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कठपुतली -हिन्दी नॉवल complete

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पूरी तरह खामोश था यह ।

चेहरा पत्थर की तरह सख्त और भावहीन नजर आ रहा था । काच की गोलियों की तरह चमकीली मगर बेजान आंखें सिर्फ और सिर्फ कुंती देबी की आंखों में झांक रहीं थी । जब वह कुंती द्वारा बार-बार झंझोड़े जाने के बाबजूद 'सोया' सा रहा तो

गोडास्कर बोला-----" हजूर शायद अभी भी यह सोच रहे हैं---- ये नहीं बताएंगे तो गोडास्कर को पता नहीं लगेगा कि हत्या वाली रात ये कहाँ थे जबकि गोडास्कर इस सवाल का जबाब पहले पा चुका है पाने के बाद ही यहाँ "धमका" है ।।

"तो तुम्ही बता दो कहां थे भैया? " कुंती देवी उसकी तरफ घूमी ।।

"ओबराय होटल के रूम नम्बर सेविन जीरी थर्टी थ्री में।" विस्कुट खाते गोडास्कऱ ने कहा----"आपकी जानकारी के लिए बता दूं--यह रूम उस सुईट के ठीक सामने है जहाँ विनम्र बिंदू से मिला था जहाँ बिदूं की हत्या हुई ।। यह कमरा मिस्टर चक्रधर चौबे ने अपने असली नाम से नहीं बल्कि किशोर साहनी के नाम से लिया था । क्यों चौबे जी, गलत तो नहीं कहा गौडास्कर ने?"

चक्रधर चौबे को लगा-अब कुछ भी कहने से कोई फायदा नहीं है ।।

बिस्कुट चबाता पुन: गोडास्कर ही बोला---" गेडास्कर गलत हो ही नहीं सकता क्योंकि यह बात मुह से निकालने से पहले चौबे जी का फोटो होटल के स्टाफ को दिखा चुका है । तस्दीक कर चुका है ।। किशोर साहनी की सुरत यही है ।"

"तुम बोलते क्यों नहीं भैेया ।" कुंती एक बार फिर चीखी----"कहते क्यो नहीं यह सब बकवास है?"

"दुनिया का नियम है-माताजी, आदमी की चुप्पी उसकी स्वीकृति होती है । अब एक ही जगह "अटके" रहने की जगह चौबे जी से यह पूछा जाना चाहिए ---इन्होंने किशोर साहनी के नाम से सुईट के ठीक सामने वाला रूम क्यों लिया ?"

"क्यों लिया?" पहली बीर बिनम्र के मुंह से निकला ।

"गोडास्कर से पूछ रहे हो तो बताए देता हूं ।" उसने एक और बिस्कुट मुह में डालने के साथ कहा'---" इन जनाब को पहले ही मालूम था तुम नौ बजे सुईट में बिदू से मिलने वाले हो । इन्होंने शाम के पांच बजे से अपने कमरे मे डेरा डाल दिया ।

जब तुंम वहाँ पहुंचे ये हुजूर "की होल' से गैलरी का सारा दृश्य देख थे । तुमने खुद बताया-तुम वहाँ ज्यादा देर नहीं रहे । विंदू कै समर्पण को ठूकराकर बापस अा गए । तुम्हारे निकलते ही मामा अपने कमरे से बाहर आये सुईट की बैल बजाई । बिंदू ने दरवाजा खोला । इन्होंने उसे कुछ भी-समझने का मौका दिए वगैर गर्दन दबा ली । यह मर गई । मगर इस बीच उसकी माला टूट चुकी थी । कार्पेट पर मोती बिखर गए । तभी किसी तरह इन्हें पता चला कमरे में एक शख्स और है । वह बिज्जूथा । उसके पास मोजूद कैमरा देखते ही ये समझ गए-उसने बिंदू की हत्या के फोटो खींचे लिए हैं । अब, इनके पास विज्जू की भी ईह लीला समाप्त कर देने के अलावा कोई चारा नहीं था ।

विज्जू को निपटा देना इनके लिए बिंदू को निपटा देने से भी आसान था ।।वही किया । कैमरे की रील निकालकर अपनी जेब में डाल ली ।। और उसकी लाश को लिफ्ट के कुए मे फेक दिया।।

"गोडास्कर । " बिनम्र ने कहा---"यह तुम किस वेस पर कह रहे हो ? "

"गोडास्कर ने अगले लफ्ज नहीं उगले थे ।" कहने के बाद 'गेप’ देने केलिए उसने बिस्कुट मुह में सरकाया और बोलना शुरू किया-----" कत्ल के बाद इन्होंने अपने एक चेले को फोन किया ।। जिसका पेशा ही ऐसे कामों को अंजाम देने का है जैसा ये उससे कराना चाहते थे ।। उसका नाम मनसब है ।। "

" मनसव !" विनम्र ने नाम दोहराया ।

" जी हां ।। मनसब के मोबाइल पर अपने मोबाइल से फोन किया था इन्होंने ।। बेस नः पहला यह ही है दोनों के मोबाइल और कंट्रोल रूम का रिकार्ड बता देगा इन्होने किस वक्त मनसब को फोन करके कितनी देर क्या बात की ? उस रिकार्ड के मुताबिक मनसब को सुईट से बिंदू की लाश हटाने का काम सौंपा था ।

इस काम को मनसब आसानी से कर सके, इस कारण उसके लिए रूम नम्बर सेविन जीरो सेबिन्टीन बुक कराया । यह काम करते वक्त इन्होंने इतनी सावधानी जरूर वरती कि कमरे की बुकिंग अपने मोबाईल से न कराकर पी . सी. ओं. के फोन से कराई । उस पी. सी. ओ से जो ओबराय के ठीक सामने सडक के उस पार है । ऐसा इसलिए किया ताकि होटल के रिकार्ड में इनके मोबाईल का नम्बर दर्ज न हो सके ।। ये…खुद किशोर साहनी के नाम से रुम नम्बर सेवन जीरो थर्टी में ठहरे हैं, यह बात मनसव को भी नहीं बताई । पी. सी . ओ. से फोन करने के बाद उजरत बापस कमरे में आ गए । हालस्कि जिक्र कर चुका हूं फिर भी एक बार पुन: बता देना मुनासिब होगा-------मनसब का कमरा अमरसिंह के नाम से ठीक दस पैंतीस पर कराया गया । मनसव ग्यारह बजे होटल पहुचा।। बारह बजकर तीस मिनट पर चॉक आऊट कर गया । बेस नम्बर टू---"गोडास्कर की इस बात की तस्दीक खुद होटल का रिकार्ड बनेगा ।। मनसब बहां एक अटैची के साथ पहुंचा था । ऐसी अटैची के साथ जिसमें बिंदू जैसी लड़की की लाश मोड़ तोड़कर रखा जा सकै । होटल का एक कर्मचारी गवाह है-अटैची जब लाई गई तो खाली थी लेकिन जब ले जाई गई तो भरी हुई थी । कहने का मतलब---डेढ़ धंटा मनसव ने विंदूकी लाश को अटैची में पैक करने, कार्पेट पर बिखरे मोती चुनने और कमरे की स्फाई करने में खर्च किया क्योंकि चौवे जी ने उससे कहा था…-किसी को सुईट में वारदात का पता न लग सके । मनसव अपना काम करके आराम से निकल गया । उस वक्त होटल का स्टाफ कल्पना तक नहीं कर पाया कि अटैची में लाश है ।। और फिर जो होटल में हुआ सब वताता चला गया गोडास्कर ।।

अमर सिंह को उन्होने मनसब के रूप में पहचाना था । इससे आगे गोडास्कर की जानकारी काम आई।।

गोडास्कर जानता था --- छटे हुए बदमाश मनसब का ना कोइ घर बार है , ना फैमली ।। यह परमानेट रूप से होटल अजंता के रूम नः आठ में रहता है ।

और दोलत राम को निगरानी का काम दिया । जैसे ही सुचना मिली मनसब को घेर लिया गया । बिंदू की लाश ही नहीं , उसका मोबाईल और माला के मोती भी मिल गये हैं ।।

वातावरण मे तनाब पूर्ण खामोशी छा गई ।

सचमुच गोडस्कर ने सबका मुहं बंद कर दिया था ।।

एकाएक चक्रधर चौबे ने पूछा ---" क्या मनसब इस वक्त तुम्हारी हवालात में है ?"

" शुक्र है ऊपर बाले का । आपने अपने गूंगे ना होने का सबूत तो दिया ।"

चक्रधर एक बार फिर चुप कर गया ।

इस बार गोडस्कर ने दौलतराम से कहा --" देख क्या रहा है दौलतराम । हजुर को ले जाकर बाहर खड़ी सरकारी जीप में बैठा ।"

पुलिस टीम चक्रधर चौबे को लेकर लॉबी के दरबाजे की तरफ बढ़ चुकी थी । गोडस्कर भी उनके साथ था ।।।।

रात के दस वजें।

विनम्र की टेक्सी सुनसान इलाके में एक मकान के बाहर रुकी । मकान करीब दो सौ गज में वना हुआ था दु मंजिला । ब्लैक मेलर के रूप में इस बार एक नई लड़की ने फोन किया था । उसने यहीं कहा था-उस मकान के चारों तरफ दूर-दूर तक खाली जगह पडी है ।। दूसरा कोई मकान नहीं है । मकान-दु-मंजिला है और वाहर लगी नेम प्लेट पर 'बसेरा' लिखा है ।

विनम्र ने टैक्सी मे बैठे ही बेठे नेम प्लेट पर नजर डाली ।

ग्रेनाईट पत्थर पर ब्रास के वड़े-वड़े अक्षरों में लिखा "वेसरा' बहां मौजूद अॉन बल्ब के कारण साफ नजर आया ।

विनम्र को कोई शक नहीं रह गया --वह वहां पहुंच चुका है, जहां बुलाया गया था ।

टैक्सी से बाहर निकला ।

ड्राईवर की मदद से खिडकी से अटैची निकलवाई । इस बार उसमें दो करोड़ थे ।।

फोनपर ब्लैक मेलर लड़की ने कहा था---" इस बार दो करोड़ लाने होगे तुम्हें। करोड़ फोटुओं की कीमत । एक करोड पहली बार की गई चालाकी का जुर्माना ।। साथ ही चेतावनी दी गई थी--" उम्मीद है समझ गये होंगे । तुम्हारी कोई भी चालाकी हमारी नजरों से छूप नहीं सकेगी । इस बार अगर कोई हरकत की गई तो अगली बार तीन करोड लाने होंगे ।"

विनंम्र ने कोई सफाई नही दी थी ।

नहीं कहा कि दाढी वाले से उसका कोई सम्बन्थ नहीं था ।

उन सब बातो का अंब कोई मतलब भी नही रह गया था । विनम्र को फोटुओं की जरूरत थी और उसके लिये दो करोड़ तो क्या, इससे कई गुना ज्यादा भी खर्च कर सकता था।। हां एक बात जरुर बार-बाऱ _ उसके मस्तिस्कै में गूंज रहीं थी । वह बात जो चक्रधर चौबे को ब्लैक मेल कर रहे पवन प्रघानं ने कही थी्--" हर ब्लेक मेलर एक जौक होता है ।वह सोने के अंड़े देने वाली मुर्गी को एक ही झटके से हलाल कर देने की बेवकूफी कभी नहीं करता बल्कि जौक बंनकर सारा खून पीने में विश्वास रखता है ।" यही है बात वाद में चक्रधर चौबे ने भी कही थी ।

विनम्र निश्चय कर चुका था…वह अपने साथ ऐसी कोई भी हरकत नहीं होने देगा ।। दो करोड मे सभी फोटो और

नेगेटिव उसे देगा तो ठीक वर्ना सख्ती से पेशं आएगा । अंटेची में विनम्र दो

करोड रुंपये लाया था तो जेब में रिवॉल्बर पडा था ।

दुढ़ निश्चय करके आया था वह--रिवींल्बर का भी इस्तेमाल करना पड़ा तो चूकैगा नहीं ।। निश्चय करते वक्त वह कांप-सा उठा था परन्तु सोचा था---जिस झमेले में फ'स गया है उससे निकलने के लिए हिम्मत तो दिखानी ही पडेगी । मजबूरी है । न तो फोटुओं को कोर्ट तक पहुचने देगा, न ही ब्लेक मेलर जौक बनने देगा ।

इनमे से किसी भी बात क्रो वह अफोर्ड नहीं कर सकता था । टैक्सी बाले को विदा करने के बाद विनम्र बसेरा के गेट की तरक बड़ा।।

अपने पहियों पर चलती अटैची उसके पीछे थी । डोरी विनम्र के हाथ मे ।

फौन पर कह दिया गया था------"बैल बजाने की कोई जरूरत नहीं है दरबाजा खोलकर सीधा अंदर चले आना ।"

विनम्र ने बैसा ही किया।।

लोहे वाला गेट खोलकर छोटी सी गैलरी मे पहुंचा ।। वहां खटारा भी नजर आने वाली मारूति वेन खड्डी थी ।

गैलरी में इमारत के अदर जाने के लिए लकडी का एक दरवाजा था ।

वह खुला हुआ था ।

विनम्र समझ गया---उसी के लिए खुला रखा गया है ।। अटैची को घसीटता वह अंदर दाखिल हो गया । मुश्किल से चार-पाच कदम चलने के बाद खुद को लाबी मे पाया । बहुत कम रोशनी थी वहां । अभी चारों तरफ का निरीक्षण कर ही रहा था कि वातावरण में फोन वाली लड़की की ख़नखनाती सी आबाज गूंजी-"उस कमरे में चले आओं मिस्टर विनम्र जिसकी लाईट आंन है ।।"

विनम्र ने चारों तरफ नजर दौड़ाई ।।।

लाबी में चार कमरों के दरबाजे थे ।।

चारों बंद । केवल एक रोशनदान के कांच पर रोशनी नजर अा रही थी, बाकी तीन एक लाबी में रोशन बल्ब के कारण चमक रहे थे ।।

विनम्र का दिल धाड़-धाड़ कर के बजने लगा था ।।

 
निर्देश के मुताबिक रोशनी बाले कमरे की तरफ बढ़ा ।। दरवाजे के नजदीक पहुंचकर हाथ किबाड़ पर रखा तो बह खुलता चला गया ।

सामने, ठीक सामने एक डबल बैड था। । डबल बेड पर दाहिनी कोहनी के बल एक लडकी लेटी थ्री । अंत्यत सुंदर थी बह । विनम्र नहीं जानता था उसका नाम क्रिस्टी है । उसके जिस्म पर 'ग्रे' कलऱ का ऐसे कपडे का लिबास था जो कमरे मैं मौजूद रोशनी के सम्पर्क से आकर हैं-जगह जगह से झिलमिला रहा था । उस लिबास को बिनम्र कोई नाम नहीं दे सका है कंधे से शुरू होकर यह लडकी की जांघों पर खत्म हो जाता था । जांघों पर भी काफी उपर ।। धड़ और टांगो के जोड़ से बस जरा ही नीचे ।

शुरू बहां से जहाँ से बक्ष प्रदेश की शुरूआत थी ।

यह भी कहा जाए तो गलत न होगा---वक्षों का ऊपरी हिस्सा थोडा-थोड़ा चमक रहा था ।

विनम्र को लगा---इस कमरे में न सही मगर मकान में इसके साथी जरूर होगें । लड़की के साथ की गई जरा-सी सख्ती पर वे इसकी मदद के लिए आ धमकैगे । वे इतने आराम से कमरे में न आ सके इसके लिए जरूरी है, वह दरवाजे को अंदर से बंद कर ले । इस बारे में सोच ही रहा था कि… "

"आओं मिस्टर विनम्र । आ जाओं ।" कहती हुई लडकी बैड से उठी । उसके होठों पर मोहक मुस्कान थी ।

विनम्र बगैर उससे कुछ कहे अटैची की डोरी छोड़कर घूमा और अगले पल उसने दरवाजा बंद करके डंडाला लगा दिया । अपना काम करके वापस लड़की की तरफ घूमा ।

लड़की ने अपने होठो पर मोहक मुस्कान चिपकाए रखकर पूछा-"ऐसा क्यों किया तुमने."'

