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Guest
यह एक औसत दर्जे का होटल था । चक्रधर रिसेप्शन पर पहुंचा । यहाँ एक भदृदी-सी औरत बैठी थी ।
चक्रधर ने जब कहा---"मुझे 'मनसब' से मिलना है ।" तो औरत ने है आवाज़ देकर करीब पन्द्रह वर्षीय लडके को बुलाया । उससे कहा…"साहब को रूम नम्बर आठ में ले जा ।"
" मैं खुद चला जाऊंगा ।" कहने कै बाद चक्रधर चौबे आगे बढ़ गया ।
अगले दो मिनट बाद वह उस बंद कमरे की कमरे की वैल वजा रहा था " जिसकी चौखट पर 'आठ' लिखा था ।
बंद दरवाजा खुला! मनसब उसके सामने था । वह, जिसका कद किसी भी तरह छ: फूट दो इंच से कम नहीं था । अपने कद के अनुपात मे काफी पतला था वह । इस कारण 'बल्ली' जैसा लगता था । चेहरे पर करीने से तराशी गई दाढी थी । बावजूद इसके दोनों गालो की उभरी हुई हडिृडयां साफ़ नजर अाती थीं । आंखें बहुत छोटी--छोंटी थी । ऐसी चमक थी उनमे जैसी सर्प की आंखों में होती है । नाक तोते जैसी थी । होठ पतले । कान बड़े-वड़े । कुल मिलाकर वह एक कूर शख्स लगता था ।
चक्रधर चौबे पर नजर पड़ते ही एक तरफ हटता बोला---"आओ सेठ । आओ-- आ जाओ ।। "
चक्रधर अदर दाखिल हुआ । एक ही नजर में उसने सारा कमरा टंटोल डाला । पूछा--'" कहां है ?"
" क्या?" मनसब ने दरवाजा बंद करके चटकनी चढा दी ।
"लाश !"
"'आराम से बैठो । तुम तो जरूरत से कुछ ज्यादा ही बेचैन नजर आरहे हो।"
"बात ही बेचैनी की है । अभी तक लाश को अपने साथ लिए घूम रहे हो । भला ये भी कोई समझदारी हुई"'
"तुम्हारे हिसाब से बेवकूफी हो सकती है सेठ मेरे हिसाब से समझदारी है ।"
"क्या मतलब?"
"बताता हू।" कहने के बाद डबलवेड के सिरहाने की तरफ बढा उसके हाथ-पेर और अंगुलियां…सब कुछ लम्बे-लम्बे थे । सिरहाने के नजदीक ग्रे कलर की एक वहुत बडी अटैंची रखी थी । मनसव उसके नजदीक बैठा और फिर एक झटके से उसका ढक्कन उठा दिया ।
चक्रधर हडवड़ा गया ।
अपने मुंह से निकलने के लिए बेताब चीख को बड़ी मुश्किल से रोका ।
भयाक्रांत आंखें अटैची पर जमी रह गई थी बल्कि यह कहा जाए तो ज्यादा मुनसिब होगा------आखें बिदू की लाश पर जमी हुई थी । वह उकडू हालत में थी । देखने मात्र से पता लगता था--लाश को घुटने और क्रोहनियां मोड़कर उसे अटैची मे जबरदस्ती ठूंसा गया है । चेहरा दोनों घुटनों के बीच ठूंसा हुआ था ।।
चक्रधर चौबे के जिस्म में झुरझुरी-सी दौड़ गई ।।
" प--प्लीज ।" बह कह उठा-“इसे बंद-कर दो ।"
"क्यों सेठ ।।" मनसब इस तरह हंसा कि चक्रधर पर खौफ हावी होगया । अटैची को बंद करने की कोई भी केशिश किए वगेर वह खड़ा होता हुआ बोला------" एक सेकण्ड पहले तक तो लाश देखने के लिए मरे जा रहे थे । अगले सेकण्ड इसे देखकर मेरे जा रहे हो । डरो मत । जिन्दा व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का सब कुछ बिगाड़ सकता है मगर लाश,कुछ नहीं बिगाड़ सकती ।"
" मेरी समझ में नहीं आरहा, तुम अभी तक इसे लिए क्यो घूम रहे हो ?"
