाँ चलें ?”–डॉली बोली।

“अरे मैं भी तो यही पूछ रहा हूँ।”

“यहाँ से निकलिये। फिर सोचते हैं।”–डॉली बोली।

राज ने सहमति में सिर हिलाया और कार स्टार्ट करके आगे बढ़ा दी।

“अब ?”–मेन रोड पर आते ही राज बोला।

“सर जी, दो ही रास्ते हैं। लेफ्ट को चले तो मवाना पहुँचेंगे। आपको मवाना जाना है ?”

“नहीं।”

“तो ऑप्शन बचा ही क्या ? चलो दाहिने हाथ को।”

“डॉली कुछ ज्यादा ही स्मार्ट टॉक नहीं करने लगी है तू आजकल मेरे साथ ?”–राज दाईं तरफ कार मोड़ता हुआ बोला।

“अरे सर हम गरीबों की ऐसी मजाल कहाँ ?”

“गरीब ! अभी-अभी पाँच मिनट पहले पाँच लाख कमाये हैं। काहे की गरीब है तू ?”

“अब कमाये हैं तो उन पैसों का हक अदा करने की भी सोचो।”

“मतलब ?”

“मतलब यू–टर्न लो। अब आये हैं तो इंचौली थाने में आई०ओ० से ही मिलते चलें। क्या पता कुछ नया जानने को मिल जाये ?”

राज ने कार रोड के किनारे कर के रोक दी और कुछ देर सोचने के बाद सहमति में सर हिलाते हुए यू–टर्न लिया और वापस चल पड़ा। पंद्रह मिनट बाद कार थाने के बाहर खड़ी थी। रास्ते मे राज ने अनिल को फोन करके आई०ओ० का नाम पूछ लिया था। दोनों कार से उतर कर थाने में पहुँचे। बाहर ही एक सिपाही से सब इन्स्पेक्टर संजय सिंह के बारे में पता किया और सिपाही के बताए कमरे में पहुँचे। संजय सिंह कोई बत्तीस तैंतीस साल का स्मार्ट सा नौजवान था। गिरीश दुबे गुमशुदगी केस की तफ्तीश वही कर रहा था। संजय बड़े प्रेमभाव से उनसे मिला। उसके पास अनिल का फोन आ गया था।

“अनिल का फोन आया था। कह रहा था कि आप लोगों की मदद करने के लिए। बताइए क्या मदद कर सकता हूँ आपकी ?”–उसने अपनी टेबल के सामने पड़ी कुर्सियों पर बैठने का इशारा करते हुए कहा।

डॉली और राज बैठ गए तो वह भी अपनी कुर्सी पर बैठ गया।

“बताइए क्या कर सकता हूँ मैं आपके लिए ?”–उसने दोबारा पूछा।

राज ने अपना और डॉली का परिचय दिया और आने का मकसद बताया।

“हम्म।”–वह कुछ सोचने लगा। “देखिए वकील साहब, अनिल मेरा बहुत अच्छा दोस्त है। लेकिन ये नियम विरुद्ध है। तफ्तीश के दौरान जाँच शेयर करना तो गलत होगा।”

“अरे इंस्पेक्टर साहब हम वकील हैं। आप पुलिस हो। हमारा आपका रोज का साथ है। छोड़िये ना ये नियम कानून की बातें। सब चलता है।”

“वकील साहब ! मैं कहूँगा तो आप यकीन नहीं करोगे। फिर भी कहता हूँ। मैं पुलिस में हूँ, पर आज तक ना तो एक रुपया रिश्वत ली और ना ही कोई नियम विरुद्ध काम किया है।”–संजय के स्वर में गर्व का पुट था।

राज हँसा।

“मैं सच कह रहा हूँ वकील साहब। बहुत ही धनाड्य परिवार से बिलोंग करता हूँ। नौकरी तो मैं अपने शौक के लिए करता हूँ।”–संजय थोड़े रुष्ट स्वर में बोला।

“वाह।”–डॉली प्रशंसामिश्रित निगाहों से संजय को देखते हुए बोली।

“जी।”–संजय ने उसकी तरफ देखा।

“सर हम फिल्मों के नायकों को नायक मानते हैं, लेकिन असली नायक तो आप हैं।”

“अरे आप तो शर्मिंदा कर रही हैं।”–संजय के चेहरे पर कोमलता के भाव आ गए।

“नहीं सर, मैं सच कह रही हूँ। आज के जमाने में कितने होंगे अपने फर्ज के प्रति ईमानदार पुलिस अफसर ?”

“और भी होंगे। कई होंगे। पर चाहे कोई एक भी ना होता, तो भी मैं जरूर होता।”

“अब मुझे भरोसा हो गया है कि इस केस में अपराधी का बचना असंभव है।”

“यकीन रखिये नहीं बचेगा।”–संजय अधिकाधिक गंभीर दिखने का प्रयास करते हुए बोला।

“मुझे यकीन है सर।”

“आप चाय लेंगी ?”–संजय मीठे स्वर में बोला।

“अरे नहीं सर, आप क्यों नाहक तकलीफ करते हैं।”

“कोई तकलीफ नहीं होगी। यकीन मानिये मुझे खुद नहीं बनानी पड़ेगी।”–संजय बोला, फिर खुद ही अपने घटिया पंच पर हँसा। उससे भी तेज खिलखिलाई डॉली ।

राज ने हैरानी से डॉली की तरफ देखा। डॉली ने हँसते हँसते राज की तरफ अपनी बाईं आँख हल्की सी दबा दी। संजय ने मेज पर पड़ी घंटी दबाई। घंटी के जवाब में आये सिपाही को चाय के लिए बोला और फिर डॉली की तरफ मुखातिब हो गया। “वैसे ये काम वकीलों का तो है नहीं।”

“जी सही बताऊँ तो इस काम का वकालत से कुछ लेना देना है भी नहीं। दरअसल मैं एक किताब लिख रही हूँ जो एक कर्तव्यनिष्ठ ईमानदार पुलिस अफसर पर आधारित है। तो मैं पुलिस के बारे में जानना चाह रही थी कि वह कैसे अपराधी का पता लगा लेते हैं। कैसे वह कड़ी दर कड़ी सबूतों को इक्कठा करके अपराधी को दबोच लेते हैं।”

“ओह्ह तो इसमें क्या है ? ये तो मैं ही आपको बता दूँगा। इसमें तो कोई हर्ज नहीं।”–संजय मीठे स्वर में बोला।

“ओह्ह थैंक यू सर। सर एक बात और थी।”

“जी डॉली जी कहिए।”

“सर क्या मैं अपनी किताब के हीरो का नाम आपके नाम पर संजय रख सकती हूँ ?”–डॉली ने हौले से पूछा।

“जी बिल्कुल। नाम पर किसी का क्या कॉपीराइट। पर आप मुझे कुछ ज्यादा ही मान दे रही हैं।”–संजय का स्वर कोमलता, मिठास और सज्जनता के चरम तक आ पहुँचा था।

“थैंक यू सर।”–डॉली ने बच्चों की तरह खुश होकर दिखाया। संजय मंत्रमुग्ध सा उसे देखता रह गया। तभी सिपाही ने चाय लाकर टेबल पर रख दी। संजय ने तत्काल एक चाय का गिलास उठाया और डॉली की तरफ बढ़ाया।

“थैंक्स।”–डॉली मुस्कुरा कर बोली और चाय का गिलास थाम लिया।

संजय ने दूसरा गिलास उठाया और अपनी कुर्सी पर बैठ गया। इस दरम्यान एक पल के लिए भी उसकी निगाह डॉली के चेहरे से हटी नहीं थी। तीसरा गिलास उपेक्षित सा मेज पर रखा था जिसे उठाने के प्रयास में राज को करीब करीब मेज पर लेट सा जाना पड़ा।

“तो सर, जैसे आपके पास किसी गुमशुदगी की रिपोर्ट आती है तो सबसे पहले पुलिस क्या करती है ?”–डॉली ने चाय में चुस्की मारते हुए सहज भाव से पूछा।

“हम पहले घर वालों को उसे तलाश करने के लिए बोलते हैं। अगर चौबीस घंटे तक भी उसका कोई पता नहीं चलता तो एफ०आई०आर० लिख कर कार्यवाही शुरू कर देते हैं।

“गिरीश दुबे के मामले में भी आपने यही किया होगा ?”

“नहीं, ये मामला थोड़ा अलग था। एक तो ये एक बड़े उद्योगपति का मामला था, दूसरे उसकी कार सड़क किनारे लावारिस खड़ी बरामद हो गई थी जिससे उसके खुद कहीं जाने की संभावना कम थी। हालाँकि हमने एफ०आई०आर० तो अगले रोज ही लिखी थी, लेकिन अपनी कार्यवाही तुरंत ही शुरू कर दी थी।”

“और कुछ बताइए ना इसके बारे में। फिर आपने क्या किया, कैसे खोजबीन शुरू की।”–डॉली ने दोनों कोहनियाँ टेबल पर टिका कर हथेलियों पर चेहरा रख कर संजय के चेहरे पर नजरें टिका लीं।

जवाब में वह कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, उसूलों का पक्का युवा इंस्पेक्टर गा गा कर सारा किस्सा सुनाने लगा। चेहरे पर प्रशंसा के अपरिमित भाव लिए डॉली सुनती रही।

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“वाह री डॉली ! तूने तो कमाल ही कर दिया!”–वापसी में राज उसकी तरफ ताऱीफी निगाहों से देखता हुआ बोला।

डॉली शान से मुस्कुराई।

“कहाँ से सीखी ये कला ?”

“मेरे तो हर चीज के गुरु आप ही हो।”–डॉली शरारती स्वर में बोली।

“मतलब ?”–राज चौंका।

“वह जब आप वृन्दा आंटी को अठारह साल की लगती हैं बता रहे थे तभी मैंने आपको गुरु मान लिया था।”

“अठारह ?...अरे मैंने इक्कीस बाइस कहा था।”

“चलो इक्कीस ही सही। पर जब चालीस साल की औरत को इक्कीस की बताया तो कला का प्रदर्शन तो हुआ ही ना ? बस मैंने भी सीख लिया।”

“डॉली भगवान से डर चालीस की कहाँ से है वह ?”–राज ने उसे घूरा।

“आप बताओ कहाँ कहाँ से नहीं है ?”–डॉली ने निर्भीक अंदाज में उससे आँख मिलाई।

“अब मैंने उसे इस तरह से थोड़े ही देखा था।”–राज हड़बड़ाया।

“जब कुछ देखा ही नहीं, तो सत्रह की बेमतलब ही बता दिया।”

“सत्रह ?”–राज की बेसाख्ता हँसी निकल गई।

“इसमें हँसने की कौन सी बात है ?”

