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Thriller तरकीब

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तरकीब

गाजियवाद हरिद्वार हाईवे पर स्थित वैशाली का शुमार गाजियवाद के पॉश इलाकों में किया जाता है। यहीं पर मेन हाईवे पर बना हुआ है तोशिबा टॉवर। तोशिबा टॉवर एक बहुमंजिला व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स है और इसी कॉम्प्लेक्स की पाँचवी मंज़िल पर ऑफिस है एडवोकेट राज शर्मा का। राज करीब उन्नतीस साल का औसत कदकाठी का गोरा चिट्टा, अच्छे नैन नक्श का हँसमुख नौजवान था। परिवार के नाम पर बस वह अकेला ही था। अपने माता–पिता की वह एकलौती संतान था। उसके माता–पिता का एक कार एक्सीडेंट में करीब दस साल पहले ही निधन हो चुका था। माता–पिता के निधन के बाद राज ने किसी रिश्तेदार के पास रहना स्वीकार नहीं किया था। अपनी पढ़ाई-लिखाई से लेकर अन्य सभी फैसले उसने खुद ही किये। उसके पिता पंकज शर्मा गाजियवाद में फौजदारी के टॉप के वकील थे। रुपया पैसा वह काफी छोड़कर गए थे। अतः इस तरफ से राज को कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। तोशिबा टावर का ऑफिस भी उसके पिता का ही था। इसके अतिरिक्त डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में भी उसके पिता का चेम्बर था। उसके पिता की पल्लवपुरम फेस टू में आलीशान कोठी थी जिसमें अपने माता–पिता के निधन के बाद से वह अकेला ही रहता था। साथ में सिर्फ उसके पिता का वफादार नौकर जय ही रहता था। जय बचपन से ही उनके यहाँ काम करता था और राज का जन्म भी उसके सामने ही हुआ था। कोई भाई-बहन ना होने की वजह से राज का बचपन जय के साथ ही अधिक गुज़रा था। इसीलिए राज उसे बहुत मान भी देता था।

पूरी कोठी जय के ही हवाले थी। सुबह शाम कामवाली आती थी जो बर्तन और साफ सफाई कर जाती थी, पर खाना खुद जय ही बनाता था। बहुत ही मुँहलगा पर वफ़ादार नौकर था जय; बल्कि नौकर नहीं एक तरह से राज का अभिभावक ही था। राज को छह साल हो चुके थे वकालत की डिग्री लिए। वकालत की पढ़ाई करते समय ही वह अपने पिता के एक सीनियर वकील मित्र के चेम्बर में तीन साल बैठ कर काम सीख चुका था। अब ऑफिस, चेम्बर और लाइब्रेरी तो विरासत में पिता से मिल गए थे, पर केस तो खुद ही पकड़ने पड़ेंगे।

छह साल में कुल तीस केस आये थे, जिनमें नोटरी, शपथपत्र, किरायेदारी एग्रीमेंट और एक दो साधारण मार-पीट के ज़मानती अपराधों की जमानत के केस भर थे, पर उसकी भी जिद थी कि करनी तो वकालत ही है।

आज भी वह सुबह आठ बजे ऑफिस जाने के लिए तैयार था। आठ से दस ऑफिस, फिर कोर्ट वाले चेम्बर में। वहाँ से चार पाँच बजे फिर ऑफिस। फिर रात को नौ दस बजे तक घर। सेट दिनचर्या थी उसकी जिसमें कोई बदलाव मुश्किल ही होता था। हाँ, शनिवार को गाजियवाद में हाइकोर्ट बेंच की माँग को लेकर दशकों से जारी हड़ताल और रविवार को छुट्टी होने के कारण वह पूरे दिन ऑफिस में ही पाया जाता था।

“काका दे दो कुछ खाने को, देर हो रही है।”–वह डाइनिंग टेबल से चिल्लाया। जय रसोई से आया और चाय, टोस्ट और ऑमलेट रख गया। राज ने जल्दी-जल्दी नाश्ता किया और अपनी बलेनो कार में बैठ ऑफिस के लिए उड़ चला। ऑफिस में बाहर एक रिसेप्शन और वेटिंग लाउंज था और अंदर उसका ऑफिस था।

ऑफिस में तीन दीवारों पर रैक में करीने से कानून की किताबें लगी हुई थीं। एक लकड़ी की शीशे के टॉप वाली विशाल टेबल और एक चमड़ा मढ़ी शानदार रिवॉल्विंग चेयर थी जिस पर वह जाकर पसर गया। बाहर रिसेप्शन पर कोई नहीं था। उसके लिए कोई बंदा रखा ही नहीं हुआ था तो होता भी कहाँ से ! पर वह जल्दी ही किसी को रखने के जुगाड़ में था कि कोई मिल जाये कम पैसों में, तो रख लूँ। पर आजकल कम पैसों में क्या होता है ? आदमी एक गर्लफ्रेंड तो एफोर्ड कर नहीं सकता, रिसेप्शनिस्ट रखना तो दूर की बात थी। कोई जूनियर वकील ही मिल जाता। फिर उसे अपने इस खयाल पर खुद ही हँसी आ गई।

जूनियर वकील और उसके पास ! सीनियर ही खाली बैठा है, जूनियर ही क्या करेगा टी०वी० देखने के सिवा ! तभी उसकी मेज पर रखी कार्डलेस बैल बजी। बाहर कोई था। पता नहीं कौन होगा ? अब उसे खुद ही देखना पड़ेगा। कोई क्लाइंट हुआ तो क्या इम्प्रेशन पड़ेगा! बहरहाल वह उठा और दरवाजा खोल कर बाहर झाँका। बाहर मुँह पर मास्क लगाए एक लड़की खड़ी थी जिसने सफेद सलवार सूट पर काला कोट पहन रखा था। गले मे बैंड भी बाँधा हुआ था। कोई चौबीस पच्चीस साल की लंबे ऊँचे कद की लड़की थी। उसकी आँखो में जहीन होने के भाव तो थे, लेकिन साथ ही साथ परेशानी भी झलक रही थी। “फरमाइए!”–राज ने शालीनता से अपना मास्क व्यवस्थित करते हुए कहा। “एडवोकेट राज शर्मा ?” –लड़की ने प्रश्नवाचक ढंग से पूछा।

“जी हाँ, कहिये। मैं ही हूँ।”

“नमस्ते सर...सर, क्या आपसे दो मिनट बात कर सकती हूँ ?”

“आइए।”–राज ने पूरा दरवाजा खोलते हुए कहा। लड़की उसके बराबर से होकर परफ्यूम की खुशबू छोड़ती अंदर केबिन में आ गई। राज ने उसे कुर्सी ऑफर की। वह सावधानी पूर्वक एक कुर्सी पर बैठ गई। राज पूरा घेरा काट कर अपनी कुर्सी पर आ बैठा। “फरमाइए क्या सेवा कर सकता हूँ मैं आपकी ?”

“एक गिलास पानी पिलवा दीजिए।”–लड़की व्याकुल निगाहों से चारों तरफ देखती हुई बोली।

उसकी माँग सुनकर एकबारगी राज अचकचाया फिर अपनी कुर्सी से उठा और बाहर फ्रिज से पानी की बोतल निकाल कर फ्रिज के ऊपर रखे गिलास में डाल कर ले जाकर लड़की को पेश कर दिया।

लड़की ने कृतज्ञ भाव से गिलास थामा और मास्क को हटा कर एक साँस में गटक गई। अच्छी खासी खूबसूरत लड़की थी ।

“और ?”–राज ने गौर से उसे देखते हुए पूछा।

“जी नहीं, शुक्रिया।”–उसने पुनः मास्क लगा लिया।

राज फिर घूम कर अपनी चेयर पर आ बैठा और लड़की की तरफ प्रश्नसूचक निगाहों से देखने लगा। “कुछ कहना चाहती हैं ?”–लड़की को बोलता ना पाकर उसने पूछा।

“सर आप केस लाने वाले को क्या कमीशन देते हैं ?”–वह बड़े संकोचपूर्ण स्वर में बोली।

“पच्चीस परसेंट।”–राज सावधान स्वर में बोला।

“वह...वह तो सब देते हैं।”

“मैं भी सब में ही हूँ। मैं क्या चाँद से आया हूँ।”–राज हँसकर बोला।

“मुझे पैसों की बहुत जरूरत है।”–वह जैसे खुद से ही बोली।

“किसे नहीं होती ?”–राज तपाक से बोला।

“देखिए मैं बहुत मुश्किल से सर्वाइव कर पा रही हूँ। मैं गाँव से बिलोंग करती हूँ। यहाँ किराये पर रहती हूँ। घर से बिलकुल पैसे नहीं मिलते। वे लोग तो चाहते हैं कि मैं गाँव वापिस आ जाऊँ, पर मुझे हर कीमत पर सफल होना है।”

“हर क़ीमत पर!”–राज की भवें सिकुड़ी।

“मेरा मतलब चाहे कितनी भी मेहनत, कितना भी संघर्ष करना पड़े।”–वह जल्दी से बोली।

“मुझसे क्या चाहती हैं ?”

“कमरे का किराया भी देना होता है। फिर खाना और भी बहुत कुछ खर्च होता है।”–वह फिर जैसे खुद से ही बात करने लगी। ऐसा लग रहा था कि जो प्रस्ताव वह देने जा रही थी उससे वह पहले खुद को ही संतुष्ट करना चाह रही थी।

“आप मुझसे क्या चाहती हैं ?”–राज ने अपना प्रश्न फिर दोहराया।

“चा...चालीस।”–वह अटकते-अटकते बोली।

“डन।”

“जी!”–जैसे उसे अपने कानों पर यकीन नहीं आया।

“मैंने कहा डन।”

“थैंक यू सर।”–वह साफ-साफ राहत की साँस लेते हुए बोली।

राज मुस्कुराया।

“वैसे आप हैंडल कर तो लेंगे ना केस ?”–वह सशंक स्वर में बोली।

“आप की बात तुरंत मान ली इसलिए पूछ रही हो ?”–वह हँसा।

“सॉरी सर।”

“वैसे आपके लिए मेरे पास एक और प्रस्ताव भी है।”

“वो क्या सर ?”

“आप मेरे साथ एक एसोसिएट फर्म बना लीजिए। ये ऑफिस है, कोर्ट में चेम्बर है, सब लुक आफ्टर कीजिये। केस लाइये जो भी अर्निंग होगी फिफ्टी फिफ्टी।”

“सर आप मजाक कर रहे हैं ? फिर तो आपने फोर्टी परसेंट वाली बात भी मजाक में ही कही थी ना ?”–उसकी आँखों मे शंका के बादल फिर छा गए।

“नहीं। कोई मजाक नहीं है। आय’म सीरियस।”

“लेकिन मेरे पास लगाने के लिए पैसे नहीं हैं बिल्कुल भी।”–वह संकोचपूर्ण स्वर में नजरें झुका कर बोली।

“केस तो लाओगी ? मेहनत तो करोगी ?”

