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विनम्र की आवाज और उसके शब्दों ने बिंदू के ही नहीं बिज्जू को भी हिलाकर रख दिया । ।
"व-विनम्र ।" भयक्रांत बिंदू पिछे हटती हुई बोली ---" ये तुम क्या कह रहे हो ?"
"बाह । मरते वक्त किसी लड़की का जिन्दगी के लिए छटपटाना कितना रोमचकारी होता है ।" बिंदू के सवाल का ज़वाब देने की जगह वह निरन्तर अागे बढता कहता चला गया…"मैं वो मंजर देखना चाहता हूं लड़की । मेरी आखें किसी तड़पती लड़की को देखने के लिए वहुत दिन से प्यासी है । आ…मैं तेरा गला दबा दूं ।।"
विनम्र इस वक्त आवाज ही से नहीं, शक्ल से भी दरिन्दा नजर अा रहा था । जिस्म का सारा खून सिमटकर सिर्फ और सिर्फ उसके चेहरे पर इकटृठा हो गया था । मस्तक और कनपटी की एक--एक नस साफ़ चमक रही थी । आखों में रोशन थे लाल रंग के बल्ब । बोहत ही डरावना लग रहा था वह । इतना ज्यादा कि उसे गुलाम वनाने सारी अंदाए भूलकर चीख पडी ।।
"बचाओ -बचाओ ।
चीखना वह तीसरी बार भी चाहती थी मंगर चीख न सकी ।
उससे पहले विनम्र ने झपटकर उसकी गर्दन दबोच ली थी ।
पहली बार बिंदुं की जगह विनम्र का चेहरा बिज्जू कै कैमरे के सामने था । उसके हाथ ही नहीं सारा जिस्म सूखे पत्ते की मानिन्द कांप रहा था । वंह चीख पडना चाहता था मगर आवाज हलक में घुटकर रह गई ।।
उसका गला नहीं दबाया जा रहा था मगर हालत उसकी भी विंदु जैसी थी ।
वह देख रहा था--- बिंदु की बाहर निकल अाई जीभ को पलकों की सीमाएं तोड़कर कूद पड़ने के लिए तैयार आंखों को । रुकती सांसो को और खुद को मरने से बचाने के लिए उसकी छटपटाहट को ।
कान बिंदू की "गु--गू' पर हावी हो गई विनम्र की आवाज सुन रहे थे----"अब आ रहा है मजा! वाह । क्या तड़पन है तेरी! तडप और तड़प! जनूनी अवस्था में वह सव कहता विनम्र उसकी गर्दन पर दवाब बढाता चला गया ।
बिज्जू की आंखें एक हत्या होते देख रही थी ।
बह बिंदू को बचाना चाहता था ।
मगर लगा---यदि विनम्र को उसके यहां होने का पता लग गया तो वह उसे भी नहीं छोड़ेगा । विनम्र इस वक्त मासूम लड़का कहां था? वह तो दरिन्दा बना हुआ था! दरिन्दा ।।
और फिर !!!!
बिंदू के मुंह से निकलने बाली "गूं-गूं की आवाज़ ने दम तोड दिया । हाथ-पांय ढीले पड गए । उनमे कोई छटपटाहट नहीं थी ।
विनम्र के हाथों में कंसी गर्दन हलाल हो चुके बकरे की मानिन्द लटकी रह गई थी ।
बिज्जू कै जहन में एक ही विचार कौधां ---" खेल खत्म । "
उस वक्त जाने कैसे उसे अपने हाथों में मोजूद कैमरे का ख्याल आया ? इधर उसने बटन दबाया उधर विनम्र ने अपने हाथ बिंदू की गर्दन से हटा लिए । लाश "धप्प' की आवाज के साथ कालीन पर जा गिरी । उसकी गर्दन में मौजूद सच्चे मोतियों की माला विनम्र की अंगुषियों में उलझकर रह थी ।
वह टूट गई ।
सफेद रंग के मोती कालीन पर दूर--दूर तक बिखर गए ।
उछलता, कूदता और लुढ़कता हुआ एक मोती फ्रिज के पीछे भी आ घुसा । ठीक वहा जहाँ बिज्यू था! मारे खौफ के बिज्जू का यह हाल हो गया था कि मोती को फौरन ही अंगुली मारकर बापस लाश की तरफ लुढ़का दिया । कछ ऐसे अंदाज में वह मोती नहीं मर्डर वेपन हो ।
विनम्र अपने कदमों में पड्री लाश और बिघरे मोतियों को फटी-फटी आंखों से देख रहा था ।।
अंदाज ऐसा था जैसे यह सब उसने नहीं, किसी और ने किया हो ।
चेहरे पर मोजूद हिंसा के भाव खौफ के भावो में तब्दील होते चले गए । आंखे बिंदू की लाश से हटने का नाम नहीं ले रही थी । उसकी जीभ और
आंखें बाहर निकली हुई थीं । विनम्र को लगा---बिंदू जीभ निकालकर उसे चिड़ा रहीहै। आंखें उसी को घूर रही हैं ।।
उसका हर अंग ढीला और शिथिल पड़ चुका था ।
विनम्र ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढांप लिया! और. . . . .