"क्योंकि पहले नहीं समझ सका था लाश इतनी कीमती है ।। "
" मतलब?"
"एकदम साफ है सेठ ।" कहने के साथ मनसब ने अपनी जेब से जर्दायुक्त-गुटखा निकाला ।। उसका कौना फाड़ा ।सारा मसाला एकही बार मुंह में डालने के बाद बौला-" नांवां दुगना लगेगा ।"
" दुगना ?"
" जितना तय हुआ था उसका डबल।"
"यानी चार लाख ?"
" अच्छा है ! तुम्हें तय की रकम याद है ।"
" पर मनसब ये बात उसूल के खिलाफ है ।"
"कौंनं सा उसूल? "
"तुम्हारे धंधें का उसूल । मैंने सुना है तुम लोग एक बार जौ रकम कुबूल कर लेते हो.......
'"वेसा तब होता है सेठ जब सोचने का मोका मिला हो । जर्दा चबाता मनसब उसकी बात काटकर कहता चला गया'--"रकम सोच समझकर मांगी गई हो । मुझे सोचने का तुमने मौका ही नहीं दिया ।
गलती तुम्हारी है । तुमने रात के ठीक दस बजे मेरे मोबाईल पर फोन किया । कहा---" होटल ओबराय के सुइट नम्बर सेविन जीरो थटींन में एक लाश पडी है । किसी की भी जानकारी में लाये बगैर उसे बहां से हटाना है । मैं हकवका गया । लोग कत्ल तो कराते हैं मुझसे मगर ऐसा काम पहली बार करा रहा था । यानी कि कतंल हुए व्यक्ति की लाश तो घंटनास्थल से गायब करने का काम । मेरे मुंह से "दो लाख' अाए, वही कह दिया । `तुमने वगैर हील-हुज्जत किए रकम कबूल कर ली और कहा…“यह काम अभी इसी वक्त होना चाहीए । कैसे करोगे?"
मैंने कहा-"फिलहाल केवल इतना करो, होटल की सातवीं मंजिल पर किसी फ़र्जी नाम से एक कमरा बूक करा दो । पैर रखने की जगह तो मिले । बाद में स्रोचूंगा क्या कैसे करना है ।'
तुमने कहा…"'ठीक्र है अमरसिंह नाम से कमरा बुक करा देता हूं । रूम नम्बर रिसेप्शन से मालूम कर लेना । मेने पूछा-'-""रकम कब और कैसे मिलेगी? तुमने कहा -- "तुम्हारे लिए अजनबी तो हूं नहीं । काम होने के बाद 'कंस्ट्रक्शन कम्पनी' के मेरे अाफिस मे अाकर चाहे जब ले जाना ।' मैने बात कुबूल करली । इसके वावजूद कबूल कर ली कि हम लोगों का ' उसूल आधी रकम काम से पहले लेने का है । इस उसूल की याद दिलाकर मैं तुम्हें उस आधी रकम देने के लिए मजदूर कर सकता था मगर नहीं किया । यह सोचकर नहीं किया कि. व्यर्थ ही "मेरा सेठ' मुसीबत मे पड़ जाएगा । टाईम उस वक्त वैसे ही तुम्हारे पास जहर खाने तक का नहीं था। तुम्हारी मुसीबत को मैंने अपनी मुसीबत समझा और लग गया यह सोचने मे की भरेपूरे फाईव स्टार होटल के सुईट में पडी लाश को सबकी नजरों से बचाकर कैसे निकाला जा सकता । यह काम आसान नहीं था । सेठ ! मेरे अलावा किसी और की सौपते तो शायद वह कर भी नहीं पाता! तो तरकीब ही मेरे दिमाग में ऐसी अा गई कि काम साला काम ही नहीं लगा । ये अटैची लेकर पहुंच गया ओबराय के रिसेप्शन पर । अपना नाम 'अमरसिंह' बताया । उन्होंने रूम नंबर सेबिन जीरो सेबिन्टीन मे पहुंचा दिया । वेटर के जाते ही मैंने अपना कमरा बंद किया और अटैची सम्भाले सुइट की तरफ बढ गया । गेलरी में मोजूद इंचार्ज और होटल के दूसरे स्टाफ़ की नजरों से खुद को बचाने के लिए क्या-क्या पापड बेलने पड़े, उनके बारे में विस्तार से बताने लगा तो शाम, हो जाएगी इसलिए शॉर्ट में यूं समझो-सबकी आंखो में धुल झौकता सुईट के दरवाजे पर पहुच गया ।।।।