“डॉली ...डॉली ...तू अतिशयोक्ति अलंकार में बात क्यों करती है ?”

“मैं तो नहीं करती।”

“अच्छा छोड़ अब बता कहाँ चलें ? घर ही चलते हैं। लंच का भी टाइम हो रहा है।”

“ठीक है। पर मारुति की एजेंसी होते हुए चलेंगे।”

“क्यों वहाँ क्या करना है ?”

“वहाँ ट्रू वैल्यू पर कोई सेकंड हैंड कार देखनी है।”

“तुम कार ले रही हो ?”–राज ने उसकी तरफ देखा।

“क्यों ? क्या गरीब कार नहीं ले सकता ?”

“अरे, मतलब सेकंड हैंड कार लेनी है तुम्हें ?”

“हाँ तो ? गरीब सेकंड हैंड कार ही लेता है।”

“नहीं नहीं सेकंड हैंड नहीं। अगर लेनी है तो नई लो।”

“नई तो बहुत महँगी आती है। और नई में जो सस्ती आती है, वह मुझे लेनी नहीं है। और क़िस्त वाला कोई चक्कर भी नहीं पालना मुझे।”

“ठीक है, तो तुम मेरी कार ले लो। सिर्फ छह महीने पुरानी है।”

“आप कितने की दोगे ?”–वह उत्सुक भाव से बोली।

“जो चाहे दे देना।”

“फिर आप क्या चलाओगे ?”

“देख, ऑफिस या चैम्बर तो तेरे साथ ही जाना होगा।”

“हाँ।”

“और कभी कहीं और जाना होगा तो कार तो घर पर ही खड़ी रहा करेगी। तो तुझसे माँग लिया करूँगा। दे तो दिया करेगी न ?”

“हाँ।”–वह अनिश्चित से स्वर में बोली।

“बस तो सौदा पक्का। आज बल्कि अभी से ये कार तेरी हुई।”–राज ने कार सड़क के किनारे करके रोक दी और कार से बाहर निकल आया।

“क्या हुआ बाहर क्यों आ गए ?”–डॉली भी कार से उतर कर उलझन भरे स्वर में बोली।

“ये लो चाबी और अपनी कार खुद चलाओ।”–राज उसे कार की चाबी थमाकर साइड वाली सीट पर आकर बैठ गया।

डॉली ने असमंजस में चाबी थामी और ड्राइविंग सीट पर आकर बैठ गई। “पर पहले पैसे बताओ।”–वह शंकित सी नजर आ रही थी।

“दो लाख।”

“आप मजाक कर रहे हो ना ?”

“तेरी कसम केवल दो लाख में ये कार तेरी हो गई।”

“पर आप इतनी सस्ती क्यों दे रहे हो ? ये तो बिल्कुल नई है।”

“किसी और को थोड़े ही दे रहा हूँ तुझे दे रहा हूँ। बाकी एक दो दिन रुक जा सब समझ जायेगी।”

“क्या समझ जाऊँगी ?”–वह चिहुँकी।

“कह तो रहा हूँ एक दो दिन में पता चल जाएगा।”

“नहीं मुझे अभी बताओ।” राज हँसा।

“बताओ।”

“अरे कुछ नहीं है। मैं नई ‘महिंद्रा थॉर’ लाऊँगा।”

“तो भी इतनी सस्ती क्यों दे रहे हो ? क्या इंजन में कुछ खराबी है ?”

“तुम्हे दे रहा हूँ तो फिर क्या महँगी, क्या सस्ती। अब तुमने मेरा काम इतने अच्छे से संभाला है। और फिर कार होगी तो और ज्यादा काम करोगी तो मुझे ही तो फायदा होगा।”

“हाँ ये तो है। तो फिर ये कार मेरी। आप आज के मेरे शेयर में से दो लाख काट लेना।”

“डन।” डॉली ने कार स्टार्ट की और गेयर डाल कर आगे बढ़ा दिया।

“डॉली तुम्हारी कार में पेट्रोल कम होगा। आगे कंपनी गार्डन वाला पेट्रोलपंप आये तो पेट्रोल भरा लेना।”–थोड़ा आगे जाने पर राज बोला।

डॉली ने उसकी तरफ देखा तो उसे आँख मूँदे हेडरेस्ट पर सर टिकाए पाया। डॉली ने पेट्रोल पंप पर कार लगा कर पेट्रोल टैंक खोल दिया

। “कितना डालना है मैडम।”–सेल्समैन खिड़की के पास आकर बोला।

डॉली ने राज की तरफ देखा। वह इन सब से निर्लिप्त आँख बंद किये पसरा हुआ था। “बताओ मैडम।”

“पाँ...पाँच सौ का डाल दो।”

“ज़ीरो देख लो मैडम।” “देख लिया ठीक है।”–डॉली एक निगाह पंप के मीटर पर डाल कर राज को गौर से देखती हुई बोली। सेल्समैन पेट्रोलटैंक बंद करके खिड़की पर आया। डॉली ने फिर एक निगाह राज पर डाली और अपनी जीन्स की जेब से एक पाँच सौ का नोट सेल्समैन को थमाया और खिड़की के शीशा बंद कर के कार आगे बढ़ा दी।

“तो आज तो दावत दोगी ?”–कार के पेट्रोल पंप छोड़ते ही राज आँख खोलकर सीधा होकर बैठता हुआ बोला।

“वह किस खुशी में ?”–उसने राज की तरफ देखा।

“अरे आज तुमने अपनी पहली कार खरीदी है।”

“हाँ सर वह तो है।”–वह तनिक खुश हुई।

“तो दावत पक्की ?”

“बिल्कुल पक्की।”

“वैसे डॉली जितनी बातें बताई हैं उस इंस्पेक्टर ने, उस हिसाब से तुम्हारा क्या ख्याल है ?”–राज अचानक गंभीर होता हुआ बोला।

“इस अमर शर्मा से मिलना पड़ेगा सर।”

“सही पकड़े हैं।”–राज उसकी तरफ ताऱीफी निगाह डालता हुआ बोला।

“ये तो उससे मिल कर ही पता चलेगा कि सही है या गलत है।”

“मिलना तो एक बार सभी से पड़ेगा जो जो इस गिरीश दुबे से कनेक्टेड हैं।”

“अभी घर पर बैठ कर एक लिस्ट बनाते हैं सब की।”–डॉली बोली।

“डॉली अगर हम पता ना लगा पाए अपराधी का तो ?”–

राज संशय भरे स्वर में बोला।

“तो क्या ? उस हालात में हम पुलिस द्वारा पकड़े गए अपराधी को ही प्लेट में सजा के आंटी जी को पेश कर देंगे।”

“नहीं डॉली , वृन्दा इतने पैसे खर्च कर रही है हम ऐसा कुछ नहीं कर सकते।”

“आप जी लगाना भूल गए।”–डॉली उसे घूरती हुई बोली।

“क्या ?”

“आप वृन्दा के आगे ‘जी’ लगाना भूल गए।”–डॉली घर के गेट के आगे गाड़ी रोकती हुई बोली।

“ओह्ह सॉरी बेध्यानी में ऐसा हुआ।”–राज कार से उतर कर कोठी का गेट खोलता हुआ बोला।

“बेध्यानी में हुआ तो फिर तो और भी खतरनाक बात है मिस्टर सर।”–डॉली होंठों ही होठों में बड़बड़ाई और कार अंदर पोर्च में लाकर खड़ी कर दी। राज कोठी के अंदर चला गया और डॉली कार को चारों तरफ से घूम घूम कर देखने लगी।

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“सर अब आगे क्या करेंगे हम ?”–डॉली थोड़े उद्विग्न स्वर में बोली। लंच के बाद दोनों ड्राइंगरूम में बैठे कॉफी पी रहे थे।

“अभी सब कुछ बिखरा बिखरा सा है। यहाँ तक कि क्या अपराध हुआ है ये भी साफ नहीं है। अभी सिर्फ गिरीश गायब है। अब उसका अपहरण हुआ है या उसकी हत्या हो गई है अथवा वह किसी साजिश के तहत खुद ही गायब हुआ है कुछ पक्का नहीं है। अब या तो गिरीश की लाश मिले या गिरीश सही सलामत वापस आ जाये तब खुलेगा जाँच पड़ताल का रास्ता।”

“और तब तक क्या करें ?”

“तब तक अमर, गिरीश और राहुल की कुंडली निकलवाते हैं।”–राज कुछ सोचता हुआ बोला।

“निकलवाते हैं ? किससे निकलवाते हैं ?”–डॉली उत्सुक स्वर में बोली।

“है एक बंदा मेरे पास जो ऐसे काम का माहिर है।”

“कौन है ?”

“देशराज सिंह।”

“अब ये हजरात कौन हैं ?”

“सस्पेंडेड पुलिस सब-इंस्पेक्टर है। आजकल प्राइवेट डिटेक्टिव का ऑफिस खोल रखा है। मेरे पिता ने ही इसका केस लड़ कर इसे जेल जाने से बचाया था। आदमी तो अक्खड़ है लेकिन मेरा बहुत सम्मान करता है।”

“क्या किया था इसने ?” रोहटा रोड थाने में था। रात के बारह बजे रोड पर चेकिंग चल रही थी। किसी इनामी बदमाश के आने की खबर थी। दो लड़के एक कार में आ रहे थे। उन्होंने डर कर कार भगा दी। तभी उनकी कार के साइलेंसर में बैक फायर की आवाज हुई। हमारे दरोग़ा जी समझे फायर हुआ है। उन्होंने कॉउंटर फायर में दोनों को मार गिराया। बाद में पता चला दोनों कॉलिज गोइंग इन्नोसेंट बच्चे थे।”

“ओह्ह कब की बात है ये ?”

“चौदह पंद्रह साल पुरानी बात है।”

“वहाँ और भी पुलिस वाले होंगे उन्होंने क्या किया था ?”

“हाँ, चार पुलिसवालों पर मुकदमा चला था। पर वह दोनों लड़के इन्हीं दरोगा जी की गोली का शिकार हुए थे तो बाकी लोगों की तो नौकरी भी बच गई।”

“ये कर देगा ये काम हमारे लिए ?”