बिज्जू स वक्त दंग रह गया जब विनम्र क्रो फूट…फूट कर रोते देखा ।। यह बात उसकी समझ से पूरी तरह बाहर थी कि हत्यारा हत्या करने के बाद रो क्यों रहा है? चेहरे पर मौजूद आंखे तक ढांप ली थीं उसने । जैसे लाश को देखना न चाहता हो ।
चेहरे को यूंही ढांपे वह रोता हुआ लाश के नजदीक से हटा । कदम ऐसे डगमगाए थे जैसे क्षमता से कई गुनी ज्यादा पी गया हो । सोफे पर जा गिरा । वहाँ भी बस हाथो से चेहरा छुपाए रोता रहा । बिज्जू की समझ मे ना आ रहा था "ये हो क्या रहा है?" न ही यह 'इन हालात वह क्या करे ?'
रोते हुए विनम्र के फोटो ले डाले उसने ।
बिज्जू की समझ में नहीं आ रहा था विनम्र क्या सोच रहा है, क्या कर रहा है! कभी रोने लगता । कभी सामान्य नजर जाता था । कभी उसके चेहरे पर किसी ठोस निश्चय की परछाई नजर जाने लगती थी ।
अब बाथरूम में गया था ।
दिमाग में सवाल अाया--" वह बाथरुम ने क्यों गया है?"
दिल जोर जोर से पसलियों पर सिर टकरा रहा था । 'जी' चाह रहा था'--फ्रिज़ के पीछे से निकले! देखने की केशिश तो करे वह बाथरुम में कर क्या रहा है मगर ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा'सका । जानता धा----अगर विनम्र को यहाँ उसकी मोज़दूगी का एहसास हो गया तो उसका भी वहीं हस्र होगा जो बिंदू का हुआ है ।
उसका खात्मा करते वक्त जो भाव विनम्र के चेहरे पर थे उन्हें याद करके बिज्जू के तिरपन कांप गए ।
उसने छूपे रहने में भलाई समझी ।
मुश्किल से दस सेकण्ड बाद सुईट में बाथरुम का दरवाजा बंद होने की आवाज गूंजी । फिर, विनम्र नजर अाया ।
इस वक्त उसके हाथ में सफेद रंग का एक रोएदार टॉवल था । टॉवल लिए वह लाश के नजदीक पहुचा।
बिज्जू का दिल धाड़ धाड़ करके बज रहा था ।
कैमरा एक बार फिर सम्भाल लिया । बिनम्र लाश के सिरहाने, घुटनों के बल बैठ गया ।
बिज्जू ने देखा-----कुछ देर बाद लाश की गर्दन को टॉवल से रगड रहा था । बिज्जू ने यह दृश्य कैमरे में कैद कर लिया ।
गर्दन को चारो तरफ से अच्छी तरह रगड़ने के वाद विनम्र ने एक बार फिर ऐसी हरकत की जो बिज्जू की समझ मेंं नहीं आईं । टॉवल का फंदा बनाकर वह ठीक इस तरह लाश की के चारो तरफ कस रहा था के जैसे जीवित व्यक्ति को मार डालने की कोशिश कर रहा हो ।
बिज्जू को यह हरकत अजीब लगी ।
पागलपन से भरी । वह बिंदू को दुवारा मारने की कोशिश क्यों कर रहा था? क्या उसे शक था कि बिंदू में अभी एकाध सांस बाकी है? अगर यह ऐसा सोच रहा था तो गधा था । बेवकूफ़ था । यह तो कभी की मर चुकी थी ।।
अंतत: विनम्र ने टॉवल वहीं, उसी पोजीशन में छोड़ा और खड़ा हो गया ।
लाश नजदीक खड़ा विनम्र कुछ देर तक कमरे का निरीक्षण करता रहा । उस "क्षण बिज्जू ने खुद को पूरी तरह फ्रिज के पीछे कर लिया था ।
फिर, उसने दूर जाती पदृचाप सुनी ।
सुईट का मुख्यद्वार खुला और बंद हो गया ।
हत्या करने के बाद इतने आराम से निकल गया हत्यारा?
