S
StoryPublisher
Guest
“राज जी, सच कहूँ तो मैं उस समय गहरे नशे में थी । आप गलत मत समझिए, पर मैं कभी-कभार ड्रग्स लेती हूँ । परसो रात को एक रेव पार्टी थी, जिसमें मैंने कुछ ज्यादा ही ड्रग्स ले ली थी, जिसकी वजह से मैं कल दोपहर देर तक सोती रही । पुलिस के आने तक मैं ड्रग्स के नशे की हालत में ही थी ।”
“ओह्ह... !” मैंने कहा ।
“राज जी, मैं कभी-कभी ड्रग्स लेती हूँ, इसका ये मतलब नहीं कि मैं ड्रग्स सप्लाई भी करती हूँ । मुझे गलत इल्जाम में फँसाया गया है ।” कहते-कहते वह रो पड़ी ।
“हम्म, कोई ना । तुम ये बताओ, कौन-कौन था तुम्हारे साथ पार्टी में ?”
“सभी थे । मेरी रूममेट्स, मेरा एक्सबॉयफ्रेंड, उदय, श्री... ।”
“श्री भी थी ?” मैंने आश्चर्य से पूछा ।
“हाँ ।”
“अच्छा, तुम गिरफ्तार हुई, तुम्हारा कोई फ़्रेंड मिलने नहीं आया तुमसे ?”
“आए थे । अभी 1 घंटा पहले राजीव, अंजलि और संध्या तीनों मिलकर गए थे ।”
“उदय भट्ट नहीं आए ?”
“नहीं राज जी ! शायद उनको पता नहीं होगा कि मैं गिरफ्तार हुई हूँ ।”
‘साल, पूरी दुनिया को पता है, बस उसे ही नहीं पता ।’
“तुम्हें अपने किसी फ्रेंड पर शक है ?”
“नहीं ।”
“ऐसे नहीं, थोड़ा-सा सोचकर बताओ । इनमें से तुम्हें कौन फँसाने की साजिश रच सकता है ? ये तो कन्फ़र्म है कि वह तुम्हारे इन्हीं फ़्रेंड्स में से कोई है ।”
“अब राज जी, वह मुझे नहीं पता । मैं इतना जानती हूँ कि मैं बेकसूर हूँ बस । वैसे आपने बताया था ना कि श्री ने कल दोपहर को किसी को मेरे फ्लैट में घुसते हुए देखा था । आप उससे पूछिए । हो सकता है मेरे कमरे में ड्रग्स उसी ने रखी हों ।”
“वो तो खैर मैं पूछूँगा ही । फिर भी तुम भी तो थोड़ी मदद करो ।”
“आपका मुलाक़ात का टाइम खत्म हो गया है ।” तभी दरवाजा खोलते हुए कॉन्स्टेबल अंदर आया ।
“बस 2 मिनट ।” मैंने उस कॉन्स्टेबल से कहा और डॉली से बोला, “ तुम बिलकुल भी चिंता मत करो । मैं तुम्हारे बताए वकील से मिलकर बात करता हूँ । और जैसा कि तुमने कहा, वह एक अच्छा वकील है तो उम्मीद है कल ही तुम्हें जमानत मिल जाए ।”
“थैंक यू राज जी ।”
“अच्छा डॉली, तुम्हारे फ्रेंडस के मोबाइल नंबर देना । आज संडे है तो उम्मीद है उनसे मुलाक़ात हो जाए । कल से तो वह शायद ऑफिस चले जाएँगे तो बात नहीं हो पाएगी, इसलिए आज ही बात कर लेता हूँ । शायद उनसे बात करने पर ऐसा कुछ हाथ आए जो तुम्हारे वकील को तुम्हें जमानत दिलाने में हेल्प कर सके ।”
“राज जी, नंबर तो याद नहीं है । आप बाहर इंस्पेक्टर से मिलकर मेरे सामान में से मेरा मोबाइल है उसे ले लीजिये । उसमें सबका नंबर सेव है । आप इंस्पेक्टर से मेरे 2 क्रेडिट कार्ड भी ले लीजिएगा । उनका पिन 0009 है । आपको वकील की फीस भी देनी है और दूसरे खर्चे भी आप कर रहे हैं । वह मुझे पता नहीं था कि कल आपको रेस्टोरेन्ट में श्री के ऊपर खर्च करना पड़ जाएगा, नहीं तो मैं कल ही आपको दे देती ।”
“वो कोई बात नहीं । वैसे भी वहाँ खाना तो मैंने भी खाया था ।” मैंने मुस्कराते हुए कहा ।
“फिर भी मुझे अच्छा नहीं लगेगा कि मेरी वजह से आपका खर्चा हो रहा है । आगे भी ना जाने कितना खर्च होगा ?”
“ठीक है, मैं क्रेडिट कार्ड ले लेता हूँ । बाय ।” कहता हुआ मैं वहाँ से निकल आया ।
☐☐☐
मैं अपनी बिल्डिंग की लिफ्ट में था । पुलिस स्टेशन से निकलने से पहले मैं इंस्पेक्टर शिवा रेड्डी से डॉली के क्रेडिट कार्ड और उसका मोबाइल फोन लेकर आया था । क्रेडिट कार्ड और मोबाइल देने से पहले उसने डॉली से उसके बारे में पूछा था । पुलिस स्टेशन से निकलते ही मैंने सबसे पहले डॉली की फ्रेंड अंजलि को फोन मिलाया । मालूम हुआ कि वह राजीव के साथ पीवीआर में मूवी देखने गई हुई थी और मूवी से फ्री होकर वह मिलने के लिए फोन करेगी ।
‘साला, फ्रेंड पुलिस की गिरफ्त में है और ये बॉयफ्रेंड के साथ मजे ले रही है । कैसी लड़की थी अंजलि और कैसा था उसका फ्रेंड राजीव ?’ अपनी बिल्डिंग की लिफ्ट से निकलते हुए भी मेरा दिमाग यहीं सोच रहा था । लिफ्ट से निकलकर मैं अपने फ्लैट में जा रहा था कि मुझे डॉली के फ्लैट का मेन गेट खुला नजर आया ।
‘जरूर ये संध्या होगी, अंजलि तो मूवी गई हुई है । चलो, आज की शुरुआत इसी से करते हैं ।’ सोचते हुए मैं उसके फ्लैट की तरफ गया । दरवाजा खुला हुआ था, पर फिलहाल उस पर पर्दा लगा हुआ था । मैंने थोड़ा पर्दा हटाकर देखा । सामने हॉल में पीछे की तरफ डाइनिंग टेबल नजर आई, पर किसी के दर्शन नहीं हुए । मैं पर्दा हटाकर अंदर जाने ही वाला था, फिर मैंने अपना इरादा बदल दिया ।
‘यार, अभी तेरे को इस घर की चाबी हासिल नहीं हुई है । शरीफ बच्चे की तरह डोरबेल बजाकर अंदर जा ।” सोचते हुए मैंने डोरबेल बजा दी । थोड़ी देर बाद एक लड़की ने दरवाजा खोला ।
“यस । किससे मिलना है ?” उसने मुझसे सवाल किया । लगा जैसे भैंस भर्राई हो ।
मैंने एक नजर उस पर दौड़ाई । वह डॉली की ही उम्र की, मगर गेहुँए रंग की, थोड़े छोटे कद की, बहुत ही मोटी लड़की थी जो दिखने में कोई खास नहीं थी । आँखों पर उसने मोटे फ्रेम का चश्मा लगा रहा था । घर में रहने के बावजूद उसने बहुत ज्यादा मेकअप कर रखा था और अपने आपको खूबसूरत दिखाने की नाकाम कोशिश कर रही थी ।
‘ये भैंस जैसी लड़की संध्या ही है ।’ मन ही मन सोचते हुए मैंने जवाब दिया, “जी मेरा नाम राज है । मैं आपका पड़ोसी हूँ । वह दो फ्लैट छोड़कर मेरा फ्लैट है ।”
“तो मैं क्या करूँ ?” उसने कहा ।
‘साली ! बड़ी खड़ूस है ।’
“जी, मैं आपकी फ्रेंड डॉली का फ्रेंड हूँ ।”
“डॉली का फ्रेंड !” उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे ।
“क्यों, लगता नहीं हूँ क्या ?” मैंने मुस्कराते हुए कहा ।
“नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है । बस पहले कभी आपको उसके साथ नहीं देखा ।” कहते हुए इस बार वह भी मुसकुराई ।
“कैसे देखेंगी ? अभी हाल ही में मेरी और उसकी दोस्ती हुई है ।”
“ओह्ह... ।”
“आप सारी पूछताछ यहीं गेट पर ही करेंगी ?”