“बिल्कुल सर। उसमें आपको कभी कोई शिकायत नहीं होगी।”

“ये ऑफिस है। बाहर अपनी नेम प्लेट लगवा लो। बाहर कंप्यूटर भी लगा हुआ है। वाई फाई का कनेक्शन है ही। बैठो और यहीं से ऑपरेट करो।”

तुरंत उसका चेहरा हज़ार वाट के बल्ब की तरह रोशन हो गया। “मैं बाहर देख लूँ सर ?”–वह अपनी कुर्सी से उठती हुई बोली।

“श्योर।” वह बाहर जा कर टेबल, कुर्सी, कंप्यूटर सब देखने लगी। उसकी खुशी छुपाए नहीं छुप रही थी। “पर सर इस सबसे आपको क्या फायदा ?”–उसे शंकाएं

फिर सताने लगीं।

“क्योंकि मेरे पास काम नहीं है, और तुम्हारे पास ऑफिस नहीं है। हम दोनों अगर मिलकर काम करते हैं तो दोनों का फायदा है।”–राज ने स्पष्ट बता दिया।

“काम तो मैं ले ही आऊँगी सर।”–वह आत्मविश्वास भरे स्वर में बोली।

“तो फिर पार्टनरशिप पक्की।”–राज उसकी तरफ हाथ बढ़ाता हुआ बोला।
 
“पक्की सर।”–उसने भी गर्मजोशी से राज से हाथ मिलाया। “अब वह काम करते हैं, जो हमे सबसे पहले करना चाहिए था।”

उसने उलझनपूर्ण दृष्टि से राज की तरफ देखा। “मैं एडवोकेट राज शर्मा!”–राज ने दोबारा उसकी ओर हाथ बढ़ाया।

“ओह, मैं एडवोकेट डॉली मलिक।”–वह राज का अपनी ओर बढ़ा हुआ हाथ थामकर मास्क के अंदर मुस्कुराती हुई बोली।

“डॉली ये ऑफिस की चाभी।”–राज ने ड्रॉअर से चाबी का एक गुच्छा उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा–”मेरे पास एक्स्ट्रा सेट है।”

उसने सहमति से सर हिलाते हुए चाबियों का गुच्छा पकड़ लिया।

“अब पिलवाते हैं आपको चाय।”–राज ने मोबाइल निकाला और एक नम्बर पर व्हाट्सएप्प कर दिया। “ये नीचे कैंटीन का नम्बर है। जब भी कुछ मँगवाना होगा तो बस मैसेज कर देना।” उसने सहमति से सर हिलाया।

“नीचे सेकंड फ्लोर पर एक नेम प्लेट बनाने वाला है। अभी बोल देंगे तो शाम तक ही तैयार कर देगा।”

“वह मैं एक दो दिन में बनवा लूँगी।”–वह जल्दी से बोली।

“अरे तो कहीं जाना थोड़े ही है। अभी फोन कर दूँगा तो यहीं आ जायेगा।”

“जाने दीजिये सर। मैं बनवा लूँगी एक दो दिन में।”

“ओह! पैसे नहीं हैं अभी ?”–राज धीमे से बोला।

लड़की का झुका सर और झुक गया। “यहाँ गाजियवाद में कहाँ रहती हो ?”

“ वैशाली में कमरा ले रखा है सर।”

“ वैशाली में तो है, पर वैशाली में कहाँ ?”

वह खामोश सर झुकाए बैठी रही। “अरे कमरा है भी या नहीं ?”

“कमरा है।”

“पर कहाँ है ये नहीं बताओगी।”–वह हँसा।

“डबल स्टोरी में है सर।”

“क्या डबल स्टोरी में ?”–राज चौंका। डबल स्टोरी सरकारी आवासीय योजना के अंतर्गत मिले एक-एक कमरे के फ्लैट थे। सड़क टूटी हुई थी और अधिकतर निम्न वर्ग के लोग वहाँ रहते थे। जरायमपेशा लोगों का वह अड्डा था और तो और सेक्स ट्रेड में लिप्त लड़कियों के भी वहाँ अड्डे थे।

“तुम्हें पता तो है ना कि वह कैसी जगह है ?” “उसने हल्के से सहमति में सर हिलाया। निरंतर फर्श की ओर देखे जा रही आँख से एक आँसू गिरा और उसकी गोद मे गिर कर जज़्ब हो गया। तभी चायवाला लड़का आया और चाय दे गया।

“लो चाय पियो।”–राज ने गिलास उसकी तरफ बढ़ाया।

लड़की ने गिलास थाम लिया।

“तुम्हारा क्या क्या सामान है कमरे पर ?”

“बस एक बैग है। बिस्तर है और दो चार बर्तन होंगे। क्यों ?”–लड़की चाय में घूँट मारती हुई बोली।

“चाय पियो, मैं अभी तुम्हारे साथ चल रहा हूँ। वहाँ से सामान उठाओ। मैं अभी तुम्हारे रहने की व्यवस्था कहीं और कराता हूँ।”

“कहाँ ?”

“कहीं भी हो वहाँ से तो हर हाल में अच्छी ही होगी।”

“वहाँ बारह सौ रुपये में है कमरा।”–वह धीरे से बोली।

“मैं हजार में दिला दूँगा उससे कहीं बेहतर।”

“अभी उसका किराया भी बाकी है।”–वह इतने संकोच से बोली कि राज मुश्किल से सुन पाया।

“कोई बात नहीं। एडवांस ले लो ऑफिस से।”–उसने जेब से पाँच-पाँच सौ के दस नोट निकाले और उसके सामने रख दिये और एक रजिस्टर निकाल कर उस पर लिख दिया–डॉली शर्मा एडवांस 5000।

“लेकिन मुझे इतने पैसे नहीं चाहिए।”

“तो खर्च मत करना। केस लाओगी तो तुम्हारे हिस्से में से कट जायेंगे। केस तो लाओगी ना ?”

“वह तो लाऊँगी ही हर हाल में।”–उसने धीरे से पैसे उठा कर कोट की जेब मे रख लिए।
 
राज उठा और उसे साथ लेकर चल दिया। कॉलोनी पहुँचकर उसके कमरे से पहले उसका सामान उठवाया फिर कार सीधी अपनी कोठी पर ला कर खड़ी कर दी।

डॉली कार से उतर कर सशंक निगाहों से कोठी को देख रही थी।

“आओ।”–राज आगे बढ़कर कोठी का गेट खोलता हुआ बोला। “यहाँ हजार में कैसे मिल जायेगा कमरा!”

“काका जरा ऊपर की चाबी देना।”–राज ने आवाज लगाई। तीन सौ गज में बनी हुई थी राज की कोठी। नीचे ही चार बैडरूम थे। ऊपर की मंजिल पर एक बैडरूम, एक बड़ी सी लॉबी और किचन थी। ऊपर का हिस्सा ज्यादातर बंद ही रहता था। बस साफ-सफाई हर दूसरे तीसरे दिन होती थी।

काका ने चाबी लाकर दी और प्रश्नसूचक निगाहों से डॉली को देखा।

“अभी आकर बताता हूँ।”–वह काका से बोलकर डॉली से मुख़ातिब हुआ–”आओ।” कोठी के पीछे बनी सीढ़ियों से होकर वह ऊपर पहुँचा। डॉली उसके पीछे-पीछे आ रही थी। चाबी लगा कर उसने दरवाजा खोला और अंदर आ गया।

डॉली अंदर आकर नर्वस भाव से पोर्शन, बेड, टी०वी०, फ्रिज, अलमीरा आदि को देखने लगी।

“ये लो चाबी। वैसे यहाँ जरूरत का सारा सामान है। पर अगर कुछ चाहिए हो तो पैसे तुम्हारे पास हैं ही, जाकर ले आना...ठीक है ?”

“लेकिन ये है किसका ? ये तो फर्निश्ड है। ऊपर से बहुत बड़ा भी है। मैं यहाँ कैसे रह सकती हूँ ? ये तो बहुत महँगा होगा।”

“ये मेरा ही घर है। सालों से ये हिस्सा बन्द पड़ा है। बस साफ-सफाई के लिए ही खोला जाता है। कोई नहीं रहता यहाँ, तो तुम ही रह लो। क्या फर्क पड़ता है ? हजार देने की बात हुई है, दे दिया करना।”

“आप ये सब मेरे लिए क्यों कर रहे हैं ?”–वह आशंकित स्वर में बोली। शायद उसके स्त्री होने के अनुभव उसे शंका करने पर मजबूर कर रहे थे।

“ये सवाल तुम्हारे दिमाग में बहुत आ रहा है। तो अगर ऐसा-वैसा कुछ आ रहा है, तो उसे दिमाग से खुरच कर फेंक दो और केस लाने की तरफ ध्यान लगाओ। मेरा जुनून है कि मैं अपने बाप से बड़ा वकील बनूँ। पैसे के लिए काम करने की मुझे कोई जरूरत नहीं है। सारे तुम ले लिया करना। मैं केस माँगने नहीं जा सकता। पर तुम ये कर सकती हो। मेहनत करो, केस लाओ सब पैसे तुम्हारे। मुझे बस नाम चाहिए। अब समझ गईं न कि मैं ये सब क्यों कर रहा हूँ ?”

“सॉरी।”–वह खेदपूर्ण स्वर में बोली।

“एक बात और...तुम्हारे कमरे में खाना बनाने का कोई सामान नहीं था, तो खाना बाहर से खाती होगी और पैसे तुम्हारे पास थे नहीं, तो ईमानदारी से बताओ कब से खाना नहीं खाया ?”