और वह ।।।
वह अभी तक यहा का यही है।
यदि इस वक्त कोई सुईट में आ जाए! जाहिर है-वह लाश पर नजर पडते ही चीखने वाली मशीन की तरह चीखना शुरु कर देगा! पलक झपकते ही हुज्जूम लग जाएगा ।
निकल भागने का कोई मौका नहीं मिलेगा उसे अगर यह लाश के साथ पकड़ा गया तो लोग उसे ही हत्यारा समझेंगे ।
"हे भगवाना ! ये क्या बेवकूफी कर रहा हूं मैं ? क्यों छूपा हुआ हूं अभी तक यहां?"
"निकलकर भाग क्यों नहीं जाता?'
इन सब विचारों ने उसे फ्रिज के पीछे से बाहर निकल अाने पर मजबूर कर दिया ।
सबसे पहली नजर मुख्य द्वार पर पडी ।
वह 'लॉक' था ।
राहत की सांस ली । फिर सोचा--" मैं गधा हूं ! भला कोई हत्यारा कैसे साबित कर सकता हैं? मेरे पास कैमरा है । वह कैमरा जो सारी दुनिया को साफ-साफ़ बता देगा 'हत्या' किसने और किस तरह की है ।।।
मैं तो गवाह हूं ।।। मुझसे बड़ा गवाह है------ये कैमरा ।
पर कैमरे में मौजूद 'खजाने' को क्या मुझे इस तरह जाया कर देना चाहिए?
नहीं!
हरगिज नहीं ।!
कैमंरे में मौजूद फोटो करौड़पति बल्कि अरबपति बना सकते हैं, लेकिन तब जब सही मौका आने पर इन्हें विनम्र के सामने रखा जाए । वह इनकी मुह मांगी कीमत दे सकता है । उन फोटुओं से तो शायद यह कम कमाई करता जो यहां खींचने अाया था मगर जो फोटो इस वक्त कैमरे में है वो उसके पौ बारह कर देगें ।।।।
एक खरबपति शख्स खुद को कानुन से बचाने के लिए क्या नहीं दे देगा ?
वह खुद को कानून से बचाना चाहता है । इसलिए तो चुपचाप निकल गया ।
नहीं । ये फोटो किसी और को नजर नहीं आने चाहिए । यदि मुझे खुद को निर्दोष सावित करने के लिए इस्तेमाल करना पड़ा तो धमकी देकर विनम्र से बेशुमार दौलत कैसे खीचूंगा?
मुझे यहाँ से निकल जाना चाहिए । किसी भी किस्म की गडबड होने से पहले मेरा निकल जाना जरूरी है ।
ऐसा सोच कर मुख्यद्वार की तरफ़ लपका । गैलरी में पहुंचते-पहुचते कैमरा जेब में डाल चुका था । लिपट नम्बर फोर की तरफ बढते वक्त दिमाग में ख्याल कौंधा---"नही, मुझे इस लिफ्ट में सफर नहीं करना चाहिए । इसका लिफ्टमेन मुझे देखते ही गोडास्कर के हवाले कर देगा ।"
"व-विनम्र ।" भयक्रांत बिंदू पिछे हटती हुई बोली ---" ये तुम क्या कह रहे हो ?"