"ताकि हमारी बाते कोई और न सुन सके ।" विनम्र के पास जबाव तैयार था ।

वह खिलखिलाकर हंस पड्री । बिनम्र को लगा-संगमरमर के फर्श पर कांच की गोलियां बिखरती चली गई हैं । हंसने के बाद बोली--" हम दोनों के अलावा यहाँ कोई नहीं है ।"

विनम्र को उसका कथन सफेद झूठ लगा ।

जबकि लड़की उसकी तरफ बढी ।

पैरो में ऊंची एडी की सैंडिल होने के कारण चलने से उसके सारे जिस्म में अजीब-सा 'लोच' पैदा होरहा था ।

लिबास के अंदर वक्ष पानी के भरे गुव्वारेकी तरह थरथराते नजर अाए ।

जाहिर था-वह ब्रा पहने हुए नहीं थी ।

विनम्र को लगा--यह उसे लुभाने की कोशिश कर रही है ।

अब तो उसके होठो पर मोजूद मुस्कान भी बिनम्र को निमन्त्रण सा देती लगी ।

और यहीं क्षण था । यहीं क्षण था जब अज्ञात आबाज उसके दिमाग की दीवारो से टकराई----"मार डाल विनम्र मार डाल इसे! मरने के बाद बह वेहद खूबसूरत लगेगी । उससे कई गुना ज्यादा खूबसूरत । जितनी अब लग रहीं है ।"

विनम्र घबरा गया ।

सिर को जोरदार झटका दिया । अंदाज ऐसा था _जैसे दिमाग में गूंज रही आवाज को छिटका देना चाहता हो ।

लड़की अत्यंत नजदीक अा गई थी । तिरछी नजरों से उस पर 'तीर' सा चलाती बोली-----" काम की कोई भी बात करने से पहले मैं तुम्हें यह बता देना जरूरी समझती हूं कि इस वक्त इस मकान मे हम दोंनो के अलावा कोई नहीं है ।"

"क-क्यो?" दिमाग में गूंज रही आबाज को अनसुनी करने का प्रयास करते विनम्र ने पूछा--"तुम्हरे साथी कहां हैं?"

"यहां नहीं हैं ।"

" वजह ?"

"मैँ उनकी गेर जानकारी में तुमसे मिल रही हूं ।"

विनम्र को उसकी इस बात पर चौंक जाना पड़ा । मुंह से निकला--""ऐसा क्यों?"

दिल जो जा गया है तुम पर ।" कहने के साथ उसने अपनी दोनो नंगी बांहें विनम्र के गले में डाल दीं---"मैँ नहीं चाहती तुम हमेशा उनकी अंगुलियों के इशारे पर नाचने बाली कठपुतली वने रहो ।"

"गर्दन दबा दे विनम्र ।गर्दन दबादे इसक्री!" आवाज दहाड्री---" क्या

सुराहीदार गर्दन है । मजा अा जाएगा । " खुद को आवाज़ के प्रभाव से निकालने का अधकचरा प्रयास करते विनम्र ने कहा---" क्या मतलब? क्या कहना क्या चाहती हो तुम ?"

"होशियार वे होते हैं डार्लिग जो कम शब्दों में पूरी बात समझ जाएं ।" उसने अपनी आंखें विनम्र की आंखों मे डालते हुए कह--"मेरे साथियों का प्लान तुमसे एक-दो या दस-बीस किश्ते लेने के बाद भी निगेटिव ऩ सौपने का है । वे तुम्हें नीबू की तरह सारी जिन्दगी निचौड़ने की योजना वनाए बैठे हैं । मुझे उनकी यह बात पसंद नहीं अाई । क्यों पसंद नहीं अाई, बता चुकी हूं ।। दिल आ गया है तुम पर । और क्रिस्टी का दिल जिस पर आ जाए उसे हासिल करके ही रहती है ।। इसलिए उसे सबसे छूप कर मैंने. . .सिर्फ मैंने तुम्हें यहां बुलाया है । मैं तुम्हें इस पहली किस्त साथ ही सारे निगेटिव और फोटो देने के लिए तेयार हूं ।"

' एक बार फिर दिमाग में गूज रही आबाज से खुद क्रो वचाते बिनम्र ने कहा------'' ऐसा है तो फोटो निगेटिब्ज मेरे हवाले करो । खुद चेक कर सकती हो।। अटैची मैं पूरे दो करोड रुपए हैं ।"

"मैं चेक करने की जरुरत नहीं समझती ।"

" तो फोटो और निगेटिब्ज मेरे हबाले ......"

" शर्तें है मेरी ।" क्रिस्टी ने उसकी बात काटकर कहा---"छोटी छोटी केवल दो शर्ते ।"

" क-केसी शर्ते?" अज्ञात आवाज को दबाने के प्रयास में विनम्र का सारा शरीर पसीने-पसीने हो गया था । "

" पहली----" बताना होगा, तुमने बिंदू की हत्या क्यों की?"

" दूसरी?"

" मेरे तन में लगी वह आग बुझानी होगी जो उसी क्षण सें मेरे अंदर सुलग रही हैजव मैंने तुम्हें पहली बार देखा था ।" कहने के साथ विनम्र के इतने नजदीक आ गई कि विनम्र अपने सीने पर उसके बक्षो की गुदगुदाहट महसूस करने लगा ।

" क-कब कब पहली बार देखा था तुमने मुझे?" वह वड़ी मुश्किल से पूछ सका ।।

"जब तुम होटल नारंग पहुचे थे ।। तुम भले ही मुझे न देख सके हो मगर मैनें बहां खड़ी अपनी वैन के अंदर से तुम्हें देखा था । मेरे घुटे हुए साथियोॉ से अपनी जिंदगी आजाद करना चाहते हो तो बताओ विनम्र, तुमने बिंदू की हत्या क्यो की और उसके बाद मुझे अपनी गोद में उठाकर बैठ पर ले जाओ ।। मेरी इच्छा पूरी कर दो ।। मैं सारे पोजिटिव ही नहीँ सारे निगेटिव भी तुम्हारे हबाले कर दूगीं ।"

"क-कैसे?" क्या तुम्हरे साथी तुम्हें…

"यह मेरा काम है । मुझे उनसे कैसे निपटना है ?" इन शब्दों के तुरन्त बाद उसने विनम्र का सिर एक झटके में इस तरह अपनी तरफ खींचा जैसे बिल्ली ने रबड़ी से भरी हांडी खींची हो । अपने होंठ विनम्र के होठों पर रख दिये उसने ।।

और विनम्र ।।।

उसके जहन में कोई दहाड़ा ---" ये लड़की तुझे बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रही है विनम्र । ऐसी हर लड़की का एक ही अंजाम होना चाहिए । मौत ।। मर जाना चाहिए इसे! ऐसी लड़कि्या मरने के बाद ज्यादा सुन्दर लगती हैं ।"

"नहीं ।" विनग्र आबाज से लड़ पड्रा----"मैं ऐसा नहीं कर सकता । तुम्हारी कठपुतली बनकर एक और हत्या नहीं कर सकता मैं । क्यों मार डालू इसे? यह एक बेकसुर लड़की है ।"

"वेकुसूर ।" आवाज ने व्यंग्य सा किया------" ये बेकुसूर हैं? ये! जो

तुझ पर अपने यौबन का हथियार चला रही है । ऐसी हर लडकी कुसूरवार होती है गथे! ऐसी हर लड़की को मर जाना चाहिए मार डाल इसे ।"

"नहीं मैं तेरा गुलाम नहीं हूं ।। नहीं मरूंगा ।" ऐस सोचकर विनम्र ने क्रिस्टी को धक्का दिया ।।

क्रिस्टी बूरी तरह लडखडा़ गई गिरते-गिरते बची थी वह ।। चेहरे पर हैरानगी के असंख्य भाव उभर अाए।। किसी मर्द से ऐसी हरकत की उम्मीद क्रिस्टी हरगिज़ नहीं कर सकती थी । भला उसे बिनम्र के दिमाग में चल रहे ’घमासान' के बारे में क्या इल्म हो सकता था ? उसने

तो केवल यहीं देखा…बिनम्र का चेहरा भटृटी में पड़े कोयले-सा दहक रहा था । पसीना यूं वह रहा था जैसे बारिश मे खड़ा हो । जो शख्स इस.

वक्त वासना के आग मे सुलगता होना चाहिए था वह गुस्से की ज्वाला में धधकता नजर आ रहा था । अभी तक उसके जहन में चल रही लडाई, जुवान पर आ गई जो ताकत लड़की को मार डालने ,कै लिए प्रेरित कर रही थी उसका विरोध करता विनम्र दहाड़ उठा'--'"चली जा लडकी! भाग जा यहां से । वरना मैं तेरा खून कर दूंगा ।"

क्रिस्टी के होश फाख्ता हो गए ।

मारे खौफ के थरथर कांपने लगी वह ।।

भूल गई नाटे ने उसे क्या काम सौपा था ।। याद था तो केबल यह चेहरा इस वक्त उसके सामने था । इतना भयानक चेहरा था वह कि क्रिस्टी सचमुच दरवाजे की तरफ़ सरकने लगी ।।

" ये तू क्या बेवकूफी कर रहा है विनम्र? क्या बेवकूफी का रहा है ये ?" उसके दिमाग पर टक्कर मारती आवाज चिंघाडी---" देख वह दरवाजे की तरफ बढ रही है ।। यहाँ है निकल कर भाग गई तो फिर किसी शरीफ को अपने यौबन के जाल मैं फंसा लेगी । फिर किसी देवी का हक छीन लेगी । खत्म कर दे ।खत्म कर दे । खत्म कर दे इसे ।

'खमोश ।' उसकी अपनी आवाज ने अंजानी आवाज का विरोध किया ---" नहीं मारूगा उसे ।। तुम्हारी कठपुतली बनकर नहीं रहूंगा ।। मैं आजाद हूं ।। मेरा अपना एक स्वंत्त्र अस्तित्व है !"

इस तरह ।

विनय ने अज्ञात ताकत से लड़ने की कोशिश की ।

उस कोशिश के तहत चेहरा विकृत होता चला गया । बैसा रूप लेता चला गया । जिसने क्रिस्टी को अपने सिर पर मंडराती मौत का एहसास करा दिया ।।

सहमी हुई वह कुछ और तेजी के साथ दरवाजे की तरफ बढ़ने लगी ।

'वह जा रही है विनम्र । रोक उसे खत्म कर दे खेल ' अंजानी ताकत फिर चीखी---"ऐसी लडकियों का खेल हमेशा के लिए खत्म होना ही चाहिए । तु इसीलिए तो धरती पर अाया है पगले । इसीलिए तो ज़न्म हुआ है तेरा ।मिटा दे इस कंलक को।'

और ।।

विनम्र की आवाज पुरजोर कोशिश के बावजूद हार गई ।

अज्ञात आवाज जीत गई ।

तभी तो उसके 'पाश' में वंधा वह क्रिस्टी की तरफ बढा । मुह से भैडिए की भी गुर्राहट निक्ली---बैइन्ताह सुन्दर हो तुम । गजब की सेक्सी । लड़की, तेरी आंखें बहुत चमकदार हैं मगर इनमे भरी हुई ये "ज्पोति' मुझे पसंद नहीं । मुझे पसंद है-वेजान आंखें । जिनमें चमक तो हो, मगर ज्योति न हो । कंचे जैसी आंखें । वे ही पसंद हैं मुझे ।"

 


" व--बिनम्र।। बिनम्र ।।" भयभीत क्रिस्टी नजरें उसके चेहरे पर जमाये, सहमी हुई दरवाजे की तरर्फ सरक रही थी---'क-क्या हो गया है तुम्हें? ये तुम क्या कह रहे हो?"

दांत पीसते विनम्र ने कहा'--'"तू यह जानना चाहती है न कि मैंने बिदु की हत्या क्यों की? तो सुन-मुझे मरते वक्त किसी लड़की का जिन्दगी के लिए छटपटाना बहुत अच्छा लगता है । मैं वो रोमांचकारी मंजर एक बार फिर देखना चाहता हूं लड़की । तेरी ये सुराहीदार गर्दन कुछ और लम्बी हो जाएगी । आ । मैं तेरी गर्दन दबा दूं ।"

भयाक्रांत क्रिस्टी चीख पड़ी---“वचाओ...... .बचाओं!"'

उसी क्षण ।

किसी ने कमरे का बंद दरवाजा बहुत जोर से पीटा ।

साथ ही एक मर्दानी दहाड़ गूंजी-----"दरवाजा खोलो ।।"

परन्तु ।।

अब विनम्र पर किसी आवाज का कोई प्रभाव नहीं पड़ा ।।

किसी 'बाहरी' आवाज को अब मानो वह सुन ही नहीं पा रहा था ।।

दिलो-दिमाग और पूरे वजूद पर अब केवल एक ही आवाज का कब्जा था।।

उस आवाज का, जो उसके जेहन में गूंज रही थी । जो बार--बार 'लडकी' को मारने के लिए प्रेरित कर रही थी ।

दरवाजे के उस तरफ़ से नाटे की आवाज सुनकर क्रिस्टी के हौंसले में थोड़ा इजाफा हुआ ।

दरवाजा खोलने के लिए वह उस तरफ़ झपटी ही थी कि विनम्र कबूतरी पर झपटने वाले बाज की तरह लपका । अगले पल-क्रिस्टी की नाजुक गर्दन उसके मजबूत हाथों की गिरफ्त में थी ।

क्रिस्टी छटपटाई ।

वह उसकी गिरफ्त से निकलने की कोशिश कर रही थी । मुह से "गूं-गूं'' की आवाज निकलने लगी ।

दरवाजा अब जुनूनी अवस्था में पीटा जाने लगा था । मानो उसे तोड़ डालने की केशिश की जा रही तो । मर्दानी आवाजं के साथ ही अब एक जनानी आवाज भी बार-बार दरवाजा खोलने के लिए चिल्लाने लगी । वह आवाज मारिया की थी मगर, विनम्र पर जरा भी फर्क नहीं पड़ा । उस शख्स पर फर्क पड़ना भी क्था था जिसे वे आवाजे सुनाई ही नहीं दे रही थी ।

अपनी ही दुनियां मे खोया था वह । क्रिस्टी की गर्दन दबाता, दांत , भींचे कह रहा था---"हां । अब अा रहा है मजा । वाह । क्या तड़पन है तेरी । तड़प । और तड़प । वाहा ।। तेरी ये बाहर को उबलती हुई आखै कितनी आकर्षक लग रही हैं । देख, तेरी जीभ बाहर निकल अाई है । कुत्ते की जीभ की तरह लटक रही है ये । वाह ! क्या मंजर है । कुतिया ही तो है तू ! तुझे मर जाना चाहिए । तू इसी लायक है । तू इसी लायक है ।

बार--बार यही शब्द दोहराता विनम्र अपने हाथो की पकड मजबूत और मजबूत करता चला गया ।

और फिर ।

" क्रिस्टी के हाथ-पांव ढीले पड़ गए । कोई छटपटाहट बाकी नहीं रही गई उनमें ।। गर्दन खरगोश की गर्दन की तरह उसके हाथों के बीच झूलती रह गई ।।

विनम्र ने जब राख हुआ चेहरा, फ़टी हुई आंखें और लटकी हूई जीभ देखी तो मस्तिष्क को झटका सा लगा ।

बडी तेजी से उसके बजूद पर हाबी जुनून सा उतरता चला गया । ऐसा महसूस किया उसने जिस्म के अंदर से कोई परछाई निकलकर अभी-अभी बाहर गई हो ।

क्रिस्टी की गर्दन को अपने हाथो में देखकर यूं चौंका जैसे अपनी हथेली पर रखे दहकते अंगारे को देखकर चौंका हो ।

"है भगवान ।"' दिमाग में वाक्य कौधें-----"ये क्या हो गया? कैसे हो गया? क्या कर डाला मैंने ? "

घबराकर उसने क्रिस्टी की गर्दन से हाथ हटा लिए ।

लाश 'धाड' की आवाज के साथ फर्श पर जा गिरी ।

अब वह फटी-फटी आंखों से लाश को देख रहा था । हेरानियां ही हैरानियां थी उसके चेहरे पर ।

दिमाग मे उसकी अपनी आवाज गूंज रही थी----'तूने एक और हत्या कर डाली विनम्र बिंदू की तरह तुने इस लड़की को भी मार डाला ।'

पहली बार ध्यान बंद दरवाजे पर पड़ रही चोटों पर गया ।

कानो में मारिया और नाटे की आवाजें घुसी ।

याद अाया------वह यहाँ ब्लैक मेलर को दो करोड रुपये देने आ्या था । "लडकी ने उसे लुभाने की केशिश की और ........ उसके बाद का सब कुछ उसे एक स्वप्न की तरह याद था । स्वन टूटा तो मरी हुई लडकी की गर्दन हाथों में झूल रही थी ।

वह समझ गया---दरवाजे के उस पार लड़की के साथी हैं ।

दरवाजा तोड़ने की कोशिश वही कर रहे है ।

अगर वह उनके हाथ पड़ गया तो मारा जाएगा या जेल की हवा खायेगा । बौखलाकर उसने चारो तरफ़ देखा----तलाश किसी ऐसी खिडकी की थी जिसके के जरिए कमरे से भाग सके मगर, ऐसा काई रास्ता नहीं था । खिड़की थी जरूर लेकिन उस पर मंजबूत ग्रिल लगी हुई थी । और फिर उसने सोचा'-"भागने से क्या होगा? इसके साथियों ने उसे इसकी हत्या करते देख लिया है । वे पुलिस को सब कुछ बता देगे ।

बिज्जू के द्वारा खीचें गए फोटो भी हैं उनके पास ।

फोटुओं के सामने अाने का मतलब है------उसका खेल खत्म ।

नहीं । वह खेल इतनी आसानी से खत्म नहीं होने देगा ।

कुछ करना होगा ।

क्या कर सकता है ?

