• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Thriller बेकसूर

S

StoryPublisher

Guest
बेकसूर

बेकसूर

“कूकूकूकू... कूकूकूकू... कूकूकू... कू... ।” मोबाइल फोन के अलार्म की आवाज बेडरूम में गूंजने लगी थी । बिस्तर में अलसाए-अलसाए, बिना आँख खोले ही मैंने इधर-उधर हाथ मारा । बेड के सहारे लगी हुई साइड टेबल पर हाथ बढ़ाकर मोबाइल उठाया । बजते हुए अलार्म को बंद किया, मोबाइल को टेबल पर रखने के बजाय सिरहाने तकिये के साइड में रखा और ‘बस 5 मिनट थोड़ी देर और सो लूँ’ कहते हुए मैंने फिर से खुद को नींद के हवाले कर दिया ।

मेरे साथ ही नहीं बल्कि हर किसी के साथ हमेशा ऐसा ही होता है । चाहे आप रात भर की पूरी नींद ले लो, फिर भी घड़ी या मोबाइल के अलार्म की आवाज से जागने के बाद 5 मिनट सोना तो बनता ही है । ये बात अलग है वह 5 मिनट की नींद कब आधे घंटे की हो जाती है, हमें खबर भी नहीं होती । पर ना जाने क्यों इस बार मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ । मैं थोड़ी देर तक इधर-उधर बिस्तर में करवट बदलता रहा और फिर जब पलकों से नींद का मिलन नहीं हुआ तो हाथ फैलाकर तकिये के बगल में से मोबाइल बरामद किया और बड़ी मुश्किल से अपनी आँखें खोलकर टाइम देखने के लिए मोबाइल की स्क्रीन पर नजर दौड़ाई । मोबाइल इस समय 2 बजकर 6 मिनट का टाइम दिखा रहा था, यानी कि 5 मिनट थोड़ी देर और से सिर्फ 1 मिनट ज्यादा ही टाइम हुआ था ।

“उफ़्फ़...! अभी तो 2 ही बजे हैं । सारा दिन कैसे पास होगा !” मोबाइल में टाइम देखते हुए मैं बड़बड़ाया ।

हाँ, दोपहर के 2:06 मिनट ही बज रहे थे । अब ये मत सोचना कि मैं दिन में क्यों सो रहा था ? आजकल मेरी नाइट शिफ्ट जो चल रही थी । रात के 10 बजे से सुबह 6 बजे तक ऑफिस में काम और फिर सुबह 6:30 तक घर आकर दोपहर 2 बजे तक सोना, आजकल मेरी बस यही दिनचर्या चल रही थी ।

मेरा नाम राज है, मूलतः मैं दिल्ली से हूँ और एक एमएनसी में जॉब कर रहा हूँ । फिलहाल जॉब के सिलसिले में वर्तमान में मुंबई मेरा रैन बसेरा है । मैं अपने परिवार के साथ मुंबई के कुकटपल्ली क्षेत्र की नवभारत टाइम्स टाउनशिप की बिल्डिंग नंबर 5 के फ्लैट नंबर 165 में रहता हूँ ।

नवभारत टाइम्स मुंबई की सबसे बड़ी और सबसे पहले बनी सरकार और प्राइवेट कंपनी के जाइंट वेंचर में लगभग 100 एकड़ में बनी हुई टाउनशिप थी, जिसमें 20 बड़ी-बड़ी बिल्डिंग थी । ये सारी बिल्डिंग 7 मंजिल से लेकर 15 माले की थी, जिसमें 23-4 बेडरूम, हर टाइप के फ्लैट थे । वैसे भारत के एक महानगर में नवभारत टाइम्स के नाम से टाउनशिप क्या कर रही थी; ये तो उसे बनाने वाला बिल्डर ही बेहतर बता सकता था कि आखिर उसने ये नाम क्यों रखा था ? बाकी सुविधाओं के नाम पर देखा जाए तो टाउनशिप वाकई में एक विकसित टाउनशिप थी और अपने नाम को चरितार्थ कर रही थी ।

अलसाये मन से मैं उठा और रसोई की तरफ चल पड़ा । उठने के बाद जब तक चाय शरीर में नहीं जाती, तब तक जैसे शरीर में जान ही नहीं आती । बेटे के स्कूल में गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही थी । बीवी उसे अपने साथ लेकर मायके गई थी; तो ये चाय बनाने का कमबख्त काम भी मुझे ही करना था । चाय बनाकर उसे कप में डाला और फिर ड्राइंगहॉल में आकर बैठ गया । अभी चाय का पहला सिप लेने ही वाला था कि फ्लैट के बाहर कुछ खटपट-सी, हलचल-सी महसूस हुई । उसे इग्नोर करते हुए मैं चाय का सिप लेने लगा । पर अभी 23 सिप ही पीये होंगे कि खटपट की आवाज कुछ ज्यादा ही तेज हो गई ।

‘साला ! चैन से चाय भी नहीं पीने देते । पता नहीं क्या हो रहा है बाहर । जब देखो कुछ ना कुछ होता रहता है । जरूर वह कॉर्नर वाला फ्लैट होगा, जहाँ तीन तितलियाँ रहती हैं । जब देखो कुछ ना कुछ ड्रामा करती रहती हैं ।’ मैं मन ही मन बड़बड़ाया और चाय पीने लगा । अभी फिर से चाय के 23 सिप पीये होंगे कि खटपट की आवाज के साथ-साथ किसी के चिल्लाने की भी आवाज आने लगी ।

‘लगता है, बाहर कुछ ज्यादा ही गड़बड़ है ।’ सोचते हुए मैंने कप से चाय के 23 घूंट जल्दी-जल्दी खींचे । इस जल्दबाजी में गले में जलन-सी हुई, पर उसे इग्नोर करते हुए एक नजर कप में आधी बची हुई चाय पर हसरत भरी नजर डाली और उठ खड़ा हुआ । अभी घर का मुख्य द्वार खोलकर मैं बाहर कदम रखने ही वाला था कि ध्यान आया, मैं सिर्फ बनियान और नेकर में ही हूँ । फटाफट मैंने दरवाजा बंद किया और ड्राइंगरूम के सोफ़े पर पड़ी हुई टी-शर्ट उठाकर पहनी । चलने से पहले मैंने वहीं टेबल पर रखे हुए कप को उठाया और उसमें बची हुई आधी चाय को एक घूंट में अंदर खींच ली । खाली कप को वहीं टेबल पर वापस से रखा और संतुष्टि से अपने होंठों पर अपनी जीभ फेरकर मैं अपने फ्लैट से बाहर आ गया । बाहर का नजारा देखते ही मैं चौंक पड़ा । बाहर आसपास के फ्लैट के काफी लोग खड़े थे । ना सिर्फ मेरी मंजिल के बल्कि ऊपर-नीचे की मंजिलों के भी कुछ जाने-पहचाने चेहरे नजर आ रहे थे ।

‘ना जाने क्या बात हो गई है ?’ मैंने मन ही मन सोचा । तभी मुझे उस कॉर्नर वाले फ्लैट से पुलिस के दो सिपाही बाहर निकलते हुए नजर आए । उनके पीछे-पीछे महिला कॉन्स्टेबल एक लड़की को हथकड़ी लगाए हुए निकली । साथ में पुलिस का एक इंस्पेक्टर रेंक का अधिकारी भी था । लड़की को देखते ही मैं चौंक गया । वह डॉली शर्मा थी, उस फ्लैट में रहने वाली उन्हीं तीन तितलियों में से एक । बाहर निकलते-निकलते उसके होंठों से निकल रहा था, “मैं बेगुनाह हूँ । मैंने कुछ भी नहीं किया । प्लीज, मुझे छोड़ दीजिये ।”

वह आसपास खड़े लोगों से खुद को बचाने की गुहार लगा रही थी, “कोई तो मेरी मदद कीजिये । मैंने कुछ नहीं किया, मुझे फँसाया गया है ।” पर सब लोग उसकी बात को सुनकर भी अनसुना कर रहे थे । शायद उनमें से कोई भी पुलिस की नजरों में नहीं आना चाहता था । तभी उसकी नजर मेरे ऊपर पड़ी ।

मुझे देखते ही उसने लेडी कॉन्स्टेबल की गिरफ़्त से अपने आपको छुड़ाने की कोशिश की पर सफल नहीं हो पाई । पुलिस उसे लेकर लिफ्ट की तरफ बढ़ी । लिफ्ट का रास्ता मेरे फ्लैट के दरवाजे से होकर ही जाता था । जैसे ही वह लोग मेरे नजदीक पहुँचे, डॉली ने मुझे छूने और बात करने की कोशिश की, पर पुलिस की पकड़ ज्यादा मजबूत थी । जाते-जाते वह मुझसे फरियाद लगाती गई, “सर ! प्लीज, आप तो मेरा विश्वास कीजिये । मैंने कुछ नहीं किया है । मुझे फँसाया गया है । प्लीज, मेरी मदद कीजिये ।” बस इससे ज्यादा वह नहीं बोल पाई थी और पुलिस उसे लेकर लिफ्ट में प्रवेश कर गई । उसके जाने के बाद पीछे खड़े लोग उसके बारे में बातें बनाने लग गए थे, जिसमें मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं था, इसलिए मैं वापस से अपने फ्लैट के अंदर आ गया । दरवाजा बंद करके मुड़ा तो नजर टेबल पर रखे हुए चाय के खाली कप पर पड़ी ।

‘उफ़्फ़ ! अब इसे भी धोना है । बाद में धो लूँगा ।’ सोचते हुए मैं सोफ़े पर आकर पसर गया और डॉली के बारे में सोचने लगा, ‘आखिर पुलिस ने उस लड़की को क्यों गिरफ्तार किया है ? उसने ऐसा क्या किया होगा ? शक्ल से तो बड़ी मासूम लगती है । लगता तो नहीं, उसने कुछ किया होगा । वैसे क्या मुझे उसकी मदद करनी चाहिए ?’ मेरे मन में खयाल आया, पर अगले ही पल अपने सिर को झटका देते हुए खुद से कहा, ‘मुझे क्या मतलब किसी से ? साली, वैसे ही बड़े भाव खाती है । 24 बार मिली लिफ्ट में, मगर क्या मजाल एकाध बार से ज्यादा कभी हाय, हैलो भी किया हो ।’
 
।’ सोचते हुए मैंने वहीं सोफ़े की साइड में पड़ा हुआ उपन्यास उठाया और पढ़ने लगा ।

डॉली नायिका का नाम पढ़ते ही मुझे तुरंत डॉली की याद आ गयी, जिसे अभी थोड़ी देर पहले ही पुलिस गिरफ्तार करके ले गई थी । मेरा मन फिर उसके बारे में सोचने लग गया था, पर अब दिमाग में उपन्यास के नायक के विचार साथ में घूम रहे थे, ‘वो लड़की कुछ नहीं कर सकती । वह बेकसूर लगती है । मुझे उसकी मदद करनी चाहिए ।’ पर फिर अगले ही पल विचार दूसरी तरफ जाने लगे, ‘अमन एक लेखक द्वारा बनाया गया नायक है, पुलिस इंस्पेक्टर है । वह ये काम कर सकता है । पर मैं एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर, असली ज़िंदगी में क्या ये काम कर पाऊँगा ? क्या मैं उसकी मदद कर पाऊँगा ? छोड़ो यार, क्यों दूसरों के लफड़े में बिना फालतू पड़ने का ? साला, मेरे बस में क्या है जो मैं कुछ कर सकूँ ? कौन-सा इतना दिमाग और हिम्मत है मुझ में ?’ सोचते हुए मैंने नॉवेल वहीं टेबल पर रखा और सोफ़े पर एक करवट लेकर लेट गया । लेटे-लेटे तभी दिमाग में दूसरे विचार आने लगे ।

‘साला, क्यों कुछ नहीं कर सकता ? भूल गया राज ! जब तू स्कूल में 8वीं क्लास में था तो कैसे उस सिकड़ी टिफिन चोर को पकड़ा था, जो सबके खाना चुराकर खा जाता था, जबकि सबका शक उस मोटे पर था । और कॉलेज के सैकेंड ईयर को भूल गया, जब तेरा दोस्त एक लड़की के पीछे पागल था और कैसे तूने उसकी जासूसी करके पता लगाया था कि उस लड़की का किसी और लड़के के साथ भी चक्कर था । और भूल मत जाना, तू भी तो एक पुलिस इंस्पेक्टर ही बनना चाहता था । वह तो मम्मी को रिश्तेदारों ने डरा दिया था और फिर उसके बाद तू कम्प्यूटर साइंस लेकर इंजीनियर बना । इसलिए तू अपने आपको किसी से कम मत समझ और बचा ले उस मासूम बेकसूर लड़की की जान ।’ दिमाग में ये विचार आते ही फिर से मैं सोफ़े से उठा और बेचैनी से हॉल में चक्कर लगाने लग गया, पर अगले ही पल दूसरे विचार मन में आने लगे ।

‘देख, मान लिया तेरे में पूरी हिम्मत है और दिमाग भी, जो तू उस लड़की की मदद कर सकता है । पर इससे फायदा क्या होगा ? तेरे ऑफिस के कई लोग इस कॉलोनी में रहते हैं । अगर उन्हें पता चला कि एक लड़की के लिए तू जासूसी करने निकला है तो सब लोग हँसेंगे तुझ पर । और फिर सोच, तेरी पत्नी को पता चल गया तो... ? खाली-पीली प्रॉब्लम हो जाएगी । ये तो वही बात हो गई, खाया-पिया कुछ नहीं और गिलास तोड़ा बारा आना । उसकी मदद करके क्या मिलेगा आखिर तुझे ?”

मन में एक के बाद एक विचार आ-जा रहे थे । आखिरकार थक-हारकर मैंने घूमना बंद किया और वापस से सोफ़े पर लेटकर आराम करने लगा । पर जब मन में विचारों की इतनी आँधी चल रही हो तो फिर आराम कहाँ मिलता है ? थोड़ी देर में ही मैं फिर से उठ गया, पर मन अब भी नहीं लग रहा था । एक नजर टेबल पर पड़े नॉवेल ‘जादू भरी मौत’ पर डाली, पर डॉली नाम होने की वजह से उसे पढ़ने की हिम्मत नहीं हो रही थी । फिर मैंने वहीं टीवी कैबिनेट में बने हुए खाने में रखे हुए दूसरे नॉवेल को उठाया और पढ़ने लगा । उस नॉवेल को पढ़ते ही खून में जैसे करंट दौड़ उठा हो । विक्रांत दिल्ली में एक प्राइवेट जासूस था । एक नंबर का हरामी था । लड़कियों की मदद करना और उसके बदले अपनी पसंदीदा फीस जो कि बड़े नोट के साथ-साथ कभी-कभी स्पेशल वाली फीस वसूल करना, ये उसका काम था । उसे पढ़ने लगा तो महसूस किया, ‘साला, मैं कौन-सा विक्रांत से कम हूँ । आखिर मैं भी दिल्ली वाला हूँ और अभी शादी हो गई तो क्या हुआ, दो बच्चों का बाप हुआ तो क्या हुआ, कॉलेज के टाइम पर मैं भी कभी एक नंबर का हरामी हुआ करता था । हो सकता है, मैं डॉली की मदद करूँ और मुझे उसके बदले विक्रांत जैसा कुछ हासिल हो जाए ।’ बस अपने कॉलेज के दिन याद आते ही दिल एक अजीब-सी आग में जलने लगा और इस आग में घी का काम किया डॉली शर्मा से हुई मेरी पहली मुलाक़ात ने, जो अब मेरी यादों में अपना घर बना रही थी ।

☐☐☐
 
“टिंग टोंग... ।” तभी बाहर से घंटी बजने की आवाज सुनाई दी ।

‘साला, अभी फ्लैट में आए हुए 10 मिनट नहीं हुए और ये दरवाजा कौन खटखटाने लग गया ?’ सोचते हुए मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा । हम आज ही इस फ्लैट में शिफ्ट होने वाले थे । हालांकि इस नवभारत टाइम्स कॉलोनी में मैं अपने परिवार सहित पिछले 1.5 साल से रह रहा था, पर पिछले दिनों ही पुराने वाले मकान मालिक से कुछ खटपट हो गई थी तो 20 दिन में ही दूसरा फ्लैट ढूँढना पड़ गया था और आज हम इस नए फ्लैट में शिफ्ट होने वाले थे । मेरी बीवी और बच्चे अभी पुराने वाले फ्लैट में ही थे । मैं ये देखने आया था कि इस नये फ्लैट की सफाई हो गई या नहीं और अभी मुझे आए हुए सिर्फ 2 मिनट ही हुए थे कि दरवाजे पर खटखटाने की आवाज हुई ।

“सर !” दरवाजा खोला तो सामने एक महिला खड़ी थी, जो साउथ इंडियन स्टाइल में साड़ी पहने हुए थी ।

“यस !”

“सर, वह झाड़ू, सफाई के लिये... कोई लाया था । वह दे दीजिये ।” उसने टूटी-फूटी हिन्दी में कहा ।

मैंने हॉल में इधर-उधर नजर दौड़ाई, पर वहाँ मुझे कोई झाड़ू नजर नहीं आई ।

“यहाँ कोई झाड़ू नहीं है ।” मैंने बेरुखी से कहा और फटाक से दरवाजा बंद कर दिया । दरवाजा बंद करके मैं फिर से फ्लैट में घूम-घूमकर सफाई देखने लगा । मेरी बीवी सफाई के मामले में बहुत ज्यादा सख्त है और उसे गंदगी बिलकुल पसंद नहीं, इसलिए मैं एक-एक कमरे को ध्यान से देख रहा था कि नए मालिक ने सफाई सही ढंग से करवाई है या नहीं । तभी अचानक से फिर से टिंग टोंग करके घंटी बजी ।

‘साला, चैन भी नहीं लेने देते । लगता है फिर से वही होगी । मालिक ने फिर से भेजा होगा देखने के लिए । इस बार डांटना पड़ेगा ।’ सोचते हुए मैंने गुस्से में दरवाजा खोला और देखता ही रह गया । दरवाजे पर एक लड़की खड़ी थी जो मुश्किल से 22-23 साल की लग रही थी । उसने पिंक कलर की टाइट टी-शर्ट और ब्लैक कलर की मिनी स्कर्ट पहनी हुई थी । टाइट टी-शर्ट में उसके बदन का एक-एक उभार साफ नजर आ रहा था । टी-शर्ट और स्कर्ट के बीच में गैप बहुत ज्यादा था, जिससे उसके पेट और कमर का काफी भाग नजर आ रहा था । मिनी स्कर्ट इतनी मिनी थी जिसमें से उसकी जांघों का काफी हिस्सा साफ-साफ नुमाया हो रहा था । उसको देखकर एक पल के लिए मैं जैसे खुद को भी भूल गया था ।

“एक्सक्यूज मी । माइ मेड हैज कम एंड आस्किंग फॉर ब्रूम ।” और बिना मेरे किसी जवाब की प्रतीक्षा किए हुए ही वह दरवाजे से अंदर आने लगी । मैं दरवाजे पर ही खड़ा था । अंदर आते हुए वह मेरे इतने पास से गुजरी कि उसका बदन मेरे बदन को लगभग छूता हुआ गया था । वह तो भगवान का शुक्र था कि मेरी पत्नी इस समय मेरे साथ नहीं थी, वरना मेरा क्या अंजाम होना था, ये सिर्फ मुझे ही पता था । अंदर आकर उसने पूरा घर छान मारा, पर झाड़ू नहीं थी तो नहीं मिली ।

“आई एम सॉरी सर । यूअर लैंडलॉर्ड हैड बौरोड ब्रूम एंड डस्टर फ़्रोम मी टू क्लीन दिस फ्लैट सो आई थॉट इट वुड बी हियर । आई थिंक क्लीनर प्लेस्ड इट समव्हेयर एल्स । आई नीड टू कन्फ़र्म फ़्रोम हिम ।”

‘साली, बढ़ी अँग्रेजी झाड़ रही है ! साली को अभी लाइन पर लेता हूँ ।’ मन ही मन सोचते हुए मैंने कहा, “कोई बात नहीं मिस । ऐसा हो जाता है कभी ।”

“ओह्ह ! आप हिन्दी बोलते हैं । आई एम रियली वेरी सॉरी । मुझे लगा आप साउथ इंडियन है और आपको हिन्दी नहीं आती होगी, इसलिए...।”

‘साली ! अब मेरे साँवले रंग का मज़ाक उड़ा रही है । जानती नहीं, साउथ इंडिया के लोग टेलेंटेड बहुत होते हैं । उनके लिए कलर कोई मायने नहीं रखता । इसको कौन बताए, रजनीकान्त साउथ से ही हैं ।’ मैंने मन ही मन फिर सोचा, पर प्रत्यक्ष में कहा, “दिल्ली... दिल्ली से हूँ मैं । वहीं जहाँ से विक्रांत गोखले है ।”

“ओह्ह ! आप दिल्ली से हैं । मैं डॉली शर्मा, मुंबई से । बाई दी वे ये विक्रांत गोखले कौन है ?”

“आप विक्रांत गोखले को नहीं जानती ! वह दिल्ली का मशहूर डिटेक्टिव है ।” मैंने जवाब दिया ।

“जी, मैं कभी दिल्ली नहीं गई मिस्टर... ! वो आपने अपना क्या नाम बताया था ?”