“ओह्ह सॉरी ! प्लीज, कम इन... ।” कहते हुए उसने गेट खोल दिया । मैं अंदर गया । कॉलोनी के सभी टावर में बने हुए फ्लैट एक ही शेप के थे, चाहे जिस भी फ्लोर पर जाए । अंदर घुसते ही एक बड़ा-सा हॉल, हॉल से लगते हुए लेफ्ट में एक छोटा कमरा, फिर कॉमन बाथरूम । उससे लगती हुई रसोई, सामने की तरफ बालकनी थी, जिस पर इस समय पर्दा लगा हुआ था । हॉल के दायी तरफ मास्टर बेडरूम और उसके बगल में दूसरा कमरा । बस अंदर का इंटीरियर सबने अपने हिसाब से कर रखा था । मास्टर बेडरूम में घुसते ही नजर आ गया था जिसके डोर पर सील लगी हुई थी । हॉल काफी बड़ा था जिसके एक कोने में कुछ जिम का सामान भी रखा हुआ था, जिसमें एक ट्रेडमिल भी थी ।
“बैठिए ।” उसने सोफ़े की तरफ इशारा करते हुए कहा ।
“वो मास्टर बेडरूम... वो डॉली का ही है ।” मैंने बैठते हुए पूछा ।
“हाँ, उसी का है ।” कहते हुए उसके चेहरे पर थोड़े गुस्से के भाव आए, पर तुरंत ही वह वापस नॉर्मल हो गई ।
“आपका रूम कौन-सा है ?”
“ये सामने वाला ।” उसने बाई तरफ वाले छोटे रूम की तरफ इशारा करते हुए कहा, जिसका दरवाजा खुला हुआ था । बाहर से कमरे के अंदर जितनी नजर जा सकती थी, उतना मैंने उसका नजारा किया । वह एक साफ़-सुथरा और सजा हुआ कमरा लग रहा था ।
“ये बगल वाला कमरा शायद आपकी फ्रेंड अंजलि का है ?” मैंने पूछा ।
“हाँ ! वह अभी बाहर गई हुई है ।”
“ओके... !” कहकर मैं थोड़ी देर के लिए रुका और फिर अपनी बात आगे बढ़ाई, “बुरा ना माने तो एक बात पूछ सकता हूँ ?”
“जी, पूछिये ।”
“डॉली के रूम की तरफ इशारा करते समय आप थोड़ी देर के लिए गुस्सा हो गई थीं । क्या मैं गलत कह रहा हूँ ?”
“नहीं ! आप सही कह रहे हैं ।”
“पर मैं आपके गुस्से का कारण नहीं समझ पाया । आखिर आपको गुस्सा क्यों आया था ?”
“क्यों नहीं आएगा गुस्सा ? जी तो इतना चाहा था कि उसे जान से मार दूँ । हर कोई चाहता है कि मास्टर बेडरूम उसको मिले, बड़े रूम पर उसका हक हो । वह मेरे बाद इस फ्लैट में आई थी, फिर भी उसने बड़े रूम पर कब्जा जमा लिया, जबकि उसे मैं लेना चाहती थी ।”
“मैं समझा नहीं ।”
“पहले उस रूम में हमारी कोई और रूम मेट थी । मैं और अंजलि अभी वाले रूम में ही थे । जब पुरानी वाली रूममेट जाने वाली थी तो मेरी उससे बात हो गई थी कि वह अपना रूम मुझे देकर जाएगी । हमने मकान मालिक को भी बोल दिया था । पर ना जाने क्यों वह और मकान मालिक ने बाद में वह रूम उस डॉली को दे दिया ।”
“तो इसमें कौन-सी बड़ी बात है ? आप रूम दूसरी जगह भी तो किराये पर ले सकती थी ।” मैंने पूछा ।
“आप सही कह रहे हैं । पर इस सोसाइटी में फ्लैट मिलना और उसमें भी एक रूम मिलना बहुत ही मुश्किल है । एक फ्लैट खाली होता नहीं है उससे पहले ही वह बुक हो जाता है । यहाँ से ऑफिस जाना भी बहुत आसान पड़ता है । आसपास मॉल भी है । कहीं और फ्लैट लेने पर वह सुविधाएँ नहीं मिल पाती, जो यहाँ मिलती हैं ।”
‘कह तो ये ठीक रही है । मुझे भी फ्लैट मिलने में बहुत मुश्किल पेश आई थी और जितना एचआरए मुझे मिल रहा था, उससे डबल रकम मुझे यहाँ किराये के रूप में देनी पड़ रही थी, इसके बावजूद मैं वहाँ रह रहा था ।’
“हम्म, मैं समझ सकता हूँ । पर अगर वह बड़े रूम में रह रही है तो जाहिर-सी बात है वह किराया भी ज्यादा दे रही होगी ।” प्रत्यक्ष में मैंने कहा ।
“2000 ही तो ज्यादा दे रही है । कौन-सा एहसान कर रही है ? बाकी सब कामों में तो बराबर खर्चा होता है ना । सफाई का, बिजली का, मैनटेनेंस का ।”
“हम्म, वह तो है ।” मैंने कहा ।
“वैसे आप बुरा ना माने तो अब मैं आपसे एक सवाल पूछूँ ?” उसने कहा ।
“क्या ?” मैं हड़बड़ाया ।
“आप ये सब तो पूछने के लिए आए नहीं होंगे । आपको काम क्या है, वह बताए ?”
“जी, आपको को पता ही है कि आपकी फ्रेंड को पुलिस ने गिरफ्तार किया है । उसी सिलसिले में आपसे कुछ जानकारी चाहिए थी ।”
“आपको जानकारी चाहिए, पर क्यों ?”
“वेल, वह अपने आपको बेकसूर बता रही है और पुलिस उसकी बात पर बिलकुल भी विश्वास नहीं कर रही है, तो बस मैं उसको बेकसूर साबित करने की थोड़ी कोशिश कर रहा हूँ ।”
“क्या आप उसके वकील है ?”