“भूल गई इसका क्या काम है अब ? अरे हम कोई फ्री में थोड़े ही करवायेंगे। इसकी फीस देंगे।”

“फिर ठीक है सर।”

“शाम को चलेंगे इसके ऑफिस।”

“ठीक है सर।”

“डॉली एक बात बताओ।”–अचानक राज को कुछ ध्यान आया। डॉली ने सवालिया निगाहों से राज की तरफ देखा।

“तुमने कभी अपने घरवालों के बारे में कुछ बताया नहीं। कौन कौन है घर में ?”

“छोड़ो भी सर।”–डॉली फीकी मुस्कान के साथ बोली।

“क्यों ?”

“प्लीज् सर जाने दो। ये समझ लो बस मैं ही मेरा परिवार हूँ।”

“पर तुमने तो कहा था कि तुम्हारे घर वाले चाहते हैं कि तुम उनके पास चली जाओ। इसलिये वह तुम्हें कोई पैसे नहीं देते।”

“वह तो झूठ बोला था। दरअसल सच इतना लंबा था कि अजनबियों से पहली मुलाकात में कहा नहीं जा सकता था।”–उदासी डॉली की आँखों से झलकने लगी थी।

“डॉली मैं भी दुनिया मे अकेला ही हूँ। मैंने भी अपनी लड़ाई खुद ही लड़ी है। यूँ उदास होना, निराश होना ठीक नहीं।”

“आपने ये लड़ाई पुरुष के रूप में लड़ी है और उसपे भी अमीर के रूप में लड़ी है। ज़मीन आसमान का अंतर है आपकी और मेरी लड़ाई में।”

“दुख बोल देने से हल्का हो जाता है।”

“छोड़ो सर। मेरा दुख भूले रहने से ही कंट्रोल रहता है।”

“मर्जी तुम्हारी।” “बताऊँगी किसी दिन। पर अभी नहीं प्लीज।”

“ठीक है ठीक है छोड़। मूड खराब मत कर अपना। दावत की तैयारी कर जो आज देनी है।”

“बताओ क्या दावत लोगे ? देखो मैं जिस टाइप की लड़की हूँ, खुद कुछ बनाऊँगी, ये उम्मीद तो लगाना मत। जो खाना है बताओ। मैं ऑनलाइन मँगवाऊँगी।”

“ये क्या बात हुई ?”–राज निराशा सी जाहिर करता हुआ बोला।

“अब हुई या नहीं हुई। पर मेरे बस की रसोई में लगना नहीं है वह भी गर्मी में।”

“तो बता फिर कैसे बनेगी बात ?”

“अच्छा बताओ क्या खाओगे ?”

“अच्छा छोड़ो दावत ड्यू रही। जब रेस्टोरेंट खुल जायेंगे तब वहीं चलकर दे देना।”

“डन।”

“सही है। तो फिर काका बना लेंगे जो बनायेंगे। तुम भी जाओ फ्रेश हो लो।”

“ओके सर।”–डॉली उठी और ऊपर अपने कमरे में चली गई। राज वहीं सोफे पर लेट गया और डॉली के पास्ट के बारे में सोचने लगा। सोचते सोचते ना जाने कब उसकी आँख लग गई। राज की आँख खुली तो सात बजने को थे। वह उठा और बाथरूम होकर आया और बार कॉउंटर पर बैठ गया। वैसे वह वीकेंड पर ही थोड़ी बहुत ले लेता था पर आज पता नहीं क्यों इच्छा सी होने लगी। उसने सामने उल्टे रखे गिलासों में से एक गिलास सीधा किया और पीछे कैबिनेट में से एक पौनी भरी ग्लेनलिवेट की बोतल निकाली और चौथाई गिलास पूरी नफासत से भर लिया, फिर उठकर गया और फ्रिज में से बर्फ की ट्रे निकाली और लेकर आइस बकेट में डाल ली। दो आइस क्यूब गिलास में डाली और तसल्ली से टिक कर बैठ गया, गिलास उठाया और एक घूँट पी कर गिलास वापिस रख दिया।

“ये आज मन क्यों बेचैन हो रहा है ?–“उसने खुद से प्रश्न किया और उत्तर ढूँढ़ने लगा।

“ओह हो...बोरियत है इस बेचैनी का कारण।”–तीसरा पैग जो उसने थोड़ा हैवी बनाया था, पीते समय उसे उत्तर मिल ही गया। हालाँकि उस समय तक ना बोरियत बची थी और ना बेचैनी।

“ये क्या सर आज अकेले ही बैठ गए ?”–उसने निगाह उठाई तो सामने दोनों हाथ कमर पर रखे डॉली खड़ी थी।

“पता नहीं क्यों पर आज मन नहीं लग रहा था।”–राज थोड़ा शर्मिंदा सा होते हुए बोला।

“कोई नहीं। होता है कभी-कभी। मेरा खुद आज मन नहीं लग रहा। शायद अतीत में थोड़ा सा झाँक लिया इसलिए।”–डॉली उसके सामने एक बार चेयर पर आ बैठी।

“कोई नहीं। होता है कभी-कभी।”–राज ने उसकी बात उसी को लौटाई और हँस पड़ा।

“क्या मजा आता है सर इसे पीने में जो आदमी अकेला बैठा भी पीकर खुश होता रहता है।”

“ये तो पता नहीं कि क्या होता है पर जो भी होता है बहुत खूब होता है।”–राज तरन्नुम में बोला।

“सर एक बात बताओ आप के पास भगवान का दिया सब कुछ है। आप अकेले इतने बड़े घर में रहते हो। शादी क्यों नहीं कर लेते ?”

“शादी और मैं !”–राज जोर से हँसा।

“क्यों क्या कोई फ़िज़िकल कमी है आप में ?”–डॉली ने मासूमियत से पूछा।

“ओह्ह शटअप।”–राज का चेहरा लाल हो गया।

“तो फिर इसमे हँसने की क्या बात थी ?”

“वह बात नहीं। दरअसल मुझे शादी में ही विश्वास नहीं है। मैंने जितने भी शादीशुदा लोगों को देखा है किसी को भी खुश नहीं देखा। अपने इस जीवन से असंतुष्ट ही देखा। भले ही वो पुरुष हो या महिला। सबको पशेमान ही देखा।”

“ऐसा नहीं है।”–डॉली असहमति प्रकट करती हुई बोली।

“ऐसा ही है। अब देख, आज मेरा मन हुआ तो पीने बैठ गया। अगर पत्नी होती तो बहस होती। लड़ाई होती, कुछ भी होता, लेकिन होता जरूर।”

“तो वह तो आपकी माँ होती तो भी होता। बहन होती तो भी होता। सिर्फ़ बीवी पर तोहमत क्यों ?”

“नहीं तब नहीं होता। और अगर होता भी तो वैसे नहीं होता।”

“आप सहित जितने लोग भी पत्नी का रोना रोते हैं, दरअसल वह औरत को समझ ही नहीं पाते। ना औरत को, ना औरत के प्यार को।” राज हँसा। एक अवज्ञापूर्ण हँसी हँसा।

“आप हँस सकते हो। लेकिन ये हँसी अहंकार की हँसी है। इसमें दर्प है। इसमें देने की ताकत होने का अहंकार है। लेकिन अगर आपने मेरा थोड़ा सा भी जीवन जिया होता तो परिवार और परिवार की सुरक्षा दोनों की अहमियत समझ जाते।”–डॉली तनिक रोष से बोली।

“तो तुम बताती ही कहाँ हो अपने बारे में कुछ भी।”

“जानना चाहते हो ?”

“हाँ।” “तो लाओ पहले एक गिलास मुझे भी दो। शायद मुझमें बताने का साहस आ जाये।”

“तुम पीती भी हो ?”–राज आश्चर्य से उसकी तरफ देखता हुआ बोला।

“आज तक छुई भी नहीं।”

“तो फिर क्यों ?”

“सुना है कि इसे पीने से आदमी की झिझक खत्म हो जाती है और उसकी वाणी मुखर हो जाती है।”

“हाँ होता तो है कुछ कुछ ऐसा।”

“तो थोड़ी सी दे दो। एक ही पैग दे दो। काफी होगा। और कुछ नहीं बस अपनी बात कहने में आसानी हो जाएगी।” राज ने सामने से दूसरा गिलास उठाया और उसमें थोड़ी सी स्कॉच डाल कर दो आइस क्यूब डाले और डॉली के सामने रख दिया।

“आईई...ये तो कड़वी ज़हर है।”–डॉली एक घूँट मार कर गिलास कॉउंटर पर रख कर बुरा सा मुँह बनाती हुई बोली–“लग रहा गले में आग लग गई हो।”

“आराम आराम से लो। जबरदस्ती मत करो। ये लो...”–रेफ्रीजिरेटर से ठंडे पानी की बोतल लाकर उसने डॉली के गिलास में थोड़ा सा पानी डाला और एक ड्राअर में से एक प्लास्टिक का छोटा सा जार उसके सामने रखते हुए बोला–“ये नमकीन काजू भी लो साथ में।”

“सर आज शाम तो हम लोग आपके देशराज सिंह के पास जाने वाले थे ना।”

“हाँ जाना तो था पर अब सुबह चलेंगे, बल्कि चलेंगे क्या उसे ही बुला लेंगे अपने ऑफिस।”

“जैसा आप ठीक समझें।”

“डॉली तुम रहने वाली कहाँ की हो ?”

“आगरा।”

“तो पढ़ाई वग़ैरह सब आगरा से ही हुई है।”

“इंटर तक आगरा से हुई है उसके बाद बी०ए० और एल०एल०बी० गाजियवाद से।”

“पढ़ाई तो आगरा की भी ठीक ही है, फिर गाजियवाद आने की वजह ?”

“घर से भाग कर आई थी।”–डॉली आराम से बोली।

“घर से भाग कर आईं थीं ! लेकिन क्यों ?”

“वही तो असली कहानी है।”–कहकर डॉली ने अपना गिलास उठाया और एक साँस में खाली कर दिया। बहुत तेज खाँसी उठी। पर उसने खुद को संभालते हुए एक काजू उठाकर मुँह में डाल लिया।

“सर कैसे पी लेते हो आप इस ज़हर को ?”–वह बुरे-बुरे से मुँह बनाती हुई बोली।

“ज़िंदगी के तजुर्बे इससे भी कड़वे होते हैं।”

“सर आप बड़े लोग हो। आपका क्या कड़वा तजुर्बा होना है। ज़्यादा से ज़्यादा हाईस्कूल में किसी गर्लफ्रेंड ने प्यार में धोखा दे दिया होगा।

” “धोखा देने का किसी को मैंने मौक़ा ही नहीं दिया कभी।”

“फिर काहे का कड़वा तजुर्बा है आपको ?”