एक ही रास्ता है---किसी भी तरह फोटो हासिल किए जाये ।

विनम्र इस नतीजे पर पहुंचा ही था कि वातावरण में' धड़ाम की जोरदार आवाज गूंजी ।

किवाड़ क्रमरे कै फर्श पर आगिरा था।

किसी भी खतरे का मुकाबला करने के लिए विनम्र ने जेब से रिवॉल्बर निकाल लिया ।

एक चार फुटा शख्स ओंर वेहद मोटी औरत उसके सामने थे । चेहरे पर दहशत लिए चौखट के उस पार खड़े वे फ़टी-फटो आंखी से लड़की कीलाश को देख रहे थे । लाश के देखते ही देखते नाटे पर जाने कैसा जुनून सवार हुआ कि विनम्र की तरफ देखता हुआ दहाड उठ-----" तुने -मेरी बीवी को मार डाला हरामजादे ! मेरी क्रिस्टी को मार डाला तूने ?"

नाटा गेंडै की तरह गुर्राकर उसपर झपटा ।।

गुस्से की ज्यादती के कारण उसे विनम्र के हाथ में मौजूद रिवॉल्बर तक नजर नहीं आया था ।

और ......

बौखलाहट में हां -- उसे विनम्र की बौखलाहट ही कही जाएगी । अंगुली ने ट्रेगर दबा दिया ।

" धांय ।"

सारा मकान दहल उठा ।

एक दहकता शोला नाटे के दिल में धुस गया ।

उस वक्त हबा में था । हबा में ही पलटियां सी खाई और मुंह से निकली अंतिम चीख के फर्श पर पर पड़े किबाड़ पर जा गिरा ।।

मारिया ने जा नाटे का जब यह हाल देखा तो दरवाजे ही पर सै "बचाओ बचाओ' चीखती हुई पलटक्रर लॉबी की तरफ भागी ।।।

विनम्र चीखा ---" रूक जाओं ! भागने की कोशिश की तो गोली मार दूंगा ! "

जहां की तहां खड़ी रह गयी मारिया ।।

यु जैसे जादुके जोर से स्थिर कर दी गई हो ।

भला मरने से कौन नहीं बचना चाहता । विनम्र के बगैर कुछ कहे उसने समर्पण की मुद्रा में दोनो हाथ हवा में उठा दिए ।

उसकी इस हरकत पर विनम्र का हौंसला बढ़ा । हुक्म सा दिया'---" मेरी तरफ़ घूमो!"

मारिया ने आदेश का पालन किया ।

उफ्फ! मौत का खौफ क्या होता है, अगर किसी को यह देखना होगो इस वक्त मारिया के चेहरे को देखे।।।

पूरी तरह निस्तेज । बेजान । कान्ति विहीन चेहरा ।

श्मशान की राख-सी उड़ती नजर आ रही थी यहाँ ।

ब्लेड मारा जाए तो खून का एक कतरा तक बरामद न हो सके ।

मारिया जीवित थी मगर आंखों मे जीवन का कोई चिन्ह नजर नहीं आ रहा था । उसकी इस हालत ने विनम्र में साहस का संचार किया ।

रिवॉल्वर उसी पर ताने धीरे धीरे उसकी तरफ बढा ।

मारिया को वह यमराज के दूत से कम नजर नहीं आ रहा था ।

वह, जो आहिस्ता-आहिस्ता उसके नजदीक बेहद नजदीक आ गया ।

उस वक्त मारिया के जिस्म ने खून की जगह मौत का खौफ़ गर्दिश कर रहा था जब विनम्र ने रिवॉल्वर की दहकती नाल उसके माथे के बीचों-बीच रख कर कहा---“बिज्जू द्धारा खींचे गए फोटो और उनके निगेटिब्ज कहां है ?"

मरने से बचने की अभिलाषा ने मारिया से कहलवाया ।

" म- मेरे 'बार' में । बार में मौजुद मेरे पर्सनल बेडरुम में ।।"

" बस करो.. बस करो। प्लीज ।" इलैक्ट्रीक शॉक्स ने चक्रधर चौबे को मानो तोड़ डाला------"कुबूल करता हूं । विंदु की हत्या मैंने ही की है । मैंने ही गला दबाकर मारा था उसे ।"

" क्यो?" टमाटर खाते गोडास्कर ने पूछा ।

"कारण वही है जिस तक तुम पहले ही पहुंच चुके हो ।" इलेक्ट्रिक चेयर पर बैठा चक्रधर चौबे हाल वैहाल हो चुका----"मैं उसकी हत्या के ईल्जाम में विनम्र को फंसाना चाहता था ताकि मुकम्मल

'भारद्वाज कंस्ट्रक्शन कम्पनी" उसी तरह मेरे कब्जे में आ जाए जिस तरह मेरे द्वारा विनम्र को सोंपने से पहले थी ।"

"अगर तुम यही स्थिति बहाल करना चाहते थे तो विनम्र को सौंपी ही क्यों थी? सारा होल्ड तो तुम्हारा था ही ।

विनम्र को अपने नीचे काम करने पर मजबूर कर सकते थे ।"

" ब-बताता है । सव कुछ बता दूंगा । मगर प्लीज, पहले उसे वहाँ से हटा दो । मैं और नहीं सह सकता ।" कहने के साथ उसने गर्दन से उस कांस्टेबल की तरफ इशारा किया जो इलेक्ट्रिक मशीन के नजदीक खड़ा था ।

गोडास्कर के इशारे पर बार--बार बहीं चक्रधर चौबे को इलैक्ट्रिक शाक दे रहा था ।

 


गोडास्कर ने अपने उस हाथ से कांस्टेबल को मशीन से दूर हटने का इशारा किया जिसमें टमाटर था ।

कांस्टेबल एक तरफ हट गया ।।

गोडास्कर ने टमाटर में एक और "बुड़क' मारने के साथ कहा----"चालू हो जाओं मामा जानी ।"

"विनम्र के पिता यानी मेरे जीजा की मौत के बाद व्यापार को सम्भालने वाला क्योकि कोई और नहीं था इसलिए मुझें मौका मिला । अगर ये कहूं तब भी गलत नहीं होगा, जिस तरह बिल्ली के भाग्य से कभी-कभी छींका टूट जाता है । उसी तरह जमा-जमाया बिजनेस मेरी झोली में अा गिरा था । खुद को बहन और भांजे का सबसे वड़ा शुभचिन्तक दर्शाया और मुकम्मल कंस्ट्रक्शन कम्पनी का मालिक वन बैठा । मुझे उस वक्त विनम्र को पालने-पोसने और पड़ाने-लिखाने में कोई बुराई नजर नहीं अाई । अाज कह सकता हूं ---मैं दूरदर्शिता से काम नहीं ले सका या । पहला झटका तब लगा जब विनम्र जवान हो गया । अमेरिका से बिजनेस मेनेजमेन्ट का कोर्स करके वापस अाया । कुंती कहने लगी--------" भैया वह वक्त अा गया है जब हमे विनम्र की अमानत उसे सोंप देनी चाहिए । वहुत मेहनत कर ली आपने । अब आपके आराम का बक्त्त अाया है । विनम्र मेहनत बनेगा और अाप चेन से लाइफ़ इन्जॉय करेगे । मैं कुंती की इस किस्म के बातो को सुनकर टालता रहा मगर कब तक टाल सकता था? उन बातों को ज्यादा अनसुनी करने का मतलब था-मेरी नीयत पर कुंती को शक हो जाना । एक दिन ऐसा आ ही गया जब मुझें सारी बागडोर विनम्र को सौंपनी पड़ी । उस वक्त भी ज्यादा झटका नहीं लगा था ।

कारण

विनम्र की यह कहना था---"काम भले ही मैं देखूंगा । मामा असली मालिक आप ही रहेगे ।" मेरा दिल उस वक्त गदगद हौगया था ।।।

सोचा था---कमान विनम्र को सौंपकर मैं कोई ज्यादा बड़ी भूल नहीं कर रहा हूं ।' बहरहाल, एक दिन बाप को भी बेटे के जबान हो जाने पर सव कुछ उसी के हवाले करना होता है मगर थीरे-धीरे मेरी समझ में यह अाता चला गया'----बातो और 'प्रैक्टिकल‘ में बड़ा फर्क होता है । मैं यह नहीं कहूंगा कि विनम्र या कुंती ने मुझे उपेक्षित किया ।। बस यूं समझो-उपेक्षित होता चला गया मैं । बात स्वाभाविक भी थी । कम्पनी का मालिक तो बहीं होता है जो मालिक बाले काम करे । वे सारे काम विनम्र कर रहा था । सो, स्टाफ की नजरों मैं बही मालिक था । अब किसी की आखों में मैं अपने लिए वह सम्मान नहीं देखता था जो देख पाने की आदत मालिक रहते पड़ गई थी। वस । ऐसे ही हालात मुझे कचोटने लगे मालिक का सम्मान पाने की इच्छा बलवती होती चली गई यह काम तभी हो सकता था जब्र विनम्र न रहे । झूठ नहीं बोलूंगा ।। । कई बार विनम्र की हत्या करने का ख्याल भी दिमाग मे आया परन्तु अंजाम देने का साहस न जुटा सका । उस दिन मैंने अपने षडृयंत्र का ताना-बाना बुन लिया । जिस दिन एक -स्टाफ मेम्बऱ से पता लगा-नागपाल ने विनम्र को ओबराय में बुलाया है और बतोर रिश्वत बह उसे लडकी पेश करने वाला है । मैंन सोचाे -खांत्मा विनम्र का नहीं, लड़की का करना चाहिए इस तरीके से कि हत्या के इल्जाम मैं विनम्र फंस जाए । उसके बाद मैंने जो कुछ जैसे किया, वह तुम जानते ही हो ।" इतना कहकर चक्रधर शांत होगया ।

“फिर भी बताओ-कैसे, क्या किया?"

"मैँ अपने कमरे के दरवाजे के "की होल' से सुईट के दरवाजे पर नजर रखे हुए था । ज्यादा विस्तार में न जाकर अगर केवल यह बता दू तो शायद आपके लिए काफी होगा कि आधे घंटे के अंदर मैं विनम्र के वापस जाने पर चौंका था । क्योंकि जो दावत बिदू के रुप मैं उसे दी गई थी वह इतनी जल्दी खत्म नहीं होनी चाहिए थी । यह तो मुझे बाद में पता लगा----विनम्र ने विदु की दावत ठुकरा दी थी । तव बाद अाया सुईट से निकलते वक्त विनम्र थोडा भन्नाया हुआ था । उस ववत मैंने इस बात पर बस ध्यान नहीं दिया था । देता भी कैसे? दिमाग तो अपने प्लान को कामयाब करने में उलझा हुआ था । उसी के तहत सुईट के दरवाजे पर पहुचा । कालबेल बजाई । बिंदू ने दरवाजा खोला था । अपने सामने एक अजनबी को देखकर अभी, वह ठीक से चौंकी भी नहीं थी कि मैंने झपटकर उसकी गर्दन दबा दी और तभी छोडा़ जब वह मर चुकी थी ।।

जब वह मर चुकी । हत्या के वाद सोचा---पुलिस को उसकी गर्दन से मेरी अगुलियों के निशान मिल जायेगे । बाथरूम में गया । एक टॉवल लाया । लाश की गर्दन से अपनी अंगुली के निशान साफ किए और फिर गर्दन के चारों तरफ इस तरह लपेट दिया जेसे हत्या उसी से दवाकर की गई हो ।"

" बिज्जु-तुम्हारे पंजे में कैसे फंस गया?"

"बात तब की है जब में बिंदू की लाश पर टांबल लपेट रहा था ।" ' चक्रधर चौबे इस तरह कहता चला गया जैेसे यह सव कहना उसकी मजबूरी हो-----"परछाई सी सुईट के बेडरूम से निकलकर मुख्य द्वार की तरफ लपकी । मैं चौंका । वह डरा जा था । इतना काफी था-उसने मेरे हाथो से होती बिंदू की हत्या देखी है । मैं झपटा । जेब से डोरी निकलकर उसके गले में डाली और…

'एक मिनट । गोडारकर ने टोका । सारा टमाटर गडप किया ओंर पूछा…"डोरी तुम्हारी जेब में कहाँ से आगई?"

"घ-घर से लेकर चला था ।" चक्रधर चौबे थोडा गड़बड़ाया ।

टिमाटर चबाते गोडास्कर ने अगला सवाल पूछा ।

" किसलिए?"

"म-मेरा इरादा बिंदू को उसी डोरी से खत्म करने का था । "

' "मगर खत्म किया विज्जू को ?"

" हां । "

"ओंर बिदू की ईह लीला हाथों से समाप्त कर दी?"

"वता चूका हूं । "

"बता तो चुके हो मामा जानी मगर बात जम नहीं रहीं ।" इन शब्दों के साथ गोडास्कर कुर्सी से खड़ा होगया ।

चक्रधर चौबे के मुंह से लड़खड़ाती आवाज निकली-----" मतलब?"

'"मामला थोड़ा उल्टा बल्कि थोड़ा नहीं पूरा का पूरा ही उल्टा हो गया है ।" कहने के साथ गौडास्कर ने टॉर्चर रूम मैं चहलकदमी सी शुरू कर दी । जेब से ट्रपल फाईव का चॉकलेट निकालता हुआ बोला------ "डोरी का इस्तेमाल तुम्हें बिंदू को मारने में करना चाहिए था , बकौल आपके जैसा कि सोचकर गए थे क्योंकि उसका मर्डर करते वक्त तुम शान्त दिमाग थे । मानसिक रूप से मर्डर करने के लिए तैयार थे । तुम्हें मालूम था-दृरवाजा खुलेगा । सामने बिंदू होगी ।

उसका क्रियाकर्म करना है । गोडास्कर के ख्याल से तो डोरी उस वक्त हाथ में तैयार होनी चाहिए थी क्योकि उसे लाये ही बिंदू पर इस्तेमाल करने के लिए थे मगर यूज नहीं की और फिर यूज की तो वहां के जहां उसे यूज करने का होश ही नहीं होना चाहिए था । बिज्जू का कत्ल अचानक करना पड़ा । हड़बड़ाहट में करना पड़ा । तुम्हरि पास डोरी निकालने का वक्त कहाँ रहा होगा उस वक्त । उसका कल्ल भी हाथों से होना चाहिए था । बिंदू का डोरी से । यहां सब उल्टा-पुल्टा है । नहीं ।" उसने चाकलेट में बूड़क मारने के साथ कहा---"बात ज़मी नहीं दोस्त । इसने कोई पेच है ।" चक्रधर चौबे के चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी थी । बोला------" जो मैंने किया या हालत ने मुझसे कराया बह बता रहा हूं। अब आपको यह जम नहीं रहा तो इसमे मैं क्या कर सकता हूं ?"

" जानता हूं मामा जानी, तुम कुछ नहीं कर सकते । करना तो सब कुछ गोडास्कर को ही पड़ेगा । खैर !! ये बताओ-उसके बाद क्या हुआ? तुम्हें कब और कैसे पता लगा कि विज्जू ने फोटो खींचे हैं?''

"भागते वक्त कैमरा उसके हाथ में था जो उसकी मौत से पहले ही क्रापेंट पर गिर क्या था । उसे देखने के बाद कुछ भी समझने की जरूरत बाकी नहीं रह गई थी । मैंने कैमरा उठाया । शटर खौला । रील निकालकर अपनी जेब के हवाले की और कैमरा बंद करके बिज्जू की जेब से ठूंस दिया । उसके बाद अाप जानते ही हैं, बिज्जू की लाश को ।

"रील कहाँ है?" गोडास्कर ने चाकलेट 'कुतरी' ।

"उसे मैं जला चुका हूं ।" चौबे के पास जवाब तैयार था ।

"शाबास । काफी अच्छा जवाब सोच रखा था । यहां अाकर तुमने गोडस्कर की बधिया बैठा दी । अागे बड़ने के सारे रास्ते बंद कर दिए ।"

" क्या मतलब?"