“अरे, नहीं-नहीं... ।”
“तो फिर जरूर डिटेक्टिव होंगे, जैसे फिल्मों में दिखाते हैं । जो एक खूबसूरत लड़की को बचाने निकला है ।” उसने मज़ाक उड़ाते हुए कहा ।
“जी, आपने सही कहा । मैं एक डिटेक्टिव ही हूँ ।” मैंने मुस्कराते हुए कहा ।
“क्या ?” उसका चेहरा हक्का-बक्का था ।
‘साला, ऐसे तो कोई सीरियस ही नहीं लेता जब तक अपने आपको शो ऑफ ना करो ।’ मन ही मन सोचते हुए मैंने कहा, “जी, आपको कोई शक है क्या ? अब ये मत बोलना कि आपने तो फिल्मों में 6 फीट लंबे कसरती बदन वाले, सड़कों पर अंधाधुंध बाइक चलाने वाले, 5050 गुंडों से एक साथ भिड़ जाने वाले डिटेक्टिव देखे हैं । वह सब फिल्मों में ही होता है । असली ज़िंदगी में डिटेक्टिव मेरे जैसा ही होता है । नॉर्मल दिखने वाला, जो इधर-उधर खोजबीन करके ही सबूत तलाश करता है ।”
“ओह्ह... ।” उसने एक गहरी साँस लेकर कहा ।
“जी ।” मैं मुस्कुराया ।
“तो आप उसको मुजरिम साबित होने से बचाने के लिए निकले हैं ?”
“जी, कोशिश तो पूरी रहेगी और मैं ऐसा कर भी पाऊँगा । अगर आप थोड़ा-सा सहयोग करे तो... ।” बोलते समय मैंने अपना हाव-भाव और विश्वास वैसा ही कर रखा था जैसा कि विक्रांत का होता है ।
“कहिए, मैं आपकी क्या मदद कर सकती हूँ इसमें ?”
“पहले तो आप ये बताए, आपको तो अपनी सहेली की बेगुनाही पर यकीन है ना ।”
“कह नहीं सकती ।”
“कह नहीं सकती, मतलब ?”
“मतलब ये कि वह गुनहगार भी हो सकती है और बेकसूर भी ।”
“मतलब आप कहना चाहती है कि वह ड्रग्स सप्लाई के धंधे में है ?”
“मैंने है नहीं कहा, मैंने कहा हो भी सकती है ?”
“मतलब आपको पूरी तरह से उसकी बेगुनाही पर यकीन नहीं है । क्या आपको उसे देखकर ऐसा लगता है कि वह ड्रग्स सप्लाई कर सकती है ?”
“अब किसी के चेहरे पर थोड़े ही लिखा होता है कि वह क्या है ?”
“पर वह तो आपके साथ इतने समय से यहीं एक छत के नीचे रह रही है, फिर भी आप उस पर संदेह कर रही हैं ।”
“एक छत के नीचे रहते हैं, पर 24 घंटे साथ नहीं रहते । अब बाकी समय में वह क्या करती है, मैं कैसे कह सकती हूँ ?”
“पर वह तो एक आईटी कंपनी में अच्छे-खासे पैकेज पर काम करती है । उसके परिवार में उसका कोई और है भी नहीं, फिर उसे क्या जरूरत है ये सब करने की ?”
“ज्यादा पैसा किसे अच्छा नहीं लगता मिस्टर । और सुना है ड्रग्स के पैसे में तो अच्छी-खासी कमाई होती है ।”
“कभी तुमने उसके पास ड्रग्स देखी है ?”
“कई बार देखी है ।”
“इतनी ज्यादा, जितनी कल उसके पास बरामद हुई है ?”
“नहीं, इतनी ज्यादा तो नहीं ।”
“तो कितनी देखी ?”
“कभी 1 पुड़ी, कभी 2 पुड़ी ।”
“इतनी तो उसके पास इसलिए होती होगी क्योंकि वह ड्रग्स लेती है और इस बात को उसने स्वीकार भी किया है । वैसे इतनी ड्रग्स तो आपके पास भी रहती होगी मिस संध्या ।”
“क्या मतलब है आपका ?”
“मतलब ये कि ड्रग्स का सेवन तो आप भी करती हैं मिस संध्या ।”
“ये आपको किसने कहा ?” वह थोड़ा गुस्से में बोली ।
“मिस संध्या, ये जानना कौन-सी बड़ी बात है ? ये तो डॉली ने बताया मुझे । मानता हूँ ड्रग्स लेना बुरी बात है, पर ये उतना बड़ा गुनाह नहीं है, जितना की ड्रग्स सप्लाई करना और जिस इल्जाम में आपकी फ्रेंड गिरफ्तार है । उसने ही बताया कि वह कभी-कभी ड्रग्स लेती है और आप भी लेती हैं । आप भी परसो उस पार्टी में ड्रग्स ले रही थीं जिसमें डॉली ने ली थी । जाहिर-सी बात है, ड्रग्स की 12 पुड़िया तो आपके पास भी मिल जाएगी, अभी भी... ।” मैं उसके चेहरे के भावों को पढ़ता हुआ आगे बोला, “इसका मतलब ये तो नहीं कि आप भी ड्रग्स सप्लाई करती हैं ?”
“हाँ, शायद आप ठीक कह रहे हैं । पर ये तो आपको भी पता है, उसके रूम से ड्रग्स की 12 पुड़ी नहीं बल्कि पूरी 100 पुड़िया बरामद हुई हैं जो एक ड्रग्स यूज करने वाले के पास नहीं होती है ।”
“हाँ, ये पता है । पर डॉली का कहना है कि वह उसकी नहीं है, उसे फँसाया गया है ।”
“पर ऐसा भला कौन करेगा ?”
“करने को तो कोई भी कर सकता है । आप भी ?”
“मैं ! मेरे पास इतनी ड्रग्स कहाँ से आएगी ?”
“वहीं से, जहाँ से डॉली के पास आई होगी ।”
“क्या मतलब है आपका ?”
“मतलब ये मिस संध्या कि जिस प्रकार आपके हिसाब से डॉली ड्रग्स की 100 पुड़ियों का इंतजाम कर सकती है तो मेरे हिसाब से ये इंतजाम तो आप भी कर सकती हैं ।”
“वॉट नॉनसेन्स । मैं एक अच्छे खानदान की अच्छी जॉब करने वाली लड़की हूँ । मुझे पैसों के लिए ड्रग्स सप्लाई करने की कोई जरूरत नहीं है ।”
“आप ठीक कह रही है । आपको पैसों के लिए ड्रग्स सप्लाई करने की कोई जरूरत नहीं है । पर पहली बात आपकी यहीं बात डॉली पर भी लागू होती है । वह अभी सिर्फ 22 साल की है और 22 लाख का उसका सैलरी पैकेज है, यानी 2 लाख रुपए महीने में कुछ ही कम है । और उसके परिवार में उसके अलावा कोई और भी नहीं है । इतने पैसों में वह अकेली फुल ऐश कर सकती है । फिर उसे पैसों के लिए ड्रग्स सप्लाई जैसे खतरनाक काम को हाथ में लेने की क्या जरूरत है ? और दूसरी बात अभी थोड़ी देर पहले आपने ही कहा था कि ज्यादा पैसा किसे अच्छा नहीं लगता ?”
“कह तो आप सही रहे हैं । पर उसे फँसाने की कोशिश कौन कर सकता है ? आखिर किसी से उसकी क्या दुश्मनी है ?”
“कोई भी कर सकता है । आप भी ?”
“मैं ? मैं भला ऐसा क्यों करूँगी ?”