“कल सुबह खाया था।”–गर्दन फिर झुक गई।

“फ्रिज चालू कर लो। खाना मैं नीचे से भिजवा देता हूँ। अगर उचित समझो तो आज नीचे ही खा लो। शाम से अपना खाना बना लेना। ऊपर किचन में सब सामान है। जो कम हो जाकर ले आना।”

“जैसा आप कहो। मैं नीचे ही खा लूँगी और आपकी फैमिली से भी मिल लूँगी।”

“फैमिली से तो तुम मिल ही ली हो। बस मैं और काका ही हैं और कोई नहीं है मेरा।”

“कोई नहीं है! आप अकेले ही हो ?”–वह हैरानी भरे स्वर में बोली।

“काका भी नौकर हैं; हालाँकि मेरे लिए वह सब कुछ हैं पर हकीकत यही है कि दुनिया में मेरा कोई अपना नहीं है। मामा, फूफा हैं, पर अपना कोई नहीं है।”

“मैं नीचे आकर ही खा लूँगी।”

“ओके।”–कहकर वह जाने को मुड़ गया।

“कितनी देर में आऊँ ?”–वह व्यग्र स्वर में बोली।

“साथ ही चलो। मुझे पता है कि तुम्हें जोरों की भूख लगी होगी। अगर खाने में देर होगी तो मिठाई, बिस्कुट खिलवाऊँगा तब तक।”–वह हँसा।

डॉली सच मे ही साथ चल दी। शनिवार का दिन था। दोपहर के एक बजे के आसपास का वक़्त था। राज ऑफिस में बैठा मोबाइल पर गेम खेलने में व्यस्त था। डॉली बाहर रिसेप्शन पर बैठी अपने नाखूनों पर नेल पॉलिश लगा कर फूँक मार-मार कर सुखा रही थी। बीच-बीच में हाथ अपनी आँखों के आगे करके देख लेती थी कि कैसे लग रहे हैं। नारी चाहे वकील बन जाये चाहे जज और चाहे आई०जी०, पर गाहे-बगाहे उसका नारीत्व, पद और रुतबे का पर्दा हटा कर बाहर झाँकता जरूर है। डॉली को व्यावसायिक रूप से राज से जुड़े दो महीने हो गए थे। इस दरम्यान वह तीन केस लाने में कामयाब हो भी गई थी। तीन में से दो तो जमानत के केस थे और एक सैशन ट्रायल था। स्कोर बेहद कम था, लेकिन डॉली को पूरी उम्मीद थी कि उनकी लॉ फर्म ‘आर० डी० एसोसिएटस’ एक दिन गाजियवाद की कामयाब लॉ फर्म बन कर ही रहेगी।

तीनों केसों से जो पैसे फीस के मिले उनमें से उसके शेयर के पैसों में से एडवांस के पाँच हज़ार राज को लौटा कर भी उसके पास ठीक-ठाक पैसे बचे हुए थे और वैसे भी अब उसका ख़र्चा ज्यादा कुछ था भी नहीं। कुल मिलाकर जिंदगी पटरी पर लौटती नजर आ रही थी। अभी वह अपने नेल पॉलिश अभियान में लगी हुई ही थी, कि बाहर का दरवाजा खुला और चेहरे से ही परेशान दिख रही एक तीस बत्तीस साल की महिला ने प्रवेश किया। महिला अच्छे नैन-नक्श की सुंदर कही जा सकने वाली महिला थी। महिला ने सिंपल कुर्ती और लेगिंग पहन रखी थी तथा चेहरे से संभ्रांत परिवार की लग रही थी।
 
डॉली के पास आकर उसने अपना मास्क व्यवस्थित किया। डॉली ने भी मास्क से नाक मुँह कवर करते हुए प्रश्नसूचक निगाहों से उसे देखा।

“जी मुझे एडवोकेट राज शर्मा से मिलना है।”–महिला व्याकुल स्वर में बोली।

“किस सिलसिले में ?”

“मेरे भाई को पुलिस उठा कर ले गई है।”

“कब ? और किस अपराध में ?”

“आज ही उठाया है और क्यों उठाया है, ये सब मुझे नहीं पता।”

“कौन से थाने की पुलिस ने गिरफ्तार किया है ?”

“मुझे क्या पता ? कैसे पता होगा ? उनकी वर्दी पर थाना थोड़े ही लिखा होता है।”

“हम्म...आप यहीं रुकिए मैं पूछती हूँ सर से। अगर उनके पास टाइम होगा तो आपकी मुलाकात हो जायेगी ?” महिला ने सहमति में सर हिलाया। डॉली अपनी सीट से उठी और राज के केबिन का दरवाजा खोलकर अंदर चली गई।

“सर!” राज ने निगाह उठाई।

“क्लाइंट।”–डॉली बाहर की तरफ इशारा करती हुई बोली।

“तो भेजो।”

“पाँच मिनट इंतजार कराते हैं। वरना खाली बैठा वकील मान लेगी आपको।”

राज ने सहमति में सिर हिलाया।

“जो कि आप हो।”

राज ने उसे घूरा। वह धृष्ट भाव से हँसी। दो महीने में दोनों में अच्छी ट्यूनिंग हो गई थी। हँसी मजाक भी चलने लगा था।

“क्या मैटर है ?”

“भैया गिरफ्तार हो गया।”

“चार्ज क्या है ?”

“ये तो अभी बहन जी को भी नहीं पता।”

“बहन जी ?”

“हाँ बहन जी जिनका भाई पुलिस ने उठाया है।”

“ओह्ह...चल तो भेज ना अंदर। खाली बैठा बोर ही हो रहा हूँ। सिर ही मार लेंगे उससे।”

“ठीक है।”–बोलकर डॉली बाहर आई और उस महिला के हाथ सेनिटाइज करा कर अंदर भेज दिया। महिला हाथ मलते हुए अंदर आई और राज का अभिवादन किया और राज के इशारे पर एक विजिटर चेयर पर बैठ गई।

“जी मेरा नाम वृन्दा दुबे है। मेरे पति का नाम गिरीश दुबे है। हम डिफेन्स कॉलोनी में रहते हैं।” “जी आप बताती रहिए मैं सुन रहा हूँ।”–राज ने भी अपना मास्क सुव्यवस्थित करते हुए कहा। “मेरा मायका गाजियवाद में ही है शास्त्रीनगर में। अभी चार साल पहले मेरी शादी हुई है। तबसे से मैं डिफेन्स कॉलोनी स्थित ससुराल में अपने पति के साथ ही रह रही हूँ।” राज गंभीरता से उसकी बात सुन रहा था। “अब मेरे पति दो दिन से लापता हैं। दो दिन पहले सुबह अपनी दवा फैक्ट्री के लिए निकले थे। जब रात तक नहीं लौटे, तो मैंने उनके मोबाइल पर फोन किया। उनका मोबाइल बंद आ रहा था। फिर मैंने फैक्ट्री के लैंडलाइन पर फोन किया, तो पता चला कि वह तो फैक्टरी पहुँचे ही नहीं थे। मैंने सब जगह रिश्तेदारी में, उनके दोस्तों के पास फोन किया लेकिन वह किसी के पास नहीं गए थे। तब मैंने अगले दिन अपने भाई के साथ पुलिस थाने में जाकर रिपोर्ट लिखवा दी।” “लेकिन वृन्दा जी! इस सारे मामले में मैं कहाँ फिट होता हूँ ?” “आज सुबह पुलिस ने मेरे भाई को उसके घर से उठा लिया।” “किस केस में ? इसी केस में या किसी और केस में ?” “पता नहीं ?”–वह रुआँसी सी होकर बोली। “देखिए आपकी डिफेंस कॉलोनी का थाना पड़ता है इंचौली। अगर इसी केस में उठाया है, तो इंचौली पुलिस ने उठाया होगा वरना आपका मायका तो नौचंदी थाने में आता है। वहाँ का कोई मामला होगा। कोर्ट में हैबियस कार्पस फाइल कर देते हैं। “हैबियस कार्पस! ये क्या होता है ?”

“इससे कोर्ट पुलिस को आदेश देगी कि मुलजिम को कोर्ट में पेश करे।” “कुछ भी करो आप मेरा दिल बहुत घबरा रहा है।” “आपका भाई चोर है, डकैत है, हत्यारा है, चाइल्ड मोलस्टर है, रेपिस्ट है ?” “नहीं नहीं, बिल्कुल भी नहीं।”–वह तत्काल विरोध करती हुई बोली। “तो फिर ?” “वह टी०वी० पर अक्सर आती रहती हैं ऐसी ऐसी न्यूज़ तो...।”–वह चिंतित भाव से बोली। “कैसी ऐसी ऐसी ?” “पुलिस ने उठा लिया बाद में न्यूज़ में दिखाया गया कि अमुक आदमी जिसे उठाया था वह छुपा हुआ क्रिमिनल था। हाल फिलहाल हुई किसी बड़ी वारदात में उसका हाथ था वगैरह।” “मत देखा कीजिये न्यूज़। अगर कुछ गंभीर देखने का मन करे तो कॉमेडी शो वग़ैरह देख लिया कीजिये वरना आज लाहौर में प्लाट खरीदने की सोचेंगी तो अगले दिन बीजिंग में।”–राज गंभीर स्वर में बोला। “जी ठीक है।”–वह गंभीरता से बोली। राज ने बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी दबाई। “तो कब लगायेंगे वह हेबि...हेबि...एप्लिकेशन ?” “हैबियस कार्पस।”–वह गंभीर स्वर में बोला–”आज ही लगायेंगे।” “आपकी फीस कितनी होगी ?”–वृन्दा बोली। “वह सब डॉली आपको बताएगी। डॉली मेरी जूनियर है। पेपर वर्क सब वही देखती है। आप उसी के साथ कोर्ट चली जाईये। वह सब करा देगी।”

“जी।” राज ने इंटरकॉम उठाया और डॉली को अंदर बुलाया । “सुनो डॉली ये मिसेज वृन्दा हैं। इनके भाई को पुलिस ने उठा लिया है। हैबियस कार्पस लगेगी कोर्ट में। तो तुम इन्हें ले जाओ और इनसे वकालतनामा साइन करा कर एप्लिकेशन मूव कर दो। जब तक कोर्ट पहुँचोगी मैं एप्लिकेशन बना कर तुम्हे मेल कर दूँगा। इनसे पूछ कर नाम पता भर कर सबमिट कर देना। डॉली ने सहमति से सिर हिलाया और वृन्दा को चलने का इशारा किया। वृन्दा उठी और डॉली के साथ बाहर निकल गई। पीछे राज थोड़ी देर बैठा उँगलियों से मेज ठकठकाता रहा फिर सामने पड़ा मोबाइल उठाया और एक नंबर मिलाकर कान से लगा लिया। रिंग जा रही थी। तभी उसे लगा कि रिंग टोन डबल आ रही है। उसने मोबाइल कान से हटाया। रिंग टोन बदस्तूर आती रही। उसने गौर किया कि रिंग टोन बाहर रिसेप्शन से आ रही थी। उसके होठों पर मुस्कान आ गई– “बड़ी लंबी उम्र है साले की!”–वह बुदबुदाया और मोबाइल डिसकनेक्ट करके सामने टेबल पर रख दिया। “आ जा बेटा अंदर आ जा...कुछ नहीं कहूँगा।” दरवाजा खुला और जीन्स और टी-शर्ट पहने एक सुदर्शन युवक ने पहले सिर दरवाजे से घुसाकर भीतर झाँका, फिर पूरा दाखिल हुआ और राज के सामने विजिटर चेयर पर ढेर हो गया। “बता भाई क्यों बुलाया मुझे ?”–आगंतुक युवक बोला। “मैंने बुलाया!”–राज हकबकाया। “और क्या तेरी कॉल आई तभी तो आया कि पता नहीं
 