"बाह । मरते वक्त किसी लड़की का जिन्दगी के लिए छटपटाना कितना रोमचकारी होता है ।" बिंदू के सवाल का ज़वाब देने की जगह वह निरन्तर अागे बढता कहता चला गया…"मैं वो मंजर देखना चाहता हूं लड़की । मेरी आखें किसी तड़पती लड़की को देखने के लिए वहुत दिन से प्यासी है । आ…मैं तेरा गला दबा दूं ।।"
विनम्र इस वक्त आवाज ही से नहीं, शक्ल से भी दरिन्दा नजर अा रहा था । जिस्म का सारा खून सिमटकर सिर्फ और सिर्फ उसके चेहरे पर इकटृठा हो गया था । मस्तक और कनपटी की एक--एक नस साफ़ चमक रही थी । आखों में रोशन थे लाल रंग के बल्ब । बोहत ही डरावना लग रहा था वह । इतना ज्यादा कि उसे गुलाम वनाने सारी अंदाए भूलकर चीख पडी ।।
"बचाओ -बचाओ ।
चीखना वह तीसरी बार भी चाहती थी मंगर चीख न सकी ।
उससे पहले विनम्र ने झपटकर उसकी गर्दन दबोच ली थी ।
पहली बार बिंदुं की जगह विनम्र का चेहरा बिज्जू कै कैमरे के सामने था । उसके हाथ ही नहीं सारा जिस्म सूखे पत्ते की मानिन्द कांप रहा था । वंह चीख पडना चाहता था मगर आवाज हलक में घुटकर रह गई ।।
उसका गला नहीं दबाया जा रहा था मगर हालत उसकी भी विंदु जैसी थी ।
वह देख रहा था--- बिंदु की बाहर निकल अाई जीभ को पलकों की सीमाएं तोड़कर कूद पड़ने के लिए तैयार आंखों को । रुकती सांसो को और खुद को मरने से बचाने के लिए उसकी छटपटाहट को ।
कान बिंदू की "गु--गू' पर हावी हो गई विनम्र की आवाज सुन रहे थे----"अब आ रहा है मजा! वाह । क्या तड़पन है तेरी! तडप और तड़प! जनूनी अवस्था में वह सव कहता विनम्र उसकी गर्दन पर दवाब बढाता चला गया ।
बिज्जू की आंखें एक हत्या होते देख रही थी ।
बह बिंदू को बचाना चाहता था ।
मगर लगा---यदि विनम्र को उसके यहां होने का पता लग गया तो वह उसे भी नहीं छोड़ेगा । विनम्र इस वक्त मासूम लड़का कहां था? वह तो दरिन्दा बना हुआ था! दरिन्दा ।।
और फिर !!!!
बिंदू के मुंह से निकलने बाली "गूं-गूं की आवाज़ ने दम तोड दिया । हाथ-पांय ढीले पड गए । उनमे कोई छटपटाहट नहीं थी ।
विनम्र के हाथों में कंसी गर्दन हलाल हो चुके बकरे की मानिन्द लटकी रह गई थी ।
बिज्जू कै जहन में एक ही विचार कौधां ---" खेल खत्म । "
उस वक्त जाने कैसे उसे अपने हाथों में मोजूद कैमरे का ख्याल आया ? इधर उसने बटन दबाया उधर विनम्र ने अपने हाथ बिंदू की गर्दन से हटा लिए । लाश "धप्प' की आवाज के साथ कालीन पर जा गिरी । उसकी गर्दन में मौजूद सच्चे मोतियों की माला विनम्र की अंगुषियों में उलझकर रह थी ।
वह टूट गई ।
सफेद रंग के मोती कालीन पर दूर--दूर तक बिखर गए ।
उछलता, कूदता और लुढ़कता हुआ एक मोती फ्रिज के पीछे भी आ घुसा । ठीक वहा जहाँ बिज्यू था! मारे खौफ के बिज्जू का यह हाल हो गया था कि मोती को फौरन ही अंगुली मारकर बापस लाश की तरफ लुढ़का दिया । कछ ऐसे अंदाज में वह मोती नहीं मर्डर वेपन हो ।
विनम्र अपने कदमों में पड्री लाश और बिघरे मोतियों को फटी-फटी आंखों से देख रहा था ।।
अंदाज ऐसा था जैसे यह सब उसने नहीं, किसी और ने किया हो ।
चेहरे पर मोजूद हिंसा के भाव खौफ के भावो में तब्दील होते चले गए । आंखे बिंदू की लाश से हटने का नाम नहीं ले रही थी । उसकी जीभ और
आंखें बाहर निकली हुई थीं । विनम्र को लगा---बिंदू जीभ निकालकर उसे चिड़ा रहीहै। आंखें उसी को घूर रही हैं ।।
उसका हर अंग ढीला और शिथिल पड़ चुका था ।
विनम्र ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढांप लिया! और. . . . .