“क्यों, थोड़ी देर पहले तो आपने खुद ही तो कहा था कि आपको उस पर इतना गुस्सा आया था कि उसे जान से मार दूँ ।”
“वो तो मैंने यूँ ही गुस्से में बोल दिया था, पर इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं ऐसा करूँगी । भला इतनी छोटी-सी बात के लिए भी कोई इतना बड़ा कदम उठाता है ।”
“छोटी-सी बात ! मैडम, लोग तो इससे भी छोटी बात के लिये कत्ल तक कर देते हैं । न्यूज नहीं पढ़ती क्या आप ? लोग 10 रुपए जैसी हक़ीर-सी रकम के बदले एक-दूसरे की जान ले लेते हैं । एक बार एक आदमी ने अपने दोस्त को मज़ाक में कुत्ता बोल दिया था, उस बात का बदला उसने अपने दोस्त को कुत्ते की मौत मार के लिया । सड़क पर गाड़ी छू जाने पर, गाली देने पर जैसी कई तुच्छ बातों पर जान लेना कोई बड़ी बात नहीं है । आपका गुस्सा तो इनसे कहीं बड़ी बात पर था ।”
“ओह्ह शटअप ! मैंने ऐसा कुछ नहीं किया ।”
“कल दोपहर को आप कहाँ थीं जब पुलिस ने डॉली को गिरफ्तार किया था ।”
“कल दोपहर मैं शॉपिंग के लिए हाइपर सिटी गई थी ।”
“कितने बजे ?”
“मैं लगभग 11 बजे यहाँ से गई थी और 22.30 बजे आई थी ।”
“शॉपिंग के लिए इतना टाइम लगता है क्या ? हाइपर सिटी ज्यादा दूर भी नहीं है । महीने भर की शॉपिंग में भी 1 घंटे से ज्यादा समय तो नहीं लगता ।”
“मिस्टर, जब कोई मॉल जाता है तो सिर्फ शॉपिंग के लिए ही नहीं जाता । वह वहाँ घूमता भी है, विंडो शॉपिंग भी करता है, आइसक्रीम भी खाता है, जूस भी पीता है । कहने को वह शॉपिंग के अलावा 10 दूसरे काम भी करता है, जिसमें टाइम लगता है ।”
“अच्छा, पर मिस संध्या ये सब दोपहर में कौन करता है ? आई मीन, अभी मई चल रहा है, भयंकर धूप और गर्मी में शॉपिंग, वह भी 34 घंटे तक, कुछ अजीब नहीं है ।”
“मिस्टर, लगता है आप मंगल गृह से आए हैं, जो इतना भी नहीं जानते कि मॉल में एसी चलता है जिसमें आपको नाममात्र की भी गर्मी का एहसास नहीं होता । आप सीधा बोलो ना कि आप डॉली को फँसाने के मामले में इनडाइरैक्ट मुझ पर शक कर रहे हैं । आपकी जानकारी के लिए बता दूँ, मैं हर महीने के पहले शनिवार को दोपहर के टाइम ही अपनी शॉपिंग करती हूँ । इसलिए मेरी बात सुनो और समझो । मैंने पहले भी बताया था और अब भी बता रही हूँ कि मैंने उसको फँसाने का काम नहीं किया और ना ही मुझे ऐसी कोई जरूरत थी ।”
“चलो, मान लेता हूँ, आपने ऐसा कुछ नहीं किया । पर क्या आप बता सकती हैं, ऐसा कौन कर सकता है ?”
“मैं कुछ कह नहीं सकती ।”
“माना आप कुछ कह नहीं सकती, फिर भी अपने दिमाग पर ज़ोर डालकर कुछ तो बताइये । उसकी किसी से दुश्मनी हो और उसने इस काम को अंजाम दिया हो ।”
“ये तो डॉली ही बता सकती है कि उसके किसके साथ दुश्मनी है ?”
“डॉली के हिसाब से उसका कोई दुश्मन नहीं है । वैसे कई बार इंसान को खुद को भी पता नहीं होता कि उसका दुश्मन कौन है ? वैसे जिसको ये पता नहीं होता उसका दुश्मन कौन है, उसका दुश्मन अक्सर उसका कोई दोस्त ही निकलता है । तो डॉली के केस में भी शायद ऐसा ही हो ।”
“आप अभी भी अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहे । खाली-पीली घूम-फिर कर फिर से मुझ पर इल्जाम लगा रहे हैं ।”
“अरे, नहीं-नहीं । आपने ऐसा क्यों सोचा ? आप अकेली ही तो डॉली की फ्रेंड नहीं हैं ना । उसके और भी फ्रेंड हैं आपकी तरह ।”
“तो आप कहना चाहते हैं कि उसको फँसाने में उसके किसी फ्रेंड का हाथ है ।”
“हो सकता है ।”
“पर मुझे नहीं लगता उसके किसी फ्रेंड ने ऐसा किया होगा ।”
“हो सकता है किया हो । आप ये बताइये, उसकी कभी किसी फ्रेंड से या किसी और से कभी कोई लड़ाई हुई हो ।”
“नहीं, मेरी जानकारी में तो कोई नहीं है ।”
“हम्म ।” कहता हुआ मैं सोच में डूब गया । फिर थोड़ी देर बाद मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई, “अच्छा, परसो रात को आप भी थी ना पार्टी में ?”
“हाँ !”
“ये पार्टी कहाँ पर हुई थी ?”
“डॉली ने नहीं बताया ?”
“मैं उससे पूछना भूल गया । आप बता दीजिये, क्या फर्क पड़ता है ?”
“पंजागुट्टा में रात के मुसाफिर नाम से बार कम रेस्टोरेन्ट है, वहीं पर हुई थी ।”
रात के मुसाफिर बार का नाम मैंने सुन रखा था । मेरे ऑफिस में से 23 नौजवान कलीग अक्सर वहाँ लेट नाइट डिस्को जाते थे । पर ये खबर मेरे लिए बिलकुल नई थी कि वहाँ पर रेव पार्टी भी होती है, जहाँ पर ड्रग्स भी सप्लाई की जाती थी ।
“वहाँ ऐसी पार्टी रोज होती है क्या ?”
“अब ये मुझे नहीं पता, क्योंकि मैं हर पार्टी का हिस्सा नहीं होती ।”
“तो क्या डॉली होती है ?”
“वो भी मुझे नहीं पता । वैसे हम साथ ही हर पार्टी में जाते हैं, पर कभी-कभी मेरी नाइट शिफ्ट होती है, तब वह उस समय जाती है या नहीं, इसका मुझे नहीं पता ।”
“अच्छा, तुम महीने में कितनी बार अटेण्ड करती हो पार्टी ?”
“कभी-कभी । मुश्किल से 12 बार, पिछले 6 महीनों में ऐसा मौका एक बार ही आया है जब मैं 3 बार गई हूँ ।”
“तो महीने में 12 बार ड्रग्स लेने से तुम्हारा काम चल जाता है क्या ? मैंने तो सुना है कि जो एक बार ड्रग्स ले लेता है, उसे ड्रग्स रोज चाहिए होता है ।”
“रोज तो नहीं चाहिए होता । मैं हफ्ते में 3 बार लेती हूँ । बहुत महंगा आता है, एक डोज़ 2000 रुपए की होती है । अब रोज नशे के लिए 2000 रुपए खर्च करना बहुत ही मुश्किल है । हाँ, जिसको पूरी तरह से लत लग जाती है, उन्हें रोज चाहिए होता है । अब वह लोग रईस लोग होते हैं, जो 1 क्या 24 खुराक रोज खरीदने की क्षमता रखते हैं ।”
“ओह्ह... !” मैंने कहा ।
“राज जी, मैं कभी-कभी ड्रग्स लेती हूँ, इसका ये मतलब नहीं कि मैं ड्रग्स सप्लाई भी करती हूँ । मुझे गलत इल्जाम में फँसाया गया है ।” कहते-कहते वह रो पड़ी ।
“हम्म, कोई ना । तुम ये बताओ, कौन-कौन था तुम्हारे साथ पार्टी में ?”