“मेरी छोड़ो, तुम अपनी व्यथा सुनाओ।”

“मेरी व्यथा ? मेरी कोई व्यथा नहीं।”

“लेकिन तुम ही तो कह रही थीं।”

“सर कुछ नहीं हुआ इससे तो। एक और दो न।”–डॉली ने खाली गिलास राज की तरफ़ सरकाया। राज ने खामोशी से उसका गिलास भर दिया। इस बार पानी की मात्रा थोड़ी कम कर दी।

“बस, इसके बाद नहीं मिलेगा। पहली बार है। इतनी बहुत है।”–राज गिलास उसकी तरफ़ सरकाता हुआ बोला।

“सर जी, बीवी के जिस बर्ताव से डर कर आप शादी नहीं कर रहे जाने अनजाने आप खुद वही बर्ताव कर रहे हो।”–डॉली हँसी।

“फर्क है।”

“कोई फर्क नहीं है। सिवा इसके कि आपके साथ नहीं हो रहा, आप कर रहे हो। वैसे सर इसे नैगिंग नहीं, केयर कहते हैं। इसकी कमी उनसे पूछो जिन्हें ये मयस्सर नहीं है।”

“छोड़ो, मुझे अपना जीवन अपने हिसाब से जीना है।” डॉली ने कोई प्रतिरोध नहीं किया। अपना गिलास उठाया और फिर एक ही साँस में पी गई। एकदम से उसे जोर की उबकाई आने को हुई। वह मुँह पर हाथ रखकर कुर्सी पर पीछे को टिक कर बैठ गई। थोड़ी देर में सामान्य हुई तो एक काजू उठाकर मुँह में डाल लिया और सीधी हो कर बैठ गई।

“ये तरीक़ा नहीं है पीने का। आराम से घूँट-घूँट करके पीनी चाहिए।”

“यार सर अब लेक्चर मत दो।”

“यार सर ?”–राज ने अपलक उसे देखा।

“सॉरी सर।”–वह तुरंत बोली। हालाँकि खेद उसके चेहरे पर दूर दूर तक नहीं था। राज ने अपना गिलास उठाया और एक घूँट भरकर वापस रख दिया। राज ने देखा डॉली कुर्सी पर हौले हौले आगे पीछे हो रही थी।

“डॉली तुम ठीक तो हो ना ?”–उसने पूछा।

“सर मुझे एक क़त्ल करना है।”–डॉली सप्रयास राज पर फोकस करती हुई बोली।

“क्या ?”–राज हकबकाया।

“सर मेरी ज़िंदगी का मक़सद है ये। समझ लो इसीलिए ज़िंदा हूँ मैं।”–डॉली की आँख में आँसू आ गए।

“तुम्हें पता भी है कि तुम क्या बोल रही हो ?”

“पता है सर। मुझे नहीं पता होगा तो किसको पता होगा।”

“डॉली तुम्हें नशा हो गया है। अब खाना खा कर सो जाओ।”

“सॉरी सर। वह मैं थोड़ा बहक गई थी। पर आप चिंता ना करो मैं ठीक हूँ।”

“दुःख कहने से हल्का हो जाता है। अगर उचित समझो तो कह डालो।”

“सर इंसान की ज़िंदगी में दो ही चीजें होती हैं जो उसके जीने का मक़सद होती हैं।”

“वो क्या ?”

“एक तो प्यार–वह चाहे खुद से हो या किसी और से–और दूसरी चीज़ है नफ़रत। पूरी दुनिया इन्हीं दो चीजों पर टिकी है।”

राज बड़े ध्यान से सुन रहा था।

“अब सर प्यार तो किसी से है नहीं। कोई है ही नहीं अपना ऐसा कोई। बाक़ी मैं तो नफरत के सहारे ज़िंदा हूँ। कभी तो इस काबिल बन पाऊँगी ही कि उसका उधार चुकता कर सकूँ।”

“किसका ?”

“अपने बाप का।”–डॉली की आँखों से फिर आँसू बह निकले।
 
“डॉली मुझे तुम्हारे बारे में कुछ नहीं मालूम। लेकिन फिर भी इतना ही कहूँगा कि भुला दो सब कुछ जो भी हुआ और नए सिरे से जिंदगी की शुरुआत करो।”

“इस उधार को चुकाने के लिए ही तो ज़िंदा हूँ, वरना तो कब की मर खप गई होती।”

“अगर कुछ ग़लत हुआ है तुम्हारे साथ तो हम कानून का सहारा ले सकते हैं।”

“कानून छू भी नहीं पाएगा उसे। अलबत्ता जो उसके ख़िलाफ़ जाएगा वह जरूर मच्छर की तरह मसल दिया जाएगा।”

“ऐसा क्या है वह ?”–राज ने उत्सुक भाव से पूछा।

“क्या करोगे जान कर सर। ये मेरी लड़ाई है। वक़्त आने पर मैं ही लड़ूँगी।”

“और कौन कौन है घर में ?”

“घर ही नहीं है सर।”–डॉली बड़ी उदास सी मुस्कान के साथ बोली।

“और माँ...?”

“मर गई दस साल पहले ही।”

“ओह्ह सॉरी।”

“कोई नहीं सर जी। अपनी-अपनी क़िस्मत है।”

“शुरू से बताओ क्या हुआ ?”

“मेरे माँ बाप की लव मैरिज हुई थी। मेरी माँ मुस्लिम थी। दोनों ने घर से भाग कर शादी की थी। इसलिए मुझे मालूम ही नहीं कि मेरे दादा-दादी और नाना-नानी कौन हैं। ना तो मेरे माँ-बाप ने कोई ज़िक्र कभी किया और ना ही कोई कभी हमारे पास आया। मेरे पिता आई०आई०टी० पासआउट थे और फिर जॉब के साथ साथ एम०बी०ए० भी कर लिया था, तो बहुत बढ़िया पैकेज मिलता था उन्हें। जल्दी ही उन्होंने घर वग़ैरह सब बना लिया। मैं उनकी इकलौती संतान थी। पापा बहुत व्यस्त रहते थे, लेकिन जब भी घर लौटते सबसे पहले मुझे ही ढूँढ़ते। मुझमें ही उनकी जान थी जैसे। जब भी घर आते थे मेरे लिए चॉकलेट ज़रूर लाते थे। चाहे कुछ और भूल जाएँ, मगर ये कभी नहीं भूलते थे। और मेरे लिए भी मेरे पापा ही हीरो थे।”

“लेकिन अभी तुम अपने पापा को...”–राज को आश्चर्य हुआ।

“यार सर टोको मत। बता रही हूँ ना।”

“सॉरी।”

“पापा मैकेनिकल इंजिनयर थे। उन्होंने एक मोटरपार्ट बनाया जो कार में लगाने से कार का माईलेज बढ़ जाता था और पोल्यूशन बहुत कम हो जाता था। पापा ने वह पेटेंट करवा लिया और जॉब छोड़कर अपनी फ़ैक्टरी लगा ली। मुझे याद है मेरे आठवें जन्मदिन पर फैक्ट्री का उद्घाटन हुआ था। मेरे ही हाथों से पापा ने फीता कटवाया था।”

राज बहुत दिलचस्पी से सुन रहा था।

“फिर फैक्ट्री ऐसी चली...ऐसी चली...कि चार साल में ही आठ और यूनिट लग गईं। पैसा जैसे बरस रहा था। और फिर जैसे किसी की नज़र लग गई। मेरा हीरो…मेरा सुपरमैन...”–डॉली का स्वर उदास हो चला–“मर गया।”

“अरे, कैसे ?”

“इंदौर की यूनिट में नई मशीन लग रही थी। क्रेन से मशीन उठा कर लाई जा रही थी। पापा वहीं पर थे। जाने कैसे मशीन क्रेन से गिर गई। कुंटलों भारी मशीन सीधे पापा के ऊपर आकर गिरी। हम लोग पापा को आख़िरी बार देख भी नहीं पाए। कुछ बचा ही नहीं था उनमें, जो देख पाते।” राज ने सांत्वना देने के अंदाज़ में डॉली का हाथ थपथपाया। डॉली के चेहरे पर बड़ी मार्मिक सी मुस्कान आई।

फोटो के आगे रोती रहती थी। फिर एक दिन अंकल स्थाई रूप से हमारे घर ही रहने आ गए। मम्मी ने मुझसे कहा कि ये तुम्हारे नए पापा हैं। पता चला कि दोनों ने शादी कर ली थी। मेरा मम्मी के अलावा था ही कौन, सो मैंने उस स्थिति से भी समझौता कर लिया। पर कुछ दिन बाद ही मुझे अहसास होने लगा कि नए पापा का मेरे प्रति नज़रिया बदल रहा है।”

“मतलब ?”–राज की आँखें सिकुड़ गईं।

“मतलब वही, जो आप समझ रहे हो।”–डॉली फीकी मुस्कान से बोली।

“तुमने अपनी मम्मी को बताया नहीं ?”

“क्या बताती ? खाली मुझे अहसास ही तो हुआ था। उसने कुछ किया तो नहीं था। मुझे छूता भी था तो पुचकारने के बहाने से। और फिर मेरी उमर बारह तेरह साल की ही तो थी।”

“फिर क्या हुआ ?”

“फिर धीरे-धीरे उसने सब कुछ अपने कंट्रोल में कर लिया। मम्मी पर तो उसने ऐसा जादू कर दिया था कि उन्हें तो उसके अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता था। बस ग़नीमत यही थी कि वह मेरी भी सुध ले लिया करती थी। समय गुजरता गया। मैंने इण्टर पास कर लिया। अब मुझमें इतनी समझ आ चुकी थी कि उससे बच कर रहने लगी थी।”–डॉली इतना कहकर रुकी। उसने अपने खाली गिलास को देखा, फिर राज की तरफ़ देखा। राज ने इनकार में सिर हिलाया। डॉली ने एक आह भरी और दोबारा बोलना शुरू किया–“और फिर वह हुआ जिसने मेरी ज़िंदगी का मुकम्मल खानाख़राब किया। मेरी माँ भी मर गई।”

“कैसे ?”–राज हमदर्दी भरे स्वर में बोला।

“बाप फैक्ट्री घुमाने ले गया था। चालू मशीन में जाने कैसे माँ की साड़ी का पल्लू आ गया। जब तक मशीन बंद करते तब तक माँ का आधा शरीर मशीन ने कुचल दिया था।”

“फिर ?”