"मतलब सीधा है मामा जानी । काफी घुटे हुए हो तुम । पहले ही सोच चुके हो----जो बयान टॉर्चर चेयर पर दिया है, कोर्ट के कटघरे में खड़े होकर उस सबसे मुकर जाना है । एक ही बात कहनी है-हवालात में तुमने जो कुछ कहा पुलिस ने टॉर्चर करके जबरदस्ती कहलवाया था । यह सब झूठ है और.... .यह सब सच है, यह साबित करने बाला गौडास्कर के पास कोई प्रूफ नहीं होगा । नहीं मामा जानी, गोडास्कर इतना वड़ा गधा नहीं है । तुम्हें कोर्ट में पेश करने से पहले गोडास्कर के पास इस बयान को सच साबित करने बाला प्रूफ होगा ताकि तुम मुकर ना सको और

प्रूफ बिज्जू द्वारा खींचे गए फोटुओं से शानदार क्रोई हो नहीं सकता । नतीजा ये ---- तुम्हें बताना होगा, फोटो या रील कहां हैं?"

"कह चुका है । रील मैने जला दी । भला ऐसी चीज को छोड़ता ही क्यों जो मेरे गले का फंदा वन सकती थी?"

"'हवलदार ।" गोडास्कर ने इलैक्ट्रानिक मशीन के नजदीक खडे़ शख्स को पुकारा ।

"यस सर ।" वह मुस्तेद था ।

"समझ ही गए होगें , मामा जानी को खुराक की जरूरत है ।"

समझ चक्रधर चौबे भी गया गोडास्कर क्या कह रहा है । उधर हवलदार मशीन के स्वीच की तरफ बढा इधर आतंकित चौबे चीख पड़ा।

" प प्लीज । ऐसा मत करो गोडास्कर । मैं सच कह रहा हूं । रील मेरे पास नहीँ हैे ।"

अागे के शब्द चीख में तब्दील हो गए । सारा शरीर विधुत तरंगों से थरथरा उठा था ।

उसके बाद तो मानो यह सिलसिला ही चल पड़ा । हवलदार इलेैक्ट्रिक शाक दे रहा था । चक्रधर चौबे बार-बार कह रहा धा-‘रील मेरे पास नहीं है हूँ चाकलेट खाते गेडास्कर को रील चाहिए थी । रील जव चक्रधर चौबे पर थी ही नहीं तो वे कहां से देता?

अंतत: 'चीखता-चिल्लाता' चौबे बेहोश हो गया ।

यहीं वक्त था जब हवालात का दरवाजा खुला ।। दौलतराम नजर

अाया ।।।

गोडास्कर उस पर घुड़का----" तुं कहां था वे?"

"आप ही ने तो भेजा था सर । फिंगर प्रिंटृस एक्सपर्ट के पास ।"

"औह ।। हां । याद अाया । क्या खबर लाया वहां से?"

दौलतराम जानता था…यह गोडास्कर की स्टाईल है, वरना याद उसे सव रहता था । बोला----"रिपोर्ट अापकी मेज पर रखी है सर ।"

‘रिपोर्ट वहां है तो गोडास्कर यहां क्या कर रहा है? ' कहने के साथ बुलडोजर-सा दरवाजा की तरफ लुढ़का ।

 


कुछ देर बाद उसकी टेबल पर रखा टेबल लेम्म अॉन था । वह फिंगर चिप्स चबाता हुआ कुर्सी पर बैठा रिपोर्ट का अध्ययन कर रहा था ।।।

एकाएक उसने अपना भारी-भरकम चेहरा उपर उठाया । मेज के उस पार सावधान की मुद्रा में खडे़ दौलतराम से कहा ।

"इस बार तो गोडास्कर भी गच्चा खा गया दौलतराम?”

"ग-गच्चा? और अाप! नहीं सर । मैं नहीं मान सकता ।"

"अबे जब गोडास्कर ही मान रहा है तो तेरे मान लेने से कौन सा तेरी शान घट जाएगी ।"

" ज- जी ?" वह सकपकाया ।

" इलैक्ट्रिक चेयर पर पड़ा जो शख्स कुछ देर पहले हाय-हा्य कर रहा था, कातिल बह नहीं है ।"

"क-वया बात कर रहे है सर?" दौलतराम उछल पड़ा -----"मैं नहीं मान सकता । आपसे और गलती । हो ही नहीं. . .

"हो चुकी है दौलत राम । गल्ती तो हो चुकी है और हो भी गई है तो अनर्थ नहीं हो गया । गोडास्कर भी इंसान है है आसमान से उतरा फरिश्ता नहीं है । इंसान तो साला है ही गलतियों का पुतला ।"

"मगर सर, इतनी बड्री बात आप कह किस वेस पर रहे है?”

"बेस सामने पड़ा है गोडास्कर के । ये रिपोर्ट । सुईट के अंदर से नागपाल की अंगुलियों के निशान मिले है।। बिंदू के निशान मिले है । बिनम्र और बिज्जू के निशान मिले हैं ।। नहीं मिले है तो मामा जानी के निशान नहीं मिले है । एक ही मतलब हैं इस बात का । यह शख्स सुईट के अंदर गया ही नहीं । गया होता तो कहीं न कहीं से निशान जरूर मिलते ।"

" सर । हो सकता है उसने अपने निशान मिटा दिए हो ?"

'"मिटाता तो मिटाने के निशान होते ।वे भी नहीं हैं उस पोजीशन में इन चारों के निशान भी कहीं न कहीं से मिटे हुए जरुर होने चाहिएं थे । नहीं दौलतराम । गोडास्कर मान ही नहीं सकता कि मामा जानी सुईट गए थे ।"

"तो फिर उन्होंने हत्याएं करनी क्यों कुबूल कर ली ?"

"गोडास्कर तुझे इलाक्ट्रिक चेयर पर बैठ देता है । दो चार झटकों से ज्यादा झटके नहीं देने पड़ेंगें । गोडास्कर तेरे सामने खडा होगा और तू कुबूल कर लेगा कि कि तूने गोडास्कर का कत्ल एक साल पहले करके दो गज जमीन के नीचे दफना चुका है ।"

दौलतराम के जिस्म में झुरझुरी-सीं दौड़ गई बोला---"कह तो आप ठीक रहे हैं सर ।"

"अब दूसरी ठीक बात सुन ।"

" सुनाइए ! "

"बिज्जू का कत्ल भी मामा जानी ने नहीं किया ।"

"तो मामा जानी ने किया क्या है सर?"

"उस पर खोपडी बाद में घुमाएंगे । फिलहाल किस्सा इस रिपोर्ट का है । रिपोर्ट कह रही है…कैमरे पर भी मामा जानी की अंगुलियों का कोई निशान नहीं है । जबकि कहलवा तो गौडास्कर ने उससे यह भी लिया है कि विज्जू का कत्ल करने के बाद उसके कैमरे से रील उसी ने निकाली थी । जो गोडास्कर ने चाहा, कहता गया वेचारा । अटका बहां जंहा मजबूरी थी ।।। रील जव उसके पास है ही नहीं तो दे कहाँ से देता ?"

"तो रोल किस पर है सर ?"

" किसी लड़की पर !"

" लड़की पर?"

"कैमरे पर बिज्जूके अलावा केवल एक लड़की की अगुलियों कै निशान है "

" बिन्दू के अलावा इस केस में और कौन-सी लडकी आ घुसी?"

" म-मारिया ।" गोडास्कर मेज पर जोरदार घुसा मारने के साथ एक झटके से खडा हो गया--'"मारिया ही हो सकती है वहां या उसकी वहन । क्या नाम था उसका? शायद क्रिस्टी । गोडास्कर को उन दोनों की अंगुलियों के निशाने लेने होंगे ।"

"इस वक्त सर?"

"क्यों इस बत्त क्या हुआ ?"

"रात कै बारह बज रहै है ।"

"तू बार-बार भूल जाता है दौलतराम ? याद रखा कर । पुलिस वालो की ड्यूटी चीबीस घंटे की होती है । तू यहीं रह ।। सीट सम्भाल गौडास्कर की । गोडास्कर मारिया बार, यूं गया और यूं अाया ।" कहने के बाद दौलतराम को वह अफिस के दरबाजे से बाहर निकलता नज़र अाया । उसे यूं लगा-जैसे नजदीक से हबा का झोंका गुजरा हो ।

" य-यकीन करो मेरा ! मेरा यकीन करो मेरा ! " पीले जर्द चेहरे बाली

मारिया का लहजा कांप रहा था--"मैंने सब कुछ तुम्हें दे दिया है । निगेटिब्ज की पूरी रील और सारे पोजिटिव । अब इन फोटुओं का मेरे पास कोई प्रिन्ट नहीं है ।"

रिवॉल्वर उसके मस्तक पर रखै विनम्र गुर्राया--"अगर इनमे से एक भी फोटो का एक भी प्रिंट तेरे पास निकल आया तो. . .

"नहीं निकलेगा । कसम खाकर कह सकती हूं ।। सव तुम्हें सौंप दिए है ।"

इस वक्त वे "मारिया बार' के बेसमेन्ट में स्थित मारिया के पर्सनल बेडरूम में अामने-सामने खड़े थे ।। सच्चाई ये है कि बिनम्र को अब इस खेल में आनन्द अा रहा था है अानन्द आने का कारण था-मारिया की हालत ।

बह तो यह सोचा करता था कि अगर किसी पर रिवॉल्वर तान दिया जाए तो उसकी सिटृटी-पिटृटी गुम हो जाएगी मगर हालत इतनी बदतर भी हो सकती है जितनी मारिया की थी , ऐसी कल्पना कभी नहीं कर पाया था । बिंदू ओर क्रिस्टी के कत्ल उससे किसी और ताकत ने कराए थे । नाटे को हडबडी मे गोली मार बैठा था । मारिया के मस्तक पर हालात ने रिवॉत्वर रखवाया था ।

उस वक्त बह और करता भी क्या मगर, उसके बाद के सारे खेल ने उसे आनन्दित कर दिया था । मारिया के चेहरे पर मौत के खौफ की कालिख देखी थी उसने ।

रिवॉल्वर की नोक पर मारिया को मकान से बाहर निकाला । गेलरी में खडी वैन की ड्राईविंग सीट पर बैठाया । उसकी कनपटी पर रिवॉल्वर रखकर बगल वाली सीट पर बैठ गया था । उसने कहा’-"गाडी स्टार्ट कर ।" तो उसने स्टार्ट कर दी । इतना ही नहीं, सारे रास्ते उसके आदेशों का इस तरह पालन करती रही जैसे सर्कस में रिंग मास्टर के कोडे़ पर शेर करता है ।

वेन उसके अादेश पर मारिया बार के बाहर रुकी ।।

ग्यारह बज चुके थे ।

बार बंद हो चुका था । स्टाफ़ का कोई आदमी नहीं था यहां और फिर जिस 'शराफत' के साथ मारिया उसे अपने बेडरूम में लाई । एक ही बार के कहने पर सारे पोजिटिब्ज और निगेटिव की रील सोंप दी ।

उससे बिनप्र को लगा---"सब कुछ कितनी आसानी से हो गया । बह सब कुछ जिसके बारे में यकीन ही नहीं थी ।। जिस काम के बह दो करोड तो क्या, उससे कई गुना ज्यादा तक खर्च करने को तेयार था बह फ्री में हो गया ।

कितने आराम से ।

दो करोड से भरी अटैची अभी भी वेन से पड़ीं थी ।

ये खूब रही । भला इससे आसान रास्ता और क्या हो सकता है?

चाहे जिसके सिर पर रिबॉल्बर रखो और चाहे जो करा लो ।

वस ।।

थोड़ी सी हिम्मत की जरुरत होती है ।

उसे यकीन था…मारिया सच बोल रही है ।

सब कुछ सौप चुकी है उसे । कुछ छुपाने या झूठ बोलने की स्थिति में ही कहां थी बेचारी?

अब विनम्र के सामने समस्या थी तो केवल एक ।

मारिया का क्या करें?

जीवित कैसे छोड सकता था उसे?

छोड़ने का मतलब था----अब तक के किए-कराए धरे पर पानी फेर देना ।

उस जैसी 'गवाह’ को भला कैसे छोड़ा जा सकता था । जबकि वह बेचारी उसके रिवॉल्वर की नोंक पर नाची ही अपनी जान बचाने के लिए थी । वह वच नहीं सकती थी । विनम्र को इस बात का अफसोस था ।

हालात को शायद मारिया ने भी अच्छी तरह 'रीड' कर लिया था । तभी तो कहा-----" व-- विनम्र मैं तुमसे वादा करती हूं --आज ही रात से शहर और फिर यह देश ही छोड़ दूंगी । कहीं और जाकर बस जाऊंगी । किसी ऐसी जगह जहां इण्डियन पुलिस के हाथ कभी मुझ तक न पहुच सकें?" मुस्करा उठा विनम्र !!

मरने के डर से किस कदर डर गई है बेचारी । सोचा-------" हां , एक सूरत इसे जीवित छोड़ देनेे की हो सकती है ।" बाएं हाथ में मोजूद फोटो और रील जेब में सरकाए ही थे कि…

बंद दरवाजे पर दस्तक पड़ी ।

 


दोनों उछल पड़े । पलक भी नहीं झपकी थी कि विनम्र के चेहरे पर भी मारिया जैसा खौफ उभर अाया ।

" क-कौन हो सकता है?" फुसफुसाकर विनम्र ने पूछा ।

मारिया बेचारी के हलक से तो आबाज तक न निकल सकी । इशारे ही से 'पता--नहीं' कहा ।

विनम्र ने रिवॉल्वर से इशारा किया-------" पूछो ।। "

मारिया पूरी ताकत लगाने के बाद हलक से आवाज़ निकाल सकी । । "क-कौन है?"

"गोडास्कर ।" यह आवाज गडगड़ाती हुई विजली बनकर दोनों पर गिरी ।

उस विनम्र की हालत देखने लायक थी जो बस एक ही पल पहले कामयाबी के कधों पर सवार होकर झूम रहा था ।

बुरी तरह हड़बड़ा गया बह । चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी । जिस्म जूडी के मरीज की मानिन्द कांप रहा था ।

मारिया की हालात भी उससे अलग नहीं थी ।

गोडास्कर की आवाज़ उभरी----"दरवाजा खोलो डार्लिग ।"

विनम्र बड़ी तेजी से मारिया के कान पर झुककर फुसफुसाया--"यहां से निकलने का कोई और रास्ता है?"

जैसे लाश की गर्दन इंकार में हिली ।

विनम्र का जी दहाड़े 'मार-मार कर रोने को चाह रहा था ।।

इस बार गोडास्कर ने दरवाजा न खोलने पर उसे तोड़ डालने की चेतावनी थी । वह चेतावनी इतने ठंडे लहजे में दी गई थी कि मारिया बरबस ही दरवाजे की तरफ बढ गई कांपता-हांफता विनम्र उसका रास्ता रोककर खड़ा हो गया । रिवॉल्वर की नाल एक बार फिर उसके मस्तक पर रख दी थी ।

सूखे होठों पर जीभ फेरती मारिया ने कहा-----“वह वगैर दरवाज़ा खुलवाए नहीं जाएगा ।"

"धीरे बोल ।" विनम्र दांत भींचकर गुर्राया ।

"समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे वि…

"धांय ।"

विनम्र ने उसके मुंह से अपना नाम निकलने से पहले ट्रेगर दबा दिया ।

एक चीख के साथ मारिया कटे वृक्ष सी गिरी ।।

उधर, फायर की आवाज ने मानो तहलका सा मचा दिया ।

"क्या हो रहा है अंदर?" गोडास्कर की इस दहाड़ के साथ यूं लगा जैसे दरवाजे से हाथी टकराया हो ।

विनम्र समझ गया----वह गोडास्कर का विशाल जिस्म होगा ।।

एक ही 'बार' में दरवाजा चरमरा गया ।

दूसरा 'वार हुआ ।

विनम्र को इस यकीन ने दहला दिया कि दरवाजा गोडास्कर का "तीसरा" वार नहीं झेल पाएगा ।

झपटकर खुद को दरवाजे के नजदीक दीवार से सटा लिया । 'तीसरे वार' पर किबाड़ का उपरी हिस्सा चौखट से अलग हो गया ।

चौथे वार पर उसे बेडरूम के अंदर गिर पड़ना था । विनम्र को कुछ और नहीं सूझा तो हाथ बड़ाकर 'डंडाला' खोल दिया ।

बाहर से गोडास्कर ने पूरी ताकत लगाकर 'चौथा वार' किया था मगर किवाड "सड़ाक' से खुल गया ।

झोंक में यह फर्श पर पड़ी मारिया के ऊपर जा गिरा ।

विनम्र पलक झपकते ही कमरे से बाहर निकला । यह काम इतनी तेजी के साथ किया था कि गोडास्कर उसे देख न सके । उसे दिखै भी तो केवल पीठ दिखे । जबकि हकीकत ये है----गोडास्कर उसकी पीठ तक नहीं देख पाया था । मारिया के जिस्म से ठोकर खाकर मुंह के वल गिरा था बह ।

जब तक सम्भलकर उठा । पलटा । तव तक "धाड़' की आवाज के साथ दरवाजा बंद हो चुका था । गोडास्कर ने अपने हाथ में मौजूद रिवाल्वर से फायर किया । गोली बंद किवाड़ पर टकराकर रह गई हालांकि वंह अगले ही पल झपटकर दरवाजे पर पहुच चुका था मगर तव तक दरवाजा बाहर से बंद किया जा चुका था । ऊपर की तरफ से चौखट से अलग हो गया दरवाजा जब केवल अंदर की तरफ खींचकर तोड़ा जा सकता था । मगर काफी टटोलने के बावजूद गोडास्कर को किवाड़ में ऐसी कोई चीज हाथ नहीं लगी जिसे पकड़कर उसे अपनी तरफ खींच सके ।।

कंधे के जैसे वार करके उसने बाहर से दरवाजे को तोड़ा था बैसे 'बार अंदर से करके नहीं तोड़ा जा सकता था ।

गोडास्कर कसमसाकर रह गया ।

दरवाजे को खोलने या तोड़ डालने की कोई जुगत नहीं थी । तभी कानो में मारिया के कराहने की आबाज आई ।

वह उसकी तरफ झपटा । मारिया वस मरने ही बाली थी । गोडास्कर फर्श पर बैठ गया ।

उसका सिर उठाकर अपनी जांघ पर रखा । करीब-करीब चीख पड़ा----"कौनं था ? कौन था वह?"