बिज्जू स वक्त दंग रह गया जब विनम्र क्रो फूट…फूट कर रोते देखा ।। यह बात उसकी समझ से पूरी तरह बाहर थी कि हत्यारा हत्या करने के बाद रो क्यों रहा है? चेहरे पर मौजूद आंखे तक ढांप ली थीं उसने । जैसे लाश को देखना न चाहता हो ।
चेहरे को यूंही ढांपे वह रोता हुआ लाश के नजदीक से हटा । कदम ऐसे डगमगाए थे जैसे क्षमता से कई गुनी ज्यादा पी गया हो । सोफे पर जा गिरा । वहाँ भी बस हाथो से चेहरा छुपाए रोता रहा । बिज्जू की समझ मे ना आ रहा था "ये हो क्या रहा है?" न ही यह 'इन हालात वह क्या करे ?'
रोते हुए विनम्र के फोटो ले डाले उसने ।
बिज्जू की समझ में नहीं आ रहा था विनम्र क्या सोच रहा है, क्या कर रहा है! कभी रोने लगता । कभी सामान्य नजर जाता था । कभी उसके चेहरे पर किसी ठोस निश्चय की परछाई नजर जाने लगती थी ।
अब बाथरूम में गया था ।
दिमाग में सवाल अाया--" वह बाथरुम ने क्यों गया है?"
दिल जोर जोर से पसलियों पर सिर टकरा रहा था । 'जी' चाह रहा था'--फ्रिज़ के पीछे से निकले! देखने की केशिश तो करे वह बाथरुम में कर क्या रहा है मगर ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा'सका । जानता धा----अगर विनम्र को यहाँ उसकी मोज़दूगी का एहसास हो गया तो उसका भी वहीं हस्र होगा जो बिंदू का हुआ है ।
उसका खात्मा करते वक्त जो भाव विनम्र के चेहरे पर थे उन्हें याद करके बिज्जू के तिरपन कांप गए ।
उसने छूपे रहने में भलाई समझी ।
मुश्किल से दस सेकण्ड बाद सुईट में बाथरुम का दरवाजा बंद होने की आवाज गूंजी । फिर, विनम्र नजर अाया ।
इस वक्त उसके हाथ में सफेद रंग का एक रोएदार टॉवल था । टॉवल लिए वह लाश के नजदीक पहुचा।
बिज्जू का दिल धाड़ धाड़ करके बज रहा था ।
कैमरा एक बार फिर सम्भाल लिया । बिनम्र लाश के सिरहाने, घुटनों के बल बैठ गया ।
बिज्जू ने देखा-----कुछ देर बाद लाश की गर्दन को टॉवल से रगड रहा था । बिज्जू ने यह दृश्य कैमरे में कैद कर लिया ।
गर्दन को चारो तरफ से अच्छी तरह रगड़ने के वाद विनम्र ने एक बार फिर ऐसी हरकत की जो बिज्जू की समझ मेंं नहीं आईं । टॉवल का फंदा बनाकर वह ठीक इस तरह लाश की के चारो तरफ कस रहा था के जैसे जीवित व्यक्ति को मार डालने की कोशिश कर रहा हो ।
बिज्जू को यह हरकत अजीब लगी ।
पागलपन से भरी । वह बिंदू को दुवारा मारने की कोशिश क्यों कर रहा था? क्या उसे शक था कि बिंदू में अभी एकाध सांस बाकी है? अगर यह ऐसा सोच रहा था तो गधा था । बेवकूफ़ था । यह तो कभी की मर चुकी थी ।।
अंतत: विनम्र ने टॉवल वहीं, उसी पोजीशन में छोड़ा और खड़ा हो गया ।
लाश नजदीक खड़ा विनम्र कुछ देर तक कमरे का निरीक्षण करता रहा । उस "क्षण बिज्जू ने खुद को पूरी तरह फ्रिज के पीछे कर लिया था ।
फिर, उसने दूर जाती पदृचाप सुनी ।
सुईट का मुख्यद्वार खुला और बंद हो गया ।
हत्या करने के बाद इतने आराम से निकल गया हत्यारा?