यार को क्या चाहिए।” आगंतुक युवक का नाम अनिल शर्मा था और वह राज का हमउम्र, बचपन का दोस्त था। अनिल पुलिस में सब इंस्पेक्टर था और इस समय एस०एस०पी० ऑफिस में तैनात था। “चल मैंने बुलाया सही, पर बाहर क्या कर रहा था ? अंदर क्यों नहीं आया था।” “भाई बाहर रिसेप्शन पर छोटी वकीलनी नहीं थी। तो मैंने सोचा कि शायद तू अंदर किसी केस की बारीकियाँ समझा रहा होगा। तो मैंने डिस्टर्ब करना उचित नहीं समझा।”–वह बाईं आँख दबाता हुआ बोला। “कमाल है! पुलिस इतनी तमीज़दार हो गई और हमें खबर तक नहीं।” “केवल यार के लिए।” “चल छोड़ एक काम कर। जरा पता कर इंचौली थाने में किसी को उठाया है क्या आज डिफेन्स कॉलोनी से ?” “अच्छा इसलिए फोन कर रहा था। चल कोई नहीं आज वीकेंड पर बीयर तो पिलायेगा ही तो ये काम तो तेरा करना ही पड़ेगा। चल नाम बता जिसे उठाया है।” “नाम तो पता नहीं।” “शाबास।” “पर मैं अभी फोन कर के पता करता हूँ।” राज ने तुरन्त डॉली को फोन मिलाया और वृन्दा से बात कराने को कहा। वृन्दा से दो मिनट बात की और कॉल डिस्कनेक्ट कर दी। “अमर शर्मा नाम है और बहन के घर डिफेंस कॉलोनी से उठाया है।” अनिल ने सहमति में सिर हिलाया और फोन में व्यस्त हो

“चोंच और पंजे रंगने के अलावा उसमें कौन सी बात है लड़कियों वाली ? पूरा दिन तो सलवार कुर्ते पर कोट चढ़ाए रखती है। बाकी समय घर में बरमूडा और टी-शर्ट। ऊपर वाले का करम है कि लुंगी नहीं बाँधती। उसमें है ही नहीं कोई शौक लड़कियों वाले।” “अच्छा जी ?” “अबे यार कसम ले ले आज तक उसे शर्माते लजाते नहीं देखा।” “अब यार वकालत में शर्माएगी तो चलेगा भी कैसे।” “पर यार दोस्त बढ़िया है। मेरे लिए तो जैसे तू यार वैसे ही वह यार। अच्छा लगता है उसकी सोहबत में। कोई बोरियत नहीं होती बस।” “सही बात है।” “भाई वह बीयर नहीं पीती और माँ-बहन की गाली नहीं बकती। इतना उपकार बहुत है उसका नारी जाति पर।” अनिल ने जोर का ठहाका लगाया। राज ने भी हँसी में उसका साथ दिया। यकायक राज की निगाह सामने रखे अपने मोबाइल पर पड़ी। तत्काल उसकी हँसी को ब्रेक लगे। उसने झपट कर फोन उठाया। उसकी डॉली को की गई कॉल अभी तक चालू थी। वह कॉल डिस्कनेक्ट हुई ही नहीं थी। उसने हौले से कॉल डिस्कनेक्ट कर दी और सिर पकड़ कर बैठ गया। “क्या हुआ भाई ?”–अनिल उसे देखता हुआ बोला। राज ने बताया। “अरे तो जरूरी थोड़े ही है कि उसने ये सब सुना ही हो। उसने भी बात कर के फोन जेब में डाल लिया होगा।”–अनिल आश्वासन देता हुआ बोला।

“जरूरी तो ये भी नहीं कि ना सुना हो।”–राज धीरे से बोला। “किसी बहाने कॉल कर, पता चल जाएगा।” “यार तू अपनी सलाह अपने पास ही रख।”–राज चिड़चिड़ाया। “तो भाई तुझे ध्यान रखना था ना, मुझपे क्यों चिड़चिड़ा रहा है।” “छोड़ अब कोई और बात कर। सुना होगा नहीं सुना होगा, जो होगा शाम को पता चल ही जाएगा।” “सही है। तो अब बता क्या प्रोग्राम है शाम का ?” “शाम का क्या होना है ? वही रहेगा जो हर वीकेंड पर हमेशा रहता है। अभी भी भीड़-भाड़ वाली जगह तो जाने का कोई अर्थ नहीं है, तो घर पर ही बैठ कर टिकायेंगे।” “सही है। तो आता हूँ फिर सात बजे तक।”–अनिल उठ खड़ा हुआ। “पर अभी कैसे आना हुआ था ?” “साहब के काम से मुजफ्फरनगर जा रहा था। सोचा यार के दर्शन ही करता चलूँ।” राज हँसा। “आ जा चल, घुमाकर लाऊँ मुज्जफरनगर।” “बस तू ही घूम आ। मुझे नहीं घूमना मुजफ्फर वुज़फ्फर नगर।” “चल, तो मैं काम निपटा कर आता हूँ। फिर बैठते हैं दोनों यार।” “सही है।” अनिल ने अपनी गर्दन में झूलता मास्क मुँह पर लगाया और बाहर को निकल गया। v v v

खट...खट...खट। राज की आँख खुली तो सामने डॉली को बैठे टेबल खटखटाते पाया। “अरे आ गई तुम! मेरी तो बैठे बैठे आँख ही लग गई थी।”–राज एक अंगड़ाई सी लेकर सीधा होता हुआ बोला। “पाँच बज गए हैं सर। अगर नींद आ रही थी तो घर चले जाते।” “आ नहीं रही थी। बस पता नहीं कैसे आँख झपक गई। जरा चाय मँगवा दो प्लीज।” डॉली ने सहमति में सर हिलाते हुए मोबाइल निकाला और चाय का मैसेज कर दिया। “और सब काम सही से निपट गया ?” “जी वह सब सही से निपट गया। और फीस के एक लाख फर्म के एकाउंट में ट्रांसफर करा लिए हैं उससे।” “शाबास! काबिल तो है तू।” “सर मैंने तो टाइपिंग के पैसे भी उसी से दिलवाए थे।”–डॉली हँसी। राज को थोड़ी तसल्ली मिली। शायद सुनी नहीं इसने हमारी बातें। “सारी डिटेल तो ले ही ली होंगी वृन्दा जी से केस से संबंधित ?” “वह तो सब ले लीं। पर अब इस केस में और होना क्या है ? मतलब हमारे करने के लिए ?” राज रहस्यमय अंदाज में मुस्कुराया। “क्या ?”–डॉली असमंजस भरे स्वर में बोली। “देख, दो दिन हो गए पति को गायब हुए और कोई रैनसम का फोन नहीं आया। और पुलिस ने भी भाई को उठाया पूछताछ के लिए।”

“तो ?” “तो ये कि मुझसे लिखवाकर ले ले कि देर सबेर वृन्दा पर भी पुलिसकर्मी की नज़रें–इनायत होना तय है। फिर जमानत भी हमें ही करानी है और केस भी हमें ही लड़ना है।” “मान गई सर पक्के ह...खिलाड़ी हो।” “खिलाड़ी ऊँचा होता है। पक्का वह ही होता है जो तू पहले कहने जा रही थी।” “नहीं सर, मैं तो पक्का खिलाड़ी ही कह रही थी।”–वह बड़ी मासूमियत से बोली। तभी चाय वाला लड़का आया और दो चाय के गिलास रख गया। दोनों ने एक एक गिलास उठाया और चाय की चुस्कियाँ लेने लगे। “सर आपका तो आज शाम का अनिल जी के साथ का प्रोग्राम होगा?” “हाँ है तो ? क्यों ?” “सर मुझे भी आज अपनी फ्रेंड की इंगेजमेंट में जाना था, तो अगर आप घर पर ही रहोगे तो मैं आपकी कार ले जाऊँ।” “बिल्कुल ले जाना इसमें पूछना कैसा ? मुझे नहीं जाना कहीं भी। और वैसे भी कोई काम हुआ भी तो अनिल की कार तो होगी ही।” “थैंक यू सर।” “सर काका को भी ले जाऊँगी। वह कार चलायेंगे। दरअसल मैं फंक्शन के लिए तैयार होकर कार चलाती थोड़ी अजीब लगूँगी न।” “ले जाना। कोई दिक्कत नहीं है। और वैसे भी लॉकडाउन है तो दस से पहले ही आ जाओगी। और हम भी उसके बाद ही डिनर करेंगे तो कोई दिक्कत है ही नहीं।” “थैंक यू सर।”

“वैसे बाई द वे जाना कहाँ है ?” “सेलिब्रेशन में।” “वह तो पास ही में है। बस बीस मिनट का रास्ता है।” “घर चलें सर ?”–वह चाय का खाली गिलास मेज पर रखती हुई बोली। “हाँ हाँ चलो।”–राज उठ खड़ा हुआ। ऑफिस को ताला लगा कर दोनों घर के लिए चल पड़े। v v v अनिल और राज दोनों ने ड्रॉइंगरूम में बैठक जमाई हुई थी। ड्राइंगरूम की एक दीवार के साथ बार कॉउंटर था जिसके पीछे बार कैबिनेट में तमाम तरह की व्हिस्की, वाइन की बोतले लगी हुई थीं। राज के पिता पंकज शर्मा को पीने का शौक़ था। रोज रात को यहीं बैठकर वह दो चार पैग लगाया करते थे। पिता की परंपरा बेटे ने कायम रखी थी। बस बेटा महीने में चार या पाँच दिन ही यहाँ बैठता था और वह भी अपने यार के आने पर। आज भी दोनों यार जमे हुए थे। वाइन के दौर चल रहे थे। दो दो पैग हो चुके थे, तीसरा सामने कॉउंटर पर रखा था। राज कॉउंटर के पीछे बैठा था और अनिल उसके ठीक सामने। “यार कुछ भी कह वाइन का कोई तोड़ नहीं है।”–अनिल अपने गिलास में से घूँट मार कर गिलास कॉउंटर पर रखता हुआ बोला। “भाई तू एस०ओ० कब बनेगा ? एस०ओ० बन जाये भाई तो कुछ केस ही दिला देगा।” “ये भी कोई कहने की बात है। यार के लिए तो जान हाजिर है।” “जान का मैं क्या करूँगा। तेरे बराबर में आइसबकेट है