" बह पागल है ।" मारिया अपने मुंह से हर लफ्ज अटक-अट्ककर निकाल पाई--" जुनूनी हत्यारा । क-किसी मर्द को लुभा रही लड़की " को देखते ही गर्दन दबाकर मार डालता है । क-क्रिस्टी को भी मार डाला ।"

"है कौन बो?" गोडास्कर चीखा--"सारी बाते भूलकर नाम बताओ मारिया ।"

" व-वो-वो-वि........."

"हा । हां । बोलो ।" गोडास्कर ने उसे झंझोड़ा मगर, सिर उसकी जांघ पर लुढक चुका था ।।।

मारिया के बेडरूम का दरवाजा बाहर से विनम्र ने नहीं, कुंती देवी ने बंद किया था ।

विनम्र को तो दरवाजा बंद करने का होश ही नहीं रह गया था । वह तो बाहर निकलते ही एक ही जंम्प में काउन्टर पार करके उस हाल में पंहुच गया था जहां शराबी लोग बैठकर पिया करते थे । रुख सीढियों की तरफ था मगर अपने पीछे दरवाजा बंद होने की आवाज सुनकर चौंका ।

ठिठका ।

उस तरफ से गोली चलने की आवाज भी आई थी । याद अाया----बाहर निकलते वक्त उसने एक साए को दरवाजे के नजदीक हरकत करते देखा था ।

दिमाग में बडी तेजी से विचार कौंधें------" कौन थी वह? दरवाजा किसने बंद किया?"

घूमा ।

और अभी ठीक से कुछ समझ भी नहीं पाया था कि दौड़ता हुआ साया उसके नजदीक अाया ।

हाथ पकडकर उत्तेजित स्वर में बोला…"भागो विनम्र ।। गोडास्कर दरवाजा तोड़कर बाहर निकल अाया तो हम वच नहीं सकेंगे ।"

विनम्र के जेहन में मानो अणु बम फटा ।

मां ।।

ये तो मां क़ी आंवाज है

कुंती देवी की ।

सच्चाई ये है कि हैरत की ज्यादती के कारण वह आवाज की आज्ञा का पालन करना भूल गया था । यह जानने के बावजूद भूल गया था कि 'यही उसके हित में है ।' जिन हालात में वह हैं, यही करना चहिए ।।

गोडास्कर बाहर निकल अाया तो सारे किए धरे पर पानी फिर जाएगा ।

वह आंखे फाड़े साए की तरफ़ देख रहा था । साया अब भी कम रोशनी कि के कारण साया ही नजर अा रहा धा । उसे यकीन अाकर नहीं दे रहा था कि वह उसकी मां ही है ।

इधर, कुंती के खींचने पर भी वह सीढियों की तरफ़ नहीं खिंचा तो कहा-"विनम्र प्लीज, सोचने के लिए हमारे पास एक पल भी नहीं है ।निकलो यहां से ।। "

बिनप्र को लगा--- बात सच है । सो, सीढियों की तरफ लपका । जेहन अभी भी फिरक्नी की तरह घूम रहा था ।

सीढियों पर पहुंचकर कुंती देबी ने वहाँ मोजूद दरवाजा भी बाहर की तरफ से बंद कर दिया । बिनम्र अागे था, कुंती देवी पीछे । सीढियां चढ़कर ऊपर कमरे में पहुचे । कुंती देबी ने वहाँ मौजूद दरवाजा भी बंद कर दिया ।

फुटपाथ पर खड्री बेन की तरफ दौडती बोली-"गोडास्कर ने तुम्हें देखा तो नहीं?"

" नहीं ।' वेन के नजदीक पहुंचकर विनम्र ने 'साए' की तरफ देखा ।

वहां स्ट्रीट लाईट के भरपूर प्रकाश के कारण उसने कुंती देवी को साफ देखा था ।।

वह हमेशा की तरह अपने परम्परागत लिबास में थी । सफेद साड़ी, खुले बाजू-वाला सफेद ब्लाऊज ।

विनम्र की हैरत कम होने का नाम नहीं ले रही थी । भागकर अाने के कारण दोनों की सांसे फूली हुई थीं ।

वावजूद इसके विनम्र चीख-सा पड़ा----" त-तुम यहां क्या कर रही हो मां?"

कुंती देवी हड़बड़ा-सी गई घबराकर इधर-उधर देखा ।। वेन के नजदीक ही गोडास्कर की जीप खड्री थी ।

कुंती देवी ने कहा-----'"यह जगह ऐसी बात करने केलिए मुनासिब नहीं है । यहाँ हमे किसी ने देख लिया और बाद में गोडास्कर को बता दिया तो अब तक किया गया सारा संघर्ष वेकार होजाएगा ।"

विनम्र को बात ठीक लगी ।

उसने भी चारों तरफ देखा ।

हालांकि बस्ती सुनसान पडी थी । मगर किसी भी वक्त कोई भी निकलकर सड़क पर जा सकता था ।

विनम्र ने जेब से वेन की चाबी निकली ।।

ड्राईविंग डोर खोला । कुंती देवी घूमकर कंडेक्टर गेट पर पहुंची ।

अगले पल वे विनम्र की बगल वाली सीट पर बैठी थी । इधर विनम्र ने इग्नीशियन में चाबी घुमाकर गाड़ी स्टार्ट की उधर सामने बाले मोड़ से लढ़खड़ाता हुआ एक शराबी मुड़कर इस सडक पर आया । मगर अब विनम्र या कुंती देबी में से किसी को उसकी परबाह नहीं थी ।। वेन कमान से निकले तीर की मानिन्द शराबी की बगल से गुजरी ही थी कि कुंती देवी ने पूछा ---" तुम सारे पाजेटिव और निगेटिव ले आए न?"'

"हां । मगर...........

उसे बोलने का मौका दिए वगैर कुंती ने अगला सवाल किया---" मारिया का क्या हुआ?"

"वह मर गई है ।"

"कैसे?"

“मैंनें उसे गोली मारी थी।"

"हां । कमरे के अंदर से मैंने फायर की अावाज सुनी थी । इसीलिए पूछा…उस आवाज को सुनकर गौडास्कर पर भी मानो जुनून सवार हो गया था । वह हाथी की तरह पीछे हट-हटकर की दरवाजे पर बार करने लगा परन्तु. . क्या तुम्हें यकीन है, मारिया मर गई थी ?"

"मतलब ? "

" अगर वह बच गई होगी तो गोडस्कर को बता देगी गोली मारने बाले तुम थे । ऐसा होगया तो .........

"नहीं होगा । वह मर चुकी थी ।"

कुंती देबी बड़वड़ा उठी---"भगवान करे ऐसा ही हो ।"

"मगर तुम यहाँ क्या करं रहीं थीं मां?" मौका लगते विनम्र एक बार फिर चीख पड़ा-" तुम क्या कर रही थी बंहां?"

" घर चलो । सब बता दूंगी । तुम 'कठपुतली' क्यों वने, शायद यह बताने का वक्त अा गया है ।" कहने के बाद कुंती देवी ने सिर इस तरह कुर्सी की पुश्त पर टिका दिया था जैसे जीवन की दौड में दौड़ते--दौडते थक गई हो ।।

आंखें बंद करली थी उन्होंने ।

विनम्र ने महसूस किया---बह रो रही हैं । आंसूं बंद पलकों से झिरी बनाकर कपोलों पर लुढक अाए थे ।। विनम्र की हिम्मत यह तक पूछने की न पडी वे रो क्यों रहीं हैं । वेन को विला तक नहीं ले गए थे ।

रास्ते ही में एक जगह छोड़ दिया । अपनी अंगुलियों के निशान मिटा दिए ।

 


अटैची निकली । कुछ देर पैदल सफर किया ।

फिर एक टैक्सी के जरिए विला पहुचे ।। अपने कमरे में ले जाकर कुंती देवी ने उसे एक कुर्सी पर बैठा दिया ।

बैठते वक्त यह कुर्सी विनम्र को कुछ अलग किस्म की लगी थी ।

बावजूद इसके वह कोई शक नहीं कर सका था लेकिन उस वक्त तो मारे हैरत के उसके रोंगटे खड़े हो गए जब कुंती देवी ने सामने रखे टी .वी ० के ऊपर से एक रिमोट उठाया ।

उसका एक बटन दबाया ।

और परिणाम स्वरूप "खटृट-खटृट’ की आबाज के साथ कु्र्सी के दोनों हत्थों से चमड़े के पटृटे निकले और पलक झपकते ही उन पट्टों ने विनम्र को कुर्सी के साथ जकड़ लिया ।

अब अपनी मर्जी से कुर्सी से उठना तो दूर वह हिल-ठुल तक नहीं सकता था ।

हलक फाड़कर दहाड उठा विनम्र--------" ये तुमने क्या किया मां? क्यो किया ऐसा? ये मै तुम्हारा कौन-सा रुप देख रहा हूं?”

विनम्र के पिता थे वे ।

वे जो अपने से काफी छोटी-उम्र की निहायत ही खूबसूरत लड़की से कह रहे थे-----" मेरा ख्याल है तुम्हें मेरी बात मान लेनी चाहिए । इसमे बुराई ही क्या है? ऐसे अनेक लोग हैं जिनकी दो या दो से ज्यादा पत्नियां भी एक छत के नीचे रहती हैं । मैंने उन्हे बहनों की तरह रहते देखा है ।

फिर भी, यह नहीं कहूंगा-----तुम कुंती की बहन की तरह रहना । पर इतना तो कर सकती हो----भले ही किसी नौकरानी की तरह सही मगर कुंती इस घर के किसी कोने में पड़ी रहे । मैं तुमसे बादा करता हूं रूबी, तुम्हारे अधिकार से कभी कोई कमी नहीं, अाएगी । सव कुछ तुम्हारा है और तुम्हारा ही रहेगा । "

" यह वह कह रहा है, वह शख्स जिसने मुझसे कोर्ट में शादी की है ।" रुबी नामक खूबसूरत लड़की कहती चली गई ----" जिसने शादी करते वक्त मुझसे हजार-हजार वादे किए थे । कहा था----" कुंती को हमेशा के लिए अपने घर से बाहर निकाल देगा ।"

"वही तो किया है रूबी । यही तो किया मैंने ।" विनम्र के पिता गिड़गिड़ा से रहे थे---" तुमसे किए गए वादे के मुताबिक मैंने अपनी ब्याहता को घर से निकाल दिया है अाज वह दर-की ठोकरें खाती घूम रही है । मुझे किसी ने बताया-----भीख मांगकर गुजारा कर रही है बह । प्लास्टिक की झोंपड़ी बनाकर फुटपाथ पर वहाँ रह रही है जहाँ बंगलादेश के शरणार्थी रहते हैं ।"

"और यह सब सुनकर तुम्हारा कलेजा हिल गया?"

" हां । ये सच है रुबी । कुंती के बारे में सुनकर मेरी आत्मा तक कांप उठी है । रह-रहकर धिक्कार रही है मुझे । कचोट रही है । कह रही है------"तेरी ब्याहता थी । कोई कुसूर भी नहीं था उसका । कुसूर तेरा है । तूने धक्के दे-देकर उसे धर से बाहर निकाला है । इसलिए आज वह गंदी नाली में रेंगने वाले कीडे जैसी जिन्दगी गुजार रही है ।"

"तो तुम यह चाहते हो---" कल वह जिन्दगी मैं गुजारू ?"

"नहीं । मैं ऐसा बिल्कुल नहीं चाहता । ऐसा कब कहाँ मैंने ।। मैं तो ये चाहता हूं कि तुम दोनों...........

" कह चुकी हूं शैलेष । एक बार नहीं, हजार वार कह चूकी हूं ।" रूबी दृढ़ता पूर्वक बोली ---"इस घर में या तो कुंती रहेगी या मैं । अगर तुम उसे यहां लाते हो तो मुझे जाना होगा । मुझे जीनी होगी वह जिन्दगी जिसे आज वह जी रहीं है मगर, कान खोलकर सुन लो मिस्टर शैलेष, मैं कुंती की तरह बेवकूफ़ नहीं हूं । जिसे तुम धक्के मारकर यहाँ से निकाल दोगे और मैं तब भी टसूवे बहाती तुम्हारे कदमों मे गिर जाऊंगी । तुम्हारे न मानने पर धर छोड़कर चली जा्ऊंगी । मुझे अपने अधिकार के लिए लड़ना आताहै ।तुम्हारी 'कीप' जब मैं थी , तब थी-------अब 'कीप' नहीं, पत्नी हूं । कोर्ट में शादी हो चुकी हैं। वह शादी जिसे करते वक्त तुमने मुझसे यहीं वादा किया था जो निभाया भी । कुंती को धर से बेदखल करने का बादा । मगर अब मुकर रहे हो । मैं तुम्हें मुकरने नहीं दूंगी शैलेष । क्यों ? क्यों मुकर रहे हो अब ?"

"रूबी ।। उसके पेट में मेरा बच्चा है ।"

"तो क्या हुआ? कल बैसा ही बच्चा मेरे पेट में भी हो सकता है ।"

"उफ्फ!" कसमसा उठा ---"तुम समझ क्यों नहीं रही?"

"तुम्हे कुंती की कोख मे मौजूद एक बच्चे का ख्याल है । उन दो बच्चों का ख्याल नहीं जो मेरे रखैल रहते तुमने मेरी कोख में डाले थे और फिर तुम्हारे ही कहने पर मैंने 'सफाई' करा ली थी ।"

"तुम भूल रही हो ।" पहली बार शैलेष की आवाज़ ऊंची हुई---“सफाई कराने के लिए मैंने नहीं कहा था । तुम्हारी मर्जी थी वह । अपनी फीगर का ख्याल था । फीगर बच्चे से ज्यादा प्यारी थी तुम्हें ।"

"क्योंकि फीगर ही पर तो कुरबान थे तुम मेरी । बरना कुंती ही में क्या कमी थी जो मेरी तरफ आकर्षित हुए ?"

"हां । ठीक कह रहीं हो । मेरी मति मारी गई थी जो शादी-शुदा होने के बावजूद तुम्हारे रूपजाल में फंसा । मुसीबत मोल ले ली मैने । आदमी साला जब "यौवनजाल' में फंसता है अागे के बारे में कुछ सोच ही नहीं पाता । मुझे पता होता ---- उस छोटे से सुख की इतनी वड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी तो .............