“सभी थे । मेरी रूममेट्स, मेरा एक्सबॉयफ्रेंड, उदय, श्री... ।”
“श्री भी थी ?” मैंने आश्चर्य से पूछा ।
“हाँ ।”
“अच्छा, तुम गिरफ्तार हुई, तुम्हारा कोई फ़्रेंड मिलने नहीं आया तुमसे ?”
“आए थे । अभी 1 घंटा पहले राजीव, अंजलि और संध्या तीनों मिलकर गए थे ।”
“उदय भट्ट नहीं आए ?”
“नहीं राज जी ! शायद उनको पता नहीं होगा कि मैं गिरफ्तार हुई हूँ ।”
‘साल, पूरी दुनिया को पता है, बस उसे ही नहीं पता ।’
“तुम्हें अपने किसी फ्रेंड पर शक है ?”
“नहीं ।”
“ऐसे नहीं, थोड़ा-सा सोचकर बताओ । इनमें से तुम्हें कौन फँसाने की साजिश रच सकता है ? ये तो कन्फ़र्म है कि वह तुम्हारे इन्हीं फ़्रेंड्स में से कोई है ।”
“अब राज जी, वह मुझे नहीं पता । मैं इतना जानती हूँ कि मैं बेकसूर हूँ बस । वैसे आपने बताया था ना कि श्री ने कल दोपहर को किसी को मेरे फ्लैट में घुसते हुए देखा था । आप उससे पूछिए । हो सकता है मेरे कमरे में ड्रग्स उसी ने रखी हों ।”
“वो तो खैर मैं पूछूँगा ही । फिर भी तुम भी तो थोड़ी मदद करो ।”
“आपका मुलाक़ात का टाइम खत्म हो गया है ।” तभी दरवाजा खोलते हुए कॉन्स्टेबल अंदर आया ।
“बस 2 मिनट ।” मैंने उस कॉन्स्टेबल से कहा और डॉली से बोला, “ तुम बिलकुल भी चिंता मत करो । मैं तुम्हारे बताए वकील से मिलकर बात करता हूँ । और जैसा कि तुमने कहा, वह एक अच्छा वकील है तो उम्मीद है कल ही तुम्हें जमानत मिल जाए ।”
“थैंक यू राज जी ।”
“अच्छा डॉली, तुम्हारे फ्रेंडस के मोबाइल नंबर देना । आज संडे है तो उम्मीद है उनसे मुलाक़ात हो जाए । कल से तो वह शायद ऑफिस चले जाएँगे तो बात नहीं हो पाएगी, इसलिए आज ही बात कर लेता हूँ । शायद उनसे बात करने पर ऐसा कुछ हाथ आए जो तुम्हारे वकील को तुम्हें जमानत दिलाने में हेल्प कर सके ।”
“राज जी, नंबर तो याद नहीं है । आप बाहर इंस्पेक्टर से मिलकर मेरे सामान में से मेरा मोबाइल है उसे ले लीजिये । उसमें सबका नंबर सेव है । आप इंस्पेक्टर से मेरे 2 क्रेडिट कार्ड भी ले लीजिएगा । उनका पिन 0009 है । आपको वकील की फीस भी देनी है और दूसरे खर्चे भी आप कर रहे हैं । वह मुझे पता नहीं था कि कल आपको रेस्टोरेन्ट में श्री के ऊपर खर्च करना पड़ जाएगा, नहीं तो मैं कल ही आपको दे देती ।”
“वो कोई बात नहीं । वैसे भी वहाँ खाना तो मैंने भी खाया था ।” मैंने मुस्कराते हुए कहा ।
“फिर भी मुझे अच्छा नहीं लगेगा कि मेरी वजह से आपका खर्चा हो रहा है । आगे भी ना जाने कितना खर्च होगा ?”
“ठीक है, मैं क्रेडिट कार्ड ले लेता हूँ । बाय ।” कहता हुआ मैं वहाँ से निकल आया ।
☐☐☐
मैं अपनी बिल्डिंग की लिफ्ट में था । पुलिस स्टेशन से निकलने से पहले मैं इंस्पेक्टर शिवा रेड्डी से डॉली के क्रेडिट कार्ड और उसका मोबाइल फोन लेकर आया था । क्रेडिट कार्ड और मोबाइल देने से पहले उसने डॉली से उसके बारे में पूछा था । पुलिस स्टेशन से निकलते ही मैंने सबसे पहले डॉली की फ्रेंड अंजलि को फोन मिलाया । मालूम हुआ कि वह राजीव के साथ पीवीआर में मूवी देखने गई हुई थी और मूवी से फ्री होकर वह मिलने के लिए फोन करेगी ।
‘साला, फ्रेंड पुलिस की गिरफ्त में है और ये बॉयफ्रेंड के साथ मजे ले रही है । कैसी लड़की थी अंजलि और कैसा था उसका फ्रेंड राजीव ?’ अपनी बिल्डिंग की लिफ्ट से निकलते हुए भी मेरा दिमाग यहीं सोच रहा था । लिफ्ट से निकलकर मैं अपने फ्लैट में जा रहा था कि मुझे डॉली के फ्लैट का मेन गेट खुला नजर आया ।
‘जरूर ये संध्या होगी, अंजलि तो मूवी गई हुई है । चलो, आज की शुरुआत इसी से करते हैं ।’ सोचते हुए मैं उसके फ्लैट की तरफ गया । दरवाजा खुला हुआ था, पर फिलहाल उस पर पर्दा लगा हुआ था । मैंने थोड़ा पर्दा हटाकर देखा । सामने हॉल में पीछे की तरफ डाइनिंग टेबल नजर आई, पर किसी के दर्शन नहीं हुए । मैं पर्दा हटाकर अंदर जाने ही वाला था, फिर मैंने अपना इरादा बदल दिया ।
‘यार, अभी तेरे को इस घर की चाबी हासिल नहीं हुई है । शरीफ बच्चे की तरह डोरबेल बजाकर अंदर जा ।” सोचते हुए मैंने डोरबेल बजा दी । थोड़ी देर बाद एक लड़की ने दरवाजा खोला ।
“यस । किससे मिलना है ?” उसने मुझसे सवाल किया । लगा जैसे भैंस भर्राई हो ।
मैंने एक नजर उस पर दौड़ाई । वह डॉली की ही उम्र की, मगर गेहुँए रंग की, थोड़े छोटे कद की, बहुत ही मोटी लड़की थी जो दिखने में कोई खास नहीं थी । आँखों पर उसने मोटे फ्रेम का चश्मा लगा रहा था । घर में रहने के बावजूद उसने बहुत ज्यादा मेकअप कर रखा था और अपने आपको खूबसूरत दिखाने की नाकाम कोशिश कर रही थी ।
‘ये भैंस जैसी लड़की संध्या ही है ।’ मन ही मन सोचते हुए मैंने जवाब दिया, “जी मेरा नाम राज है । मैं आपका पड़ोसी हूँ । वह दो फ्लैट छोड़कर मेरा फ्लैट है ।”
“तो मैं क्या करूँ ?” उसने कहा ।
‘साली ! बड़ी खड़ूस है ।’
“जी, मैं आपकी फ्रेंड डॉली का फ्रेंड हूँ ।”
“डॉली का फ्रेंड !” उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे ।
“क्यों, लगता नहीं हूँ क्या ?” मैंने मुस्कराते हुए कहा ।
“नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है । बस पहले कभी आपको उसके साथ नहीं देखा ।” कहते हुए इस बार वह भी मुसकुराई ।
“कैसे देखेंगी ? अभी हाल ही में मेरी और उसकी दोस्ती हुई है ।”
“ओह्ह... ।”
“आप सारी पूछताछ यहीं गेट पर ही करेंगी ?”