“जी, अभी तक बताया नहीं था । वैसे बंदे को राज कहते हैं । नाम तो आपने सुना... ।” अभी मैं और कुछ कहने जा रहा था तभी मेरा मोबाइल बजने लगा था । मैंने अपनी जीन्स के पॉकेट से मोबाइल निकाला । मेरी वाइफ़ का फोन था, जिसे मैंने माइ लव के नाम से सेव कर रहा था । उसने नंबर देखने की कोशिश की, जिसकी वजह से उसके उभार मेरे हाथों से टच होने लगे थे ।

‘साली, अजीब चिपकू लड़की है । शुक्र है वाइफ़ साथ में नहीं है, वरना मेरे साथ-साथ इस लड़की भी खैर नहीं थी ।’

“आपकी गर्लफ्रेंड का फोन है । उठा लीजिये, नहीं तो बेचारी परेशान हो जाएगी ।” उसने नाम देखकर हँसते हुए कहा ।

‘साला, मैं इतना जवान लग रहा हूँ क्या ?’ मैंने मन ही मन सोचा फिर अगले ही पल खुद ही विचार को झटक दिया, ‘नहीं, 2 महीने बाद मैं 38 का होने जा रहा हूँ और ये गर्लफ्रेंड के लिए बोल रही है । साली, जरूर उल्लू बना रही है ।’

“जी नहीं, वाइफ़ का फोन है ।” मैंने उससे कहा, ‘ना जाने क्यों झूठ बोलने की महान कला मैं खुद में विकसित नहीं कर सका था ।’

“फिर तो आप फोन जरूर उठाइए, वरना शक करेगी और फिर आपकी खैर नहीं ।” उसने हँसते हुए कहा ।

‘हाँ साली ! जैसे मैं तेरी ही परमिशन का वेट कर रहा था ।’ मैंने फोन उठाने की कोशिश की, पर तब तक मोबाइल की रिंग बजनी बंद हो चुकी थी ।

“अब आपकी तो खैर नहीं राज जी ।” उसने फिर से हँसते हुए कहा ।

“जी, ऐसा कुछ नहीं...।” मैं भी उससे बात करने के फुल मूड में आ चुका था । पर मैं अभी उसे और कुछ कहने जा रहा था कि तभी मेरा मोबाइल दुबारा बज उठा ।

‘अब मैडम जी को भी चैन नहीं । मेरी थोड़ी-सी भी खुशी बर्दाश्त नहीं होती । ना जाने इतनी दूर से भी कैसे सूंघ लेती है ?’ सोचते हुए मैंने मोबाइल स्क्रीन पर नजर आ रहे आन्सर पर स्वेप किया और डॉली से थोड़ा दूर जाते हुए इतना धीरे से बोला कि मुझे खुद को भी अपनी आवाज बड़ी मुश्किल से सुनाई दी, “हैलो जान !”

“इतना धीरे क्यों बोल रहे हो ?” उधर से पत्नी ने कहा ।

23 मिनट तक हमारी बात चलती रही । मैंने कनखियों से फ्लैट के मुख्य दरवाजे की तरफ देखा ।

‘साली, अब तक खड़ी है । लगता है आज पाप करवा के ही मानेगी मुझसे ।’ मन ही मन सोचते हुए मैंने वाइफ़ को फोन पर कहा, “अच्छा, ठीक है जान ! बस 5 मिनट में निकलता हूँ । बाय ।” कहते हुए मैंने फोन काट दिया और दरवाजे की तरफ चल पड़ा, जहाँ डॉली खड़ी थी ।

“मेरी झाड़ू तो मिली नहीं राज जी । सॉरी, आपको डिस्टर्ब किया ।”

“कोई बात नहीं डॉली जी !”

“अच्छा, अब मैं चलती हूँ । वह कॉर्नर वाला फ्लैट मेरा है, जहाँ मैं अपनी 2 सहेलियों के साथ रेंट पर रहती हूँ । कभी वक़्त निकालकर आइयेगा ।” वह बाहर जाने के लिए फिर से मेरे से इतना करीब से गुजरी कि मेरे पूरे शरीर में करंट-सा दौड़ गया था ।

☐☐☐
 
उसका वह स्पर्श याद आते ही आज फिर मेरे अंदर तक वहीं करंट दौड़ उठा था । अंदर के विक्रांत का कमीनापन जो कहीं पर सोया हुआ था, वह आज फिर से जाग रहा था ।

‘अब तो साली की मदद करनी ही पड़ेगी । क्या पता वो वाकई में बेकसूर हो और मैं उसकी थोड़ी मदद कर सकूँ तो विक्रांत गोखले की तरह मेरी भी किस्मत चमक उठे । विक्रांत साला, लकी बास्टर्ड ।’

वैसे ये विक्रांत सिर्फ मेरे अंदर ही नहीं, हर मर्द के अंदर छुपा हुआ होता है । चाहे वह कुँवारा हो या फिर शादीशुदा हो, ऑलरेडी कोई गर्लफ्रेंड हो या फिर गर्ल के नाम से ही कई किलोमीटर दूर भागने वाला । बस कहीं पर कोई एक मौका मिलने की बात है और फिर अंदर का ये विक्रांत बाहर आ जाता है । और जब ये विक्रांत बाहर आता है तो सारी शराफत शर्म के मारे कहीं दूर किसी कोने में मुँह छुपा लेती है ।

फिर तो मेरा सारा आलस जैसे जादू के ज़ोर से गायब हो गया था । मैं तुरंत सोफ़े से उठा और बाथरूम में घुस गया । साली लड़की, बड़ी कुत्ती चीज है । चाहे उस दिन के बाद मुझे दो-तीन बार भी ढंग से मिली भी नहीं हो, सिर्फ लिफ्ट में कभी-कभी मामूली मुलाक़ात हुई हो, पर इन आँखों में अब ना जाने कितने ऐसे रंगीन सपने झिलमिलाने लग गए थे जैसे वह मेरी कोई भूली-बिसरी गर्लफ्रेंड हो ।

☐☐☐

अभी दोपहर के तीन भी नहीं बजे थे । तापमान लगभग 40 डिग्री से ज्यादा ही था और इस भरी गर्मी में मैं कुकटपल्ली पुलिस स्टेशन के बाहर खड़ा था । और कोई दिन होता तो मैं अपने फ्लैट में बैठा हुआ मस्त एसी की ठंडी-ठंडी हवा खा रहा होता, कोई नॉवेल पढ़ रहा होता या फिर टीवी में कोई मूवी देख रहा होता । और अगर इन सबसे भी मन नहीं लगता तो मोबाइल में पॉर्न देख रहा होता । पर आज एक लड़की के चक्कर में भरी दोपहर में पुलिस स्टेशन के बाहर खड़ा था । पहले जहाँ मैं मन ही मन दुआ करता था कि ज़िंदगी में कभी पुलिस का मुँह नहीं देखना पड़े, वहीं पर आज मैं खुद पुलिस स्टेशन जाकर पुलिस से मिलने वाला था । वजह बता ही चुका हूँ, लड़की ।

दिखने में वह पुलिस स्टेशन दूसरे आम पुलिस स्टेशन के जैसा ही था । पुलिस स्टेशन के बाहर गेट के ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में कुकटपल्ली पुलिस स्टेशन अँग्रेजी में और तेलुगु में लिखा हुआ था । अब मुंबई में था इसलिए तेलुगू था, वरना मेरे लिए तो तेलुगू, तमिल, कन्नड़ या मलयालम में फर्क करना असंभव था ।

“चपंडी ।” जैसे ही मैं गेट से अंदर जाने लगा, वहाँ खड़े हुए हवलदार ने मुझसे कहा । वह हवलदार लगभग 4045 साल का अधेड़-सा नजर आने था, जिसकी तोंद किसी प्रसूता के आठवें माह की तरह उभार लिए थी ।

“क्या ?” मेरे मुँह से निकला । तीन साल हो गए थे पर तेलुगू का एक शब्द भी नहीं सीख पाया था । ऐसा नहीं था कि मैंने कोशिश नहीं की, शुरू-शुरू में सीखने का ज़ोर लगाया था और कुछ शब्द सीख भी लिए थे, पर फिर बाद में बंद कर दिया । क्योंकि एक तो मैं इस मामले में बहुत आलसी था और दूसरा मुंबई में टूटी-फूटी हिन्दी में हर जगह काम चल जाता था ।

“बोलिए ?” जैसे उसने समझ लिया था कि तेलुगु मेरे लिए काला अक्षर भैंस बराबर थी, इसलिए इस बार उसने मुझसे हिन्दी में ही पूछा ।

“आई वांट टू मीट इंचार्ज ऑफ दिस पुलिस स्टेशन । वेयर केन ही विल बी अवलेबेल ?” मैंने उससे इंग्लिश में पूछा, क्योंकि तेलुगू मुझे आती नहीं थी और मेरे हिसाब से अच्छी हिन्दी उसको नहीं आती थी ।

“क्या ?” उसने हिन्दी में पूछा ।

“मुझे इस पुलिस स्टेशन के इंचार्ज से मिलना है । वह कहाँ मिल सकते हैं ?” मुझे समझ जाना चाहिए था कि एक कॉन्स्टेबल सिर्फ 12वीं पास होता है और उसका अंग्रेजी ज्ञान कामचलाऊ होता है । वैसे भी एक कॉन्स्टेबल का वास्ता उसके लोकल एरिया वालों से ही पड़ता है, जिसके लिए लोकल भाषा की जरूरत पड़ती है ना कि अंग्रेजी या अन्य किसी और भाषा की ।

“क्या काम है ?” उसने इस बार थोड़ा रूड भाषा में पूछा । शायद मेरे द्वारा कही गई बात का इंग्लिश से हिन्दी अनुवाद करने में उसे अपनी बेइज्जती-सी महसूस हुई थी । जबकि मेरा ऐसा कोई इरादा भी नहीं था । ना जाने देश में हर कोई अपनी इज्ज़त को अंग्रेजी से क्यों तोलता है, जबकि अंग्रेजी इस देश की भाषा भी नहीं है ।

“वो दिन में आप लोग नवभारत टाइम्स कॉलोनी से जिस लड़की को गिरफ्तार करके लाये हैं, मैं उसका... फ्रेंड हूँ ।”

“फ्रेंड... ! वो जो जवान-सी लड़की को लेकर आए थे थोड़ी देर पहले, उसके ?” उसने एक बार मुझे घूरकर देखा जैसे साले को यकीन नहीं हो रहा था कि एक 2223 साल की जवान लड़की का मेरे जैसा कोई फ्रेंड हो सकता है । या फिर वह मेरे द्वारा अंग्रेजी में पूछे गए सवाल से जो उसको बेइज्जती महसूस हुई थी, उसका बदला ले रहा था ।

“क्यों सर, इसमें हैरान होने की क्या बात है ? क्या मैं आपको उसका फ्रेंड नहीं लगता ?” अपने गुस्से को मन ही मन दबाते हुए उसको बड़ी रेस्पेक्ट देते हुए मैंने मुस्कुराकर कहा ।

“नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है । आजकल तो कुछ भी हो सकता है । वैसे भी अगर वह तुम्हारी फ्रेंड नहीं होती तो मुझे ज्यादा हैरानी होती । आजकल की लड़कियाँ, मर्द में और कुछ देखे ना देखे, पैसे जरूर देखती है ।” उसने जैसे मेरा फिर से मज़ाक उड़ाते हुए टूटी-फूटी हिन्दी में कहा ।

‘अबे, बस कर साले ! अब बहुत ज्यादा हो गया । अगर पुलिस वाला नहीं होता तो यहीं मुँह तोड़ देता । कोई ना साले, मेरा भी टाइम आएगा ।’ मन ही मन उसे गाली बकते हुए प्रत्यक्षतः जबरन अपने होंठों पर मुस्कुराहट लाते हुए पूछा, “सर ! क्या मैं उससे मिल सकता हूँ ?”

“अंदर जाओ । आगे लेफ्ट से सेकेंड कमरा है, वहाँ हमारे साब बैठे हुए है जो उसके केस को देख रहे हैं । जाओ, उनसे बात कर लो ।”

“थैंक यू सर ! मे गॉड गिव यू आल प्रोस्पेरिटी एंड सक्सेस इन यूअर लाइफ... ! मे यूअर ऑल विशेज कम ट्रू एंड यू विल बी ऑन टॉप ऑफ द वर्ल्ड !” बिना उसकी तरफ नजर दौड़ाए मैंने उसे कहा और अंदर की ओर चल पड़ा ।

‘राज, यू आर ग्रेट ।’ अंदर चलते हुए मैंने मन ही मन अपनी पीठ थपथपाई । आखिर मैं भी अपनी बेइज्जती का बदला लेने में सफल हो गया था ।

“मे आई कम इन सर !” उस कॉन्स्टेबल के बताए हुए कमरे के सामने पहुँचकर मैं रुका और दरवाजे को थोड़ा खोलते हुए मैंने आवाज लगाई ।

“यस, कम इन ।” अंदर से आवाज आई ।

मैं दरवाजा खोलकर अंदर गया । अंदर कुर्सी पर जो पुलिस वाला बैठा था, मैं उसे देखते ही पहचान गया था । ये वहीं था जो उस पुलिस टीम का नेतृत्व कर रहा था । जो डॉली शर्मा को उसके घर से गिरफ्तार करके लेकर आई थी । वह एक 2223 साल का नौजवान-सा चुस्त-दुरुस्त नजर आने वाला शख्स था, जो अभी महकमे में ताजा-ताजा ही भर्ती हुआ लग रहा था और शक्ल से ऐसा लग रहा था जैसे वह बना ही पुलिस की नौकरी के लिए है । मूँछें उसने सूर्या(सिंघम) के नायक जैसे रख रखी थी, जो उसके व्यक्तित्व पर खूब जंच रही थी । शायद वह उसका बहुत बड़ा फैन था । टेबल पर उसके नाम की तख्ती रखी हुई थी, जिस पर शिवा रेड्डी लिखा हुआ था । उसकी पुलिस यूनीफ़ॉर्म के कंधों पर लगे सितारों को देखकर पता चल रहा था कि वह सब-इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत था, जिसे मैं उस समय पहली नजर में इंस्पेक्टर समझ बैठा था, जब वह डॉली शर्मा को गिरफ्तार करके ला रहा था ।

मैं उसके सामने जाकर खड़ा हुआ । उसने नजरे उठाकर मेरी तरफ देखा और बोला, “कूरचोंडी सर । चेपण्डी, नेनु मीकू ये विधामुगा सहायामु चेयागालानु ।”

‘उफ़्फ़ ! लगता है इस लड़की के चक्कर में तेलुगू सिखनी ही पड़ेगी ।’ चेपण्डी के अलावा उसका एक भी शब्द मेरे पल्ले नहीं पड़ा था और मैं पागलों की तरह उसके सामने खड़ा रहा ।

“सॉरी सर ! मैं आपका मतलब नहीं समझा ?” मैंने कहा ।

“ओह्ह, हिन्दी ! मेरा मतलब है बैठिए और बताइये, मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ ।” उसने नम्रता से कहा । किसी पुलिस वाले से मैंने ऐसे व्यवहार की कल्पना भी नहीं की थी । मेरी नजर में किसी पुलिस वाले की इमेज लगभग वैसे ही थी जो एक आम नागरिक के मन में होती है । वह जिसे अक्सर फिल्मों में दिखाया जाता है । बशर्ते वह फिल्म का हीरो ना हो तो । मतलब अक्खड़, बदतमीज, गुस्सैल, बात-बात में गाली बकने वाला । पर उस पुलिस वाले की ना सिर्फ मूँछें सिम्हा मूवी के हीरो की तरह थी, बल्कि उसका व्यवहार भी उसकी तरह ही था । या फिर ऐसा भी हो सकता था, वह पुलिस में अभी नया-नया भर्ती हुआ था । समाज सेवा का शौक रखता था, जो वक़्त के साथ-साथ बदल जाने वाला था ।

“थैंक्स सर ।” मैं कुर्सी पर बैठते हुए उसको थोड़ा मस्का लगाते हुए बोला, “आपकी हिन्दी काफी अच्छी है ।”

“हाँ, मुझे हिन्दी फिल्में देखना बहुत पसंद है और उसी से मेरी हिन्दी इतनी अच्छी हुई है । अपने दोस्तों के साथ अक्सर हिन्दी मूवीज देखना पसंद करता हूँ ।” उसने मुस्कराते हुए कहा, “बाय द वे, आप मेरी हिन्दी की तारीफ तो करने आए नहीं होंगे यहाँ पर, क्यों ?”

‘अरे नहीं सर !” उसकी बात सुनकर मैं झेंपते हुए बोला, “वो तो मैं डॉली शर्मा से मिलने आया था ।”

“कौन डॉली शर्मा ? अच्छा वो, जिसे अभी गिरफ्तार करके लाये हैं ।”

“जी, मैं उसी की बात कर रहा हूँ ।”

“आप कौन है और आप उसके क्या लगते हैं ?” उसने सीरियस होते हुए पूछा ।

“जी सर, मेरा नाम राज है और मैं उसका फ...।” मैंने थोड़ा रुकते हुए जवाब दिया, “पड़ोसी, मैं उसका पड़ोसी हूँ ।”

“ओह्ह, याद आया ! जब हम उसको लेकर आ रहे थे तो आप वहीं अपने फ्लैट के बाहर खड़े थे और उसने आपको सहायता के लिए पुकारा था । तो आप उसकी पुकार सुनकर आए हैं ?”

“जी ! बस एक पड़ोसी होने के नाते उसकी हेल्प के लिए आया हूँ ।”

“आप जानते भी हैं उसे किस जुर्म में गिरफ्तार किया गया है ?”

“जी नहीं ।”

“तभी, जानते होते तो शायद नहीं आते ।”

“क्यों सर ऐसा क्या जुर्म कर दिया उसने?”

“वो एक ड्रग्स पैडलर है । उसके पास ड्रग्स मिली हैं ।”

“सर, ड्रग्स लेना तो कोई इतना बड़ा जुर्म नहीं है । आजकल नौजवान लोग बिगड़ जाते हैं और कभी-कभी सिगरेट और शराब के साथ-साथ ड्रग्स का नशा भी करने लग जाते हैं ।” मैंने जल्दबाजी में कहा ।

“लगता है शायद आपने मेरी बात ध्यान से सुनी नहीं है । शी वाज नोट कंज्यूमिंग ड्रग्स, शी इज अ ड्रग पैडलर । पैडलर मतलब जानते हो ना ?”

“क्या कहा आपने ? ड्रग पैडलर ! सॉरी सर ! मैंने आपकी बात पर ध्यान नहीं दिया । हाँ ! मैं ड्रग पैडलर का मतलब जानता हूँ । वहीं जो ड्रग सप्लाई करता है ।” मैंने जवाब दिया, ‘ड्रग पैडलर का मतलब मुझे अच्छी तरफ से पता था । आखिर इतने नॉवेल जो पढ़ रहे थे मैंने इस पर ।’

“हाँ, तुमने ठीक कहा । वह ड्रग सप्लाई करती है ।”

“पर सर, शक्ल से तो वह ऐसी लगती नहीं है । मासूम-सी दिखने वाली वह लड़की इतना खतरनाक काम कर सकती है, यकीन नहीं होता ।”

“किसी की शक्ल पर नहीं लिखा हुआ होता मिस्टर कि वह कितना मासूम है या कितना बड़ा अपराधी है । हमने उसे सबूतों के साथ गिरफ्तार किया है । उसके फ्लैट में उसके रूम से हमें हेरोइन के 11 ग्राम के 100 पैकेट प्राप्त हुए हैं, जिसकी बाजार में कीमत लगभग 20 लाख रुपये हैं ।”

“ओह्ह माइ गॉड, 100 पैकेट !” मेरा मुँह उसके बारे में ये जानकर खुला का खुला रह गया । पर फिर भी मेरा मन ये मानने को बिलकुल भी तैयार नहीं था कि वह लड़की ऐसा कर सकती है । शायद उसकी खूबसूरती का नशा था जो मेरे सिर पर चढ़कर बोल रहा था या फिर विक्रांत और अमन दिमाग में छाए हुए थे जो हर उस लड़की को सबसे पहले अपने शक के दायरे से बाहर रखते हैं, जो उनसे मदद माँगती है, इसलिए मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई, “पर सर, ये भी तो हो सकता है कि वह लड़की निर्दोष हो और किसी दूसरे ने उसे फँसाने के लिए उसके रूम में वह सब सामान रखा हो ।”

“यार, नाम क्या बताया था तुमने अपना ?”

“राज, राज ।”

“हाँ, तो मिस्टर राज ! ऐसा लगता है तुम फिल्में कुछ ज्यादा ही देखते हो या फिर जासूसी नॉवेल ज्यादा ही पढ़ते हो जो तुम्हें वह मासूम नजर आ रही है । क्यों, सही कहा ना मैंने ?”

“जी वो... ।



“मतलब नॉवेल पढ़ते हो ?” उसने ठहाका लगाया ।

“जी सर, पढ़ता तो हूँ पर... ।” मैं आगे कुछ कहता इससे पहले ही वह मेरी बात काटते हुए बोला, “कौन से रायटर के नॉवेल पढ़ते हो ? जेफ़ी आर्चर ? सिडनी शेल्डन ?”

“नहीं सर ! मैं इंग्लिश नहीं, हिन्दी नॉवेल पढ़ना पसंद करता हूँ ।”

“क्यों, इंग्लिश समझ नहीं आती क्या ?”

“नहीं सर, ऐसी बात नहीं है । आई एम ए टीम लीडर इन इन्फो साइबर सोल्यूशंस लिमिटेड एंड माइ डेलि वर्क इज टू इंटरेक्ट विथ फ़ॉरेन क्लाइंट्स । आई रेड 23 इंग्लिश नॉवेल, पर उनमें वह मजा नहीं आया जो अपनी भाषा में पढ़ने में आता है ।”

“हम्म ओके । पर ध्यान रखिए, ये कोई आपके पढ़े हुए नॉवेल की कहानी नहीं है, जिसकी नायिका मासूम और भोली होती है । जिसे फँसाने के लिए विलेन चाले चलता है । हमने जब उसे गिरफ्तार किया था, उसके फ्लैट का दरवाजा अंदर से बंद था जो उसने खुद खोला था ।”

“पर सर... !”