“फिर क्या ? फिर तो वह था और मैं थी।”

“उसने ज़बरदस्ती की तुम्हारे साथ ?”–राज की आवाज़ में क्रोध था।

“बड़ा सभ्य शब्द है ज़बरदस्ती। सच पूछो तो बलात्कार भी छोटा शब्द है उस सब के मुक़ाबले जो उसने मेरे साथ किया।”–डॉली की आवाज़ में अजीब सी लाचारी थी।

राज ने डॉली का गिलास उठाया और इस बार लार्ज पैग बनाकर उसकी तरफ़ सरकाया। डॉली ने कृतज्ञता भरी नज़रों से राज की तरफ़ देखा और गिलास उठा दो बड़े-बड़े घूँट पी कर गिलास नीचे रखा और जल्दी से एक दो काजू उठा कर मुँह में डाल लिए।

“माँ की तेरहवी तक तो ग़नीमत रही। उसने ज़्यादा कुछ नहीं कहा मुझे। बस एक दो बार दिलासा देने के बहाने मुझे लिपटाया, पर उसकी उन्हीं हरकतों ने मुझे आने वाले ख़तरे के बारे में चेतावनी दे दी थी। मेरे बचपन का नासमझी वाला मौन शायद उसे ग़लत सिग्नल दे गया था। पर ख़तरे की घंटी बजने पर भी मैं क्या करती ? मुझे तो कुछ पता ही नहीं था बाहर की दुनिया के बारे में। ना कोई रिश्तेदार था। जाती भी तो कहाँ जाती ? करती भी तो क्या करती ?” राज ने हमदर्दी वाले भाव से गर्दन हिलाई।

“मुझे आज भी याद है वह रात जब वह नशे में धुत्त मेरे पास आया था। सर वह नॉर्मल आदमी नहीं था। वह कुंठित मनोवृत्ति का आदमी था, जिसे स्त्री को अपमानित करने में संतुष्टि मिलती थी। सर मैं आपको ज़्यादा नहीं बता पाऊँगी।

बावजूद नशे के नहीं बता पाऊँगी। पर आप सोचो वह सामने बैठा शराब पी रहा है और मैं बिना कपड़ों के बेड पर चौपायों की तरह आधा घंटे तक चल रही हूँ। मेरा सम्मान, मेरा आत्मविश्वास क्या, मेरी रूह तक ज़ख़्मी हो गई। और ये तो कुछ भी नहीं, आगे जो कुछ तीन दिन तक मेरे साथ हुआ उसे आपको बताना तो दूर, मैं खुद अपने मन में भी नहीं दोहरा सकती। और ये सब तब तक हुआ जब तक तीसरे दिन मैं मौका मिलते ही भाग नहीं गई। बस ग़नीमत यही रही कि मैं अपने सारे डॉक्युमेंट अपने साथ ले गई। फिर मैं कैसे ट्रेन में बैठी, कैसे गाजियवाद पहुँची, कैसे मैंने छोटे-मोटे काम किये, लोगों के घरों में भी काम किया, कैसे पैसे जोड़े, कैसे कॉलेज में एडमिशन लिया बड़ी लम्बी कहानी है।”

“मैं तेरे साथ हूँ डॉली । नाम बता उस राक्षस का। उसे एक पल भी जीने का कोई हक़ नहीं है।”–राज दृढ़ स्वर में बोला।

“रणविजय सिंह।”–डॉली एकटक उसकी आँखों में झाँकती हुई बोली।

“क्याऽऽ...रणविजय सिंह…वह जो सांसद है ? जो पिछली सरकार में मंत्री थे, वह…वह रणविजय सिंह ?” “हाँ वही रणविजय, जो मेरे पा

पा के पैसों के बलबूते पर अरबपति व्यापारी और सांसद बना बैठा है। क्यों क्या हुआ ? पुनर्विचार करोगे अपने फैसले पर ?”

“नहीं, कोई पुनर्विचार नहीं। बस थोड़ा आश्चर्य जरूर हुआ। ये आदमी कैसे कैसे भाषण देता है ! जैसे इससे बड़ा समाजसेवी कोई हो ही ना और इसकी हकीकत क्या है !”

“आज सर पहली बार किसी को बताया है। सच्ची बड़ा हल्का महसूस हो रहा है। और सर जमाने की हक़ीक़त देखो, एक रात मैंने मंदिर में काटी थी वहाँ ज़बरदस्ती तो नहीं हुई पर गंदे इशारे हुए। पूरी रात डर लगता रहा और आज एक घर में एकांत में किसी के साथ बैठी शराब पी रही हूँ और कोई डर नहीं लग रहा। चाहे होश ना भी रहे, फिर भी डर नहीं।”

“डॉली तुम्हारे साथ जो ग़लत होना था हो चुका। अब जो भी होगा सही ही होगा।”

“मुझे पता है।” “और तुम्हारा हक़, तुम्हारी फैक्ट्रीज, तुम्हारी प्रॉपर्टीज़ सब तुम्हें वापिस मिलेगा ये मेरा वादा है।”

“अब यार सर तुम तो सेंटी हो गए।”–डॉली हँसने लगी। इस बार राज भी हँसा। उसने ‘यार सर’ पर कोई एतराज़ नहीं किया।

“सर मैंने लोगों के घरों में भी काम किया। फिर बाद में ऑफिस वग़ैरह में भी काम किया। पर जहाँ भी पाया हमेशा आदमी को कुत्ता ही पाया।”–वह कहकर रुकी, फिर बोली–“सिवा इस बार के।”

“डॉली तुम्हें नशा हो रहा है। चलो खाना खाकर सो जाओ।”

“ओह्ह शट अप सर, कोई नशा फशा नहीं हो रहा।”–डॉली की आवाज़ लड़खड़ा रही थी। राज ने निगाह मारी। डॉली के गिलास में अभी भी आधे के करीब व्हिस्की थी। अब राज नहीं चाहता था कि वह ज़रा सी भी और पिए। उसने धीरे से उसके गिलास की तरफ हाथ बढ़ाया। अभी उसका हाथ गिलास तक पहुँचा ही था कि डॉली ने हाथ बढ़ाकर गिलास उठाया और एक साँस में खाली कर दिया। और इस बार ना मुँह बनाया और ना काजू उठाया।

“नो चीटिंग सर।”

“चलो डॉली आओ खाना खाते हैं।”

“कहीं नहीं जाएगी डॉली । डॉली के लिए यहीं आएगा खाना।”–उसने काउंटर पर घूँसा मारा।

“चलो कोई नहीं। मैं यहीं मँगवाता हूँ।”

“यस, मँगवाओ फटाफट और एक लास्ट और दो।”–वह गिलास राज की तरफ़ खिसकाती हुई बोली। अब डॉली की आँखे बार बार बंद हो जा रही थीं जिन्हें वह सप्रयास मिचमिचा मिचमिचा कर खोल रही थी।

“नहीं, बिलकुल भी नहीं। अब एक बूँद भी नहीं।”–राज सख़्ती से बोला।

“दे दे ना यार, प्लीज़ ! ये तो बहुत ही बढ़िया चीज़ है। दारु अंदर, ग़म बाहर। कल से रोज़ टिकाया करेंगे दोनों भाई।”

“ठीक है, पर कल से।”–राज को हँसी आ गई।

“हम नहीं भई। हमें तो चहिए।”–अब उसने बाँह काउंटर पर फैला कर उसपे सर रखा हुआ था और आँखे बंद थीं।

“अच्छा चलो तुम्हें तुम्हारे कमरे तक छोड़ आऊँ। खा लिया तुमने खाना।”

“नहीं पहले एक गिलास दो।”

“अच्छा चलो अपने बेडरूम में चलो वही दूँगा एक पैग। पीना और सो जाना।”

“अच्छा बना कर मुझे दे दो मैं बेडरूम में जाकर ही पियूँगी।”

“डॉली ये क्या जिद है।”

“आज अगर बेहोश ना हुई तो बहुत रोऊँगी सर।”–वह बहुत बेबस सी आवाज़ में बोली।

राज ने देखा उसकी बंद आँखों से भी आँसू बह रहे थे। “आँख खोलकर सीधी बैठो। अब आज हम पूरी रात पिएँगे। अगर तुम सो भी गई तो पूरी रात तुम्हारे सिरहाने बैठा रहूँगा।” वह सीधी होने के नाम पर ज़रा सा हिली भर और आँख खोलने के नाम पर ज़रा सी पलकें हिलाईं।

राज ने वास्तव में दो पैग बनाए। एक उसके सामने रखा और एक खुद थाम लिया।

“बना दिया ले लो।”

डॉली ने अंधों की तरह बिना आँख खोले हाथ चलाए। राज ने उसका हाथ पकड़ कर गिलास पकड़ा दिया। उसने ज़रा सी गर्दन उठाई और गिलास होंठो से लगाकर आधी पीते, आधी गिराते गिलास खाली कर दिया।

“हो गया, अब चलें ?”–राज अपना गिलास खाली करता हुआ बोला।

“एक और।” राज अपनी सीट से उठा और डॉली के बराबर में आकर बैठ गया। उसने डॉली के हाथ अपने हाथ में ले लिए।

“डॉली अब रोने की बारी उस राक्षस की है। मेरा यक़ीन करो उसे कुत्ते की मौत मारेंगे।”

“वादा।”

“पक्का वादा।”

“ठीक है।”

“अब चलें ?” जवाब नदारद। राज ने देखा वह काउंटर पर सर टिकाए सोई पड़ी थी। “ज़िंदगी में अगर तुझे दोबारा सूँघने को भी दे दूँ तो लानत है मुझ पर।”

राज ने उसे हौले से उठाया और उसके कमरे की तरफ़ चला। दो कदम चलते ही उसे अहसास हो गया कि नशा उसे भी फुल है। उसने एक नज़र सीढ़ियों पर डाली। तुरंत उसके दिमाग़ ने ऊपर जाने से मना कर दिया। उसने पल भर सोचा फिर अपने बेडरूम की तरफ़ बढ़ चला। उसने डॉली को अपने बेड पर लिटा कर चादर ओढ़ा दी और खुद जाकर अनिल वाले बेडरूम में ढेर हो गया। खाना खाने का इरादा उसका भी नहीं रहा था। काका किचन में से सारे क्रिया कलाप को देख रहे थे। उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी।

*********************
 
सुबह के आठ बजे थे जब डॉली ने बेडरूम से बाहर कदम रखा।

“गुड मॉर्निंग।”–राज उसे देख कर मुस्कुराया। राज लॉबी में सोफे पर बैठा अख़बार पढ़ रहा था। भाप उड़ाता चाय का कप उसके सामने सेंटर टेबल पर रखा था।

“गुड मॉर्निंग सर।”–वह उलझन भरे स्वर में बोली और राज के पास ही आकर सोफे पर उसके सामने बैठ गई।

“लो चाय पियो।”–राज उसकी तरफ़ चाय का कप खिसकाता हुआ बोला।

“आप लो सर।”

“तुम पियो। मेरी तो सुबह से दूसरी है। काका और ले आएँगे।”

“थैंक यू सर।”–उसने कृतज्ञतापूर्ण स्वर में कहा और चाय उठा ली।

“और सब ठीक है ?”