जरा सी बर्फ डाल मेरे ग्लास में।” “यार, काका नहीं दिख रहे आज।”–अनिल आइस टोंग से एक आइस क्यूब उठाकर उसके गिलास में डालता हुआ बोला। “डॉली को किसी फंक्शन में जाना था तो काका कार लेकर उसके साथ गए हैं।” “यार अभी तो सात ही बजे हैं। फंक्शन का ये कौन सा टाइम हुआ ?” “वह पहले अपने किसी फ्रेंड के यहाँ गई है। पहले वहाँ तैयार होगी फिर जाएगी। उसकी फ्रेंड भी साथ जा रही है उसके।” “तैयार होगी ? अपनी छोटी वकीलनी तैयार होगी ?”–अनिल आश्चर्यचकित होने की एक्टिंग सी करता हुआ बोला। “भाई बताया तो यही था और निकल भी यहाँ से छह बजे ही गई थी।” “चल छोड़, तू गिलास खाली कर नया बनाते हैं।” “नहीं, हौले हौले पीनी है। दस साढ़े दस तक आयेंगे काका तभी डिनर होगा।” “अरे तू खाने की फिक्र मत कर। वो मैं जोमेटो से मँगवा लूँगा। अब तो सर्विस चालू ही है सबकी।” “चालू तो है पर बाहर का खाना तो नहीं है अभी।” “अरे कुछ नहीं होता। अब सब ठीक है।” “ठीक इसीलिए तो है क्योंकि हम एहतियात बरत रहे हैं। इसलिए जब तक मजबूरी ना हो, ना कहीं बाहर जाओ और ना बाहर का कुछ खाओ।” “ठीक है भाई तुझे तो पका पकाया मिल रहा है। हमसे पूछ, अकेले पड़े हैं पुलिस क्वार्टर में। अब ड्यूटी करें या खाना बनाएँ ? और पुलिस की ड्यूटी तो तुझे पता ही है।”
 
“एस०पी० ऑफिस में है तू। दस से पाँच की ड्यूटी है तेरी, हमें मत सिखा।”

“अरे तो अब है ना, हमेशा थोड़े ही रहेगी।”

“अरे तो यहाँ आ जा। पूरा घर खाली पड़ा है। पहले भी कहा है तुझसे।”

“नहीं भाई, जैसे चल रहा है, ठीक है।” राज ने देखा दोनों के गिलास खाली थे। उसने दोनों गिलासों में वाइन डाल कर आइस क्यूब डाल दिये।

“अनिल कल पता करना इंचौली थाने से कि गिरीश गुमशुदगी केस में चल क्या रहा है ?”

“क्यों भई तुझे क्या करना है ? जो काम तेरे पास आया तूने कर दिया। अब आगे क्यों जानना है तुझे ?”–अनिल गिलास उठा कर एक घूँट मार कर गिलास वापिस कॉउंटर पर रखता हुआ बोला।

“यार दो दिन हो गए कोई रैनसम नहीं माँगी गई। मेरे खयाल से तो गिरीश दुबे का रामनाम सत्य हो चुका है, या फिर वह खुद ही कहीं गायब हुआ है।”

“तो भी तुझे क्या ?”

“तो ये भाई कि वृन्दा मेरी क्लाइंट है। अगर उस पर कोई इल्ज़ाम आने की संभावना बनती है, तो हमें हाइकोर्ट से कुछ रिलीफ तो लेने चाहिए। एंटीसिपेट्री बेल ना मिले तो कम से कम सेम डे हियरिंग की एप्लीकेशन की तैयारी तो कर ही लेंगे पहले से।”

“तो वृन्दा से बात कर ना, वह बताएगी पूरी कहानी।”

“कल सुबह ऑफिस आ रही है। उससे तो बात कर ही लूँगा। पर तू भी तो पता कर।”

“मैं तो पता कर ही दूँगा कल।”

“गुड।”

दोनों यार पीते रहे। गपशप करते रहे। बीच बीच में लड़ते रहे। दोनों की दोस्ती में खासियत ये थी कि दोनों में से कोई एक दूसरे की तारीफ नहीं करता था। ना किसी को किसी की कोई बात बुरी लगने की फिक्र थी। बिल्कुल सहज आडम्बररहित मित्रता थी। दोनों ही अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के समर्थक थे। राजनीतिक बहस भी खूब होती थी। लेकिन दोनों ने ही तय कर रखा था कि वीकेंड की पार्टी में राजनीतिक चर्चा करेंगे ही नहीं। ये समय केवल एन्जॉय को समर्पित था। सवा दस बजे के करीब गाड़ी आने और गेट खुलने की आवाज आई।

“ले भाई आ तो गए।”–अनिल कुर्सी पर सीधा होता हुआ बोला। “हम्म।”–राज आँख मिचमिचाते हुए उठा और जाकर दरवाजा खोल दिया। सामने एक रूपसी लाल लहँगा पहने–लहँगे को दोनों हाथों से दोनों साइडों से थोड़ा सा उठाये–खड़ी थी। उसके बिल्कुल स्ट्रेट रेशमी बाल हवा में हल्के-हल्के लहरा रहे थे।

“जी कहिए।”–राज सकपकाया सा बोला।

“दरवाजे से हटो सर अंदर तो आने दो।”–रूपसी बोली।

“डॉली ?”–राज का मुँह खुला का खुला रह गया। रूपसी हँसी। एक गर्वभरी हँसी। और भौंचक्के राज को एक साइड को हटाती हुई अंदर चली गई। अवाक राज उसके पीछे-पीछे अंदर चल दिया। जय गाड़ी खड़ी करके गेट बंद करके अंदर आया और दरवाजा बंद करके सीधा किचन में चला गया। डॉली हॉल से ऊपर जाती सीढ़ियों से ऊपर को चल दी। अब वह पीछे की सीढ़ियों का प्रयोग ना करके कोठी के अंदर की सीढ़ियों का प्रयोग ही करती थी। आख़िरी सीढ़ी पर पहुँचकर उसने एक बार नीचे देखा फिर आगे बढ़ गई। राज मुँह बाये उसी की तरफ देख रहा था। राज वापिस ड्राइंगरूम में पहुँचा।

“क्या हुआ भाई ? तेरे बारह कैसे बज गए ? ऐसा क्या देख लिया ?”

“जादू।”

“जादू ?”

“यार मेकओवर सुना था, ये तो चेंजओवर हो गया।”

“क्या बक रहा है ?”

“छोड़ चल खाना खाते हैं।”

“चल।”–अनिल उठ खड़ा हुआ। डिनर करके अनिल और राज अपने अपने बेडरूम में पहुँचे और बेड पर लेटे ही थे कि नींद के हवाले हो गए। राज की कोठी में अनिल का अपना बेड रूम था जिसमें उसकी जरूरत भर के कपड़े भी रखे रहते थे। हफ्ते में दो दिन तो उसका यहाँ रहना लाजमी था। सुबह चाय, ब्रेकफास्ट के बाद अनिल तो एस०पी० ऑफिस के लिए निकल गया। उसे मुज्जफरनगर से लाई गई फ़ाइल और रिपोर्ट साहब को देनी थी। उसके बाद राज के काम के लिए इंचौली थाने भी जाना था। जबकि राज और डॉली दस बजे के करीब ऑफिस पहुँच गए। आज वृन्दा से केस के संदर्भ में डिस्कशन होना था। साढ़े दस बजे के करीब वृन्दा आई। डॉली ने उसके हाथ सेनीटाइज कराए और उसके साथ ही खुद भी अंदर आ कर

बैठ गई। केस के संबंध में जो भी बातें होनी थीं, वह सब उसे भी जाननी थीं। आखिर वकील थी वह भी; और काम सीखना भी तो था। ज़िंदगी भर जूनियर बने रहने का उसका कोई इरादा नहीं था। फिलहाल तो नहीं ही था।

“सबसे पहले तो थैंक्स अमर को छुड़ाने के लिए।”–औपचारिक अभिवादन के पश्चात वृन्दा बोली। वृन्दा आज पिंक कलर की जेगिंग्स और सफेद रंग की कुर्ती पहने हुए थी जो उस पर काफी जंच रही थी।

“कोई बात नहीं वृन्दा जी ये तो हमारा काम ही है। अब आप सिलसिलेवार ढंग से बताइए कि हुआ क्या था ?”

“जी मेरी और गिरीश की शादी चार साल पहले हुई थी। गिरीश की दवा बनाने की फैक्ट्री है। काम बहुत अच्छा चल रहा है। किसी प्रकार की कोई परेशानी भी नहीं थी। सब बढ़िया चल रहा था कि तीन दिन पहले अचानक गिरीश गायब हो गए।” “आपके गिरीश जी से संबंध कैसे थे ?”

“कैसे थे मतलब ? अच्छे थे।”

“आपके साथ ससुराल में और कौन कौन रहता है ?”

“मेरे सास-ससुर और एक देवर है जो कॉलेज में पढ़ता है। और एक नौकर है जो सर्वेंट क्वार्टर में रहता है। इसके अलावा एक ड्राइवर और कुक है जो रात को अपने घर चले जाते हैं।”

“अगर पुलिस आपके सास-ससुर और देवर से पूछेगी कि आपके अपने पति से संबंध कैसे थे तो क्या वह भी अच्छे ही बताएँगे ?”–राज ने पूछा।

“मेरे सास-ससुर तो मुझे बिल्कुल ही पसंद नहीं करते।”–

वह चिंतित स्वर में बोली। “और नौकर वगैरह ?”

“पता नहीं। वे सब मेरे ससुर के वफादार हैं। मुझे क्या पता वह क्या कहेंगे ?”–वह कठिन स्वर में बोली।

“और देवर ?”

“राहुल...उसका भी पता नहीं ? आखिर वह भी साइड तो अपने घरवालों की ही लेगा।”

“पुलिस ने राहुल को भी थाने बुलवाया था ?”

“नहीं, उससे तो घर पर ही बात की थी। हम सब से ही की थी। तभी उससे भी की थी।”

“हम्म।”–राज ने गंभीर भाव से सिर हिलाया। “अब क्या ?”–वह चिंतित स्वर बोली।

“आपके पति का बाहर किसी से कोई अफेयर वग़ैरह तो नहीं है ?”–राज ने उसके सवाल को नजरअंदाज करते हुए पूछा।

“मुझे कैसे पता होगा! सुबह से रात तक तो बाहर ही रहते हैं। महीने में पंद्रह दिन टूर पे रहते हैं। पर फिर भी मुझे नहीं लगता कि उनका बाहर कोई चक्कर होगा।”

“कोई रैनसम वगैरह का फोन आया ?”