“पर क्या यार ! लगता है तुम पर नॉवेल का भूत कुछ ज्यादा ही सवार है । एनिवे, अगर तुम डॉली शर्मा से मिलना चाहते हो तो मैं तुम्हें उससे मिलवा देता हूँ ।” कहते हुए उसने अपने सामने लगी हुई बेल बजाई । बेल की आवाज सुनकर बाहर से कॉन्स्टेबल अंदर आया ।

“सर्वानंद ! लॉकअप लो उन्ना डॉली शर्मा डग्गरी इतनिनी तीसुकु वेल्लु ।” सब-इंस्पेक्टर ने उसे क्या कहा ये तो पता नहीं, पर इतना मैं समझ गया था कि उसने उसे मुझे लॉकअप में बंद डॉली शर्मा से मिलवाने के लिए बोला है ।

“थैंक यू सर !” कहते हुए मैं अपनी सीट से उठ गया था ।

“रंडी ।” उस कॉन्स्टेबल ने मुझसे कहा ।

“वॉट !” मेरे मुँह से निकला ।

“वो आपको आने के लिए बोल रहा है । उसके साथ जाइए ।” सब-इंस्पेक्टर शिवा हँसते हुए बोला ।

“ओके सर, समझ गया ।” मैंने मुस्कराते हुए कहा और उस कॉन्स्टेबल के पीछे चलते-चलते सोचने लगा, ‘साला, रंडी का ये मतलब भी हो सकता है तेलुगू में, मुझे नहीं मालूम था । मैं तो कुछ और ही समझ बैठा था ।

वह मुझे एक छोटे से रूम में लेकर गया, जहाँ 2 कुर्सियाँ रखी हुई थी । शायद वह उनका मुलाकाती रूम था, जहाँ पर हवालात में बंद व्यक्ति से उससे मिलने आए हुए लोगों से मुलाक़ात करवाई जाती थी ।

“बैठो । मैं उसे लेकर आता हूँ ।” वह समझ गया था कि मुझे हिन्दी नहीं आती है । मैं रूम में चक्कर काटते हुए डॉली का इंतजार करने लगा । लगभग 23 मिनट बाद वह डॉली शर्मा को वहाँ लेकर हाजिर हुआ ।

“तुम्हारे पास 10 मिनट है ।” कहते हुए कॉन्स्टेबल ने एक नजर हम पर डाली और वहाँ से चला गया ।

“हैलो ।” उसके जाने के बाद मैं डॉली शर्मा से बोला ।

“आप... आप यहाँ ?”

“जी, बैठिए !” मैंने एक कुर्सी की तरफ इशारा किया और खुद दूसरी कुर्सी पर बैठ गया । वह भी कुर्सी पर आकर बैठ गई ।

“सर ! प्लीज, मेरी मदद कीजिये । मैंने कुछ नहीं किया है ।”

‘साली, एक तो मदद करने आओ और ऊपर से सर कह रही है ।’ मन ही मन सोचते हुए मैंने कहा, “पर पुलिस ने तुम्हें रंगे हाथों गिरफ्तार किया है । उन्होंने तुम्हारे रूम से 100 ग्राम हेरोइन बरामद की है ।”

“सर ! मुझे नहीं नहीं मालूम, वह ड्रग्स मेरे रूम में किसने रखी ? वह जरूर किसी ने मुझे फँसाने के लिए मेरे रूम में प्लांट की है ।”

“पर फ्लैट का दरवाजा अंदर से बंद था और वह गेट तुमने खुद खोला था । फिर कोई तुम्हें कैसे फँसा सकता है ?”

“पर सर, इस फ्लैट की चाबी सिर्फ मेरे पास ही नहीं, बल्कि मेरी रूममेट्स के पास भी है ।”

“तो तुम कहना चाहती हो कि तुम्हें तुम्हारी रूममेट्स ने फँसाया है ?”

“नहीं सर, मेरे कहने का मतलब ये नहीं है । मैं सिर्फ यह कहना चाहती हूँ कि दरवाजा अंदर से बंद था और मैंने ही इसे खोला था, इसका मतलब ये नहीं कि मैं गुनहगार हूँ । मैं बेकसूर हूँ सर ! प्लीज, मेरी हेल्प कीजिये । मैं जीवन भर आपका ये एहसान नहीं भूलूँगी ।”

“हम्म ! अच्छा, तुम्हारे फ्लैट की चाभी तुम्हारी फ़्रेंड्स के अलावा किसी और के पास भी है क्या ?” मैंने कुछ सोचते हुए पूछा ।

“हाँ, एक चाबी तो राजीव के पास है ।”

“कौन राजीव ?”

“वो मेरा फ्रेंड है ।”

“फ्रेंड !”

“मेरा एक्स-बॉयफ्रेंड है । कुछ समय पहले ब्रेकअप हो गया था ।”

“ब्रेकअप के बाद चाबी वापस नहीं ली ?”

“सर, उससे क्या फर्क पड़ता है ? हमारी जेनेरेशन में ब्रेकअप तो चलता रहता है । अब ब्रेकअप हो गया तो क्या, फ्रेंड तो फिर भी रह ही सकते हैं ना ?”

‘साली, हमारी जेनेरेशन बोलकर मुझे क्या ओल्ड जेनेरेशन का बोलना चाह रही है ? पहले दिन तो कितना चिपककर गई थी ? वह तो वाइफ़ के साथ देख लिया तो अपनी चाल ही बदल ली ।’

“सर, क्या हुआ ? आप क्या सोचने लग गए ? आप मेरी मदद करेंगे ना ?”

“मैं इसलिए तो यहाँ पर आया हूँ । मुझसे जो भी बन पड़ेगा, वह मैं जरूर करूँगा । अच्छा, राजीव तुम्हारा बॉयफ्रेंड है, उसके पास तुम्हारे फ्लैट की चाबी है । तुम्हारी फ़्रेंड्स के भी तो बॉयफ़्रेंड्स होंगे ? उनके पास भी तो तुम्हारे फ्लैट की चाबी होगी ?

“नहीं सर ।”

“बॉयफ्रेंड नहीं है या फिर उनके पास फ्लैट की चाबी नहीं है ?”

“दोनों ।”

“दोनों मतलब ?”

“सर, मेरा मतलब है, मेरी एक रूम-मेट संध्या का तो कोई बॉयफ्रेंड नहीं है और...।” वह कहते हुए बीच में रुकी ।

“और क्या ?”

“और अंजलि का जो बॉयफ्रेंड है, वह राजीव ही है । मेरे से ब्रेकअप के बाद राजीव ने अंजलि के साथ लिंकअप कर लिया था ?”

“वॉट ! तुम्हारा एक्स-बॉयफ्रेंड तुम्हारी फ्रेंड को डेट कर रहा है और तुम्हें कोई प्रॉब्लम नहीं हुई ?”

“सर ! इसमें प्रॉब्लम की क्या बात है ? आजकल तो ये सब चीज कॉमन है । कोई किसी एक लड़की या लड़के के साथ सारी ज़िंदगी थोड़ी ही गुजार सकता है ?”

‘हाँ साली ! बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड ना हुए ,कपड़े हो गए जो जब देखो एक्सचेंज करते रहते हो । आज एक ने पहना, कल किसी और ने, परसो किसी और ने ।’

“अच्छा, राजीव के अलावा और किसी के पास फ्लैट की चाबी… ?” मैंने अपना वाक्य अधूरा छोड़ा ।

“सर, एक चाबी मिस्टर रामनाथन स्वामी के पास है ।”

“रामानाथन स्वामी ! ये... तो अपने ब्लॉक के प्रतिनिधि का नाम भी है ।”

“जी सर, वही है ।”

‘ओह्ह ।” मैं एक गहरी साँस लेकर रह गया । हमारी कॉलोनी के हर बिल्डिंग यानी ब्लॉक का एक प्रतिनिधि होता था, जो कॉलोनी की सोसाइटी में उस ब्लॉक का प्रतिनिधित्व करता था । रामनाथन स्वामी हमारे ब्लॉक का प्रतिनिधि था । उसके बारे में मुझे इतना ही पता था कि वह एक 60 साल का बुड्ढा था और इसी साल मुंबई यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर के पद से रिटायर्ड हुआ था ।

‘साले, बुड्ढे को भी चाबी दे रखी है ।’ सोचते हुए मैंने पूछा, “उसके पास आपके फ्लैट की चाबी कहाँ से आई ?”

“छ:-सात महीने पहले एक बार रात को 11 बजे मैं पार्टी से घर आई तो मेरी फ्लैट की चाबी कहीं गुमा दी थी ।”

“चाबी गुमा दी !”

“वो उस समय मैं थोड़े नशे में थी । रात को फ्रेंडस भी फ्लैट में नहीं थी । संध्या की नाइट शिफ्ट थी और अंजलि अपने किसी रिलेटिव के घर गई हुई थी । मैं गेट के बाहर परेशान खड़ी थी । तब रामनाथन सर ने ऊपर की मंजिल से अपने फ्लैट से मुझे देखा । मेरी परेशानी समझकर ना जाने वह कहाँ से रात को 11 बजे किसी ताला-चाबी बनाने वाले को लेकर आए और डोर लॉक की नई चाबियाँ बनवाई थी । उस समय ऐसी ही किसी इमर्जेंसी के लिए मैंने एक चाबी उनको भी दे दी थी । अगर उस रात वह नहीं आए होते तो या मुझे किसी होटल में जाना पड़ता या फिर पार्क में रात गुजारनी पड़ती ।”

“और किसी के पास चाबी है ?”

“हाँ, अपनी सोसाइटी के जिम इंस्ट्रक्टर मिस्टर उदय भट्ट के पास भी एक चाबी है । शुरू में मैं जिम जाती थी, पर बाद में हम सहेलियों ने मिलकर अपने स्टोर रूम में ही जिम का कुछ सामान रख दिया था । उस दौरान मिस्टर भट्ट ने हमें बेसिक सामान खरीदने में मदद की थी ।”

‘चाबी नहीं हुई, मंदिर का प्रसाद हो गया, जो हर किसी को बाँटते ही जा रही है । पर साला, ये प्रसाद अभी तक मुझे क्यों हासिल नहीं हुआ ?’ अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी मेरे मोबाइल की रिंग बजने लगी । फोन उठाकर देखा तो वाइफ़ का फोन था ।
 
‘इसको भी मेरी जरा भी खुशी बर्दाश्त नहीं है । किसी लड़की से बात कर रहा हूँ तो 1500 किलोमीटर दूर होते हुए भी सूंघ ही लेती है ।’ सोचते हुए मैंने फोन को साइलेंट कर दिया ।

“जी और किसी के पास भी है आपके फ्लैट की चाबी ?” मैंने स्माइल करते हुए पूछा ।

“नहीं, बस ।”

“याद करने की कोशिश कीजिये । शायद और किसी को भी चाबी दे रखी हो ?”

“नहीं-नहीं, और तो कोई नहीं है ।”

“आपको इनमें से किसी पर शक है क्या ? इनमें से कोई आपको फँसाने की कोशिश कर सकता है क्या ?”

“सर, वह मुझे नहीं पता । मेरी तो किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं है । मैं नहीं जानती, कौन मुझे फँसाना चाहता है ? प्लीज, मेरी हेल्प करिए । मैं आपका ये एहसान ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगी ।”

“हम्म ! पर मैं किस तरह से तुम्हारी मदद कर सकता हूँ ?”

“आप प्लीज, मेरी बेल करवा दीजिये ।”

“पर मैं तुम्हारी बेल कैसे करवा सकता हूँ ? तुमने अपनी फैमिली को इन्फॉर्म किया ?”

“नहीं सर । मेरे परिवार में कोई नहीं है । एक दूर के रिश्तेदार ने मुझे पाला-पोसा था, पर वह भी कुछ साल पहले गुजर गए थे ।”

“ओह्ह... ! तुम्हारे फ्रेंडस तुम्हारी बेल नहीं दे सकते क्या ? अरे हाँ ! मैं एक बात पूछना तो भूल ही गया था ।”

‘क्या ?”

“सर ! मीकू केटाइंचीना समायम आइपोइंडि ।” तभी बाहर से कॉन्स्टेबल ने अंदर आते हुए कहा ।

‘इसे भी अभी टपकना था ।’ मन ही मन बड़बड़ाते हुए मैंने पूछा, “क्या हुआ ?”

“सर, आपका मिलने का टाइम खत्म हो गया है ।”

“बस 2 मिनट ।”

“सर, आप पहले ही ज्यादा टाइम ले चुका है । और ज्यादा हो गया तो इंस्पेक्टर साब मुझे ही डाँटेगा ।”

“डोंट वरी ! तुम्हारे इंस्पेक्टर से मैं बात कर लूँगा ।”

“तो साब ! आप पहले इंस्पेक्टर साब से बात कर लीजिये, फिर यहाँ आ जाइए । पर अभी तो आपको यहाँ से निकलना ही होगा ।”

“ओके यार ! तुम तो नाराज हो रहे हो । 1 मिनट तो दे दो बस ।” मेरी बात सुनकर उसने सिर हिलाया, पर वह वहीं खड़ा रहा ।

“अच्छा डॉली, मेरी एक बात सुनो ।”

“बोलिए सर ।”

“देखो, अगर तुम बेकसूर हो तो तुम बिलकुल भी डरो मत । पुलिस के साथ पूरा-पूरा सहयोग करो । बाकी मैं तुम्हारी मदद करने की पूरी-पूरी कोशिश करूँगा । वैसे तुम किसी वकील को जानती हो जो तुम्हारा केस देख सके ?”

“नहीं सर, मैं किसी को नहीं जानती, इसलिए आपसे बोल रही हूँ । वैसे भी मेरा इन सबसे क्या काम ?”

“ठीक है डॉली, कोई बात नहीं । मैं ही देखता हूँ तुम्हारे लिए कोई वकील ।”

“थैंक यू सर । वैसे मैं आपसे एक बात कहूँ ?”

“हाँ, बोलो ।”

“आपकी याददाश्त बहुत अच्छी है, जो आपको मेरा नाम अभी तक याद है । शायद एक साल पहले पहली बार जब आपके फ्लैट में आई थी, तभी मैंने आपको अपना नाम बताया था । उसके बाद सिर्फ लिफ्ट वगैरह में कभी-कभी आपको देखा था, जिसमें भी ज़्यादातर आप आपकी वाइफ़ के साथ थे । अब देखिये, मैं तो आपका नाम तक भूल गई, इसलिए अपनी भूल छुपाने के लिए आपको सर कहना पड़ रहा है ।” उसने मुस्कराते हुए कहा ।

‘साली, हवालात में खड़ी है फिर भी मुस्करा रही है ।’

“कोई बात नहीं डॉली जी, मेरा नाम राज है ।”

“ओह्ह, याद आया मिस्टर राज । थैंक्स वंस अगेन ।”

“ओके, बाय डॉली ।” मेरी नजरें उसके चेहरे से होते हुए उसके उभारो तक गई और मेरे मन में ये ख्याल आने लगा, ‘अब जब ये हवालात से बाहर होगी तो इसके फ्लैट की एक चाबी मेरे पास भी होगी ।’ फिर मैं एक आह भरता हुआ पलटा और उस कॉन्स्टेबल से बोला, “चल मेरे भाई । अब कब तक यूं मेरे सिर पर खड़ा रहेगा ?” और फिर मैं उस मुलाकाती कक्ष से बाहर आ गया । वह कॉन्स्टेबल वहीं पीछे खड़ा रहा । शायद वह डॉली को वापस से काल-कोठरी में ले जाने वाला था ।

अभी मैं गैलरी में गुजर रहा था कि मेरा मोबाइल फोन फिर से बज उठा । जाहिर-सी बात है, फोन बीवी का ही था । मैंने फोन को फिर से साइलेंट कर दिया । जाने से पहले मैंने एक बार डॉली की बेल के बारे में बात करने के लिए सब-इंस्पेक्टर शिवा से मिलने की सोची, इसलिए मैं सीधा उसके केबिन में गया ।

“मे आई कम इन सर !”

“ओह्ह, मिस्टर शरलॉक होम्स ! यस, प्लीज कम इन !” मुझे देखते ही उसके होंठों पर एक व्यंग्य भरी मुस्कान आ गई । मैं अंदर गया ।

“हेव अ सीट ।” उसने कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा ।

“हाँ तो जासूस साब ! क्या रहा आपकी पूछताछ का नतीजा ?” मैं अभी कुर्सी पर ढंग से बैठ भी नहीं पाया था कि उसने मुझसे सवाल किया ।

“सर, मेरे हिसाब से वह बेकसूर हो सकती है । ऐसा लगता है उसे किसी ने फँसाया है ।”

“ये तुम कैसे कह सकते हो ? एक मिनट, कहीं ये उसकी खूबसूरती का असर तो नहीं बोल रहा ? वैसे वह है भी खूबसूरत, क्यों ?”

मैं समझ गया था, वह भी मेरा मज़ाक उड़ाने की कोशिश कर रहा था, इसलिए अपने चेहरे को संजीदा बनाते हुए मैंने कहा, “नहीं सर, ऐसी तो कोई बात नहीं है ।” मैंने कहा और फिर जो कुछ डॉली से बातचीत हुई थी और उस पर जो कुछ मेरा नजरिया था, वह सबकुछ विस्तार से बताया । कैसे उसके फ्लैट की चाबी उसकी फ़्रेंड्स के अलावा उसके एक्स-बॉयफ्रेंड, ब्लॉक प्रतिनिधि और जिम के इंस्ट्रक्टर के पास थी और फ्लैट अंदर से लॉक होने के बावजूद वह लोग बिना उसे पता चले बाहर से ताला खोलकर अंदर जा सकते थे और ड्रग्स रखकर बाहर भी आ सकते थे ।

मेरी बात सुनकर उसका भी चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया था । वह थोड़ी देर कुछ सोचने लग गया था ।

‘थैंक यू अमन…! नहीं, अमन नहीं ! थैंक यू विक्रांत गोखले, द लकी बास्टर्ड ! तुम्हारे नॉवेल में तो पुलिस वाले कई बार सोचते हैं, पर आज मेरे सामने हकीकत में एक पुलिस वाला तुम्हारी वजह से सोच रहा है ।’

“हम्म, पर मिस्टर शरलॉक होम्स ! हमने उस लड़की को फ्लैट में कहीं से भी नहीं उसके रूम से गिरफ्तार किया था । और ड्रग्स भी हमने उसके उस बैग से बरामद की थी जो उसकी अलमारी में रखा हुआ था । अब चलो कोई चुपके से उसके फ्लैट में गया और उसे इस बारे में खबर नहीं हुई, ये तो ठीक है । पर जासूस महोदय, कोई आदमी फ्लैट के अंदर घुसकर उसके रूम के अंदर तक गया, उसकी अलमारी को खोलकर उसका बैग निकाला, उसमें ड्रग्स रखी, बैग को वापस अलमारी में रखा और उसके कमरे और फ्लैट से बाहर चला गया और उसे पता भी नहीं चला । ऐसा कैसे हुआ ?”

उसकी बात सुनकर मैं एक पल के लिए हड़बड़ा गया, पर वह विक्रांत ही क्या जो बात ना संभाल सके, “सर, हो सकता है, उस समय वह गहरी नींद में हो ।”

“दोपहर में ?”

“सर, हो सकता है ऑफिस से नाइट शिफ्ट करके आई हो । जैसे मैं भी तो आजकल नाइट शिफ्ट में ही ऑफिस जा रहा हूँ और अभी दोपहर में ही उठा हूँ ।”

“क्या तुम दिन में भी इतनी गहरी नींद में सोते हो कि कोई तुम्हारे रूम में आए, तुम्हारी अलमारी से छेड़छाड़ करे और तुम्हें पता भी नहीं चले ।”

सब-इंस्पेक्टर का सवाल सुनकर मैं फिर से हड़बड़ा गया । 3 साल हो गए थे मुझे शिफ्ट में काम करते हुए, पर जब भी नाइट शिफ्ट से वापस घर आया, आज तक एक बार भी दिन में ढंग से नहीं सो पाया था । अगर कमरे में थोड़ी-सी भी हलचल होती है तो नींद अपने आप डिस्टर्ब हो जाती है ।

‘पर सब एक जैसे थोड़े ही ना होते हैं । कुछ लोग सारा दिन कुंभकर्ण की तरह सोते रहते हैं और मजाल डीजे की तेज आवाज में भी उनकी नींद डिस्टर्ब हो जाए ।’ मैंने सोचते हुए कहा, “फिर सर, हो सकता है वह नींद की गोली लेकर सोई हो या फिर नशा करके सोई हो । उस परिस्थिति में कोई बड़ी बात नहीं, कोई उसके रूम में आया हो और उसे पता नहीं चला हो ।”

“हम्म ! ऐसा हो सकता है । जब हमने उसको उसके फ्लैट से गिरफ्तार किया था तो वह अलसाई-सी तो नजर आ रही थी । दरवाजा भी उसने ना जाने कैसे खोला था ? ऐसा लग रहा था जैसे वह अभी गिर जाएगी ।”

“वही सर, आप इन बातों पर गौर करके अपनी जाँच पड़ताल कराइएगा, वह जरूर बेकसूर साबित होगी ।” मैं उत्साहित स्वर में बोल उठा ।

“वो तो हम करेंगे ही जासूस साब । आप तो ये बताओ, इंग्लिश में तो मुझे पता है कि अच्छे जासूसी उपन्यास कौन लिखता है । पर हिन्दी में भी ऐसा कौन-सा रायटर हो गया जिसे पढ़कर आपका दिमाग इतना तेज चल रहा है ?”

“सर, आप मजे ले रह है अब ?”

“अरे नहीं, सच्ची यार !”

“अगर आप सच कह रहे हैं सर, तो हिन्दी लेखन को आप ऐसा वैसा मत समझिए । हिन्दी में भी बहुत से अच्छे रायटर है । अभी वर्तमान दौर में संतोष पाठक को ही ले लीजिये, जो हिन्दी जासूसी साहित्य के सिरमौर है ।”

“अच्छा । पर मैंने तो सुना है कि हिन्दी नॉवेल वाले अपनी कहानियाँ विदेशी नॉवेलों से चुराकर लिखते हैं ।”

“अरे सर, ऐसा नहीं है । हाँ, पहले कभी ऐसा होता था, पर आज के इंटरनेट के जमाने में ऐसा करना मुश्किल है । क्योंकि पाठक तुरंत पकड़ लेते हैं कि इस लेखक ने उपन्यास कहाँ से चुराकर लिखा है । और जब ऑरिजिनल उपलब्ध होता है तो कॉपी कौन पढ़ता है । इसलिए आजकल के लेखक मूल कहानियाँ लिख रहे हैं ।”

“भाई, मुझे भी सजेस्ट करो कुछ, ताकि मैं भी पढ़ सकूँ ।”

“आप हिन्दी उपन्यास पढ़ेंगे ?”