“ओह्ह सॉरी ! प्लीज, कम इन... ।” कहते हुए उसने गेट खोल दिया । मैं अंदर गया । कॉलोनी के सभी टावर में बने हुए फ्लैट एक ही शेप के थे, चाहे जिस भी फ्लोर पर जाए । अंदर घुसते ही एक बड़ा-सा हॉल, हॉल से लगते हुए लेफ्ट में एक छोटा कमरा, फिर कॉमन बाथरूम । उससे लगती हुई रसोई, सामने की तरफ बालकनी थी, जिस पर इस समय पर्दा लगा हुआ था । हॉल के दायी तरफ मास्टर बेडरूम और उसके बगल में दूसरा कमरा । बस अंदर का इंटीरियर सबने अपने हिसाब से कर रखा था । मास्टर बेडरूम में घुसते ही नजर आ गया था जिसके डोर पर सील लगी हुई थी । हॉल काफी बड़ा था जिसके एक कोने में कुछ जिम का सामान भी रखा हुआ था, जिसमें एक ट्रेडमिल भी थी ।
“बैठिए ।” उसने सोफ़े की तरफ इशारा करते हुए कहा ।
“वो मास्टर बेडरूम... वो डॉली का ही है ।” मैंने बैठते हुए पूछा ।
“हाँ, उसी का है ।” कहते हुए उसके चेहरे पर थोड़े गुस्से के भाव आए, पर तुरंत ही वह वापस नॉर्मल हो गई ।
“आपका रूम कौन-सा है ?”
“ये सामने वाला ।” उसने बाई तरफ वाले छोटे रूम की तरफ इशारा करते हुए कहा, जिसका दरवाजा खुला हुआ था । बाहर से कमरे के अंदर जितनी नजर जा सकती थी, उतना मैंने उसका नजारा किया । वह एक साफ़-सुथरा और सजा हुआ कमरा लग रहा था ।
“ये बगल वाला कमरा शायद आपकी फ्रेंड अंजलि का है ?” मैंने पूछा ।
“हाँ ! वह अभी बाहर गई हुई है ।”
“ओके... !” कहकर मैं थोड़ी देर के लिए रुका और फिर अपनी बात आगे बढ़ाई, “बुरा ना माने तो एक बात पूछ सकता हूँ ?”
“जी, पूछिये ।”
“डॉली के रूम की तरफ इशारा करते समय आप थोड़ी देर के लिए गुस्सा हो गई थीं । क्या मैं गलत कह रहा हूँ ?”
“नहीं ! आप सही कह रहे हैं ।”
“पर मैं आपके गुस्से का कारण नहीं समझ पाया । आखिर आपको गुस्सा क्यों आया था ?”
“क्यों नहीं आएगा गुस्सा ? जी तो इतना चाहा था कि उसे जान से मार दूँ । हर कोई चाहता है कि मास्टर बेडरूम उसको मिले, बड़े रूम पर उसका हक हो । वह मेरे बाद इस फ्लैट में आई थी, फिर भी उसने बड़े रूम पर कब्जा जमा लिया, जबकि उसे मैं लेना चाहती थी ।”
“मैं समझा नहीं ।”
“पहले उस रूम में हमारी कोई और रूम मेट थी । मैं और अंजलि अभी वाले रूम में ही थे । जब पुरानी वाली रूममेट जाने वाली थी तो मेरी उससे बात हो गई थी कि वह अपना रूम मुझे देकर जाएगी । हमने मकान मालिक को भी बोल दिया था । पर ना जाने क्यों वह और मकान मालिक ने बाद में वह रूम उस डॉली को दे दिया ।”
“तो इसमें कौन-सी बड़ी बात है ? आप रूम दूसरी जगह भी तो किराये पर ले सकती थी ।” मैंने पूछा ।
“आप सही कह रहे हैं । पर इस सोसाइटी में फ्लैट मिलना और उसमें भी एक रूम मिलना बहुत ही मुश्किल है । एक फ्लैट खाली होता नहीं है उससे पहले ही वह बुक हो जाता है । यहाँ से ऑफिस जाना भी बहुत आसान पड़ता है । आसपास मॉल भी है । कहीं और फ्लैट लेने पर वह सुविधाएँ नहीं मिल पाती, जो यहाँ मिलती हैं ।”
‘कह तो ये ठीक रही है । मुझे भी फ्लैट मिलने में बहुत मुश्किल पेश आई थी और जितना एचआरए मुझे मिल रहा था, उससे डबल रकम मुझे यहाँ किराये के रूप में देनी पड़ रही थी, इसके बावजूद मैं वहाँ रह रहा था ।’
“हम्म, मैं समझ सकता हूँ । पर अगर वह बड़े रूम में रह रही है तो जाहिर-सी बात है वह किराया भी ज्यादा दे रही होगी ।” प्रत्यक्ष में मैंने कहा ।
“2000 ही तो ज्यादा दे रही है । कौन-सा एहसान कर रही है ? बाकी सब कामों में तो बराबर खर्चा होता है ना । सफाई का, बिजली का, मैनटेनेंस का ।”
“हम्म, वह तो है ।” मैंने कहा ।
“वैसे आप बुरा ना माने तो अब मैं आपसे एक सवाल पूछूँ ?” उसने कहा ।
“क्या ?” मैं हड़बड़ाया ।
“आप ये सब तो पूछने के लिए आए नहीं होंगे । आपको काम क्या है, वह बताए ?”
“जी, आपको को पता ही है कि आपकी फ्रेंड को पुलिस ने गिरफ्तार किया है । उसी सिलसिले में आपसे कुछ जानकारी चाहिए थी ।”
“आपको जानकारी चाहिए, पर क्यों ?”
“वेल, वह अपने आपको बेकसूर बता रही है और पुलिस उसकी बात पर बिलकुल भी विश्वास नहीं कर रही है, तो बस मैं उसको बेकसूर साबित करने की थोड़ी कोशिश कर रहा हूँ ।”
“क्या आप उसके वकील है ?”