“मेरी जानकारी में तो नहीं आया।”

“आप अपने पति से प्यार करती हैं ?”–राज ने सहज स्वर में पूछा।

“ये कैसा सवाल हुआ ? हर पत्नी अपने पति से प्यार करती है।”–वह तनिक उखड़े स्वर में बोली।

“जरूरी नहीं; बल्कि मेरे हिसाब से तो अस्सी प्रतिशत पति पत्नियों में प्यार होता ही नहीं।

“ये क्या कह रहे हैं आप ?”

“यही हकीकत है। चौबीस घंटे साथ रहने से उत्पन्न

लगाव को प्रेम समझ लिया जाता है, पर असल में वह प्रेम होता ही नहीं।”–राज दार्शनिक अंदाज में बोला।

“इन सब बातों का मेरे पति की गुमशुदगी से क्या वास्ता ?”

“अगर अपहरण फिरौती के लिए नहीं हुआ है, तो वास्ता हो भी सकता है।”

“अब मैं क्या करूँ ?”

“मैंने पुलिस की लाइन ऑफ एक्शन के बारे में पता करवाया है। लेकिन जितना मैँ फिलहाल समझ पा रहा हूँ उसके हिसाब से अब आपकी गिरफ्तारी बस वक़्त की ही बात है।”

“क..क..क्या!”–वृन्दा बुरी तरह चौंकी–“लेकिन मैंने क्या किया है ?”

“यही तो पुलिस जानना चाहती है। तभी तो गिरफ्तार करेगी आपको।”

“अब मैं क्या करूँ ?”–वह घबराए स्वर में बोली। “वह सब आप हम पर छोड़ दीजिए। आप तो बस बरायमेहरबानी अगर इस संबंध में कुछ भी जानती हों तो साफ साफ बता दीजिए।”

“क्या बताऊँ मैं ?”–वह उलझन भरे स्वर में बोली।

“अगर मैं पूछूँगा तो बहुत लंबा और शायद गैरजरूरी वार्तालाप हो जाएगा। तो आप खुद ही बता दीजिए कि आपके पति से किसकी रंजिश थी, या उनके ना रहने से किसको फायदा है ? कोई भी गैरमामूली बात जो आपको अजीब लगी हो।”

“वह मुझसे बिजनेस की कोई बात नहीं करते थे। दरअसल ऐसी कोई भी बात जिससे मेरा वास्ता ना हो, वह मुझसे नहीं करते थे।”–वह खेदपूर्ण स्वर में बोली।

“अपने भाई से कैसे संबंध थे आपके पति के ?”

“वह राहुल से पंद्रह साल बड़े थे। राहुल को भाई कम बेटा ज्यादा मानते थे।”

“और राहुल ?”

“वह भी अपने पिता से बढ़कर मानता है उन्हें।”

“कोई नाम तलाशिये वृन्दा जी जिसे हम आपकी जगह फिट कर सकें। वरना मुझे तो प्राइम सस्पेक्ट आप ही लग रही हैं।”

“अब ऐसे ही कैसे किसी का नाम ले दूँ ? कोई हो भी तो सही।”

“वृन्दा जी अगर बहुत जरूरी ना होता तो मैं नहीं पूछता लेकिन ये जानना बहुत जरूरी है।”

“क्या ?”

“क्या आप दोनों के बीच कोई तीसरा भी था ?”

“मुझे नहीं पता। सच्ची नहीं पता।”–वह झुँझला सी गई। “वृन्दा जी बात को समझिए। पुलिस की जाँच को कुछ नए एंगल देने पड़ेंगे। वरना उनका फोकस सिर्फ आप तक ही रहेगा। बात के मर्म को समझिए।”

“मुझे नहीं पता।”

“ठीक है तो फिर पहले आपकी एंटीसिपेट्री बेल करानी होगी। फिर देखते हैं कि आगे क्या हो सकता है।”

“वह क्या है और कैसे होगी ?”

“अग्रिम जमानत, जिससे आपको इस केस में लटकती गिरफ्तारी की तलवार से निजात मिल जाये।”

“तो करा दीजिए।”–वह व्यग्र स्वर में बोली।

“लाइये एफ०आई०आर० की कॉपी दीजिए। आज रात की ट्रेन से ही भिजवाते हैं प्रयागराज हाई कोर्ट।

“वहाँ आप जायेंगे ?”
 
“नहीं, हमारी फर्म के एडवोकेट वहाँ बैठते हैं। वह करा देंगे जो भी संभव होगा।”–राज डॉली की तरफ देख मुस्कुराता हुआ बोला।

वृन्दा ने अपने पर्स में से एफ०आई०आर० की कॉपी निकालकर राज की तरफ बढ़ाई। राज ने ड्रॉज में से ग्लव्स निकाले और पहनकर एफ०आई०आर० की कॉपी पकड़कर उसका मुआइना किया। फिर टेबल पर रख दी।

“डॉली , तुम वृन्दा जी के साइन ले लो सादे कागज और वकालतनामे पर और बाकी सब फॉर्मेलिटीज पूरी करवा लो।”

“ठीक है। आइए वृन्दा जी।” डॉली वृन्दा को लेकर बाहर रिसेप्शन पर आ गई। आधा घंटे बाद डॉली अकेली अंदर आई। उसका चेहरा हज़ार वाट के बल्ब की तरह जगमगा रहा था।

“कितने ?”–राज उसके चेहरे को गौर से देखते हुए बोला।

उसने दो अँगुली दिखाईं। “शाबास।”

“लेकिन इसमें सेशन की बेल की भी फीस है। अगर करानी पड़ी तो?”

“चल कोई नहीं। करा देंगे बेल भी।”

“वैसे क्या लगता है आपको ? सच बोल रही थी ये ?”–डॉली सामने बैठते हुए बोली।

“हाँ, इसने कुछ नहीं किया।”–राज विश्वासपूर्वक बोला।

“ये कैसे कह सकते हो सर ?”

“क्योंकि सब तरफ से इसी पर शक जा रहा है। अगर इसने कुछ किया होता तो जरा कुछ तो अपना बचाव सोचा होता।”

“बात में दम तो है आपकी।”–डॉली ने स्वीकार किया। राज मुस्कुराया।

“लेकिन सर, अब मैं अपनी थ्योरी बताऊँ ?”

“बताओ।”–राज ने जिज्ञासापूर्ण लहजे में पूछा।

“अगर कोई पैसों के लिए अपहरण करता, तो पैसों की डिमांड करता। जो कि तीन दिन बीत जाने पर भी नहीं हुई है। तो सर ये अपहरण वाली थ्योरी कैंसिल।”

“ठीक है कैंसिल।”

“अब अगर कोई बाहर का दुश्मन मारना चाहता, तो मार देता। लाश गायब क्यों करता ? तो सर मुझे ये दुश्मनी वाला एंगल भी नहीं लगता।”

“चलो ये भी कैंसिल।”–राज उसकी बातों में दिलचस्पी लेता हुआ बोला।

“और सर दिनदहाड़े गायब हुआ है। बगैर किसी शोर-शराबे के गायब हुआ है। किसी ने कहीं कुछ नहीं देखा है। तो इसका मतलब तो साफ है कि या तो वह खुद ही गायब हुआ है; या किसी ऐसे अपने ने गायब किया है, जिसके साथ वह बिना संकोच चला गया।”

“माना फिर ?”

“तो सर या तो ‘उस अपने’ ने उसे रास्ते से हटाने के लिए गायब किया है या फिर वह अपने को ही रास्ते से हटाने के लिए गायब हुआ है।”

“ओह माय गॉड ! यानी अगर वह जिंदा है, तो वृन्दा की जान खतरे में है !”– राज चौंका।

“सर, चाहे उसने साफ कहा नहीं, लेकिन गिरीश उस पर ध्यान नहीं देता था। अब इस सूरत में या तो उसकी जिंदगी में कोई है, जिसकी वजह से वह वृन्दा पर ध्यान नहीं देता; या फिर उसे वृन्दा के बारे में कुछ पता चल गया होगा। इस वजह से वह इससे बेजार होगा। दोनों ही सूरतों में दोनों के ही पास एक दूसरे की हत्या का मोटिव है।”

“डॉली आज तूने सिद्ध कर दिया तू मेरी पक्की चेली है।”

“पार्टनर हूँ।”

“पार्टनर भी है और चेली भी।”

“शिष्या हूँ और पार्टनर हूँ।”

“चल शिष्या सही मतलब तो एक ही है।”

“हैं तो नहीं एक ही मतलब...पर चलो।”

“इतनी तो खूबसूरत है वृन्दा ! कैसे संभव है कि इसका कोई बॉयफ्रेंड ना हो ! जबकि इसका पति इस पर ध्यान तक नहीं देता।”–राज बोला।

“कहाँ की खूबसूरत है। चोंच और पंजे रंग लेने से कोई खूबसूरत हो जाता है ?”–वह सामान्य स्वर में बोली। राज ने अपलक उसे देखा।

“क्या हुआ सर ?”–वह मासूमियत से बोली।

“तुमने हमारी सारी बातें सुनी थीं ?”

“कौन सी बातें सर ?”

“तुम्हे पता है कौन सी बातें।”

“नहीं सर मुझे नहीं पता।”

“सॉरी।”–राज धीरे से बोला। “किस बात के लिए सर ?”

“तुम्हें पता है। और मैने सॉरी बोल दिया। बस बात खत्म।”

“पता नहीं क्या बोल रहे हो सर! मेरी तो कुछ समझ नहीं आया।”

“ये स्ट्रेट बाल अच्छे लग रहे हैं तुम पर।”–राज उसके बालों की तरफ इशारा करते हुए बोला।

“क्या सर...क्यों मजाक उड़ा रहे हो हम गरीबों का।”–वह कृत्रिम गंभीरता से बोली।

“सॉरी बोला ना।”

“सर इंसान का दिल अच्छा हो, तो शब्द महत्व नहीं रखते।”

“चलो थैंक्स तुम्हें बुरा नहीं लगा।”

“बुरा नहीं लगा! ये किसने कहा ?”

“तो फिर ?”