“क्यों भाई, जब हिन्दी मूवीज देख सकता हूँ तो हिन्दी नॉवेल पढ़ने में कोई प्रॉब्लम है ? हाँ, थोड़ी-सी प्रॉब्लम होगी पर मैं मैनेज कर लूँगा ।”

“फिर तो सर, अभी तो आपको संतोष पाठक के बारे में बताया है । इसके अलावा कंवल शर्मा जी है, शुभानन्द जी है, इकराम फरीदी जी है ।”

“ठीक है, तुम ही कोई नॉवेल लाकर दे देना मुझे ।”

“ओके सर, ठीक है ।” मैं आगे और कुछ कहने ही जा रहा था तभी मेरे मोबाइल की रिंग फिर से बजने लगी । फोन वाइफ़ का था और अगर इस बार फोन नहीं उठाया तो मेरी शामत निश्चित थी ।

‘अब इससे कोई अच्छा-सा बहाना बोलना पड़ेगा ।’ मैंने मन ही मन सोचा और अपनी सीट से उठने लगा, ‘आखिर एक पुलिस वाले के सामने झूठ कैसे बोल सकता था ?’ अभी मैं कुर्सी से उठ भी नहीं पाया था कि तभी वह सब-इंस्पेक्टर बोल उठा-

“किसका फोन है जासूस साब ? हमारे सामने ही उठा लीजिये ।”

उसकी बात सुनकर मैं एक पल के लिए सकपका गया । फिर वापस से सीट पर बैठ गया और मोबाइल को स्वीप किया ।

“हैलो जान !”

“...”

“वो मैं सो रहा था जान ! तुम्हें तो पता ही है, नाइट शिफ्ट थी ।” मैं सब-इंस्पेक्टर की तरफ देखकर मुस्कराते हुए अपनी वाइफ़ से बोला । सब-इंस्पेक्टर भी मुस्कुरा दिया ।

“...”

“नहीं जान, वह आज सेटरडे था तो मॉर्निंग में ऑफिस से ब्रेकफ़ास्ट करके आया था तो लेट हो गया । अच्छा ठीक है, मैं अभी फ्रेश होकर बात करता हूँ ।” कहते हुए मैंने फोन काट दिया ।

“बीवी थी क्या ?” सब-इंस्पेक्टर ने मुझसे पूछा । मैंने सहमति से सिर हिलाया ।

“जासूस महोदय, ऐसे काम ही क्यों करते हो जो बीवी से झूठ बोलना पड़े ?” उसने मुस्कराते हुए कहा । उसकी बात सुनकर मैं सिर्फ मुस्कुरा दिया और बात बदलते हुए पूछा ।

“सर, उसको जमानत मिल सकती है क्या ?”

“क्यों भाई, तुम जमानत दे रहे हो क्या ? बीवी को क्या बोलोगे ?” उसने मुस्कराते हुए पूछा ।

“अरे, नहीं सर ! मैं तो ऐसे ही पूछ रहा हूँ । उसके दोस्त दे सकते हैं जमानत ।” मैंने हड़बड़ाते हुए कहा ।

“क्यों ? तुम उसके दोस्त नहीं हो क्या ?” वह फिर से मुस्कुराया और आगे बोला, “डोंट टेक टेंशन यार ! मैं तो ऐसे ही बोल रहा था । वैसे ये ड्रग्स का केस है, ऐसे तो जमानत मिलना मुश्किल है । जमानत तो अब कोर्ट से ही मिल सकती है । वह अब सोमवार को ही मिल पाएगी ।”

“ठीक है सर । मैं इसके फ़्रेंड्स को इन्फॉर्म कर दूँगा ।”

“हम्म, लगता है इसके फ़्रेंड्स से पूछताछ का इरादा रखते हो जासूस महोदय ।”

“हाँ सर, सोचा तो है कुछ ऐसा । फिलहाल घर में अकेला रहकर वैसे भी बोर ही होना है । इस बहाने से कम से कम कुछ टाइम तो पास हो जाएगा ।”

“ख्याल तो अच्छा है जासूस साब ! पर क्या मैं तुम्हें एक सलाह देने की गुस्ताखी कर सकता हूँ ?” इस बार वह थोड़ा सीरियस होते हुए बोला ।

“अरे सर ! आप जो भी सलाह देंगे वह मेरे ही काम आएगी । दीजिये ।”

“देखो जासूस महोदय । ये पूछताछ का काम हमें ही करने दो तो बेहतर रहेगा । ना… ना, बीच में बोलने से पहले मेरी पूरी बात सुन लो । तुमने कुछ अच्छे जासूसी नॉवेल पढ़ लिए, 24 जासूसी मूवीज देख ली और उसके बेस पर जासूसी करने निकले हो, अच्छी बात है, पर...।” उसने अपनी बात को विराम दिया और अपनी सीट पर थोड़ा आगे को झुका और गंभीर होकर बोला, “पर माइ डियर जासूस महोदय ! ये कोई मामूली छीना-झपटी, आपस में छोटी-मोटी कहासुनी या लड़ाई का केस नहीं है, जो तुम उस लड़की के लिए जासूसी करने निकले हो ? बेशक मुझे पुलिस का काम करते हुए 2 साल ही हुए हैं, पर इन 2 सालों में मुझे इतना तजुर्बा हो गया है कि किसी बेकसूर और गुनाहगार में अंतर कर पाऊँ । बेशक तुम उसकी खूबसूरती पर, मासूमियत पर फिदा होकर उसे बेकसूर मान रहे हो, पर मुझे वह गुनहगार ही लगती है साथ ही किसी ड्रग्स माफिया का कोई अंग । बेशक हमने उसे अलसाई हालत में गिरफ्तार किया हो, पर पुलिस को देखते ही उसके चेहरे पर घबराहट आ गई थी ।”

‘साला, अभी थोड़ी देर पहले तो मेरे सामने बोल रहा था कि वह बेकसूर हो सकती है और अब फिर से बात पलट रहा है ।’ मन ही मन सोचते हुए मैंने कहा, “सर, घबराहट तो पुलिस को अपने दर पर देखते ही किसी भी शरीफ आदमी को हो जाती है । इस परिस्थिति में तो मैं खुद भी घबरा जाऊँ ।”

“मिस्टर जासूस, ये वह वाली घबराहट बिलकुल भी नहीं थी जो पुलिस को देखकर किसी शरीफ इंसान को होती है । ये वह घबराहट थी जो सिर्फ और सिर्फ मुजरिमों को ही होती है । इसलिए मेरी सलाह मानो तो उस लड़की से दूर रहो, वह किसी भी हाल में बेकसूर नहीं है ।” कहते हुए उसने मेरे चेहरे की तरफ गौर से देखा, फिर मेरे चेहरे पर विराजमान भावों को पढ़ते हुए बोला, “चलो, एक पल के लिए मान लेता हूँ कि हो सकता है वह लड़की बेकसूर हो और उसे किसी ने फँसाया हो, पर ये ड्रग्स सप्लाई का केस है माइ डियर जासूस महोदय । अगर उसे किसी ने फँसाया है तो उसे इतनी ड्रग्स तभी हासिल हो सकती है जब वह खुद किसी ड्रग्स माफिया से जुड़ा हुआ हो । और इतने समझदार तो तुम मुझे लगते हो जो इतना तो समझ सकते हो कि ड्रग्स माफिया तुम्हारे लिए कितना खतरनाक हो सकता है ? अपनी नॉवेल्स की दुनिया से बाहर आइये जासूस महोदय ! वहाँ पर सबकुछ रायटर की मर्जी से होता है जहाँ पर विलेन द्वारा चलाई गई गोलियों की बौछार से भी हीरो को कुछ नहीं होता । पर अपने आपको देखो, तुम बंदूक तो क्या, किसी चाकू का भी सामना कर पाओगे ? कहीं ऐसा ना हो कि इस केस की छानबीन के साथ-साथ हमें तुम्हारे कत्ल के केस की भी छानबीन करनी पड़ जाए । वह लड़की बेकसूर हो या फिर मुजरिम, ऐसे पूछताछ करना दोनों ही तरफ से तुम्हारे लिए मुसीबत का काम है ।”

‘साला, कह तो सही रहा है ये पुलिसवाला । अगर वाकई ये मामला किसी ड्रग्स माफिया से जुड़ा हुआ निकला तो फिर बैंड बज जानी तय है । क्यों भरी जवानी में अपनी बीवी को विधवा और अपने बच्चों को बिन बाप का बनाना चाहता है राज ।’ मेरे अन्तर्मन ने मुझसे ये कहा तो एक पल के लिए मैं अंदर ही अंदर घबरा गया पर अगले ही पल डॉली का खूबसूरत बदन मेरी आँखों के सामने आ गया । उसे देखते ही मेरे दिमाग में दूसरी आवाज गूंज उठी, ‘नहीं यार, भला ड्रग्स माफिया को क्या जरूरत पड़ गई जो उस बेचारी को फँसाने के लिए अपनी 20 लाख की ड्रग्स को ऐसे दांव पर लगाएगा और अपने आपको और अपने धंधे को पुलिस के सामने एक्सपोज करने का खतरा उठाना चाहेगा ? नहीं, ये उनका काम नहीं है । ये तो जरूर उसके किसी दोस्त, दोस्त नहीं, बल्कि किसी दुश्मन का काम है ।

‘पर उसके किसी दोस्त या दुश्मन के पास उसको फँसाने के लिए इतनी ड्रग्स कहाँ से आई ? ड्रग्स कोई किसी दुकान पर थोड़े ही मिलती है जो जब चाहे, जितनी चाहे खरीद ली जाए ।’ तभी मेरे अन्तर्मन की पहले वाली आवाज ने मुझे फिर चेताया ।

‘अरे ! वह खुद ड्रग्स यूज करता होगा तो कर लिया होगा इंतजाम किसी तरह से । तू ये सोच, अगर तू उसकी मदद कर पाया और तेरी थोड़ी-सी मदद से वह बेकसूर साबित हो गई तो फिर उसके फ्लैट की एक चाबी तेरे पास भी होगी ।’ मेरे दूसरे मन ने मुझे फिर ललचाया । मेरे दिमाग में अभी ये सब घूम रहा था तभी सब-इंस्पेक्टर की आवाज ने मुझे चौंकाया ।

“क्या हुआ जासूस महोदय ? इतना क्या सोचने लग गए ? ऐसा नहीं है कि हम उसे गुनहगार मानकर ही अपनी छानबीन करेंगे । तुम्हारे नॉवेल के पुलिस वाले नहीं है जो किसी को एक बार गुनहगार मान ले तो फिर उसे ही मुजरिम साबित करने में लग जाते हैं । और नॉवेल का हीरो अपनी छानबीन से पुलिस वालों को गलत साबित करके पुलिस द्वारा गिरफ़्तार शख्स को बेकसूर साबित करके असली मुजरिम को पकड़ता है । पर माइ डियर, असली ज़िंदगी में ऐसा नहीं होता है । प्राइवेट डिटेक्टिव नाम का जो जीव होता है ना, वह सिर्फ शादी के लिए लड़का-लड़की की छानबीन वगैरह ही कर सकता है । और हम असली पुलिस वाले हर पहलू को ध्यान में रखकर ही अपनी जाँच-पड़ताल आगे बढ़ाते हैं । इसलिए चिंता मत करो, हम लड़की का बयान भी लेंगे और उसके बताए हुए लोगों से पूछताछ भी करेंगे । अगर वह वाकई बेकसूर है तो उसे जमानत पर ही नहीं बल्कि बाइज्जत रिहा किया जाएगा ।” उसने मुस्कुराते हुए अपनी बात खत्म की ।

“थैंक यू वेरी मच सर । मैं भी यही चाहता हूँ कि अगर वह लड़की बेकसूर है तो जल्द से जल्द रिहा हो जाए । वैसे भी कानून के लिए कहा जाता है, चाहे 100 गुनहगार छूट जाए पर किसी बेकसूर को सजा नहीं मिलनी चाहिए ।” मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा और अपनी सीट से उठते हुए बोला, “थैंक यू वेरी मच सर, जो आपने मेरी बात सुनी और उस लड़की से मिलने दिया । पुलिस डिपार्टमेंट में आप जैसे ऑफिसर विरले ही मिलते हैं । अच्छा सर, मैं चलता हूँ । मुझे उम्मीद है, इस लड़की की रिहाई की खबर मुझे जल्दी ही मिलेगी ।”

“क्यों भाई, अब तुमने अपनी जासूसी करने का इरादा छोड़ दिया क्या जो मुझसे उसकी रिहाई की खबर चाहते हो । वैसे अगर ऐसा है तो ये तुम्हारे लिए ही अच्छा रहेगा ।” मैं उसकी बात का कुछ जवाब देता इतने में मेरा मोबाइल फोन फिर से बजने लगा था ।

“नमस्ते !” मैंने अपने दोनों हाथ जोड़कर उस सब-इंस्पेक्टर से इतना ही कहा और मुड़ते समय अपना फोन उठाया जो कि वाइफ़ का ही था और बोला, “हाँ स्वीटहार्ट बस अभी तुम्हें फोन करने ही वाला था कि तुम्हारा फोन आ गया ।” मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा था, पर मुझे पूरा-पूरा यकीन था, उस सब-इंस्पेक्टर ने मेरी बात सुन ली थी और मुस्कुरा रहा था ।

☐☐☐
 
मैं अपने फ्लैट में बैठा हुआ था ‘ पर मन नहीं लगा । बार-बार ध्यान डॉली शर्मा की तरफ ही जा रहा था । एक दिल कह रहा था कि वह मासूम है और मुझे उसकी मदद करनी चाहिए, उसके दोस्तों से मिलकर पूछताछ करनी चाहिए । क्या पता उनसे बात करके मुझे कोई ऐसा सुराग मिल जाए जिससे कि वह बेकसूर साबित हो जाए । दूसरी तरफ सब-इंस्पेक्टर शिवा रेड्डी की चेतावनी मेरे कानों में गूंज रही थी, ‘माइ डियर जासूस महोदय । अगर उसे किसी ने फँसाया है तो उसे इतनी ड्रग्स तभी हासिल हो सकती है जब वह खुद किसी ड्रग्स माफिया से जुड़ा हुआ हो और इतने समझदार तो तुम मुझे लगते हो जो इतना तो समझ सकते हो कि ड्रग्स माफिया तुम्हारे लिए कितना खतरनाक हो सकता है ?’

‘साला ! क्या करूँ, कुछ समझ नहीं आ रहा है । उसकी हेल्प करूँ या नहीं ?’ दिमाग में यही सवाल घूम रहा था, ‘साली शक्ल से तो इतनी सीधी लगती है ! क्या वह वाकई में किसी ड्रग्स गैंग से जुड़ी हुई हो सकती है ? नहीं यार, अकेली लड़की है, इतना अच्छी नौकरी है, सेक्सी भी है; जरूरत की हर चीज उसके पास है । आखिर उसे किस चीज की कमी महसूस हो सकती है जो उसे किसी ड्रग्स गैंग से जुड़ने की जरूरत पड़ी हो ? उसे जरूर किसी ने फँसाया ही है । पर कौन हो सकता है वह ? क्या मुझे उन सब लोगों से पूछताछ करनी चाहिए जिनके पास उसके फ्लैट की चाबी है ? पर अगर उस सब-इंस्पेक्टर की बात पर गौर किया जाये कि अगर उसे फँसाया गया है और जिसने भी उसे फँसाया है वह ड्रग्स माफिया से जुड़ा हुआ हो सकता है । और अगर मैंने उनसे पूछताछ की तो फिर मेरी तो वाट लग जाना पक्का है । जाने दो यार, कौन उसके लफड़े में पड़े । कौन-सा मुझे उसके फ्लैट की चाबी मिल जानी है । पर साली एक बार चाबी मिल जाए तो...।’ सोचते-सोचते मैं उन यादों में खो गया जब उसको दूसरी बार नजदीक से देखा था ।

☐☐☐

इस फ्लैट में आए हुए मुझे 4 महीने से ज्यादा हो गए थे । इस दौरान वह मुझे 45 बार दिखी थी । लगभग हर बार मेरे साथ मेरी वाइफ़ और मेरे दोनों बच्चे हुआ करते थे, जब हम किसी मॉल से घूमकर वापस आते थे । अब सामने से चाहे कितनी ही हसीन लड़की जा रही हो तो आपकी मजाल नहीं हो सकती कि वाइफ़ के सामने उसे घूरकर देख सको । हाँ, आदम जात कुत्ते की जात होती है जो दर्शन लोभ छोड़ नहीं पाता । मैं भी कनखियों से उसका हसीन बदन निहार ही लेता था । एक बार जब मैं ऑफिस से मॉर्निंग शिफ्ट करके दोपहर के लगभग 3 बजे घर आ रहा था और उस समय बिलकुल अकेला था तब भी उसे देखा था । पर हाय रे मेरी फूटी किस्मत, इस बार वह अकेली नहीं थी । इस समय वह किसी लड़के के साथ थी जो कि शायद उसका बॉयफ्रेंड था । उस समय उसने टाइट टी-शर्ट और मिनी स्कर्ट पहन रखी थी, जिससे उसके बदन का एक-एक अंग साफ नुमाया हो रहा था । उस साले, कुत्ते, कमीने, बेशर्म, कमबख्त उस लड़के, उसके बॉयफ्रेंड पर मुझे पर बहुत गुस्सा आ रहा था, जिसके हाथ उसकी नग्न कमर पर फिसल रहे थे । मेरा जी कर रहा था, साले को अभी जाकर धो डालूँ और उसकी जगह उस हसीना की नग्न कमर पर मैं अपने हाथों को फिसलाऊँ । हम तीनों लिफ्ट में सवार हुए । उसके हाथ अभी तक उसकी कमर से लिपटे हुए थे और इधर-उधर फिसल रहे थे । साले को इतनी भी शर्म नहीं थी, भरी दोपहर का समय था और मैं उन्हें देख रहा हूँ । कुछ पलों के लिए डॉली से मेरी नजरे मिली तो वह मुस्कुरा दी ।

‘साली, बॉयफ्रेंड की बाहों में होकर भी चैन नहीं है । मुश्किल से कुछ सेकंड हम लिफ्ट में साथ रहे थे और हमारा थर्ड फ्लोर आ गया था । मैं उनसे पहले लिफ्ट से बाहर आ गया था और एक कनखियों से डॉली पर नजर डालकर अपने फ्लैट की तरफ चला गया था ।

हाँ, तो मैं बता रहा था, मुझे इस फ्लैट में आए हुए 45 महीने हो चुके थे । दिसम्बर का महीना चल रहा था; सर्दी की शुरुआत हो चुकी थी । मैं ऑफिस से अपनी सेकंड शिफ्ट, जो रात के 10 बजे तक चलती है, खत्म करके लौटा ही था और अपनी पार्किंग में बाइक खड़ी कर रहा था । अभी मैंने बाइक ढंग से खड़ी भी नहीं की थी कि पीछे से एक आवाज आई –

“एक्सक्यूज मी ! आप अपनी बाइक थोड़ी आगे खड़ी करेंगे, ताकि मैं अपनी स्कूटी पार्क कर सकूँ ।”

मैंने पीछे मुड़कर देखा तो पाया डॉली शर्मा अपनी स्कूटी लेकर खड़ी थी । वह मेरे पीछे कब आई, मुझे इस बात का पता भी नहीं चला । शायद मेरी बाइक की आवाज में उसकी स्कूटी की आवाज दब गई थी । हमारी कॉलोनी में पार्किंग की बड़ी समस्या है । कॉलोनी में एक बिल्डिंग में जितने फ्लैट हैं सिर्फ उसके आधे फ्लैट्स के लिए कवर्ड पार्किंग मौजूद थी । बाकी लोग अपनी गाड़ियाँ ओपन स्पेस में ही खड़ी करते थे । वह तो शुक्र था कि मेरे मकान मालिक के फ्लैट के लिए कवर्ड पार्किंग मौजूद थी, जहाँ पर मैं अपनी कार और बाइक दोनों पार्क कर सकता था । मैं अपनी बाइक इस तरह से पार्क करता था कि उसके पीछे और कोई दुपहिया वाहन खड़ा ना हो सके, क्योंकि कई बार दुपहिया वाहन को भी खड़े करने में प्रॉब्लम्स आती थी । खैर, इतनी सुंदर लड़की रिक्वेस्ट कर रही थी तो मुझे अपनी बाइक आगे करने में क्या प्रॉब्लम होती ? मैंने अपनी बाइक थोड़ी आगे खिसकाई । उसने अपनी स्कूटी मेरी बाइक के पीछे पार्क की, अपना हेलमेट उतारा और मुस्कराते हुए बोली, “थैंक यू ।”

“वैल्कम ।” मैंने भी मुस्कराते हुए जवाब दिया ।

“ऑफिस से आ रहे हैं आप ?”

“जी हाँ ! और आप ?” मैंने उसके बदन पर अपनी नजरे गड़ाते हुए पूछा । सर्दी शुरू हो चुकी थी, जो रात के समय महसूस होती थी । जहाँ मैंने स्वेटर पहना हुआ था, वही उस साली ने अभी भी घुटनों से थोड़ी ऊपर की स्कर्ट और हाफ बाजू की शर्ट पहनी हुई थी । शर्ट के ऊपर के 2 बटन खुले हुए थे । पता नहीं शर्ट के बटन अनजाने में खुले रह गए थे या फिर जानबूझकर खुला छोड़ रखा था । ऊपर से शर्ट इतना पतला था जिसमें से उसकी ब्रा की शेप साफ नजर आ रही थी ।

‘पता नहीं ये लड़कियाँ ऐसा क्या खाती है जो इन्हें बिलकुल भी सर्दी नहीं लगती ।’ मैंने मन में सोचा ।

“ओह्ह ! आप कपड़े देखकर पूछ रहे हैं ? वह एक दोस्त का बर्थडे था तो वहीं सामने मॉल में सेलिब्रेट करने गई थी ।”

“ओह्हके ।” मैंने एक गहरी साँस लेकर कहा और सीढ़ियों की तरफ जाने लगा । कभी-कभी मैं सीढ़ियाँ भी इस्तेमाल कर लिया करता था अपनी मंजिल तक जाने के लिए ।

“अरे, सर ! आइये, लिफ्ट से चलते हैं ना ?” डॉली ने पीछे से मुझे कहा ।

“ओके !” मैंने भी कहा और हम लिफ्ट की तरफ चल पड़े ।

“आप कहाँ जॉब करते हैं ?” उसने मुझसे पूछा ।

“मैं इन्फो साइबर सोल्यूशंस, हाइटेक सिटी में टीम लीडर हूँ । और आप ?”

“जी, मैं ओरा डीबी सोल्युशंस में एक्जीक्यूटिव ऑफिसर हूँ ।”

“ओह्ह, ओरा डीबी में ! वह तो वर्ल्ड की नंबर 1 कंपनी है डीबी डोमेन में । कभी जब मैं कॉलेज में था तो मेरा सपना था डीबी सोल्युशंस में काम करने का, पर बाद में पता चला वह सिर्फ आईआईटी में ही कैम्पस सेलेक्शन करती है ।” बात करते-करते हम लिफ्ट में आ चुके थे ।

“जी ! मैंने आईआईटी मुंबई से कम्प्यूटर साइन्स से डिग्री ली है । लास्ट इयर ही कैम्पस से सिलैक्ट हुई हूँ ।”

“ओह्ह ! आपका पैकेज कितना है ?”