“अरे, नहीं-नहीं... ।”
“तो फिर जरूर डिटेक्टिव होंगे, जैसे फिल्मों में दिखाते हैं । जो एक खूबसूरत लड़की को बचाने निकला है ।” उसने मज़ाक उड़ाते हुए कहा ।
“जी, आपने सही कहा । मैं एक डिटेक्टिव ही हूँ ।” मैंने मुस्कराते हुए कहा ।
“क्या ?” उसका चेहरा हक्का-बक्का था ।
‘साला, ऐसे तो कोई सीरियस ही नहीं लेता जब तक अपने आपको शो ऑफ ना करो ।’ मन ही मन सोचते हुए मैंने कहा, “जी, आपको कोई शक है क्या ? अब ये मत बोलना कि आपने तो फिल्मों में 6 फीट लंबे कसरती बदन वाले, सड़कों पर अंधाधुंध बाइक चलाने वाले, 5050 गुंडों से एक साथ भिड़ जाने वाले डिटेक्टिव देखे हैं । वह सब फिल्मों में ही होता है । असली ज़िंदगी में डिटेक्टिव मेरे जैसा ही होता है । नॉर्मल दिखने वाला, जो इधर-उधर खोजबीन करके ही सबूत तलाश करता है ।”
“ओह्ह... ।” उसने एक गहरी साँस लेकर कहा ।
“जी ।” मैं मुस्कुराया ।
“तो आप उसको मुजरिम साबित होने से बचाने के लिए निकले हैं ?”
“जी, कोशिश तो पूरी रहेगी और मैं ऐसा कर भी पाऊँगा । अगर आप थोड़ा-सा सहयोग करे तो... ।” बोलते समय मैंने अपना हाव-भाव और विश्वास वैसा ही कर रखा था जैसा कि विक्रांत का होता है ।
“कहिए, मैं आपकी क्या मदद कर सकती हूँ इसमें ?”
“पहले तो आप ये बताए, आपको तो अपनी सहेली की बेगुनाही पर यकीन है ना ।”
“कह नहीं सकती ।”
“कह नहीं सकती, मतलब ?”
“मतलब ये कि वह गुनहगार भी हो सकती है और बेकसूर भी ।”
“मतलब आप कहना चाहती है कि वह ड्रग्स सप्लाई के धंधे में है ?”
“मैंने है नहीं कहा, मैंने कहा हो भी सकती है ?”
“मतलब आपको पूरी तरह से उसकी बेगुनाही पर यकीन नहीं है । क्या आपको उसे देखकर ऐसा लगता है कि वह ड्रग्स सप्लाई कर सकती है ?”
“अब किसी के चेहरे पर थोड़े ही लिखा होता है कि वह क्या है ?”
“पर वह तो आपके साथ इतने समय से यहीं एक छत के नीचे रह रही है, फिर भी आप उस पर संदेह कर रही हैं ।”
“एक छत के नीचे रहते हैं, पर 24 घंटे साथ नहीं रहते । अब बाकी समय में वह क्या करती है, मैं कैसे कह सकती हूँ ?”
“पर वह तो एक आईटी कंपनी में अच्छे-खासे पैकेज पर काम करती है । उसके परिवार में उसका कोई और है भी नहीं, फिर उसे क्या जरूरत है ये सब करने की ?”
“ज्यादा पैसा किसे अच्छा नहीं लगता मिस्टर । और सुना है ड्रग्स के पैसे में तो अच्छी-खासी कमाई होती है ।”
“कभी तुमने उसके पास ड्रग्स देखी है ?”
“कई बार देखी है ।”
“इतनी ज्यादा, जितनी कल उसके पास बरामद हुई है ?”
“नहीं, इतनी ज्यादा तो नहीं ।”
“तो कितनी देखी ?”
“कभी 1 पुड़ी, कभी 2 पुड़ी ।”
“इतनी तो उसके पास इसलिए होती होगी क्योंकि वह ड्रग्स लेती है और इस बात को उसने स्वीकार भी किया है । वैसे इतनी ड्रग्स तो आपके पास भी रहती होगी मिस संध्या ।”
“क्या मतलब है आपका ?”
“मतलब ये कि ड्रग्स का सेवन तो आप भी करती हैं मिस संध्या ।”
“ये आपको किसने कहा ?” वह थोड़ा गुस्से में बोली ।
“मिस संध्या, ये जानना कौन-सी बड़ी बात है ? ये तो डॉली ने बताया मुझे । मानता हूँ ड्रग्स लेना बुरी बात है, पर ये उतना बड़ा गुनाह नहीं है, जितना की ड्रग्स सप्लाई करना और जिस इल्जाम में आपकी फ्रेंड गिरफ्तार है । उसने ही बताया कि वह कभी-कभी ड्रग्स लेती है और आप भी लेती हैं । आप भी परसो उस पार्टी में ड्रग्स ले रही थीं जिसमें डॉली ने ली थी । जाहिर-सी बात है, ड्रग्स की 12 पुड़िया तो आपके पास भी मिल जाएगी, अभी भी... ।” मैं उसके चेहरे के भावों को पढ़ता हुआ आगे बोला, “इसका मतलब ये तो नहीं कि आप भी ड्रग्स सप्लाई करती हैं ?”
“हाँ, शायद आप ठीक कह रहे हैं । पर ये तो आपको भी पता है, उसके रूम से ड्रग्स की 12 पुड़ी नहीं बल्कि पूरी 100 पुड़िया बरामद हुई हैं जो एक ड्रग्स यूज करने वाले के पास नहीं होती है ।”
“हाँ, ये पता है । पर डॉली का कहना है कि वह उसकी नहीं है, उसे फँसाया गया है ।”
“पर ऐसा भला कौन करेगा ?”
“करने को तो कोई भी कर सकता है । आप भी ?”
“मैं ! मेरे पास इतनी ड्रग्स कहाँ से आएगी ?”
“वहीं से, जहाँ से डॉली के पास आई होगी ।”
“क्या मतलब है आपका ?”
“मतलब ये मिस संध्या कि जिस प्रकार आपके हिसाब से डॉली ड्रग्स की 100 पुड़ियों का इंतजाम कर सकती है तो मेरे हिसाब से ये इंतजाम तो आप भी कर सकती हैं ।”
“वॉट नॉनसेन्स । मैं एक अच्छे खानदान की अच्छी जॉब करने वाली लड़की हूँ । मुझे पैसों के लिए ड्रग्स सप्लाई करने की कोई जरूरत नहीं है ।”
“आप ठीक कह रही है । आपको पैसों के लिए ड्रग्स सप्लाई करने की कोई जरूरत नहीं है । पर पहली बात आपकी यहीं बात डॉली पर भी लागू होती है । वह अभी सिर्फ 22 साल की है और 22 लाख का उसका सैलरी पैकेज है, यानी 2 लाख रुपए महीने में कुछ ही कम है । और उसके परिवार में उसके अलावा कोई और भी नहीं है । इतने पैसों में वह अकेली फुल ऐश कर सकती है । फिर उसे पैसों के लिए ड्रग्स सप्लाई जैसे खतरनाक काम को हाथ में लेने की क्या जरूरत है ? और दूसरी बात अभी थोड़ी देर पहले आपने ही कहा था कि ज्यादा पैसा किसे अच्छा नहीं लगता ?”
“कह तो आप सही रहे हैं । पर उसे फँसाने की कोशिश कौन कर सकता है ? आखिर किसी से उसकी क्या दुश्मनी है ?”
“कोई भी कर सकता है । आप भी ?”
“मैं ? मैं भला ऐसा क्यों करूँगी ?”