आंख 'की-होल' से सटाई । इन मोहतरमा की लाश सामने ही पड्री थी । एक बार फिर कहूंगा सेठ-------अगर यह काम तुमने किसी मर्डर सोशलिस्ट को सौंपा होता तो किसी हालत में सम्पन्न नहीं हो सकता था । दरवाजा लॉक था । और मर्डर सोशलिस्ट भले ही आदमी को भुर्ता बना सकते हो मगर बगैर चाबी के लॉक नहीं खोल सकते । और 'लॉक' खोले बगैर यह काम नहीं हो सकता था । शुक्र मनाओ-आदमियों का क्रियाकर्म करने में माहिर बनने से पहले मनसब नाम का यह बंदा चोरियां करने का उस्ताद माना जाता था ।
अपने उसी फ़न के इस्तेमाल से मैंने लॉक खोता । सुईट में पहुचा । लाश सुटकेस में ठूंसी । गनीमत थी तव तक इस मोहतरमा को मरे ज्यादा वक्त नहीं गुजरा था अर्थात् लाश अकड्री नहीं थी । वैसा हो गया होता तो इसे सूटकेस में ठूंसना नामुमकिन हो जाता है । उसके बाद मेने लाश के चारों तरफ बिखरे मोती चुने ।"
"म-मोती'-"' चक्रधर चौबे के मुंह से यहीं एक लफ्ज निकला ।
" "हां सेठ ! मोती! इसी मोहतरमा की माला के मोती थे वे । हालाकि तुमने यह काम नहीं सौपा था । केवल लाश को सुईट से निकाल कर कहीं ठिकाने लगाने की बात कहीं थी मगर मोती मैंने खुद चुने । अपनी खोपडी से यह सोचकर चुने कि जव वे पुलिस को बरामद हो गए तो शायद तुम्हारा वहां से लाश को हटवाने का मकसद ही खत्म हो जाएगा ।"
चक्रधर चौवे को अपनी 'भूल का एहसास हुआ ।
ठीक ही कह रहा था मनसब उसने खुद भी लाश के चारों तरफ बिखरे मोती देखे थे परन्तु मनसब से लाश के साथ उन मोतियों को भी हटाने के बारे में कहना भूल गया था । यह टाईम ही ऐसा या । दिमाग पर हड़बड़ाहट हावी थी । जितना सूझ गया वह काफी था । सारे हालात पर गोर करने के वाद वह बोला----"छोटी-छोटी बाते नहीं बताई जाती मनसब| जव मैंने लाश हटाने का काम सौपा था तो जाहिर था-------मैं किसी को वहाँ हुए मर्डर की भनक नहीं लगने देना चाहता । अपने विवेक से तुमने मोती हटाने का काम करके ठीक ही किया ।"
"मेने केवल मोती ही नहीं हटाए हैं सेठ । अच्छी तरह सफाई भी की है । अब कोई माई का लाल यदि खुर्दबीन लेकर भी वहां का निरीक्षन करेगा तो ताड नहीं सकेगा तुमने वहाँ इस मोहतरमा का क्रियाकर्म किया है ।।
"म--मैंने!" हलक से निकले इस लफ्ज के साथ चक्रधर चौबे का मुंह सूख गया ।
" तुम तो यूं उछल रहे हो सेठ जैसे इसका क्रियाकर्म तुमने नहीं मेने ‘ कियाहो । मर्डर करना आसान है । मुश्किल उसके बाद कै हालात है से जूझना है । खेर, भला तुम्हें इन बातों का क्या एक्सपीरियेस हो सकता था । मेरे ख्याल से तुम्हारा यह पहला ही काम है । तभी तो अभी तक चेहरे की दोनों सुईयां बारह पर अटकी पड़ी है । मर्डर कर तो दिया तुमने लेकिन उसके बाद बूरी तरह घबरा गए । मुश्किल काम' मुझे सौप दिया । इससे तो बेहतर होता मर्डर ही मुझसे करा लेते ।"