“ज्यादा नहीं है सर, सिर्फ 22 का है !”

‘साली को 22 साल की उम्र में 22 लाख का पैकेज कम लग रहा है । यहाँ 38 का हो चुका हूँ और अभी भी 22 नहीं पहुँचा ।’ मन ही मन सोचते हुए मैंने उससे कहा, “फिर तो पार्टी होनी चाहिए मिस... ।”

“जब आप कहे सर ।” कहते हुए वह मेरे इतना पास आ खड़ी हुई थी कि उसका बदन मुझसे लगभग टच होने लगा था । मेरे शरीर को अब सर्दी लगनी बंद हो चुकी थी, ये उसके बदन की गर्मी का कमाल था ।

“बटन...।” मैंने हकलाते हुए कहा ।

“क्या ! बटन ?”

“वो लिफ्ट का बटन तो प्रैस कीजिये । हम कब से लिफ्ट के अंदर हैं और बातों में इतना खो गए कि बटन ही प्रैस करना भूल गए ।” मैंने कहा ।

“ओह्ह हाँ ! मुझे लगा आप कुछ और कहना चाह रहे थे ।” उसने अपनी शर्ट की तरफ देखते हुए कहा, पर फिर भी बटन बंद करने की जहमत नहीं उठाई । फिर उसने 3 नंबर प्रैस किया जो कि हमारी मंजिल थी ।

वह मुलाक़ात उससे मेरी नजदीकी दूसरी लंबी मुलाक़ात थी । उसके बाद वह कई बार मुझे लिफ्ट में, कॉलोनी में घूमती हुई मिली, पर कभी मैं अकेला नहीं था, कभी वह अकेली नहीं थी । उससे फिर कभी वैसी नजदीकी मुलाक़ात नहीं हुई । 56 महीने गुजर गए थे और अब जून का महीना चल रहा था ।

वह मुलाक़ात याद आते ही मेरे हाथ से नॉवेल छूट चुका था ।

“इतनी हसीन लड़की गुनहगार नहीं हो सकती । जिस लड़की का 22 लाख का पैकेज हो, उसे क्या जरूरत आन पड़ी ड्रग्स जैसे खतरनाक काम में हाथ डालने की । वह बेकसूर है । मुझे उसकी मदद करनी चाहिए । क्या पता, इस बार उसके साथ और भी नजदीकी मुलाक़ात हो जाए ?” सोचते ही मैं फटाफट उठा । नॉवेल को वहीं सोफ़े पर फेंका और रसोई की तरफ चाय बनाने के लिए जाने लगा ।

‘साला, अभी चाय पीने की क्या जरूरत है ? जिसके भी घर पूछताछ के लिए जाऊँगा वह चाय तो पिलाएगा ही ।’ सोचते हुए मैं लिस्ट बनाने लगा, जिनके पास डॉली के फ्लैट की चाबी थी । उसमें पहला नंबर था राजीव का । उसका एक्स-बॉयफ्रेंड । उसका कॉलोनी में ही कहीं पर फ्लैट है, ये मुझे पता था । पर वह फ्लैट कौन-सा है, ये ना तो मुझे पता था, ना ही मैं डॉली से पूछ पाया था । उसका कोई कॉन्टेक्ट नंबर भी मेरे पास नहीं था, इसलिए उसके मिलने का प्रोग्राम मैंने फिलहाल ड्रॉप कर दिया था । उसकी फ्लैटमेट्स संध्या और अंजलि फिलहाल फ्लैट में मौजूद नहीं थी तो उनसे भी कुछ पूछताछ संभव नहीं थी । शाम के 6 बजने वाले थे, जिम इंस्ट्रक्टर उदय भट्ट भी जिम में मिल जाने थे, पर एक तो मैं उन्हें बिलकुल भी नहीं जानता था, दूसरा वहाँ पर चाय मिलने की संभावना न के बराबर थी, इसलिए उससे मिलने का इरादा भी फिलहाल ड्रॉप कर दिया था । बाकी बचे हमारे ब्लॉक के प्रतिनिधि मिस्टर रामनाथन स्वामी जी, जिनसे मैं अभी तक 2 बार मिल चुका था । एक तो फ्लैट में आने से पहले ही उनसे मिला था । कॉलोनी की सोसाइटी के रुल्स के हिसाब से फ्लैट में आने से पहले एक चेक-इन फॉर्म भरकर ऑफिस में जमा कराना पड़ता था, जिस पर पहले ब्लॉक प्रतिनिधि के सिग्नेचर करवाने पड़ते थे । बस उसी सिलसिले में पहली बार उनसे मिलना हुआ था । दूसरी बार मैं उनसे तब मिला था, जब कॉलोनी में मनाए जाने वाले गणेशोत्सव के लिए वह चंदे की रसीद काट रहे थे । मैंने सबसे पहले उनसे ही मिलने का निश्चय किया । मैं तुरंत उठा और रामनाथन स्वामी के फ्लैट में जाने के लिए तैयार होने लगा ।

☐☐☐
 
रामनाथन स्वामी का फ्लैट चौथे फ्लोर पर स्थित था, यानी कि हमारे फ्लोर से जस्ट ऊपर वाला फ्लोर । चौथे फ्लोर पर उसका फ्लैट लिफ्ट से निकलकर दाई तरफ का पहला फ्लैट था और मैं इस समय उसके फ्लैट के सामने खड़ा था । मैंने कॉलबेल बजाई और दरवाजा खुलने का इंतजार करने लगा । इंतजार के उन कुछ पलों में मैंने अपनी नजरे इधर-उधर घुमाई तो मेरी नजरें नीचे थर्ड फ्लोर पर स्थित डॉली के फ्लैट पर पड़ी जो विपरीत दिशा में कोने का फ्लैट था ।

‘साला, यहाँ से साफ नजर आ रहा है उसका फ्लैट । अगर दरवाजा खुला होता तो उसके फ्लैट का हॉल भी साफ नजर आ जाता । जरूर कभी-कभी नजर मारता होगा बुड्ढा उन पर ।’ अभी मैं ये सोच ही रहा था कि दरवाजा खुला और एक आवाज आई, “यस, एवरू कावालि ।”

‘साला, फिर से वही भाषा की समस्या ।’ मैंने मन ही मन सोचा और मुड़कर देखा तो पाया साउथ इंडियन स्टाइल की सलवार-कमीज में एक 2526 साल की सांवली-सी लड़की दरवाजे पर खड़ी थी । वैसे मैं जानता था जब हमारे घर पर कोई अंजान व्यक्ति आता है तो हम उससे यही पूछते हैं कि किससे मिलना है ? बस इसी से उसकी बात का अंदाजा लगाकर मैंने जवाब दिया, “जी, इज मिस्टर रामनाथन स्वामी एट होम ?”

“एमिटि पनि ?”

“क्या ? मैं समझा नहीं ।” इस बार मेरे मुँह से निकला और मैंने हिन्दी में ही कहा । शायद उसको अँग्रेजी नहीं आती थी, जो वह मेरी बात को नहीं समझ पाई थी और मैंने भी इस बार इतना अंदाजा नहीं लगा पाया था कि वह क्या पूछ रही है ?

“क्या काम है ?” साली में इतना भी मेनर्स नहीं था, सारी बात दरवाजे पर ही खड़े-खड़े कर लेना चाहती थी । पर शुक्र था उसे हिन्दी तो आती थी ।

“जी, मुझे आपके पिताजी से मिलना था । उनसे कुछ काम था ।” मैंने जवाब दिया ।

“येवरू ?” तभी अंदर से किसी की आवाज आई ।

“नान्नगारु एवरों... ।” आगे बोलने से पहले उसने मेरी तरफ देखा और पूछा, “आपका नाम ?”

“राज !”

“डैडी, एवरों राज अट ।” उसने अपनी बात पूरी की ।

“अतनिनी लोपलकु रमम्नु ।” अंदर से आवाज आई ।

“आइए ।” उसने डोर को पूरा खोला और अंदर आने का इशारा किया । अंदर प्रवेश करते ही हॉल था, जिसमें 3+2+2 का सोफा सेट बिछा हुआ था और उसके आगे एक कॉफी टेबल रखी हुई थी । कॉलोनी के सभी फ्लैट्स इसी तरह से बने हुए थे ।

“बैठिए ।” उसने इशारा करते हुए कहा और अंदर की तरफ चली गई । मैं सिंगल सोफ़े पर बैठ गया । लगभग 2 मिनट के बाद रामनाथन स्वामी अंदर के बेडरूम से चलते हुए आए । मैं उन्हें देखते ही खड़ा हुआ ।

“अरे सर, प्लीज बैठिए ।” कहते हुए वह बीच वाले बड़े सोफ़े पर बैठ गए ।

“जी थैंक्स । आपकी हिन्दी बहुत अच्छी है ।” मैंने बैठते हुए कहा ।

“अरे भाई, मैं रिटायर्ड होने से पहले मुंबई यूनिवर्सिटी में हिन्दी का प्रोफेसर हुआ करता था । अब हिन्दी के प्रोफेसर की इतनी भी अच्छी हिन्दी नहीं होगी क्या ?”

“जी, तभी आपकी हिन्दी इतनी अच्छी है और आपकी बेटी की भी ।”

“धन्यवाद ! कहिए, मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ ? नहीं, सबसे पहले ये बताइये आप क्या लेंगे ? ठंडा या गरम ?”

‘बुड्ढा मिलनसार है ।’ मैंने मन ही मन खुद से कहा और उससे बोला, “अरे सर ! आप क्यों तकल्लुफ करते हैं ।”

“इसमें तकल्लुफ की कोई बात नहीं है सर ! अभी मैं आपके घर पर आऊँ तो क्या आप मुझे बिना कुछ खिलाये-पिलाये भेज देंगे ?” कहते हुए उसने एक ठहाका लगाया ।

“अरे, नहीं सर । आप चाय पिला दीजिये ।” मैंने भी मुस्कराते हुए कहा ।

“श्री बेटा, 2 चाय लेकर आना ।” उसने आवाज लगाई ।

‘नहीं, ये बुड्ढा उसको नहीं फँसा सकता । ये तो कितना अच्छा आदमी है ।’ मैंने अपने मन में सोचा ।

“जब तक चाय आती है, आप ये बताइये, मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ ?”

“जी, मुझे आपसे कुछ बात करनी थी ?”

“किस सिलसिले में ?”

“जी, डॉली शर्मा के संबंध में ?”

“कौन डॉली शर्मा ?”

‘साला, ये तो बड़ा चालू लगता है । कौन डॉली शर्मा ? साले के पास उसके रूम की चाबी है, फिर भी पूछ तो ऐसे रहा है जैसे उसे जानता ही नहीं ।” अगले ही पल उसके प्रति मेरी राय बदल गई थी ।

“जी, वही डॉली शर्मा जिसका अपनी बिल्डिंग में ही फ्लैट है और जिसे पुलिस ने आज दोपहर को अपने फ्लैट से गिरफ्तार किया है ।”

“ओह्ह, अच्छा वह ! पर आप उसके बारे में मुझसे क्या बात करना चाहते हैं ?” कहते हुए बुड्ढा इतना सीरियस हो गया था कि मुझे लगने लगा था कि कहीं मैं थोड़ी देर पहले किसी और इंसान से तो बात नहीं कर रहा था ।

“जैसा कि वह उस समय कह रही थी, वह निर्दोष है । आपको क्या लगता है, वह सही में निर्दोष है ?”

“अब भाई, इस बारे में तो पुलिस ही सबसे बेहतर बता सकती है । मुझे तो ये भी नहीं पता कि आखिर पुलिस ने उसे किस जुर्म में गिरफ्तार किया है ।” कहते हुए उसका चेहरा पूरा सपाट था ।

‘बुड्ढा पूरा घाघ है । साला, कोई भी भाव चेहरे पर नहीं ला रहा । क्या सच में इसको नहीं पता, पुलिस ने डॉली को क्यों गिरफ्तार किया है ?’ सोचते हुए मैंने कहा, “सर, पुलिस ने उसे ड्रग्स सप्लाई के इल्जाम में गिरफ्तार किया है ।”

“वॉट ! क्या कह रहे हो तुम ? पर तुमको ये बात कैसे पता चला ?”

‘अगर इसे नहीं पता तो कोई बात नहीं, पर अगर इसे पता है तो तगड़ा एक्टर है ।’

“सर ! मैं अभी पुलिस स्टेशन ही होकर आया हूँ और वहाँ मैंने ड्यूटी इंचार्ज से बात की थी । उसी ने बताया था कि डॉली के रूम की तलाशी लेने पर उसके यहाँ से 11 ग्राम के 100 पैकेट्स ड्रग्स के मिले हैं, जिनकी मार्केट कीमत 20 लाख रुपए है ।” कहते हुए मैंने अपनी निगाहें उसके चेहरे पर जमाये रखी ।

“पर उसको देखने पर तो लगता नहीं था कि वह ऐसा काम कर सकती है । चेहरे से बड़ी भोली और मासूम नजर आती है । पर आज के जमाने के बारे में क्या कहा जा सकता है ! कौन, कब, क्या कर जाए, किसको पता ?”

“सर ! मैंने इस बारे में डॉली शर्मा से भी बात की थी और...।” कहते हुए मैंने अपनी बात अधूरी छोड़ दी ।

“और क्या ?” वह व्यग्र भाव से बोला ।

“और उसका कहना है कि वह बेकसूर है और उसे किसी ने इस मामले में फँसाया है ।”

“वो तो जिसे भी पुलिस गिरफ्तार करती है, वह हर मुजरिम यही कहता है कि वह बेकसूर है ।”

“सर, पुलिस जिसे गिरफ्तार करती है वह मुलजिम होता है और तब तक बेकसूर ही होता है जब तक कोर्ट में उसे मुजरिम साबित ना कर दिया जाए । वैसे मेरा भी यहीं मानना है कि वह बेकसूर हो सकती है ।”

“तो आपका कहना है कि उसे किसी ने फँसाया है ।”

“सर ! हो सकता है ।”

“उसे कौन फँसाएगा और क्यों ?”

“अब क्यों फँसाएगा ये तो तफ़्तीश का मुद्दा है । पर कौन फँसा सकता है, इसके बारे में मैं अपनी राय दे सकता हूँ ।”

“कौन ?” उसके मुँह से निकला ।

“वही जिसके पास उसके फ्लैट में आने-जाने की सुविधा मौजूद हो । जो कभी भी उस फ्लैट में बिना किसी रोक-टोक के, बिना आवाज किए आ-जा सकता हो । वही जिसके पास मिस शर्मा के फ्लैट की चाबी मौजूद हो ।”

“फ्लैट की चाबी !”

“जी ।”

“वो तो उसकी फ्लैटमेट्स के पास होगी ।

“जी, उनके पास तो होगी ही । आखिर वह तो उसी फ्लैट में रहती है । पर मैंने इस सिलसिले में डॉली शर्मा से बात की थी । और उसने बताया था कि उसके और उसकी रूममेट्स के अलावा भी फ्लैट की चाबी कई लोगों के पास है ।”

“किस-किस के बारे में बताया ?”

“उसने किस-किस के बारे में बताया, ये तो छोड़िए, पर उन नामों में एक नाम... ।” अभी मैं आगे कहने ही जा रहा था कि तभी हमारी बातचीत में व्यवधान आ पड़ा ।

“डैडी, चाय !” रामनाथन स्वामी की बेटी एक ट्रे में चाय बिस्किट और नमकीन लेकर आई थी, जिसकी वजह से मेरी बात अधूरी रह गई थी ।

“पहले मेहमान को दो ।”

“सर चाय, प्लीज ।” कहते हुए उसे ट्रे मेरे सामने झुकाई और झुकाने में वह खुद भी इतनी झुक गई थी कि मुझे उसकी कमीज से उसके क्लीवेज साफ नजर आ रहे थे । या तो साली को उस बारे में बिलकुल नहीं पता था या फिर क्या पता जानबूझकर झुकी थी । खैर, मैंने अपनी निगाहें वहाँ से तुरंत हटाई । ट्रे से चाय का कप लिया और बोला, “थैंक यू ।”

फिर उसे चाय अपने डैडी को दी और ट्रे को वहीं मेज पर रखकर अंदर की तरफ चली गई ।

“बिस्किट लीजिये सर ।” उसने ट्रे में रखी हुई बिस्किट की तरफ इशारा करते हुए कहा और खुद भी उसमें से एक बिस्किट उठा लिया । मैंने भी ट्रे से एक बिस्किट उठाते हुए कहा, “थैंक यू सर ।”

“उसमें एक नाम आपका था ।” बिस्किट का टुकड़ा मुँह में डालते हुए मैंने अपनी अधूरी बात पूरी की ।

“क्या ? मैं समझा नहीं ।”

“सर ! जिनके पास मिस शर्मा के फ्लैट की चाबी है, उनमें एक नाम आपका भी है ।” कहते हुए मेरी आँखें उसके चेहरे पर ही टिकी थी । शायद मैं भी जासूसों की तरह उसके चेहरे के भाव पढ़ने में कामयाब हो जाता ।

“ओह्ह, तो ये बात है !” उसने मुँह से सिर्फ इतना ही निकला । मुझे लगा था कि मेरी बात सुनते ही उसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगेगी, उसकी जुबान लड़खड़ाने लगेगी, जैसा कि नॉवेल में, फिल्मों में अक्सर होता है । पर हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था । साले के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आई थी । या तो बुड्ढा बहुत बड़ा एक्टर था या फिर बुड्ढे ने वाकई कुछ नहीं किया था ।

“जी, यही बात है ।”

“तो मेरे पास चाबी होने का अर्थ तुमने ये लगाया है कि मैंने उसे फँसाया है । उसके रूम में ड्रग्स मैंने रखी हैं ।”

“होने को तो कुछ भी हो सकता है सर । अभी थोड़ी देर पहले आपने ही ये बात कही थी कि आज के जमाने के बारे में क्या कहा जा सकता है, कौन, कब, क्या कर जाए, किसको पता ?”

“वो तो मैंने एक मिसाल दी थी और अब वही मिसाल तुम मेरे पर आजमा रहे हो ।” कहते हुए वह मुस्कुराया ।

“जी ।” मैंने भी मुस्कराते हुए ही कहा ।

“बरखुरदार । अभी तुमने ही कहा कि उसके रूम से 100 पेकेट्स ड्रग्स के मिले हैं । अब तुम मुझे बताओ, क्या ड्रग्स किसी शॉपिंग मॉल में, किसी दुकान में, किसी पान की थड़ी पर मिलती है, जो मैंने वहाँ से खरीद ली और डॉली शर्मा के रूम में उसको फँसाने के लिए छुपा दी ।”

“नहीं सर, ऐसा तो नहीं है ।” उसकी इस सीधी बात पर मैं हड़बड़ा गया था, पर फिर भी इतनी जल्दी उसे अपने संदेह से थोड़े ही ना बरी कर देता, इसलिए मैंने आगे कहा, “सर, मानता हूँ कि ड्रग्स इतनी आसानी से किसी शॉपिंग मॉल में नहीं मिलती, पर ये भी तो हो सकता है, वह आपने कहीं और से खरीदी हो । आखिर बहुत से लोग ड्रग्स का सेवन करते हैं । उन्हें भी तो ड्रग्स कहीं ना कहीं से हासिल हो ही जाती है । आपने भी ऐसी ही किसी जगह से ली होगी ?”

“जो ड्रग्स कहीं ना कहीं से हासिल कर लेते हैं वह ड्रग्स का सेवन करते हैं । क्या मुझे देखकर तुम्हें ऐसा लगता है कि मैं ड्रग्स जैसा नशा करता हूँ ?” उसने फिर मुझसे सवाल किया ।

उसके इस सवाल पर मैं फिर से हड़बड़ा गया ।

‘साला, बेइज्जती पर बेइज्जती हो रही है ।’

“सर, जरूरी तो नहीं, जो ड्रग्स लेता है सिर्फ वही उस जगह का पता जानता है जहाँ से ड्रग्स मिलती है । ड्रग्स बेचने वाला भी तो उस जगह के बारे में अच्छी तरह से जानता है ।” मैंने पूरी ढिठाई से कहा ।

“मिस्टर, अब तुम अपनी लाइन क्रॉस कर रहे हो । तुम एक मुंबई यूनिवर्सिटी से प्रोफेसर के पद से रिटायर्ड एक इज़्ज़तदार आदमी पर ड्रग्स सप्लायर होने का इल्जाम लगा रहे हो ?” उसने अपने शब्दों पर ज़ोर देते हुए कहा ।

“नहीं सर, मेरा आप पर ऐसा इल्जाम लगाने का कोई इरादा नहीं था । मैंने सिर्फ अपनी ये राय बताई थी कि अगर इरादा कर लिया जाये और ड्रग्स पाना ही हो तो वह इतना मुश्किल काम भी नहीं है । फिर भी मेरे शब्दों से अगर आपको कोई ठेस पहुँची हो तो मैं दिल से क्षमा चाहता हूँ ।” मैंने बात को संभालते हुए कहा ।

“हम्म, तुम्हें सोच-समझकर कुछ बोलना चाहिए था मिस्टर !”

“सर, मैं एक बार फिर से हाथ जोड़कर क्षमा चाहता हूँ ।”

“हम्म ओके ।”

“अच्छा सर ! आपकी इजाजत हो तो 24 सवाल और पूछ सकता हूँ ?”

“अब भी कुछ पूछना चाहते हो ? हम पर इतने बेहूदा इल्जाम लगाने के बाद भी ?”

“सर, अगर आपकी इजाजत हो तो ?” मैंने मुस्कराते हुए, अपने शब्दों में शक्कर-सी मिठास घोलते हुए कहा ।

“अच्छा पूछो, क्या पूछना चाहते हो ?”

“सर, आपके पास डॉली शर्मा के फ्लैट की चाबी क्योंकर है ?”

“अरे भाई ! जब डॉली ने ये बताया कि मेरे पास उसके फ्लैट की चाबी है तो उसने ये भी बताया होगा कि क्यों है ?”