" अब पछताने से कुछ नहीं होगा शैलेष । बच्चे की ख्वाहिश है तो आओ । समा जाओ मुझमें । बच्चा पैदा करना कौन--सा मुश्किल है? दो इसीलिए नाली मे बहा दिए क्योंकि उस वक्त मैं तुम्हारी रखैल थी । अब पत्नी हूं । पैदा कर दूंगी बच्चा । नौ महीने बोझा ही तो उठाना होगा उसका ।"

"बच्चे के लिए जिस तरह की "लेग्वेज’ तुम इस्तेमाल कर रही हो वैसी लेग्वेज इस्तेमाल करने बाली औरत कभी मां बनने के असली सुख को महसूस नहीं कर सकती ।"

"अब तो जैसी हूं , तुम्हारी पत्नी हूं शैलेष । मुझ ही से बच्चा हासिल करना होगा । और कोई रास्ता नहीं है ।"

शैलेष के जबड़े भिंच गए ।गुर्राया---"एक रास्ता है ।"

"कौन-सा रास्ता? ज़रा मैं है तो सुंनू।"

"कानूनी रूप से आज भी कुंती ही पत्नी है ।"

"तुम भूल रहे हो---"हमारी शादी कोर्ट में हुई है ।'"

" भूल तुम रही हो! मैं शादी-शुदा था । तलाक नहीं दे दिया था कुंती को ।

ऐसी अवस्था में तुमसे की गई शादी खुद-व-खुद गैरकानूनी हो जाती है ।"

ऐसा सुनते ही रूबी अवाक रह गई ।।

हालत थी जैसे हवा से परवाज़ करती-करती अचानक जमीन पर आ पडी हो । बहुत देर तक शैलेष को केवल देखती रही । कुछ बोली नहीं । फिर होठो पर मुस्कान पैदा की ।

मादक मुस्कान ।

वह मुस्कान जिसके बारे में वह जानती थी------" शैलेष को अंदर तक रोमांचित कर देने के लिए काफी है ।"

मगर, आज़ शैलेष पर अपनी मुस्कान का उसे वह असर होता नजर नहीं आया जो होना चाहिए था ।। तभी तो कहा----"डार्लिग, आज हुआ क्या है तुम्हें? इतने उखड़े हुए क्यों हो? अाते ही ये किस किस्म की बाते करने लगे ?"

"बताया तो रूबी । मुझे एक आदमी मिला था । उसने कहा’ "कुंती वंगला देशियों की बस्ती में . . .

"छोडो न शैलेष । क्या बेकार की बातें ले वैठे । उसकी बात काटकर रूबी ने अपने जिस्म पर मौजूद गाऊन जैसा लिबास उतार दिया । गाऊन के नीचे वह केवल सफेद अदरूनी बस्त्र पहने हुए थी । वे दोनों कपड़े उसके सांचे से ढले गुलाबी जिस्म पर ऐसे लग रहे ये जेसे गुलाब की पंखुडी की जड़ में सफेद रंग का शेड ।।।

साफ महसूस हुआ…शैलेष का हलक सुख गया है ।

थूक सरकता वह साफ नजर आया ।

ऊंची एड़ी की सैंडिल पर अपने जिस्म को नचाती-सी रूबी अागे बढ़ी । शैलेष की तरफ़ । उसके नजदीक पहुची । नंगी गोल और गुदाज बांहें उसकी गर्दन में डाली ।

बोली------"सुबह से तुम्हारे आँफिस से लौटने का इन्तजार कर रही हूं । जाने क्या-क्या सोचे थी कि तुम्हरे अाते ही यह करूंगी, वो करूगी । सारे जिस्म को चूमूंगी तुम्हारे और तुम्हें भी ऐसा मौका दूंगी कि मेरे सारे जिस्म को चूम सको मगर एक तुम हो आते ही लगे झाड़ने । जानती हूं डार्लिंग आँफिस में सारे दिन का काम तुम्हें थका देता है । थोड़े-चिड़चिड़े हो जाते हो तुम है आओ. .मैं तुम्हारी थकान उतारू ।" कहने के साथ उसने शेलेष को बैड की तरफ खींचा था । शैलेष की मुख-मुद्रा से साफ लग रहा था बह कुछ कहना चाहता है परन्तु रूबी के निमंत्रण को ठुकरा नहीं पा रहा ।

रुबी ने जब महसूस किया-----वह बैड की तरफ खिंचते कुछ हिचक रहा है-------------

तो-------अपने होंठ ऊपर उठाकर शैलेष के होठों पर रख दिए ।

शैलेष कसमसाता नजर अाया । ऐसी कोशिश कर रहा था वह अपने होठो को उसके होठों से अलग करना चाहता हो मगर कब तक? कब तक कर सकता था वह ऐसी कोशिश? साफ नजर अा रहा था-साफ नजर आ रहा था----उसके होठों को चुसकवी रूबी ने ब्रा के अंदर से छलक पड़ने को तैयार अपने यौवन उभार शैलेष की छाती में पेवेस्त कर दिए । अभी तक हिचक रहे, कसमसा रहे शैलेष की बाहें स्वत: बड़ी । रूबी के कोमल जिस्म के चारों तरफ़ लिपट गई ।। रूबी को समेटकर उसने अपने बलिष्ठ जिस्म में यूं समेट लिया धा जेसे चंदन के वृक्ष से नागिन लिपटी रहती है । जाने कब? शायद उसे भी मालूम नहीं था, उसके हाथ रूबी के शरीर पर थिरकने लगे । जाधों से पकड़कर रूबी को उसने ऊपर उठाया । और अब. . वह उसके हेंठों को उससे कहीं ज्यादा जोश में भरकर चूस रहा था ।

"स्टॉप इट. . सटॉप इट ।" कुर्ती के साथ बंधा विनम्र हलक फाड़कर चीख पड़ा । यूं कसमसाया था वह कि सारी कुर्सी को भूचाल झेलना पड़ा ।

चेहरा उसी तरह भभका हुआ था जिस तरह इस किस्म के दृश्य देखकर भभक उठता था । जब तब भी टीबी. पर वही दृश्य चलता रहा तो एक बार फिर चीख पड़ा------''बंद करौ इसे । बंद कर दो वर्ना मैं पागल हो जाऊगां"

" नहीं विनम्र । यह बंद नहीं होगा ।" कुंती देबी ने कहा---" पूरा देखना होगा तुम्हें? मैं जानती थी-इसे देखते वक्त तुम्हारा यही हाल होगा । जुनून सवारं हो जाएगा तुम पर । एक वार फिर टी . वी. स्कीन तोड़ने पर आमादा हो जाओगे । ऐसा न कर सको, इसका इन्तजाम मैंने पहले ही कर दिया हैे । कुर्सी से बांध दिया है तुम्हें । वेसे भी, इस दृश्य को तुम पहली वार नहीं देख रहे । पहले भी द्रेख चुके हो । तभी, जब ये पहली बार हुआ था ।"

"नहीं ।" वह दहाड उठा----" यह शर्मनाक मंजर कभी नहीं देखा ।"

" देखा है विनम्र ।" कुंती देवी का लहजा वहुत ठोस था----" तुमने देखा है ।"

"कब । कब देखा है मैंने यह सब?"

" जब यह वास्तव में हुआ था-पच्चीस साल पहले ।'"

तुम शायद पागल हो गई हो मां । मेरी तो उम्र ही साढे चौबीस साल है । फिर ये सब मेरा देखा हुआ कैसे हो सकता है ?"

'" तुमने देखा है बेटे । देखा है तुमने ।" " देवी मानो सचमुच पागल हो गई थी । कहती चली गई---" देखते रहो, शायद कुछ याद आ जाए । ध्यान से देखो-----अभी तो बड़े-वड़े मोड़ अाएंगे इस कहानी में । जिस रात के दृश्य तुम देख रहे हो, बडी ही कयामत की रात थी वह । देखो-------चारों तरफ से ध्यान हटाकर टी . बी पर केद्रित कर लो ।"

विनम्र कुछ समझ नहीं सका ।।।

नजर स्वत: स्क्रीन की तरफ उठ गई थी और फिर बहीं चिपककर रह गई| ।।

अब यह कहना गलत होगा कि शैलेष को रूबी खींचकर बैड पर ले गई थी ।

अब तो यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा एक-दूसरे से गुथे दोनों बैड के नजदीक पहुंचे ।। विनम्र भभकते चेहरे और सुलगती आंखों सै देखता रहा-----रूबी और शैलेष वेड पर पलटियां खा रहे थे ।।

शैलेष की शर्ट के सारे बटन खोल चुकी थी । शैलेष भूल चुका था कि कुछ देर पहले वह रूबी से कुंती की पेरबी कर रहा था । बिनम्र ने देखा---------" जव पूरी तरह कामोत्तेजित हो चुका तो रुबी इस खेल की घुटी हुई खिलाडी की मानिन्द चिकनी मछली की तरह फिसलकर बांहों से निकलेगा ।।

"आओं न रुबी । आओ न ।" वासनायुवत स्वर में कहता शैलेष उस पर झपट पड़ा ।

रुबी हल्की-सी करवट के साथ खुद को बचा गई ।।।

खिलखिलाई । वड़ी ही सैक्सी खिलखिलाहट थी वह ।

 


शैलेष फिर भूखे कुत्ते की तरह रोटी के टुकड़े पर लपका ।

रूबी पुन: खिलखिलाती हुई खुद को बचा गई ।।।

"य-ये क्या कर रही हो रुबी? प्लीज़ । तरसाओ मत ।'"

रूबी ने आँखें तिरछी करके कहा----"एक शर्त पर ।"

"मु-पुझे तुम्हारी हजारो शर्तें मंजूर हैं ।" कामातुर पुरुष और कहता क्या?

रुबी ने तकिए के नीचे से एक बाण्ड पेपर निकाला । साथ में पैन भी था । पैन खोलकर शैलेष की तरफ बढाया । कहा-----इस पर साईन कर दो । उसके बाद सब कुछ तुम्हारा ।"

शैलेष के जेहन में वह नस कहा बची थी जो इंसान को सोचने-समझने की ताकत देती है ।

पलक झपकते ही साईन कर दिए ।

रूबी ने पैन और बाण्ड पेपर वापस तकिए के नीचे सरकाए और उसके बाद यह सब कुछ हुआ जिसे विनम्र अपनी मां के सामने तो क्या, अकेला भी नहीं देख सकता था ।

वह बार-बार टी बी बंद करने के लिए कहता रहा परन्तु जाने क्यों, कुंती देवी ने ऐसा नहीं किया । वह अपने जवान वेटे को यह सब दिखाती रही जो शायद कोई मां अपने एक साल के बच्चे तक को नहीं दिखा सकती ।

चीखते-चिलाते और पगलाये से बिनम्र को जब कुछ और नहीं सूझा तो आंखें कसकर बंद कर ली ।

तभी खोली जब कमरे में फोन की घंटी की आवाज गूंजने लगी । पाया…व्रह आवाज भी टी.वी के स्पीकर्स से ही निकल रही थी ।।

शैलेष ने बैड से उठकर फोन रिसीव किया । दूसरी तरफ से जाने क्या कहा गया । सुनकर वह चौंका ।

रिसीवर वापस क्रेडिल पर पटकने के बाद बैड पर पड़ी रूबी से कहा-----" नई साईड से लोहा चोरी हो गया है । मेरा बहाँ अभी पहुंचना जरूरी है । "

रूबी ने मानो कुछ भी कहना ज़रुरी नहीं समझा । ज्यों की त्यों अपने जिस्म पर एक चादर डाले अलसाई-सी पड़ी रही ।

जिस तरह टी बी स्क्रीन पर से तूफान गुजर चुका था । उसी तरह विनम्र के जेहन पर भी अब तूफान का कोई नामोनिशान बाकी नहीं बचा । अब वह चेहरे पर घृणा लिए स्क्रीन पर नजर आने बाले दृश्यों को देख रहा था ।

शैलेष ने कपडे पहने और कमरे से बाहर चला गया ।

कार स्टार्ट होने की आवाज अाई ।

और. . .जैसे ही दुर होती कार की आवाज सुनाई देनी बंद हुई ।।।

रूबी ने एक झटके से अपने जिस्म पर मोजूद चादर दूर फेक दी । तकिए के नीचे से स्टाम्प पेपर निकाला ।

कूदकर फर्श पर खड्री हो गई इस वात की उसे जरा भी परवाह नहीं थी कि जिस्म पर कपड़े के नाम पर एक थागा तक नहीं है ।

स्टाम्प पेपर खाली था । रूबी ने उसे चूमा और बाथरुम की तरफ बड़ी ही थी कि बूरी तरह चौंकी ।

स्टाम्प पेपर हाथ से फिसलकर फर्श पर जा गिरा ।

" त-तुम ??" हलक से हैरत अंगेज लहजा निकला था----"त-तुम यहां?”

एक पर्दे के पीछे से प्रकट हुई कुंती ने कुछ कहा नहीं ।

मां को स्कीन पर खडी देखकर विनम्र के रोंगटे खडे हो गए । पच्चीस साल पहले की कुंती देवी थी वह ।

जिस्म पर सचमुच भिखारिन जैसा लिबास । बाल बिखरे हुए । दोनों आंखो के चारों तरफ बड़े--बड़े काले धब्बे नजर आ रहे थे । उभरा हुआ पेट बता रहा था-----वह प्रैग्नैन्ट है । कुछ भी तो नहीं बोल रही थी वह । वस अपनी सूनी-सूनी आंखों से रूबी को देख रही थी ।

रूबी ।

बह रूबी जो शुरू में उसे देखकर चौंकी थी ।

हड़बड़ाई थी ।

समय गुजरने के साथ सामान्य होती चली गई सामान्य ही नहीं 'मस्त' होती चली गई वह ।

झुकी । स्टाम्प पेपर वापस उठाया । उसे कलेण्डर की तरह गोल शेप में मोड़ती हुई बोली----"कमाल है, तू यहीं थी ।

इसी कमरे में । पर्दे के पीछे छूपी थी और छुपी ही रही ।

वाकई ।

तेरी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी । अपने पति कोअपनी आंखों से दूसरी औरत के साथ संभोग करते देखती रहीं और चुप रहीं । छुपी रही । सामने नहीं अाई । सचमुच । वहुत हिम्मत है तूझमें ।

तेरी जगह मैं होती तो गोली मार देती दोनों को । मेरी तारीफ में जो कहता रहा, उसे तू अपने कानों से सुनती रही और चीख नहीं पड़ी । कमाल का कलेजा है तुझमे ।

कुंती देवी के होंठ कांप रहे थे ।

आंखों में आंसू थे ।

मगर बोली अब भी कुछ नहीं ।

"बोल ना मां! बोल । तू चुप क्यों है?" बिनम्र इस तरह चीख पड़ा जैसे वह सब वर्तमान हो ।।

स्क्रीन पर पुन: रूबी ने ही कहा था-------" बैले शुरु में । तव, जब शैलेष इस कमरे आया था । जो कुछ उसने कहा था, उसे सुनकर तो तू गदगद हो गई होगी । पैरवी जो कर रहीं था तेरी । पैरवी ही नहीं, तारीफ कर रहा था । उस वक्त तो मैं विलेन नजर अा रहीं थी उसे । जी चाह रहा था-हरामजादे का मुह नोच लू। मौज मेरे साथ मनाने का चस्का पाल बैठा था । पैरवी तेरी कर रहा था-मूझे जैसे ही उसने कहा----कानून की नजर में अभी भी तू ही उसकी बीबी है तो मुझे झटका लगा । बात ठीक थी । यह बात पहले ही से मेरे दिमाग में थी । तभी तो यह स्टाम्प पेपर मंगाकर रखा था । उसके तेवर भाँपते ही मैंने अपने तेवर बदल दिए । वह सब परोस दिया जिसे उस जैसा मर्द कभी ठुकरा नहीं सकता । और देख मेरे पास कोरे स्टाम्प पेपर पर उसके साईन हैं । कल इस पर उसके द्वारा सारी चल-अचल सम्पत्ति मेरे नाम कर देने की तहरीर लिख दी जाएगी । उसके बाद वह कमीना अपनी कानूनी पत्नी को अपने साथ रखे, मेरी बला से । पर रहना उसे भी तेरे साथ वंगलादेशियो की वस्ती से होगा । कल से खुला छोड़ दूंगी उसे ।

मेरे पास रहना चाहे मेरे पास रहे । तेरे पास रहना चाहे. . .