“तो फिर ये कि ये बात आपकी समझ में नहीं आएगी।”–डॉली बोली और उठकर बाहर रिसेप्शन पर जाकर बैठ गई। उसने पर्स से छोटा सा शीशा निकाला और अपने बाल आगे पीछे करके देखने लगी।

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सुबह सात बजे के करीब राज सो कर उठा। काका चाय और अखबार पकड़ा गए। अनिल सुबह सबेरे ही चला गया था। राज ने अखबार खोला और पहली हैडलाइन पर नजर पड़ते ही उछल पड़ा। अखबार में मोटे-मोटे अक्षरों में हैडलाइन थी– अपह्रत उद्योगपति की पत्नी पर जानलेवा हमला। वफादार कुत्ते ब्रूनो ने अपनी जान देकर मालकिन की जान बचाई। वह जल्दी जल्दी सारी ख़बर पढ़ गया। ख़बर के अनुसार जब वृन्दा दुबे रोज की तरह शाम सात बजे अपने कुत्ते ब्रूनो को घुमा कर लौट रही थी, तो किसी अज्ञात हमलावर ने उन पर फायरिंग कर दी। अगर वह फुर्ती से गेट के पिलर की आड़ में ना हो गई होती और उनका बॉक्सर नस्ल का कुत्ता हमलावर पर झपट न पड़ा होता, तो उनका बचना नामुमकिन था। पिलर पर दो गोलियों के निशान साफ देखे गए।

हमलावर की एक गोली ब्रूनो को लगी थी और वह मारा गया था। राज ने अखबार एक तरफ फेंका और उठ कर ऊपर डॉली के पास पहुँचा। उसने डॉली को सारा हाल बताया।

“यानी हमारी थ्योरी सही साबित हुई। अब देख लेना गिरीश भी लौट आएगा।”–डॉली बोली।

“लेकिन काम तो उसका हुआ ही नहीं।”

“वह दोबारा किसी और तरीके से प्रयास करेगा। पर अभी नहीं; क्योंकि अब बहुत दिन तक शायद कोई मौका मिले ही ना।”

“सही कह रही हो। वह जल्दबाजी में कुछ नहीं करेगा।”

“चाय पियोगे ?”

“पी लूँगा। मेरी चाय तो इस ख़बर के चक्कर में नीचे ही रह गई।”

“कोई नहीं। मैं अपनी भी बनाने ही जा रही थी।” डॉली किचन में चली गई।

राज वहीं लॉबी में पड़े सोफे पर बैठ गया। वहाँ से किचन साफ नजर आ रहा था। वह डॉली को चाय बनाते हुए देखने लगा। डॉली ने नाइकी का ब्लैक कलर का लोअर और ब्रांडेड गोल गले की हरे रंग की टी-शर्ट पहन रखी थी जो कि उस पर खूब फब रही थी। अपने लंबे कद की वजह से वह कोई स्पोर्ट्स स्टार लग रही थी। राज के होंठो पर मुस्कान आ गई। डॉली दो गिलासों में चाय ले आई। एक गिलास राज को थमाया और एक खुद थाम कर उसके सामने बैठ गई।

“खूब शौपिंग हुई है ?”

“ऑन लाइन मँगवाया था।”–वह हँसी।

“दिल पे ले गई उस दिन की बात।”

“बिल्कुल ले ली। नहीं लेनी चाहिए थी क्या ?”–उसने राज की तरफ भवें चलाईं।

“चाय अच्छी बनी है।”–राज ने विषय बदला।

“अनिल जी ने कुछ बताया वृन्दा वाले मामले में ?”

हाँ, यही बताया था कि वृन्दा ही प्राइम सस्पेक्ट है।”

“पर इस आज वाली घटना के बाद अब शायद ना रहे ?”

“देखो क्या होता है। हमें तो जो करना था कर चुके। हाई कोर्ट से भी रिलीफ आ जायेगी। हम तैयार हैं हर स्थिति के लिए।”

“एक बार मिल कर आना चाहिए वृन्दा जी से।”

“क्यों भई ? हमारा काम कोर्ट का है। हम वकील हैं। कोई जासूस नहीं।”

“अरे मैं तो कॉमन कर्टसी की बात कर रही थी।”

“डायरी तो देखना जरा। देखो आज कोई तारीख तो नहीं है। फिर देखते हैं। टाइम होगा तो चलकर मिल आयेंगे।”

“डायरी क्या देखनी है सर। आज कोई तारीख नहीं है। हम कोई इतने बड़े वकील थोड़े ही हैं।”

राज ने उसे घूर कर देखा।

“सही कह रही हूँ सर। आज कोई तारीख नहीं है किसी भी केस की। वैसे भी कोरोना काल में केवल बेल वर्क हो रहा है। तारीख होती भी, तो अगली तारीख मिल जाती। काम तो फिर भी नहीं होता।”

“चल तो फिर आज चैम्बर पर जाते ही नहीं। मुंशी को बोल दे कि अगर कोई नया केस आये तो हमें फोन कर दे।”

“हो लो खुश। अभी इतने नामवर वकील थोड़े ही हुए हैं हम कि केस खुद चलकर आने लगे मिस्टर सर।”

“तू आजकल मेरी हर बात काटने नहीं लग गई है ?”–राज ने उसे घूरा।

“सॉरी सर।” “और ये ‘मिस्टर सर’ क्या होता है ?”

“सॉरी सर, जुबान फिसल गई।”–वह साफ-साफ नकली खेद प्रगट करती हुई बोली।

“ठीक है। तो फिर तैयार हो कर नीचे आ जा। चलते हैं। सबसे पहले डिफेंस कॉलोनी ही चलते हैं।”

“ओके सर। फिर आप काका को नाश्ते के लिए मना कर दो। उधर ही जा रहे हैं तो ‘दिल्ली वाले’ के छोले भटूरे खा लेंगे या ‘न्यू वेज़’ के समोसे खा लेंगे। बहुत दिन से खाये नहीं।”–डॉली होठों पर जीभ फेरती हुई बोली।

“चुपचाप नीचे आ जा और नाश्ता कर ले। बाहर का खाना अभी ठीक नहीं।”

डॉली उठी और मुँह बिसूरती हुई बाथरूम में घुस गई। राज भी उठा और नीचे को चल दिया।

“बाबा नाश्ते में क्या लोगे आज ?”–नीचे पहुँचते ही जय ने सवाल किया।

“नाश्ता...”–राज ने थोड़ा सोचा, फिर बोला–“नाश्ता तो रहने ही दो काका। तुम सीधा लंच ही तैयार करना और आज डॉली भी लंच नीचे ही करेगी।”

“कौन सी नई बात है, रोज ही तो नीचे करती है।”–जय मुस्कुरा कर बोला।

“अरे! वह तो ऊपर बनाती है अपना खाना न ?”

“रोज तो सब्जी नीचे से ले जाती है। कहती है काका एक रोटी खाऊँगी। अब उसके लिए सब्जी बनाऊँ। सब्जी कम हो, तो चाहे दो ही चम्मच दे दो। मैं रोटी छुआ-छुआ कर खा लूँगी, पर बनाऊँगी नहीं।”

राज को हँसी आ गई।

“बहुत भली लड़की है बाबा। चली जायेगी तो घर खाली खाली हो जाएगा।”–जय राज की ओर देखकर अर्थपूर्ण स्वर में बोला।

राज ने कोई जवाब नहीं दिया और बाथरूम में घुस गया।

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राज ने गिरीश दुबे की कोठी के सामने कार खड़ी की और दोनों कार से उतरे। बड़े से पार्क के सामने कम से कम दो हज़ार गज में बनी दो मंजिला कोठी थी। गेट से घुसते ही एक खूब बड़ा सा लॉन था, जिसके चारों तरफ बड़े-बड़े पेड़ खड़े थे। गेट के एक साइड वॉचमैन का केबिन था। राज ने वॉचमैन को अपना कार्ड दिया और मंतव्य बताया।

वॉचमैन ने फोन पर कोठी के अंदर बात की और राज को अंदर जाने का इशारा कर दिया।

राज और डॉली पैदल ही कोठी के अंदर को चल दिये।

“यहाँ तो गेट पर वॉचमैन रहता है। जब वृन्दा जी पर हमला हुआ, तब ये कहाँ था ?”–राज कुछ सोचता हुआ बोला।

“वृन्दा ही बताएगी कि कहाँ था।”–डॉली सहज स्वर में बोली।

लंबा ड्राइव वे पार करके वह कोठी में पहुँचे, तो एक सर्वेंट को खड़ा पाया। वह उन्हें एक सजे-धजे विशाल ड्राइंगरूम में बैठा कर अंदर चला गया। डॉली ने चारों तरफ निगाह दौड़ा कर मुआइना सा किया। दीवारों पर शानदार पेंटिंग्स, पीतल के बड़े-बड़े हाथी, फर्श पर मोटा ईरानी कालीन, बेहतरीन आधुनिक राजसिंहासन जैसे सोफे, एक कोने में खड़ी एंटीक आदमकद घड़ी, सब कुछ बड़े सुरुचिपूर्ण ढंग से सजा हुआ था। डॉली के चेहरे पर प्रशंसा के भाव आ गए।

“सब पैसे का जहूरा है।”–राज धीरे से बोला।

“नहीं, सिर्फ पैसा ही नहीं, उसे खर्चने की तमीज का भी रोल है।”

“तुझे तो खैर मेरी बात काटनी ही है।”

“लो अब अपना नज़रिया भी नहीं रख सकता गरीब आदमी ?”

“गरीब और तू ? कहाँ से गरीब है तू ?

” जहाँ बैठी हूँ और जिसके साथ बैठी हूँ, सबसे गरीब मैं ही तो हूँ।”

“बकवास मत कर।”

“लो कुचल दी न गरीब की आवाज़।”

अभी राज कोई जवाब देता कि वृन्दा अंदर दाखिल हुई। कॉटन के सिंपल सूट में भी वह बेहद हसीन और गरिमापूर्ण लग रही थी।

“कैसी हैं आप ? मैंने तो सुबह अखबार पढ़ा तब पता चला कि ऐसा हो गया।”–औपचारिक अभिवादन के बाद राज बोला।

“पता नहीं किसी को मुझसे ऐसी क्या दुश्मनी हो गई ?”–वृन्दा फीकी मुस्कान के साथ बोली।

“सोचिये, आप बेहतर जान सकती हैं कि ऐसा कौन हो सकता है जिसकी राह का आप रोड़ा हैं।”

“मेरी तो कुछ भी समझ नहीं आ रहा।”

“या शायद आप समझना ही नहीं चाह रहीं।”–राज धीरे से बोला।

“आप बार-बार एक ही तरफ इशारा करते हैं। पर मुझे बिल्कुल नहीं लगता कि वह ऐसा कर सकते हैं। आपकी वह बात सही है कि शायद हमारे बीच प्यार नहीं है; पर नफरत हो ऐसा भी नहीं है। वह ऐसा क्यों करेंगे ?”