“जी सर, बताया था । मेरा मतलब है, आपने उसकी एक चाबी अपने पास क्यों रखी, जब आपने तालेवाले को बुलाकर उसके फ्लैट का नया ताला लगवा दिया था ।”

“भाई ! मुझे लगा था कि अगर फिर कभी देर रात को उसके साथ ऐसा हादसा दुबारा हो जाए तो ज्यादा परेशानी नहीं हो, बस इसलिए इंसानियत के नाते एक चाबी मेरे पास रख ली थी ।”

“अच्छा, कभी दुबारा चाबी इस्तेमाल करने की जरूरत पेश पड़ी ?”

“नहीं भाई, कभी नहीं ।”

“आपने कभी यूज की ?”

“मतलब ?”

“मतलब कभी आप उस चाबी को यूज करके उसके फ्लैट में गए ।”

“नहीं भाई, बताया ना । उस दिन के बाद मैं कभी उसके रूम में नहीं गया । कभी जरूरत ही नहीं पड़ी ।”

“उसकी अनुपस्थिति में भी नहीं ? या उसकी उपस्थिति में ही कभी नहीं गए ?”

“तुम कहना क्या चाहते हो ?”

“आप आज दिन में कभी उसके रूम में गए ?”

“ओह्ह, अब समझा । तुम कहना चाह रहे हो कि आज जब वह दिन में गहरी नींद में सो रही थी, मैं चुपके से अपनी चाबी से उसके फ्लैट में गया और ड्रग्स वहाँ उसके कमरे में छुपा दी ?”

“हो सकता है सर ?”

“अच्छा और ये सब मैंने किया और उसे पता भी नहीं चला ।”

“जब पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया था, वह बहुत गहरी नींद में थी ।”

“इतनी गहरी नींद में कि मैं उसके फ्लैट में चाबी लगाकर अंदर गया, उसके रूम में जहाँ वह सो रही थी, वहाँ गया, उसका बैग निकालकर उसमें ड्रग्स रखी और बड़े आराम से फ्लैट से बाहर आ गया और फ्लैट को बाहर से वापस लॉक लगाकर चला गया और उसे कानों कान खबर भी नहीं हुई ?”

“हो सकता है ?” मैं अपनी जिद पर अड़ा रहा ।

“अच्छा, फिर ये बताओ, ऐसा करने के पीछे मेरा उद्देश्य क्या था ? मेरी उससे ऐसी कौन-सी दुश्मनी थी जो मैं उसे फँसाने के लिए इतना कुछ करूँगा ?”

उसका ये सवाल सुनकर मैं एक बार फिर से सोच में पड़ गया । थोड़ी देर सोचने पर मुझे ऐसी कोई वजह नहीं मिली जिसके कारण मैं उसका इस वारदात से हाथ जोड़ सकता था । पर तभी मेरे दिमाग में फिर से जासूसी कीड़ा कुलबुलाया, ‘जरूर बुड्ढे ने उस पर अपना हाथ साफ करने की कोशिश की होगी । आखिर वह खुले विचारों और उससे भी ज्यादा खुले कपड़ों वाली थी ही । बुड्ढे ने उसे ईजी ले समझकर हाथ साफ करने की कुचेष्टा की होगी । पर डॉली को वह पसंद नहीं आया होगा और उसने बुड्ढे की जरूर इन्सल्ट की होगी, जिसकी वजह से बुड्ढे ने उससे बदला लेने के लिए ये सब किया होगा ।’ पर अपने मन के भावों को मन में ही दबाते हुए मैंने कहा, “होगी कोई वजह, वह तो तफ़्तीश से पता चलेगी ।”

“तुम तो पीछे ही पड़ गए यार । लगता है, बिना किसी बात के तुम मुझे मुजरिम साबित करके ही मानोगे, जो मुझ पर ये इतना बड़ा इल्जाम लगा रहे हो । अब साथ ही साथ ये भी बता दो, मुझे ये कैसे पता चला कि वह अपने रूम में इतनी गहरी नींद में सो रही है कि उसे डिस्टर्ब किए बिना मैं उसके रूम में बड़े आराम से जा सकता हूँ और उसे फँसाने का इंतजाम कर सकता हूँ ।”

“पता चल गया होगा किसी तरह से । ये तो मुझसे बेहतर आप बता सकते हैं कि आप उस मासूम लड़की को क्यों फँसाना चाहते हैं और आपको उसके गहरी नींद में होने की बात कैसे पता चली ?”

“ओह्ह, अच्छा ।” उसने कहा और एक गहरी साँस ली फिर अपनी बात आगे बढ़ाई, “मुझे एक बात बताओ, ये सब पूछताछ तुम क्यों कर रहे हो ? अगर वह लड़की, क्या नाम था उसका... हाँ, डॉली शर्मा । अगर वह वाकई निर्दोष है तो ये बात उसे पुलिस को बतानी चाहिए थी । पुलिस असली मुजरिम को गिरफ्तार करके उसे उसकी परेशानी से कम से कम तुमसे बेहतर तरीके से और जल्दी निजात दिला देगी ।”

“सर, मैं जब उससे मिला था तब तक पुलिस ने उससे पूछताछ नहीं की थी । पुलिस उस समय तक उसे गिरफ्तार करने की खानापूर्ति में व्यस्त थी । खैर ! पुलिस जब उससे पूछताछ करेगी तो वह ये सब बातें उन्हें भी बताएगी और तब पुलिस ये सब सवाल, जो मैं आपसे पूछ रहा हूँ, वह आपसे करेगी ।”

“तो ठीक है मेरे भाई । मैं पुलिस को इन सवालों के जवाब दूँगा, पर तुम्हें किस खुशी में दूँ ? तुम आखिर हो कौन ? तुम उस लड़की के वकील हो क्या ? नहीं, तुम वकील तो नहीं हो सकते । मैंने जब तुमसे गणपति का चंदा लिया था, तब तुमने अपने आपको शायद किसी आईटी कंपनी का एम्प्लॉई बताया था ।”

“जी, आपकी याददाश्त कमाल की है, जो एक साल बाद भी आपको ठीक से याद है ।”

“तारीफ का धन्यवाद, पर अब ये बताओ, जब तुम उसके वकील नहीं हो, जासूस भी नहीं हो, या ना ही उसके कोई रिश्तेदार हो, फिर मुझसे यूं सवाल पर सवाल क्यों किए जा रहे हो ?” उसने मुझसे व्यंग्य भरी आवाज में पूछा ।

‘साला, ये तो बेइज्जती पर बेइज्जती कर रहा है ।’

“सर, होने को तो मैं उसका कोई भी नहीं हूँ; पर हाँ, एक अच्छा पड़ोसी जरूर हूँ । और मैं इस उम्मीद से उसकी हेल्प करने की कोशिश कर रहा हूँ कि अगर भविष्य में मैं कभी किसी मुसीबत में फँस जाऊँ तो कोई मेरा पड़ोसी मेरी हेल्प करने से हिचकिचाये नहीं । हम लोग अपने घर परिवार से इतना दूर जॉब कर रहे हैं । किसी मुसीबत में सबसे पहले यहीं पड़ोसी ही काम आने वाले हैं । बेशक आप यहाँ पर लोकल हैं, आपके सारे रिश्तेदार यहाँ हैं, पर अगर कभी आप किसी सीरियस कंडिशन में फँस जाते हैं तो आपकी मदद करने को सबसे पहले आपके पड़ोसी ही आयेंगे ।” मैंने एकदम से सीरियस होते हुए कहा । हालांकि मैं जानता था कि शहरों में, खासतौर पर महानगरों में मदद करना तो दूर, हमारे पड़ोस में कौन रहता है ये हमें मालूम ही नहीं होता । वैसे भी अगर डॉली शर्मा खूबसूरत नहीं होती या फिर मेरा परिवार मेरे साथ होता तो उसकी मदद करना तो दूर, मैं उससे मिलने के लिए पुलिस स्टेशन की तरफ अपने कदम भी नहीं बढ़ाने वाला था । पर उसको बोलने के लिए मुझे इससे अच्छा जवाब नहीं सूझा था, और क्या जवाब सूझा था । मेरी बात सुनकर वह भी सीरियस हुआ और बोला –

“अच्छा भाई, मैं तुम्हारी बात समझ गया । वह लड़की निर्दोष होगी तो मुझे भी खुशी होगी । पर मेरा यकीन मानो, मुझे उसके बारे में कुछ नहीं मालूम । उसके रूम की चाबी मेरे पास जरूर है, पर मुझे उसके इस्तेमाल की कभी जरूरत नहीं पड़ी ।”

“ठीक है सर । मुझे आपकी बात पर पूरा यकीन है । अच्छा सर, अभी तो मैं चलता हूँ । फिर कभी जरूरत महसूस हुई तो आपको फिर से तकलीफ देने आऊँगा ।” मैंने मुस्कराते हुए कहा ।

“तुम फिर मेरा सिर खाने आओगे ?” उसने भी उसी प्रकार मुस्कराते हुए कहा ।

“हाँ सर । इसी बहाने एक कप चाय मिल जाएगी ।”

“हाहाहा... ।” उसने एक जोरदार ठहाका लगाया ।

‘बुड्ढा सच में, सच बोलता हुआ लग रहा है ।’

“अच्छा सर, नमस्ते । सहयोग के लिए शुक्रिया ।” कहते हुए मैं सोफ़े से उठ गया । उठते हुए मेरी नजर अंदर कमरे की तरफ गई जहाँ से मुझे पर्दा हिलता हुआ नजर आया । पर्दे की पीछे कोई साया था जो मेरे देखते ही गायब हो गया था । शायद बुड्ढे की बीवी या बेटी थी ।

☐☐☐
 
उसके फ्लैट से निकलकर मैंने अपनी घड़ी की तरफ निगाहें फेरी । डिजिटल घड़ी 6:55 का टाइम दिखा रही थी और मेरे ऑफिस जाने का समय भी हो रहा था । वैसे तो मेरे ऑफिस की शिफ्ट रात को 10 बजे से शुरू होती थी, पर जब भी गर्मियों की छुट्टियों में बीवी बच्चों को लेकर अपने मायके चली जाती थी तो मैं ऑफिस रात को 8 बजे ही चला जाता था । अब साला रात का डिनर कौन बनाए या होटल में पैसा कौन खर्च करे, जब ऑफिस में फ्री का डिनर मिल रहा हो । घर से ऑफिस जाने में इस समय अंदाजन 2025 मिनट लगते थे, इसलिए थोड़ी देर रेस्ट करने के लिए मेरे पास अभी समय था । मुझे एक मंजिल ही नीचे उतरना था इसलिए लिफ्ट के बजाय मैं सीढ़ियाँ उतरकर अपने फ्लैट की तरफ जाने लगा । गैलरी से गुजरते हुए मैंने यूं ही एक नजर डॉली शर्मा के फ्लैट की तरफ दौड़ाई । मुझे दरवाजे पर लगे हुए पर्दे के पीछे से कोई हलचल-सी महसूस हुई ।

‘लगता है, उसकी कोई फ्लैटमेट वापस आ गई है । चलो, एक बार उससे भी थोड़ी पूछताछ कर लेता हूँ ।’ सोचते हुए मैंने अपने कदम उसके फ्लैट की तरफ बढ़ाए, पर अगले ही पल उल्टे पैर मैं वापस लौट गया, ‘नहीं यार, कल दिन में फुर्सत से मिलूँगा इनसे । अभी इतना टाइम भी नहीं है” ।

मैं अपने फ्लैट में आया । दरवाजा बंद करके मैंने अपनी टी-शर्ट उतारकर सोफ़े के एक कोने पर फेंकी और उसी सोफ़े पर लेट गया । लेटे-लेटे मैं बुड्ढे के बारे में सोचने लगा-

‘बुड्ढा शक्ल से तो शरीफ लग रहा है । बोलने का अंदाज भी शरीफों जैसा ही है । और ऊपर से दूर-दूर तक ऐसी कोई वजह भी नजर नहीं है, जिसकी वजह से वह डॉली शर्मा से बदला लेने के लिए उसको फँसाने की सोचे । वह भी इस तरीके से 20 लाख रुपए खर्च करके । उसने सही कहा था, ड्रग्स कोई मॉल में या पान की दुकान में आसानी से तो मिलती नहीं है । ड्रग्स का इंतजाम वही कर सकता है जो खुद ड्रग्स लेता हो या फिर उसके व्यापार में शामिल हो । बुड्ढा इन दोनों में से कोई नहीं लगता । खैर, इतनी जल्दी किसी नतीजे पर थोड़े ही पहुँचा जा सकता है । विक्रांत जैसे जासूस को भी कई दिन लगते हैं किसी केस को सॉल्व करने में । मुझे भी थोड़ा टाइम तो लगेगा ही । मैं जरूर उस बंदे को खोज निकालूँगा जिसने डॉली शर्मा को फँसाने की कोशिश की है ।’ विक्रांत के बारे में सोचते-सोचते मैं उस इंस्पेक्टर की चेतावनी भुला बैठा था कि यह केस ड्रग्स के मामला का है और इससे ड्रग्स माफिया जुड़ा हुआ हो सकता है जो कि मेरे लिए खतरनाक हो सकता है ।

मैं अभी ये सोच ही रहा था कि तभी फ्लैट की घंटी बज उठी ।

‘साला ! अब इस समय कौन आ गया ?’ सोचता हुआ मैं सोफ़े से उठा और दरवाजा खोलने चल दिया ।

दरवाजा खोलकर देखा तो पाया सामने एक लड़की खड़ी थी । मैं अभी उसे पहचानने की कोशिश कर ही रहा था कि तभी मुझे अपनी स्थिति का ध्यान आया । मैंने तुरंत उसके मुँह पर दरवाजा ज़ोर से बंद किया । पीछे से मुझे हँसने की आवाज आई । मैं भागकर सोफ़े पर पड़ी हुई अपनी टी-शर्ट उठाई और उसे पहनने लगा । मुझे ध्यान ही नहीं रहा था कि मैं सिर्फ अपनी जीन्स में हूँ और ऊपर का बदन मेरा नंगा था । टी-शर्ट पहनकर मैंने दुबारा दरवाजा खोला, तब तक मैं उस लड़की को पहचान चुका था । पहचानने में थोड़ा समय इसलिए लगा, क्योंकि इस समय उसका काया पलट हो चुका था । पहले वह जहाँ टिपिकल साउथ इंडियन सलवार-कमीज में घरेलू लड़की नजर आ रही थी, वही इस समय वह व्हाइट कलर की टाइट केप्री और ब्लू कलर की डेनिम में अत्यंत आधुनिक बाला नजर आ रही थी । केप्री और जीन्स के बीच कम से कम 4 इंच का गैप था, जिसमें से उसकी साँवली कमर नजर आ रही थी और मेरी नजरे वहाँ से शुरू होकर उसके सीने तक बार-बार आ-जा रही थी ।

‘साला, इन कपड़ों में तो ये किसी बॉम्ब से कम नजर नहीं आ रही है । मन ही मन सोचते हुए मैंने प्रत्यक्ष में पूछा, “आप तो शायद मिस्टर रामनाथन स्वामी की बेटी हैं ?”

“जी ।”

“आपको मुझसे कोई काम था मिस... ?”

“श्रीकुट्टी, यू केन कॉल मी श्री ।”

“यस मिस श्री… आपको मुझसे कुछ काम है क्या ?”

“हाँ, काम तो है पर... ।”

“पर ?”

“जब आपके घर पर कोई मिलने आता है तो उससे इसी तरह से गेट पर खड़े होकर ही बातें करते हैं क्या ?”

“ओह्ह नो... आई एम सॉरी । प्लीज, कम इन ।” कहते हुए मैंने दरवाजा खोल दिया ।

“थैंक यू... प्लीज गेट बंद कर दीजिएगा ।” कहते हुए वह अंदर आ गई ।

‘गेट क्यों बंद करवा रही हैं । इसका इरादा क्या है ?’ सोचते हुए मेरी नजरें उसकी कमर पर ही फिसल रही थी । उसके पीछे मैं भी गेट बंद करके अंदर आ गया ।

हॉल में आकर वह खड़ी रही और खड़े ही वह हॉल का नजारा करने लगी, जो उस समय उसी तरह से बिलकुल अस्त-व्यस्त था, जैसा किसी बैचलर आदमी का होता है । डाइनिंग टेबल पर फ्रूट बास्केट्स ऐसे ही पड़ी थी, कुछ किताबें भी रखी हुई थी । फर्श पर गंदगी साफ नजर आ रही थी । चाय का खाली कप भी वैसे ही टेबल रखा हुआ मेरा मुँह चिढ़ा रहा था । वैसे भी मैं उस समय बैचलर लाइफ ही तो जी रहा था ।

“सॉरी, इस समय बिलकुल अकेला हूँ तो... ।” कहते हुए मैंने अपना वाक्य अधूरा छोड़ा ।

“इट्स ओके । नो प्रॉब्लम ।”

“बैठिए ।” मैंने सोफ़े पर पड़े हुए अपने नॉवेल उठाए और उसके कवर को ठीक करते हुए उसे बैठने का इशारा करते हुए कहा ।

“थैंक यू ।” वह 3 सीटर सोफ़े पर बैठते हुए बोली ।

“कहिए, मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ ?” मैंने साइड वाले सोफ़े पर बैठते हुए कहा ।

“मदद तो मैं आपकी करने आई हूँ ।”

“जी, मेरी मदद... ।” मैंने अचकचाते हुए कहा ।

“जी, आपकी मदद ।” कहते हुए वह मुस्कुराई ।

“मैं समझा नहीं । आप मुझसे किस मदद की बात कर रही हैं ?”

“डॉली शर्मा के बारे में ।”

“वॉट ?” मैं थोड़ा सावधान हो गया था, “आप उसको जानती है ?”

“जी, वह मेरी फ्रेंड है ।”

“पर उसने तो आपके बारे में बताया ही नहीं था ।”

“क्या आपने उससे उसकी सभी फ़्रेंड्स के बारे में पूछा था ?”

“जी नहीं, मेरी तो सिर्फ उसकी रूममेट्स के बारे में बात हुई थी या फिर जिसके पास उसके रूम की चाबी है, उसके बारे में बताया था ।”

“सो देयर यू आर ।”

“हम्म ! आप मेरी क्या मदद कर सकती है ?”

“मैं आपको कुछ इन्फॉर्मेशन दे सकती हूँ ।”

“कैसी इन्फॉर्मेशन ?”

“मैंने आपकी और मेरे डैडी की सारी बातें सुनी थी । उसी से मुझे पता चला कि आप डॉली को बेकसूर मानते हैं और आपको ये लगता है कि उसे किसी ने फँसाया है और... ।” कहते हुए वह रुकी ।

“और क्या ?”

इससे पहले कि वह कुछ जवाब देती, मेरे मोबाइल की घंटी बजने लगी ।

‘जरूर वाइफ़ का ही फोन होगा । जब भी किसी लड़की से बात करता हूँ ना जाने उसे कैसे पता चल जाता है ? साला, पत्नियों के दिमाग में जरूर कोई सेटेलाइट फिट रहता है जो पतियों पर इतनी दूर से भी नजर रख लेती है । मेरी जरा भी खुशी थोड़े ही बर्दाश्त होती है उसे ।’ सोचते हुए मैंने मोबाइल की स्क्रीन की तरफ नजर दौड़ाई तो पाया उस पर माइ लव कॉलिंग ही डिस्प्ले हो रहा था ।

“एक्सक्यूज मी ।” मैंने श्री को कहकर फोन उठाया और हॉल के कोने में चला गया ।

“हाय जानू ।”

“हैलो पतिदेव । फोन उठाने में इतनी देर क्यों लगाई ? क्या किसी पड़ोसन से बात कर रहे थे ?”

‘भगवान ने भी पत्नियों के दिमाग में ना जाने कैसा एंटीना फिट कर रखा है, जो इतने दूर से भी सही-सही खबर मिल जाती है ।’ सोचते हुए मैंने कहा, “अरे नहीं डार्लिंग ! वह तो मैं नॉवेल पढ़ रहा था । तुम्हें तो पता ही है, यही मौका मिलता है पढ़ने का, अपना शौक पूरे करने का ।”

“जानती हूँ, तुम्हें भी और तुम्हारे शौक को भी । जब साथ में होती हूँ तो कौन-सा अपनी किताबों को छोड़ देते हो ? किताबें ना हुई, मेरी सौतन हो गई ।”

“अरे-अरे, बस ! फोन पर भी लड़ना शुरू कर दो तुम ।”

“मैं लड़ रही हूँ ?”

“नहीं बाबा, मैं लड़ रहा हूँ । अच्छा, ये बताओ फोन क्यों किया ?”

“ये बताने के लिए कि अब मैं खाना बनाने जा रही हूँ । मुझे डिस्टर्ब मत करना ।”

“ठीक है, नहीं करूँगा ।”

“आप नहीं जा रहे ।”

“बस थोड़ी देर में ।”

“अच्छा, अब 8.30 बजे फोन करूँगी । तब तक खाना खा लेना । तब तक के लिए बाय ।”

“ओके बाय जानूँ ।” कहते हुए मैंने फोन काट दिया ।

“सॉरी, वह वाइफ़ का फोन था ।” मैंने श्री को कहा ।

“या आई गॉट इट । आदमी जब किसी लड़की से बात कर रहा होता है और उस दरमियान अगर पत्नी का फोन आ जाता है तो ऐसे ही लड़की से दूर जाकर पत्नी से बात करता है ।”

“अच्छा, आप कुछ डॉली शर्मा की मदद के बारे में कुछ कह रही थीं । बताइये, आप क्या कह रही थीं ?” मैंने सोफ़े पर बैठकर बात बदलते हुए कहा ।

“हाँ ! पर ऐसे नहीं और यहाँ नहीं ?”

“फिर कहाँ ?”