“सर मैं यहाँ कैसे सो गई ? और आप कहाँ सोए थे ?”–वह राज का सवाल अनसुना करते हुए बोली।

“तुम्हें कुछ भी याद नहीं ?”–राज गंभीर चेहरा बनाते हुए बोला।

“क्या ?”–वह चाय पीना भूल गई।

“रात कितना परेशान किया तुमने मुझे।”

“कैसे ?”–वह आशंकित स्वर में बोली।

“अब छोड़ो...जाने दो...मैं तुम्हें ब्लेम नहीं कर रहा।”

“आप मुझे ब्लेम नहीं कर रहे ?...इसका मतलब ?”–उसके माथे पर बल पड़ गए।

“अब छोड़ो डॉली । जाने दो न।”

“ठीक है सर, जाने देते हैं।”–वह ग़ौर से राज का चेहरा देखती हुई बोली।

राज ने चौंक कर उसकी तरफ़ देखा।

“बहुत घटिया ऐक्टर हो सर आप।”–वह मुस्कुराती हुई बोली।

तब राज भी गंभीरता कायम नहीं रख पाया और ज़ोर से हँसा।

“अब आज का क्या प्रोग्राम है सर ?”

“सबसे पहले चलते है देशराज सिंह के पास। उसे काम पे लगा दें पहले।”

“ठीक है सर।”

“जाओ तो चाय पी कर पहले अपनी कार पे कपड़ा मार लो। फिर नहा धो कर चलते हैं।”

डॉली ने माथे पर बल डाल कर उसकी तरफ़ देखा फिर अनमने भाव से सिर हिलाया। तभी काका दो कप चाय दे गए। दोनों ने एक एक कप उठाया और पीने लगे।

“बहुत भूख लग रही है सर।”

“चाय ख़त्म करो। फटाफट नहा कर तैयार हो जाओ फिर नाश्ता करके निकलते हैं।”

डॉली ने सहमति में सिर हिलाया और उठ खड़ी हुई। राज भी उठकर बाथरूम में घुस गया।

*********************
 
देशराज का ऑफिस शहर के व्यस्त बाज़ार में बने कॉम्प्लेक्स की पहली मंज़िल पर था। बड़ी मुश्किल से डॉली को कार पार्क करने की जगह मिली। कार पार्क करके दोनों उसके ऑफिस में पहुँचे। ऑफिस के नाम पर बस एक ही दुकान थी। उसी में दरवाज़े के पास रिसेप्शन काउंटर था, जिसके आगे पार्टिशन कर के देशराज ने ऑफिस बना लिया था। रिसेप्शन पर बीस बाइस साल की लड़की बैठी एक मैगजीन पढ़ रही थी।

राज से नाम पूछ कर उसने अंदर इंटरकॉम पर बात की और उन्हें अंदर जाने का इशारा करके फिर मैगजीन में व्यस्त हो गई। राज और डॉली मास्क व्यवस्थित करते हुए अंदर चल दिए।

देशराज कोई चालीस बयालीस साल का काफी हट्टा-कट्टा आदमी था। वह राज से बड़े प्रेमभाव से मिला। राज ने उसे अपना मंतव्य बताया।

“हो जाएगा राज जी। आज अपने पहली बार कोई काम बताया है। आपका काम सबसे पहले होगा।”

“बस देशराज जी, गिरीश, वृन्दा, राहुल और अमर, इनकी कुंडली निकलवा दो। इन्हीं से होकर निकलेगा आगे जाने का रास्ता।”

“आपने बोल दिया, समझो हो गया।”

“अब अपनी फ़ीस बताइए।”–राज संकोच भरे स्वर में बोला।

“अजी छोड़िए वकील साहब। आपसे फ़ीस कैसे ले सकता हूँ। आपके पिता जी की मेहरबानी है जो ज़िंदगी जेल में नहीं सड़ी।”

“देशराज जी, पिताजी ने जो भी किया था, किया तो फ़ीस लेकर ही था ना, और मैं भी कौन सा जेब से दूँगा। अब ऐसा तो मत करिए जो दोबारा आपके पास काम लेकर भी ना आ सकें।”

“आप तो शर्मिंदा कर रहे हैं वकील साहब।”

“ये मेरा पर्सनल काम नहीं है। आपकी फ़ीस भी मुवक्किल ही देगा।”

“पक्का ना मुवक्किल देगा ? क्योंकि मैं आपसे नहीं लूँगा।”

“पक्का।”

“बीस हज़ार जमा दो हज़ार रोज़ खर्चे के। लेकिन देना तभी जब मुवक्किल दे।”

“दे चुका मुवक्किल।”–राज जेब से दो-दो हज़ार के पंद्रह नोट निकाल कर सामने टेबल पर रखता हुआ बोला।

देशराज ने अनिश्चित भाव से पैसे उठाकर दराज में डाल दिए।

इसमें दस हज़ार खर्चे के हैं। बाक़ी बाद में देख लेंगे।

देशराज ने सहमति में सिर हिलाया।

“तो फिर आज्ञा है ?”–राज उठने का उपक्रम करता हुआ बोला।

“ऐसे कैसे, बैठिये चाय मँगवाता हूँ।”

“नहीं नहीं, चाय की कोई इच्छा नहीं। अभी घर से नाश्ता करके ही निकले हैं।”

“ऐसे तो अच्छा नहीं लगता।”

“फॉर्मेलिटी की कोई बात नहीं है। जरूरत होती तो कह कर मँगवा लेते।”

“जैसी आपकी इच्छा। आप नहीं जानते वकील साहब कि आपके पिता जी का कितना बड़ा एहसान है मुझ पर।”

“बहुत जल्दी मिलेगा एहसान उतारने का मौका भी।”

“मतलब।”

“जल्द ही बताऊँगा मतलब भी।”–राज ने उठते हुए कहा और नमस्कार कर के बाहर को चल दिया। डॉली भी उसके पीछे चल दी। पीछे देशराज गंभीर मुद्रा में उन्हें जाता हुआ देखता रहा।

*********************
 
“अब ?”–डॉली कार की ड्राइविंग सीट पर बैठती हुई बोली।

“ऑफिस चल।”–राज कुछ सोचता हुआ बोला, फिर आसमान की ओर निहारते हुए कहने लगा–“मौसम के भी आसार कुछ ठीक नहीं लग रहे।”

डॉली ने सहमति में सिर हिलाते हुए कार स्टार्ट कर के आगे बढ़ा दी।

अचानक आसमान पर काले बादल घिर आए थे। बादल इतने घने थे कि देखते ही देखते रात का सा भ्रम होने लगा। ठंडी हवा चल रही थी। डॉली ने कार का ए०सी० बंद करके शीशे खोल दिए। राज ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसकी तरफ़ देखा।

“सर बहुत अच्छा मौसम है।”

“बारिश आने वाली है। सारा पानी अंदर आएगा। भीग जाएँगे।”

“अभी नहीं आ रही। जब आएगी देखा जाएगा।”–डॉली हवा से उड़ते अपने बाल सँभालती हुई बोली।

“हेड–लाइट तो जला लो।”

डॉली ने उसकी तरफ़ मुँह बिचका के हेड-लाइट ऑन कर दी। सड़क पर सूखे पत्ते, कागज और पॉलीथिन आदि तेज हवा में गोल-गोल घूम रहे थे।

“सारी धूल अंदर आ रही है।”–राज भुनभुनाया।

“सर आपको कोई रस नहीं प्रकृति से ?”–डॉली उसकी तरफ़ विचित्र नेत्रों से देखती हुई बोली।

तभी अचानक बहुत तेज बारिश शुरू हो गई। डॉली के शीशे बंद करते करते भी दोनों एक एक साइड से तक़रीबन पूरा भीग गए।

“अब कुछ कहना है प्रकृति प्रेमी को ?”–राज रूमाल से अपने चेहरे को पोंछता हुआ व्यंग से बोला।

तभी इतनी तेज बिजली कड़की कि सारा कुछ रोशनी में नहा सा गया।

“ग़ज़ब।”–डॉली मंत्रमुग्ध सी बाहर को निहारती हुई बोली। यकायक डॉली ने कार सड़क के किनारे करके रोक दी और कार की हेडलाइट और इंजिन ऑन ही छोड़कर दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गई। ज़रा देर में ही वह तर-ब-तर हो गई। उसने अपने हाथ ऊपर को उठा दिए जैसे बूँदों का स्वागत कर रही हो। वह कार के आगे खड़ी थी। उसने अपना चेहरा ऊपर आसमान की तरफ़ कर रखा था। बस थोड़ी थोड़ी देर में हाथों से अपने चेहरे को साफ कर लेती थी पर हाथ पानी साफ करके वापस जा भी नहीं पाते थे कि चेहरा फिर पानी से तर-ब-तर हो जाता था। पानी से भीग कर उसके कपड़े जिस्म से चिपक गए थे, जिनमें उसके जिस्म का एक एक कटाव, एक एक उभार बिलकुल स्पष्ट नज़र आने लगा था। और वह इससे क़तई बेपरवाह बच्चों की तरह मुँह आसमान की तरफ़ किए दोनों हाथ ऊपर उठाए गोल-गोल घूम रही थी। राज कार के अंदर बैठा हेड लाइट की रोशनी में उसे ही मंत्रमुग्ध सा निहार रहा था।

थोड़ी देर में डॉली कार के अंदर आ गई और कार को गियर में डाल कर आगे बढ़ा दिया। उसके दाँत किटकिटा रहे थे।

“दुनिया में जितने भी पागल हैं, सब मेरी ही ज़िंदगी में आने हैं क्या?”–राज उसकी तरफ़ देखता हुआ बोला।

“और कौन कौन हैं सर ?”–डॉली बजते दाँतों से बमुश्किल बोली।

“यानी खुद को तो तुमने मान ही लिया है।”–राज हँसा।

“मैं तो हूँ ही सर। इसमें मानना क्या, न मानना क्या।”

“आगे से लेफ़्ट टर्न ले लेना।”