वाक्य पूरा नहीं हो सका रूबी का ।

कुंती ने झपटकर उसकी गर्दन दबोच ली थी ।

"श-शाबास । शाबास मां ।" कुर्सी पर बंधा बैठा विनम्र पागलों भी मानिन्द चीख पड़ा---"मार डाल इसे । ये इसी लायक है । गर्दन दवा दे इसकी । छोड़ना नहीं मां । लाश बनकर ये ज्यादा खूबतूस्रत लगेगी ।। आंखें बाहर निकल आनी चाहिएं । जीभ लटक जानी चाहिए ।। मार । मार डाल मां । शाबास । मैं इसे लाश में तब्दील होती देखना चाहता हूं ।।"

जुनूनी अवस्था में वह चीखता चला गया ।

अपने स्थान पर खड़ी कुंती बेटे की हालत देखकर रो रही थी ।

उधर, स्कीन पर रूबी उसी तरह छटपटा रही थी जैसे विदू ओर क्रिस्टी छटपटाई थी ।। दांतो पर दांत जमाए कुंती उसकी गर्दन पर अपने हाथो का दवाब बढाती चली जा रही थी ।

उसके चेहरे पर कमोवेश वैसे ही भाव थे जैसे बिंदू और क्रिस्टि का खात्मा करते वक्त विनम्र के चेहरे पर थे ।

रूबी की आँखें उबल अाई । जीभ बाहर-लटक गई ।।

और फिर ।

वह वक्त भी अाया जब रुबी ने छटपटाना बंद कर दिया । हाथ पांव जहाँ के तहां लटक गए । गर्दन से ऊपर का हिस्सा कुंती के हाथों से झूल गया था । उसने हाथ हटाए । रूबी की लाश फर्श पर गिरी ।

"हां । मर गई" विनम्र को मानो अब जाकर चैन मिला हो---" वह मर गई मां । शाबास । अच्छा किया तुमने । वह इसी लायक थी । जिंदा रहती तो जाने कितने मर्दो को अपने जाल में फंसाती । कितने धर बरबाद करती । तुमने अच्छा किया मां तुमने खुद ही का नहीं, सारे समाज का भला किया है, ऐसी लड़कियों का यही अंजाम होना चाहिए ।"

कुंती देबी आगे बड़ीं । टी. वी. से कनेक्टिड बी.सी.आर. आँफ किया । स्क्रीन पर झिलमिल नजर आने लगी । कुंती देवी ने वी.सी.आर. का इजेक्ट वाला बटन दबाया ! वीडियों कैसिट बाहर आ गई ! वह केसिट जिसमे यह सब शूट था ।

"पर मां ।" वहुत लम्बी खामोशी के बाद विनम्र ने पूछा--" यह सव कैसिट में कैसे? किसने सूट किए ये सीन?"

"पवन प्रधान ने ।"

"पवन प्रधान? " विनम्र चौका…"वह्र जो मामा को ब्लैक मेल कर रहा था?"

"हां । वही । वह असल मे तेरे मामा को नहीं मुझ ही को ब्लैक मेल कर रहा था ।"

" म--मगर उस रात तो तुम भी मामा पर भडक रहीं थी । बात कुछ समझ में नहीं अा रही ।"

"उस रात, जिस रात मेरे हाथों रूबी की हत्या हुई । खुद मुझे भी पता नहीं लगा उस कमरे के सारे दृश्य सूट हो चुके है । हालांकि बहाँ रूबी की हत्या के इरादे से नही गई थी । वह तो बस हालातवश हो गई जिस खामोशी के साथ गई थी उसी खामोशी के साथ वंगलादेशियों की बस्ती में लौट गई बाण्ड पेपर साथ ले गई थी । उसके -दुक्रड़े करके नाले में वहा दिए ।

 
अगले दिन पेपर्स में रूबी हत्या का समाचार छपा । तेरे पापा सहित किसी को मुझ पर शक होने का सवाल ही नहीं था । उसकी हत्या के हज्जाम में किसी को नहीं पकड़ा जा सका । एक दिन तेरे पिता मेरी झोपडी में अाए । रूबी के रूपजाल से फंसकर भटकने के लिए माफी मांगी और मुझें बंगले से वापस ले गए । चैन की सांस ली ही थी कि पवन प्रधान सामने अाकर खड़ा हो गया । उसने मुझे कैसिट दी । एकान्त में देखने के लिए कहा । देखते ही होश उड़ गए मेरे । अगले दिन वह पुन: उस वक्त अाया जब तेरे पिता घर नहीं थे । उसने बताया…ये शूटिंग उसने कमरे के रोशनदान से भविष्य में रूबी को ब्लैक मेल करने के इरादे से की थी मगर अंत होते-होते मैं उसके जाल में फंस गई उसने कहा-----वह इस कैसिंट की चाहे जितनी कापियां बना सकता है क्योकि मास्टर प्रिन्ट उसके पास है । इस तरह उसके द्वारा ब्लेक मेल होने का सिलसिला शुरु हुआ । तेरा जन्म हुआ । यह सच है---जव तू पांच साल का था तो ' हार्ट फेल' हो जाने तेरे पिता की मृत्यु होगई और या भी सच है------उस वक्त मसीहा बनकर तेरे मामा हमारी जिदगी मे अाए । पवन प्रधान की मांगो से मैं इस कदर त्रस्त हो चुकी थी कि एक दिन सारा भेद तेरे मामा को बता दिया---उसके बाद-उन्होंने ही पवन प्रधान को "टेकिल' करना शुरू कर दिया । कहा-'तुम्हें जो चाहिए, मुझसे मांगोगे पवन प्रधान । बहन को परेशान नहीं करोगे । उससे मिलोगे तक नहीं ।" पवन प्रधान ने कहा---'मुझे इससे क्या फर्क पड़ता है । मुझे तो रकम चाहिए तुम दो या कुंती ।' तव से भैया ही उसे हैडिल कर रहे थे !"

"लेकिन जिस रात बह मारा गया, तुमने तो उस रात भी यह दर्शाया जैसे . . .

"वह सब भैया की जिद पर करने के लिए मजबूर थी ।"

"क्या मतलब ?

"बात उस दिन की है जिस दिन तुमने उत्तेजित होकर टी.बी. सक्रीन तोड़ डाली थी ।" कुंती देवी कहती चली गई-----''" जिस कदर तुम उत्तेजित थे और स्कीन तोड़ने का जो कारण तुमने बताया उसे सुनकर मेरे होश उड गए । तुम्हारी अवस्था और उस अवस्था में तुम्हारे बिचार ठीक वैसे ही थे जैसे रू्बी की हत्या करते वक्त मेरे थे । इस ख्याल ने मेरे होश उड़ा दिए कि 'हैरिडिटी' के रूप में जैसे मां-बाप की वहुत-सी आदतें बच्चों में आ जाती हैं, क्या उसी तरह यह बात भी तुममें आ गई है? तुम्हें याद होगा! उस वक्त मैंने तुझे गले से लगाने के साथ कहा था---" हे भगवान । तेरे विधान में क्या ऐसा भी हो सकता है? यह सोचकर मैं वहुत डर गई थी कि कहीं तू किसी रोज सच में रूबी जैसी लड़की की हत्या न कर बैठे? अपनी शंका भैया को बताई । वे भी हैरान रह गए । दोनों जाकर "साइक्लोजिस्ट' से मिले । बगैर यह बताए उससे डिसकस किया कि केस हमारे ही बेटे का है । उसने स्पष्ट कहा---" बेशक ऐसा हो सकता है । बच्चा जब मां के गर्भ में होता है तो वही खाकर जीवित रहता है जो मां खाती है । इसी तरह, वह सब देखता और सुनता है जो मां देखती और सुनती है । मां अगर खुश है तो बच्चा भी खुश होता है । मां अगर पीड़ा में है तो बच्चा भी उस पीड़ा को उसी शिदूदत से महसूस ही नहीं करता, जीता भी है । फर्क केवल यह होता है कि जन्म होते ही यह सब उसके स्मृति पटल से मिट जाता है ।

बावजूद इसके, उन्हीं खास हालात में फंसने पर जिन हालात को उसने गर्भ में रहते शिदूदत से महसूस किया था, वह कर सकता है जो उन हालात में उसकी मां ने किया था । हालांकि यह समझ नहीं पाएगा कि उसने ऐसा क्यों किया ।।

अभिमन्यु का किस्सा अाप लोगों ने जरूर सुना होगा । उसने गर्भ में चकव्यहू तोड़ने की विधि सुनी थी । अर्जुन आधी ही विधि बता पाए थे कि सुभद्रा को नीद आ गई मां को नीद आ गई तो बच्चा भी सो गया । वह भी आधी ही विधि सुन पाया ।

सामान्य अवस्था में अभिमन्मु को पता तक नहीं था कि चक्रव्यूह भी कोई चीज होती है और वह उसे आधा तोड़ सकता है लेकिन जब पाण्डवों के सामने यह समस्या अाई चक्रव्यूह को कौन तोड़े तो अभिमन्यु खुद कह उठा…'आधा चक्रव्यूह को तोड़ना मुझे अाता है ।'

पांडव यह सोचकर हैरान रह गए-अभिमन्यू ने चक्रव्यूह तोड़ना कब सीख लिया? बाद में यह रहस्य कृष्ण ने बताया था कि चक्रव्यूह तोड़ने की

विधि अभिमन्यु ने गर्भ में ही सीख ली थी । उसी तरह--------यदि किसी गर्भवती स्त्री ने हत्या की है तो वैसी ही खास परिस्थति पैदा होने पर उसका बच्चा भी हत्या कर सकता है । इसमें हैरत की कोई बात नहीं है । हां । वह खुद हैरान जरूर होगा क्योंकि जान नहीं सकेगा हत्या उसने क्यों कर डाली?"

" त-तो - तो ये है मेरे हाथों से हुई हत्याओं का रहस्य ।" विनम्र बड़बड़ा उठा ।

"हमने साइक्लोजिस्ट से ऐसे बच्चे के इलाज के बारे से पूछा । उसने कहा 'हां, उसका इलाज हो सकता है । मेडिकल साइंस से ऐसी दवाएं है । वह उस खास परिस्थिति में फंसने पर भी वेसे रियेक्ट नहीं करेगा । कहने का मतलब ये, ऐसा मरीज बिल्कुल ठीक हो सकता है लेकिन उसे लेकर मेरे क्लिनिक पर आना होगा और जब तक उसे दवाओं की मुकम्मल डोज न दे दी जाए तब तक उन खास हालात से बचाकर रखना होगा जिनमें वह किसी की हत्या कर सकता है ।"

"तो फिर तुमने मेरा इलाज क्यों नहीं कराया मां? क्यों हो जाने दी मेरे हाथों से हत्याएं?"

"मैं और भैया दुविधा से फंस गए थे । तुम्हे डाक्टर के पासं ले जाएँ या नहीं ? दो समस्याएं थी । पहली-------तुम क्या सोचोगे । दूसरी---कम से कम उस डॉक्टर को तो पता लग ही जाएगा कि शहर का प्रतिष्ठित कालोनाइजर विनम्र भारद्वाज इतनी खतरनाक बीमारी का मरीज हो सकता है । यहाँ इस बात पर खास ध्यान दो…"मरीज हो सकता है, जरूरी नहीं कि हो ही ।' साईक्लोजिस्ट ने हमसे यहीं कहा था-------ऐसा बच्चा मरीज हो भी सकता है, नहीं भी ।' उसमें मरीज के 'सिम्टम्स' नहीं हुए तो व्यर्थ ही धिछालेदारी हो जाएगी । और भी कुछ नहीं तो डॉक्टर को यह तो पता लग ही जाएगा कि मैं यानी विनम्र की मां एक हत्या कर चुकी हैै मुमकिन है…तुम्हें भी पता लग जाए । इन्हीं कारणों से 'ऊहापोह' में फंसे थे कि भैया को स्टाफ मेम्बर से पता लगा-नागपाल ने तुम्हें ओबराय में बुलाया है । इस बात का जिक्र भैया ने मुझसे किया । कहा------" मुमकिन वह विनम्र के सामने लड़की पेश करे, ऐसा वह पहले भी एक अन्य कालोनाइजर के लिए कर चुका हेै-मगर पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता वह ऐसा ही करने वाला है । मुमकिन है, सचमुच गगोल के आदमियों की लिस्ट देने वाला हो ।

एक बार फिर हम दुबिधा में थे । समझ नहीं पा रहे थे क्या करें?

कहीं ऐसा न हो कि तुम खुद को लुभाने की कोशिश कर रही लड़की को मार डालो । और कहीं ऐसा न हो जाएं कि इस वहम के शिकार होकर हम कम्पनी का नुकसान कर बैठे ।

हालात के मुताबिक तय ये हुआ कि भैया तुम पर नजर रखेंगे । इसीलिए उन्होंने सुईट के ठीक सामने बाला कमरा लिया । पांच बजे बहां पहुंच गए । अपने कमरे की "की होल' से वे सुईट के दरवाजे पर नजर हुए थे ।

उन्होंने सुईट में नागपाल और बिंदू को आते फिर नागपाल को जाते देखा और तुम्हें अाते देखा । आधे घंटे ' के बाद तुम्हें निकलते देखा और देखा तुम्हारे ठीक पीछे निकलते बिज्जू को ।। बिज्जू को उन्होंने सुईट के अंदर जाते नहीं देखा था। इसलिए चौंके । यह तो वाद में पता लगा वह पांच बजे से पहले से ही सुईट में छुपा हुआ था । उसके जाने के काफी देर बाद भी जब विंदू सुइंट से बाहर नहीं अाई तो भैया अपने कमरे से निकले । दवे पांव सुईट के दरवाजे के नजदीक पहुचे । आंख "की होल' से सटाई और होश उड़ गए । सामने बिंदू की लाश पड़ी थी । समझ सकते हो उसे देखकर भैया की क्या हालत हुई होगी । उनके पैरों तले की मानो जमीन ही सरक गई थी । दौड़ते-हाफंते अपने कमरे में अाए । मुझे मोबाईल से बताया-"कुंती वही हो गया जिसका डर था ।' पूरी बात सुनकर मेरे होश भी फाख्ता हो गए । क्या'-"भैया, जैसे भी हो विनम्र को बचाओ ।' उन्होंने कहा----"तू चिन्ता मत कर कुंती, मैं अपने बेटे को कुछ नहीं होने दूगा ।'

उसके बाद मनसब की मदद से तेरे मामा ने जो किया वह तू जानता है ।

सुईट से लाश उन्होंने यह सोचकर हटवाई --वहांसे मिली तो सीधे तुम ही फंसोगे ।"

यानी मामा ने जो किया मुझे बचाने केलिए किया जबकि गोडास्कर ने ठीक इसके विपरीत सौचा---उसकै ख्याल से हत्या खुद करके मामा

मुझे फंसारहे थे।"

"गोडास्कर के ये विचार तूने मुझें बताये । मैंने भैया को । तव भैया ने कहा…"हाला'कि इसकी कोई सम्भावना नहीं है लेकिन फिर भी पहले ही से कह रहा हूं कुंती । अगर ऐसे कोई हालात बने कि गोडास्कर मुझें बिंदू की हत्या के इल्जाम में पकडे तो तू खामोश रहेगी । एक लफ्ज नहीं ।' मैंने उनकी इस बात का पुरजोर विरोध किया । कहा-----ये तुम क्या कह रहे हो मैया? मैं बेटे को बचाने के लिए भाई की बलि कैसे चढ़ा सकती हूं ?

तब उन्होंने समझाया----' कुछ नहीं होगा पगली । हत्या ज़ब की ही नहीं है तो अदालत से सजा कैसे होगी ?

तू देख़ना-सुवूतों के अभाव में कोर्ट को मुझे बाइज्जत बरी करना होगा ।

जबकि तु-बोली तो विनम्र फंस जाएगा ।। वह फंसा तो बच नहीं पाएगा क्योकि हत्या सचमुच उसी ने की है ।

कानून को चकमा देने का यहीं एक रास्ता है-----वह फंस जाए जिसने जुर्म किया ही नहीं है । जव किया ही नहीं है तो साबित भी कुछ नहीं हो पायेगा ।

लिहाजा बरी होगा---असली मुजरिम इसीलिए बच जाएगा क्योंकि उसे कोर्ट मे पेश ही नहीं किया गया है ।

भैया के सारे तर्कों से सहमत होने के बावजूद मैं तुम्हें बचाने के लिए उसे फंसने के तैयार नहीं थी ।

तब उन्होंने तुम्हारी कसम देकर ऐसी कोई परिस्थिति अाने पर चुप रहने का वचन लिया ।

कलेजे पर पत्थर रखकर मैंने इस वचन को निभाया ।

सच्चाई यही है विनम्र, तेरे मामा तेरे लिए उतना कर रहे हैं जितना शायद एक बाप भी नहीं कर सकता ।।

उस वक्त तू हम ही से बात कर रहा था जव तेरे मोबाईल पर ब्लैक मेलर का फोन जाया ।

बात करता हुआ तू लांन में चला गया था मगर तेरी भाव-भंगिमाओं ने हमें बता दिया-फोन ब्लैक मेलर का है ।

बिज्जू की लाश मिलने, उसके कैमरे से गायब होने वाली रील ने इस बात सम्भावना पहले ही वना दी थी कि तुम किसी ब्लेक मेलर के चक्कर में फंसोगे।

यह फोन भैया ने खुद सुना । जिसके जंरिए तुम्हें अजंता होटल में एक करोड के साथ बुलाया गया था ।

पवन प्रधान से ब्लैक मेल हो रहे मैं और भैया जानते थे ब्लैेक मेलर किस तरह खून चूसते हैं । तुम्हें झमेले से बचाने के लिए भैया दाढी वाला बनकर अजंता पहुंचे । मगर उस रात ब्लैक मेलर वहाँ पहुचा ही नहीं ।।

तुम जानते हो वहाँ क्या हुआ ?"