“क्यों, थोड़ी देर पहले तो आपने खुद ही तो कहा था कि आपको उस पर इतना गुस्सा आया था कि उसे जान से मार दूँ ।”
“वो तो मैंने यूँ ही गुस्से में बोल दिया था, पर इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं ऐसा करूँगी । भला इतनी छोटी-सी बात के लिए भी कोई इतना बड़ा कदम उठाता है ।”
“छोटी-सी बात ! मैडम, लोग तो इससे भी छोटी बात के लिये कत्ल तक कर देते हैं । न्यूज नहीं पढ़ती क्या आप ? लोग 10 रुपए जैसी हक़ीर-सी रकम के बदले एक-दूसरे की जान ले लेते हैं । एक बार एक आदमी ने अपने दोस्त को मज़ाक में कुत्ता बोल दिया था, उस बात का बदला उसने अपने दोस्त को कुत्ते की मौत मार के लिया । सड़क पर गाड़ी छू जाने पर, गाली देने पर जैसी कई तुच्छ बातों पर जान लेना कोई बड़ी बात नहीं है । आपका गुस्सा तो इनसे कहीं बड़ी बात पर था ।”
“ओह्ह शटअप ! मैंने ऐसा कुछ नहीं किया ।”
“कल दोपहर को आप कहाँ थीं जब पुलिस ने डॉली को गिरफ्तार किया था ।”
“कल दोपहर मैं शॉपिंग के लिए हाइपर सिटी गई थी ।”
“कितने बजे ?”
“मैं लगभग 11 बजे यहाँ से गई थी और 22.30 बजे आई थी ।”
“शॉपिंग के लिए इतना टाइम लगता है क्या ? हाइपर सिटी ज्यादा दूर भी नहीं है । महीने भर की शॉपिंग में भी 1 घंटे से ज्यादा समय तो नहीं लगता ।”
“मिस्टर, जब कोई मॉल जाता है तो सिर्फ शॉपिंग के लिए ही नहीं जाता । वह वहाँ घूमता भी है, विंडो शॉपिंग भी करता है, आइसक्रीम भी खाता है, जूस भी पीता है । कहने को वह शॉपिंग के अलावा 10 दूसरे काम भी करता है, जिसमें टाइम लगता है ।”
“अच्छा, पर मिस संध्या ये सब दोपहर में कौन करता है ? आई मीन, अभी मई चल रहा है, भयंकर धूप और गर्मी में शॉपिंग, वह भी 34 घंटे तक, कुछ अजीब नहीं है ।”
“मिस्टर, लगता है आप मंगल गृह से आए हैं, जो इतना भी नहीं जानते कि मॉल में एसी चलता है जिसमें आपको नाममात्र की भी गर्मी का एहसास नहीं होता । आप सीधा बोलो ना कि आप डॉली को फँसाने के मामले में इनडाइरैक्ट मुझ पर शक कर रहे हैं । आपकी जानकारी के लिए बता दूँ, मैं हर महीने के पहले शनिवार को दोपहर के टाइम ही अपनी शॉपिंग करती हूँ । इसलिए मेरी बात सुनो और समझो । मैंने पहले भी बताया था और अब भी बता रही हूँ कि मैंने उसको फँसाने का काम नहीं किया और ना ही मुझे ऐसी कोई जरूरत थी ।”
“चलो, मान लेता हूँ, आपने ऐसा कुछ नहीं किया । पर क्या आप बता सकती हैं, ऐसा कौन कर सकता है ?”
“मैं कुछ कह नहीं सकती ।”
“माना आप कुछ कह नहीं सकती, फिर भी अपने दिमाग पर ज़ोर डालकर कुछ तो बताइये । उसकी किसी से दुश्मनी हो और उसने इस काम को अंजाम दिया हो ।”
“ये तो डॉली ही बता सकती है कि उसके किसके साथ दुश्मनी है ?”
“डॉली के हिसाब से उसका कोई दुश्मन नहीं है । वैसे कई बार इंसान को खुद को भी पता नहीं होता कि उसका दुश्मन कौन है ? वैसे जिसको ये पता नहीं होता उसका दुश्मन कौन है, उसका दुश्मन अक्सर उसका कोई दोस्त ही निकलता है । तो डॉली के केस में भी शायद ऐसा ही हो ।”
“आप अभी भी अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहे । खाली-पीली घूम-फिर कर फिर से मुझ पर इल्जाम लगा रहे हैं ।”
“अरे, नहीं-नहीं । आपने ऐसा क्यों सोचा ? आप अकेली ही तो डॉली की फ्रेंड नहीं हैं ना । उसके और भी फ्रेंड हैं आपकी तरह ।”
“तो आप कहना चाहते हैं कि उसको फँसाने में उसके किसी फ्रेंड का हाथ है ।”
“हो सकता है ।”
“पर मुझे नहीं लगता उसके किसी फ्रेंड ने ऐसा किया होगा ।”
“हो सकता है किया हो । आप ये बताइये, उसकी कभी किसी फ्रेंड से या किसी और से कभी कोई लड़ाई हुई हो ।”
“नहीं, मेरी जानकारी में तो कोई नहीं है ।”
“हम्म ।” कहता हुआ मैं सोच में डूब गया । फिर थोड़ी देर बाद मैंने अपनी बात आगे बढ़ाई, “अच्छा, परसो रात को आप भी थी ना पार्टी में ?”
“हाँ !”
“ये पार्टी कहाँ पर हुई थी ?”
“डॉली ने नहीं बताया ?”
“मैं उससे पूछना भूल गया । आप बता दीजिये, क्या फर्क पड़ता है ?”
“पंजागुट्टा में रात के मुसाफिर नाम से बार कम रेस्टोरेन्ट है, वहीं पर हुई थी ।”
रात के मुसाफिर बार का नाम मैंने सुन रखा था । मेरे ऑफिस में से 23 नौजवान कलीग अक्सर वहाँ लेट नाइट डिस्को जाते थे । पर ये खबर मेरे लिए बिलकुल नई थी कि वहाँ पर रेव पार्टी भी होती है, जहाँ पर ड्रग्स भी सप्लाई की जाती थी ।
“वहाँ ऐसी पार्टी रोज होती है क्या ?”
“अब ये मुझे नहीं पता, क्योंकि मैं हर पार्टी का हिस्सा नहीं होती ।”
“तो क्या डॉली होती है ?”
“वो भी मुझे नहीं पता । वैसे हम साथ ही हर पार्टी में जाते हैं, पर कभी-कभी मेरी नाइट शिफ्ट होती है, तब वह उस समय जाती है या नहीं, इसका मुझे नहीं पता ।”
“अच्छा, तुम महीने में कितनी बार अटेण्ड करती हो पार्टी ?”
“कभी-कभी । मुश्किल से 12 बार, पिछले 6 महीनों में ऐसा मौका एक बार ही आया है जब मैं 3 बार गई हूँ ।”
“तो महीने में 12 बार ड्रग्स लेने से तुम्हारा काम चल जाता है क्या ? मैंने तो सुना है कि जो एक बार ड्रग्स ले लेता है, उसे ड्रग्स रोज चाहिए होता है ।”
“रोज तो नहीं चाहिए होता । मैं हफ्ते में 3 बार लेती हूँ । बहुत महंगा आता है, एक डोज़ 2000 रुपए की होती है । अब रोज नशे के लिए 2000 रुपए खर्च करना बहुत ही मुश्किल है । हाँ, जिसको पूरी तरह से लत लग जाती है, उन्हें रोज चाहिए होता है । अब वह लोग रईस लोग होते हैं, जो 1 क्या 24 खुराक रोज खरीदने की क्षमता रखते हैं ।”