चक्रधर ने जब कहा---"मुझे 'मनसब' से मिलना है ।" तो औरत ने है आवाज़ देकर करीब पन्द्रह वर्षीय लडके को बुलाया । उससे कहा…"साहब को रूम नम्बर आठ में ले जा ।"
" मैं खुद चला जाऊंगा ।" कहने कै बाद चक्रधर चौबे आगे बढ़ गया ।
अगले दो मिनट बाद वह उस बंद कमरे की कमरे की वैल वजा रहा था " जिसकी चौखट पर 'आठ' लिखा था ।
बंद दरवाजा खुला! मनसब उसके सामने था । वह, जिसका कद किसी भी तरह छ: फूट दो इंच से कम नहीं था । अपने कद के अनुपात मे काफी पतला था वह । इस कारण 'बल्ली' जैसा लगता था । चेहरे पर करीने से तराशी गई दाढी थी । बावजूद इसके दोनों गालो की उभरी हुई हडिृडयां साफ़ नजर अाती थीं । आंखें बहुत छोटी--छोंटी थी । ऐसी चमक थी उनमे जैसी सर्प की आंखों में होती है । नाक तोते जैसी थी । होठ पतले । कान बड़े-वड़े । कुल मिलाकर वह एक कूर शख्स लगता था ।
चक्रधर चौबे पर नजर पड़ते ही एक तरफ हटता बोला---"आओ सेठ । आओ-- आ जाओ ।। "
चक्रधर अदर दाखिल हुआ । एक ही नजर में उसने सारा कमरा टंटोल डाला । पूछा--'" कहां है ?"
" क्या?" मनसब ने दरवाजा बंद करके चटकनी चढा दी ।
"लाश !"
"'आराम से बैठो । तुम तो जरूरत से कुछ ज्यादा ही बेचैन नजर आरहे हो।"
"बात ही बेचैनी की है । अभी तक लाश को अपने साथ लिए घूम रहे हो । भला ये भी कोई समझदारी हुई"'
"तुम्हारे हिसाब से बेवकूफी हो सकती है सेठ मेरे हिसाब से समझदारी है ।"
"क्या मतलब?"
"बताता हू।" कहने के बाद डबलवेड के सिरहाने की तरफ बढा उसके हाथ-पेर और अंगुलियां…सब कुछ लम्बे-लम्बे थे । सिरहाने के नजदीक ग्रे कलर की एक वहुत बडी अटैंची रखी थी । मनसव उसके नजदीक बैठा और फिर एक झटके से उसका ढक्कन उठा दिया ।
चक्रधर हडवड़ा गया ।
अपने मुंह से निकलने के लिए बेताब चीख को बड़ी मुश्किल से रोका ।
भयाक्रांत आंखें अटैची पर जमी रह गई थी बल्कि यह कहा जाए तो ज्यादा मुनसिब होगा------आखें बिदू की लाश पर जमी हुई थी । वह उकडू हालत में थी । देखने मात्र से पता लगता था--लाश को घुटने और क्रोहनियां मोड़कर उसे अटैची मे जबरदस्ती ठूंसा गया है । चेहरा दोनों घुटनों के बीच ठूंसा हुआ था ।।
चक्रधर चौबे के जिस्म में झुरझुरी-सी दौड़ गई ।।
" प--प्लीज ।" बह कह उठा-“इसे बंद-कर दो ।"
"क्यों सेठ ।।" मनसब इस तरह हंसा कि चक्रधर पर खौफ हावी होगया । अटैची को बंद करने की कोई भी केशिश किए वगेर वह खड़ा होता हुआ बोला------" एक सेकण्ड पहले तक तो लाश देखने के लिए मरे जा रहे थे । अगले सेकण्ड इसे देखकर मेरे जा रहे हो । डरो मत । जिन्दा व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का सब कुछ बिगाड़ सकता है मगर लाश,कुछ नहीं बिगाड़ सकती ।"
" मेरी समझ में नहीं आरहा, तुम अभी तक इसे लिए क्यो घूम रहे हो ?"
"क्योंकि पहले नहीं समझ सका था लाश इतनी कीमती है ।। "
" मतलब?"