“इधर कहाँ जाना है सर ?”–डॉली लेफ़्ट टर्न लेती हुई बोली।

“वह सड़क के किनारे बड़ा सा बरगद का पेड़ दिख रहा है, वहाँ उसके नीचे रोकना।

विशाल पेड़ के नीचे एक लकड़ी का बड़ा सा चाय का खोखा था। पेड़ के नीचे काफी सारी प्लास्टिक की कुर्सियाँ पड़ी थीं, जो इस घड़ी बिलकुल खाली थीं। राज ने अपनी तरफ़ का शीशा उतार कर खोखे की तरफ़ दो उँगलियाँ दिखाईं। खोखे पर बैठे आदमी ने हाथ उठाकर बताया कि उसने देख लिया है। घने पेड़ के नीचे सीधी बारिश नहीं आ रही थी, लेकिन पत्तों से पानी लगातार टपक रहा था।

“यहाँ चाय पीने आए हैं ? चाय तो ऑफिस चलकर भी पी लेते।”

“पहले पी लो फिर बताना।” डॉली दाँत किटकिटाती बैठी रही।

“लगता है ठंड ने प्रकृति प्रेम पर तीव्र आघात किया है।”

“मुझे ठंड लग रही है।”

“जब फुदक फुदक कर गई थीं पानी में, तब पता नहीं था कि बाद में ठंड लगेगी ?” अभी डॉली कोई जवाब देती उससे पहले एक लड़का छाता लगाए आया और दो गिलास चाय के दे कर चला गया।

“वाओ, ये तो बहुत अच्छी है।”–डॉली घूँट मारते ही बोली।

राज मुस्कुराया।

“सच में बहुत अच्छी है।”

“पता है मुझे।”–राज कार का हीटर ऑन करता हुआ बोला। गर्म गर्म चाय पी कर और हीटर की गर्म हवा से डॉली को काफी राहत मिली। राज ने लड़के को इशारे से बुलाया और खाली गिलास और पैसे दे दिए। डॉली ने गाड़ी ऑफिस की तरफ़ दौड़ा दी। बारिश पूरी गति से जारी थी, बस रोशनी में थोड़ा सा इजाफ़ा हो गया था।

“मेरा तो फिर भीगने का मन करने लगा।”–यकायक डॉली बोली।

“वापस घर चलो। छत पर जाकर खूब भीगना।”

“घर ?”

“हाँ।” डॉली ने चुपचाप कार वापस घुमा ली। “सर आपका मन नहीं करता कभी भीगने को ?”

राज के ख़्यालों में तत्काल एक चेहरा घूम गया।

“नहीं, बिलकुल भी नहीं।”

“बस देखना अच्छा लगता होगा।”

“नहीं, वह भी नहीं।”

“डॉली ने विचित्र निगाहों से उसकी तरफ़ देखा। राज ख़ामोश

“ओह्ह।”–काफी देर बाद डॉली बोली।

“क्या ओह्ह ?”–राज चौंक कर बोला।

“वही चाँदनी पिक्चर का विनोद खन्ना वाला गाना।”–डॉली बोली।

“क्या ?”–राज हकबकाया

“लगी आज सावन की फिर वह झड़ी है, वही आग सीने में फिर जल पड़ी है।”

“नॉन्सेन्स।”–राज बोला।

“तो फिर सेंस की बात आप बता दो।”

“जो तुम सोच रही हो, वैसी कोई बात नहीं है बस।”

“पर जो बात है वह नहीं बताओगे।”

“छोड़ो कोई और बात करो।”

“कोरोना की वैक्सीन कब तक आ जाएगी सर ?”

“क्या ?”–राज असंबंधित विषय से हकबकाया।

“चीन मानेगा या नहीं मानेगा सर ?”

“क्या बक रही है।”

“आपने कहा ना कि कोई और बात करो।”–वह बड़ी मासूमियत से बोली।

“मेरा मतलब है जो काम हाथ में लिया है, उस विषय में बात करो।”

“ओह्ह अच्छा अच्छा। तो ये मतलब था आपका।”

राज ने उसे घूर कर देखा। “सॉरी।”–वह तत्काल बोली।

“डॉली अगर तुमने इस वृन्दा वाले पचड़े में हाथ ना डाला होता, तो हम आज ही आगरा के लिए निकल जाते।” डॉली ख़ामोश रही।

“या लौटा दें वृन्दा के पैसे ?”

“नहीं सर बिलकुल नहीं। अगर हम ये काम ना कर पाए, तो उस काम को कर पाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।”

“ये भी सही है।”

“और सर आपके लिए दस लाख छोटी रक़म होगी। हम ग़रीबों के तो प्राण ही निकल जाएँगे दस लाख लौटाने के नाम पर।”

“तुम और गरीब…इतने बड़े औद्योगिक साम्राज्य की इकलौती वारिस गरीब।”

“अभी तो हूँ ही गरीब।”

“नहीं हो। अब भी नहीं हो। अगर आगरा से कुछ भी ना भी मिले, तब भी नहीं हो।”–राज गम्भीर स्वर में बोला।

“अगर मेरा कुछ भी वापस ना मिला तो क्यों नहीं हूँ ?”–उसने प्रश्नवाचक निगाहों से राज की तरफ़ देखा।

“बस नहीं हो तो नहीं हो।”

“बताओ अभी इसी समय कि क्यों नहीं हूँ गरीब ?”

“क्योंकि तुम्हारे साथ मैं हूँ।”

“हो तो आप जय काका के साथ भी।”

“डॉली ...डॉली ...तुम बात को कहाँ से कहाँ ले जाती हो ! काम की बात नहीं कर सकती क्या ?”–राज झुँझला उठा।

“अगर आपकी यही इच्छा है तो करो। काम की बात भी करो। और काम की ही क्यों क्रोध, मद, लोभ सबकी बात करो।”

“जब पहली बार मिली थी, तब तो नहीं चलती थी इतनी ज़ुबान।” डॉली अभी कुछ जवाब देने ही वाली थी कि राज के मोबाइल की घंटी बजी। उसने मोबाइल की स्क्रीन पर नज़र डाली तो पाया अनिल की कॉल थी।
 
“हेलो।”–वह कॉल रिसीव करके मोबाइल कान से लगाता हुआ बोला। थोड़ी देर उधर की बात सुनने के बाद

‘ठीक है’ कहकर कॉल डिस्कनेक्ट करके मोबाइल सामने डैशबोर्ड पर रख दिया और सोच में डूब गया।

“क्या हुआ सर ?”–डॉली उत्सुक भाव से बोली।

“गिरीश दुबे वापस आ गया है।”–राज उसके चेहरे को ग़ौर से देखता हुआ बोला।

“वह तो आना ही था।”–डॉली आराम से बोली।

“क्यों ?”

“उसकी स्कीम जो बैकफायर कर गई।”

“यानी वृन्दा को रास्ते से हटाना ?”

“अब इसमें क्या शक है।”–कहने के साथ ही डॉली ने कार घर के गेट पर रोक कर हॉर्न बजाया।

“तुम्हारी बात ठीक हो सकती है, लेकिन कुछ है, जो मुझे शुरू से खटक रहा है।”–राज कार का दरवाज़ा खोल कर बाहर निकलता हुआ बोला। जय ने गेट खोल दिया था। डॉली ने कार ले जाकर पोर्च में खड़ी कर दी।

“कौन सी बात खटक रही है ?”–वह लॉबी में राज के पास जाकर बैठती हुई बोली।

“पहले जाओ कपड़े बदल कर आओ, वरना तबियत ख़राब हो जाएगी।”

डॉली उठी और ऊपर अपने कमरे की ओर चली गई। राज गहरी सोच में डूब गया।

“अब बताओ।” राज ने निगाह उठाई। डॉली सामने बैठी थी। उसने कपड़े चेंज करके लोअर और टी-शर्ट पहन ली थी।

“इतनी जल्दी ! अभी दो मिनट पहले ही तो गई थी ! इतनी जल्दी बदल भी लिए !”–वह हैरानी से बोला।

“देख लो।”

“लेकिन बाल नहीं पोंछे। ये गीले ही हैं। सिर से ही बैठती है ठंड।”

“अरे सर कुछ नहीं होता। आप बताओ क्या खटक रहा है ?”–वह उत्कंठा से बोली।

“डॉली खूब सोच, और ये बता कि डिफेंस कॉलोनी से वैशाली, पंद्रह किलोमीटर दूर, वह धनाढ्य, पढ़ी-लिखी महिला बिना किसी के रिकमंड किए कानूनी मदद माँगने, इस मामूली वकील के पास क्यों आई ?”

डॉली सोच में पड़ गई।

“और ये भी सोच कि कोर्ट में चेम्बर पर नहीं आई। वहाँ तो मान लेते कि चलो वकील करने आई और संयोग से हमारे चेम्बर में आ गई। वह यहाँ शहर के दूसरे कोने पर आई। तोशिबा टावर में आई, जहाँ किसी और वकील का ऑफिस है ही नहीं। जबकि वहाँ से लेकर यहाँ तक आने के दरमियान बीच रास्ते पचीसों वकील के ऑफिस होंगे। इसका मतलब ये हुआ डॉली कि वह आई ही मेरे पास थी।

डॉली ने गंभीर भाव से सहमति में सिर हिलाया।

“बस, अब सवाल ये है, कि क्यों ?”

“क्यों ?

“यही तो पता करना है।”

“पर अब क्या पता करना और क्यों पता करना ? उसका पति तो लौट आया। केस ख़त्म, पैसे हज़म।”

राज अवाक् सा उसकी तरफ़ देखता रहा।

“क्या ?...सही तो कह रही हूँ। उसने यही केस तो सौंपा था। हमने पति को खोज निकाला। केस ख़त्म।”

“हमने खोज निकाला !”–राज उसे अपलक देखता हुआ बोला।

“जो भी है, मिल तो गया ही ना ? और बाकी हुआ क्या था उसके साथ, वो गिरीश खुद बताएगा।”

काका चाय दे गए।

“चाय पी कर तैयार हो जा। चल मिल कर आते हैं उससे।”

“ठीक है।”–डॉली चाय पीती हुई बोली।

राज भी ख़ामोश चाय पीता रहा।

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गिरीश की कोठी के बाहर पुलिस की जीप खड़ी थी। अख़बार और टी०वी० के रिपोर्टरों का जमघट सा लगा हुआ था। कई चैनलों की ओबीवैन खड़ी थी।

“सर जी, इस समय आपकी वृन्दा से मिल पाना तो मुश्किल लग रहा है।”–डॉली जमघट को देखती हुई बोली।

राज गंभीरता से सिर हिलाता हिलाता रुक गया और अपलक डॉली को देखा–“मेरी वृन्दा ?”