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"और तुम । तुम ‘मारिया वार' कैसे पहुच गई मां"'

कुंती देबी कहती चली गई------" भैया को जब गोडास्कर पकड़कर ले गया तो तेरी 'हिफाजत' के लिए मेरे अलावा कौन आगे अाता?

मेरी आंखें तो चौबीस घंटे तुझी पर ज़मी थी । इधर ने वैंक से एक करोड और निकला । उससे पहले करोड के साथ अटैची में भरा ।।

बिला में टैक्सी बुलाई ।।

मैं समझ गई…तू ब्लैक मेलर से मिलने जा रहा है । तेरे टैक्सी बैठने से पहले ही मैं ड्राईवर की नजर बचाकर पिछली सीट के नीचे छुप चुकी थी ।

तेरे साथ सुनसान इलाके में बने मकान पर पहुंची है जब तू और ड्राईवर डिवकी से अटैची निकाल रहे थे ।। तब मैं टैक्सी से निकलकर झाडियों में छुप गई टेक्सी बाला चला गया । तुम मकान के अंदर गए ।

मैं गेलरी में खडी वेन में जा छुपी थी । मकान के अंदर से जव गोलियां चलने की आवाज अाई तो मेरा कलेजा हिल गया था ।।

मगर जब देखा----तुम मारिया को कवर किए चले आ रहे हो तो सोचा-----जो हो रहा है, ठीक ही हो रहा है ।

मैं और भैया भी तो यही चाहते थे ।

यह कि कुछ ऐसा हो जाए जिससे तुम ब्लेक मेलर के चंगुल से निकल जाओं । यही तुम कर रहे थे ।

मारिया बार में तुम मारिया को लेकर उसके बेडरूम में चले गए । मुझे लग रहा था---काम हो गया मगर तभी बहां गोडास्कर पहुच गया ।

एक बार फिर मेरे होश उड गए लेकिन खैर, अंत भला तो सब भला ।" कहने के बाद कुंती देवी सांस लेने के लिए रुकी थी ।

पुन: बोली-------"'हालात ये है विनम्र, तुमने जो भी किया या हालात ने कराया, किसी का कोई सुबूत कहीं नहीं है । सारे फोटो और रील हमारे कब्जे में है । नाटा, क्रिस्टी मारिया मारे जा चुके है ।

केवल यही जानते थे कि बिंदू की हत्या तुमने की है । यह हमारे लिए बहुत अच्छा रहा कोई सूत्र नहीं है जिसे पकड़कर पुलिस तुझ तक पहुच सके । इससे लगता है…भगवान भी हमारे साथ है ।

बैसे भी, कुसूर क्या है तेरा? तू मेरी तरह बेकसूर है बेटे ।

'हैरीडिटी' वश तूने जो किया यह मेरी देन है, तेरी मां की देन । मैं तेरा इलाज कराऊंगी । वहुत जल्द तू ठीक हो जाएगा । वैसे हालात में फंसने पर भी कोई आवाज तुझे किसी लड़की की हत्या के लिए नहीं उकसाएगी ।"

"मगर मामा । मामा का क्या होगा मां?"

"उनकी फिक्र मत कर । एक दिन की भी सजा नहीं होगी भैया को । बे पूरा प्लान वना चुके हैं ।" कुंती देबी ने कहा----'थोड़ा-सा टॉर्चर होने पर वे वह सब कुबूल कर लेगे जो गोडास्कर कुवूलवाना चाहता है मगर कोर्ट में मुकर जाएंगे । कहेंगें----उन्होने बिंदू की हत्या नहीं की । सुबूतों के अभाव में कोर्ट को उन्हे छोड़ना ही पडे़गा ।"

बात हर एंगिल से विनम्र को ठीक लग रही थी ।

 


थैक्यू भैया । थैेक्यू वेरी मच ।" श्वेता ने झपटकर गोडास्कर के गाल का चुम्बन ले लिया था ।

खीरा खाते गोडास्कर ने कहा-----"किस बात पर इतनी खुश है?"

" मेरा अनुरोध जो मान लिया तुमने । इतनी जल्दी सलाखों के पीछे जो पहुंचा दिया विंदू के हत्यारे को ।"'

कहने के साथ श्वेता ने वह अखवार

डायनिंग टेबल पर पटका जिसमें चक्रधर चौबे की गिरफ्तारी की ख़बर

थी । कहती चली गई वह--"विनम्र बेचारा किस कदर टेंस था । मगर, बात है हैरतअंगेज भैया । हालांकि तुमने पहले ही मामा पर शक जाहिर कर दिया था । मगर न विनम्र को यकीन अाया था, न मुझे । मैं और विनम्र तो सोच तक नहीं सकते थे कि बाहर से इतना प्यार जताने वाला मामा अंदर से इतने काले हैं । ये दौलत भी सभी से क्या-किया गुल खिलवाती है । जो कम्पनी एक दिन खुद मामा ने ही बिनम्र को सौंपी थी, उसी कम्पनी का मालिक बनने के लिए उन्होंने विनम्र को हत्या जैसे जघन्य जुर्म में फंसाने की कोशिश की ।"

"तू अगर चोंच बंद करे तो गोडास्कर भी कुछ कहे बहना?"

बहुत खुश थी श्वेता । बीली--'"बोलो भैया ।"

“अखबार से छपी यह खबर रात की है और रात की ज्यादातर चीजें सुबह तक 'बासी' हो जाती हैं ।"

"क्या मतलब?" “गोडास्कर" के चैनल से सुबह के बुलेटिन की ताजा खबर ये है कि बिंदू का हत्यारा चक्रधर चौबे नहीं है ।"

" क-क्या ?" श्वेता उछल पड़ी--"क्या कहा अापने?"

"वही । जो तूने सुना ।" गोडास्कर खीरा चिंगलता रहा ।

“पर ऐसा केसे हो सकता है? अखबार में तो लिखा है------इस केस को अाप ही ने वर्क आऊट किया है । अाप ही ने पकड़ा है मामा को । वे अाप ही की हवालात में हैं ।"

"एक-अक लफ्ज ठीक लिखा है ।"

"और अब अाप कह रहे हैं-हत्या मामा ने नहीं की । बात कुछ समझ में नहीं आई ।

" गोडास्कर ने हालांकि पहली बार गच्चा खाया । लेकिन खा तो गया ही ।। वस एक ही गनीमत रही । यह कि पूरा गच्चा नहीं खा पाया । आधा खाकर रह गया । चक्रधर चौबे को कोर्ट में पेश कर देता तो पूरा ही गच्चा खा चुका होता । गोडास्कर का यह रिकार्ड टूट जांता कि उसके द्वारा कोर्ट में पेश किया गया मुजरिम बगैर मुजरिम सबित हुए नहीं रहता । और इसके लिए शुक्रिया अदा करना पड़ेगा पिछली रात को ।। उस रात को जिसमे घटनाएं काफी तेजी से घटी ।।"

"मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा भैया । तुम कह क्या रहे हो?"

"छोटा-सा दिमाग है गोडास्कर की नन्हीं-सी बहन का । ज्यादा पेंचदार‘ बाते समझने की कोशिश मत कर । वलास्ट हो जाएगा । बस इतना समझ ले…चक्रथर चौबे धोखे में पकडा़ गया । असली हत्यारा कोई और है । पिछली रात उसने तीन हत्याएं और कर दी ।"

"त-तीन हत्याए'?"

"उनने से एक हत्या ठीक उसी तरह की गई । जिस तरह विंदू की थी । बाकी दो को गोली मार दी । दो हत्याएं सुनसान इलाके में बने एक मकान में ।। गोडास्कर मुआयना कर अाया है । एक हत्या मारिया बार में की । खुद मारिया की । यह हत्या तो पटूठे ने एक तरह से गोडास्कर के देखते ही देखते कर दी ।"

"और वह घटनास्थल से भागने में कामयाब हो गया?"

"यही तो करिश्मा किया पटृठे ने । गोडास्कर को अपनी शक्ल तक नहीं देखने दी । "

" पर एक रात में तीन हत्याएं ? श्वेता के चेहरे पर खौफ था-----"वह पागल है क्या?"

"मारिया का तो यहीं कहना है । कि वह पागल है । हत्या करने का जुनून सवार होता है उस पर । किसी मर्द को लुभाने की कोशिश कर रही लडकी को देखते ही गर्दन दबाकर उसे मार डालता है ।"

"धक्क ।" से रह गया श्वेता का दिल ।

"क--क्या कहा?" मुंह से निकला-……'"क-क्या कहा भैया?"

गोडास्कर अपने शब्द दोहराने लगा । दरअसल ये शब्द उसके अपने नहीं, मारिया के थे । उन्हें सुनते वक्त श्वेता की आंखों के सामने नाच रहा था-------स्वीमि'ग पूल में अधेड से अठखेलियां कर रही लड़की का दृश्य । उस दृश्य को देखकर भभके हुए विनम्र का चेहरा वह आज तक नहीं भूली थी ।

वह उस वक्त भी उस चेहरे को देख रहीं थी जब गोडास्कर ने झंझोड़ा ---“कहां चली गई बहना?"

"आं !! " वह चौंकी…“क-कहीं नहीं । मैं यहीं हूं ।"

"मगर तू चिन्ता मत कर । तेरा भाई जल्दी ही असली मुजरिम को पकडकर विनम्र को टेंसन मुक्त कर देगा ।" उसे सान्तवना देने के लिए गोडास्कर जाने क्या…क्या कहता चला जा रहा था ? उसे नहीं मालुम था, कि श्वेता के कानों तक उसका एक शब्द भी नहीं पहुच पा रहा ।

"त-तुम । तुम यहाँ श्वेता?" विनम्र अचानक उसे अपने बेडरूम में देखकर चोंक पड़ा ?”

श्वेता चहकी-----" क्या मैं यहाँ नहीं आ सकती?"

"आ क्यों नहीं सकती । घर है तुम्हारा मगर...... ..

"मगर?" श्वेता ने उसकी आँखों में झांका ।

" पहले कभी बगैर फोन के नहीं अाई । इसी कारण थोडा आश्चर्य हुआ और...........

"और ?" वह जरूरत से ज्यादा चहक रही थी ।

उसे ऊपर से नीचे तक देखते 'बिनम्र ने कहा------"ड्रेस भी आज तुमने कुछ अलग पहन रखी है ।"

"क्यों, क्या बूराई है इस ड्रैस में?" कहती हुई श्वेता थोड्री पीछे हटी---"स्कर्ट-ब्लाऊज पहना है । अच्छा नहीं लग रहा?"

"अच्छा तो लग रहा है मगर.......

"बात अधूरी वहुत छोड़ रहे हो आज तुम । मगर क्या?"

"ऐसी ड्रेस में मैंने तुम्हें कम देखा है । बल्कि शायद पहली बार देख रहा हूं ।"

गनीमत है, मैंने कुछ पहन तो रखा है । तुम तो कुछ पहने हुए भी नहीं हो । कहने के साथ वह हंसी थी ।।

विनम्र झेंप गया । सचमुच उसके जिस्म पर "वी शेप' अण्डरवियर के अलावा कुछ नहीं था ।

बाथरूम से नहाकर निकला था वह । बेडरुम में कदम रखा ही था कि सामना श्वेता से हुआ । शायद इसीलिए ज्यादा बौखला गया था । जाने वह कब वहाँ आ गई थी ।

जव उसने नग्नता का ध्यान दिलाया तो उपने कपडों के वार्डरोब की तरफ लपका ।

जिस्म पर डालने के लिए शर्ट निकाली ही थी कि अपने दोनों कंधों पर श्वेता के कोमल हाथ महसूस किए ।

सारे शरीर में विधुत तरंगे दौड़ती महसूस की उसने ।

जबकि श्वेता ने अपना गाल उसकी पीठ पर रख दिया । साथ ही बहूत रोमांटिक लहजे मे कहा था-------"कोई जरूरत नहीं है ।"

"क-क्या मतलब? " वह चौंककर कहता हुआ घूमा ।

श्वेता उसके नजदीक खडी थी ।

वेहद नजदीक ।

इतनी ज्यादा कि वह उसकी गर्म सांसों को अपने चेहरे पर महसूस कर रहा था ।।

आंखे 'बरबस ही श्वेता की आंखों से जा टकराई ।

शायद 'बरबस' कहना गलत है । असल में ऐसा इसीलिए हुआ था क्योकि वह उसकी आंखों में झांक रही थीं ।

एकटक ।

अपलक ।

"मुझे तुम ऐसे ही अच्छे लग रहे हो ।" कहने के साथ वह उसके सीने के बालों से खेलने लगी थी ।।

"क-क्या वात कर रही हो श्वेता ।" विनम्र कधें के नज़दीक से उसके दोनों बाजू पकड़कर खुद से अलग हटाता बोला-----""' तुम्हें हो क्या गया है?"

"आज मैं खुश हूं । बहुत खुश ।" कहने के साथ वह उसके हाथों से निकलकर फिरकनी की तरह घूम गई कुछ इतनी तेज कि स्कर्ट ऊचे उड़कर हबा में घूम गई थी । इतने ऊचे कि स्कर्ट के नीचे श्वेता द्वारा पहना गया चुस्त अण्डरवियर तक चमक गया । स्कर्ट थी ही इतनी ऊंची कि यूं घूमने पर उसे चमकना ही था ।

"मगर क्यों, ऐसी क्या बात हो गई है? विनम्र ने खुद को नियंत्रित रखने की कोशिश करते हूए कहा ।

"बिंदू का हत्यारा जो पकड़ा गया । टेंसन मुक्त जो हो गए तुम ।। क्या तुम खुश नहीं हो?" कहने के बाद फिरकनी की तरह घूम रही श्वेता रुक गई थी और विनम्र.......ने पहली बार महसूस किया…....ब्लाऊज के नीचे वह कुछ भी नहीं पहने थी ।

विनम्र ने उसके उठानों को थरथराते महसूस किए थे ।

हे भगवन ।। ये क्या है ??

श्वेता को तो इस तरह उसने कभी नहीं देखा ।

वह हमेशा ब्रा पहनकर रहती थी ।

और गला....... ब्लाऊज का गला भी काफी बड़ा था ।

इतना ज्यादा कि चोटियों का उपरी हिस्सा नजर आ रहा था ।

ब्लाऊज में कोई बटन या हुक नहीं था ।

अपने पेट पर उसने दोनों 'पल्ली' की गांठ-सी बांध रखी थी ।

बह भी इतनी उपर कि नाभि साफ़ चमक रही थी ।।

विनम्र चाहकर भी कुछ न बोल सका । जुबान तालु से जा चिपकी थी ।

श्वेता उसे बहुत ध्यान से देख रही थी । पता लगाने की कोशिश कर रही धी कि उस पर उसकी ड्रैस और अब तक की हरकतों का क्या प्रभाव पड़ा है? सोच रही थी-----क्या इतना मासूम चेहरे वाला जुनूनी हत्यारा हो सकता है? किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी वह । ।

"तुमने जवाब नहीं दिया विनम्र ।"

"आं । " वह हड़बड़ाकर बोला----“कौन सी बात का जवाब?"

"क्या तुम्हें बिंदू मर्डर केस खुल जाने की खुशी नहीं हुई ?"'

" ह-हुआ क्यों नहीं मगर.......

" तुमने फिर बात अधूरी छोड़ दी ।"

"मुझे दुख है, उसके हत्यारे मामा निकले ।"

" दुख भी ज्यादा हैरत की वात है विनम्र ।" कहने के साथ वह ' पॉलिसी ' के तहत विनम्र की तरफ बढी । एक बार फिर उसके बेहद नजदीक पहुंची । बोली ।

" हम सोच तक नहीं सकते थे । मामा' ऐसा कर सकते हैं । भैया ने पहले ही शंका जाहिर कर दी थी । कभी-कभी हम दिल से सोचने वाले लोग वहुत गलत सोच बैठते हैं । इसीलिए धोखा खाते हैं । दिमाग से सोचने वाले भैया जैसे लोग कभी धोखा नहीं खाते । अक्सर इंसान बाहर से और नजर जाता है, अदर से विपरीत निकलता है । ऐसा कि उसके बाहरी रूप को देखकर जैसे की कल्पना तक नहीं की होती ।"

 
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