"एकदम साफ है सेठ ।" कहने के साथ मनसब ने अपनी जेब से जर्दायुक्त-गुटखा निकाला ।। उसका कौना फाड़ा ।सारा मसाला एकही बार मुंह में डालने के बाद बौला-" नांवां दुगना लगेगा ।"
" दुगना ?"
" जितना तय हुआ था उसका डबल।"
"यानी चार लाख ?"
" अच्छा है ! तुम्हें तय की रकम याद है ।"
" पर मनसब ये बात उसूल के खिलाफ है ।"
"कौंनं सा उसूल? "
"तुम्हारे धंधें का उसूल । मैंने सुना है तुम लोग एक बार जौ रकम कुबूल कर लेते हो.......
'"वेसा तब होता है सेठ जब सोचने का मोका मिला हो । जर्दा चबाता मनसब उसकी बात काटकर कहता चला गया'--"रकम सोच समझकर मांगी गई हो । मुझे सोचने का तुमने मौका ही नहीं दिया ।
गलती तुम्हारी है । तुमने रात के ठीक दस बजे मेरे मोबाईल पर फोन किया । कहा---" होटल ओबराय के सुइट नम्बर सेविन जीरो थटींन में एक लाश पडी है । किसी की भी जानकारी में लाये बगैर उसे बहां से हटाना है । मैं हकवका गया । लोग कत्ल तो कराते हैं मुझसे मगर ऐसा काम पहली बार करा रहा था । यानी कि कतंल हुए व्यक्ति की लाश तो घंटनास्थल से गायब करने का काम । मेरे मुंह से "दो लाख' अाए, वही कह दिया । `तुमने वगैर हील-हुज्जत किए रकम कबूल कर ली और कहा…“यह काम अभी इसी वक्त होना चाहीए । कैसे करोगे?"
मैंने कहा-"फिलहाल केवल इतना करो, होटल की सातवीं मंजिल पर किसी फ़र्जी नाम से एक कमरा बूक करा दो । पैर रखने की जगह तो मिले । बाद में स्रोचूंगा क्या कैसे करना है ।'
तुमने कहा…"'ठीक्र है अमरसिंह नाम से कमरा बुक करा देता हूं । रूम नम्बर रिसेप्शन से मालूम कर लेना । मेने पूछा-'-""रकम कब और कैसे मिलेगी? तुमने कहा -- "तुम्हारे लिए अजनबी तो हूं नहीं । काम होने के बाद 'कंस्ट्रक्शन कम्पनी' के मेरे अाफिस मे अाकर चाहे जब ले जाना ।' मैने बात कुबूल करली । इसके वावजूद कबूल कर ली कि हम लोगों का ' उसूल आधी रकम काम से पहले लेने का है । इस उसूल की याद दिलाकर मैं तुम्हें उस आधी रकम देने के लिए मजदूर कर सकता था मगर नहीं किया । यह सोचकर नहीं किया कि. व्यर्थ ही "मेरा सेठ' मुसीबत मे पड़ जाएगा । टाईम उस वक्त वैसे ही तुम्हारे पास जहर खाने तक का नहीं था। तुम्हारी मुसीबत को मैंने अपनी मुसीबत समझा और लग गया यह सोचने मे की भरेपूरे फाईव स्टार होटल के सुईट में पडी लाश को सबकी नजरों से बचाकर कैसे निकाला जा सकता । यह काम आसान नहीं था । सेठ ! मेरे अलावा किसी और की सौपते तो शायद वह कर भी नहीं पाता! तो तरकीब ही मेरे दिमाग में ऐसी अा गई कि काम साला काम ही नहीं लगा । ये अटैची लेकर पहुंच गया ओबराय के रिसेप्शन पर । अपना नाम 'अमरसिंह' बताया । उन्होंने रूम नंबर सेबिन जीरो सेबिन्टीन मे पहुंचा दिया । वेटर के जाते ही मैंने अपना कमरा बंद किया और अटैची सम्भाले सुइट की तरफ बढ गया । गेलरी में मोजूद इंचार्ज और होटल के दूसरे स्टाफ़ की नजरों से खुद को बचाने के लिए क्या-क्या पापड बेलने पड़े, उनके बारे में विस्तार से बताने लगा तो शाम, हो जाएगी इसलिए शॉर्ट में यूं समझो-सबकी आंखो में धुल झौकता सुईट के दरवाजे पर पहुच गया ।।।।