“अभी मैं लेट हो रही हूँ और मुझे कहीं निकलना है । ऐसा करो अभी... ।” वह सामने दीवार पर लगी हुई घड़ी पर नजर दौड़ाते हुए बोली, “1 घंटे बाद 8.30 बजे आप मुझे मंजीरा मॉल में 2 स्टेट्स बार एंड रेस्टोरेन्ट में मिलना, मैं आगे की बात वहीं बताऊँगी । मेरा आज का डिनर तुम्हारी तरफ से है ।”

“पर... ।” मैंने कुछ कहना चाहा पर मेरी बात बीच में काटते हुए वह बोली, “पर-वर कुछ नहीं । अभी तो बोला, तुम डॉली की मदद करना चाहते हो ? अब उसकी मदद के लिए इतना-सा नहीं कर सकते ? 8:30 बजे मंजीरा माल । याद रखना । अगर मैं थोड़ी लेट हो जाऊँ तो जाना मत, मेरा इंतजार करना । मैं आऊँगी जरूर । ओके बाय ।” कहते हुए वह सोफ़े से उठ खड़ी हुई ।

“बाय ।” मैं भी उठ खड़ा हुआ । उसके गेट से बाहर जाते ही मैंने गेट बंद किया और सोचने लगा कि मुझे श्री से मिलने के लिए जाना चाहिए या नहीं ? कहाँ मैं अपने डिनर के 200300 रुपए बचाने के लिए ऑफिस में जाकर डिनर करता हूँ, वहीं पर वह मुझे उस बार कम रेस्टोरेन्ट में डिनर के लिए बुला रही थी, जहाँ का मुझे अंदाजा था कि वहाँ पर मेरे कम से कम 5000 रुपए खर्च हो जाने थे ।

‘साला, कौन जाएगा उससे मिलने के लिए ! वैसे भी मुझे नहीं लगता वह कुछ जानती होगी । वह जरूर अपना कोई उल्लू सीधा करना चाह रही होगी ।” सोचते हुए मैंने सामने लगी हुई दीवार घड़ी की तरफ नजर दौड़ाई, जिसमें अभी 7:35 ही बजे थे ।

‘10 मिनट बाद तैयार होता हूँ ऑफिस जाने के लिए ।’ सोचते हुए मैं सोफ़े पर लेट गया ।

☐☐☐

साढ़े आठ बजने में अभी 5 मिनट बाकी थे और मैं इस समय मंजीरा माल के बेसमेंट में बनी हुई पार्किंग में अपनी बाइक खड़ी कर रहा था । मैंने डेनिम की ब्लू जीन्स और येल्लो टी-शर्ट पहन रखी थी । आज बालों में बहुत दिनों के बाद जैल लगाया था, एक ही दिन में दूसरी बार जैसे मैं वक़्त को मात देने की कोशिश कर रहा था ।

‘एक लड़की अच्छे-भले आदमी को क्या से क्या बना देती है ? कहाँ मैं ऑफिस जाने वाला था और कहाँ पर एक लगभग अजनबी लड़की की मदद करने के लिए दूसरी लगभग अजनबी लड़की से मिलने जा रहा था; इस उम्मीद से कि हो सकता था मैं उसकी कुछ मदद कर पाऊँ और शायद उस मदद के बदले में मुझे भी उसके फ्लैट की चाबी हासिल हो सके और फिर... ।’ सोचते हुए मैं जागते-जागते ही वह हसीन ख्वाब देखने लग गया था, जो एक शादीशुदा मर्द के लिए वर्जित फल की तरह होना चाहिए, पर फिर भी मर्द उस फल को खाने के लिए हर पल लालायित रहता है । उस समय वह ये बात भूल जाता है कि अगर उसकी बीवी भी उसके पीछे से ऐसे ही वर्जित फल खा रही हो तो क्या वह ये बात सहन कर पाएगा ?’

लिफ्ट के द्वारा मैं मंजीरा माल के टॉप फ्लोर पर पहुँचा, जहाँ पर 2 स्टेट्स बार एंड रेस्टोरेन्ट था । मैंने अपने कदम अभी लिफ्ट से बाहर निकाले ही थे कि तभी मेरे मोबाइल की रिंग बजने लगी ।

‘उस लड़की का तो फोन हो नहीं सकता । मैंने तो उसे अपना नंबर भी नहीं दिया था, फिर किसका फोन हो सकता है ?’ सोचते हुए मैंने जीन्स की पॉकेट से मोबाइल बाहर निकाला तो पाया, बीवी का फोन था ।

मुझे समझ जाना चाहिए 8.30 बज गए है और रोज रात इसी समय खाना खाने के बाद बीवी मुझे फोन करती थी, पर लड़की के चक्कर में मैं सब भूल गया था ।

‘अच्छा हुआ फोन अभी आ गया । अगर उसके सामने अंदर डिनर लेते समय आता तो प्रॉब्लम हो जानी थी ।’ सोचते हुए मैंने फोन उठाया ।

“हैलो जानू ।”

“जानू के बच्चे ! इतनी देर लगती है फोन उठाने में ?”

“अरे ! अभी तो मैंने पहली बार में ही फोन उठा लिया यार ।”

“कहाँ पहली बार में उठाया ? चेक करो अपना फोन ।”

मैंने मोबाइल देखा तो पाया उसमें 3 मिस कॉल थी । शायद जब मैं बाइक के लिए पार्किंग देख रहा था, उसी समय मोबाइल की घंटी बजी थी ।

“सॉरी जानू ! वह मैं खाना खा रहा था और फोन साइलेंट था, इसलिए मुझे पता नहीं चला था ।” मैंने जब ये कहा तब तक मैं रेस्टोरेन्ट के गेट के सामने पहुँच चुका था । रेस्टोरेन्ट के दरवाजे पर खड़ा हुआ दरबान जो मुझे देखते ही दरवाजा खोलने के लिए तत्पर था, तुरंत उसने मुझे अचरज भरी नजरों से देखा और अगले ही पल वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया । मैंने उसे घूरकर देखा तो वह सकपका गया । मैं अंदर जाने के बजाय वापस पलट पड़ा था ।

“अच्छा, वह तो मैं समझ गई थी कि तुम ऑफिस में खाना खा रहे होंगे, पर क्या करूँ ? तुम तो जानते ही हो मैं अपनी आदत से मजबूर हूँ, इसलिए बार-बार फोन मिला रही थी ।”

“जानता हूँ जान । बहुत फिकर है तुम्हें मेरी । अच्छा ! बच्चे क्या कर रहे हैं ?”

“अब याद आई है तुम्हें सुबह से उनकी ? वह दोनों अपनी मुसई के पास है । मैं भी बस जा ही रही थी । सुबह बात करती हूँ ।”

“ठीक है जान ! गुड नाइट ।”

“बड़ी जल्दी है तुम्हें ? किसी गर्लफ्रेंड से बात करनी है क्या ?”

“क्या यार, तुम भी ना ! तुम्हें पता हैं ना, ऑफिस में हूँ ।”

“अरे ! मज़ाक कर रही थी । अच्छा ठीक है, अब तुम अपना काम करो । बाय, गुड नाइट ।”

“गुड नाइट !” कहते हुए मैंने फोन काट दिया ।

‘साली, अभी तक आई नहीं । 8.30 तो कब के बज गए हैं ? वैसे अच्छा हुआ वह अभी तक नहीं आई । अगर उसके सामने फिर से बीवी का फोन आता तो वापस से इन्सल्ट हो जाती ।’ मैं रेस्टोरेन्ट के गेट के बाहर टहलते हुए उसका इंतजार करने लगा । 57 मिनट बाद मेरे दिमाग में दूसरा विचार आया, ‘कहीं वह मुझसे पहले ही तो नहीं आ गई और अंदर बैठकर मेरा इंतजार कर रही हो ? ये बात मेरे दिमाग में पहले क्यों नहीं आई ? चलो, अंदर चलकर देखता हूँ ।’ सोचते हुए मैं रेस्टोरेन्ट के गेट की तरफ चल पड़ा । गेट पर खड़े दरबान ने मुझे देखकर गेट खोलकर मुस्कराते हुए कहा, “गुड ईवनिंग सर ।”

मैंने अपने सिर को एक हल्की-सी जुंबिश दी और अंदर प्रवेश कर गया । अंदर पहुँचकर मैंने इधर-उधर नजर दौड़ाई । वह एक बड़ा-सा डाइनिंग हॉल था जो शनिवार होने की वजह से लगभग पूरा भरा हुआ नजर आ रहा था । मैंने उस भीड़ में श्री को ढूँढने की कोशिश की, पर सफल नहीं हो सका । वहाँ 45 छोटे-छोटे केबिन भी बने हुए थे, जिनके ऊपर पर्दा पड़ा हुआ था । शायद वह कुछ लोगों के एकांत के लिए बने हुए थे ।

‘वो उनमें से किसी केबिन में हो सकती है क्या ? क्या मुझे वहाँ जाना चाहिए ?’ मैं वहाँ खड़े हुए मन ही मन सोचने लगा । मुझे इस तरह से खड़ा हुआ देखकर एक सूट-बूट पहना हुआ आदमी मेरी तरफ आया और बड़े ही अदब से बोला, “मे आई हेल्प यू सर ?”

“जी, क्या ?” उसके इस तरह से पूछने से मैं एकदम से हड़बड़ा गया था ।

“मैं यहाँ का मैनेजर हूँ सर ! क्या मैं आपकी कोई सहायता कर सकता हूँ ?” उसने आप तो बोला, पर आवाज में वह अदब अब गायब थी जो अँग्रेजी में पूछते हुए दिखाई दी थी ।

‘साला, सूट-बूट पहनकर आदमी पता नहीं अपने आपको क्या समझता है ? हिन्दी बोलने वाले को गंवार समझता है । हैं तो साला एक रेस्टोरेन्ट का नौकर ही ना ।’ मन ही मन सोचते हुए मैंने कहा, “एक्चुली आई एम लूकिंग फॉर माइ फ्रेंड । शी वाज सपोज्ड टू बी हियर एट 8.30 बट आई डोंट नो, शी इज हियर ओर नोट । सो इफ यू केन टेल मी, इफ शी इज बिहाइंड दोज कैबिन, देन आई विल बी थैंकफूल टू यू।”

“नो सर, शी इज नोट हियर ।” वह हड़बड़ा गया था ।

“आपको कैसे पता ?” इस बार मैंने मुस्कराते हुए हिन्दी में पूछा ।

“सर, क्योंकि अभी 3 कैबिन भरे हुए हैं और उनमें से किसी में भी कोई अकेली लड़की नहीं है ।”

“ओह्ह के... ।” मैं निराश हो गया था ।

“सर, आप चाहो तो उन 2 कैबिन में से किसी में भी इंतजार कर सकते हैं । जैसे ही कोई अकेली लड़की आएगी, आई विल टेल हर अबाउट यू ।” कहते हुए उसके होंठों पर जो स्माइल आई, वह मैं समझ सकता था ।
 
“नो थैंक्स ! मैं उसका बाहर जाकर इंतजार करता हूँ ।” कहते हुए मैं रेस्टोरेन्ट से बाहर आने के लिए मुड़ा । मैं रेस्टोरेन्ट का गेट खोलकर बाहर आ गया । तभी श्री मुझे सामने से आते हुए नजर आई ।

“ओह्ह सॉरी सर ! मुझे आने में थोड़ी देर हो गई ।” वह मुझे देखते ही बोली ।

“इट्स ओके !” मैंने कहा ।

“अंदर नहीं चलना क्या ? मुझे बहुत तेज भूख लग रही है ।”

“बस आपका ही इंतजार कर रहा था । चलिये ।” कहते हुए मैं उसके साथ रेस्टोरेन्ट की तरफ चलने लगा । गेट पर खड़ा दरबान मुझे देखकर मुस्कुराया और गेट खोलकर मुस्कराते हुए कहा, “वेलकम सर, वेलकम मेम ।” शायद वह अब डिनर के बाद मिलने वाली टिप की कामना कर रहा था ।

“वेलकम सर, वेलकम मेम ! प्लीज, कम दिस साइड ।” साला, वह रेस्टोरेन्ट का मैनेजर अंदर जैसे मेरा ही इंतजार कर रहा था । वह हमें उन 2 खाली केबिन में से एक केबिन की तरफ इशारा करते हुए बोला ।

अंदर कैबिन में 4 सीटर डाइनिंग टेबल लगी हुई थी । मैं और वह आमने-सामने बैठ गए ।

“आपको जब भी कुछ ऑर्डर करना हो, ये बेल दबा दीजिये, वेटर आ जाएगा ।” मैनेजर ने कहा और फिर वह वहाँ से चला गया ।

“हाँ जी, अब बताइये ! आप मेरी किस तरह से मदद कर सकती हैं ?” उसके जाने के बाद मैंने श्री से पूछा ।

“आपकी मदद ?”

‘साली, मजे लेने के मूड में आई है ।’ मन ही मन सोचते हुए मैंने कहा, “आई मीन डॉली शर्मा की मदद ।”

“आपको बहुत जल्दी है उसकी मदद करने की । पहले कुछ खाने-पीने का ऑर्डर तो कर दो यार ।”

“ठीक है, आप बताइये, आप क्या खाएँगी ?”

“खाएँगी ! ड्रिंक नहीं लोगे क्या ?”

“नहीं यार । अभी मुझे ऑफिस जाना है । नाइट शिफ्ट चल रही है । अगर आपसे मिलना नहीं होता तो मैं इस समय ऑफिस में होता, इसलिए मैं इतनी जल्दी कर रहा हूँ ।”

“ओह्ह... ! मैं तो आई ही इसलिए थी कि तुम्हारे साथ ड्रिंक करने का मौका मिलेगा । एनीवे ! चलो, ड्रिंक तुम पर उधार रही । अभी तुम वेटर को बुलाओ, तब तक मैं आइटम डिसाइड करती हूँ ।”

मैंने घंटी बजाई । थोड़ी ही देर में वहाँ पर वेटर आ गया । वह उसको ऑर्डर बताने लगी ।

‘साली, पूरे महीने का आज ही खाएगी क्या ? लग गई आज तो 45 हजार की चपत ।’ मैं उसको ऑर्डर करते हुए देखकर मन ही मन सोच रहा था ।

“आप कुछ अपनी पसंद का लेंगे ?” उसने मुझसे पूछा ।

“शुक्र है आपको मेरा ख्याल तो आया । एनीवे, आज जो आपकी पसंद वही मेरी पसंद ।” दिल में उसे हजार गालियाँ देते हुए प्रत्यक्ष में मैंने कहा ।

उसने ऑर्डर पूरा दिया । वैटर ऑर्डर लेकर चला गया ।

“जब तक खाना सर्व होता है, तब तक तो कुछ बताइये ? आखिर आप कैसे डॉली की मदद कर सकती हैं ?” मैंने पूछा ।

“हम्म, पहले मेरे एक सवाल का जवाब दो ।”

“पूछो ?”

“तुम्हें क्या वास्तव में वह बेकसूर लगती है ।”

“हम्म, मुझे लगता तो है । वैसे आप शायद भूल रही हैं, दिन में आप मेरे फ्लैट में ये जानकार ही आई थी कि मेरी नजरों में डॉली बेकसूर ही है इसलिए मैं उसकी मदद कर रहा हूँ ।”

“हम्म... मुझे याद है । मैं तो सिर्फ इसे कन्फ़र्म कर रही थी ।”

“अच्छा, अगर अब आपको यकीन हो गया हो तो बताइये, आप मुझे कौन-सी इन्फॉर्मेशन देने वाली थीं ?”

“तुम कह रहे थे कि उसे जरूर किसी ने फँसाया है ।”

“हम्म, लगता तो ऐसा ही है ।”

“मैं तुम्हें बता सकती हूँ कि ऐसा कौन कर सकता है ? उसे फँसाने के लिए जाल कौन बुन सकता है, पर... ।” उनसे अपना वाक्य अधूरा छोड़ा ।

“पर क्या ?”

“पर क्या ये इन्फॉर्मेशन फ्री में ही ले लोगे ? ये बताइये उसका नाम जानने के बदले में आप मुझे क्या देंगे ?”

“आपको डिनर तो करा रहा हूँ और आपको क्या चाहिए ?”

“इन्फॉर्मेशन के बदले डिनर, ये तो सिर्फ मिलने का बहाना था । मुझे कुछ पैसों की जरूरत है, ज्यादा नहीं सिर्फ 1 लाख रुपए ।”

“मिस, मुझे लगता है, आपको कोई गलतफहमी हुई है । मुझे डॉली की मदद से कुछ हासिल होने वाला नहीं है, जो मैं आपको दे सकूँ । मैं तो सिर्फ एक पड़ोसी के नाते उसकी हेल्प कर रहा हूँ ।”

“ओह्ह... !” उसने चेहरे पर मायूसी साफ देखी जा सकती थी ।

“मुझे तो लगा था आप उसके वकील हो, जो उसके केस की पूछताछ कर रहे हो ।”

“आपने मेरी और आपके डैड की बात सुनी थी तो आपको पता होना चाहिए था, मैं उसका वकील नहीं हूँ । अभी उसकी मदद करने वाला कोई दोस्त, या जानकार यहाँ कोई उपलब्ध नहीं था, तो मैं उससे यूं ही इंसानियत के नाते मिलने चला गया था ।”

“ओह्ह ।” उसके चेहरे पर साफ मायूसी झलक रही थी ।

“जी, और उम्मीद करता हूँ आप भी थोड़ी-बहुत इंसानियत दिखाएँगी । किसी मजबूर इंसान की मदद करना हम सबका फर्ज है । भगवान ना करे कल को आप किसी मुसीबत में फँस जाओ और कोई भी आपकी मदद के लिए आगे ना आए तो सोचिए आपको कैसा लगेगा ?”

“मैं यहाँ लेक्चर सुनने के लिए नहीं आई मिस्टर... ।” उसके चेहरे पर थोड़ा गुस्सा आ गया था ।

“मैं लेक्चर नहीं दे रहा, बल्कि मैं तो हकीकत बयान कर रहा हूँ । आदम जात को कब किसी की जरूरत पड़ जाये, ये बात तो वह ऊपर वाला भी नहीं बता सकता । खैर, अगर आप कुछ जानती है तो बताइये ।” अभी मैं आगे कुछ बोलने ही वाला था कि तभी वेटर खाना लेकर केबिन में आ गया । जब तक उसने खाना सर्व किया तब तक हम दोनों ही खामोश रहे ।

“आपको लगता है, आप उसकी मदद कर पाएँगे ?” उसके जाने के बाद उसने फिर से मुझसे सवाल किया ।

“आप फिर से बात को घुमा रही हैं । मैं उसकी मदद कर पाऊँगा या नहीं ये दूर की बात है । मैं तो बस थोड़ी बहुत कोशिश ही कर सकता हूँ । अब आप कुछ बताने आई हैं तो मेहरबानी करके वह बताइये । हो सकता है, इससे उसकी मदद हो जाए ।”

“अच्छा, पर वह अपने बचाव के लिए कोई वकील तो करेगी ?” उसने मेरी बात का जवाब दिये बगैर फिर से अपना सवाल पूछा ।

“वो तो जरूर करेगी ।”

“तो वह वकील को फीस भी जरूर देगी ?”

“वो तो देगी ही, बिना फीस दिये भी कोई काम करता है भला ? इसमें पूछने की क्या बात है ?”

“आप कर रहे हैं ना ।”

“मतलब ?”

“मतलब बिना फीस लिए आप काम कर रहे हैं ना उसके लिए ।” उसने मुस्कराते हुए कहा ।

“ओह्ह वो... ।”

“एनिवे, अगर मेरी हेल्प से डॉली को कुछ मदद मिलती है, उसके जेल से बाहर आने की वजह बनती है तो आप मुझसे डॉली से 1 लाख नहीं तो 50 हजार रुपए दिलवा सकते हैं ? आखिर महीने के वह लाखों रुपये कमा रही है तो वह इतना तो दे ही सकती है ।”

“आप अपनी दोस्त की हेल्प करने के उससे पैसे माँग रही हो ?” आश्चर्य से मेरा मुँह खुला रह गया था ।

“क्यों सर ? पैसों की जरूरत किसे नहीं है ? हो सकता है, आपको जरूरत नहीं हो । आखिर आपका भी लाखों में पैकेज होगा । पर मुझे रुपयों की सख्त जरूरत है और बिना रुपए लिए मैं कोई इन्फॉर्मेशन शेयर नहीं कर सकती । वैसे भी वह मेरी कोई इतनी अच्छी दोस्त नहीं है । एक कॉलोनी में, एक ही बिल्डिंग में रहते हैं तो सिर्फ थोड़ी बहुत वाकिफकार है ।”

“अच्छा, क्या इन्फॉर्मेशन है आपके पास ?”

“ऐसे नहीं, पहले आप मुझे उससे 50 हजार रुपए दिलवाने का वादा करें । एडवांस 10 हजार चलेगा ।”

“अगर मैं पुलिस को आपके बारे में इन्फॉर्म कर दूँ कि आप इस केस के बारे में कुछ जानती हैं तो ?”

“वैसे तो आप पुलिस को इन्फॉर्म नहीं करने वाले, पर अगर कर भी दो तो मैं साफ मुकर जाऊँगी कि मैं कुछ जानती हूँ । वैसे भी आपकी जेब से क्या जा रहा है जो आप इतना सोच रहे हैं ? आप उससे एक बार बात तो करके देखिये, क्या पता वह मान जाए ?”