और वह ।।।
वह अभी तक यहा का यही है।
यदि इस वक्त कोई सुईट में आ जाए! जाहिर है-वह लाश पर नजर पडते ही चीखने वाली मशीन की तरह चीखना शुरु कर देगा! पलक झपकते ही हुज्जूम लग जाएगा ।
निकल भागने का कोई मौका नहीं मिलेगा उसे अगर यह लाश के साथ पकड़ा गया तो लोग उसे ही हत्यारा समझेंगे ।
"हे भगवाना ! ये क्या बेवकूफी कर रहा हूं मैं ? क्यों छूपा हुआ हूं अभी तक यहां?"
"निकलकर भाग क्यों नहीं जाता?'
इन सब विचारों ने उसे फ्रिज के पीछे से बाहर निकल अाने पर मजबूर कर दिया ।
सबसे पहली नजर मुख्य द्वार पर पडी ।
वह 'लॉक' था ।
राहत की सांस ली । फिर सोचा--" मैं गधा हूं ! भला कोई हत्यारा कैसे साबित कर सकता हैं? मेरे पास कैमरा है । वह कैमरा जो सारी दुनिया को साफ-साफ़ बता देगा 'हत्या' किसने और किस तरह की है ।।।
मैं तो गवाह हूं ।।। मुझसे बड़ा गवाह है------ये कैमरा ।
पर कैमरे में मौजूद 'खजाने' को क्या मुझे इस तरह जाया कर देना चाहिए?
नहीं!
हरगिज नहीं ।!
कैमंरे में मौजूद फोटो करौड़पति बल्कि अरबपति बना सकते हैं, लेकिन तब जब सही मौका आने पर इन्हें विनम्र के सामने रखा जाए । वह इनकी मुह मांगी कीमत दे सकता है । उन फोटुओं से तो शायद यह कम कमाई करता जो यहां खींचने अाया था मगर जो फोटो इस वक्त कैमरे में है वो उसके पौ बारह कर देगें ।।।।
एक खरबपति शख्स खुद को कानुन से बचाने के लिए क्या नहीं दे देगा ?
वह खुद को कानून से बचाना चाहता है । इसलिए तो चुपचाप निकल गया ।
नहीं । ये फोटो किसी और को नजर नहीं आने चाहिए । यदि मुझे खुद को निर्दोष सावित करने के लिए इस्तेमाल करना पड़ा तो धमकी देकर विनम्र से बेशुमार दौलत कैसे खीचूंगा?
मुझे यहाँ से निकल जाना चाहिए । किसी भी किस्म की गडबड होने से पहले मेरा निकल जाना जरूरी है ।
ऐसा सोच कर मुख्यद्वार की तरफ़ लपका । गैलरी में पहुंचते-पहुचते कैमरा जेब में डाल चुका था । लिपट नम्बर फोर की तरफ बढते वक्त दिमाग में ख्याल कौंधा---"नही, मुझे इस लिफ्ट में सफर नहीं करना चाहिए । इसका लिफ्टमेन मुझे देखते ही गोडास्कर के हवाले कर देगा ।"