“वह ऐसा क्यों करेंगे ?”–राज ने अर्थपूर्ण ढंग से उसकी बात दोहराई–“देखिए वृन्दा जी, बिना प्यार के इंसान को तब तक कोई समस्या नहीं होती जब तक उसके पास विकल्प ना हो। एक बार विकल्प मिल जाये तो वह किसी भी हद तक जा सकता है।”

“मुझे नहीं लगता कि ऐसा कुछ है।”

“भगवान ना करे ऐसा कुछ हो, पर अगर ऐसा हुआ है तो आपकी जान खतरे में है।”–राज चेतावनीपूर्ण स्वर में बोला।

“तो आप पता लगाइये ना कि कौन है इस हमले के पीछे? कौन लेना चाहता है मेरी जान ?”–वृन्दा चिंतित स्वर में बोली।

“हम क्या कर सकते हैं इसमे ? हम तो वकील हैं। सिर्फ कानूनी सेवाएँ ही दे सकते हैं। दे ही रहे हैं।”

“प्लीज आप कुछ कीजिये। गिरीश का पता लगा दीजिये और मेरे पीछे कौन लगा है, ये भी पता लगा दीजिये। मैं आपको आपकी पूरी फीस दूँगी।”

“बात फीस की नहीं है वृन्दा जी। पर ये हमारा काम नहीं है।”–राज समझाने वाले अंदाज में बोला।

“आप पता तो लगाइये। मुझे पूरा यकीन है कि आप इसकी तह तक जा सकते हैं। मैं आपको इसके लिए पूरे दस लाख रुपये दूँगी।”

डॉली ने दस लाख सुनते ही तत्काल राज की तरफ देखा।

“देखिये वृन्दा जी...आप समझ नहीं रही हैं।”–राज असहाय भाव से बोला।

“प्लीज।”

“हम करेंगे ये काम आपके लिए।”–डॉली निर्णायक स्वर में बोली।

राज ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। डॉली ने आँखों ही आँखों में उसे आश्वस्त किया।

“थैंक यू।”–वृन्दा राहत की साँस सी लेती हुई बोली।

राज के चेहरे से असंतोष के भाव नहीं गए।

“आप लोग बैठिए मैं अभी दो मिनट में आई।”–वृन्दा बोली और उठकर अंदर चली गई।

“हम लोग वकील हैं या जासूस ? कैसे करेंगे ये सब ?”–वृन्दा के नजरों से ओझल होते ही राज असंतोष भरे स्वर में बोला।

“चुप।”

“क्या ?”–राज हकबकाया।

“मेरा मतलब सर प्लीज चुप रहिए। वह बस आने ही वाली होगी। हम बाद में करते हैं ना इस बारे में बात।”

“बाद में क्या बात करने को रह जायेगा जब यहाँ हाँ कर देंगे तो ?” तभी राज के फोन की मेसेज टोन बजी। उसने देखा तो उनके लॉ फर्म के खाते में दस लाख रुपये क्रेडिट हुए थे। वह आँखें फाड़कर मोबाइल की स्क्रीन को घूरने लगा।

“आ गए पैसे...गुड।”–डॉली संतोषपूर्ण स्वर में बोली। राज ने उसे घूर कर देखा। वह तत्काल परे देखने लगी। तभी एक नौकर एक ट्रॉली खींचता हुआ लाया और सेंटर टेबल पर चाय, बिस्किट और ड्राई फ्रूट्स की प्लेट लगा कर ट्रॉली को खींचता हुआ वापस ले गया। तभी वृन्दा वापिस ड्राइंगरूम में दाखिल हुई।

“लीजिए चाय लीजिए।”–वह वापिस अपनी जगह पर आकर बैठती हुई बोली।

“शुक्रिया।”–राज चाय का कप उठाता हुआ बोला।

“वृन्दा जी हम लोग आज से, बल्कि अभी से इस केस पर लग रहे हैं। आपको भी थोड़ा सहयोग करना होगा।”–डॉली बातचीत का सूत्र अपने हाथ में लेती हुई बोली।

“जी बताइए मुझसे जो बन पड़ेगा मैं करूँगी।”

“कुछ सवालों के सीधे-सीधे जवाब देकर और ये सुनिश्चित करके कि आपको जो पता है आपने सब सच-सच बता दिया है, आप हमारी बहुत मदद कर सकती हैं।”

“आप पूछिए जो पूछना है। मैं सब सच-सच ही बताऊँगी।”

“आपके और गिरीश जी के बीच क्या डिफरेंसेज हैं ?”–डॉली ने सवाल पूछ कर वृन्दा के चेहरे पर निगाह गड़ा दी।

“गिरीश को लगता है कि स्त्री को घर दे दिया, कार दे दी, पैसे दे दिए, बस उसका कर्तव्य पूरा हो गया। जबकि मैं बहुत ही भावुक किस्म की हूँ। मुझे ये सब नहीं चाहिए। मुझे एक साथी चाहिए जो मेरी तरफ ध्यान दे। मुझे समझे। संक्षेप में ये समझ लीजिए कि हमारी एक भी आदत नहीं मिलती।”

“आपको कभी ऐसा लगा कि आपके पति का बाहर किसी से अफेयर है जिसकी वजह से वह आप पर ध्यान नहीं देते ?”–डॉली सावधानी से शब्दों का चयन करती हुई बोली।

“अगर गिरीश का व्यवहार मेरे प्रति बदलता, तो मुझे ऐसा कुछ जरूर लगता। पर उसका व्यवहार तो मेरे प्रति पहले दिन से ही ऐसा है। वह जरा भी रोमांटिक नहीं है...है ही नहीं, तो बाहर भी कैसे करेगा रोमांस ? हाँ, वन नाईट स्टैंड जैसी कोई बात कभी हुई हो तो संभव है।”

“आप के गेट पर तो गॉर्ड रहता है। वह कहाँ था जब आप पर हमला हुआ ?”–राज ने पूछा।

“वह कल मैं अपना मोबाइल रूम में ही भूल गई थी, तो मैंने गॉर्ड को मोबाइल लाने भेज दिया था।”

“ये तो जाने अनजाने आपने हमलावर की मदद ही कर दी।”

“क्या मदद हो गई हमलावर की ? गॉर्ड कोई रायफल लेकर थोड़े ही ड्यूटी करता है। गॉर्ड के होने ना होने से उस पर क्या फर्क पड़ना था ?”

“हम्म...ये भी सही है...अच्छा ये बताइए कि आप के मायके के आर्थिक हालात कैसे हैं ?”

“मेरी ससुराल वालों की तरह रईस तो नहीं हैं, लेकिन अच्छे हैं। मेरे पिता ‘सी०एम०ओ०’ के पद से रिटायर हुए हैं। अच्छी खासी पेंशन आती है और खुद भी मेडिकल प्रेक्टिस करते हैं।”

“और भाई ? वह क्या करता है ?”

“वह अपना बिजनेस शुरू करने वाला है।”–वृन्दा थोड़े संकोच भरे स्वर में बोली।

“करने वाला है! यानी फिलहाल कुछ नहीं करता ? शादी शुदा है ?”

“नहीं, अभी शादी नहीं हुई उसकी।”

“आपसे बड़ा है या छोटा ?”

“मुझसे बड़ा है।”–वृन्दा वार्तालाप की इस दिशा से खुश नहीं लग रही थी।

“तो आपके मायके में माता-पिता और एक भाई ही है।”

“मम्मी का देहांत हो चुका है। बस पापा और भाई ही हैं।”

“ओह्ह सॉरी, मुझे खेद है।”

“नहीं नहीं...कोई बात नहीं।”

“अच्छा अब यहाँ ससुराल के बारे में बताइए। यहाँ कौन कौन है ?”

“सास, ससुर और एक देवर है राहुल।”
 
“राहुल क्या करता है ?”

“वह तो अभी बाईस साल का है। कॉलेज जाता है।”

“फिर तो आपका हमउम्र ही हुआ।”–राज धीरे से बोला।

वृन्दा की आँखों में चमक सी आ गई। जबकि डॉली ने हैरानी से राज की तरफ देखा।

“आपको कितनी लगती है मेरी उम्र ?”–वृन्दा हौले से अपना मास्क हटाती हुई बोली।

“इक्कीस या ज्यादा से ज्यादा बाइस। चौबीस, पच्चीस की तो कतई नहीं।”–राज बोला।

“ती...सत्ताईस की हूँ मैं।”–वह गर्व से बोली।

“कमाल है।” वह हँसी। एक गर्वभरी हँसी।

“पर क्या फायदा! धन-दौलत, ऐशो आराम सब कुछ होने पर भी अंदर से बहुत रीती हूँ मैं। बिल्कुल खाली। तन्हा।”–वृन्दा राज का सिर से पैर तक मुआइना सा करती हुई बोली।

“चिंता मत करिए। हम बहुत जल्दी ढूँढ़ लायेंगे आपके पति परमेश्वर को।”–डॉली व्यंग्यात्मक स्वर में बोली। वृन्दा ने उसकी तरफ अप्रसन्न भाव से देखा।

“माफ कीजियेगा वृन्दा जी, क्या मैं आपका वॉशरूम यूज़ कर सकता हूँ?”–राज बोला।

“जी बिलकुल। वह सामने वाला दरवाजा है।”–वृन्दा एक दरवाजे की तरफ इशारा करती हुई बोली।

“थैंक्स।”–राज उठकर उस तरफ चल दिया।

“आप शहर में किस तरफ रहती हैं ?”–पीछे वृन्दा डॉली को तोलती हुई सी बोली।

“मैं और राज लिव इन में रहते हैं।”–डॉली सपाट स्वर में बोली।

“जीईई....”–वृन्दा चौंकी, फिर संभली–“अच्छी जोड़ी है आप दोनों की।”

“थैंक्स।”–डॉली मुस्कुराई।

“वैसे एक बात बोलूँ। आप वाकई बहुत खूबसूरत हैं।”–डॉली बोली।

“ओह्ह थैंक्स।”–वह मुस्कुराई।

“जवानी में तो बहुत लड़के मरते रहे होंगे आप पर ?”

“क्या ?”–तत्काल उसके चेहरे से मुस्कान जैसे जादू के जोर से पुंछ गई।

“ओह्ह सॉरी...मेरा मतलब था कॉलेज में...कॉलेज में तो बहुत लड़के मरते रहे होंगे आप पर।”

“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं।”–उसके चेहरे से अप्रसन्नता के भाव नहीं गए। तभी राज वापस आया।

“अच्छा वृन्दा जी अब इजाज़त दीजिए। फिर मुलाकात होगी आपसे।”–राज डॉली को चलने का इशारा करता हुआ बोला।

वृन्दा ने एक गहरी नजर राज पर डाली और उठ कर हाथ जोड़ दिए।

“अपना ध्यान रखिएगा वृन्दा जी। खतरा अभी टला नहीं है।”

“जी मैं ध्यान रखूँगी।”–वृन्दा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई। राज और डॉली रवाना हो गए।

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