“ठीक है, मैं उससे बात करके देखूँगा, क्या होता है ।”

“जरूर देखिये । आखिर इसमें फायदा उसी का है ।”

“हम्म, ठीक है ।” कहकर मैं खामोश हो गया और वह बड़ी ही बेफिक्री से उस लजीज खाने का मजा लेने लगी, जिसके भुगतान के लिए उसने बड़ी ही चालाकी से एक बकरा फांस लिया था । मन मार के मैं भी खाने लग गया था ।

‘साला, खाया-पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारा आना । साले, कहाँ तो तू रोज के 200250 रुपए बचाने के लिए ऑफिस में खाना खाता है और कहाँ आज बिना किसी मतलब के, एक अंजान लड़की की खातिर, दूसरी अंजान लड़की पर 45 हजार रुपए ऐसे ही लूटा रहा है । अगर ये पैसे तूने अपनी बीवी को ऐसे रेस्टोरेन्ट में खाना खिलाने पर खर्च किए होते तो बीवी कितनी खुश होती ।’ मेरे मन में एक पल के लिए ये ख्याल आया तो था, पर अगले ही पल वह ख्याल हवा में उड़ चुका था ।

“आप कुछ और लेंगी ?” मैंने पूछा ।

“जी नहीं, आज के लिए बहुत है । थैंक्स फॉर द डिनर ।”

मैंने बेल बजाई । बेल की आवाज सुनकर कुछ ही पलों बाद वेटर आया । मैंने बिल लाने के लिए बोला । थोड़ी देर बार वेटर एक ट्रे लेकर आया जिसमें एक तरफ दो बाउल वॉटर के थे और छोटी ट्रे में सौंफ के साथ बिल था । पानी से हाथ धोकर मैंने बिल देखा जो कि 3850 रुपये का बना था । मन मारकर मैंने अपना पर्स निकाला और 2 हजार के 2 नोट रखे और बोला, “कीप द चेंज ।”

“थैंक्स यू सर ।” वेटर ने कहा तो था पर उसके शब्दों में वह गर्मजोशी नहीं थी जो टिप मिलने पर वेटर लोगों में झलकती है ।

‘साले को 150 रुपए भी कम लग रहे हैं टिप के । अब क्या पूरा पर्स निकाल कर रख दूँ, जो साला खुश होगा ।’ मैंने मन ही मन कहा ।

“मैंने जो कहा है एक बार उसके बारे में डॉली को जरूर बता दीजिएगा ।” उसने उठते हुए कहा ।

“हम्म, मैं उससे बात करूँगा ।” मैं भी उठ गया और केबिन से बाहर आ गया ।

“हाउ वाज द फूड सर ?” अभी मैं कैबिन से बाहर आया ही था कि रेस्टोरेन्ट का मैनेजर लपककर मेरे पास आया ।

“इट वाज गुड ।”

“सर, यू केम हियर फ़र्स्ट टाइम ! प्लीज, फ़िल दिस फीडबैक फॉर्म ।” उसने एक फॉर्म आगे बढ़ाते हुए कहा ।

“अभी टाइम नहीं है ।” मैंने रुड भरे स्वर में कहा और आगे बढ़ गया, ‘साला, अब कौन-सा दुबारा यहाँ आना था मुझे ।’

गेट से बाहर निकला तो उसी दरबान ने फिर से एक जोरदार सेल्यूट मारा ।

‘साला, हर कोई भिखारी है यहाँ पर ।’ कहते हुए मैंने उसकी तरफ देखे बिना ही अपने कदम आगे बढ़ा दिये थे । पीछे से उसके कुछ बड़बड़ाने की आवाज आई । शायद टिप ना मिलने पर वह मुझे गाली दे रहा था । पर मेरे क्यों इससे क्या फर्क पड़ने वाला था ।

“लगता है आप गुस्सा हो गए हो ?” पीछे से श्री ने आते हुए कहा, तब तक मैं लिफ्ट का बटन दबा चुका था ।

“नो नॉट एट आल । मेरी ऐसी मजाल कैसे हो सकती है ?” मैं अपना गुस्सा छुपा नहीं पाया था ।

“ओह्ह सर !” वह कुछ आगे कहती उससे पहले ही लिफ्ट आ चुकी थी और उसकी बात अधूरी रह गयी थी । लिफ्ट में पहले से लोग थे इसलिए हम शांत रहे । लिफ्ट के पार्किंग स्थल तक पहुँचने तक हम में से कोई कुछ ना बोला । लिफ्ट का दरवाजा खुलते ही मैं बाहर निकला, मेरे पीछे-पीछे वह भी आ गई ।

“देखिये, मैं आपको सिर्फ एक बात बता सकती हूँ ।” उसने कहा ।

“क्या ?”

“मैं आपको ये बता सकती हूँ कि आज दोपहर 1 बजे के करीब मैंने किसी को डॉली के फ्लैट में घुसते हुए देखा था । जाते समय उसके हाथ में एक बैग था जो भरा हुआ लग रहा था । पर जब लगभग 57 मिनट बाद वह उसके फ्लैट से बाहर आया तो उसका वह बैग खाली था । ये वह वक़्त होगा जब वह सोई हुई होगी । हो सकता है वह ड्रग्स उसके कमरे में उसने ही रखी हो ?”

चलते-चलते हम वहाँ तक आ गए थे जहाँ मैंने अपनी बाइक पार्क की थी ।

“कौन था वह ?”

“उसका नाम तो मैं तब बताऊँगी, जब आप मुझे डॉली से 50 हजार रुपए दिलवा देंगे । ये बात सुनकर डॉली मुझे 50 हजार देने के लिए मना नहीं करेगी । वह तो ज्यादा भी दे सकती है, पर आप इतने ही दिलवा दीजिये, वही बहुत है ।” कहते हुए वह मुस्कुराई ।

“हम्म, ठीक है । मैं उससे कल ही बात करता हूँ । आप मुझे अपना फोन नंबर बता दीजिये ताकि मैं आपको कॉल कर सकूँ ।” थोड़ी काम की बात सुनते ही मेरे भी होंठों पर मुस्कान आ गई थी ।

“7032..... ये मेरा मोबाइल नंबर है, जब आपकी डॉली से बात हो जाए तो आप मुझे फोन कर दीजिएगा ।”

“ओके, डन ।”

“थैंक्स ! क्या आप मुझे अब कॉलोनी के गेट तक ड्रॉप कर सकते हैं ?”

“जी बैठिए ।” कहते हुए मैंने बाइक स्टार्ट की । कॉलोनी तक पहुँचने का रास्ता वैसे तो सिर्फ 5 मिनट का था, पर वह 5 मिनट का सफर मैं पूरी जिंदगी नहीं भूल सकता । 5 मिनट का सफर ऐसा था मानो कोई जन्नत का सफर हो । इस तरह से उसने डिनर का शुक्रिया अदा किया था। उसको ड्रॉप करने के पश्चात मैं अपने ऑफिस की ओर चल दिया ।

☐☐☐

“क्या बात है, तू आज डिनर के टाइम नहीं आया ?” अमित अग्निहोत्री ने पूछा । अमित अग्निहोत्री उम्र में मुझसे कोई 57 साल बड़ा था और इन्फो साइबर सोल्यूशंस में मुझसे सीनियर पोस्ट पर था । वह भी दिल्ली से था । ना सिर्फ दिल्ली से, बल्कि दिल्ली के जिस एरिया का मैं निवासी था, उसी एरिया का वह भी रहने वाला था । ना सिर्फ दिल्ली बल्कि मुंबई में भी जिस कॉलोनी में मेरा घर था, उसी कॉलोनी में 6 बिल्डिंग छोड़कर उसका फ्लैट था । इसलिए उसका मेरे साथ सीनियर जैसा नहीं बल्कि मित्र जैसा व्यवहार था । उसकी भी फैमिली आजकल दिल्ली गई हुई थी, इसलिए नाइट शिफ्ट में डिनर ऑफिस ही आकर करता था । इत्तफाक से आजकल उसकी ड्यूटी भी मेरे साथ ही नाइट शिफ्ट में थी ।
 
“वो सर, आज दिन में खाना ज्यादा खा लिया था तो भूख नहीं लग रही थी ।”

“हम्म, तेरे को कितनी बार कहा है, सर मत बोला कर; अमित कहा कर । खामखाह बुड्ढा बना देता है मुझे !” उसने हँसते हुए कहा ।

“सॉरी सर... !”

“फिर सर... ?” उसने आँखें तरेरी ।

“अगेन सॉरी सर… आई मीन अमित ।”

“हाहाहा… ।” उसने ज़ोर से ठहाका लगाया ।

“अरे ! सुना है, आज तेरी बिल्डिंग में पुलिस आई थी ।”

“हाँ, आई थी । मेरे ही फ्लोर पर आई थी ।”

“क्या हुआ ?”

“सर, मेरी साइड में जो कॉर्नर वाला फ्लैट है, उसमें रहने वाली डॉली शर्मा को गिरफ्तार करके लेके गई है ।”

“क्यों ?”

“ड्रग्स सप्लाई के इल्जाम में ।”

“ड्रग्स सप्लाई ! तेरे को कैसे पता चला ?”

“मुझे... ।” मैं हड़बड़ाया फिर बात को संभालते हुए कहा, “वो जब पुलिस उसे गिरफ्तार करके लेकर जा रही थी तो लोग आपस में कानाफूसी कर रहे थे, उसी में मैंने सुना था ।”

“अच्छा ! ये डॉली वही लड़की तो नहीं जो शाम को अक्सर अपने डॉगी को लेकर घूमती है ।”

“पता नहीं अमित जी, मैंने कभी ध्यान नहीं दिया ।” ज्यादा बोलना खतरनाक हो सकता था । फिर हम दोनों अपने-अपने काम में लग गए । रात के 11:30 बज रहे थे और ये हमारा टी टाइम था । इस समय हम कैंटीन में चाय पीने के लिए बैठे हुए थे ।

“अमित जी ! आप किसी वकील को जानते हैं क्या ?”

“क्यों, क्या हुआ ? उस लड़की को बेल दिलवानी है क्या ?” अमित ने ठहाका लगाकर पूछा ।

“अरे, नहीं-नहीं ! वह मकान चेंज करना है तो एफ़िडेविड बनवाना है । आपको बताया तो था पिछली बार जब मकान चेंज किया था तो उस साले नोटरी वाले ने एफ़िडेविड में गड़बड़ी कर दी और फिर दुबारा प्रिंट के नाम पर डबल चार्ज कर लिए थे । इस बार ऐसा कुछ नहीं हो इसलिए पूछ रहा था ।”

“अच्छा, वह कुकटपल्ली में 5 नंबर रोड पर है तो सही जानकार । तेरे को कल देता हूँ उसका नंबर ।”

“ठीक है अमित जी ।” कहते हुए मैंने अपनी बात खत्म की और चाय पीकर उठ गया ।

☐☐☐

हमेशा की तरह दोपहर 2 बजे मोबाइल में बज रहे अलार्म की आवाज से मेरी नींद खुली । पर आज 5 मिनट और सो लेता हूँ, बोलकर सोने के बजाय मैं तुरंत बिस्तर से उठ गया था । मोबाइल में देखा तो अमित अग्निहोत्री का मैसेज आया हुआ था, जिसमें नोटरी वकील का नाम और एड्रेस लिखा हुआ था । मैं तुरंत फ्रेश होने के लिए बाथरूम में घुस गया । आधे घंटे के अंदर मैं नहा-धोकर चाय पीकर डॉली से मिलने जाने के लिए तैयार कुकटपल्ली पुलिस स्टेशन के गेट के बाहर खड़ा था । गेट पर वही कल वाला कॉन्स्टेबल खड़ा था । मुझे देखते ही शायद उसने मुझे पहचान लिया था ।

“क्या काम है ?” उसने रूखे स्वर में पूछा । शायद कल वाले वाकये से वह अभी भी खफा था ।

“अरे सर, नाराज क्यों होते हो ? चलिये, आपको चाय पिलाकर आपका मूड फ्रेश करता हूँ ।” मैंने भी वक़्त की नजाकत को देखकर उसे मस्का मारते हुए कहा ।

“अरे सर, नाराजगी की कोई बात नहीं है । अभी ड्यूटी पर हूँ, आपकी चाय उधार रही ।” उसने मुस्कराते हुए कहा । शायद अपने लिए सर सुनकर उसका सीना चौड़ा हो गया था ।

“अच्छा सर, जैसी आपकी मर्जी । चाय फिर कभी सही । वैसे शिवा रेड्डी साब अंदर है ?”

“हाँ, वह अभी थोड़ी देर पहले ही बाहर से आए है । अगर बड़े साब के पास नहीं होंगे तो आपको अपनी सीट मिल जाएँगे ।”

“अच्छा, एक बात बताओ । उस लड़की से मिलने के लिए कोई आया या नहीं ?”

“हाँ, एक लड़का और एक लड़की आए तो थे मिलने के लिए ।”

“क्या नाम था ?”

“अब नाम तो याद नहीं आ रहा ।”

“दोनों एक साथ आए थे या अलग-अलग ?”

“आए तो एक साथ ही थे ।”

‘फिर तो जरूर उसकी वह फ्रेंड होगी जिसका बॉयफ्रेंड है । दूसरी वाली तो सिंगल है । उसका किसी लड़के के साथ आने का चान्स कम ही है ।’ मैं मन ही मन सोचने लगा ।

“क्या सोचने लग गए सर जी ?”

“कुछ नहीं, मैं अंदर जाकर तुम्हारे साब से मिल लेता हूँ ।” कहता हुआ मैं पुलिस स्टेशन के अंदर प्रवेश कर गया । इस बार मुझे मेरी मंजिल मालूम थी इसलिए किसी से पूछने की जरूरत पड़े बिना, मैं सीधा शिवा रेड्डी के रूम के बाहर आवाज दे रहा था ।

“मे आई कम इन सर ?”

“यस कम इन ।” अंदर से आवाज आई ।

मैं अंदर गया और सीधा उसकी टेबल के आगे खड़ा हो गया । उसने नजरे उठाकर देखा तो मुझे देखकर एक पल के लिए तो चौंक गया और फिर मुस्कराते हुए कहा, “ओह्ह, जासूस महोदय तुम ?”

“जी सर मैं, नमस्ते ।”

“नमस्ते । अरे, खड़े हो क्यों हो ? बैठो भाई ।”

“थैंक्स ।” मैंने कुर्सी पर बैठते हुए कहा ।

“हाँ, तो जासूस महोदय, कहाँ तक पहुँची तुम्हारी जासूसी ?”

“अरे सर, जासूसी कहाँ । मैं तो बस ऐसे ही थोड़ी सी... ।”

“थोड़ी-सी में ही उस बेचारे रिटायर्ड प्रोफेसर को साजिशकर्ता बता दिया । उसको ही ड्रग्स सप्लाई करने वाला बोल दिया, वह भी उसके मुँह पर ।”

“आपको कैसे पता ?” मेरे मुँह से निकला ।

“भाई, लगता है भूल गए हो । इस केस की छानबीन मैं ही कर रहा हूँ । डॉली से बात मैंने भी की थी और उसने भी वही आलाप अलापा था, जो तुमने मेरे सामने अलापा था कि किसी ने उसको फँसाने के लिए ऐसा किया है ।”

“फिर ?”

“उसी ने बताया कि उसके फ्लैट की चाबी किस-किस के पास है ? तो उन सबसे मैंने पूछताछ की थी, उसमें वह प्रोफेसर भी शामिल था ।”

“अच्छा... ।”

“जासूस महोदय, शुक्र करो कि उसने तुम पर मानहानि का दावा नहीं किया, वरना तो वह बहुत गुस्से में था ।”

‘साला, मेरे सामने तो ऐसे पेश आ रहा था जैसे बहुत सज्जन आदमी हो ।’

“अब सर, मैंने तो उससे ऐसा कुछ भी नहीं कहा था, जिससे कि वह गुस्सा हो जाए ।”

“ये तुम्हारा सोचना है, उसका सोचना कुछ और था ।”

“अच्छा, उसे छोड़िए सर ! आप ये बताए, आपने किस-किस से पूछताछ की थी ।”

“उन सभी से जिसके बारे में डॉली ने बताया था । उसकी दोनों रूममेट्स, उसका एक्स बॉयफ्रेंड, जिम इंस्ट्रक्टर और वह प्रोफेसर ।”

“तो सर, उनसे पूछताछ से कुछ पता चला, उनमें से किसने उसे फँसाया है ?”

“उनसे पूछताछ से मुझे ये पता चला है कि मिस डॉली शर्मा को किसी ने नहीं फँसाया । वह लड़की झूठ बोल रही है और वह खुद ड्रग्स सप्लाई करती है ।”

‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता । श्री ने बताया था कि कल दोपहर में डॉली के फ्लैट में कोई गया था । क्या मुझे ये बात इस इंस्पेक्टर को बतानी चाहिए ? नहीं ! ये तो वैसे ही डॉली पर भरोसा नहीं कर रहा । ऊपर से अगर इसने श्री से पूछताछ की और बाद में वह मुकर जाए तो प्रॉब्लम हो जाएगी । मुझे खुद ही कुछ करना होगा ।’

“क्या सोचने लग गए जासूस महोदय ? क्या तुम उस लड़की को अभी भी बेकसूर मान रहे हो ?”

“सर, मेरे मानने से क्या होता है ? क्या मेरे द्वारा उसे बेकसूर मान लेने से आप उसे छोड़ देंगे ?” मैंने हँसते हुए कहा ।

“ये तो तुम सही कह रहे हो ।” उसने भी हँसी में मेरा साथ दिया, “वैसे तुम्हें देखकर ये नहीं लगता कि तुम उसे गुनहगार मानते हो । तुम जरूर अपनी जासूसी से बाज नहीं आओगे और उन लोगों से पूछताछ करोगे ।”

“अब सर, फ्री बैठा हूँ तो करने में क्या हर्ज है ?”

“हर्ज तो कोई नहीं, पर तुम फालतू में अपना टाइम वेस्ट करोगे ।”

“अब सर मेरे पास तो वैसे भी अभी पूरा 1 महीना फालतू टाइम ही टाइम है । कम से कम इसी बहाने मेरा थोड़ा टाइम पास ही हो जाएगा ।”

“यार, तुम जरूर किसी मुसीबत में फँसोगे ।”

“अब सर, आपके हिसाब से उसके दोस्त शरीफ हैं तो उनसे थोड़ी पूछताछ करने में कैसी मुसीबत ? या... ।” मैंने अपनी बात रोककर कहा, “फिर आपको ये लगता है कि उनमें से भी कोई मुजरिम हो सकता है ?”

“नहीं, मुझे ऐसा कुछ नहीं लगता । मेरी अभी तक की जाँच-पड़ताल से मुझे यहीं पता चला है कि किसी ने भी उस लड़की को फँसाने की कोई कोशिश नहीं की है । उसका कोई दोस्त, कोई जानकार मुजरिम नहीं है ।”

“तो फिर क्या प्रॉब्लम है ?”

“कोई प्रॉब्लम नहीं । करो तुम अपनी जासूसी । पर अगर आगे किसी मुसीबत में फँस जाओ तो फिर किसी को दोष मत देना ।”

“ओके सर ! क्या मैं डॉली से मिल सकता हूँ ?”

“हम्म... ।” कहते हुए उसने अपने सामने लगी हुई बेल बजाई । बेल की आवाज सुनकर बाहर से कल वाला ही कॉन्स्टेबल आया ।

“सर्वानंद ! लॉकअप लो उन्ना डॉली शर्मा डग्गरी इतनिनी तीसुकु वेल्लु ।” शिवा रेड्डी ने उससे कहा ।

“थैंक यू सर !” कहते हुए मैं अपनी सीट से उठ गया था ।

“कम इन सर ।” उस कॉन्स्टेबल ने मुझसे कहा जो मुझे देखते ही पहचान गया था और जानता था, मुझे तेलुगू नहीं आती है ।

वह मुझे उसी छोटे से रूम में लेकर छोड़ गया, जहाँ पर कल मेरी डॉली से मुलाक़ात हुई थी । थोड़ी देर बाद वह डॉली शर्मा को वहाँ लेकर हाजिर हुआ । इस दौरान मेरी वाइफ़ का फोन आया था और मैंने सोने का बहाना करके फोन रख दिया था ।

“हाय डॉली !” उसे देखते ही मैंने कहा ।

“हैलो !” उसने जवाब दिया ।

“बैठो ।” मैंने उसे एक कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा और खुद दूसरी कुर्सी पर बैठ गया ।

“कैसी हो ?” उसके बैठने के बाद मैंने सवाल किया ।

“हवालात में कोई कैसा रह सकता है राज जी ? चिंता के मारे मैं सारी रात सो नहीं पाई ।”

“मैं समझ सकता हूँ । पर यूं चिंता करने से क्या होगा ? तुम हिम्मत रखो और मुझ पर भरोसा रखो ।”

“बस राज जी, अब तो आप पर ही भरोसा है ।”

“मैंने तुम्हारे लिए वकील देखा है । आज उससे बात करूँगा ।”

“कौन है ?” उसने मुझसे पूछा । मैंने बताया ।

“पर राज जी, वह तो जनरल नोटरी पब्लिक वकील है । वह मेरी मदद नहीं कर पाएगा । आप ऐसा करिए, पंजागुट्टा में रोड नंबर 5 पर एस॰ रामानुजन का ऑफिस है । आप उनसे मिल लीजिये । अच्छे क्रिमिनल लॉयर हैं । वह अगर मेरा केस लड़ेंगे तो जरूर मुझे बेकसूर साबित करा देंगे ।”

“पर कल तो तुम बता रही थी कि तुम्हें किसी वकील के बारे में नहीं पता ।”

“पहले नहीं मालूम था, पर यहाँ हवालात में जो कॉन्स्टेबल है, कल शाम को उसने मुझे उसके बारे में बताया था । उसी ने कहा था कि आप पैसे वाली हो, वह आपका केस लड़कर आपको यहाँ से बाहर निकाल सकता है ।”

“अच्छा ! जैसा तुम कहो । मुझे इसका ज्यादा आइडिया नहीं था ।”

“आपका बहुत एहसान होगा मुझ पर । उसकी जो भी फीस होगी, मैं पे कर दूँगी ।”

“ठीक है । अरे हाँ, फीस से याद आया, तुम श्री कुट्टी को जानती हो ?”

“श्री कुट्टी वह मिस्टर रामनाथन जी की बेटी । हाँ जानती हूँ, एक बिल्डिंग में रहते हैं तो थोड़ी-बहुत जान-पहचान है । कभी-कभी किसी पार्टी में हम साथ चले जाते हैं ।”

“हाँ वही । उसका दावा है कि वह आपको बेकसूर साबित कर सकती है । वह जानती है कि आपके घर में ड्रग्स छुपाने में किसका हाथ हो सकता है ?”

“कैसे ?”

श्री ने जो कुछ मुझे बताया था, वह मैंने डॉली को बता दिया । सारी बात सुनने के बाद उसने कहा, “ये तो मेरे लिए बहुत फायदे की बात है । ये मेरी बेगुनाही का बहुत बड़ा सबूत होगा । मैं उसे 50 हजार देने के लिए तैयार हूँ । आप प्लीज, उससे उस आदमी का नाम पूछिएगा ।”

“ठीक है, मैं आज ही उससे बात करूँगा ।”

“थैंक यू राज जी ।”

“अच्छा डॉली, तुमसे एक बात पूछनी थी, सच-सच जवाब देना ।”

“जी, पूछिये ।”

“कल दोपहर में तुम इतनी गहरी नींद में सो रही थी कि तुम्हारी हाजरी में कोई तुम्हारे फ्लैट का दरवाजा खोलकर आया, तुम्हारे कमरे में घुसा, तुम्हारे बैग में ड्रग्स के भरे पैकेट रखे और तुम्हें कानों कान खबर भी नहीं हुआ । ऐसा कैसे हो सकता है ?”
 
Back
Top