“सॉरी सर ज़ुबान फिसल गई।”

“चल, यहाँ तो रुकने का कोई फायदा लग नहीं रहा। दोबारा आयेंगे। गिरीश जो भी बताएगा, बाजरिया अनिल हमें पता चल ही जाएगा।”

“फिर कहाँ चलें अब ?”

“कहाँ चलें ?”–राज ने दोहराया।

“मैं आपसे पूछ रही हूँ।”

“चलो कोर्ट चलो। आज चेम्बर पर ही बैठते हैं। यहाँ शाम को देखते हैं। तब शायद किसी से बात हो पाए।”

“जो आज्ञा।”–डॉली ने कार कोर्ट की तरफ़ दौड़ा दी।

शाम तक दोनों ने चेम्बर पर ही दिन गुज़ारा। काम तो कोई था नहीं। सो पुरानी फाइलें ही पढ़ते रहे। शाम को राज ने वृन्दा को कॉल की, तो मोबाइल बंद पाया। दोनों ठंडे ठंडे घर के लिए निकल लिए।

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“बाबा।” राज ने निगाह उठाई तो जय को खड़े पाया।

“हाँ काका।”

“बाबा गाँव से फोन आया है। बड़े भाई की तबियत बहुत ख़राब है। मुझे जाना पड़ेगा।”

“अरे, तो काका तुरंत निकल जाओ। मेरी चिंता मत करो।” जय का गाँव रुड़की के पास ही था। मुश्किल से दो घंटे का रास्ता था।

“तुम्हारे खाने का कैसे होगा ? अभी इस समय बाहर का खाना तो ठीक नहीं है ना।”–जय चिंतित स्वर में बोला।

“बाहर का नहीं खाऊँगा। तुम चिंता ना करो, डॉली है, उसी के साथ खा लिया करूँगा।”

“ये ठीक है। तो फिर मैं निकलता हूँ।”

“काका थोड़े पैसे ले जाना डाल कर। वहाँ पता नहीं क्या ज़रूरत पड़ जाए।”

“ले लिए अलमारी से। पाँच हज़ार ले लिए हैं। और ज़रूरत पड़ी, तो तुम डाल देना खाते में, मैं निकाल लूँगा।”

“ठीक है काका। जैसी भी बात हो बता देना।” जय सहमति में सिर हिलाता ड्रॉइंगरूम से निकल गया।

तभी राज के मोबाइल की घंटी बजी। उसने स्क्रीन पर निगाह मारी तो उस पर वृन्दा का नाम फ़्लैश कर रहा था।

उसने कॉल रिसीव करके मोबाइल कान से लगा लिया।

“हेल्लो।”

“हेल्लो, राज जी मैं वृन्दा दुबे बोल रही हूँ।”

“हाँ वृन्दा जी, कहिए।”

“राज जी, मैंने आपको बताने के लिए फोन किया था कि गिरीश मिल गए हैं।”

“जी मुझे जानकारी मिल गई थी। मैंने आपको कॉल भी की थी, पर आपका फोन बंद आ रहा था।”

“जी आज इतनी गहमाग़हमी थी कि मोबाइल बंद करना पड़ा। मैंने अभी खोला तो आपकी मिस्ड कॉल का मैसेज देखा।”–वह खेदपूर्ण स्वर में बोली।

“कोई बात नहीं।”–राज मीठे स्वर में बोला।

“राज जी मुझे आपसे मिलना है।”–वृन्दा परेशान स्वर में बोली।

“आप जब चाहे आ जाइए। या कहिए तो हम ही आ जाते हैं आपके घर।”

“नहीं नहीं यहाँ नहीं, यहाँ तो गिरीश है। दरअसल मुझे आपसे अकेले में मिलना है।”–वह दबे स्वर में बोली।

“तो आप ऑफिस आ जाइए। या उचित समझें, तो घर पर आ जाइए।”

“घर पर तो आपकी लिव इन पार्टनर होगी। दरअसल मुझे आपको कुछ बताना है, और बात बहुत कॉन्फ़िडेंशल है।”

“क्या कहा आपने मेरी लिव इन पार्टनर ? मेरी कौन लिव इन पार्टनर?”–राज चौंका।

“वही जो आपके साथ आई थी घर पर, आपकी जूनियर।”

“आपसे किसने कहा कि वह मेरी लिव इन पार्टनर है ?” “उन्होंने ही बताया था।”

“चलिए वह सब छोड़िए, आपसे अकेले ही बात होगी। आप चिंता मत करिए।”

“तो मैं कब मिल सकती हूँ ?”

“जब आप चाहें।”

“अभी मुलाक़ात हो सकती है ?”

“बिलकुल हो सकती है। मैं लोकेशन भेज देता हूँ। आप आ जाइए।”

“थैंक्स, आप लोकेशन भेज दीजिए। मैं आठ बजे तक आ जाऊँगी।”

“ओके।” राज ने मोबाइल जेब में रखा और उठकर ऊपर डॉली के कमरे की तरफ़ जाने को हुआ। फिर कुछ सोचकर वापस बैठ गया। उसने मोबाइल निकाला और वृन्दा को अपनी लोकेशन भेज दी और आँख बंद करके पीछे को पीठ टिका कर सोचने लगा कि आख़िर वृन्दा क्या बताना चाहती होगी।

“काका कहाँ हैं ?” उसने आँख खोली तो सामने डॉली को बैठे पाया। उसने अपलक उसे घूरा।

“क्या हुआ सर ?” राज ख़ामोश उसे घूरता रहा।

“सर काका कहाँ गए हैं ?”

“काका के भाई की तबियत ख़राब है। वह अपने गाँव गए हैं।”

“ओह्ह, तो चाय मैं ही बना लाती हूँ।”–वह उठी और किचन में चली गई। थोड़ी देर में वह दो कप चाय ले आई। एक कप राज के सामने रख, दूसरा खुद पकड़ कर सामने बैठ गई।

“तो तुम मेरी लिव इन पार्टनर हो ?”–राज उसे घूरता हुआ बोला।

“क...क्या ?”–वह हकबकाई।

“क्या कहा था तुमने वृन्दा जी से ?”–राज उसे पूर्ववत घूरता हुआ बोला।

“अच्छा वो...”

“हाँ, वही...वो।”

“तो क्या ग़लत बोला ? लिव इन में ही तो हैं हम।”–वह इत्मिनान से चाय में घूँट भरती हुई बोली।”

“क्या मतलब ?”–राज चिहुँक कर बोला।

“अरे, हम दोनों एक घर में साथ साथ रहते हैं। और क्या होता है लिव इन ?”

“साथ रहना लिव इन हो गया ?”–राज तेज स्वर में बोला।

“तो और क्या होता है लिव इन ?”

“जब साथ में पति पत्नी की तरह रहते हैं, वह होता है लिव इन।”–राज दाँत पीसता हुआ बोला।

“ओह्ह सॉरी, मुझे पता नहीं था। मैं तो इसे ही लिव इन मानती थी।”–वह बड़ी मासूमियत से बोली।

“अरे तो पहले पता कर लेती।”–राज कलपा।

“वैसे सर, आपका कौन सा खेल बिगड़ गया, अगर कह भी दिया तो?”–डॉली अर्थपूर्ण स्वर में बोली।

“मेरा…मेरा क्या खेल बिगड़ना था ? पर ऐसे नहीं कहना चाहिए था।”–अब राज हड़बड़ाया।

“आपके ग़ुस्से से तो ऐसा ही लग रहा है कि जैसे कोई खेल ख़राब हो गया हो।”

“बकवास मत कर।”–राज चिड़चिड़ाया।

“सर, कहीं ऐसा तो नहीं है कि आज काका नहीं हैं, तो आप उसे घर पर बुलाने की सोच रहे थे।”

“क्या बक रही है।”

“ऐसा सोचना भी मत। मैं ऐसा अनाचार नहीं होने दूँगी घर में।”

“क्या है, कुछ भी अनाप शनाप बोले जा रही है।” अब राज सोच में पड़ गया। ये तो बात ही उल्टी पड़ गई। कहाँ तो वह जवाब माँग रहा था और अब खुद को फँसा सा महसूस कर रहा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब वृन्दा के आने की बात कैसे बताए?” डॉली ग़ौर से उसके चेहरे पर आते जाते रंग देख रही थी।

“डॉली अभी वृन्दा जी का फोन आया था।”–अंत में राज बोला।

“पता है मुझे।”–डॉली आराम से बोली।

“तुझे कैसे पता ?”–राज आश्चर्य से बोला।

“अभी क्लास ले रहे थे न मेरी, लिव इन वाली बात पर। अब खुद तो वह आई नहीं, तो फोन ही तो आया होगा।”

“शाबाश, दिमाग़ तो काफी तेज है तेरा।”–राज प्रशंसात्मक स्वर में बोला।

“तारीफ़ छोड़ो सर जी, मतलब पे आओ।”–उसकी निगाह राज पर ही टिकी थी।

“उसे मुझसे कुछ बात करनी है। मतलब वह कुछ बताना चाहती है।”–राज जल्दी से बोला।

“तो कर लेती बात, जब फोन किया था। किसने रोका था ?”

“वह बता रही थी कि बात बहुत कॉनफ़िडेंशल है। कह रही थी कि मिलकर ही बताएगी।”

“तो ?”–डॉली ने अपलक उसकी तरफ देखा।

“तो मैंने बोल दिया उसे यहीं आ जाने को...तो वह यहीं आ रही है।”–राज धीरे से बोला।

“ब्रेवो! देख लो, वही बात निकली ना, जो मैंने कही थी!”

“डॉली प्लीज़, मेरी इन सब बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है।”–राज रूखे स्वर में बोला।

“पता है।”–डॉली बहुत धीरे से बोली।

“क्या कहा ?”

“कुछ नहीं।” राज असंतुष्ट भाव से उसे देखता रहा।

“अब खाना मुझे बनाना है, तो बता दो क्या बनाऊँ?”–डॉली विषय परिवर्तित करती हुई बोली।

“कुछ भी बना लो।”–राज लापरवाही से बोला।

“सर, किचन में मेरा हाथ बहुत तंग है। मुझे कामचलाऊ काम आता है।”

“अरे जो तुम खाओगी वही मैं खा लूँगा। ये कोई मैटर नहीं है।

” “ठीक है सर, जैसी आपकी आज्ञा।”

राज ने उसे घूर कर देखा। वह शराफत की मूर्ति बनी बैठी थी। *********************
 
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