आंख 'की-होल' से सटाई । इन मोहतरमा की लाश सामने ही पड्री थी । एक बार फिर कहूंगा सेठ-------अगर यह काम तुमने किसी मर्डर सोशलिस्ट को सौंपा होता तो किसी हालत में सम्पन्न नहीं हो सकता था । दरवाजा लॉक था । और मर्डर सोशलिस्ट भले ही आदमी को भुर्ता बना सकते हो मगर बगैर चाबी के लॉक नहीं खोल सकते । और 'लॉक' खोले बगैर यह काम नहीं हो सकता था । शुक्र मनाओ-आदमियों का क्रियाकर्म करने में माहिर बनने से पहले मनसब नाम का यह बंदा चोरियां करने का उस्ताद माना जाता था ।
अपने उसी फ़न के इस्तेमाल से मैंने लॉक खोता । सुईट में पहुचा । लाश सुटकेस में ठूंसी । गनीमत थी तव तक इस मोहतरमा को मरे ज्यादा वक्त नहीं गुजरा था अर्थात् लाश अकड्री नहीं थी । वैसा हो गया होता तो इसे सूटकेस में ठूंसना नामुमकिन हो जाता है । उसके बाद मेने लाश के चारों तरफ बिखरे मोती चुने ।"
"म-मोती'-"' चक्रधर चौबे के मुंह से यहीं एक लफ्ज निकला ।
" "हां सेठ ! मोती! इसी मोहतरमा की माला के मोती थे वे । हालाकि तुमने यह काम नहीं सौपा था । केवल लाश को सुईट से निकाल कर कहीं ठिकाने लगाने की बात कहीं थी मगर मोती मैंने खुद चुने । अपनी खोपडी से यह सोचकर चुने कि जव वे पुलिस को बरामद हो गए तो शायद तुम्हारा वहां से लाश को हटवाने का मकसद ही खत्म हो जाएगा ।"
चक्रधर चौवे को अपनी 'भूल का एहसास हुआ ।
ठीक ही कह रहा था मनसब उसने खुद भी लाश के चारों तरफ बिखरे मोती देखे थे परन्तु मनसब से लाश के साथ उन मोतियों को भी हटाने के बारे में कहना भूल गया था । यह टाईम ही ऐसा या । दिमाग पर हड़बड़ाहट हावी थी । जितना सूझ गया वह काफी था । सारे हालात पर गोर करने के वाद वह बोला----"छोटी-छोटी बाते नहीं बताई जाती मनसब| जव मैंने लाश हटाने का काम सौपा था तो जाहिर था-------मैं किसी को वहाँ हुए मर्डर की भनक नहीं लगने देना चाहता । अपने विवेक से तुमने मोती हटाने का काम करके ठीक ही किया ।"
"मेने केवल मोती ही नहीं हटाए हैं सेठ । अच्छी तरह सफाई भी की है । अब कोई माई का लाल यदि खुर्दबीन लेकर भी वहां का निरीक्षन करेगा तो ताड नहीं सकेगा तुमने वहाँ इस मोहतरमा का क्रियाकर्म किया है ।।
"म--मैंने!" हलक से निकले इस लफ्ज के साथ चक्रधर चौबे का मुंह सूख गया ।
" तुम तो यूं उछल रहे हो सेठ जैसे इसका क्रियाकर्म तुमने नहीं मेने ‘ कियाहो । मर्डर करना आसान है । मुश्किल उसके बाद कै हालात है से जूझना है । खेर, भला तुम्हें इन बातों का क्या एक्सपीरियेस हो सकता था । मेरे ख्याल से तुम्हारा यह पहला ही काम है । तभी तो अभी तक चेहरे की दोनों सुईयां बारह पर अटकी पड़ी है । मर्डर कर तो दिया तुमने लेकिन उसके बाद बूरी तरह घबरा गए । मुश्किल काम' मुझे सौप दिया । इससे तो बेहतर होता मर्डर ही मुझसे करा लेते ।"